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Posts Tagged ‘varanasi’

साझा संस्कृति मंच

वाराणसी

माननीय श्री अण्णा हजारे ,

कबीर , तुलसी और रैदास की बनारस की इस कर्मभूमि में हम आपका हृदय से स्वागत करते हैं । वाराणसी के सामाजिक सरोकारों के संगठनों का यह साझा मंच आप से यह नम्र निवेदन कर रहा है :

राज्य व्यवस्था भ्रष्टाचार और हिंसा को नियंत्रित करने के लिए बनी हुई है । आज भ्रष्टाचार एक केन्द्रीय समस्या बन गया है क्योंकि उसके कारण एक औसत नागरिक के लिए सामान्य ढंग से ईमानदारी का जीवन जीना मुश्किल हो गया है । भ्रष्टाचार का शिकार हुए बगैर रोजमर्रा का काम नहीं चल पा रहा है इसलिए भ्रष्टाचार से मुक्त होने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है । सामान्य अवस्था में भ्रष्टाचार सिर्फ लोभी और बेशर्म आदमियों तक सीमित रहता है और अधिकांश घटनाओं में लोग आश्वस्त रहते हैं कि दोषी दण्डित होंगे । मौजूदा समय में नेक आदमी भी भ्रष्टाचार करने लगा है और कोई आदमी ईमानदारी से अपना काम करता है तो उसकी हालत दयनीय हो जाती है ।

भ्रष्टाचार को जड़ से समझने के लिए निम्नलिखित आधारभूत विकृतियों को समझना होगा:

(१) प्रशासन के ढांचे की गलतियां – जवाबदेही की स्पष्ट और समयबद्ध प्रक्रिया का न होना भारतीय शासन प्रणाली का मुख्य दोष है । प्रशासन और अर्थनीति जैसे हैं वैसे ही बने रहें लेकिन भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा –  यह हमें मुमकिन नहीं दिखता ।

(२) समाज में आय-व्यय की गैर-बराबरियां अत्यधिक हैं । जहां ज्यादा गैर बराबरियां रहेंगी , वहां भ्रष्टाचार अवश्य व्याप्त होगा । गांधीजी के शब्दों में ,’थोड़े लोगोंको करोड़  और बाकी सब लोगोंको सूखी रोटी भी नहीं , ऐसी भयानक असमानतामें रामराज्य का दर्शन करनेकी आशा कभी नहीं रखी जा सकती ’(दिनांक १०६-’४७) ।

(३) गांववासियों के लिए कचहरी और पुलिस में कोई फर्क नहीं होता । कचहरी वह है , जिसके द्वारा पटवारी-पुलिस किसानों को सताते हैं । सैकड़ों बार कचहरी आ कर अदालत में घूस और वकीलों की फीस में किसानों के करोडों रुपए लूट लिए जाते हैं । देश का पेट भरने वाले किसान के जीवन में बड़े   बड़े निजी निगमों का हस्तक्षेप बढ़ाया जा रहा है , इसे हम अपनी संस्कृति पर हमला मानते हैं और इसलिए इस पर रोक की माग करते हैं । किसान से जुड़े समस्त कार्य एक ही व्यवहार पटल (खिड़की) से क्यों नहीं निपटाये जा सकते ।

(४) हमारी यह स्पष्ट समझदारी है कि भ्रष्टाचार के इस अहम सवाल के अलावा हमें बेरोजगारी ,  दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली , विकास की गलत अवधारणा से उत्पन्न विस्थापन के मसलों को भी समाज के व्यापक आन्दोलन का हिस्सा बनाना ही होगा ।

इन विकृतियों को समझते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के निम्नलिखित बिन्दु उभरते हैं :

(१) समाज के दलित , किसान , मजदूर , पिछड़े , आदिवासियों के कल्याण के लिए नरेगा तथा अन्य कल्याणकारी योजनाएं बनाई गई हैं उसके पैसे भ्रष्ट अधिकारी , बिल्डर ,ठेकेदार एक गठबन्धन बना कर लूटते हैं । इस पर रोक सुनिश्चित होनी चाहिए ।

