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Archive for the ‘Benaras’ Category

काशी विश्वविद्यालय आवासीय विश्वविद्यालय है। कला संकाय का डॉ एनी बेसेन्ट छात्रावास परिसर के बाहर है। सुरक्षा की दृष्टि से कम सुरक्षित।शहर से सीधे छात्रावास में घुस कर मार-पीट की संभावना ज्यादा होगी यह मानते हुए उसे परिसर के छात्रावासों से अधिक असुरक्षित माना जा सकता था। 1982 में उस छात्रावास में रहने वाले नन्दलाल,नन्दा राम,राम दुलार सहित 8 छात्रों को छुआछूत और जातिगत भावना से मारा-पीटा गया। समता युवजन सभा ने आवाज उठाई तो मार-पीट करने वाले छात्र प्रो मनोरंजन झा की समिति की जांच के बाद निकाल दिए गए। पीडित छात्रों को सुरक्षा की दृष्टि से परिसर के छात्रावास में कमरे दिए जांए,यह मांग भी थी। प्रशासन ने इन सभी छात्रों को बिडला छात्रावास के 6ठे ब्लॉक के कॉमन रूम से 6-7 कमरे बनवा कर आवण्टित किया गया।

सयुस की इकाई की स्थापना के मौके पर किशन पटनायक 1982 में बोले। परिसर में जाति,पैसे और गुंडागर्दी के बोलबाले का हमने जिक्र किया।किशनजी ने कहा ,”भारतीय समाज में जाति ऐसी गली है जो बन्द है।जन्म,विवाह और मृत्यु इसी गली के भीतर होना तय हो जाता है।गुण्डा वह है जो अपने से कमजोर को सताता है और अपने से मजबूत के पांव चाटता है। छात्र किसी एक वर्ग से नहीं आते लेकिन उनका समूह ऐसा होता है जिसके सदस्यों के गुण- जोखिम उठाने का साहस,बड़ों की बात आंख मूंद कर न मान लेना और दुनिया बदलने का सपना देखना होता है।”

मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के फैसले के बाद उच्च शिक्षा केन्द्रों में लाजमी तौर पर विरोध हुआ। चूंकि उच्च शिक्षा केन्द्र सवर्ण वर्चस्व के केन्द्र हैं।मंडल विरोधी छात्रों द्वारा आत्मदाह के प्रयास के बाद मुझे जला कर मारने की योजना बनी। सिख छात्रों को बचाने,एक छात्रावास के कमरे में मालवीयजी के समय से रखे गए गुरुग्रंथ साहब से छेडछाड करने वालों के खिलाफ शिकायत करने के कारण भी मेरे खिलाफ उन्हीं लोगों में गुस्सा था।जो अखबार राम मन्दिर आन्दोलन के दौर में विहिप का पैम्फलेट बन जाते थे उन्हींमें से एक में एक अध्यापक ने सवर्ण वर्चस्व के पक्ष में लिखा,’घोड़ा खरीदने जाते हैं तो अरबी घोड़ा खोजते हैं।कुत्ता रखना होता है तो अलसेशियन रखते हैं। फिर पढ़ाई और नौकरियों में सवर्णों का होना तो स्वाभाविक है।’ इस लेख के छपने के बाद लाजमी तौर पर वे छापा-तिलक लगाए,जनेऊधारी चिकित्सक हमें बेल्टधारी अलसेशियन लगते थे।

ऐसे माहौल में काशी विश्वविद्यालय में नेल्सन मण्डेला का कार्यक्रम बना।उन्हें मानद उपाधि दी गई। हम हवाई अड्डे पर पहुंचे। नेल्सन मण्डेला के साथ राजमोहन गांधी थे। उन्होंने हमें अपने साथ ले लिया।काफिला प्रह्लाद घाट पहुंचा,जहां स्थानीय प्रशासन ने मण्डेला साहब से ‘गंगा-पूजन’ करवाया। 5 कदम की दूरी पर रविदास मन्दिर था,जिसके बारे में मण्डेला साहब को नहीं बताया गया। हमारे ज्ञापन के बारे में राजमोहनजी ने संक्षेप में बताया और हम लोगों से कहा कि वे विस्तार से बाद में उसके बारे में बात कर लेंगे।

ज्ञापन तो यहां दर्ज करेंगे ही,उस दौर में वि.वि. में जाति प्रथा कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए थी,कुछ उदाहरण जान लीजिए। कृषि विज्ञान संस्थान में स्नातक स्तर पर ही आपको अपनी जाति के हिसाब से इतने अंक मिला करते थे कि स्नातकोत्तर कक्षाओं के विभाग उसी हिसाब से तय हो जाते थे। ब्राहमण के कृषि अर्थशास्त्र,राजपूत और भूमिहार के एग्रोनॉमी,पिछडे और दलित के हॉर्टीकल्चर में जाने की संभावना ज्यादा रहती थी। इसका व्यतिक्रम होने पर – कुर्मी किसान घर का पंचम सिंह  और पांडुरंग राव आत्महत्या करते हैं (दोनों कृषि विज्ञान संस्थान)। भौतिकी विभाग के कुशवाहा प्रोफेसर ने  एक क्षत्रीय शोध छात्र (नाम के साथ उसके भी कुशवाहा था) को परेशान किया तो प्रोफेसर ने चक्कू खाया था। छात्र पर 307 न लगे इसके लिए तत्कालीन कुलपति ने कचहरी जाकर निवेदन किया था।

