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राष्ट्रीयता और साम्प्रदायिकता एक दूसरे को कमजोर करनेवाली होती है,क्योंकि राष्ट्रीयता के परिधान में ही साम्प्रदायिकता आकर्षक लगती है।न सिर्फ साम्प्रदायिकता की चुनौती को झेलने के लिए बल्कि अलगाववाद पर नियंत्रण पाने के लिए भी राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के संबंध में एक दृढ़ और स्पष्ट अवधारणा को प्रचारित करना जरूरी हो गया है।नई आर्थिक नीतियों के कारण हमारी आजादी पर खतरे की आशंका व्यापक हो रही है।आर्थिक नीतियों के मामले में राष्ट्रवाद को परिभाषित करना ही होगा।यहां से शुरू करके राष्ट्र संबंधी पूर्णांग धारणा विकसित हो सकती है। – किशन पटनायक

भारतीय संस्कृति का स्थान भी साम्प्रदायिकता ले रही है,मानो पश्चिमी संस्कृति को मानने वाले ही साम्प्रदायिकता का विरोध कर रहे हैं।बात बिल्कुल ऐसी नहीं है क्योंकि पश्चिमी संस्कृति को मानने वाले राजनीतिक स्तर पर अब बड़ी संख्या में भाजपा के समर्थक बनते जा रहे हैं।इसलिए भारतीय संस्कृति का एक ग़ैरसाम्प्रदायिक आधुनिक रूप प्रचारित होना बहुत जरूरी है।आजादी के पहले रवींद्रनाथ ठाकुर इसके प्रभावी प्रतीक थे।आजादी के बाद पश्चिमीकृत संस्कृति के विकल्प में सिर्फ सती प्रथा और आसाराम स्थापित हो रहे हैं।
-किशन पटनायक

गैर भाजपाई दलों में सपा और बसपा का अकेला मोर्चा है जो संघ परिवार से भयभीत नहीं जान पड़ रहा है।इससे एक सबक लेना है-एक सीधा और गहरा सबक।संघ परिवार से मुकाबला करने के लिए जिस जनाधार की जरूरत है वह शूद्र-दलित समन्वय से बनता है ।जिस राजनैतिक दल का नेतृत्व मुख्य रूप से उच्च जातिवाला है,जिसके कार्यकर्ता भी सामान्यतया उच्च जाति से आते हैं,उसके पांव संघ परिवार से लड़ते वक्त लड़खड़ाते हैं।कई सामाजिक और ऐतिहासिक कारणों से उसके अंदर दुविधाएं और कमजोरियां पैदा होती हैं।
– किशन पटनायक

अंततोगत्वा संघ परिवार की धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक नीतियों का लक्ष्य समाज में ब्राह्मणवाद को पुनः स्थापित करना है।इसलिए ब्राह्मण-बनिया-राजपूत जातियों का एक स्वाभाविक आकर्षण इन नीतियों के प्रति होता है।यह सही है कि कई बार राजपूत और यादव,कायस्थ और कुर्मी समान रूप से मुसलमान विरोधी यानी साम्प्रदायिक दिखाई देते हैं।लेकिन गहराई में जाने पर पिछड़ों और दलितों का साम्प्रदायिक विद्वेष बहुत सतही मालूम होगा। ब्राह्मणवादी विचारों के हिसाब से ब्राह्मण ही पूरी तरह हिन्दू है या फिर द्विज जातियां।शूद्र जातियां अपेक्षाकृत कम हिन्दू हैं और दलितों का हिंदुत्व नगण्य है।अतः जिस दाल का नेतृत्व जितना द्विज प्रधान होगा,साम्प्रदायिकता के मुकाबले वह अपने को उतना दुविधाग्रस्त पाएगा।भाजपा से लड़ने में उसका आत्मविश्वास उतना कमजोर पाया जाएगा।उसका नेता प्रबल धर्मनिरपेक्षतावादी हो सकता है,लेकिन उसके अपने परिवार और स्वजनों के बीच उसकी बातें प्रभावी नहीं होंगी।
-किशन पटनायक
(धर्मनिरपेक्षता का घोषणापत्र 4)

अतिक्रमण को मुआवजा क्यों दिया मोदी जी ?

(वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ गोकर्ण काशी के नगीना हैं।सैंकडों वर्ष से महात्म्य के कारण देश के कई भागों के लोग काशी के विभिन्न मोहल्ले में बसे हैं।आम तौर पर देश के विभिन्न भागों के राजे,महाराजे,जमींदार,समृद्ध लोग ‘काशी – वास ‘ के लिए भवन निर्माण करते और अपने इलाके के ब्राह्मणों को रहने के लिए दे देते थे।काशी का कॉस्मोपोलिटन चरित्र इस वजह से रहा है।)

इन दिनों वर्चअल वल्र्ड में एक वीडियो वायरल हो रहा है। जाने कितने लाख लोगों ने उसे अब तक देख लिया है। वीडियो में बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर काॅरिडोर से जुड़ी चीजें शूट की गयी हैं। वीडियो में कुछ तमिल तीर्थयात्री दिखते हैं। वीडियो के साथ आॅडियो हिन्दी में है। बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों का नतीजा है कि अतिक्रमण से घिरे बाबा विश्वनाथ आज मुक्त हो कर सांस ले रहे हैं। खुद मोदी जी ने भी जब आठ मार्च को इस काॅरिडोर की आधारशिला रखी तब भी उन्होंने कहा कि चालीस हजार वर्गमीटर में बन रहे इस काॅरिडोर को जब हमनें खाली कराया तो यहां 44 ऐसे अति प्राचीन मंदिर मिले जिन्हें इलाके के लोगों ने अतिक्रमण कर अपने घरों में छिपा लिया था। उन मंदिरों और शिवालयों में लोगों ने टाॅयलेट बना लिया था।