(२) भोंडी फिजूलखर्ची पर रोक लगाई जाए तथा आर्थिक विषमता को सीमित करने के उपाए किए जांए ।

(३) प्राकृतिक संसाधनों की लूट को रोकने के लिए आर्थिक नीतियों में परिवर्तन करने होंगे । मौजूदा उदार नीतियों से भ्रष्टाचार और लूट का सीधा सम्बन्ध है ।

(४) यह आन्दोलन व्यापक स्तर पर ’ घूस देंगे नहीं , घूस लेंगे नहीं ’  के साथ जन-जागरण चलायेगा ।

(५) अधिकांश अदालती मामलों के निपटारे के लिए समय की सीमा बाँधी जाए और झूठे मामलों की छानबीन की कोई कारगर प्रक्रिया तय हो जाए ताकि यह जलालत और घूसखोरी घट सके ।

(६) समाज और देश में वैमनस्य फैलाने वाली शक्तियों की सक्रियता की वजह से तमाम लोकहित के मुद्दे पीछे चले जाते हैं तथा इससे भ्रष्ट यथास्थितिवादी ताकतों को शक्ति मिल जाती है । इसलिए इस प्रश्न को हम गौण समझ कर नहीं चल सकते तथा इसके प्रति सतत सचेत रहेंगे ।

(७) प्रशासन के कई सुधारों के लिए संविधान या आर्थिक व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन की जरूरत भी नहीं होती है ।फिर भी आम नागरिक की आजादी को दबाने के लिए और प्रशासन के भ्रष्ट तत्वों को कवच प्रदान करने के लिए भारतीय दण्ड प्रक्रिया में जिन धाराओं से मुकदमा चलाने के लिए राज्यपाल,राष्ट्रपति आदि की अनुमति लेनी पड़ती है उन्हें बदलना होगा । भ्रष्ट और अपराधी अधिकारियों पर मामला चले ही नहीं इसके लिए इन प्राविधानों का उपयोग होता है ।

इसी प्रकार विश्वविद्यालय जैसे सरकारी वित्त से चलने वाली संस्थाओं में भ्रष्टाचार के मामलों की समग्र निष्पक्ष जांच के लिए विजिटर (राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल ) ही जांच गठित कर सकता है । इस वजह से से आजादी के बाद सिर्फ दो बार ही विजिटोरियल जांच हो पाई है (मुदालियर आयोग तथा गजेन्द्र गड़कर आयोग )।इसके समाधान के लिए समाज और विश्वविद्यालय के बीच पुल का काम करने वाली ’कोर्ट’ को अधिकारसम्पन्न और लोकतांत्रिक बनाना होगा।

(८) उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था कायम रखने के लिए बनाई गई पुलिस द्वारा बिना विभाग का पैसा खर्च किए भ्रष्ट बिल्डरों , कॉलॉनाईजरों,निर्माण कम्पनियों से पुलिस विभाग के निर्माण करवाये जा रहे हैं । इस दुर्नीति के चलते यह भ्रष्ट अपने गलत काम सम्पन्न करने की छूट पा जा रहे हैं तथा उसका परिणाम अन्तत: प्रदेश की गरीब जनता पर उतारा जा रहा है ।

माननीय अण्णा , उत्तर प्रदेश में अभियान की शुरुआत वाराणसी से करने के लिए हम आपके आभारी हैं तथा आप से यह अपील करेंगे कि आन्दोलन को व्यापक आधार देने के लिए आप अन्य समन्वयों ,मोर्चों से सम्पर्क , संवाद और समन्वय स्थापित करने के लिए पहल करेंगे ।

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क्वचित प्रकाशं क्वचित्प्रकाशं,

नभ: प्रकीर्णाम बुधरम विभाति ।

क्वचित क्वचित पर्वत सनिरुद्धम ,

रुपं यथा शान्त महार्णवस्य ॥

बिलकुल शुरुआती श्लोकों में से एक । आदरणीय गुरु रामचन्द्र शास्त्री का सिखाया हुआ , दरजा छ: में । शायद उनका रचा हुआ भी ।

