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असेम्बली बम काण्ड पर यह अपील भगतसिंह द्वारा जनवरी, 1930 में हाई कोर्ट में की गयी थी। इसी अपील में ही उनका यह प्रसिद्द वक्तव्य था : “पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और यही चीज थी, जिसे हम प्रकट करना चाहते थे।”


माई लॉर्ड, हम न वकील हैं, न अंग्रेजी विशेषज्ञ और न हमारे पास डिगरियां हैं। इसलिए हमसे शानदार भाषणों की आशा न की जाए। हमारी प्रार्थना है कि हमारे बयान की भाषा संबंधी त्रुटियों पर ध्यान न देते हुए, उसके वास्तवकि अर्थ को समझने का प्रयत्न किया जाए। दूसरे तमाम मुद्दों को अपने वकीलों पर छोड़ते हुए मैं स्वयं एक मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करूंगा। यह मुद्दा इस मुकदमे में बहुत महत्वपूर्ण है। मुद्दा यह है कि हमारी नीयत क्या थी और हम किस हद तक अपराधी हैं।

विचारणीय यह है कि असेंबली में हमने जो दो बम फेंके, उनसे किसी व्यक्ति को शारीरिक या आर्थिक हानि नहीं हुई। इस दृष्टिकोण से हमें जो सजा दी गई है, वह कठोरतम ही नहीं, बदला लेने की भावना से भी दी गई है। यदि दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए, तो जब तक अभियुक्त की मनोभावना का पता न लगाया जाए, उसके असली उद्देश्य का पता ही नहीं चल सकता। यदि उद्देश्य को पूरी तरह भुला दिया जाए, तो किसी के साथ न्याय नहीं हो सकता, क्योंकि उद्देश्य को नजरों में न रखने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति भी साधारण हत्यारे नजर आएंगे। सरकारी कर वसूल करने वाले अधिकारी चोर, जालसाज दिखाई देंगे और न्यायाधीशों पर भी कत्ल करने का अभियोग लगेगा। इस तरह सामाजिक व्यवस्था और सभ्यता खून-खराबा, चोरी और जालसाजी बनकर रह जाएगी। यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाए, तो किसी हुकूमत को क्या अधिकार है कि समाज के व्यक्तियों से न्याय करने को कहे? यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाए, तो हर धर्म प्रचारक झूठ का प्रचारक दिखाई देगा और हरेक पैगंबर पर अभियोग लगेगा कि उसने करोड़ों भोले और अनजान लोगों को गुमराह किया । यदि उद्देश्य को भुला दिया जाए, तो हजरत ईसा मसीह गड़बड़ी फैलाने वाले, शांति भंग करने वाले और विद्रोह का प्रचार करने वाले दिखाई देंगे और कानून के शब्दों में वह खतरनाक व्यक्तित्व माने जाएंगे… अगर ऐसा हो, तो मानना पड़ेगा कि इनसानियत की कुरबानियां, शहीदों के प्रयत्न, सब बेकार रहे और आज भी हम उसी स्थान पर खड़े हैं, जहां आज से बीस शताब्दियों पहले थे। कानून की दृष्टि से उद्देश्य का प्रश्न खासा महत्व रखता है।

माई लॉर्ड, इस दशा में मुझे यह कहने की आज्ञा दी जाए कि जो हुकूमत इन कमीनी हरकतों में आश्रय खोजती है, जो हुकूमत व्यक्ति के कुदरती अधिकार छीनती है, उसे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं। अगर यह कायम है, तो आरजी तौर पर और हजारों बेगुनाहों का खून इसकी गर्दन पर है। यदि कानून उद्देश्य नहीं देखता, तो न्याय नहीं हो सकता और न ही स्थायी शांति स्थापित हो सकती है। आटे में संखिया मिलाना जुर्म नहीं, यदि उसका उद्देश्य चूहों को मारना हो। लेकिन यदि इससे किसी आदमी को मार दिया जाए, तो कत्ल का अपराध बन जाता है। लिहाजा, ऐसे कानूनों को, जो युक्ति (दलील) पर आधारित नहीं और न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है, उन्हें समाप्त कर देना चाहिए। ऐसे ही न्याय विरोधी कानूनों के कारण बड़े-बड़े श्रेष्ठ बौद्धिक लोगों ने बगावत के कार्य किए हैं।