मोदी जी, आपका बयान रिकाॅर्डेड है। अब आप यह कह नहीं सकते कि नहीं हमने तो ऐसा कहा ही नहीं था। क्योंकि आपके इस झूठ को पूरी दुनिया ने लाइव टेलिकास्ट में देखा। हमें नहीं मालूम कि आपको किसने यह सब पढ़ा दिया लेकिन हम बनारस के लोग उस दिन इस सचाई को जान कर हैरान थे कि दुनिया में ताकतवर माने जाने वाले हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री का सामान्य ज्ञान कितना कमजोर है। मोदी जी पिछले पांच सालों से आप इतिहास से भी पुराने इस बनारस के सांसद है। बीते आठ मार्च तक आपने अपने संसदीय क्षेत्र का 19 बार दौरा भी किया। तथाकथित रूप से आपने इस शहर को कई हजार करोड़ रूपए का तोहफा भी दे डाला पर हजरत अफसोस कि इस शहर को आप अब तक समझ नहीं सके। आप न तो इसके इतिहास से वाकिफ हुए और न आपने इसके भूगोल को जानने की कोशिश की। आपके लिए इतिहास मतलब केवल असी घाट और भूगोल मतलब शहर के बाहरी हिस्से मंडुआडीह स्थित डीजल रेल इंजन कारखाने से लंका के बीएचयू गेट तक का सड़क ही रहा। आपने इस चुनावी साल के जनवरी महीने में बनारस में प्रवासी भारतीय सम्मेलन पर अरबों रूपए खर्च कर वाहवाही बटोरी। इस आयोजन का मकसद आज तक कोई समझ नहीं सका। आपने प्रवासियों को बनारस के गली कूचे में तमाम सारी जानकारी दिलवायी लेकिन अफसोस कि इन बीते पांच सालों में आप खुद आज तक कभी किसी गली में गये ही नहीं। आपने जापान के पीएम शिंजो अबे से लेकर फ्रांस के राष्ट्रपति तक के साथ कई बार स्टीमर पर बैठकर गंगा यात्रा की लेकिन जनाब आपने कभी इन घाटों की उन सीढ़ियों पर अपने चरण नहीं धरे जिन पर लेट कर कबीर ने अपने गुरू से राम राम कहो का ज्ञान हासिल किया। आपने कभी तुलसी घाट के उस हुजरे को भी नहीं देखा जहां बाबा तुलसी दास ने रामचरित मानस लिखा। आपने रविदास मंदिर में मत्था टेक कर पंजाब के लिए अपना राजनीतिक मंतव्य साधने का प्रयास जरूर किया लेकिन मोदी जी आपने कभी उस सारनाथ को जानना नहीं चाहा जहां तथागत बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। सारनाथ में आपकी दिलचस्पी शायद इसलिए नहीं थी क्योंकि आपके सलाहकारों ने आपको शायद ये समझा दिया था कि बुद्ध को मानने वाले तो किसी और पार्टी के वोट बैंक हैं। हां याद आया आप इस पूरे टेन्योर में एक बार कालभैरव गये थे। वो भी इसलिए कि जब आपने देखा कि हर बार आपके बनारस आगमन पर बिन मौसम बरसात हो जाती है और कुछ न कुछ हादसा हो जाता है। तो ऐसे में आपको मशवरा देने वाला बुद्धिमान गिरोह बनारसियों के दबाव में आ गया और आपकी वहां हाजिरी लगवा दी गयी।

मोदी जी, बनारस का इतिहास बहुत पुराना है। यहां के प्राग ऐतिहासिक मंदिरों का अपना वजूद है। यहां के मोहल्लों का भी अपना एक तिलिस्म है। गुस्ताखी माफ सर, काशी विश्वनाथ मंदिर काॅरिडोर के नाम पर आपने एक पूरे इलाके की जिस तरह से कुर्बानी ली है, इसके लिए इतिहास आपको कभी माफ नहीं करेगा। ज्ञानवापी से लेकर सरस्वती फाटक तक और फिर लाहौरी टोला से लेकर ललिता घाट तक के लोगों को आपने अपने इगो के लिए जबरन पैसे देकर जिस तरह उजाड़ा है उसे पुश्तों तक दर्द के साथ याद रखा जाएगा। साहब, ये लोग अतिक्रमणकारी नहीं थे। ये तो वो लोग थे जो पार्टीशन के वक्त पाकिस्तान से उजड़ कर यहां आये थे। ये वो लोग थे जिन्हें उस जमाने में रिफ्यूजी कहा गया। लाहौर में अपना सब कुछ गंवा कर लौटे इन लोगों को जहां जगह मिली बनारस ने अपने साथ रचा बसा लिया। इसलिए इस मोहल्ले का नाम लाहौरी टोला रखा गया। आपकी जानकारी के लिए साहेब, ये सब के सब हिन्दू थे, जिनकी खैरख्वाही का आप दम भरते हैं। अफसोस की हिन्दूत्व की आपकी झंडाबरदारी सच नहीं है। आपने उन्हें उजाड़ा है। आपको पता है, खत्री पंजाबी बिरादरी से लेकर राजस्थानी गौड़ सारस्वत ब्राह्मण बिरादरी तक के ये लोग उजाड़े जाने के बावजूद हर रोज इस इलाके में आते हैं और यहां के मिट्टी की सोंधी खूशबू अपने फेफड़ों में भर कर जाते है। जानते हैं क्यों ? क्योंकि आपके बहुत ज्यादा मुआवजा देने के बावजूद अपनी जड़ो से दोबारा बेदखल किये जाने का दर्द उन्हें रातों में सोने नहीं देता।

मुआवजे की बात के साथ एक बात याद आयी। मोदी जी, आपने कहा कि 44 मंदिरों पर अवैध कब्जा था। लोगों ने उसे घेर कर घर बनवा लिया था। जनाब यह पूरी तरह से फरेब है। झूठ है। बेइमानी है। आपको शायद नहीं मालूम होगा कि हूण, तुगलक और मुगलों ने देश के तमाम मंदिरों के साथ बनारस के मंदिरों पर भी हमले किये। उन्हें ढ़हाया। उसे नष्ट किया और लूटा। उस जमाने में मोहल्ले के लोगों ने इन प्राचीन मंदिरों को आक्रमणकारियों से छिपाने के लिए उसके इर्द गिर्द दीवार खड़े किये। उस जमाने जान हथेली पर रख कर वहां पूजा पाठ का क्रम बनाये रखा। ऐसे में क्या उन्हें अतिक्रमणकारी कहना चाहिए। आप बेशक होंगे प्रधानमंत्री लेकिन किसी को बेइमान कहने का हक तो आपको संविधान भी नहीं देता जनाब। चलिए मान लेते हैं कि 40 हजार वर्ग मीटर में आने वाले 280 मकान अतिक्रमण ही थे तो साहेब, आपने या आपकी सूबाई सरकार ने संविधान की किस धारा के तहत इन अतिक्रमणकारियों को करोड़ो का मुआवजा दे दिया ? इन्हें तो कायदे से जेल में डाला जाना चाहिए था फिर आपने कैसे यह सब होने दिया ? आपको शायद पता होगा कि पांच सौ फीट के एक मकान का मुआवजा एक करोड़ रूपए दिया गया, जबकि उसकी कीमत महज कुछ लाख ही थी। कुछ रसूख वालों को तो आपके चहेते योगी आदित्यनाथ की सरकार ने नौ करोड़ का मुआवजा दिया। सर, ऐसा क्यों ? योगी जी की सरकार में इसी क्षेत्र से आने वाले एक नये मंत्री से लेकर कभी शिवसेना के नाम पर राजनीति करने वाले इस इलाके के एक छोटभैया नेता तक ने घर उजाड़े जाने के इस धंधे में अरबों रूपए कूट डाले।

सर, आप इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि आपको कुछ पता ही नहीं रहा। आपको इस बात का भी पता है कि इन रिफ्यूजीस के घर उजाड़ने में किसने कितनी दलाली ली। सुन कर शर्म आती है कि आपकी सरकार ने बनारस के लोगों को सिर्फ दलाली के टुकड़े फेंके और औरंगजेब सरीखे इन आततायियों ने अपनों का सिर कलम कर दिया। बाकी धंधे का असली माल तो गुजरात से आये धंधेबाजों ने आपस में बांट लिया। काॅरिडोर कैसे बनेगा और उसमें कहां क्या बनेगा ये सब तो गुजरात के हाथ लगा है। इसके पीछे दलालों की दलील है कि हमारे यहां ईमान नहीं है। साहेब, ये कह कर तो आपने पूरे बनारस को बेइमान घोषित कर दिया। सब रिकाॅर्डेड है साहेब कि पिछले पांच सालों में बनारस में जो कुछ भी तथाकथित विकास हुआ उसमें बनारस के हाथ कुछ नहीं लगा। एक भी ठेका बनारस वालों को नहीं दिया गया। सबके सब गुजरात वालों को। वो गुजराती ठेकेदार अपने साथ मजूदर भी लेकर आये। क्या हम बनारसी मजदूरी के लायक भी नहीं हैं ? मोदी जी, क्या हम इतने खराब हैं कि आप हमें मजदूरी के लायक भी न समझें ? सर, ये कुछ चंद सवालात बनारस वालों का इगो नहीं है, ये ऐसे यक्ष प्रश्न हैं जिनके जवाब आपके पास तो क्या संघ के पुरोधाओं के पास भी नहीं हैं। आपकी सूबाई सरकार ने काॅरिडोर के नाम पर दर्जनों मंदिर तोड़े हैं। इन मंदिरों से उखाड़ कर फेंके गये देवी देवताओं के सैकड़ों विग्रह और शिवलिंग अक्सर ही किसी काॅलोनी के खाली पड़े प्लाॅट में कूड़े के बीच पड़े मिलते हैं। साहेब, ये विग्रह नहीं उन देवताओं की रूहें हैं जिनकी प्राण प्रतिष्ठा कर कई पुश्तों ने इन्हें पूजा था। ये रूहें आज लाहौरी टोला के लोगों को सोने नहीं दे रही हैं लेकिन यकीन मान लीजिए जनाब की चुनाव बाद आप और आपकी पार्टी भी चैन से सो नहीं पाएगी। क्योंकि हिन्दूत्व के नाम पर आपने पाप किया है।

