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वे वर्तमान की चिंताओं में दुबले नहीं होते
वे रहते हैं अतीत के खोये हुए महल में
जहां सब कुछ है आलीशान
और महान
भारी और भव्य

नए पौधे रोपने में उनका यकीन नहीं
वे आंधी में उखड़ गए बूढ़े पेड़ को
उसकी जड़ों से जोड़ने में जूट रहते हैं
और सोचते हैं
इस तरह वे लौट जाएंगे
आंधी से पहले के मौसम में

वे पुरखों की वीरता के किस्से सुना कर
सोचते हैं उनकी कायरता छिपी रहेगी
वे दावा करते हैं
की वे दुरुस्त कर सकते हैं बीते हुए समय को
वे दूर कर सकते हैं इस आदमी की बीमारी
अगर लोग इसकी लाश को बचा कर रखें.
– राजेन्द्र राजन
(स्रोत -शुक्रवार)

काशी विश्वविद्यालय आवासीय विश्वविद्यालय है। कला संकाय का डॉ एनी बेसेन्ट छात्रावास परिसर के बाहर है। सुरक्षा की दृष्टि से कम सुरक्षित।शहर से सीधे छात्रावास में घुस कर मार-पीट की संभावना ज्यादा होगी यह मानते हुए उसे परिसर के छात्रावासों से अधिक असुरक्षित माना जा सकता था। 1982 में उस छात्रावास में रहने वाले नन्दलाल,नन्दा राम,राम दुलार सहित 8 छात्रों को छुआछूत और जातिगत भावना से मारा-पीटा गया। समता युवजन सभा ने आवाज उठाई तो मार-पीट करने वाले छात्र प्रो मनोरंजन झा की समिति की जांच के बाद निकाल दिए गए। पीडित छात्रों को सुरक्षा की दृष्टि से परिसर के छात्रावास में कमरे दिए जांए,यह मांग भी थी। प्रशासन ने इन सभी छात्रों को बिडला छात्रावास के 6ठे ब्लॉक के कॉमन रूम से 6-7 कमरे बनवा कर आवण्टित किया गया।

सयुस की इकाई की स्थापना के मौके पर किशन पटनायक 1982 में बोले। परिसर में जाति,पैसे और गुंडागर्दी के बोलबाले का हमने जिक्र किया।किशनजी ने कहा ,”भारतीय समाज में जाति ऐसी गली है जो बन्द है।जन्म,विवाह और मृत्यु इसी गली के भीतर होना तय हो जाता है।गुण्डा वह है जो अपने से कमजोर को सताता है और अपने से मजबूत के पांव चाटता है। छात्र किसी एक वर्ग से नहीं आते लेकिन उनका समूह ऐसा होता है जिसके सदस्यों के गुण- जोखिम उठाने का साहस,बड़ों की बात आंख मूंद कर न मान लेना और दुनिया बदलने का सपना देखना होता है।”

मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के फैसले के बाद उच्च शिक्षा केन्द्रों में लाजमी तौर पर विरोध हुआ। चूंकि उच्च शिक्षा केन्द्र सवर्ण वर्चस्व के केन्द्र हैं।मंडल विरोधी छात्रों द्वारा आत्मदाह के प्रयास के बाद मुझे जला कर मारने की योजना बनी। सिख छात्रों को बचाने,एक छात्रावास के कमरे में मालवीयजी के समय से रखे गए गुरुग्रंथ साहब से छेडछाड करने वालों के खिलाफ शिकायत करने के कारण भी मेरे खिलाफ उन्हीं लोगों में गुस्सा था।जो अखबार राम मन्दिर आन्दोलन के दौर में विहिप का पैम्फलेट बन जाते थे उन्हींमें से एक में एक अध्यापक ने सवर्ण वर्चस्व के पक्ष में लिखा,’घोड़ा खरीदने जाते हैं तो अरबी घोड़ा खोजते हैं।कुत्ता रखना होता है तो अलसेशियन रखते हैं। फिर पढ़ाई और नौकरियों में सवर्णों का होना तो स्वाभाविक है।’ इस लेख के छपने के बाद लाजमी तौर पर वे छापा-तिलक लगाए,जनेऊधारी चिकित्सक हमें बेल्टधारी अलसेशियन लगते थे।

ऐसे माहौल में काशी विश्वविद्यालय में नेल्सन मण्डेला का कार्यक्रम बना।उन्हें मानद उपाधि दी गई। हम हवाई अड्डे पर पहुंचे। नेल्सन मण्डेला के साथ राजमोहन गांधी थे। उन्होंने हमें अपने साथ ले लिया।काफिला प्रह्लाद घाट पहुंचा,जहां स्थानीय प्रशासन ने मण्डेला साहब से ‘गंगा-पूजन’ करवाया। 5 कदम की दूरी पर रविदास मन्दिर था,जिसके बारे में मण्डेला साहब को नहीं बताया गया। हमारे ज्ञापन के बारे में राजमोहनजी ने संक्षेप में बताया और हम लोगों से कहा कि वे विस्तार से बाद में उसके बारे में बात कर लेंगे।

ज्ञापन तो यहां दर्ज करेंगे ही,उस दौर में वि.वि. में जाति प्रथा कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए थी,कुछ उदाहरण जान लीजिए। कृषि विज्ञान संस्थान में स्नातक स्तर पर ही आपको अपनी जाति के हिसाब से इतने अंक मिला करते थे कि स्नातकोत्तर कक्षाओं के विभाग उसी हिसाब से तय हो जाते थे। ब्राहमण के कृषि अर्थशास्त्र,राजपूत और भूमिहार के एग्रोनॉमी,पिछडे और दलित के हॉर्टीकल्चर में जाने की संभावना ज्यादा रहती थी। इसका व्यतिक्रम होने पर – कुर्मी किसान घर का पंचम सिंह  और पांडुरंग राव आत्महत्या करते हैं (दोनों कृषि विज्ञान संस्थान)। भौतिकी विभाग के कुशवाहा प्रोफेसर ने  एक क्षत्रीय शोध छात्र (नाम के साथ उसके भी कुशवाहा था) को परेशान किया तो प्रोफेसर ने चक्कू खाया था। छात्र पर 307 न लगे इसके लिए तत्कालीन कुलपति ने कचहरी जाकर निवेदन किया था।

आम तौर पर दलों,संगठनों से ऊपर उठकर जातियों का एका बन जाता था। जातिवादी मठाधीश प्रोफेसर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए जाति का उपयोग करते थे,जाति के प्रति प्रेम भी उसके लिए आवश्यक नहीं होता था।

एक मजबूत दलित प्रत्याशी लगातार ब्राह्मण प्रत्याशी से हारा-तब सवर्ण गोलबन्दी के लिए,’आजादी की लड़ाई सवर्णों ने लड़ी।छात्र संघ किसका? सवर्णों का’ जैसे परचे बटते। संयोगवश मैं भी उसी पद पर चुनाव लड़्ता था। ‘खटिका को हराना है तो……. को जिताना होगा’ नारा सफल नहीं हो पाया क्योंकि मेरे कारण गोलबन्दी नहीं हो पाई। वि.वि. में महिला महाविद्यालय,चिकित्सा विज्ञान संस्थान,दृश्य कला संकाय और प्रौद्योगिकी संस्थान के छात्र छात्राओं में जाति का असर न्यूनतम था और वहां मैं नम्बर एक पर था-अन्य संकायों में एक बडे गठबंधन के नाम पर सोनकर नम्बर पर एक थे। विश्वविद्यालय के पिछड़े- दलित छात्रों ने इस बात पर गौर किया और अगले साल ऊपर दिए संकायों के अलावा उनका भरपूर समर्थन मुझे मिला।

समता युवजन सभा हाथ के बने पोस्टर लगाती और मोटर साइकिल जुलूस की जगह साइकिल जुलूस निकालती। राजनीति में असरकारी होना जरूरी होता है।जब सयुस असरकारी हुई तब मुख्यधारा वाले समूहों ने भी साइकिल जुलूस निकाला।छात्रों ने उसे नकल माना। ”सयुस की साइकिल देखी,सबने मोटर साइकिल फेंकी”

नेल्सन मण्डेला को दिया गया ज्ञापन-

 

प्रति,

माननीय नेल्सन मण्डेला,

नेता, अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस ।                                        दिनांक 17 अक्टूबर 1990

परम आदरणीय महोदय.