आम तौर पर दलों,संगठनों से ऊपर उठकर जातियों का एका बन जाता था। जातिवादी मठाधीश प्रोफेसर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए जाति का उपयोग करते थे,जाति के प्रति प्रेम भी उसके लिए आवश्यक नहीं होता था।

एक मजबूत दलित प्रत्याशी लगातार ब्राह्मण प्रत्याशी से हारा-तब सवर्ण गोलबन्दी के लिए,’आजादी की लड़ाई सवर्णों ने लड़ी।छात्र संघ किसका? सवर्णों का’ जैसे परचे बटते। संयोगवश मैं भी उसी पद पर चुनाव लड़्ता था। ‘खटिका को हराना है तो……. को जिताना होगा’ नारा सफल नहीं हो पाया क्योंकि मेरे कारण गोलबन्दी नहीं हो पाई। वि.वि. में महिला महाविद्यालय,चिकित्सा विज्ञान संस्थान,दृश्य कला संकाय और प्रौद्योगिकी संस्थान के छात्र छात्राओं में जाति का असर न्यूनतम था और वहां मैं नम्बर एक पर था-अन्य संकायों में एक बडे गठबंधन के नाम पर सोनकर नम्बर पर एक थे। विश्वविद्यालय के पिछड़े- दलित छात्रों ने इस बात पर गौर किया और अगले साल ऊपर दिए संकायों के अलावा उनका भरपूर समर्थन मुझे मिला।

समता युवजन सभा हाथ के बने पोस्टर लगाती और मोटर साइकिल जुलूस की जगह साइकिल जुलूस निकालती। राजनीति में असरकारी होना जरूरी होता है।जब सयुस असरकारी हुई तब मुख्यधारा वाले समूहों ने भी साइकिल जुलूस निकाला।छात्रों ने उसे नकल माना। ”सयुस की साइकिल देखी,सबने मोटर साइकिल फेंकी”

नेल्सन मण्डेला को दिया गया ज्ञापन-

 

प्रति,

माननीय नेल्सन मण्डेला,

नेता, अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस ।                                        दिनांक 17 अक्टूबर 1990

परम आदरणीय महोदय.

आपके हमारे विश्वविद्यालय आगमन के अवसर पर हमारा मन हर्ष नहीं, अपितु विषाद से भर उठा है। मानवीय मूल्यों के लिए आपकी आजीवन लड़ाई,अपने जीवन मूल्यों के लिए कठोरतम परिस्थिति में विश्वास ज्योति को जलाए रखना, सिर्फ ऐसे समाज के लिए प्रेरणा बननी चाहिए जो स्वयं उन मूल्यों में विश्वास करे और उन्हें प्रतिस्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हो।

आज हमारा समाज , विशेषतः इस विश्वविद्यालय का छात्र-युवा,अध्यापक समाज, विशेष अवसर द्वारा विषमता मूलक समाज संरचना को दूर करने के खिलाफ खड़ा है। उसकी वाणी,उसकी लेखनी में जातिवाद के साथ-साथ नस्लवाद साफ-साफ परिलक्षित होता है। जात्यिवाद को वैज्ञानिक व्यवस्था करार देने के साथ हर जाति को अलसेशियन कुत्ता,अरेबियन घोड़ा की विशिष्टता के साथ जोड़ा जा रहा है। आज की तारीख में ऐसी मानसिकता को प्रश्रय देने वाला यह प्रशासन, छात्रावासों में अनुसूचित जाति, जनजाति के छात्रों को अलग लॉबी में रखता है। खुले कमरों में रहने की जुर्रत करने वाले,राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में मुखर दलित छात्रों को पीटा जाता है।लिखित शिकायत करने पर भी कुलपति,प्रशासन सिर्फ आश्वासन देते हैं। दोषी छात्रों अथवा छात्रावास संरक्षकों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाता।

यहां मंडल कमीशन की संस्तुतियों के खिलाफ आन्दोलनकारियों के प्रति वि.वि. प्रशासन ने अतिशय नरम व सहयोगी रुख अपनाया है। ऐसे में यहां की विद्वत परिषद द्वारा आपका अभिनन्दन एक विडंबना ही है। यदि आपको सही वस्तुस्थिति की जानकारी होती तो आप कदापि इस मानद उपाधि को सम्मान नहीं मानते व इसे ग्रहण करने से इंकार कर देते।

विषमता मूलक समाज के पोषक , विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा आयोजित इस समारोह का विरोध करते हुए भी महात्मा गांधी के देश में हम अपने प्रेरणा स्रोत के रूप में आपका स्वागत करते हैं।

विनीत,

( डॉ स्वाति )                                          (हरिशंकर)