1989 में जब मंडल सिफारिशों को केंद्र की नौकरियों में लागू किया गया था तब विश्वविद्यालयों में गैर आरक्षित छात्रों का विशाल बहुमत था।अनुसूचित जाति/जनजाति का दाखिले में आरक्षण था।अन्य पिछड़े वर्गों के लिए दाखिले में आरक्षण न था।समाजवादी युवजन सभा दाखिले के मामले में ‘खुला दाखिला,सस्ती शिक्षा-लोकतंत्र की सही परीक्षा’ मानती थी। ‘खुला दाखिला’ का मतलब था जिसने भी पिछली कक्षा पास की हो और आगे पढ़ना चाहता हो उसे दाखिला मिले।यह सिद्धांत लागू हो तो दाखिले में आरक्षण का सवाल बेमानी हो जाता। 1977 में काशी विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष चंचल कुमार ने ‘खुला दाखिला’ करवाया था।यह अपवाद था।शिक्षा व्यवस्था की छलनियाँ लगातार छंटनी करती जाती है।सीट घटाना,फीस बढ़ाना,प्रवेश परीक्षा करना छंटनी के प्रिय औजार होते हैं।इस पूरी प्रक्रिया से निकली मलाई व्यवस्था को चलाती है,यथास्थिति तीजै रखती है ।
बहरहाल,1989 में विश्वविद्यालय मंडल विरोध का केंद्र बने और कुछ युवकों ने आत्मदाह द्वारा आत्महत्या की कोशिश की। इसी समूह ने मेरे जैसे आरक्षण समर्थक को जलाने की योजना बनाई थी।समाजवादी साथी और जिगरी दोस्त महताब आलम की मुस्तैदी से आग लगाने जैसा कुछ न हो सका।कुछ गुंडों ने मुझ पर हमला जरूर किया था।आरक्षण समर्थन की पहल परिसर के छात्रावासों के बाहर लॉजों,देहातों, कचहरी और पटेल धर्मशाला जैसे केंद्रों से होती थी।समता संगठन के साथी सुनील ने मंडल रपट का गहराई से अध्ययन किया था।वे हमारी गोष्ठियों में देश समाज के लिए आरक्षण का महत्व समझाते थे।मंडल आयोग में पिछड़ेपन के आकलन के लिए किन कारकों को गणना में लेकर इंडेक्स बनाया गया था,सुनील बताते थे।सामाजिक यथास्थिति को धक्का लगा था। CII,ASSOCHAM और FICCI जैसे पूंजीपतियों के संगठन ने मंडल का विरोध किया।मधु लिमये,किशन पटनायक, राजकिशोर,मस्तराम कपूर और सुनील जैसों के अग्रलेख सामाजिक न्याय को ताकत और दिशा देते थे।
1977 में प्रशासनिक सेवाओं में भारतीय भाषाओं के माध्यम की इजाजत से भी इस प्रकार का सकारात्मक तब्दीली आई थी।एक मौन क्रांति हुई जब अर्जुन सिंह ने गैर आरक्षित सीटों को बढ़ाते हुए दाखिले में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण देना शुरू किया।इसके पहले तक अनुसूचित जाति/जनजाति के छात्र शिक्षा केंद्रों में अन्य पिछड़े वर्गों के छात्रों से अधिक संगठित थे।
मुझे 76-77 के दौर में हर साल नतीजे घोषित करते वक़्त लोक सेवा आयोग द्वारा यह प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया जाता था कि आरक्षित वर्ग के कितने परीक्षार्थी सामान्य सीटों पर चुने गए।यह आंकड़ा आरक्षण नीति की सफलता का द्योतक है। 8 लाख की आमदनी वाले सवर्णों को ‘आरक्षण’ देकर न सिर्फ गरीब सवर्णों के साथ अन्याय हुआ अपितु आरक्षित वर्गों के उन मेधावी बच्चों के साथ भी अन्याय हुआ है जो गैर आरक्षित सीटों पर खुली स्पर्धा में चुने जाते।मैंने ‘ ‘ का इस्तेमाल इसलिए किया कि आरक्षण ‘गरीबी हटाओ’ या ‘रोजगार दो’ का कार्यक्रम नहीं होता,एकाधिकार हटाने और नुमाइंदगी का औजार है।किशन पटनायक कहते थे साध्य नहीं साधन है आरक्षण,साध्य है समतामूलक समाज।
5 मार्च के भारत बंद का केंद्र विश्विद्यालय बने इसकी बहुत तसल्ली है।विश्विद्यालयों की छात्र- आबादी का स्वरूप बदल चुका है।ज्यादा चर्चा नहीं हो रही इसलिए यह भी दर्ज कर रहा हूँ कि जातिवार जनगणना और सार्वजनिक क्षेत्रों की सुरक्षा भी इस ‘भारत बंद’ के मुद्दे थे।भूलो मत! भूलो मत!