आपके हमारे विश्वविद्यालय आगमन के अवसर पर हमारा मन हर्ष नहीं, अपितु विषाद से भर उठा है। मानवीय मूल्यों के लिए आपकी आजीवन लड़ाई,अपने जीवन मूल्यों के लिए कठोरतम परिस्थिति में विश्वास ज्योति को जलाए रखना, सिर्फ ऐसे समाज के लिए प्रेरणा बननी चाहिए जो स्वयं उन मूल्यों में विश्वास करे और उन्हें प्रतिस्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हो।

आज हमारा समाज , विशेषतः इस विश्वविद्यालय का छात्र-युवा,अध्यापक समाज, विशेष अवसर द्वारा विषमता मूलक समाज संरचना को दूर करने के खिलाफ खड़ा है। उसकी वाणी,उसकी लेखनी में जातिवाद के साथ-साथ नस्लवाद साफ-साफ परिलक्षित होता है। जात्यिवाद को वैज्ञानिक व्यवस्था करार देने के साथ हर जाति को अलसेशियन कुत्ता,अरेबियन घोड़ा की विशिष्टता के साथ जोड़ा जा रहा है। आज की तारीख में ऐसी मानसिकता को प्रश्रय देने वाला यह प्रशासन, छात्रावासों में अनुसूचित जाति, जनजाति के छात्रों को अलग लॉबी में रखता है। खुले कमरों में रहने की जुर्रत करने वाले,राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में मुखर दलित छात्रों को पीटा जाता है।लिखित शिकायत करने पर भी कुलपति,प्रशासन सिर्फ आश्वासन देते हैं। दोषी छात्रों अथवा छात्रावास संरक्षकों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाता।

यहां मंडल कमीशन की संस्तुतियों के खिलाफ आन्दोलनकारियों के प्रति वि.वि. प्रशासन ने अतिशय नरम व सहयोगी रुख अपनाया है। ऐसे में यहां की विद्वत परिषद द्वारा आपका अभिनन्दन एक विडंबना ही है। यदि आपको सही वस्तुस्थिति की जानकारी होती तो आप कदापि इस मानद उपाधि को सम्मान नहीं मानते व इसे ग्रहण करने से इंकार कर देते।

विषमता मूलक समाज के पोषक , विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा आयोजित इस समारोह का विरोध करते हुए भी महात्मा गांधी के देश में हम अपने प्रेरणा स्रोत के रूप में आपका स्वागत करते हैं।

विनीत,

( डॉ स्वाति )                                          (हरिशंकर)