हमारे मुकदमे के तथ्य बिल्कुल सादा हैं। 8 अप्रैल, 1929 को हमने सेंट्रल असेंबली में दो बम फेंके। उनके धमाके से चंद लोगों को मामूली खरोंचें आईं। चेंबर में हंगामा हुआ, सैकड़ों दर्शक और सदस्य बाहर निकल गए। कुछ देर बाद खामोशी छा गई। मैं और साथी बीके दत्त खामोशी के साथ दर्शक गैलरी में बैठे रहे और हमने स्वयं अपने को प्रस्तुत किया कि हमें गिरफ्तार कर लिया जाए। हमें गिरफ्तार कर लिया गया। अभियोग लगाए गए और हत्या करने के प्रयत्न के अपराध में हमें सजा दी गई। लेकिन बमों से 4-5 आदमियों को मामूली चोटें आईं और एक बेंच को मामूली नुकसान पहुंचा। जिन्होंने यह अपराध किया, उन्होंने बिना किसी किस्म के हस्तक्षेप के अपने आपको गिरफ्तारी के लिए पेश कर दिया। सेशन जज ने स्वीकार किया कि यदि हम भागना चाहते, तो भागने में सफल हो सकते थे। हमने अपना अपराध स्वीकार किया और अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए बयान दिया। हमें सजा का भय नहीं है। लेकिन हम यह नहीं चाहते कि हमें गलत समझा जाए। हमारे बयान से कुछ पैराग्राफ काट दिए गए हैं, यह वास्तविकता की दृष्टि से हानिकारक है।

समग्र रूप में हमारे वक्तव्य के अध्ययन से साफ होता है कि हमारे दृष्टिकोण से हमारा देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा है। इस दशा में काफी ऊंची आवाज में चेतावनी देने की जरूरत थी और हमने अपने विचारानुसार चेतावनी दी है। संभव है कि हम गलती पर हों, हमारा सोचने का ढंग जज महोदय के सोचने के ढंग से भिन्न हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हमें अपने विचार प्रकट करने की स्वीकृति न दी जाए और गलत बातें हमारे साथ जोडी जाएं।

‘इंकलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ के संबंध में हमने जो व्याख्या अपने बयान में दी, उसे उड़ा दिया गया है: हालांकि यह हमारे उद्देश्य का खास भाग है। इंकलाब जिंदाबाद से हमारा वह उद्देश्य नहीं था, जो आमतौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और यही चीज थी, जिसे हम प्रकट करना चाहते थे। हमारे इंकलाब का अर्थ पूंजीवादी युद्धों की मुसीबतों का अंत करना है। मुख्य उद्देश्य और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया समझे बिना किसी के संबंध में निर्णय देना उचित नहीं। गलत बातें हमारे साथ जोड्ना साफ अन्याय है।
इसकी चेतावनी देना बहुत आवश्यक था। बेचैनी रोज-रोज बढ़ रही है। यदि उचित इलाज न किया गया, तो रोग खतरनाक रूप ले लेगा। कोई भी मानवीय शक्ति इसकी रोकथाम न कर सकेगी। अब हमने इस तूफान का रुख बदलने के लिए यह कार्रवाई की। हम इतिहास के गंभीर अध्येता हैं। हमारा विश्वास है कि यदि सत्ताधारी शक्तियां ठीक समय पर सही कार्रवाई करतीं, तो फ्रांस और रूस की खूनी क्रांतियां न बरस पड़तीं। दुनिया की कई बड़ी-बड़ी हुकूमतें विचारों के तूफान को रोकते हुए खून-खराबे के वातावरण में डूब गइंर्। सत्ताधारी लोग परिस्थितियों के प्रवाह को बदल सकते हैं। हम पहले चेतावनी देना चाहते थे। यदि हम कुछ व्यक्तियों की हत्या करने के इच्छुक होते, तो हम अपने मुख्य उद्देश्य में विफल हो जाते। माई लॉर्ड, इस नीयत और उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए हमने कार्रवाई की और इस कार्रवाई के परिणाम हमारे बयान का समर्थन करते हैं। एक और नुक्ता स्पष्ट करना आवश्यक है। यदि हमें बमों की ताकत के संबंध में कतई ज्ञान न होता, तो हम पं. मोती लाल नेहरू, श्री केलकर, श्री जयकर और श्री जिन्ना जैसे सम्माननीय राष्ट्रीय व्यक्तियों की उपस्थिति में क्यों बम फेंकते? हम नेताओं के जीवन किस तरह खतरे में डाल सकते थे? हम पागल तो नहीं हैं? और अगर पागल होते, तो जेल में बंद करने के बजाय हमें पागलखाने में बंद किया जाता। बमों के संबंध में हमें निश्चित जानकारी थी। उसी कारण हमने ऐसा साहस किया। जिन बेंचों पर लोग बैठे थे, उन पर बम फेंकना कहीं आसान काम था, खाली जगह पर बमों को फेंकना निहायत मुश्किल था। अगर बम फेंकने वाले सही दिमागों के न होते या वे परेशान होते, तो बम खाली जगह के बजाय बेंचों पर गिरते। तो मैं कहूंगा कि खाली जगह के चुनाव के लिए जो हिम्मत हमने दिखाई, उसके लिए हमें इनाम मिलना चाहिए। इन हालात में, माई लार्ड, हम सोचते हैं कि हमें ठीक तरह समझा नहीं गया। आपकी सेवा में हम सजाओं में कमी कराने नहीं आए, बल्कि अपनी स्थिति स्पष्ट करने आए हैं। हम चाहते हैं कि न तो हमसे अनुचित व्यवहार किया जाए, न ही हमारे संबंध में अनुचित राय दी जाए। सजा का सवाल हमारे लिए गौण है।