बस ,फर्क सिर्फ़ यह था कि आज पर्वत की जगह मेघ पहले रह-रह कर प्रकाश को अवरुद्ध कर रहे थे और बाद में जैसा होना था चन्द्रमा की परछाई  ।

काशी में सूर्योदय ५ : २१ पर हुआ था और सूर्य ग्रहण ५ : ३० पर शुरु हुआ और  ७ : २७ तक चला । ६ : २४ से ६ : २७ तक सूर्य पूर्णरूपेण आच्छादित था ।

मैं साढ़े पाँच बजे उठा और खग्रास सूर्यग्रहण के  दौरान मैंने तसवीरें लीं । ’यही है वह जगह’ के पाठको के समक्ष प्रस्तुत है ।

Solar Eclipse Kashi

आखिरी तसवीर में बादलों के बीच किसी जेट विमान के धूँए की सीधी लकीर । इसके यात्रियों से “अदेखाई” भी हुई । कुछ तसवीरों को क्रॉप भी किया है और संजाल पर पूर्ण साइज में अपलोड नहीं किया है ।

सूरज जैसे ही पूरी तरह ढक गया , पक्षी तो शान्त हो गये किन्तु पास के डालमिया छात्रावास से लड़कों का शोर उठा ।

पूरा खेल परछाई का था । सो ,  इस दिव्य दृश्य के दर्शक की परछाइयों को भी खींचा । अखबार में पढ़ा कि यह खगोलीय स्थिति अगली बार  ११ जून २१३२ को बनेगी ।

मैंने अपने कैमेरे के अलावा किसी फिल्टर का प्रयोग नहीं किया है । प्रयोग का चूहा हूँ या नहीं यह वक्त बतायेगा ।
चित्र के कैप्शन पर खटका मारें और पिकासा अलबम पर स्लाईड शो के रूप में देखें । पिकासा का पेज खुलने के बाद F 11 बटन दबाकर पूरे परदे पर स्लाईडशो देखिएगा ।

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बनारस से प्रकाशित तीनों प्रमुख दैनिकों ने कल प्रथम पृष्ट पर यह संयुक्त विज्ञापन छापा था । मुझे कीटनाशकों के अवशेष पाए जाने के बाद तथाकथित गला-काट स्पर्धा वाली दोनों दानवाकार शीतल पेय कम्पनियों की संयुक्त प्रेस कॉन्फरेन्स की याद आई ।

From baghudi

[ कृपया विज्ञापन पढ़ने के लिए चित्र पर खटका मारें ।]
पेट काट कर सात दिनों की हड़ताल करने वाले हॉकरों की एकता को अखबार प्रबन्धन ने तोड़ दिया । इन तीनों प्रमुख दैनिकों से लड़ने के लिए
हॉकरों ने बनारस के सब से पुराने दैनिक ‘आज’ को बाँटना शुरु किया था । ‘आज’ प्रबन्धन पिछले कुछ वर्षों से रियल एस्टेट के धन्धे को प्रथमिकता देते हैं और तीनों प्रमुख दैनिकों की माँग की भरपाई करने के लिए जरूरी प्रतियाँ छापने की उनकी औकात नहीं रह गयी थी ।
मसिजीवी जानना चाहते थे कि हड़ताल से सम्बन्धित खबर छपती थी या नहीं । पीडी का अनुमान बिलकुल सही था । तीनों दानवों ने आज कुछ हॉकरों द्वारा अखबार प्रबन्धन को दी गयी नये साल की शुभ कामना छापी है । हड़ताल के दौरान बनारस के प्रमुख सान्ध्य दैनिक ‘गांडीव’ हड़तालियों की खबर ढंग से छाप रहा था ।
इस प्रकार बनारस के नगर संस्करण की कीमत साढे़ तीन रुपये हो गयी और डाक संस्करण की चार रुपये । हॉकरों का कमीशन दोनों संस्करणों के लिए एक रुपये पाँच पैसे रहा ।
चिट्ठेकारों द्वारा प्रदर्शित सहानुभूति एवं समर्थन के लिए हार्दिक शुक्रिया।