  • सुनील
    भा रत में वन्यप्राणियों को बचाने की मुहिम जोर शोर से चल राही है। देश में राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारण्यों की संख्या बढ़ते-बढ़ते छ: सौ के करीब पहुंच चुकी है। इस मुहिम में वन्य प्राणियों के बीच शेर या बाघ को विशेष दर्जा दिया गया। यह माना गया है कि वन्य प्राणियों की भोजन श्रृंखला में चूंकि शेर सबसे ऊपर है, इसलिए शेरों की उपस्थिति एवं संख्या कुल मिलाकर उस इलाके की पारिस्थितिकी हालत का पैमाना होती है। अंतर्राष्ट्रीय चिंता एवं दबाव के बीच भारत में 1973 से प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ। वर्ष 2005 तक देश में कुल 28 टाइगर रिजर्व बनाए जा चुके थे। बाद में आठ नए संरक्षित क्षेत्रों के टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला है। इनमें से सबसे ज्यादा 6 मध्यप्रदेश में हैं। कहते हैं कि देश के लगभग तीन हजार शेरों में से 246 से 364 के बीच मध्यप्रदेश में है। लेकिन इस टाइगर स्टेट में भी शेरों के जीवन पर संकट छाया है। मशहूर कान्हा टाइगर रिजर्व में भी नवंबर 2008 से मार्च 2009 के बीच के मात्र 5 महीनों में 6 शेरों की मौत की खबर है।
    आ जकल जंगल के राजा शेर की हवाई यात्राएं खबरों में छाई है। यह अलग बात है कि बेचारा शेर ये यात्राएं बेहोश हालत में करता है। पिछले वर्ष जून-जुलाई में राजस्थान के रणथंभौर रिजर्व से एक शेर और एक शेरनी के हेलीकॉप्टर से सारिस्का टाइगर रिजर्व में पहुंचाया गया था। स्थानांतरित शेरों में रेडियो कॉलर लगाए गए हैं और उपग्रहों की मदद से उन पर नजर रखी जा रही है। इस हाई-फाई कार्यक्रम पर डेढ़ करोड़ रुपया खर्च हुआ। शेरों को लाने के साथ सरिस्का टाइगर रिजर्व के गांव हटाए जा रहे हैं। एक गांव हटाया जा चुका है तथा दो और गांवों को बाहर बसाने के लिए केन्द्र सरकार ने 26 करोड़ रुपए की मंजूरी दी है।
    फिर ‘टाइगर स्टेट’ मध्यप्रदेश की बारी आई। बांधवगढ़ और कान्हा टाइगर रिंजर्वों से दो शेरनियों को इसी तरह हेलीकॉप्टर व ट्रक से पन्ना टाइगर रिंजर्व में छोड़ा गया। पहले बताया गया कि पन्ना टाइगर रिजर्व में नर शेर ही बचे हैं। इसलिए मादाओं की जरूरत है। लेकिन जब मादा पहुंची, तो इकलौता नर भी गायब हो गया। कई जानकारों ने शंका प्रकट की है कि शेरों के ये नाटकीय व महंगे स्थानांतरण कितने सफल होंगे। प्रकृति में पलने वाले शेर कोई कागंजी शेर नहीं हैं, जिन्हें एक जगह से हटाकर दूसरी जगह स्थापित कर दिया जाए। सवाल यह भी है कि सरिस्का या पन्न रिंजर्वों से शेर गायब कैसे हो गए? साढ़े तीन दशकों से चल रहे प्रोजेक्ट टाइगर में अरबों रुपए खर्च करने के बाद ऐसे हालात क्यों पैदा हो रहे हैं? 2004 का दिसम्बर महीना भारत के वन्य जीव संरक्षण कार्यक्रम और वन्य प्राणी प्रेमियों के लिए एक बड़ा झटका लेकर आया था। पता चला कि राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व में एक भी शेर नहीं है। इसी वर्ष पहले वहां 16 से 18 शेर होने का दावा किया गया था। इसके पहले सरिस्का में 26-27 शेर बताए जा रहे थे। लगता है शेरों की गिनती काफी हद तक फर्जी थी।
    सरिस्का के इस भंडाभोड़ ने देश के वन्य जीवन संरक्षण के पूरे ढांचे को झकझोर दिया। प्रधानमंत्री ने सरिस्का में सीबीआई जांच का आदेश दिया। भारत के शेर संरक्षण के कार्यक्रम का मूल्यांकन करने और सुझाव देने के लिए एक टास्क फोर्स प्रसिध्द पर्यावरणविद् सुनीता नारायण की अध्यक्षता में बनाई गई। इस टास्क फोर्स ने वर्ष 2005 में ही एक बहुमूल्य रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी। लेकिन हालात नहीं बदले। इसके तीन वर्ष बाद मध्यप्रदेश पन्ना टाइगर रिजर्व का घपला सामने आया है। 542 वर्ग किमी में फैले पन्न टाइगर रिजर्व में वर्ष 2008 की गणना में 24 शेर होने का दावा किया गया था। वर्ष 2002 में 31 की संख्या बताई गई थी। अचानक वे गायब हो गए हैं और वहां शेरों को आबाद करने के लिए शेर आयात करना पड़ रहा है। हालांकि एक शोधकर्ता रघु चुंडावत ने 2005 में ही वहां शेरों की संख्या पर सवाल उठाया था। जवाब में इस शोधकर्ता को पन्ना टाइगर रिंजर्व के अधिकारियों ने काफी परेशान किया था और उनके शोध में रूकावटें पैदा की थीं। केंद्र सरकार ने अब पन्न के मामले के भी जांच बिठाई है। इसी प्रकार एक घपला मध्यप्रदेश के मूनो अभ्यारण्य में हुआ है। एशियाई सिंह (बब्बर शेर) सिर्फ गुजरात के गिर अभ्यारण्य में ही बचे हैं, किंतु वहां उनकी संख्या ंज्यादा हो गई है। इसलिए इन्हें कूनो में रखने की योजना बनी। वहां के सहारिया आदिवासियों के 24 गांवों को 1999-2001 के दरम्यान हटाकर बाहर बसाया गया। उनकी हालत अब बहुत खराब है। लेकिन उधर गुजरात सरकार के इंकार कर देने से सिंह भी नहीं आ पाए हैं।
    भारत में वन्यप्राणियों को बचाने की मुहिम जोर शोर से चल राही है। देश में राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारण्यों की संख्या बढ़ते-बढ़ते छ: सौ के करीब पहुंच चुकी है। इस मुहिम में वन्य प्राणियों के बीच शेर या बाघ को विशेष दर्जा दिया गया। यह माना गया है कि वन्य प्राणियों की भोजन श्रृंखला में चूंकि शेर सबसे ऊपर है, इसलिए शेरों की उपस्थिति एवं संख्या कुल मिलाकर उस इलाके की पारिस्थितिकी हालत का पैमाना होती है। अंतर्राष्ट्रीय चिंता एवं दबाव के बीच भारत में 1973 से प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ। वर्ष 2005 तक देश में कुल 28 टाइगर रिजर्व बनाए जा चुके थे। बाद में आठ नए संरक्षित क्षेत्रों के टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला है। इनमें से सबसे ज्यादा 6 मध्यप्रदेश में हैं। कहते हैं कि देश के लगभग तीन हजार शेरों में से 246 से 364 के बीच मध्यप्रदेश में है। लेकिन इस टाइगर स्टेट में भी शेरों के जीवन पर संकट छाया है। मशहूर कान्हा टाइगर रिजर्व में भी नवंबर 2008 से मार्च 2009 के बीच के मात्र 5 महीनों में 6 शेरों की मौत की खबर है।
    आम तौर पर ऐसे संकटों के जवाब में सरकार, वन विभाग, वन्य जीव प्रेमियों और मीडिया जगत की प्रतिक्रिया स्टाफ, सुरक्षा और धनराशि बढ़ाने की मांग के रूप में होती है। किंतु मात्र ज्यादा नाकेदारों, ज्यादा बंदूकों और ज्यादा बजट से यह संकट हल नहीं होने वाला है। दरअसल टाइगर टास्क फोर्स ने अपने विश्लेषण में बताया है कि सरिस्का और पन्ना दोनों टाइगर रिजर्व ऐसे हैं, जहां देश के अन्य टाइगर रिजर्वों से काफी ज्यादा पैसा व स्टाफ लगाया गया है। धनराशि और स्टाफ के हिसाब से वे देश के सर्वोच्च पांच टाइगर रिजर्वों में हैं। पन्ना और सरिस्का टाइगर रिजर्व पर अभी तक क्रमश: 20 करोड़ और 25 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च किए जा चुके हैं। यह वन विभाग के सामान्य बजट तथा कर्मचारियों के वेतन व भत्तों के अतिरिक्त हैं। यदि इतना खर्च करने के बाद भी वहां शेर गायब होते जाते हैं, तो यह इस गरीब देश के बहुमूल्य संसाधनों की बरबादी है। इसे शेर घोटाला कहा जा सकता है। वन विभाग की एक दूसरी प्रतिक्रिया स्थानीय गांववासियों के मत्थे दोष मढ़ने की होती है। यह कहा जाता है कि ये गांव वाले शिकार करते हैं या शिकारियों की मदद करते हैं। उनकी चराई, वनोपज संग्रह, निस्तार और उपस्थिति मात्र से जंगल नष्ट होता है, और शेरों के प्राकृतवास में व्यवधान पैदा होता है। इस समस्या का समाधान स्थानीय गांववासियों के ऊपर कई तरह के प्रतिबंध लगाने तथा गांवों के विस्थापन में खोजा जाता है। किंतु न तो अभी तक संरक्षित क्षेत्रों से गांव हटाने का पूरा काम हो पाया है और न गांववासियों के वन उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना संभव हो पाया है। दरअसल जंगल में रहने वाले आदिवासियों और अन्य गांववासियों की जिंदगी व रोजी-रोटी पूरी तरह जंगल पर आधारित है। इसलिए ये प्रतिबंध और विस्थापन न तो व्यावहारिक हैं और न वांछनीय। इस चक्कर में यह जरूर हो गया है कि वन विभाग और स्थानीय समुदाय के बीच स्थाई रूप से झगड़ा खड़ा हो गया है। वन्य जीवन संरक्षण और शेर बचाने के प्रयासों की नाकामी के पीछे यह एक बड़ा कारण है।
