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हमने अपनी मातृभाषाओंके मुकाबले अंग्रेजी से ज्यादा मुहब्बत रखी , जिसका नतीजा यह हुआ कि पढ़े-लिखे और राजनीतिक दृष्टि से जागे हुए ऊंचे तबके के लोगों के साथ आम लोगों का रिश्ता बिलकुल टूट गया और उन दोनों के बीच एक गहरी खाई बन गई । यही वजह है कि हिन्दुस्तानी भाषायें गरीब बन गई हैं , और उन्हें पूरा पोषण नहीं मिला । अपनी मातृभाषा में दुर्बोध और गहरे तात्विक विचारों को प्रकट करने की अपनी व्यर्थ चेष्टा में हम गोते खाते हैं । हमारे पास विज्ञान के निश्चित पारिभाषिक शब्द नहीं हैं । इस सबका नतीजा खतरनाक हुआ है । हमारी आम जनता आधुनिक मानस यानी नए जमाने के विचारों से बिल्कुल अछूती रही है । हिन्दुस्तान की महान भाषाओं की जो अवगणना हुई है और उसकी वजह से हिन्दुस्तान को जो बेहद नुकसान पहुंचा है ,उसका कोई अंदाजा या माप आज हम निकाल नहीं सकते, क्योंकि हम इस घटना के बहुत नजदीक हैं । मगर इतनी बात तो आसानी से समझी जा सकती है कि अगर आज तक हुए नुकसान का इलाज नहीं किया गया,यानी जो हानि हो चुकी है उसकी भरपाई करने की कोशिश हमने न की, तो हमारी आम जनता को मानसिक मुक्ति नहीं मिलेगी, वह रूढ़ियों और वहमों से घिरी रहेगी । नतीजा यह होगा कि आम जनता स्वराज्य के निर्माण में कोई ठोस मदद नहीं पहुंचा सकेगी। अहिंसा की बुनियाद पर रचे गये स्वराज्य की चर्चा में यह बात शामिल है कि हमारा हर एक आदमी आजादी की हमारी लड़ाई में खुद स्वतंत्र रूप से सीधा हाथ बंटाए । लेकिन अगर हमारी आम जनता लड़ाई के हर पहलू और उसकी हर सीढ़ी से परिचित न हो और उसके रहस्य को भली भांति न समझती हो, तो स्वराज्य की रचना में वह अपना हिस्सा किस तरह अदा करेगी ? और जब तक सर्वसाधारण की अपनी बोली में लड़ाई के हर पहलू व कदम को अच्छी तरह समझाया नहीं जाता , उनसे यह उम्मीद कैसे की जाए कि वे उसमें हाथ बंटाएंगे ?
– मो.क. गांधी , रचनात्मक कार्यक्रम – उसका रहस्य और स्थान,१९४६

अक्टूबर १९३६ में काशी विद्यापीठ में आम का पौधा लगाते हुए गांधीजी

अक्टूबर १९३६ में काशी विद्यापीठ में आम का पौधा लगाते हुए गांधीजी

सफाई पर गांधी

सफाई पर गांधीः
श्रम और बुद्धि के बीच जो अलगाव हो गया है,उसके कारण अपने गांवों के प्रति हम इतने लपरवाह हो गए हैं कि वह एक गुनाह ही माना जा सकता है ।नतीजा यह हुआ है कि देश में जगह-जगह सुहावने और मनभावने छोटे-छोटे गांवों के बदले हमें घूरे जैसे गांव देखने को मिलते हैं।बहुत से या यों कहिए कि करीब-करीब सभी गांवों में घुसते समय जो अनुभव होता है, उससे दिल को खुशी नहीं होती। गांव के आसपास और बाहर इतनी गंदगी होती है और वहां इतनी बदबू आती है कि अक्सर गांव में जाने वाले को आंख मूंद कर और नाक दबा कर जाना पड़ता है। ज्यादातर कांग्रेसी गांव के बाशिन्दे होने चाहिए; अगर ऐसा हो तो उनका फर्ज हो जाता है कि वे अपने गांवों को सब तरह से सफाई के नस्मूने बनायें। लेकिन गांव वालों के हमेशा के यानी रोज-रोज के जीवन में शरीक होने या उनके साथ घुलने-मिलने को उन्होंने कभी अपना कर्तव्य माना ही नहीं। हमने राष्ट्रीय या सामाजिक सफाई को न तो जरूरी गुण माना; और न उसका विकास ही किया। यों रिवाज के कारण हम अपने ढंग से नहा-भर लेते हैं,मगर जिस नदी,तालाब या कुए के किनारे हम श्राद्ध या वैसी ही दूसरी कोई धार्मिक क्रिया करते हैं, और जिन जलाशयों में पवित्र होने के विचार से हम नहाते हैं , उनके पानी को बिगाड़ने या गन्दा करने में हमें कोई हिचक नहीं होती। हमारी इस कमजोरी को मैं एक बड़ा दुर्गुण मानता हूं। जिस दुर्गुण का ही यह नतीजा है कि हमारे गांवों की और हमारी पवित्र नदियों के पवित्र तटों की लज्जाजनक दुर्दशा और गन्दगी से पैदा होने वाली बीमारियां हमें भोगनी पड़ती हैं।
(उद्धरण का स्रोत संदेश के रूप में बता सकते हैं)