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    saksuka001

    यह हैं काशी के शिवाला मोहल्ले के हयात मोहम्मद खाँ। हमारे पोलू भाई । मोहल्ले के ज्यादातर लोगों की तरह जरदोजी , बैज ( ब्लेजर पर लगने वाला ) बनाने अथवा बनारसी साड़ी बिनने का काम वे नहीं करते हैं । पोलू भाई कभी ऑटो रिक्शा चलाते थे , कभी बिजली का काम ।

    उनका पसंदीदा काम है रसोइए का । छोटी-सी चाय की गुमटी है । गरमियों में चाय बनना बन्द हो जाती है । उसकी जगह आम का पन्ना , लस्सी , नीबू पानी और रूह आफ़ज़ा चलने लगता है । उन दिनों ‘यह कोक-पेप्सी मुक्त क्षेत्र है’ का बैनर अथवा ‘दूध – दही के देश में ,पेप्सी-कोक नहीं चलेगा’ के स्टिकर उनकी दुकान की शोभा बढ़ाते हैं । पोलू भाई जब ‘अनरसे की गोलियाँ’ छानते हैं तब बच्चों की भीड़ लग जाती है ।

    आज , पोलू भाई की अंतर्राष्ट्रीय पाक कला निपुणता की चर्चा करेंगे । पोलू भाई आस – पास के लॉजों में रसोइए का काम भी करते रहे हैं । बनारसी पंडे तीर्थ यात्रियों का हाव – भाव , चाल – चलन , वेश-भूषा ‘तजबीज’ कर उनका प्रान्त बता देते हैं । पोलू भाई उसी गुण से विदेशी पर्यटकों का देश बता देते हैं । जब वे लॉजों में रसोई बनाते थे तब इसराईली लड़कियाँ उनसे पूरी-सब्जी , मसालेदार सब्जी , दाल और चपाती बनाना सीखती थीं । उन्हीं लड़कियों से पोलू भाई ने ‘सकसूका’ और ‘मलावा’ जैसे इसराईली पकवान बनाने सीखे । त्योहारों और विशिष्ट अवसरों पर ‘ मलावा’ और ‘सकसूका’ का बनना जरूरी होता है । “पुरुष नहीं सीखते – भारतीय पकवान बनाना?” पोलू भाई गंभीरता से बताते है अपने देश में रेस्टरॉं चलाने वाले इक्का दुक्का पुरुष भी सीखते थे ।

    बहरहाल , इसराईली महमानों से उनके देश के व्यंजन बनाना सीखने के बाद पोलू भाई ने एक लॉज के मेनू में सकसूका और मलावा को शामिल करवाया । इनकी लोकप्रियता को देख कर मेनू चोरी हुआ और अब शिवाला के अन्य गेस्ट हाउसों में भी यह इसराईली व्यंजन उपलब्ध हो गये हैं ।

    पोलू भाई नरीमन हाउस में इसराईली नागरिकों के साथ आतंकियों की नृशंसता से आहत हैं। उनके मोहल्ले के रेस्टरां तथा स्वयं उनकी चर्चा भारत के बारे में हिब्रू में लिखी गई पर्यटन गाइडों और इन पर्यटकों के ब्लॉगों में हुई है ।

    पोलू भाई की दिली इच्छा है कि काशी आने वाले इसराईली पर्यटकों की पसंद शिवाला है- यह भी दुनिया जाने ।

    saksuka002

    क्या आप इन बोर्डों को पढ़ सकते हैं ? कौन सी लिपि है , यह ? काशी विश्वविद्यालय से काशी स्टेशन तक गंगाजी के समानांतर जाने वाली बनारस की एक मुख्य सड़क पर यह बोर्ड हैं । जॉन ज़ैदी द्वारा संचालित इन्टरनेट कैफ़े की सूचना है, इन पर । महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद जॉन जिन्हें मोहल्ले में ‘लिटिल’ के नाम से पुकारा जाता है ने यह इन्टरनेट कैफ़े शुरु किया । इसराईली पर्यटकों का यह अति प्रिय केन्द्र है । लिटिल को एक मनोरंजन चैनल में नौकरी मिल गयी इसलिए उन्हें बनारस छोड़ना पड़ा । उनके बड़े भाई अली नवाज जैदी अब उस कैफ़े के संचालक हैं । लिटिल की चर्चा पर्यटक स्वदेश लौट कर भी करते हैं इसलिए बनारस आने वाले इसराईली पर्यटक अभी भी उसकी दुकान और उसे खोजते हुए पहुंचते हैं ।