    टाइगर टास्क फोर्स की रिपोर्ट में बताया है कि देश के 600 आरक्षित क्षेत्रों में करीब 40 लाख लोग रहते हैं, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासियों की है। देश के 28 टाइगर रिजर्वों में 1487 गांव हैं, जिनमें करीब 4 लाख लोग रहते हैं। ‘सरिस्का’ में 27 गांव है और ‘पन्ना’ में 45 गांव है। इतने सालों के बाद भी इनमें चार-पांच गांवों को ही हटाकर दूसरी जगह बसाया जा सका है। गांव को दूसरी जगह बसाना व समुचित पुनर्वास करना भी आसान नहीं है। लोगों की जिंदगी बरबाद हो जाती है। फिर सवाल पैसे का भी है। सारे गांव के पुनर्वास में अरबों-खरबों रुपयों की जरूरत होगी। जिस दर से अभी गांवों को बाहर बसाया जा रहा है, देश के सारे आरक्षित क्षेत्रों को गांवमुक्त बनाने में सौ दो सौ साल लग जाएंगे। क्या तब तक देश के शेर व अन्य वन्य प्राणी सुरक्षित नहीं हो पाएंगे?
    दरअसल भारत के वन्य जीव संरक्षकों की बुनियादी दृष्टिकोण इस संकट की जड़ में है। वे यह भूल गए कि जंगल में सिर्फ शेर, हाथी, गैंडे या हिरन ही नहीं रहते है बल्कि मनुष्य भी रहते हैं। भारत के आदिवासियों के बहुत सारे गांव घने जंगलों के बीच ही हैं। जंगल उनकी भी धरोहर है और उनका जीवन भी जंगल पर उतना ही आश्रित है। भारत के नक्शे पर आदिवासी इलाके और जंगल वाले इलाके लगभग एक ही हैं। ये ही इलाके देश के सबसे गरीब इलाके भी हैं। इन गरीब आदिवासियों और अन्य वनवासियों से उनका एकमात्र सहारा जंगल छीन लेना आजाद भारत के बड़े अमानवीय कृत्यों और अन्यायों में से एक है। इस दृष्टिदोष के कारण भारत के वन्य जीव संरक्षण के कानूनों, नियमों और योजनाओं में वनवासियों के जरूरतों व अस्तित्व की कोई जगह नहीं रखी गई है, बल्कि उसे गैर कानूनी बना दिया गया है। नतीजा यह हुआ है कि देश के सारे आरक्षित क्षेत्रों में वन विभाग और ग्रामवासियों के बीच तनाव एवं संघर्ष की स्थिति है। विभाग की जो ऊर्जा और संसाधन वास्तविक संरक्षण कार्य में लगने चाहिए, वे स्थानीय लोगों के खिलाफ प्रतिबंधों को लागू करने और उन्हें दूसरी जगह बसाने की तैयारी में लग रहे हैं।
    विडंबना यह है कि देश के किसी भी आरक्षित क्षेत्र में इस बात का कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया है कि वहां रहने वाले गांववासियों की चराई, वनोपज संग्रह, निस्तार, खेती या जंगल के वन्य उपयोग से वहां के वन्य प्राणियों को क्या एवं कितनी दिक्कत है? दोनों साथ-साथ रह सकते हैं या नहीं? ग्रामीणों की उपस्थिति से वन्य जीवन को अनिवार्य रूप से नुकसान होता है, यह देश के वन्य जीव संरक्षण प्रतिष्ठान की एक अंधविश्वास है, जिसके कारण समस्या का सही निदान नहीं हो पा रहा है। यह जरूरी नहीं है वन्य जीव तथा ग्रामवासियों के हितों में अनिवार्य रूप से टकराव हो। कुछ साल पहले एक अध्ययन में पता लगा कि राजस्थान के भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य में वहां चरने वाली भैसों से पक्षियों को आकर्षित करने और भोजन में मदद मिलती है। लेकिन वहां भैंसों की चराई रोकने के लिए अभ्यारण्य के स्टाफ द्वारा चरवाहों पर गोली चलाने तक की घटनाएं हो चुकी हैं। जंगल में आग नियंत्रण में भी गांववासियों की बड़ी भूमिका है। न केवल वे आग बुझाने की मदद करते हैं, बल्कि उनके पालतू पशुओं की चराई से जंगल की घास व झाड़ियों की वृध्दि नियंत्रित रहती है। यदि जंगल क्षेत्र से गांवों को हटाकर चराई पूरी तरह रोक दी गई, तो घास व झाड़ियां इतनी बढ़ जाएंगी कि उनमें आग लगने पर उसे किसी हालत में काबू करना संभव नहीं होगा। ऑस्टे्रलिया और अमरीका में पिछले कुछ समय में जंगलों में भीषण आग की घटनाएं हमारे लिए एक सबक है। हेलीकॉप्टरों और अनेक फायर ब्रिगेडों के बावजूद इन आग पर काबू न पाया जा सका। भारत में भी जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं। यदि ग्रामवासियों को बाहर करने की अंधी व आत्मघाती नीति चलती रही, तो भारत में भी ऐसी घटनाएं हो सकती हैं।
    सच तो यह है कि भारत के जंगलों और जंगली जानवरों का विनाश वहां रहने वाले आदिवासियों के कारण नहीं हुआ है। यदि ऐसा होता, तो काफी पहले जंगल और शेर खत्म हो जाने चाहिए थे। दरअसल, जंगल, जंगली जानवरों और आदिवासियों का तो सह-अस्तित्व रहा है। वनों और वन्य प्राणियों के विनाश का असली कारण तो आधुनिक विकास है, जो पिछले दो सौ सालों में जंगलों को निगलता गया है। राजाओं, नवाबों व अंग्रेंज अफसरों द्वारा जानवरों का शिकार भी एक कारण रहा है। सुनीता नारायण की अध्यक्षता वाले टाइगर टास्क फोर्स ने वन्य प्राणी संरक्षण की इस जन विरोधीनीति की खामी को पहचाना है। वनों में एवं उनके आसपास रहने वाले समुदायों की सक्रिय भागीदारी के बगैर वन्य प्राणी संरक्षण की कोई योजना सफल नहीं हो सकती है, इसकी चेतावनी उसने दी है। इसके लिए उनके हितों, अधिकारों और अस्तित्व को भी सुनिश्चित करना होगा। टास्क फोर्स ने इस बात को सूत्र रूप में कहा है- ‘शेरों का संरक्षण उन जंगलों के संरक्षण से अभिन्न रूप से जुड़ा है जहां वे रहते हैं तथा जंगलों का संरक्षण अभिन्न रूप से जंगल में रहने वाले लोगों की जिंदगियों से जुड़ा है।’ लेकिन लगता है कि सरकार में बैठे वन्य प्राणी संरक्षण के पुरोधाओं ने टाइगर टास्क फोर्स की इस समझदारी पर कोई ध्यान नहीं दिया है, और उसका ढर्रा एवं रवैया नहीं बदला है। इसकी एक झांकी 2007 के अंतिम दिनों में मिली, जब ताबड़तोड़ ढंग से देश के टाइगर रिजर्वों में कोर क्षेत्र या ‘संवेदनशील शेर आवास’ घोषित किए गए। कानून की जरूरत के मुताबिक विशेषज्ञ समिति बनाने से लेकर उसकी रिपोर्ट तैयार होने और राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशन तक की कार्रवाईयां एक महीने में पूरी कर ली गई। मध्यप्रदेश की विशेषज्ञ समिति ने तो टाइगर रिजर्वों का दौरा करने या गांववासियों या अन्य व्यक्तियों से बात करने की भी जरूरत नहीं समझी, और मात्र भोपाल में एक बैठक करके आठ दिन के अंदर अपनी सिफारिशें दे दीं। कानून की भावना का मजाक बनाते हुए यह गजब की हड़बड़ी इसलिए की गई, क्योंकि 1 जनवरी 2008 से देश में वन अधिकार कानून लागू हो रहा था। टाइगर रिजर्वों में रहने वाले ग्रामवासियों को अधिकार न मिल पाए, इसलिए अचानक वन विभाग इतना मुस्तैद हो गया था। यह कदम टकराव को बढ़ाने का ही काम करेगा।