समता संगठन                                    समता युवजन सभा

भारतीय न्याय व्यवस्था की एक बहुत बड़ी विडंबना है कि वह जिसरूप में आज मौजूद है वह अंग्रेजों द्वारा खड़ी की गई थी। एक आम भारतीय केसाथ न्याय करना इस व्यवस्था का ध्येय नहीं था। उसका मकसद तो ‘अपराधी’ मूलबाशिंदों को दंडित करना और भारत में रह रहे ब्रिटिश भद्र लोक केबीच के दीवानी मामले सुलटाना था। आज भी अगर यह सवाल किया जाए कि इस न्यायव्यवस्था से कितने प्रतिशत भारतीयों को न्याय मिलता है तो शायद उसकाईमानदार जवाब होगा 1% से भी कम। इस देश की 20% से ज्यादा आबादी वकील करनेका माद्दा नहीं रखती- जो 78% प्रतिशत जनता(अर्जुन सेनगुप्ता कमेटीकी रपट केअनुसार) रोजाना 20 रुपये से कम में गुजारा करती है वो जाहिर है कि वकीलकरने में सक्षम नहीं होगी। जो खुद के वकील कर पाते हैं वो अंतिम फैसला आनेतक सालों साल अदालतों के धक्के खाते रहते है। न्याय प्रक्रिया इतनी लम्बी, जटिल और महँगी होती है कि अंत आते-आते मुवक्किल आर्थिक और मानसिक रूप सेनिचुड़ चुका होता है। ऊपर से काफी संभावना रहती है कि आपका सामना भ्रष्ट, जातिवादी, मर्दवादी, साम्प्रदायिक, संभ्रांतवादी अथवा अक्षम जज से हो। इसप्रकार अततः जिन चंद लोगों को इस न्याय-व्यवस्था में न्याय मिलता है वोजनसँख्या के 1% से भी कम हैं। फिर भी आज तक सरकार या प्रभुत्वशाली वर्गोंके द्वारा शोषित लोग थक-हार कर न्यायालयों का ही दरवाजा खटखटाते है, इसउम्मीद के साथ के साथ कि जज की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति निष्पक्षता के साथउनसे न्याय करेगा। वह निष्पक्षता, जो संविधान में निहित है।
वर्तमान सरकार जबसे सत्ता में आई है तब से लगातार जजों सेजुड़े कई विवादित फैसले लेती रही है। सबसे पहला था जून महीने में सर्वोच्चन्यायलय के कॉलेजियम द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति के लिए प्रस्तावित 4 नामों में से एक वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मणियम का नाम अलग कर उसेवापिस भेजना और फिर यह कदम और उसके पीछे के ‘कारण’ जगजाहिर करवा देना। नामवापसी को जाहिर करना बहुत ही शातिर कदम था। सरकार जानती थी कि नाम वापसकरने के बाद भी यदि कॉलेजियम दोबारा वही नाम भेजे तो कानून उसे स्वीकारकरने के अलावा उसके पास और कोई चारा नहीं होता। लेकिन सार्वजनिक रूप सेअपनी ईमानदारी पर शक का दाग लगने के बाद गोपाल सुब्रह्मनियम ने पद के लिएअपनी सहमति वापस ले ली। ऐसे में प्रमुख न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम.लोधाद्वारा सार्वजनिक तौर पर सरकार के कदम की आलोचना करना और गोपाल सुब्रह्मणियमकेसमर्थन में आना किसी काम न आया। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय एक निष्पक्ष, संवेदनशील और प्रखर न्यायविद जज से मरहूम हो गया।दूसरा था अगस्त महीने में संविधान संशोधन करके और नया कानून ला कर उच्चतरन्यायपालिका की नियुक्ति की प्रक्रिया बदलना। इस पर हम इस लेख में विस्तारसे चर्चा करेंगे।और तीसरा था अभी हाल में सेवानिर्वित्त हुए प्रमुख न्यायाधीश एस. सदाशिवमको केरल का गवर्नर नियुक्त करना। न्यायिक स्वतंत्रता के संवैधानिक सिद्धांतके परखच्चे उड़ाता यह फैसला न्यायपालिका की गरिमा पर भी बट्टा लगाता है। कईकानूनों में सेवानिवृत्त जजों को विभिन्न कमीशनों का अध्यक्ष या सदस्यबनाने का प्रावधान है और ज्यादातर सभी सरकारें अपने प्रिय जजों को यहलालीपॉप पकड़ाती हैं। लेकिन देश के पिछले प्रमुख न्यायाधीश को गवर्नर जैसीराजनैतिक पदवी देना तो बहुत ही गंभीर मसला है। न्यायमूर्ति सदाशिवम का यहकहना कि अगर वह गवर्नर नहीं बनते तो उन्हें किसानी करना पड़ता शोचनीय है। इसदेश में किसान की हालत इतनी कमजोर है कि सदाशिवम अपने जीवन भर की कमाईप्रतिष्ठा दाँव पर लगाने को तैयार हैं लेकिन किसानी करने को नहीं। काश किवे वापस अपने गाँव जा कर खेती करते तो हम भारतीय भी गर्व से दुनिया को कहसकते कि हमारा राष्ट्रपति भले ही उरुग्वे के राष्ट्रपति के जैसा सादा जीवन नजीता हो मगर हमारे देश का प्रमुख न्यायाधीश सेवानिवृत्त हो कर गाँव मेंएक आम नागरिक की तरह जीवन यापन कर रहा है।यह तीनों फैसले न्यायिक स्वतंत्रता पर करारी चोट हैं, इमरजेंसी के युग कीयाद दिलाते हैं और केंद्र सरकार के बेशर्म और अधिनायकवादी रवैये के द्योतकहैं। इतिहास गवाह है कि तानाशाह हमेशा देश के संविधान और जजों को अपने वशमें करना चाहता है।
न्यायिक नियुक्ति कमीशन बिल, 2014
पिछले महीने लोकसभा ने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय केजजों की नियुक्ति का यह बिल पारित कर दिया। अब इसका राज्यसभा द्वारा पारितहोना और राष्ट्रपति की मुहर लगना बाकी है। माने तय है कि यह बिल कानून बनजाएगा। सरकार चाहती है कि मानसून सत्र में ही यह प्रक्रिया पूरी हो जाए।आखिर पूरे देश पर असर डालने वाले इस कानून को लागू करने में इतनी जल्दीबाजीक्यों? सरकार ने न्यायपालिका को साफ़ इशारा कर दिया है कि हमारे द्वारानिर्धारित सीमा में रहोगे तो पदोन्नति के साथ साथ कार्यविधि के बाद भीमलाईदार पोस्टिंग मिल सकती है नहीं तो अब तुम्हारा केरियर हम चौपट कर सकतेहैं।1993 के पहले इस देश में उच्चतर न्यायालयों में जजों की नियुक्तिकार्यपालिका के हाथ में होती थी। इसके कारण काफी सारी नियुक्तियाँ राजनीतिककारणों से प्रेरित होती थीं। आपातकाल के दौरान हमें इसका सबसे वीभत्स रूपदेखने को मिला। केशवानंद भारती केस को मनचाहा मोड़ देने के लिए इंदिरा गाँधीने नियुक्तियाँ कीं। यह बात दीगर है कि अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने 7:6 के अनुपातसे अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसमें संविधान के मूलभूत ढाँचे के सिद्धांतकी नींव पड़ी। इसी ढाँचे में निहित है न्यायिक स्वतंत्रता का सिद्धांत। बादमें हेबिअस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) केस में जब न्यायपालिका सरकार के सामने झुक गई तब एकनिर्भीक और निष्पक्ष जज एच.आर. खन्ना, जिन्होंने अपना संवैधानिक दायित्वनहीं छोड़ा और विपक्ष में फैसला दिया, उन्हें प्रमुख न्यायाधीश बनने से हाथधोना पड़ा, उनसे जूनियर जज को प्रमुख सर्वोच्च न्यायाधीश बनाया गया और इसके विरोधस्वरूप उन्होंने इस्तीफा दे दिया।1993 में सर्वोच्च न्यायाधीश ने अपने फैसले से इस नियुक्ति प्रक्रिया में आमूलचूलबदलाव ला दिया। अब सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में नियुक्तिप्रक्रिया पूरी तरह से सर्वोच्च न्यायलय के 5 सबसे वरिष्ठ जजों यानी कॉलेजियम के हाथमें आ गयी। सरकार एक बार कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित नाम वापस भेज सकतीहै लेकिन उसके बाद अगर दोबारा कॉलेजियम वही नाम भेजे तो राष्ट्रपति को उसपरमुहर लगानी ही पड़ती है। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता का पूरा अभाव है।जजों के बेटों-भतीजों की नियुक्तियाँ बेतहाशा होती हैं।न्यायपालिकासंभ्रांत वर्ग के पुरुषों का क्लब बन के रह गई है जिसमें औरतों, दलितों औरआदिवासियों का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है। सरकारी मनमानी से बचने के लिएबनी यह व्यवस्था पूरी तरह से विफल हो गई है।न्यायाधीश नियुक्ति का नया कानून इन दोनों उपरोक्त प्रणालियों की बुराइयाँलिए हुए है। संविधान को संशोधित कर एक न्यायाधीश नियुक्ति कमीशन बनाया गयाहै, जो उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और प्रमुखन्यायाधीश की नियुक्ति करेगा। इस कमीशन में 6 सदस्य होंगे जिनमें 3 सर्वोच्च न्यायलय के तीन सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश, कानून मंत्री और 2 गणमान्य हस्तियाँ होंगी (देश के प्रमुख न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और सबसे बड़े विपक्षी दल के नेताद्वारा मनोनीत किये गए)।किसी भी जज को प्रस्तावित करने के लिए 6 में से 5 सदस्यों की सहमति आवश्यकहोगी। अगर किन्हीं 2 सदस्यों ने विरोध में मत दिया तो प्रस्ताव वहीँ रद्दहो जाएगा। इस प्रकार यदि कानून मंत्री ने यदि एक सदस्य को भी अपने पक्ष मेंमना लिया तो सरकार की नापसंदगीवाला उम्मीदवार जज नहीं बन पाएगा। इससे भी घातकप्राविधान था सर्वसम्मति का। उसके अनुसार अगर एकबार राष्ट्रपति कोईप्रस्तावित नाम वापस भेज देते हैं तो कमीशन सर्वसम्मति से ही उस नाम कोपारित कर पाएगा। इस प्रकार कानून मंत्री को वीटो की शक्ति मिल गयी थी। ऐसाहोता वो दिन दूर नहीं था जबन्यायपालिका पूरी तरह सरकार के कब्जे में होती।खैर, विपक्षी दलों ने काफी विरोध कर यहप्रावधान हटवा लिया। वैसे अगर यहप्रावधान बना रहता और कोर्ट के सामने आता तो अवश्य ही गैरसंवैधानिक घोषितहोता। लेकिन कानून मंत्री की कमीशन में मौजूदगी ही न्यायपालिका औरकार्यपालिका की अलग-अलग सत्ताओं के सिद्धांत की अवमानना है। मनमोहन सिंह सरकार द्वारा 2010 में लाए गए बिल में भी कमीशन में कानून मंत्री को रखने का प्रावधानथा।कॉलेजियम प्रणाली की सबसे बड़ी खामीगैरपारदर्शिता इस कानून में बरकरारहै, बस उस गैरपारदर्शी प्रणाली में न्यायपालिका के साथ-साथ सरकार को भीघुसा दिया गया है। किसी भी न्यायिक कमीशन में वर्तमान जज और कानून मंत्रीनहीं रहने चाहिए।एक और महत्वपूर्ण पहलू है कमीशन के पास समय की कमी। कमीशन को 30 सर्वोच्च न्यायालय के जजों, 1 भारत के प्रमुख न्यायाधीश और 906 उच्च न्यायालय के जज और प्रमुखन्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानान्तरण करने का दायित्व और अधिकार होगा।हमारी न्याय-व्यवस्था पहले से ही रिक्त पदों की समस्या से त्रस्त और ग्रस्त है। उच्चन्यायालयों में करीब 300 पद रिक्त पड़े हैं। नियुक्ति कमीशन को हर साल करीब 1000 अभ्यार्थियों में से करीब 100 जज नियुक्त करने होंगे। ऐसे में इननियुक्तियों को विश्वसनीय बनाने के लिए ज़रूरी है कि यह कमीशन पूर्णकालिकहो। फिलहाल जो सदस्य इस कानून में हैं उन सभी के पास अपने ही इतने काम हैंकि पूरी सम्भावना है कि रिक्त पदों की समस्या वहीँ की वहीँ रह जाएगी या फिरजल्दबाजी में नियुक्त हुए जजों से न्यायपालिका के स्तर में और भी गिरावटआएगी।
कैंपेन फॉर ज्यूडिसियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफ़ोर्म्स नामक समूह जो कई वर्षोंसे न्याय व्यवस्था में जवाबदेही और मूलभूत सुधारों की माँग उठाता आया है, ने काफी पहले से एक ऐसे पूर्णकालिक कमीशन की माँग रखी है जो जजों कीनियुक्ति करेगा और उनके खिलाफ शिकायतें सुनेगा। जजों की बर्खास्तगी(जोफिलहाल बहुत जटिल है) भी उसके हाथ में होगी।कमीशन की नियुक्ति सी.ए.जी., सी.वी.सी., मुख्य चुनाव आयुक्तसर्वोच्च न्यायालय के 2 वरिष्ठ जज, प्रधान मंत्री औरनेता विपक्षी दल की 7 सदस्यीय टीम करेगी। इंग्लैंड, फ्रांस, और न्यू यॉर्कके न्यायिक कमीशनों की तर्ज पर इस कमीशन में भी कम से कम 3 ऐसे जाने-मानेईमानदार व्यक्ति हों जो न्याय व्यवस्था से ताल्लुक न रखते हों।मेरा मानना है कि अगर प्रक्रिया को इतना जटिल न भी किया जाय तो भी भारत केप्रमुख न्यायाधीश, प्रधान मंत्री और सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता- इन तीनसदस्यों टीम द्वारा चुने गए एक पूर्णकालिक कमीशन की ज़रूरत है, जिसमें वर्तमानजज या कानून मंत्री न हों। यह कमीशन कोई भी पद खाली होने पर सार्वजनिकघोषणा करे और अभ्यर्थियों की सूची भी घोषित करे। जनता को यह मौका मिले किवह अभ्यार्थियों के बारे में अपनी आपत्तियाँ दर्ज कर सके जिनको परख कर कमीशननियुक्तियाँ करे।इसके अलावा नियुक्तियों के ठोस और सार्वजनिक पैमाने होने चाहिए। वर्तमानकानून ने न्यायिक कमीशन को यह अधिकार दिया गयाहै कि वह यह पैमाने निर्धारितकरे। कानून की समझ, समय के साथ बदलते कानूनों की जानकारी और ईमानदारी केसाथ यह भी बहुत ज़रूरी है कि न्यायाधीश बनने के अभ्यार्थी कमजोर और हाशिये परखड़े समुदायों के प्रति संवेदनशील हों, समय के साथ बदलते सामाजिक मूल्योंके प्रति संवेदनशील हों मेहनती हों और धैर्यवान भी। कमीशन सुनिश्चित करेकि न्यायालयों में महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और विकलांगव्यक्तियों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व हो।इसके अलावा उच्चतर न्यायालयों के जजों की बर्खास्तगी की प्रक्रिया भी बहुतजटिल है और उसमें भी आमूलचूल बदलाव की ज़रूरत है। न्याय व्यवस्था को औरजवाबदेह और सरल बना कर अंतिम औरत तक लाना होगा। लेकिन उस पर फिर कभी और।