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दो-तीन वाकये ऐसे हैं जब लड़कियों द्वारा मुझ पर खुले आम व्यक्तिगत टिप्पणी की गई थी।मैं उत्तर देने की स्थिति में न था।और मुझे बहुत अच्छा लगा था।
स्कूल से निकल कर उच्च शिक्षा के संस्थान में दाखिला हुआ था।हॉस्टल से करीब 500 मीटर चल कर पढ़ाई के लिए जाना होता था।इतनी सी दूरी में भी ढेर सारे पेड़ और पोखर रास्ते मे थे।संस्थान के संस्थापक का निवास भी रास्ते मे था।उस भवन की छत पर एक लड़की अपनी सहेलियों के साथ अक्सर खड़ी रहती थी।मुझे देख कर,’शुकनो चोख, शुकनो चोख’ (सूखी आंखें)! नकारात्मक होने के बावजूद बुरा नहीं लगता।
दूसरी-तीसरी घटना विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय की थीं।मेरे सफेद,बैगनी और गुलाबी चेक्स वाले शर्ट को देख कर,’Look at the moving graph paper.’ में निरुत्तर किन्तु प्रसन्न था।
इस परिसर में अपने चुनाव प्रचार के दौरान एक फिल्मी गीत की पैरोडी जैसा,अराजनैतिक नारा सुना था-‘सुन साहिबा सुन अफलातून,,मैने तुझे चुन लिया तू भी मुझे चुन’! उल्लेखनीय है कि पहले चुनाव में मुझे मिले कुल वोटों में इस महाविद्यालय के सर्वाधिक थे।बाद के चुनाव में इस कॉलेज के अलावा प्रौद्योगिकी संस्थान,दृश्य कला संस्थान और चिकित्सा संस्थान में जब अन्य उम्मीदवारों से अधिक वोट मिलते थे तो उसका एक विश्लेषण भी होता था-इन चारों संस्थान/संकाय/कॉलेज में जाति,पैसे,गुंडई का असर न्यूनतम था।करीब 32-34 साल बाद कहने में फक्र है कि परिसर में नई राजनैतिक संस्कृति के सूत्रपात का यह प्रयास था।