खास आदमी कार्यकर्ता

खास आदमी कार्यकर्ता

स्त्री-पुरुष विषमता को लोहिया आदि-विषमता कहते थे। जाति जैसा ठहरा हुआ वर्ग भी स्त्री-पुरुष विषमता के खत्म होने के पहले टूट सकता है यह अब सिर्फ अनुमान अथवा कल्पना की बात नहीं रही। हरयाणा की खाप-पंचायतों द्वारा अन्तर्जातीय विवाहों का अनुमोदन इसका जीता जागता नमूना है।जातियों का अस्तित्व रोटी-बेटी संबंध से टिका रहता है। जाति के हितों की रक्षा के लिए बनी ये खाप पंचायतें भी हरयाणवी समाज में लुप्त हो रही बेटियों के दुष्परिणाम से घबड़ा कर जाति-बन्धन शिथिल करने के आदेश दे रही हैं। मुख्य तौर पर कन्या-भ्रूण हत्या के कारण हरयाणा में लिंगानुपात लगातार कम होता जा रहा है। अतिशय चिन्ताजनक लिंगानुपात के कारण गरीब राज्यों से बहुएं ब्याह कर हरयाणा लाई जा रही हैं। हरित क्रांति से समृद्ध बने प्रान्तों में हरयाणा की भी गिनती होती है। हमारे देश के गैर-बराबरी बढ़ाने वाले विकास के कारण , बिहार, झारखण्ड,ओडीशा,उत्तर बंग,पूर्वी उत्तर प्रदेश के देहाती बेरोजगार पंजाब ,हरयाणा के खेतों में मजदूरी करने जाते हैं । अब लुप्त हो रही स्त्रियों के कारण इन्हीं राज्यों से हरयाणा में बहुएं भी लाई जा रही हैं। इस प्रकार हरयाणवी समाज ने अपने प्रान्त की लुप्त की गई स्त्रियों को बचाने का कोई सामाजिक आन्दोलन चलाने के बजाए पिछडे प्रान्तों की बहुओं को लाकर तथा उनसे विवाह करने में जाति के बन्धन छोड़ने की छूट देने को बेहतर समझा है।
मेरे एक हरयाणवी मित्र की माताजी श्रीमती निर्मला देवी ने बताया कि सभी पर-प्रान्तीय बहुओं को ‘मनीपुरी बहु’ कहा जाता है। गौरतलब है कि इस नामकरण का मणिपुर राज्य से संबध नहीं है अंग्रेजी के शब्द ‘मनी’ से संबंध है। शादी-विवाह के मौकों पर गाए जाने वाले लोक-गीतों को मनीपुरी बहुएं नहीं गा पाती। मुझे यकीन है कि कुछ ही वर्षों में इन लोक गीतों को मनीपुरी बहुएं भी सीख जाती होंगी। पर-प्रान्त में विवाह करने वाली मेरी नानी,मामी,मां और भाभियों द्वारा नई भाषा सीख लेने में गजब की निपुणता प्रकट होती थी।
करीब १८ वर्ष पहले रेवाड़ी जिले के एक गांव में चार पांच दिवसीय कार्यक्रम में शरीक होने का मौका मिला था। गांव के बाहर लगी एक सरकारी सूचना को देख कर मैं चौका था। उस सरकारी बोर्ड में गांव में स्त्रियों और पुरुषों की संख्या में अन्तर चौंकाने वाला था।लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत से काफी कम था। अनुसूचित जाति के स्त्री-पुरुषों की संख्या भी राष्ट्रीय औसत की तुलना में विषम जरूर थी किन्तु गैर – अनुसूचित तबकों से बेहतर थी। मैंने लौट कर मेजबान साथी को इस विषय में एक पत्र लिखा। बहरहाल , २००१ की जनगणना के बाद से हरयाणा में चिन्ताजनक तौर पर घट रहा लिंगानुपात शैक्षणिक चर्चा का विषय बन गया है।