समता संगठन                                    समता युवजन सभा

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काशी विश्वविद्यालय में १९८६ में छात्र संघ निलंबित हुआ उसके साथ छात्र संघ के उपाध्यक्ष और महामंत्री भी निलंबित हुए | अध्यक्ष नहीं हुए |पदाधिकारी न होते हुए भी मैं हुआ | कुछ पूर्व छात्रों के परिसर प्रवेश पर रोक लगी | छात्रों की तरफ से सिर्फ मैंने उच्च न्यायालय के जज ए एस श्रीवास्तव की जांच समिति का सामना किया |मैंने सभी छात्रों का बचाव किया और सभी पूर्णतय: दोषमुक्त हुए | चूंकि दोषसिद्ध होने के पूर्व निलंबन को सजा नहीं माना जाता है इसलिए मेरे विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आर सी यादव ने मेरे यूं जी सी नेट की परीक्षा के आवेदन को अग्रसारित किया था | इस परीक्षा में सफल हुआ और निलंबन की अवधि के वजीफे से स्कूटर खरीदी |निलंबन के दौरान ही पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा भी दी ,द्वितीय स्थान रहा | वजीफे के लिए बैंक खाता खुला | खाते में फिलवक्त ६ हजार ७ सौ २३ रुपये पचास पैसे हैं | अखबारों में छपने वाले लेखों का पारिश्रमिक |

परीक्षाओं की कमियों को दूर करने के लिए कई सुधार किए जा सकते हैं |छात्र के साथ  एक बार हुए अन्याय से निजात पाने के लिए और मौके दिया  जाना ऐसा ही सुधार माना जाता है | हमारे विश्वविद्यालय में इन सुधारात्मक उपायों के लिए बैक और इम्प्रूवमेंट कहा जाता था | साल भर की पढ़ाई का आकलन तीन घंटे में हो जाना – कई बार जुआ खेलने जैसी बात हो जाती है | बहरहाल , इन उपायों को हटाया गया तब मैं परीक्षा देने के स्तर से ऊपर जा चुका था | आन्दोलन की मजबूती के लिए परीक्षाओं में सुधार पर हमने संगोष्ठियाँ आयोजित कीं | आन्दोलन में मानव श्रुंखला , जन-सुनवाई और आखीर में घेरा डालो – डेरा डालो जैसे शांतिमय प्रतिकार के उपाए गढ़े गए | प्रशासन ने मुझे इस आन्दोलन का ‘मास्टर माइंड’ माना – जो नकारात्मक पदवी है | लेकिन छात्रों ने इसे एक सम्मान माना |

समाजवादी जनपरिषद ने मुझे वाराणसी कैंट से चुनाव लड़ाने का निर्णय लिया है | नामांकन के साथ नया बैंक खाता खोलने का आयोग का निर्देश है इसलिए कल स्टेट बैंक में खाता खोला |तुरंत एक ए टी एम् -कम- डेबिट कार्ड भी मिला | अब तक ऐसे कार्ड का मालिक न था | मित्र-मंडली से आए चंदे के ४८ हजार रूपए उस खाते में जमा कर दिए  हैं | चुनाव खर्च का ब्यौरा पूर्णतय: मानकों के अनुरूप रखने के लिए एक साथी को  पूर्णकालिक यह काम ही करना होगा |

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वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को पुलिस के साथ ठेकेदारों , बिल्डरों और कॉलॉनाइजरों तथा अन्य न्यस्त स्वार्थी तत्वों के गठजोड़ की जानकारी भली प्रकार है । इस नए किस्म के अनैतिक – गैर – कानूनी गठजोड़ के स्वरूप पर गौर करने से मालूम पड़ता है कि इस कदाचार को उच्च प्रशासन का वरद हस्त प्राप्त है। आश्चर्य नहीं होगा यदि पता चले कि वरि्ष्ठ अधिकारी इस किस्म के भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित भी करते हों ।

वाराणसी जिले के विभिन्न थाना परिसर व पुलिस चौकियों में निर्माण कार्य ठेकेदारों , बिल्डरों , कॉलॉनाईजरों से कराए गए हैं । इन निर्माण कार्यों के लिए पुलिस विभाग ने एक भी पैसा खर्च नहीं किया है । उदारीकरण के दौर की ’प्राईवेट-पब्लिक पार्टनरशिप ’ की अधिकृत नीति के इस भोंड़े अनुसरण ने उसे दुर्नीति बना दिया है । इस नए तरीके में प्रत्यक्ष तौर पर व्यक्ति विशेष के बजाए महकमे को लाभ पहुंचाया जाता है । मुमकिन है कि न्यस्त स्वार्थों से काम कराने वाले दरोगा या उपाधीक्षक को अप्रत्यक्ष लाभ या प्रोत्साहन भी दिया जाता हो ।पडोस के जिले मिर्जापुर में तो देश के सबसे बदए बिल्डरों में एक ’जेपी एसोशिएट्स’ ने तो एक थाना ही बना कर भेंट दिया है।

भ्रष्टाचार की इस नई शैली में घूस को पकड़ना ज्यादा सरल है । नगद घूस की लेन-देन को ’रंगे हाथों’ पकड़ने के लिए आर्थिक अपराध शाखा का छापा मय नौसादर जैसे रसायनों तथा नोटों के नम्बर पहले से दर्ज कर मारा जाता है । कदाचार को पकड़ने के इस पारम्परिक तरीके में कई झोल हैं । छापा मारने वाले विभाग की भ्रष्टाचारियों से साँठ-गाँठ हो जाने की प्रबल संभावना रहती है । जैसे नकलची परीक्षार्थियों द्वारा पकडे जाने पर चिट उदरस्थ करने की तकनीक अपनाई जाती है वैसे ही घूस मिल रहे नोटों को निगलने के प्रकरण भी हो जाया करते हैं ।  अ-सरकारी ’देश प्रेमियों ’ द्वारा कराए गए निर्माण चिट की भाँति निगल जाना असंभव है ।