… अब आखरी सवाल रह जाता है दखल वाला कि जीवन के ऐसे कुछ दायरे होने चाहिए कि जिनमें राज्य का,सरकार का,संगठन का,गिरोह का ,दखल न हो।जिस तरह हमारे जमीन की बेदखालियाँ हो जाती हैं,उसी तरह सरकार और राजनीतिक पार्टियां हमारे जीवन में बेदखालियाँ कर डालती हैं।कभी-कभी सोशलिस्ट पार्टी के लोगों के मन में भी आ जाया करता है कि वे व्यक्ति के जीवन में बेदखलियाँ शुरू कर दें।मान लो आदमी सार्वजनिक पैसा खा लेता है तो उसमें दखल देना समझ में आता है। लेकिन मान लो कोई आदमी है,मिसाल देने में झंझट भी खड़ी हो जाती है,कई लोग तिलमिला उठेंगे, पुरानी धारणाएं हैं इस कारण।वह मिसाल न लेकर हम दूसरी मिसाल लेंगे।जैसे,जब यह निश्चित हो जाए कि कोई आदमी मरने ही वाला है,एक नहीं कई डॉक्टर इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं,तो क्या उस आदमी को यह अधिकार होना चाहिए कि वह कोई ऐसी सूई लगवा कर खत्म हो जाए और डॉक्टर का ऐसी सूई देना उचित है क्या? विशेष रूप में,ऐसी बीमारी में,जिसमें महीनों ही नहीं,बरसों रगड़ा लगता है,जिसमें बीमार ही नहीं,उसके घर वाले भी तबाह होते हैं । ऐसी चीज को दया-हत्या बोलते हैं।दया-हत्या का ऐसा दायरा है जिस पर सोच विचार करना चाहिए।मैं अपनी कोई आखिरी राय नहीं दे सकता।लेकिन आत्महत्या के बारे में तो मेरी पक्की राय है की हर मर्द-औरत को हक़ होना चाहिए कि वह अपनी जान ले ले।इसमें दूसरे को दखल देने का क्या हक है।लेकिन कई देशों में इसके खिलाफ कानून बने हुए हैं।अगर आत्महत्या करने में कोई सफल हो जाए तब तो ठीक है,और अगर असफल हो जाए तो ऐसा सिलसिला चलता है कि क्या कहने।बहुत कम ऐसे बेवकूफ जज होंगे जो दो-चार महीने की सजा दे दें।

इस मिसाल के अलावा और भी हैं जैसे घर मे कैसे रहें,शादी-विवाह के मामले-इन सबको लेकर राजनैतिक पार्टियों और सरकार को दखल नहीं देना चाहिए।किस राजनैतिक पार्टी में कोई रहे ,सरकार के नौकर भी,इसमें भी दखल नहीं होना चाहिए।ये कुछ बातें मैंने सिर्फ गिना दी हैं।असल में इन्हें उदाहरण स्वरूप ही लेना।इनके पीछे तर्क या सिद्धांत यह है कि व्यक्ति के जीवन में राज्य या राजनैतिक पार्टी को दखल देने का हक नही होना चाहिए ।हर एक व्यक्ति को एक हद तक अपने जीवन को अपने मन के मुताबिक चलाने का अधिकार होना चाहिए।हो सकता है कि वह उस अधिकार का दुरुपयोग करे।लेकिन जब उस अधिकार को मान लेते हैं और दुरुपयोग होता है तो क्या कर सकते हैं,सिर्फ अपना मुंह मटका के रह जाओ और क्या किया जा सकता है? उस पर ज्यादा चर्चा भी नहीं करनी चाहिए। समाज का गठन वैसा बन जाएगा तो उस पर चर्चा भी बहुत नहीं होगी।यूरोप के देशों में इन सब चीजों पर लोग चर्चा भी नहीं किया करते और कहीं करते भी हैं तो सैद्धांतिक तौर पर कर करा लिया करते हैं।रूस और अमेरिका का मुकाबला करें तो,मुक़ाबलतन,ऐसा नहीं कि रूस को मैं कोई प्रमाणपत्र दे रहा हूँ,रूस अच्छा है।अमरीका और फ्रांस भी इस दखल वाले मामले में अच्छे हैं।

…सातवीं क्रांति का लक्ष्य समूह के हस्तक्षेप से व्यक्ति के निजी जीवन की रक्षा करना है। संगठन लगातार व्यक्ति की स्वतंत्रता का अपहरण करता रहा है।इसका यह मतलब नहीं कि व्यक्ति के महत्त्व और कल्याण में जरूरी तौर पर कमी आई है।वास्तव में उसका महत्व भी बढ़ा है,हालत भी सुधरी है,खास तौर पर उन्हीं इलाकों में जहां स्वतंत्रता में कमी आई है।व्यक्ति का कल्याण और सुख,शिक्षा और स्वास्थ्य,और उसका आराम भी,दरअसल उसके जीवन और विचार का बड़ा हिस्सा विभिन्न प्रकार की योजनाओं का विषय बन गया है।यह नियोजन साम्यवादी देशों में अधिक कठोर है, लेकिन संगठनात्मक बाध्यता का एक तत्व हर जगह मौजूद है।व्यक्ति की स्वतंत्रता की क्रांति पर विचार करते हुए हमें भलाई के लिए आयोजन संबंधी अपने युग की ख़ासियत को ध्यान में रखना चाहिए।