हरयाणा भाजपा के एक नेता द्वारा मुफ्त में बिहारी बहुएं दिलाने के वाएदे से बिहार के कई नेता आहत होकर बयान दे रहे हैं । हरयाणा में लुप्त हो रही स्त्रियों और पर-प्रान्त की दारिद्र्य झेल रही स्त्रियों के हरयाणा में मनीपुरी बहु बन कर जाने की बाबत इन बयानों में गहराई से चर्चा नहीं की जा रही है और न ही कोई संवेदना प्रकट हो रही है। हरयाणा में यह समझदारी बन चुकी है कि मनीपुरी बहुओं के न आने से वहां कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ जाएगी। इस समझदारी के व्यापक होने के कारण इस प्रकार के विवाह रुक जाएं यह हरयाणा का कोई भी दल अथवा खाप पंचायत नहीं कहेगी । बिहार के नेता इस संबंध के मुफ्त न होने और विधान सभा चुनाव बाद मुफ्त कर दिए जाने के आश्वासन से अपमान-बोध कर रहे हैं।
हमारे देश की विकास नीति कई बार सामाजिक पहेलियां भी गढ़ देती है। यह विदित है कि केरल और नागालैन्ड में लिंगानुपात स्त्री के हक में है। इन राज्यों की साक्षरता और किसी जमाने में प्रचलित मातृ सत्तात्मक समाज की इस सन्दर्भ में शैक्षिक जगत में चर्चा हो जाया करती है। हकीकत यह है स्त्री-उत्पीड़न और हिंसा के मामलों में अब केरल भी पीछे नहीं रहा । पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में स्त्री बहुलता वाला लिंगानुपात पाया गया है । पहली नजर में यह अबूझ पहेली लगता है। जनगणना की जिला रपटों के आधार पर स्थानीय अखबारों में इस बाबत कुछ ऊलजलूल सुर्खियां भी प्रकट हो गई थीं। इस तथ्य के बहाने दावा किया जाने लगा कि यह सूचकांक स्त्री की बेहतर हो रही स्थिति का द्योतक है। वास्तविकता यह है कि भारी तादाद में प्रवासी पुरुष मजदूरों के कारण जनगणना के दौरान लिंगानुपात स्वस्थ हो जाता है ।
भारतीय समाज की यह विडंबना है कि विकास की दौड़ में जिस राज्य को लाभ पहुंचा वहां औरत की स्थिति इतनी चिन्ताजनक है। राजनीति इतने पतनशील दौर से गुजर रही है कि सामाजिक और क्षेत्रीय गैर-बराबरी के मूल मसलों के समाधान की बात तो दूर उन्हें समझना भी नहीं चाहती । किसी रचनात्मक पहल से उम्मीद बचती है।
साभारः अमर उजाला , १३ जुलाई ,२०१४.

गुजराती साहित्य को इन्टरनेट पर लोकप्रिय बनाने वाले युवा ब्लॉगर मृगेश शाह नहीं रहे। सादर श्रद्धांजलि। उनका १९ मई को ब्रेन-हेमरेज हुआ।कल उनका दुखद अवसान हुआ। उनकी उम्र ३६ वर्ष थी।वडोदरा के इस युवा ने गुजराती की सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्यिक वेबसाइट बनाई।नवम्बर २००६ में मैंने उनसे बात की थी। यह ‘तरकश’ में प्रकाशित हुई थी।
Mrugesh Shah
‘तरकश’ ने उसे प्रकाशित किया था।
मृगेश शाह का www.readgujarati.com  १,३३००० लोगों द्वारा देखा जा चुका है.औसतन ६००-७०० लोग रोज इस स्थल पर पहुंचते हैं.’पुस्तक परिचय’ और ‘साहित्य विभाग’ नामक दो चिट्ठे मूल स्थल से जुडे हैं.’साहित्य-विभाग’ ३,०००,०० लोग देख चुके हैं.मृगेश मानते हैं कि प्रतिष्ठित साहित्यकारों की रचनाओं तथा गुजराती प्रेमियों की व्यक्तिगत चर्चा की कारण इतनी पाठक संख्या हो सकी है.’रीड गुजराती’ के बारे में लगभग सभी गुजराती अखबारों और लोकप्रिय पत्रिकाओं में लेख छपे हैं.