 

भारत की लगभग एक चौथाई आबादी के पास रोशनी के लिए भी बिजली नहीं है। अमेरिका और विश्व व्यापार संगठन के लिए यह चिन्ता का विषय क्यों हो? 2013 में अमेरिका ने विश्व व्यापार संगठन में शिकायत दर्ज कराई कि भारत द्वारा अपने सौर्य उर्जा कार्यक्रम (जवाहरलाल नेहरू सोलर मिशन,NSM) के लिए दिया जा रहा अनुदान विश्व व्यापार संगठन के व्यापार नियमों का उल्लंघन है। शिकायत में कहा गया था कि सौर्य उर्जा संग्रहण के लिए जिन पुर्जों की आवश्यकता होती है उसके विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ भारत सरकार की नीति विभेदकारी है।

प्रधान मंत्री की हाल की अमेरिका यात्रा के ठीक पहले विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटारा समिति ने इस मामले में फैसला सुना दिया। सौर्य उर्जा संग्रहण में काम आने वाले पुर्जो को बनाने वाली भारतीय कम्पनियों को दिया जाने वाली रियायत विश्व व्यापार नियमों का उल्लंघन है तथा रियायत बन्द न करने की स्थिति में भारत के खिलाफ व्यापार-प्रतिबन्ध की कार्रवाई की जाएगी।

दुनिया भर में समझदार देश जीवाश्म ईंधन जला कर बिजली बनाना कम करने तथा सौर्य उर्जा जैसे नवीनीकृत किए जाने लायक स्रोतों से बिजली बनाने का परिमाण बढ़ाने की जुगत में लगे हैं। मोरोक्को जैसे सहार रेगिस्तान से जुड़े देश में सन 2020 कुल बिजली आवश्यकता की आधी नवीनीकृत किए जाने लायक स्रोत से पैदा होगी।इस प्रकार पैदा बिजली का कुछ हिस्सा वह योरप को निर्यात भी कर सकेगा। अमेरिका और जर्मनी जैसे औद्योगीकृत देशों की बात लें तो कुल बिजली जरूरत का अमेरिका 10 फीसदी नवीनीकृत स्रोत (कार्बन उत्सर्जन न करने वाले) से हासिल करता है जबकि जर्मनी अपनी जारूरत का 28 फीसदी इस प्रकार स्वच्छ बिजली से हासिल करता है। अमेरिका खुद नवीकरण योग्य बिजली बनाने में अनुदान और कर्ज-रियायतें देता है।गत वर्षों में अमेरिका ने सालाना 39 अरब डॉलर का अनुदान तथा 30% कर छूट नवीकरण के लायक बिजली उत्पादन के लिए दी है। भारत ने इस सन्दर्भ में विश्व व्यापार संगठन में प्रश्न जरूर उठाया है परंतु अमेरिका की तरह विवाद पंचायत में मामला दर्ज नहीं कराया है।

अमेरिका द्वारा भारत के नेहरू सौर्य उर्जा मिशन की बाबत उठाये गये विवाद की बारीकी में चला जाये। नेहरू सौर्य उर्जा मिशन के पहले चरण में सौर्य बैटरी तथा सौर्य मॉड्यूल बनाने वाली भारतीय कंपनियों को अनुदान मिल रहा था किन्तु इससे अमेरिका को दिक्कत नहीं थी क्योंकि अमेरिकी कम्पनिया इनका बहुत कम निर्यात करती हैं।अमेरिका की आंखों में किरकिरी नेहरू सौर्य मिशन के दूसरे चरण में शुरु हुई। दूसरे चरण में यह संभावना था कि भारत अपने मिशन में घरेलू उत्पादों के हिस्से का दायरा बढ़ा देगा और अक्टूबर 2013 में जब मिशन का दूसरा चरण शुरु हुआ तब अमेरिका की आशंका सही साबित हुई। भारतीय बाजार में अमेरिकी पतली फिल्म का वर्चस्व था।

भारत द्वारा अन्य देशों के साथ विभेदकारी बर्ताव किया जा रहा है अमेरिका का यह तर्क विश्व व्यापार संगठन ने मान लिया to उसमें विस्मय की बात नहीं थी। कैनेडा द्वारा पर्यावरण के हक में तथा स्वदेशी सौर्य उर्जा को बढ़ावा देने के लिए बनाये गये एक कानून को युरोपीय संघ और जापान ने विश्व व्यापार संगठन में चुनौती दी थी। विश्व व्यापार संगठन ने इस कानून को विभेदकारी ठहराया था।