    १८५७ से ७६ साल पहले अंग्रेज सैनिकों के छक्के छुड़ाने वाले इस मोहल्ले की चर्चा इस चिट्ठे पर पहले हुई है । साहित्यकार रत्नाकर के नाम पर बने इस मोहल्ले के रत्नाकर पार्क के समक्ष १९६७ में अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन के प्रदर्शनकारियों पर गोली चालन हुआ था । आतंकी मुम्बई के नरीमन हाउस पर हमले द्वारा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को जो घिनौना संकेत देना चाहते थे उसकी काट भी शिवाला के पोलू भाई और जॉन ज़ैदी बनेंगे , यह हमारी दुआ है ।

 

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[  जुलाई १९६७ में बनारस में हुए नेपाल के युवा समाजवादियों के सम्मेलन को डॉ. लोहिया ने यह सन्देश दिया था । प्रदीप गिरि , केदारनाथ श्रेष्ठ और नेमकान्त दाहल सम्मेलन के आयोजक थे । लोकतंत्र के करीब आने के बाद शायद यह सन्देश पहली बार प्रसारित हो रहा है ।

    नेपाल के बारे में डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने जो कुछ कहा – लिखा उनमें से यह आखिरी सन्देश है । नेपाल के जनसंघर्ष की अन्तर्पीड़ा को इस सन्देश की सदीच्छा शायद अब पूरी होगी ।  ]

 

   

   

    नेपाली युवजन का एक जगह इकट्ठा होना ही बड़ी बात है । जब राज्य स्वच्छन्द हो जाता है , उसे किसी भी तरह के समूह से डर लगने लगता है । मेरा अन्दाज है कि पशुपतिनाथ की भीड़ से भी वर्तमान राजा को डर लगता होगा । ऐसी अवस्था में जनतन्त्र और समाजवाद का उद्देश्य लेकर जो भीड़ बनारस में इकट्ठा हो रही है वह नेपाली इतिहास के लिए निर्णायक हो सकती है ।

   वर्तमान राजा के पिता ने जब वे राणाशाही के कैदी जैसे थे , मुझसे एक बार पुछवाया था कि क्या किसी जुलूस के नेतृत्व करने का उनका समय आ गया है । राणा और राजा की लड़ाई का आज जैसा जनतन्त्र विरोधी नतीजा निकलेगा ऐसा अन्दाज हम नहीं लगा सके थे । खैर , कोई बात नहीं , क्योंकि इतिहास बिल्कुल सीधी चाल नहीं चलता थोड़े बहुत उलट फेर या आगे पीछे ही करते हैं । एक बात मैं वर्तमान राजा को जरूर कहना चाहूँगा । बेचारे मानें न मानें , आज वे गद्दी पर बैठ हैं उसमें थोड़ा बहुत मेरा भी हाथ रहा है । चाहे इसी नाते मेरी वे सलाह मानें कि नेपाल के नागरिकों को भाषण और संगठन की आजादी मिले बाकी चीजें बाद में होती रहेंगी ,  उनकी और जनता की पारस्परिक रजामन्दी से ।

    नेपाल के युवजनों को मैं सलाह दूँगा कि जनतन्त्र और समाजवाद ऐसे देवता हैं कि जिन पर कभी – कभी बड़ी आहुति चढ़ानी पड़ती है । ऐसा कुछ, थोड़ा बहुत नेपाल के युवजनों ने किया है । लेकिन वह बहुत कम है । देखों योरोप के युवजनों को और उनकी संकल्प शक्त को । संकल्प चाहे छोटा करो लेकिन उसके हासिल करने में अपना तन मन न्योछावर करने की शक्त हासिल करो । मैं बहुत चाहता था आप लोगों के बीच आता लेकिन इसी संदेश से संतोष कर रहा हूँ ।

 डॉ. राममनोहर लोहिया  ,                        जुलाई १९६७ .

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