मृगेश शाह से ‘तरकश’ के लिए मेरी बात-चीत प्रस्तुत है – अफलातून. :

 

१. गुजराती में ब्लॉग्स की शुरुआत , प्रसार  और अभी की हालत   पर संक्षिप्त टिप्पणी करें.संख्या का अनुमान दें.

गुजराती में सर्वप्रथम ब्लॉग www.forsv.com/guju  है. इसके पहले कोई ब्लॉग रहा हो ऐसी जानकारी नहीं है.यह चिट्ठा अमेरिका में रहने वाले एक कम्प्यूटर वैज्ञानिक द्वारा चलाया जाता है.वर्षों से वे भी काफी अच्छा काम कर रहे हैं.उनके चिट्ठे पर खासतौर पर काव्य,रास-गरबा सुन्दर होता है.

तमाम गुजराती चिट्ठों का प्रसार ‘मित्र-मंडलियों’ और ‘सर्च इन्जिनों’ द्वारा हुआ है.गुजराती सूचना-तकनीक के क्षेत्र में अच्छी संख्या मे हैं तथा कविता,गज़ल और साहित्य का शौक आम है,इस से ही चिट्ठों की सुविधा का प्रयोग करने की लोगों को प्रेरणा मिली है,साथ- साथ निजी शौक की सृजनात्मक अभिव्यक्ति भी हो जाती है.

पिछले एक साल में गुजराती चिट्ठों की संख्या बहुत बढी है,उससे पहले तीन-चार सक्रिय चिट्ठे थे. अब करीब तीस चिट्ठे हैं.

 

२.फिलहाल , ज्यादातर गुजराती ब्लॉग्स व्यक्तिगत शेरो-शायरी और साहित्य पर ही हैं.ग्यान-विग्यान, राजनीति , सामयिक घटनाक्रम, खेल कूद  आदि पर कम हैं.इन  विषयों पर ब्लॉगिंग बढे-इसके लिए क्या कोई सामूहिक या व्यक्तिगत प्रयास हो रहे हैं ?

आप की बात सही है.अभी ज्यादातर गुजराती चिट्ठे काव्य,गज़ल और साहित्य-केन्द्रित ही हैं.’कलरव’ नामक एक चिट्ठा बच्चों के लिए है तथा ‘गुजराती सारस्वत परिचय’  नामक गुजराती चिट्ठे में गुजराती के साहित्यकारों की जीवनियों की झलकियां देखी जा सकती हैं.चन्द चिट्ठों को छोड ज्यादातर साहित्य-केन्द्रित चिट्ठे  हैं.राजनीति,सामयिक सामाजिक घटनाओं पर आधारित चिट्ठे दिखाई नहीं पडते.इसका कारण यह हो सकता है कि उन्हें रोज नयी प्रविष्टियों से ताजा रखना होगा,जो नही हो पाता.आमतौर पर चिट्ठेबाजी सरलता  से चलने वाली शौकिया वृत्ति है इसलिए पेशे या व्यावसायिक व्यस्तता वाले लोग रोज-ब-रोज ‘अपडेट’ करने वाले विषय सहजता से चुनते ही नहीं.इसके बावजूद अब कुछ गुजराती मंच और समूह संजाल पर गठित हो रहे हैं,यह खुशी की बात है.

३.आपके ब्लॉग की पाठक संख्या बहुत अच्छी है.इसके लिए क्या उपाय किए -कि इतनीपाठक संख्या हो गयी ?’ रीड  गुजराती’ की सफलता की कहानी संक्षेप में बतायें.

सबसे पहले यह स्पष्ट कर दूं कि www.readgujarati.com का स्वरूप चिट्ठे का नहीं,वेबसाइट का है.साहित्य और पुस्तक चर्चा के लिए मैंने  चिट्ठों का उपयोग किया है क्योंकि उससे जालस्थल का गठन सरल हो जाता है तथा फ़ीड का लोग उपयोग कर पाते हैं.इस लिए मेरे द्वारा ब्लॉग्स का उपयोग वेबसाइट की मदद में किया जा रहा है.