सरकारी आयोजन का लक्ष्य हमेशा भलाई करना ही होता है।उसमें अगर कोई बुराई पैदा होती है तो अनिच्छित और प्रासंगिक परिणाम के रूप में।इस बुराई की जड़ बाध्यता में होती है।जब लोगों को मजबूर किया जाता है कि वे बुरे की जगह अच्छे को चुनें, तो अनिवार्य ही उसके कुछ बुरे परिणाम निकलते हैं।अच्छाई के विभिन्न प्रकार होते हैं और उनमें अलग अलग प्राथमिकताएं होती हैं।लेकिन इसके अलावा,क्या अच्छा है और क्या बुरा,यह बात हमेशा इतनी साफ नहीं होती जितनी योजनाएं बनाने वाले सोचते हैं।इसके अतिरिक्त सुरुचि,विवेक,ज्ञान और समझ का विकास ज्यादा अच्छा होता है जब चुनाव करने और गलती करने की आजादी होती है।जिन देशों में सरकारी नियोजन नही है,वहां निजी मुनाफे के संगठनों के भी लगभग वैसे ही परिणाम निकलते हैं।वरण की सारी घोषित स्वतंत्रता के बावजूद,जिन देशों में सरकारी नियोजन नहीं है,वहां भी शिक्षा,सूचना और मनोरंजन एक खास स्वीकृत दायरे के अंदर ही रहते हैं।इसके अलावा,इनका ज्यादा और नीचा एयर एकरसता-भर स्तर ही आमतौर पर चलता है।लक्ष्य चाहे मुनाफा हो या कोई आदर्श,संगठन व्यक्ति को बाध्य करते हैं।यद्यपि इससे इनकार करना व्यर्थ है कि तानाशाही बाध्यता ज्यादा गहरी और चतुराई भरी होती है।

भलाई करने का संगठित प्रयत्न हमारे युग की खासियत है।जो बिल्कुल पूंजीवादी समाज हैं,उनमें भी किसी प्रकार वे बेकारी भत्ते या बीमारी-बीमे की व्यवस्था जरूरी हो गई है।जिन क्षेत्रों या उद्योगों की ओर निजी पूंजी आकर्षित नहीं होती,उनमें राज्य का पूंजी लगाना भी काफी आम बात हो गई है।इसलिए ऐसा माना जा सकता है कि भलाई के उद्देश्य से नियोजन और बढ़ेगा।इसके साथ निजी जीवन में हस्तक्षेप भी बढ़ेगा।

क्या निजी हैऔर क्या सार्वजनिक इसकी परिभाषा करना आसान नहीं है।बहुत कुछ देश और पीढी की मान्यताओं पर निर्भर होता है।लेकिन बाध्यता और सार्वजनिकता के वातावरण से अलग स्वतंत्रता और निजता के वातावरण को पहचानना उतना मुश्किल नहीं।

सोवियत रूस में जो इस समय हो रहा है,वह इस संदर्भ में एक प्रवृत्ति के रूप में महत्वपूर्ण है।आज संगीत और अमूर्त चित्रकला की संगठन द्वारा जितनी आलोचना होती है,उतना ही कुछ निजी क्षेत्रों में उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है।कवि और उपन्यासकार गाने या रोने की स्वतंत्रता माँग रहे हैं।किसी दिन ये सभी क्षेत्र निजी मान लिए जाएंगे जिन्हें राज्य या संगठन के हस्तक्षेप से बचाया जाए।इसके साथ ही संपत्ति सबंधी कुछ रूढ़ धारणाओं में भी ढीलापन आ रहा है।

गोरे लोगों के बीच यही असली बहस चल रही है।उनमें जो लोकतंत्र के समर्थक हैं उनका आग्रह है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकार करने पर किसी-न-किसी रूप में निजी संपत्ति और उसके पुरस्कार को भी मान्यता देने होगी।लेकिन तर्क की दृष्टि से संपत्ति और व्यक्ति-स्वातंत्र्य के बीच कोई सीधा संबंध आवश्यक नही प्रतीत होता।व्यवहार में संपत्ति के साम्यवादी स्वामित्व के फलस्वरूप बच्चे पैदा करने से लेकर भाषण देने तक सभी प्रकार के संबंधों में निजी जीवन में हस्तक्षेप हुआ है।अतः ख़तरे के ये संकेत हमेशा रहेंगे।निजी जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को उन सभी क्षेत्रों में स्वीकार करना होगा जिनका संपत्ति से कोई सीधा संबंध नहीं है।आधुनिक जीवन में पारस्परिक संबंध दरअसल इतने पेचीदा हैं कि सीधी या सरल परिभाषाओं से काम नहीं चल सकता।मिसाल के लिए घरेलू प्रबंध या मनोरंजन में निजी जीवन की स्वतंत्रता का संपत्ति की व्यवस्था पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।तब क्या किया जाए? हमें जोखिम उठाने को तैयार रहना चाहिए।मिसाल के लिए संपत्ति की व्यवस्था अगर प्रभावित नही होती ,तो इस आधार पर निजी जीवन मे हस्तक्षेप की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए कि निजी संपत्ति की भावना को प्रोत्साहन मिलता है।