जिन भ्रष्ट तत्वों द्वारा नये किस्म के दुराचार के तहत निर्माण कराये जाते हैं उनको मिले लाभ भी अक्सर देखे जा सकते हैं । मजेदार बात यह है कि सूचना के अधिकार के तहत जब इन निर्माणों के बारे में पूछा गया तो पुलिस विभाग के लिए बिल्डरों द्वारा कराए गए निर्माण को पूर्णतया नकार दिया गया। इसके बदले बिल्डर के भव्य शॉपिंग कॉम्प्लेक्स को नगर निगम के रिक्शा स्टैण्ड को निगलने की छूट मिल गई। शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के भूतल में वाहनों के लिए जो खाली जगह छोड़ी गई थी वहां भी दुकाने खुल गई हैं। फलस्वरूप वाहन लबे सड़क खड़े होकर जाम लगा रहे हैं । मनोविज्ञान की पाठ्य पुस्तकों के उदाहरण याद कीजिए – पति से हुए विवाद के कारण शिक्षिका पत्नी अपने स्कूल में बच्चे को छड़ी लगाती है और आखिर में बच्चा कुत्ते पर ढेला चला कर सबसे कमजोर पर गुस्सा उतारता है । वैसे ही इस शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में आई गाड़ियों से उत्पन्न यातायात के व्यवधान का गुस्सा पुलिस सबसे कमजोर तबके – पटरी व्यवसाइयों पर लाठी भांज कर,तराजू-बटखरा जब्त कर निकालती है ।

    विनोबा भावे के जुमले का प्रयोग करें तो उदारीकरण के दौर में सृजित भ्रष्टाचार की इस नई विधा का वर्णन करना हो तो कहना होगा – ’ अ-सरकारी तत्वों द्वारा कराया गया यह सरकारी काम इन चोरों की दृष्टि से असरकारी है ।’

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’ यह अब तक का सर्वाधिक समझदार ,सन्तुलित और नैतिक हथियार है । ’ सिर्फ़ जीवन हरण करते हुए तमाम निर्जीव इमारतों आदि को जस – का – तस बनाये रखने की विशिष्टता वाले न्यूट्रॉन बम के आविष्कारक सैमुएल कोहेन ने अपने ईजाद किए इस संहारक हथियार के बारे में यह कहा था। इस ६ दिसम्बर को उसके बेटे ने खबर दी कि उसकी कैन्सर से मृत्यु हो गई । युद्ध के बाद इमारतें जस की तस बनी रहेंगी तो निर्माण उद्योग को बढ़ावा कैसे मिलेगा ? संभवत: इसीलिए न्यूट्रॉन बम के प्रति बड़े मुल्कों में आकर्षण नहीं बना होगा । इराक के ’पुनर्निर्माण’ से अमेरिकी उपराष्ट्रपति डिक चेनी से जुड़ी कम्पनियां जुड़ी थीं , यह छिपा नहीं है ।

कल बनारस के शीतला घाट पर हुए ’ मध्यम श्रेणी के विस्फोट ’ के बाद से समस्त मीडिया का ध्यान काशी की कानून और न्याय – व्यवस्था पर है । यहां के नागरिकों और पर्यटकों के जान – माल की रक्षा में विफल जिला प्रशासन पर है ।

सैमुएल कोहेन की तरह बनारस के जिला प्रशासन ने भी एक ’समझदार ,सन्तुलित किन्तु संहारक हथियार ’ गत ढाई महीने से इस्तेमाल किया है । इस हथियार का प्रयोग बनारस के शहरी-जीवन के हाशिए पर मौजूद पटरी व्यवसाइयों पर हुआ है । इस माएने में जिला प्रशासन न्यूट्रॉन बम से भी एक दरजा ज्यादा ’समझदार’ है। वह जीवितों में भी भी गरीबों को छांट लेता है । ढाई महीने से आधा पेट खाकर लड़ रहे इन पटरी व्यवसाइयों के बीच से दो फल विक्रेता – रामकिशुन तथा दस्सी सोनकर रोजगार छीने जाने के आघात से अपनी जान गंवा चुके हैं । जिला प्रशासन की इस दमनात्मक कारगुजारी में ’रियल एस्टेट’ लॉबी तथा पुलिस बतौर गठबन्धन के शरीक है । इस गठबन्धन ने खुले रूप से एक घिनौना स्वरूप ग्रहण कर लिया है । लंका स्थित शॉपिंग कॉम्प्लेक्स को बनारस की सबसे चौड़ी पटरी और नगर निगम का रिक्शा स्टैण्ड उपहार स्वरूप भेंट दे दिया गया है , इसके बदले रियल एस्टेट मालिक द्वारा लंका थाना परिसर में कमरे बनवाना तथा पुताई करवाई गई है । इसी परिवार द्वारा बनाये गई बहुमंजली इमारतों में कई ’आदर्श घोटाले’ छुपे हैं ।

मुख्यधारा की मीडिया जिला प्रशासन रूपी न्यूट्रॉन बम को देखे-समझे यह भी सरल नहीं है ।