(सामयिक वार्ता ,सितम्बर 2014)

‘मैं हार सकता हूँ , बार – बार हार सकता हूँ लेकिन हार मान कर बैठ नहीं सकता हूँ ।’ लोहिया की पत्रिका ‘जन’ के संपादक ओमप्रकाश दीपक ने कहा था। नारायण देसाई ने कोमा से निकलने के बाद के तीन महीनों में अपनी चिकित्सा के प्रति जो अनुकूल और सहयोगात्मक रवैया प्रकट किया उससे यही लगता है कि वे हार मान कर नहीं बैठे , अन्ततः हार जरूर गये। आखिरी दौर में हम जो उनकी ‘सेवा’ में थे शायद हार मान कर बैठ गये। उनकी हालत में उतार – चढ़ाव आये । अपनी शारीरिक स्थिति को भली भांति समझ लेने के बाद भी मानो किसी ताकत के बल पर उन्होंने इन उतार चढ़ावों में निराशा का भाव प्रकट नहीं किया । खुश हुए,दुखी हुए,अपनी पसंद और नापसन्दगी प्रकट की। स्वजनों को नाना प्रकार से अपने स्नेह से भिगोया। पदयात्रा,ओडीशा
विनोबा द्वारा आपातकाल के दरमियान गोवध-बन्दी के लिए उपवास शुरु किए गए तब नारायण देसाई अपनी पत्नी उत्तरा के साथ उनका दर्शन करने पवनार गए थे। दोनों हाथों से विनोबा ने उनके सिर को थाम लिया था। चूंकि नारायण देसाई आपातकाल विरोधी थे इसलिए उस वक्त विनोबा के सचिवालय के एक जिम्मेदार व्यक्ति ने नारायण देसाई को उनकी संभावित गिरफ्तारी का संकेत दिया था। विनोबा नारायण देसाई के आचार्य थे और अपनी जवानी में उन्होने उन्हें हीरो की तरह भी देखा होगा ऐसा लगता है । विनोबा की सचेत मौत से गैर सर्वोदयी किशन पटनायक तक आकर्षित हुए थे तो नारायण देसाई पर तो जरूर काफी असर पड़ा ही होगा। इस बीमारी के दौर में निराशा का उन पर हावी न हो जाना मेरी समझ से इस विनोबाई रुख से आया होगा।
तरुणाई में रूहानियत का एक जरूरी सबक भी विनोबा से उन्हें मिला था। आम तरुण की भांति बड़ों की बात आंखें मूंद कर न मान लेने का तेवर प्रदर्शित करते हुए नारायण देसाई ने विनोबा से कहा था ,’बापू द्वारा बताई गई सत्याग्रह की पहली शर्त – ईश्वर में विश्वास- मेरे गले नहीं उतरती।‘ आचार्य ने पलट कर पूछा ,’ प्रतिपक्षी के भीतर की अच्छाई में यकीन करके चल सकते हो?’
‘यह बात कुछ गले उतरती है’।
‘तब तुम पहली शर्त पूरी करते हो’ ।
अपनी समस्त पैतृक जमीन के रूप में गुजरात का पहला भूदान देने के बाद ही वे सामन्तों से भूदान मांगने निकले थे। इस मौके पर विनोबा का तार मिला था तो गदगद हो गये थे – ‘जिस व्यक्ति के बगल में खड़े-खड़े उनका ध्यान आकृष्ट हो इसकी प्रतीक्षा करनी पडती थी, उस हस्ती ने याद रख कर तार से आशीर्वाद भेजे हैं।‘
प्राकृतिक संसाधनों की मिल्कियत राजनीति द्वारा तय होती है। इस प्रकार भूदानी एक सफल राजनीति कर रहे थे। सरकारी भूमि सुधारों और समाजवादियों-वामपंथियों के कब्जों द्वारा जितनी जमीन भूमि बंटी है उससे अधिक भूदान में हासिल हुई। जो लोग इसे तेलंगाना के जन-उभार को दबाने के लिए शुरु किया गया आन्दोलन मानते हैं उन्हें इन तथ्यों को नजरन्दाज नहीं करना चाहिए। ‘दान’ मांगने के दौर में कुछ उत्साही युवा जो तेवर दिखाते थे उन्हें सर्वोदयी कैसे आत्मसात करते होंगे,सोचता हूं। नारायण भाई के मुंह से यह गीत सुना था, ‘‘भूमि देता श्रीमानो तमने शूं थाय छे? तेल चोळी,साबू चोळी खूब न्हाये छे! ने भात-भातना पकवानों करि खूब खाये छे।‘’(श्रीमानों, भूमि देने में आपका क्या जाता है? आप तो तेल-साबुन मल के खूब नहाते हैं और भांति-भांति के पकवान बना कर खूब खाते हैं।) यह बहुत लोकप्रिय भूदान-गीत भले नहीं रहा होगा लेकिन उस पर रोक भी नहीं लगाई गई थी। आज मनमोहन सिंह और नरेन्द्र मोदी की सरकारें देश का प्राकृतिक संसाधन यदि देशी-विदेशी पूंजीपतियों को सौंपने पर तुली हुई हैं तो यह भी राजनीति द्वारा हो रहा है। बहरहाल, भूदान एक कार्यक्रम के बजाए एकमात्र कार्यक्रम बन गया ।
आदर्श समाज की अपनी तस्वीर गांधी ने आजादी के पहले ही प्रस्तुत कर दी थी। उनके आस-पास की जमात में उस तस्वीर का अक्स भी साफ-साफ दीखता था। उस तस्वीर को आत्मसात करने वाले नारायण देसाई जैसे गाम्धीजनों का जीवन आसान हो जाया करता होगा और इसलिए मृत्यु भी। इन लोगों की दिशा भी स्पष्ट होगी।