(यह लेख डॉ लोहिया की अंग्रेजी किताब ‘ मार्क्स,गांधी एन्ड सोशलिज्म’ की भूमिका से उनके निकट साथी ओमप्रकाश दीपक द्वारा अनुदित है।लेख उन्होंने 1963 में लिखा था।अनुवाद 1970 में प्रकाशित हुआ।लोहिया का यह अंतिम लेख है।)

बहुत लंबे इंतजार के बाद नया युग आरंभ हुआ है

अब सुबह समय से होती है और प्रफुल्लित वातावरण में

वैसी ही हवा बहती है जैसी

अंधकार युग के विदा होने के बाद बहनी चाहिए

 

जिसके फलस्वरूप फूल खिलने लगे हैं

फसलें लहलहाने लगी हैं चिड़ियां गाने लगी हैं।

 

जिन्हें रास्ते से हटाना था हटा दिया गया है

जिन्हें रास्ते पर लाना था ला दिया गया है

सारे रास्तों की सारी बाधाएं दूर कर दी गई हैं

अब जाकर विकास ने पकड़ी है रफ्तार।

विकास इतना तेज चल रहा है कि लोग पीछे छूट जाते हैं

मगर उन्हें उनके हाल पर छोड़ नहीं दिया गया है

उन्हें विकास से जोड़ने के लिए कमेटियां

और योजनाएं बना दी गई हैं

और उन्हें बुलाकर या लाकर

जगह-जगह संबोधित भी किया जाता है।

 

विकास के रफ्तार पकड़ने के साथ ही

या उसके पहले से

आंकड़े एकदम दुरुस्त आने लगे हैं

अब आंकड़े जान लेने के बाद अलग से

सच्चाई जानने की जरूरत नहीं रहती।

 

जिसे वापस लाना था ला दिया गया है

जिसे भगाना था भगा दिया गया है

जिसे डराना था डरा दिया गया है

जिसे बचाना था बचा लिया गया है

कीमतों पर काबू पा लिया गया है

वे लोग काबू में हैं जिनकी कुछ कीमत है

जिसकी अभी -अभी कीमत लगी

उसकी खुशी देखते ही बनती है

बाकी यह सोचकर मुस्कराते हैं

कि मायूस दिखने से रही-सही कीमत भी जाती रहेगी।

 

इस तरह बने चतुर्दिक खुशनुमा माहौल में

नकारात्मक नजरिए के लिए गुंजाइश ही कहां बचती है

अब ना कहने के लिए बहुत हिम्मत जुटानी पड़ती है

सकारात्मक सोच का जोश इस कदर हावी है

कि घोषणा होती ही काम हुआ मान लिया जाता है

आश्वासन मात्र से होता है प्राप्ति का अहसास

वर्णन मात्र से छा जाता है संबंधित वस्तु के होने का विश्वास।

 

इस नवयुग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ऊंची-ऊंची कुर्सियों पर पहली बार ऐसे लोग बिठाये गए हैं