भारत सरकार के खिलाफ आया यह फतवा देश और दुनिया के पर्यावरण के हित में नहीं है। इससे ज्यादा चिन्तनीय है किसी अन्य देश अथवा थानेदारी करने वाले विश्व व्यापार संगठन के अलावा भारत की घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय उर्जा दुर्नीति। प्रधान मंत्री के विदेश दौरों में साथ रहने वाले उद्योगपति के धन्धे का प्रमुख क्षेत्र उर्जा उत्पादन का है।अडाणी समूह द्वारा राजस्थान सरकार के उपक्रम के साथ मिल कर 10,000 मेगावाट सौर्य बिजली बनाने की 65,000 करोड रुपये की योजना है।यह देश में नवीकरण योग्य उर्जा की सबसे बड़ी परियोजना है।ऑस्ट्रेलिया में 10 अरब डॉलर से प्रस्तावित कारमाइकल खनन योजना के बाद अडाणी समूह की यह दूसरे नम्बर की परियोजना है। इसकी सफलता इसमें लगने वाली पूंजी के जुगाड़ पर निर्भर है है। वित्तीय वर्ष 2013-14 के खत्म होते वक्त अडाणी समूह पर 71,979 करोड का कर्ज था। उद्योगपति की लगाई अपनी पूंजी से कर्ज का अनुपात 2.92 (lagbhag teen guna)था।ऐसी परियोजनाओं में आम तौर पर 70 फीसदी हिस्सा कर्ज का होता है।

अमेरिका की शिकायत पर भारत के खिलाफ विश्व व्यापार संगठन का यह फैसला अगस्त 2015 में आया है। जनवरी 2015 अडाणी समूह ने ‘सन एरिकसन’ नामक अमेरिकी कम्पनी के साथ मिल कर भारत का सबसे बड़ा सौर्य पैनल बनाने का कारखाना बैठाने का निर्णय ले लिया था।उस वक्त गौतम अडाणी ने घोषणा की थी भारत नवीकरणीय उर्जा में दुनिया का नेतृत्व करेगा। भारत सरकार द्वारा देश के विरुद्ध दिए गए निर्णय का विरोध न करने की यह प्रमुख वजह नहीं हो सकती है?

उर्जा के क्षेत्र में भारतीय पूंजीपतियों द्वारा छोटे मुल्कों में पांव पसारने में सरकार की मदद की भूमिका पर गौर करना भी अप्रासंगिक नहीं होगा। उदारीकरण के 23 साल बीत जाने के बाद भी बजट का सबसे बड़ा मद कर्ज चुकाने में जाता है। इसके बावजूद प्रधान मंत्री विदेश यात्राओं के क्रम में जब मंगोलिया को एक अरब डॉलर अथवा बांग्लादेश को दो अरब डॉलर का कर्ज देना घोषित करते हैं। देश के नागरिकों को क्या इसका फक्र करना चाहिए? इस बात को भी हमें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि मंगोलिया में नवीकरण योग्य बिजली में अडाणी तथा बांग्लादेश में विद्युत निर्माण में अम्बानी-अडाणी की परियोजनायें चलने वाली हैं। अफ़लातून ,
, रीडर आवास ,जोधपुर कॉलॉनी,
काशी विश्वविद्यालय , वाराणसी२२१००५
Phone फोन : +918004085923 दि. अक्टूबर 27, 2015


असेम्बली बम काण्ड पर यह अपील भगतसिंह द्वारा जनवरी, 1930 में हाई कोर्ट में की गयी थी। इसी अपील में ही उनका यह प्रसिद्द वक्तव्य था : “पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और यही चीज थी, जिसे हम प्रकट करना चाहते थे।”


माई लॉर्ड, हम न वकील हैं, न अंग्रेजी विशेषज्ञ और न हमारे पास डिगरियां हैं। इसलिए हमसे शानदार भाषणों की आशा न की जाए। हमारी प्रार्थना है कि हमारे बयान की भाषा संबंधी त्रुटियों पर ध्यान न देते हुए, उसके वास्तवकि अर्थ को समझने का प्रयत्न किया जाए। दूसरे तमाम मुद्दों को अपने वकीलों पर छोड़ते हुए मैं स्वयं एक मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करूंगा। यह मुद्दा इस मुकदमे में बहुत महत्वपूर्ण है। मुद्दा यह है कि हमारी नीयत क्या थी और हम किस हद तक अपराधी हैं।

विचारणीय यह है कि असेंबली में हमने जो दो बम फेंके, उनसे किसी व्यक्ति को शारीरिक या आर्थिक हानि नहीं हुई। इस दृष्टिकोण से हमें जो सजा दी गई है, वह कठोरतम ही नहीं, बदला लेने की भावना से भी दी गई है। यदि दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए, तो जब तक अभियुक्त की मनोभावना का पता न लगाया जाए, उसके असली उद्देश्य का पता ही नहीं चल सकता। यदि उद्देश्य को पूरी तरह भुला दिया जाए, तो किसी के साथ न्याय नहीं हो सकता, क्योंकि उद्देश्य को नजरों में न रखने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति भी साधारण हत्यारे नजर आएंगे। सरकारी कर वसूल करने वाले अधिकारी चोर, जालसाज दिखाई देंगे और न्यायाधीशों पर भी कत्ल करने का अभियोग लगेगा। इस तरह सामाजिक व्यवस्था और सभ्यता खून-खराबा, चोरी और जालसाजी बनकर रह जाएगी। यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाए, तो किसी हुकूमत को क्या अधिकार है कि समाज के व्यक्तियों से न्याय करने को कहे? यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाए, तो हर धर्म प्रचारक झूठ का प्रचारक दिखाई देगा और हरेक पैगंबर पर अभियोग लगेगा कि उसने करोड़ों भोले और अनजान लोगों को गुमराह किया । यदि उद्देश्य को भुला दिया जाए, तो हजरत ईसा मसीह गड़बड़ी फैलाने वाले, शांति भंग करने वाले और विद्रोह का प्रचार करने वाले दिखाई देंगे और कानून के शब्दों में वह खतरनाक व्यक्तित्व माने जाएंगे… अगर ऐसा हो, तो मानना पड़ेगा कि इनसानियत की कुरबानियां, शहीदों के प्रयत्न, सब बेकार रहे और आज भी हम उसी स्थान पर खड़े हैं, जहां आज से बीस शताब्दियों पहले थे। कानून की दृष्टि से उद्देश्य का प्रश्न खासा महत्व रखता है।

माई लॉर्ड, इस दशा में मुझे यह कहने की आज्ञा दी जाए कि जो हुकूमत इन कमीनी हरकतों में आश्रय खोजती है, जो हुकूमत व्यक्ति के कुदरती अधिकार छीनती है, उसे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं। अगर यह कायम है, तो आरजी तौर पर और हजारों बेगुनाहों का खून इसकी गर्दन पर है। यदि कानून उद्देश्य नहीं देखता, तो न्याय नहीं हो सकता और न ही स्थायी शांति स्थापित हो सकती है। आटे में संखिया मिलाना जुर्म नहीं, यदि उसका उद्देश्य चूहों को मारना हो। लेकिन यदि इससे किसी आदमी को मार दिया जाए, तो कत्ल का अपराध बन जाता है। लिहाजा, ऐसे कानूनों को, जो युक्ति (दलील) पर आधारित नहीं और न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है, उन्हें समाप्त कर देना चाहिए। ऐसे ही न्याय विरोधी कानूनों के कारण बड़े-बड़े श्रेष्ठ बौद्धिक लोगों ने बगावत के कार्य किए हैं।