उत्तर प्रदेश में शासन कैसे चल रहा है इसका नमूना बनारस के पटरी व्यवसाइयों के ढाई महीने से चल रहे संघर्ष से समझा जा सकता है । मुख्यमन्त्री के कान-हाथ दो तीन नौकरशाह हैं । जो जिलाधिकारी इनसे तालमेल बैठा लेता है वह कोई भी अलोकतांत्रिक कदम उठा सकता है । वाराणसी नगर निगम के किसी भी अधिकारी द्वारा कोई भी आदेश न दिए जाने के बावजूद जिलाधिकारी के मौखिक आदेश का डंडा स्थानीय थानध्यक्ष के सिर पर है और थानाध्यक्ष के हाथ का डंडा पटरी व्यवसाइयों के सिर पर । गत दिनों सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पटरी पर व्यवसाय को मौलिक अधिकार का दरजा दिए जाने को भी जिलाधिकारी नजरअंदाज करते आए हैं । वाराणसी के कमीशनर को विधानसभाध्यक्ष , सत्ताधारी दल के कॉडीनेटर,शासन द्वारा नामित सभासदों द्वारा लिखितरूप से कहने को स्थानीय प्रशासन नजरअंदाज करता आया है ।सत्ताधारी दल के इन नुमाइन्दों ने स्थानीय प्रशासन को यह भी बताना उचित समझ कि अधिकांश  पटरी व्यवसाई दलित हैं । लोगों का कहना है कि इन महत्वपूर्ण सत्ता -पदों पर बैठे राजनैतिक कार्यकर्ताओं का महत्व गौण होने के पीछे स्वयं मुख्यमन्त्री का तौर तरीका है । माना जाता है कि नौकरशाह दल के नेताओं से ज्यादा चन्दा पहुंचाते हैं । लाजमी तौर पर दल के कार्यकर्ताओं का इन अफ़सरों से गौण महत्व होगा।

 

 

 

 

 

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छनकर बचा हुआ तबका  ही उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों तक पहुंच पाता है । शिक्षा के बजट का बड़ा हिस्सा इसी मद में खर्च होता है- छँटे हुओं के लिए । इसके बावजूद यह अपेक्षा की जा रही है कि उच्च शिक्षा के संस्थान और विश्वविद्यालय अपने स्तर पर संसाधन जुटायें ।

देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय (काशी विश्वविद्यालय) में संसाधन जुटाने के तरीकों में जो फर्क आया है उस पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ ।

यह विश्वविद्यालय  इंजीनियरिंग की पढ़ाई देश में सबसे पहले शुरु करने वाले केन्द्रों में से एक है । इसके फलस्वरूप आई.आई.टियों के निर्माण के पहले अधिकांश बड़े इंजीनियरिंग के पदों पर यहीं के स्नातक पाए जाते थे । बनारस के दो प्रमुख उद्योगों के विकास में इस विश्वविद्यालय का हाथ रहा ।

संस्थापक महामना मालवीय के आग्रह पर एक चेकोस्लोवाकियन दम्पति यहां के सेरामिक विभाग से जुड़े़ । इन लोगों ने विश्वविद्यालय परिसर के आस पास के गांवों और मोहल्लों के लोगों को मानव निर्मित मोती बनाने का प्रशिक्षण दिया । प्रशिक्षण पाने वाले न्यूनतम दरजा आठ तक पढ़े थे । आज यह बनारस का प्रमुख कुटीर उद्योग है । एक समूह तो इन मोतियों का प्रमुख निर्यातक बन गया है । इसी विभाग द्वारा उत्पादित चीनी मिट्टी के कप – प्लेट भी काफ़ी पसन्द किए जाते थे । पूर्वी उत्तर प्रदेश में ’भारत छोड़ो आन्दोलन’ के प्रमुख नेता और इस विभाग के शिक्षक राधेश्याम शर्मा ने यह तथ्य मुझे एक साक्षात्कार में बताये थे।

बनारस का एक अन्य प्रमुख लघु उद्योग छोटा काला पंखा रहा है । इसके निर्माताओं ने भी पहले पहल काशी विश्वविद्यालय से ही प्रशिक्षण पाया । इंजीनियरिंग कॉलेज के औद्योगिक रसायन विभाग द्वारा टूथ पेस्ट भी बनाया और बेचा जाता था । विश्वविद्यालय में यह सभी उत्पादन आजादी के पहले हुआ करते थे ।

इस प्रकार इन उत्पादों द्वारा न सिर्फ़ विश्विद्यालय संसाधन अर्जित करता था अपितु बनारसवासियों के लिए  रोजगार के नये और स्थाई अवसर भी मुहैय्या कराता था ।

ग्लोबीकरण के दौर को किशन पटनायक ने एक प्रतिक्रान्ति के तौर पर देखा था । जैसे क्रान्ति जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन लाती है  वैसे ही प्रतिक्रान्ति हर क्षेत्र में नकारात्मक दिशा में ले जाने वाली तब्दीलियाँ लाती है । काशी विश्वविद्यालय के संसाधन अर्जन के मौजूदा तरीकों पर गौर करने से यह प्रतिक्रान्ति समझी जा सकती है ।

विश्वविद्यालय में संसाधन जुटाने का प्रमुख तरीका अब ’पेड सीटों’ वाले पाठ्यक्रम हैं। इन पाठ्यक्रमों में अभिभावकों से भारी फीस वसूली जाती है । इस प्रकार इन पाठ्यक्रमों में दाखिले में छद्म – आरक्षण दिया जा रहा है – सभी जातियों के पैसे वालों को ।

पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बिहार का सबसे बड़ा सर सुन्दरलाल चिकित्सालय- विश्वविद्यालय के आयुर्विज्ञान संस्थान से जुड़ा है । मुष्टिमेय ईमानदार डॉक्टरों को अलग कर दिया जाए तो बाकी सभी प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए बदनाम है । जाहिर है प्रैक्टिस न करने के लिए मिलने वाला भत्ता पाने के बाद भी । पिछले कुछ समय से इस लूट को अधिकृत बनाने के लिए अस्पताल-भवन में ही ज्यादा पैसा देकर मरीज दिखाने की सुविधा दे दी गई है । इस बढ़ी फीस का छोटा हिस्सा विश्वविद्यालय को मिलता है और बाकी डॉक साहबों की जेब में जाता है । प्राइवेट प्रैक्टिस के इस अधिकृत रूप के आने के बाद आम-ओ.पी.डी के मरीजों के प्रति उपेक्षा-भाव बढ़ना लाजमी है ।

दवा कम्पनियां डॉक्टरों को विदेश यात्रायें , चार चकिया वाहन आदि भेंट में देने लगी हैं – जिनके बदले डॉक्टर लगभग हर पर्ची में निर्दिष्ट दवायें लिखते हैं । यह देन-लेन तो डॉक्टरों से निजी स्तर पर हुआ। जाहिर है इस संस्थान के सेमिनार और कॉन्फ़रेंसों के लिए चिकित्सकीय यन्त्र ,दवा बनाने वाली कम्पनियां और निजी पैथेलॉजिकल प्रयोगशालायें – वाहन , खाना-’पीना’, अच्छे होटलों में टिकाने की व्यवस्था घोषित-अघोषित रूप से करती हैं ।

विश्वविद्यालय द्वारा धन कमाई का बदलता स्वरूप दिखाता है कि आजादी के पहले इन प्रयोगों से गरीब नागरिकों को आर्थिक मजबूती मिल रही थी । प्रतिक्रांति के दौर में विश्वविद्यालय की दुनिया से गरीब दो तरीकों से दूर कर दिया गया है । सामान्य मंहगाई के माध्यम से उसकी पहुंच असाध्य हुई है । मंहगाई का एक हिस्सा अप्रत्यक्ष करों के बोझ से उसके कन्धों पर भी आता है।  फीस वृद्धि और निजीकरण ने इस युग के उस नीति को ही पुष्ट किया है – ’समाज के एक छोटे-से छँटे हुए तबके के लिए ही सरकारी सुविधायें हों ’- शिक्षा,स्वास्थ्य,बिजली,पानी सब । सस्ते हो रहे हैं हमारे  जल , जंगल, जमीन, खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधन विदेशी कम्पनियों और बड़े उद्योगपतियों के लिए ।

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काशी विश्वविद्यालय

यही है वह जगह

जहां नामालूम तरीके से नहीं आता है वसंतोत्सव

हमउमर की तरह आता है

आंखों में आंखे मिलाते हुए

मगर चला जाता है चुपचाप

जैसे बाज़ार से गुज़र जाता है बेरोजगार

एक दुकानदार की तरह

मुस्कराता रह जाता है

फूलों लदा सिंहद्वार

इस बार वसंत आए तो जरा रोकना उसे

मुझे उसे सौंपने हैं

लाल फीते का बढ़ता कारोबार

नीले फीते का नशा

काले फीते का अम्बार

कुछ लोगों के सुभीते के लिए

डाली गई दरार

दरार में फंसी हमारी जीत – हार

किताबों की अनिश्चितकालीन बन्दियां

कलेजे पर कवायद करतीं भारी बूटों की आवाजें

भविष्य के फटे हुए पन्ने

इस बार वसंत आए तो जरा रोकना उसे

बेतरह गिरते पत्तों की तरह

ये सब भी तो उसे देने हैं .

अरे , लो

वसंत आया

ठिठका

चला गया

और पथराव में उलझ गए हमारे हांथ

फिर उनहत्तरवीं बार !

किसने सोचा था

कि हमारे फेंके गये पत्थरों से

देखते – देखते

खडी हो जाएगी एक दीवार

और फिर

मंच की तरह चौडी .

इस पर खडे लोग

मुंह फेर कर इधर भी हो सकते हैं

और पीठ फेर कर उधर भी

इस दीवार का ढहना

उतना ही जरूरी है

जितना कि एक बेहद तंग सुरंग से निकलना

जिसमें फंस कर एक जमात

दिन – रात बौनी हो रही है .

किताबों के अंधेरे में

लालीपॉप चूसने में मगन

हमें यह बौनापन

दिखाई नहीं देगा .

मगर एक अविराम चुनौती की तरह

एक पीछा करती हुई पुकार की तरह

हमारी उम्र का स्वर

बार-बार सुनाई यही देगा

कि इस अंधेरे से लडो

इस सुरंग से निकलो

इस दीवार को तोडो

इस दरार को पाटो.

और इसके लिए

फिलहाल सबसे ज्यादा मुनासिब

यही है वह जगह .

— राजेन्द्र राजन

राजन की कविता

राजन की कविता पहले पहल तो पर्चे में छपी थी.’किताबों की एक अनिश्चितकालीन बन्दी’ के दौरान.पर्चे की सहयोग राशि थी २० पैसे.मेरे झोले में करीब बत्तीस रुपए सिक्कों में थे जब उस पर्चे को बेचते हुए मैं गिरफ़्तार हुआ था.चूंकि विश्वविद्यालय के तत्कालीन संकट के लिहाज से यह ‘समाचार’ था इसलिए समाचार – पत्रिका ‘माया’ ने इसे एक अलग बॉक्स में,सन्दर्भ सहित छापा.’माया’ में वैसे कविता नहीं छपती थी.