जिनका कद पद के अनुरूप है जिनको काबिलियत पर

शक नहीं किया जा सकता जो भरोसे के काबिल हैं

जो अलिखित निर्देशों को भी पढ़-समझ लेते हैं

और उन पर अमल करने को तत्पर रहते हैं

जिन्हें स्वयं सोचने की इच्छा या अवकाश नहीं

इसलिए जिनसे गलतियां नहीं होतीं और जो अपराध-बोध से दूर

सदा प्रसन्न रहते हैं बड़े फख्र से कहते हैं

हमारी अमूल्य सेवाओं के लिए

एक ही पुरस्कार पर्याप्त है

कि हमें निजाम में असीम निष्ठा रखने का

परम सौभाग्य प्राप्त है।

  • राजेन्द्र राजन
  • सभार-‘गांव के लोग’ से

वे जो भी कहते हैं

चुपचाप मान लो

हुक्मरान सबूत नहीं देते।

सबूत नागरिकों को देने पड़ते हैं

उन्हें दिखाना पड़ता है हर मौके-बेमौके

प्रमाणपत्र

नागरिक होने का,मतदाता होने का,भारतीय

होने का

पते का,बैंक खाते का,कर अदायगी का

जन्म का,जाति का,शिक्षा का,गरीबी का

मकान का,दुकान का,खेत का,मजूरी का

चरित्र का,नौकरी का,सेवानिवृत्ति का

और कई बार खुद हाजिर होकर

बताना पड़ता कि आप खुद आप हैं

और जिंदा हैं।

सबूत देते रहना

नागरिक होने की नियति है

पर हुक्मरानों की बात कुछ और है

दाल में भले कुछ काला हो

उनका एलान या बयान भर काफी है

उस पर सवाल मत उठाओ

वरना संदिग्ध करार दिए जाओगे

तुम्हारे देशप्रेम पर शक किया जाएगा

फिर देशभक्ति का सबूत कहां से लाओगे?

  • राजेन्द्र राजन
  • (साभार- ‘गांव के लोग’)

सन 1952 में मैं ‘साम्ययोगी विनोबा’ नामक पुस्तक की तैयारी कर रहा था। उसी सिलसिले में मैं एक सूची बना रहा था – विनोबा कितनी भाषाएं जानते हैं, कितने धर्मों का अभ्यास,उन धर्मों के मूल ग्रंथों के  मार्फत उन्होंने किया है,उन्होंने किस-किस प्रकार के शारीरिक परिश्रम के काम किए हैं आदि। इस सूची में कहीं कोई गलती न रह जाए,इसलिए वह सारी जानकारी जांच के लिए विनोबा को दे दी।शरीर-परिश्रम के कामों की सूची खासी लंबी थी।किसान,बुनकर,रंगरेज,धोबी,बढ़ई,लुहार,पत्थर तोड़ने वाले आदि अनेक प्रकार के श्रमजीवियों के साथ विनोबा अपने जीवन का तार मिला चुके थे।

इस सूची को देखकर विनोबा ने कहा”इसमें एक मजदूरी का उल्लेख नहीं आता।”भाषा ज्ञान की सूची में मैंने ऐसी भाषाएं शामिल की थीं,जिनको विनोबा को थोड़ा परिचय था,लेकिन पूरा ज्ञान नहीं था,इसलिए उस सूची को संक्षिप्त करने का उन्होंने प्रयत्न किया था। लेकिन वही विनोबा शरीर परिश्रम की सूची बढ़ाने के लिए कह रहे हैं,इससे मुझे आश्चर्य हुआ।मैंने पूछा-कौन-सी मजदूरी बाकी रह गई?

विनोबा ने बड़ी गंभीरता से कहाः मैंने लिखने की मजदूरी की है,उसे तुमने सूची में नहीं लिखा है।मुझे लगा कि विनोबा विनोद कर रहे हैं।पर विनोद करते समय उनके चेहरे पर जिस प्रकार की रेखाएं उभरती हैं,वे इस समय नहीं थीं।

मैंने पूछा कि लिखना क्या मजदूरी कही जा सकती है?

” जिससे हाथ में आंटन (गांठ),भट्ट पड़ जाए,वह काम शरीर परिश्रम का गिना जाएगा या नहीं?” विनोबा ने पूछा।मैंने कहा,”जी हां,वह तो जरूर गिना जाएगा।”

“तो देखो,मेरी ये उंगलियां!इसमें आंटन पड़ गए हैं।उंगलियों की पोर थोडी सख्त हो गई है।आज से 38 वर्ष पहले मैंने जो लिखा,उसके कारण ऐसा हुआहै।”

“आज से 38 वर्ष पहले।” विनोबा की जीवनी लिखने वाले की हैसियत से मुझे इस बात में ज्यादा दिलचस्पी थी।उस समय आपको ऐसा क्या लिखना पडा था?”

“उस समय मैं कविता लिखता था।कविता लिख-लिख करके ही मेरे आंटन पड़े हैं” विनोबा हंस कर बोले।

इतनी सारी कविताएं।मिल जाएं तो एक बहुत बडा काम हो जाए। मैंने पूछा- “ये कविताएं आज कहां होंगी?”