हमारे मुकदमे के तथ्य बिल्कुल सादा हैं। 8 अप्रैल, 1929 को हमने सेंट्रल असेंबली में दो बम फेंके। उनके धमाके से चंद लोगों को मामूली खरोंचें आईं। चेंबर में हंगामा हुआ, सैकड़ों दर्शक और सदस्य बाहर निकल गए। कुछ देर बाद खामोशी छा गई। मैं और साथी बीके दत्त खामोशी के साथ दर्शक गैलरी में बैठे रहे और हमने स्वयं अपने को प्रस्तुत किया कि हमें गिरफ्तार कर लिया जाए। हमें गिरफ्तार कर लिया गया। अभियोग लगाए गए और हत्या करने के प्रयत्न के अपराध में हमें सजा दी गई। लेकिन बमों से 4-5 आदमियों को मामूली चोटें आईं और एक बेंच को मामूली नुकसान पहुंचा। जिन्होंने यह अपराध किया, उन्होंने बिना किसी किस्म के हस्तक्षेप के अपने आपको गिरफ्तारी के लिए पेश कर दिया। सेशन जज ने स्वीकार किया कि यदि हम भागना चाहते, तो भागने में सफल हो सकते थे। हमने अपना अपराध स्वीकार किया और अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए बयान दिया। हमें सजा का भय नहीं है। लेकिन हम यह नहीं चाहते कि हमें गलत समझा जाए। हमारे बयान से कुछ पैराग्राफ काट दिए गए हैं, यह वास्तविकता की दृष्टि से हानिकारक है।

समग्र रूप में हमारे वक्तव्य के अध्ययन से साफ होता है कि हमारे दृष्टिकोण से हमारा देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा है। इस दशा में काफी ऊंची आवाज में चेतावनी देने की जरूरत थी और हमने अपने विचारानुसार चेतावनी दी है। संभव है कि हम गलती पर हों, हमारा सोचने का ढंग जज महोदय के सोचने के ढंग से भिन्न हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हमें अपने विचार प्रकट करने की स्वीकृति न दी जाए और गलत बातें हमारे साथ जोडी जाएं।

‘इंकलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ के संबंध में हमने जो व्याख्या अपने बयान में दी, उसे उड़ा दिया गया है: हालांकि यह हमारे उद्देश्य का खास भाग है। इंकलाब जिंदाबाद से हमारा वह उद्देश्य नहीं था, जो आमतौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और यही चीज थी, जिसे हम प्रकट करना चाहते थे। हमारे इंकलाब का अर्थ पूंजीवादी युद्धों की मुसीबतों का अंत करना है। मुख्य उद्देश्य और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया समझे बिना किसी के संबंध में निर्णय देना उचित नहीं। गलत बातें हमारे साथ जोड्ना साफ अन्याय है।
इसकी चेतावनी देना बहुत आवश्यक था। बेचैनी रोज-रोज बढ़ रही है। यदि उचित इलाज न किया गया, तो रोग खतरनाक रूप ले लेगा। कोई भी मानवीय शक्ति इसकी रोकथाम न कर सकेगी। अब हमने इस तूफान का रुख बदलने के लिए यह कार्रवाई की। हम इतिहास के गंभीर अध्येता हैं। हमारा विश्वास है कि यदि सत्ताधारी शक्तियां ठीक समय पर सही कार्रवाई करतीं, तो फ्रांस और रूस की खूनी क्रांतियां न बरस पड़तीं। दुनिया की कई बड़ी-बड़ी हुकूमतें विचारों के तूफान को रोकते हुए खून-खराबे के वातावरण में डूब गइंर्। सत्ताधारी लोग परिस्थितियों के प्रवाह को बदल सकते हैं। हम पहले चेतावनी देना चाहते थे। यदि हम कुछ व्यक्तियों की हत्या करने के इच्छुक होते, तो हम अपने मुख्य उद्देश्य में विफल हो जाते। माई लॉर्ड, इस नीयत और उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए हमने कार्रवाई की और इस कार्रवाई के परिणाम हमारे बयान का समर्थन करते हैं। एक और नुक्ता स्पष्ट करना आवश्यक है। यदि हमें बमों की ताकत के संबंध में कतई ज्ञान न होता, तो हम पं. मोती लाल नेहरू, श्री केलकर, श्री जयकर और श्री जिन्ना जैसे सम्माननीय राष्ट्रीय व्यक्तियों की उपस्थिति में क्यों बम फेंकते? हम नेताओं के जीवन किस तरह खतरे में डाल सकते थे? हम पागल तो नहीं हैं? और अगर पागल होते, तो जेल में बंद करने के बजाय हमें पागलखाने में बंद किया जाता। बमों के संबंध में हमें निश्चित जानकारी थी। उसी कारण हमने ऐसा साहस किया। जिन बेंचों पर लोग बैठे थे, उन पर बम फेंकना कहीं आसान काम था, खाली जगह पर बमों को फेंकना निहायत मुश्किल था। अगर बम फेंकने वाले सही दिमागों के न होते या वे परेशान होते, तो बम खाली जगह के बजाय बेंचों पर गिरते। तो मैं कहूंगा कि खाली जगह के चुनाव के लिए जो हिम्मत हमने दिखाई, उसके लिए हमें इनाम मिलना चाहिए। इन हालात में, माई लार्ड, हम सोचते हैं कि हमें ठीक तरह समझा नहीं गया। आपकी सेवा में हम सजाओं में कमी कराने नहीं आए, बल्कि अपनी स्थिति स्पष्ट करने आए हैं। हम चाहते हैं कि न तो हमसे अनुचित व्यवहार किया जाए, न ही हमारे संबंध में अनुचित राय दी जाए। सजा का सवाल हमारे लिए गौण है।

दो-तीन वाकये ऐसे हैं जब लड़कियों द्वारा मुझ पर खुले आम व्यक्तिगत टिप्पणी की गई थी।मैं उत्तर देने की स्थिति में न था।और मुझे बहुत अच्छा लगा था।
स्कूल से निकल कर उच्च शिक्षा के संस्थान में दाखिला हुआ था।हॉस्टल से करीब 500 मीटर चल कर पढ़ाई के लिए जाना होता था।इतनी सी दूरी में भी ढेर सारे पेड़ और पोखर रास्ते मे थे।संस्थान के संस्थापक का निवास भी रास्ते मे था।उस भवन की छत पर एक लड़की अपनी सहेलियों के साथ अक्सर खड़ी रहती थी।मुझे देख कर,’शुकनो चोख, शुकनो चोख’ (सूखी आंखें)! नकारात्मक होने के बावजूद बुरा नहीं लगता।
दूसरी-तीसरी घटना विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय की थीं।मेरे सफेद,बैगनी और गुलाबी चेक्स वाले शर्ट को देख कर,’Look at the moving graph paper.’ में निरुत्तर किन्तु प्रसन्न था।
इस परिसर में अपने चुनाव प्रचार के दौरान एक फिल्मी गीत की पैरोडी जैसा,अराजनैतिक नारा सुना था-‘सुन साहिबा सुन अफलातून,,मैने तुझे चुन लिया तू भी मुझे चुन’! उल्लेखनीय है कि पहले चुनाव में मुझे मिले कुल वोटों में इस महाविद्यालय के सर्वाधिक थे।बाद के चुनाव में इस कॉलेज के अलावा प्रौद्योगिकी संस्थान,दृश्य कला संस्थान और चिकित्सा संस्थान में जब अन्य उम्मीदवारों से अधिक वोट मिलते थे तो उसका एक विश्लेषण भी होता था-इन चारों संस्थान/संकाय/कॉलेज में जाति,पैसे,गुंडई का असर न्यूनतम था।करीब 32-34 साल बाद कहने में फक्र है कि परिसर में नई राजनैतिक संस्कृति के सूत्रपात का यह प्रयास था।

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