हां, ‘रीड गुजराती’ की की भारी पठक संख्या को मैं ईश्वर की कृपा मानता हूं.एक कारण यह भी है कि साहित्यिक  लेखों वाले चिट्ठे या वेबसाइट नहीं है तथा प्रसिद्ध गुजराती लेखकों की कहानियां और निबन्ध पढने को मिलते हों और नियमित तौर पर मिलते हों ऐसा अन्य कोई जालस्थल नहीं है.

रीडगुजराती ने ज्यादातर गुजराती अखबारों और पत्रिकाओं का ध्यान खींचा है.पाठक अपने मित्रों और स्वजनों को भी इसके बारे में बताते हैं.इसकी भारी पाठक संख्या साइट की पब्लिसिटी के कारण नहीं है अपितु साहित्य में लोगों की ऋचि के कारण है.फ़िर यह पाठक संख्या अचानक नहीं हुई है,एक साल की अवधि में धीरे धीरे लोग इसके बारे में जानने  लगे.उत्तम साहित्य पढने की उत्कट इच्छा परदेश में रहने वालों को होती है इसलिए ज्यादा तादात में वे प्रवासी गुजराती इस जालस्थल पर आते हैं.

 

४.भारतीय भाषाओं में ब्लॉगिंग के भविष्य के बारे में आप क्या सोचते हैं ?

भारतीय भाषाओं में ब्लोग काफ़ी विकसित हुए हैं.उनमें हिन्दी की व्याप्ति के कारण अगणित ब्लॉग बने हैं , यह आनन्द की बात है.इससे हमारा साहित्य टिकेगा और दूर के लोगों के लिए भी  लोकोपयोगी बन पडता है. इसलिए यह इन्टरनेट का सदुपयोग ही माना जाएगा.चिट्ठे सतत नई प्रविष्टियों से ताजे रखे जांए,विविध विषयों का समावेश करें तो अधिक उपयोगी होंगे.ब्लॉगिंग अच्छी वृत्ति है लेकिन इसके साथ यह ध्यान रखा जाए कि उत्तम सामग्री परोसी जा रही है.यह मनोरंजन का साधन न बने,ज्ञान प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन बने.

 

इस लज्जित और पराजित युग में

कहीं से ले आओ वह दिमाग़

जो खुशामद आदतन नहीं करता

कहीं से ले आओ निर्धनता

जो अपने बदले में कुछ नहीं मांगती

और उसे एक बार आंख से आंख मिलाने दो

जल्दी कर डालो कि फलने-फूलनेवाले हैं लोग

औरतें पीयेंगी आदमी खायेंगे – रमेश

एक दिन इसी तरह आयेगा – रमेश

कि किसी की कोई राय न रह जायेगी – रमेश

क्रोध होगा पर विरोध न होगा

अर्जियों के सिवाय – रमेश

ख़तरा होगा ख़तरे की घंटी होगी

और उसे बादशाह बजायेगा – रमेश

रघुवीर सहाय

[१९७४]

रघुवीर सहाय ः प्रतिनिधि कविताएं,राजकमल पेपरबैक्स

रघुवीर सहाय

रघुवीर सहाय

” गांधी – एक सख़्त पिता । जेपी – एक असहाय मां । विनोबा – एक पुण्यात्मा बड़ी बहन ।
लोहिया – गांव-दर-गांव भटकने वाला यायावर । अम्बेडकर – पक्षपाती हालात से नाराज होकर घर से बाहर रहने वाला बेटा ।
यह है हमारा हमारा कुटुंब । हम हैं इस परिवार की संतान। इसे और किस नजरिए से देखा जा सकता है ?”
– देवनूर महादेव , (प्रख्यात कन्नड़ साहित्यकार और अध्यक्ष , सर्वोदय कर्नाटक पक्ष)

देवनूर महादेव

अध्यक्ष ,सर्वोदय कर्नाटक पक्ष

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2013 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

The concert hall at the Sydney Opera House holds 2,700 people. This blog was viewed about 21,000 times in 2013. If it were a concert at Sydney Opera House, it would take about 8 sold-out performances for that many people to see it.

Click here to see the complete report.

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