राजन ने यह कविता समता युवजन सभा के अपने साथियों को समर्पित की थी . राजेन्द्र राजन किशन पटनायक के सम्पादकत्व मे छपने वाली ‘सामयिक वार्ता’ के सम्पादन से लम्बे समय तक जुडे रहे.आजकल ‘जनसत्ता’ के सम्पादकीय विभाग में हैं. ‘समकालीन साहित्य ‘ , ‘हंस’ आदि में राजन की कवितांए छपी हैं . छात्र राजनीति से जुड़ी एक जमात ने यह कविता  पर्चे और पोस्टर (हाथ से बने ,छपे नहीं ) द्वारा प्रसारित की.उस जमात का छात्र -राजनीति की मुख्यधारा से कैसा नाता होगा,इसका अंदाज लगाया जा सकता है .

बहरहाल, पिछली प्रविष्टि में स्थापना दिवस पर गांधी जी के भाषण का जिक्र किया था.गांधी जी के चुनिन्दा भाषणों मे गिनती होती है ,उस भाषण की  .वाइसरॉय लॉर्ड हार्डिंग के आगमन की तैय्यारी में शहर के चप्पे – चप्पे में खूफ़िया तंत्र के बिछाये गये जाल ,विश्वनाथ मन्दिर की गली की गन्दगी से आदि का भी गांधी जी ने उल्लेख किया था .यहां उच्च शिक्षण की बाबत जो उल्लेख आया था,उसे दे रहा हूं :

“मैं आशा करता हूं कि यह विश्वविद्यालय इस बात का प्रबन्ध करेगा कि जो युवक – युवतियां यहां पढने आवें , उन्हें उनकी मतृभाषाओं के जरिए शिक्षा मिले.हमारी भाषा हमारा अपना प्रतिबिम्ब होती है . और अगर आप कहें कि भाषांए उत्तम विचारों को प्रकट करने में असमर्थ हैं ,तो मैं कहूंगा कि जितनी जल्दी इस दुनिया से हमारा अस्तित्व मिट जाए उतना ही अच्छा होगा . क्या यहां एक भी ऐसा आदमी है ,जो यह सपना देखता हो कि अंग्रेजी कभी हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा बन सकती है? (’कभी नहीं’ की आवाजें ) राष्ट्र पर यह विदेशी माध्यम का बोझ किस लिए ? एक क्षण के लिए तो सोचिए कि हमारे लडकों को हर अंग्रेज लडके के साथ कैसी असमान दौड दौड़नी पडती है . “

वसंतोत्सव यहां नामालूम तरीके से नहीं आता . वसंत पंचमी (१९१६ ) इस विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस है.स्थापना दिवस के दिन छात्र – छात्रांए अलग -अलग विषय चुन कर झांकियां जुलूस की शक्ल में निकालते थे. जैसे १९८६ के स्थापना दिवस की झांकी में आचार्य नरेन्द्रदेव छात्रावास (सामाजिक विग्यान संकाय के स्नातक छात्रों का ) के बच्चों ने स्नातक प्रवेश के लिए परीक्षा को ही विषय चुना था .एक ट्रक पर विश्वविद्यालय का सिंहद्वार बना.द्वार के दो हिस्से थे.ग्रामीण पृष्ट्भूमि के छात्रों को भगा दिया जा रहा था और शहरी पृष्टभूमि के कोचिंग ,क्विज़  के अभ्यस्त बच्चों का स्वागत किया जा रहा था.सचमुच केन्द्रीय बोर्ड के पाठ्यक्रम पर आधारित प्रवेश परीक्षा के जरिए दाखिले शुरु होने के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के अपने अपने बोर्ड की परीक्षा में अच्छा करने वाले छात्र भी छंटने लगे और औद्योगिक शहरों के केन्द्रीय बोर्ड के पाठ्यक्रम पढे बच्चे बढ गये.स्थापना दिवस की झांकी पर उस वर्ष बर्बर पुलिस दमन हुआ.अब झांकिया नहीं निकलतीं स्थापना दिवस पर.

यादगार और ऐतिहासिक स्थापना दिवस तो पहला ही रहा होगा.विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मालवीय ने अंग्रेज अधिकारियों के अलावा गांधीजी ,चंद्रशेखर रमण जैसे महानुभावों को भी बुलाया था.

गांधी जी का वक्तव्य हिन्दी में हुआ .मालवीयजी को दान देने वाले कई राजे -महाराजे आभूषणों से लदे विराजमान थे .गांधी ने उन पर बेबाक टिप्पणी की .उस भाषण को सुन कर विनोबा ने कहा कि ‘इस आदमी के विचारों में हिमालय की शान्ति और बन्गाल की क्रान्ति का समन्वय है’.लोहिया ने भी उस भाषण का आगे चल कर अपनी किताब में जिक्र किया.

गांधी एक वर्ष पूर्व ही दक्षिण अफ़्रीका से लौटे थे और भारत की जमीन पर पहला सत्याग्रह एक वर्ष बाद चंपारण में होना था.’मालवीयजी महाराज’ (गांधीजी उन्हें यह कह कर सम्बोधित करते थे) की दूरदृष्टि थी की भविष्य के नेता को पहचान कर उन्हें बुलाया.