“ये काव्य मैंने काशी में गंगा के किनारे लिखे थे।इनमें से जिनके बारे में मुझे समाधान नहीं था,जो मुझे ठीक जंचे नहीं,वे तो मैंने अग्नि को समर्पित किए और जिनके बारे में समाधान था,वे मैंने गंगाजी में बहा दिए थे।”

मैं चकित होकर सुनता रहा।ये काव्य प्रसिद्धि के लिए नहीं लिखे गए थे,प्रशस्ति के लिए भी नहीं लिखे गए थे।पाठ के लिए भी नहीं लिखे गए थे।गीता का अनुवाद करने के लिए मां रुक्मिणीबाई ने कहा था।बस उसके अभ्यास के तौर पर एक ओर गीता को जीवन में उतारने का प्रयास शुरु किया और दूसरी ओर व्याकरण,काव्य शास्त्र इत्यादि का अभ्यास।ये काव्य तो स्वान्तः सुखाय लिखे गये थे।विनोबा के लिए साहित्य मनोरंजन या शोक का विषय नहीं है,जीवन साधना का एक साधन है।

विनोबा की संपूर्ण साहित्य साधना एक वांगमय तप ही बनी है।मां की इच्छा थी कि उनका बेटा श्रीमदभगवद्गीता का मराठी अनुवाद करे।मां की यह इच्छा मां की मृत्यु के बाद पूरी हुई।इस अनुवाद को विनोबा ने नाम दिया गीताई और उसकी प्रस्तावना एक अनुष्टुप में कीः गीताई माऊली माझी,मी तिचा बाल नेणता,पडता रडता थेई उचलून कडेवरी।

विनोबा मानते हैं कि यदि ईश्वर ने उनके पास से दूसरी कोई और सेवा नहीं कराई होती और गीताई ही लिखाई होती तो भी ये अपने कृतकृत्य मानते।मराठी और संस्कृत भाषा के विशेषज्ञ गीताई के साहित्यिक गुणों पर मुग्ध हैं।उत्तर भारत की अधिकांश भाषाओं में गीता के समश्लोकी अनुवाद सुने हैं।पर गीताई में जो ओज है,सरलता और शुद्धता का जो मेल है,वैसा दूसरे किसी भाषांतर में मन्हीं मिलता। मराठी भाषियों में विनोबा की इस पुस्तक की लोकप्रियता असाधारण है।अब तक गीताई की 40 लाख से ऊपर प्रतियां छप चुकी हैं।

नोआखली में पदयात्रा करते समय गांधीजी से किसी अमेरिकी पत्रकार ने संदेश मांगा था। 79 वर्ष की उम्र विद्यार्थी के रूप में गांधीजी उस समय बंगाली भाषा सीखते थे।उन्होंने बंगाली में लिखकर संदेश दिया’आमार जीवन इ आमार वाणी।”

विनोबा पर भी यह वाक्य अक्षरशः लागू होता है।उनका जीवन ही उनकी वाणी है,और उनकी वाणी ही उनका जीवन है।

इस वांगमयी तपास,खोज के आरंभ की तपस्या कठोर थी।दिन के हर क्षण का निश्चित हिसाब पसीने से सराबोर हो जाए,इतना परिश्रम,बुजुर्ग ज्ञानियों को भी मात करे,अभ्यास की ऐसी गहराई-ये विनोबा की आरंभिक तपस्या के क्षण थे।उनके आरंभकाल के साहित्य में यह तेजस्विता और साथ-साथ थोड़ी कठोरता की झलक मिलती हैं। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध कवि मामा वरेरकर के शब्दों में कहूं तो ‘उनकी भाषा में मिठास थी थी,लेकिन यह मिठास मिश्री जैसी सख्त थी।जीवन के प्रौढ़काल  में यह मिठास अंगूर की तरह रसीली बन गई।’

विनोबा वांगमय एक विशाल सागर जैसा है।विनोबा ने जो कुछ लिखा और आगे आगे चलकर जो कुछ बोला, वह साहित्य की एक विशिष्ट निधि बन गया है।

आज लोग यद्यपि उन्हें एक आन्दोलन के नेता और क्रांतिकारी संत के रूप में ही जानते हैं पर उनका साहित्यकार का रूप भी कम लुभावना नहीं है।

स्वयं विनोबा द्वारा लिखी गई और उनके प्रवचनों के आधार पर तैयार की गई पुस्तकों की कुल संख्या पचासों में है। उनके विचारों में हमें एक निष्पक्ष,सजीव और मौलिक दिशा मिलती है।

[नारायण भाई ने यह लेख सन 1965 में लिखा था।]

 

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