किशोर नारायण देसाई गांधीजी के साथ

किशोर नारायण देसाई गांधीजी के साथ

१९४६ में गांधीजी से नारायण देसाई ने कहा था ,’आपके दो किस्म के अनुयाई हैं। कुछ राजनीति में हैं और कुछ रचनात्मक कामों में। मैं इन दोनों तरह के कामों के बीच सेतु का काम करना चाहता हूं।‘ १९४७ में विवाह के बाद अपनी पत्नी उत्तरा और मित्र मोहन पारीख के साथ उन्होंने दक्षिण गुजरात के आदिवासी गांव में ग्रामशाला की शुरुआत की। प्रतिष्ठित साहित्यकार उमाशंकर जोशी ने इसका उद्घाटन किया और अपनी पत्रिका ’संस्कृति’ में इसका विवरण लिखा। आजादी के काफी पहले से महात्मा गांधी के सहयोगी जुगतराम दवे का यह कार्यक्षेत्र था। जुगतराम दवे कहते थे कि वे द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा कटवाने का प्रायश्चित कर रहे हैं ।
१९४५ से ही नेहरू और गांधी के बीच का गांव बनाम शहर केन्द्रित विकास का दृष्टिभेद सामने आ चुका था । सर्वोदय की मुख्यधारा ने इस ओर बहुत लम्बे समय तक आंखें मूंदे रक्खीं । १९६७ में नवकृष्ण चौधरी द्वारा ‘गैर-कांग्रेसवाद’ के अभियान को समर्थन और ओड़ीशा में इसके लिए पहल एक स्वस्थ अपवाद था । नेहरू के औद्योगिक विकास के मॉडल के प्रति सर्वोदय आन्दोलन द्वारा आंखों के मूंदा होने के फलस्वरूप जे.सी. कुमारप्पा जैसे प्रखर गांधीवादी अर्थशास्त्री माओ-त्से-तुंग के ‘घर के पिछवाड़े इस्पात भट्टी’ (बैकयार्ड स्टील फरनेस) जैसे प्रयोगों से आकर्षित हुए। जमशेदपुर ,राउरकेला,भिवण्डी और अहमदाबाद जैसे औद्योगिक केन्द्रों में आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में हुए दंगों में ‘शान्ति सेना’ पूरी निष्ठा और लगन से काम करती थी लेकिन नेहरू द्वारा चुनी गई विकास की दिशा से इन दंगों के अन्तर्संबंध पर कोई प्रभावी आवाज नहीं उठाती थी। हाल के दशकों का उदाहरण देखें तो विकास की प्रचलित अवधारणा से प्रभावित होने के कारण गुजरात के सर्वोदय नेता कांग्रेस-भाजपा नेताओं के सुर में सुर मिलाते हुए नर्मदा पर बने बड़े बांधों के समर्थन में थे। नारायण देसाई इसका अपवाद थे। वे बडे बांधों और परमाणु बिजली के खिलाफ थे। अपने गांव के निकट स्थित काकरापार परमाणु बिजली घर के खिलाफ उन्होंने आन्दोलन का नेतृत्व किया और परमाणु बिजली के खिलाफ उन्होंने नुक्कड नाटक भी लिखा ।
जयप्रकाश नारायण ने नागालैण्ड, तिब्बत और काश्मीर जैसे मसलों पर अपना रुख साफ़-साफ़ तय किया था और बेबाक तरीके से जनता के समक्ष उसे वे पेश करते थे। शेख अब्दुल्लाह और उनका दल नैशनल कॉन्फरेन्स राष्ट्रीय आन्दोलन का समर्थक था लेकिन नेहरू ने उन्हें लम्बे समय तक गिरफ्तार करके रखा था। नेहरू के गुजरने के बाद जेपी ने उनकी रिहाई के लिए पहल की। जेपी ने नारायण देसाई तथा राधाकृष्णन को शेख अब्दुलाह से मिलने भेजा और इन दोनों ने उनसे बातचीत की रपट तत्कालीन प्रधान मन्त्री लालबहादुर शास्त्री को पेश की जिसके बाद शेख साहब की रिहाई हुई। नागालैण्ड में जेपी द्वारा स्थापित नागालैण्ड पीस मिशन की पहल पर ही पहली बार युद्ध विराम हो पाया। तिब्बत की मुक्ति के जेपी प्रमुख समर्थक थे। हाल ही में धर्मशाला में गांधी कथा के मौके पर नारायण भाई की दलाई लामा और सामदोन्ग रेन्पोचे से तिब्बत मुक्ति पर महत्वपूर्ण बातचीत हुई । नारायण देसाई का आकलन था कि चीन के अन्य भागों में उठने वाले जन उभारों से तिब्बत मुक्ति की संभावना बनेगी। दलाई लामा,रेम्पोचे,नारायण देसाईतिब्बत की निर्वासित सरकार की संसद ने नारायण देसाई की मृत्यु पर शोक प्रस्ताव पारित किया है। जब पूरे विश्व की जनता बांग्लादेश की मुक्ति चाहती थी परंतु सरकारों को उसे मान्यता देने में हिचकिचाहट थी तब जेपी और प्रभावती देवी का विदेश दौरा हुआ। बांग्लादेश के शरणार्थियों के बीच राहत शिविर चलाने के अलावा बांग्लादेश के मुक्त होने के पहले उसके राष्ट्र-गान को युवा शरणार्थियों को सिखाने तक का काम शान्ति सेना ने किया था। २४ परगना के बनगांव जैसे सीमावर्ती कस्बे में शरणार्थियों के लिए स्थानीय आबादी से भी अन्न-चन्दा मांगा जाता था –‘ओपार थेके आश्चे कारा? आमादेरी भाई बोनेरा’ (उस पार से आ रहे हैं, कौन? आपके-मेरे भाई-बहन) जैसे नारे लगा कर। बांग्लादेश की मौजूदा सरकार ने मुक्ति-संग्राम का मित्र होने के नाते नारायण देसाई का सम्मान किया।
इन राहत कार्यों के लिए विदेशी स्वयंसेवी संस्थाओं से मदद ली गई। सूखा राहत के लिए भी विदेशी मदद लेने में संकोच नहीं किया। इन अनुभवों से सबक लेकर मनमोहन चौधरी जैसे सर्वोदय नेताओं ने विदेशी धन लेकर सामाजिक काम करने को स्वावलम्बन-विरोधी माना। ओडीशा सर्वोदय मण्डल ने विदेशी संस्थाओं से मुक्त रहने का फैसला भी किया लेकिन सर्व सेवा संघ (सर्वोदय मण्डलों का अखिल भारत संगठन) के स्तर पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। नारायण देसाई ने भी ऐसी संस्था वाले सर्वोदइयों को बहुत स्नेहपूर्वक ‘तंत्र’ कम करते जाने तथा ‘तत्व’ को कमजोर न होने देने की सलाह जरूर दी थी। गांधीजनों के रचनात्मक कार्यक्रमों के अपनी संस्था तक कुंठित या आबद्ध हो जाने के प्रति उन्होंने चेतावनी दी । नारायण देसाई ने कहा कि रचना के साथ लोकजागरण लाने का काम नहीं हो रहा है ।
सर्वोदय आन्दोलन की एक विशेषता है। ‘सर्वसम्मति’ से फैसले लेने के बावजूद अपने मनपसंद फैसलों को ही मानने और बाकी फैसलों की उपेक्षा करने का चलन रूढ़ हो चुका है। गोवध बन्दी, शान्ति सेना, लोक समिति, खादी,विदेशी धन पर आश्रित रचनात्मक काम – इनमें से जिसे जो पसंद हो, कर सकता था। मसलन, गोवध-बन्दी आन्दोलन में जुटा व्यक्ति शान्ति सेना के काम में बिल्कुल रुचि न ले तो भी कोई दिक्कत नहीं थी। इस प्रकार ताकत बंटी रहती थी। नारायण देसाई सर्व सेवा संघ से स्थापना से जुड़े रहे तथा इसके अध्यक्ष भी हुए। कुछ समय पहले उन्होंने सर्व सेवा संघ को विघटित करने का सुझाव दिया।