गांधीजी के भाषण से राजे महराजों के अलावा डॉ. एनी बेसेण्ट भी नाराज हुई थीं.इस भाषण के कुछ अंश तो अगली प्रविष्टि मे दूंगा लेकिन पाठकों से यह अपील भी करूंगा कि ‘सम्पूर्ण गांधी वांग्मय’ हिन्दी मे संजाल पर उपलब्ध कराने की मांग करें.सभी १०० खण्ड अंग्रेजी में संजाल पर हैं.

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छनकर बचा हुआ तबका  उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों तक पहुंच पाता हो भले ही लेकिन शिक्षा के बजट का बड़ा हिस्सा इसी मद में खर्च होता है । इसके बावजूद यह अपेक्षा की जा रही है कि उच्च शिक्षा के संस्थान और विश्वविद्यालय अपने स्तर पर संसाधन जुटायें ।

देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय (काशी विश्वविद्यालय) में संसाधन जुटाने के तरीकों में जो फर्क आया है उस पर इस पोस्ट में ध्यान आकर्षित किया गया है ।

यह विश्वविद्यालय  इंजीनियरिंग की पढ़ाई देश में सबसे पहले शुरु करने वाले केन्द्रों में से एक है । इसके फलस्वरूप आई.आई.टियों के निर्माण के पहले अधिकांश बड़े इंजीनियरिंग के पदों पर यहीं के स्नातक पाए जाते थे । बनारस के दो प्रमुख उद्योगों के विकास में इस विश्वविद्यालय का हाथ रहा । संस्थापक महामना मालवीय के आग्रह पर एक चेकोस्लोवाकियन दम्पति यहां के सेरामिक विभाग से जुड़े़ । इन लोगों ने विश्वविद्यालय के आस पास के लोगों को मानव निर्मित मोती बनाने का प्रशिक्षण दिया । आज यह बनारस का प्रमुख कुटीर उद्योग है । इसी विभाग द्वारा उत्पादित चीनी मिट्टी के कप – प्लेट भी काफ़ी पसन्द किए जाते थे । बनारस का एक अन्य प्रमुख लघु उद्योग छोटा काला पंखा रहा है। इसके निर्माताओं ने भी पहले पहल काशी विश्वविद्यालय से ही प्रशिक्षण पाया । इंजीनियरिंग कॉलेज के औद्योगिक रसायन विभाग द्वारा टूथ पेस्ट भी बनाया और बेचा जाता था ।

इस प्रकार इन उत्पादों द्वारा न सिर्फ़ विश्विद्यालय संसाधन अर्जित करता था अपितु बनारस वासियों के लिए  रोजगार के नये अवसर भी मुहैय्या कराता था ।

ग्लोबीकरण के दौर को किशन पटनायक ने एक प्रतिक्रान्ति के तौर पर देखा था । जैसे क्रान्ति जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन लाती है  वैसे ही प्रतिक्रान्ति हर क्षेत्र में नकारात्मक दिशा में ले जाने वाली तब्दीलियाँ लाती है । काशी विश्वविद्यालय के संसाधन अर्जन के मौजूदा तरीकों पर गौर करने से यह प्रतिक्रान्ति समझी जा सकती है ।

हमारे छात्र जीवन में किसान -घर के लड़के विश्वविद्यालय परिसर के हॉ्स्टेल में कमरा पाना चाहते थे क्योंकि उसका भाड़ा १० रुपये प्रति माह होता तथा घर से आये अनाज से कमरे के हीटर पर भोजन बन जाता । ऐसे ही दाल बनाते हुए कवि गोरख पांडे ने लिखा था ,’देश गल रहा है,या दाल गल रही है’ । बहरहाल ,बढ़ी हुई फीस तथा मेस में खाने की अनिवार्यता से बचने के लिए अब किसान घर के बच्चे परिसर के बाहर रहने के लिए बाध्य हैं । जैसे सूती कपड़े पहनने वाले सिंथेटिक पहनने के लिए बाध्य हो गये हैं ।

संसाधन कमाने के नाम पर देश के संसाधनों की लूट को पोख्ता करने के उपाय अब विश्वविद्यालय की शोध परियोजनायें कर रही हैं । भूभौतिकी विभाग ने कोका कोला से समझौता किया है । इस प्रोजेक्ट द्वारा कम्पनी इन ’विद्वानों’ से कहलवाना चाहती है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस दानवाकार बहुराष्ट्रीय कम्पनी द्वारा भूगर्भ जल दोहन से कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ने वाला । विभाग में इस प्रोजेक्ट को चलाने वाला विश्विद्यालय प्रशासन का पसन्दीदा व्यक्ति है चूंकि वह रैंगिंग विरोधी समिति का अधिकारी भी बनाया गया है ।

भारत की खेती को पराश्रित बनाने में विशाल बीज कम्पनियाँ प्रमुख भूमिका अदा कर रही हैं । कई विकासशील देशों की राष्ट्रीय आय से ज्यादा का सालाना व्यवसाय करने वाली यह कम्पनियां लूट के साधन के तौर पर विकसित नई किस्मों पर शोध के लिए करोड़ों रुपये दे रही हैं । लाजिम है कि मोन्सैन्टों जैसी इन कम्पनियों के प्रवक्ताओं को ही सबसे बड़ा वैज्ञानिक माना जा रहा है ।

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