ईरोम शर्मीला चानू के आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट विरोधी अनशन के बावजूद देश भर में उनके समर्थन में माहौल नहीं बन पा रहा है। देश के कुछ भागों में ऐसे दमनकारी कानून का विकल्प क्या हो सकता है यह विचारणीय है। साठ और सत्तर के दशक में ऊर्वशी अंचल (तब का नेफा और अब अरुणाचल प्रदेश। नारायण देसाई इसे उर्वशी अंचल कहते हैं और लोहिया ने उर्वशीयम कहा।) में शान्ति सेना के काम को भुलाया नहीं जाना चाहिए। वह इलाका जहां चीनी फौज ग्रामीणों को एक हाथ में आइना और दूसरे में माओ की तस्वीर दिखा कर पूछती हो,’तुम किसके करीबी हुए?’ जहां की सड़कों पर कदम-कदम पर भारतीय सेना के ’६२ के चीनी आक्रमण में पराजय के स्मारक बने हों वहां बिना सड़क वाले सुदूर गांवों में भी शान्ति केन्द्र चलते थे। तरुण शान्ति सेना के राष्ट्रीय शिबिरों में अरुणाचल के युवा भी हिस्सा लेते थे। आज यदि इस राज्य में पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की तरह अलगाववादी असर प्रभावी नहीं है और हिन्दी का प्रसार है तो इसमें शान्ति सेना और नारायण भाई के हरि सिंह जैसे साथियों के योगदान को गौण नहीं किया जा सकता है। आपातकाल में इन केन्द्रों को सरकार ने बन्द कराया। १९७७ में जनता सरकार के गठन के बाद रोके गये काम को फिर से शुरु करने के लिहाज से मोरारजी देसाई ने नारायण देसाई को अपने साथ अरुणाचल प्रदेश के दौरे में बुलाया था। इसी यात्रा में वायुसेना का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। मोरारजी देसाई और नारायण देसाई समेत सभी यात्री बच गये थे किंतु तीनों चालकों की मृत्यु हो गई थी। नारायण भाई को लगा था कि महत्वपूर्ण यात्रियों की जान बचाने के लिए वायु सेना के उस जहाज के चालकों ने अपना बलिदान दिया था।
हितेन्द्र देसाई के मुख्य मन्त्रीत्व में हुए साम्प्रदायिक दंगों में शान्ति सेना के काम की मुझे याद है। तब ही नारायण देसाई के आत्मीय साथी नानू मजुमदार की कर्मठता के किस्से सुने और मस्जिदों में बने राहत शिबिरों को देखा था। इन दंगों के बाद जब नारायण भाई द्वारा काबुल में मिल कर दिए गए निमन्त्रण पर सरहदी गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान भारत आए तो सर्वोदय मण्डल ने गुजरात में उनका दौरा कराया। उनका आना निश्चित हो जाने के बाद प्रधान मन्त्री ने उन्हें ‘सरकार का अतिथि’ घोषित किया। मुंबई के निकट भिवण्डी में बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद भी जब दंगे नहीं हुए तो लोगों को सुखद अचरज हुआ। उन गैर सरकारी शान्ति समितियों को इसका श्रेय दिया गया जो इसके कई वर्ष पूर्व गठित हुई थीं और सामान्य परिस्थितियों में भी जिनकी बैठकें नियमित तौर पर हुआ करती हैं। भिवण्डी में इन ‘अ-सरकारी और असरकारी’ शान्ति समितियों के गठन में नारायण देसाई और भगवान बजाज जैसे उनके साथियों की अहम भूमिका थी। गांधी का सन्देश गुजरात के गांव-गांव तक नहीं फैला इसलिए इतना बड़ा नर-संहार संभव हुआ – अपनी इस विवेचना के कारण खुद को भी उन्होंने जिम्मेदार माना और रचनात्मक प्रायश्चित के रूप में गांधी-कथाएं की। गुजरात भर में कथाएं हो जाने के बाद ही अन्य प्रान्तों और विदेश गए।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के एक छात्रावास के कॉमन रूम में एक छोटी-सी गोष्ठी में जेपी ने ‘लोकतंत्र के लिए युवा’ (यूथ फॉर डेमोक्रेसी) का आवाहन किया। सिर्फ २५-३० छात्र उस गोष्ठी में रहे होंगे।अगली बार जब काशी विश्वविद्यालय के सिंहद्वार पर जेपी आए तब वे लोकनायक थे और सिंहद्वार के समक्ष हजारों छात्रों का उत्साह देखते ही बनता था। इन दोनों कार्यक्रमों के बीच क्या-क्या हुआ होगा,यह गौरतलब है।जेपी के साथ नारायण देसाई गुजरात में छात्रों ने अपनी सामान्य सी दिखने वाली मांगों के लिए नाना प्रकार के शांतिमय उपायों के कार्यक्रम शुरु किए थे जिनमें अद्भुत सृजनशीलता प्रकट होती थी। मसलन छात्रों द्वारा चलाई गई जन-अदालतों में मुख्यमन्त्री को राशन की लाइन में एक बरस तक खड़े रहने की सजा सुनाई जाती थी। नारायण देसाई ने नवनिर्माण आन्दोलन के सृजनात्मक कार्यक्रमों की रपट जेपी को दी जिसके बाद आन्दोलन के नेताओं के साथ जेपी का संवाद हुआ । जेपी ने गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन को समर्थन दिया। चिमनभाई पटेल सरकार की अन्ततः विदाई हुई और पहली बार बाबूभाई पटेल के नेतृत्व में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। बिहार के युवाओं के जरिए देश को अपना लोकनायक तो मिलना ही था। जेपी ने अपने आन्दोलन को ‘शांतिमय और शुद्ध उपायों’ से चलाया । इसे अहिंसक नहीं कहा। उन्हें लगता था कि अहिंसा श्रेष्ठतर मूल्य था । जो लोग सिर्फ रणनीति के तौर पर शान्तिमय उपायों को अपनाने को तैयार हुए थे,यानी जिनकी इसमें निष्ठा होना जरूरी न था वे भी आन्दोलन में शरीक थे। लाखों की सभाओं में जेपी ‘बन्दूक की नाल से निकलने वाली राजनैतिक शक्ति’ की अवधारण पर सवाल उठाते थे। ‘कितनी प्यार से जेपी इन सभाओं में पूछते थे,’कितनों को मुहैया कराई जा सकती हैं,बन्दूकें?’ ‘छिटपुट-छिटपुट हिंसा बड़ी हिंसा (सरकारी) से दबा दी जाएगी’ अथवा नहीं?’ , हिंसा न हो इसके लिए उनके साथी सजग थे।जेपी की सभा में आ रही जन सैलाब पर ‘इंदिरा ब्रिगेड’ के दफ्तर से गोलीबारी की प्रतिक्रिया न हो यह सुनिश्चित करके आचार्य राममूर्ति ने गांधी मैदान में जेपी को सूचना दी थी। बिहार बन्द के दरमियान रेल की पटरी पर जुटी नौजवानों की टोली को देख कर असहाय हुए जिलाधिकारी हिंसा और पटरी उखाड़े जाने की संभावना से आक्रांत थे। भीड़ यदि तोड़-फोड़ पर उतारू होती तो गोली-चालन की भी उनकी तैयारी थी। तब उन्ही से मेगाफोन लेकर नारायण देसाई ने उन युवाओं से संवाद किया और ‘हमला हम पर जैसा होगा,हाथ हमारा नहीं उठेगा’,’संपूर्ण क्रांति अब नारा है,भावी इतिहास हमारा है’ जैसे नारे लगवाये । जिलाधिकारी की जान में जान आई। बिहार की तत्कालीन सरकार द्वारा नारायण देसाई को बिहार-निकाला दिया गया था।
आपातकाल के दौरान जॉर्ज फर्नांडीस ने नारायण भाई के समक्ष अपनी योजना (जिसे बाद में सरकार ने ‘बडौदा डाइनामाइट केस’ का नाम दिया) रखी थी । नारायण भाई ने ऐसे मामलों में तानाशाह सरकारों द्वारा घटना – क्षेत्र की जनता पर जुर्माना ठोकने की नजीर दी और कहा कि इससे आन्दोलन के प्रति जनता की सहानुभूति नहीं रह जाएगी। आपातकाल के दौरान गुजरात से ‘यकीन’ नामक पत्रिका का संपादन शुरु करने के अलावा ‘तानाशाही को कैसे समझें?’, ‘अहिंसक प्रतिकार पद्धतियां’ जैसी पुस्तिकाएं नारायण देसाई ने तैयार कीं और छापीं। भवानी प्रसाद मिश्र की जो रचनायें आपातकाल के बाद ‘त्रिकाल संध्या’ नामक संग्रह में छपीं उनमें से कई आपातकाल के दौरान ही ‘यकीन’ में छपीं। प्रेसों में ताले लगे,अदालतों के आदेश पर खोले गए। रामनाथ गोयन्का ने ‘भूमिपुत्र’ को अपने गुजराती अखबार ‘लोकसत्ता’ के प्रेस में छापने का जोखिम भी उठाया।
१९७७ के चुनाव में कई सर्वोदइयों ने पहली बार वोट दिया। ये लोग वोट न देने की बात गर्व से बताते थे। कंधे पर हल लिए किसान वाला झन्डा (जनता पार्टी का) मेरे हाथ से कुछ कदम थाम कर तक मतदाता केन्द्र की ओर चलते हुए नारायण देसाई ने मुझे यह बताया था । यह ‘तानाशाही बनाम लोकतंत्र’ वाला चुनाव था लेकिन जनता से वे यह उम्मीद भी रखते थे – ‘जनता पार्टी को वोट जरूर दो लेकिन वोट देकर सो मत जाओ’। नारायण भाई ने जन-निगरानी के लिए बनी लोक समिति के गठन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर काम किया। बिहार के चनपटिया के कामेश्वर प्रसाद इन्दु जैसे लोक समिति के नेता ‘बेशक सरकार हमारी है ,दस्तूर पुराना जारी है’ के जज्बे के साथ गन्ना किसानों के हक में लड़ते हुए जेल भी गये।
तरुणमन के एक लेख में नारायण देसाई ने कहा था कि महापुरुषों के योग्य शिष्य सिर्फ उनके बताये मार्ग पर ही नहीं चलते है, नई पगडंडियां भी बनाते हैं। इस लिहाज से नारायण देसाई अपने अभिभावक जैसे गांधीजी, अपने आचार्य विनोबा और नेता जेपी की बताई लकीरों के फकीर नहीं बने रहे,उन्होंने अपनी नई पगडंडियां भी बनाई। आन्दोलनों में गीत, संगीत व नाटक का नारायण भाई ने जम कर प्रयोग किया। सांस्कृतिक चेतना के मामले में वे खुद को गांधीजी की बनिस्बत गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से अधिक प्रभावित मानते थे। वे सधी हुई लय के साथ रवीन्द्र संगीत गाते भी थे। रवीन्द्रनाथ के कई गीतों और कविताओं का उन्होंने गुजराती में अनुवाद किया जो ‘रवि-छबि’ नाम से प्रकाशित हुआ। हकु शाह ,वासुदेव स्मार्त ,गुलाम मुहम्मद शेख और आबिद सूरती जैसे मूर्धन्य चित्रकारों से उनका निकट का सरोकार और मैत्री थी। हकु शाह ने तरुण शान्ति सेना के लिए अपने रेखांकन के साथ फोल्डर बनाया था । शान्ति केन्द्रों के प्रवास से लौट कर वासुदेव स्मार्त ने अपनी विशिष्ट शैली में अरुणाचल प्रदेश पर पेन्टिंग्स की एक सिरीज बनाई थी तथा ‘रवि-छबि’ का जैकेट भी बनाया था। गुलाम मुहम्मद शेख बडौदा शान्ति अभियान का हिस्सा थे और गांधी और विभाजन पर लिखी नारायण देसाई की किताब ‘जिगर ना चीरा’ का जैकेट बनाया था। रवीन्द्रनाथ के शिक्षा विषयक नाटक ‘अचलायतन’ का नारायण देसाई ने अनुवाद किया था। गुजराती साहित्य परिषद गुजराती भाषा की पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था है। साबरमती आश्रम में संगीतज्ञ पंडित खरे और विष्णु दिगंबर पलुस्कर आते थे । पं. ओंकारनाथ ठाकुर भी गांधीजी और राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रभावित थे। अस्पताल के बिस्तर पर भी अपने पसंदीदा कलाकार दिलीप कुमार रॉय, जूथिका रॉय ,सुब्बलक्ष्मी और पलुस्कर के भजन सुन कर तथा स्वजनों से पसंदीदा रवीन्द्र संगीत या कबीर के निर्गुण सुनकर कर नारायण देसाई भाव विभोर हो जाते थे। मृत्यु से नौ दिन पहले होली के मौके पर वेडछी गांव के बच्चे बाजा बजाते हुए उनके आवास पर पहुंचे तब उनके बाजों के साथ नारायण भाई ताल दे रहे थे। दक्षिण गुजरात के इस आदिवासी इलाके का होली प्रमुख त्योहार है। नारायण देसाई साहित्य परिषद के अध्यक्ष बने तब इस संस्था की गतिविधियों को अहमदाबाद के दफ्तर से निकाल कर पूरे गुजरात की यात्राएं की, युवा लेखकों को प्रोत्साहित किया। अपने सामाजिक काम के लिए मिले सार्वजनिक धन को उन्होंने ‘अनुवाद प्रतिष्ठान’ की स्थापना में लगाया है। भारतीय भाषाओं में बजरिए अंग्रेजी से अनुवाद न होकर सीधे अनुवाद हों यह इस प्रतिष्ठान का एक प्रमुख उद्देश्य है। इसके अलावा वैकल्पिक उर्जा तथा मानवीय टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में काम शुरु करने की उनकी योजना थी, जो अपूर्ण रह गई। अंग्रेजी की एक स्तंभकार ने आशंका व्यक्त की है कि २००२ के दंगे न होते तो नारायण देसाई उसी वक्त अवकाश-प्राप्ति कर बैठ जाते। मुझे यह मुमकिन नहीं लगता है। वैसे में वे मानवीय टेक्नॉलॉजी, पानी का प्रश्न,परमाणु बिजली का विरोध तथा भारतीय भाषाओं के हक में लगे हुए होते।
संस्थागत तालीम न हासिल करने वाले नारायण देसाई ने जो तालीम गांधी के आश्रमों में हासिल की थी उसमें कलम और कुदाल का फासला बहुत कम था। बनारस के साधना केन्द्र परिसर के विष्ठा से भरे सेप्टिक टैंक में उतर कर उसकी सफाई करते हुए उन्हें देखा जा सकता था। प्रदूषण फैलाने और पर्यावरण नष्ट करने वाले उद्योगों को इजाजत देने के सूत्रधार जब स्वच्छता अभियान का पाखंड रचते हैं तब उस पाखंड को हम नारायण देसाई जैसे गांधीजन की जीवन-शैली से समझ सकते हैं।
सांगठनिक दौरों से लौट कर अपने मुख्यालय बनारस आने पर वे दौरे की पूरी रपट अपनी पत्नी को देते थे और घर के कपड़े भी धोते थे। १० दिसम्बर को कोमा में जाने के पहले तक उन्होंने गत ७६ वर्षों से लिखते आ रही डायरी की उस दिन की प्रविष्टि लिखने के अलावा तुकाराम के अभंगों को गुजराती में अनुदित करने का काम तो किया ही ,डेढ़ घण्टा चरखा भी चलाया था। चिकित्सकों को अचरज में डालते हुए कोमा से निकल आने के बाद भी उन्होंने अस्पताल में कुल २०० मीटर सुन्दर सूत काता। १९४७ में अपनी पत्नी के साथ मिलकर जिस ग्रामशाला को चलाया था उसके प्रांगण में हुई प्रार्थना सभा में उनके पढ़ाए छात्र और साथी शिक्षकों के अलावा जयपुर से वस्त्र-विद्या के गुरु पापा शाह पटेल और ओडीशा से चरखा, कृषि औजार और बढ़ईगिरी के आचार्य चक्रधर साहू मौजूद थे। नारायण भाई की श्मशान यात्रा में गुजराती के वरिष्ट साहित्यकार राजेन्द्र पटेल व गुजरात विद्यापीठ के पूर्व उपकुलपति सुदर्शन आयंगर भी उपस्थित थे। नई तालीम के इस विद्यार्थी के जीवन में कलम और कुदाल दोनों से जो निकटता थी वह उनकी मृत्यु में भी इन दोनों प्रकार की उपस्थितियों से प्रकट हो रही थी।
वेडछी गांव से गुजरने वाली वाल्मीकी नदी के तट पर नारायण भाई की अन्त्येष्ठी हुई।गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि १९४८ में उनकी मां दुर्गा देसाई ने गांधीजी तथा १९४२ से रखी हुई महादेव देसाई की अस्थियों को एक साथ यहीं विसर्जित किया था। रानीपरज के चौधरी-आदिवासियों के रीति-रिवाज से उनका अंतिम संस्कार किया गया। गंगा जल और मुखाग्नि देने वाले स्वजनों में उनकी पुत्री डॉ संघमित्रा के अलावा इमरान और मोहिसिन नामक दो युवा भाई भी थे जो २००२ के दंगों में मां-बाप से बिछुड़ने के बाद नारायण भाई के साथ संपूर्ण क्रांति विद्यालय परिवार का हिस्सा थे। करीब दस साल बाद उनके माता-पिता का पता तो चल गया लेकिन ‘दादाजी’ की बीमारी की खबर मिली तो तुरंत उनकी सेवा करने के लिए वेडछी आ गये थे।
गांधी ने स्वयं नारायण देसाई का यज्ञोपवीत करवाया था। नारायण भाई ने गांधी के जिन्दा रहते ही जनेऊ से मुक्ति पा ली थी। जेपी आन्दोलन के क्रम में जब हजारों युवजन जनेऊ तोड़ रहे थे तब इस प्रसंग का उन्होंने स्मरण किया था। गांधी ने भी ‘सत्य के प्रयोग’ के क्रम में खुद को इतना विकसित कर लिया था कि १९४७ में नारायण-उत्तरा के विवाह में किसी एक पक्ष के अस्पृश्य न होने के कारण वे उपस्थित नहीं हुए थे। अलबत्ता ऐन शादी के दिन उनका आशीर्वाद का खत पहुंच गया था ।
(अफलातून)
५ , रीडर आवास,
जोधपुर कॉलोनी, काशी विश्वविद्यालय,
वाराणसी – २२१००५.
aflatoon@gmail.com

मित्र लाल्टू ने कहा,” ‘नल की हड़ताल’ पढ़कर अपनी दो पुरानी कविताएँ याद आ गईं। चंडीगढ़ में 1992 में वाटर वर्क्स कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी, तब लिखी थीं । पहली है’ –

तुम कोई भी हो खुले आकाश का खालीपन टूटे नल से बहा तालाब
कहने को कह सकता हूँ उत्तर संरचित बातें इस वक्त
जब सुन रहा बहुत पुराने गीत शिकवा यह कि नहीं चढ़ा पानी आज भी

कहने दो मुझे यह जीवन भी सुंदर है
हजारों हड़ताली जेल में टूटी हैं
पानी की पाइपें तड़प रहे
अस्पतालों में रोगी हग रखा
बाथरुम में किसने मुझे आती उल्टी।

कहने दो जब नहीं मिलता पानी बच्चों को
पानी सुंदर यह जीवन सुन रहा हूँ
बहुत पुराने गीत भुगत रहा प्यास से
कहीं नहीं पीने लायक बूँदें।

ऐसे में सोचते हुए उनको जो गाँवों में गंदे बावड़ियों से पीते पानी
याद आ रही एक सुंदर लड़की चाहता हूँ रोना
उसके उरोजों में रख अपना चेहरा कहने दो
सुंदर है सुनना पुराने गीत चाहना रोना
उसकी त्वचा का याद कर जो कर सकती है पैदा
एक और प्यासा।
(वाक् – 2010)
दूसरी –
परेशान आदमी

कहा उसने कि पढ़ी थी कभी अखबार में
अड़तालीस लोगों के प्यास से तड़प मरने की खबर
वह कह रहा था आप लोग बुश क्लिंटन छोड़ो
नल बंद करना सीखो
निरंतर बातें करते उसके बालों से चू रहा पसीना
कोई इंकलाबी सरकार नहीं दे सकती पर्याप्त
पानी घर शिक्षा स्वास्थ्य चीख रहा था वह
बहुत परेशान वह सुबह सुबह

आँखें कह रही थीं दिल में बैठा कोई अंजील था तड़पता
बाद में कहा दोस्तों ने
क्यों हो इतना परेशान
रहना इस देश में तो ऐसे रहना सीखो
किसी तरह दिन काटो अपने बाकी मत देखो
खत्म हो जाओगे सोच सोच
क्या फायदा हो इतना परेशान
रुका नहीं वह
कहता रहा देश विदेश की बहुत सी बातें

दोस्त बाग चले गए एक एक कर
बाल्टी बाल्टी पानी भर
उसकी बाल्टी में अब भर रहा था
बूँद बूँद पानी
परेशान आदमी की यही कहानी।
(पश्यंती- जनवरी मार्च १९९५)

हमने अपनी मातृभाषाओंके मुकाबले अंग्रेजी से ज्यादा मुहब्बत रखी , जिसका नतीजा यह हुआ कि पढ़े-लिखे और राजनीतिक दृष्टि से जागे हुए ऊंचे तबके के लोगों के साथ आम लोगों का रिश्ता बिलकुल टूट गया और उन दोनों के बीच एक गहरी खाई बन गई । यही वजह है कि हिन्दुस्तानी भाषायें गरीब बन गई हैं , और उन्हें पूरा पोषण नहीं मिला । अपनी मातृभाषा में दुर्बोध और गहरे तात्विक विचारों को प्रकट करने की अपनी व्यर्थ चेष्टा में हम गोते खाते हैं । हमारे पास विज्ञान के निश्चित पारिभाषिक शब्द नहीं हैं । इस सबका नतीजा खतरनाक हुआ है । हमारी आम जनता आधुनिक मानस यानी नए जमाने के विचारों से बिल्कुल अछूती रही है । हिन्दुस्तान की महान भाषाओं की जो अवगणना हुई है और उसकी वजह से हिन्दुस्तान को जो बेहद नुकसान पहुंचा है ,उसका कोई अंदाजा या माप आज हम निकाल नहीं सकते, क्योंकि हम इस घटना के बहुत नजदीक हैं । मगर इतनी बात तो आसानी से समझी जा सकती है कि अगर आज तक हुए नुकसान का इलाज नहीं किया गया,यानी जो हानि हो चुकी है उसकी भरपाई करने की कोशिश हमने न की, तो हमारी आम जनता को मानसिक मुक्ति नहीं मिलेगी, वह रूढ़ियों और वहमों से घिरी रहेगी । नतीजा यह होगा कि आम जनता स्वराज्य के निर्माण में कोई ठोस मदद नहीं पहुंचा सकेगी। अहिंसा की बुनियाद पर रचे गये स्वराज्य की चर्चा में यह बात शामिल है कि हमारा हर एक आदमी आजादी की हमारी लड़ाई में खुद स्वतंत्र रूप से सीधा हाथ बंटाए । लेकिन अगर हमारी आम जनता लड़ाई के हर पहलू और उसकी हर सीढ़ी से परिचित न हो और उसके रहस्य को भली भांति न समझती हो, तो स्वराज्य की रचना में वह अपना हिस्सा किस तरह अदा करेगी ? और जब तक सर्वसाधारण की अपनी बोली में लड़ाई के हर पहलू व कदम को अच्छी तरह समझाया नहीं जाता , उनसे यह उम्मीद कैसे की जाए कि वे उसमें हाथ बंटाएंगे ?
– मो.क. गांधी , रचनात्मक कार्यक्रम – उसका रहस्य और स्थान,१९४६

अक्टूबर १९३६ में काशी विद्यापीठ में आम का पौधा लगाते हुए गांधीजी

अक्टूबर १९३६ में काशी विद्यापीठ में आम का पौधा लगाते हुए गांधीजी

सफाई पर गांधी

सफाई पर गांधीः
श्रम और बुद्धि के बीच जो अलगाव हो गया है,उसके कारण अपने गांवों के प्रति हम इतने लपरवाह हो गए हैं कि वह एक गुनाह ही माना जा सकता है ।नतीजा यह हुआ है कि देश में जगह-जगह सुहावने और मनभावने छोटे-छोटे गांवों के बदले हमें घूरे जैसे गांव देखने को मिलते हैं।बहुत से या यों कहिए कि करीब-करीब सभी गांवों में घुसते समय जो अनुभव होता है, उससे दिल को खुशी नहीं होती। गांव के आसपास और बाहर इतनी गंदगी होती है और वहां इतनी बदबू आती है कि अक्सर गांव में जाने वाले को आंख मूंद कर और नाक दबा कर जाना पड़ता है। ज्यादातर कांग्रेसी गांव के बाशिन्दे होने चाहिए; अगर ऐसा हो तो उनका फर्ज हो जाता है कि वे अपने गांवों को सब तरह से सफाई के नस्मूने बनायें। लेकिन गांव वालों के हमेशा के यानी रोज-रोज के जीवन में शरीक होने या उनके साथ घुलने-मिलने को उन्होंने कभी अपना कर्तव्य माना ही नहीं। हमने राष्ट्रीय या सामाजिक सफाई को न तो जरूरी गुण माना; और न उसका विकास ही किया। यों रिवाज के कारण हम अपने ढंग से नहा-भर लेते हैं,मगर जिस नदी,तालाब या कुए के किनारे हम श्राद्ध या वैसी ही दूसरी कोई धार्मिक क्रिया करते हैं, और जिन जलाशयों में पवित्र होने के विचार से हम नहाते हैं , उनके पानी को बिगाड़ने या गन्दा करने में हमें कोई हिचक नहीं होती। हमारी इस कमजोरी को मैं एक बड़ा दुर्गुण मानता हूं। जिस दुर्गुण का ही यह नतीजा है कि हमारे गांवों की और हमारी पवित्र नदियों के पवित्र तटों की लज्जाजनक दुर्दशा और गन्दगी से पैदा होने वाली बीमारियां हमें भोगनी पड़ती हैं।
(उद्धरण का स्रोत संदेश के रूप में बता सकते हैं)

खास आदमी कार्यकर्ता

खास आदमी कार्यकर्ता

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