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Archive for the ‘kishan pattanayak’ Category

राष्ट्रीयता और साम्प्रदायिकता एक दूसरे को कमजोर करनेवाली होती है,क्योंकि राष्ट्रीयता के परिधान में ही साम्प्रदायिकता आकर्षक लगती है।न सिर्फ साम्प्रदायिकता की चुनौती को झेलने के लिए बल्कि अलगाववाद पर नियंत्रण पाने के लिए भी राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के संबंध में एक दृढ़ और स्पष्ट अवधारणा को प्रचारित करना जरूरी हो गया है।नई आर्थिक नीतियों के कारण हमारी आजादी पर खतरे की आशंका व्यापक हो रही है।आर्थिक नीतियों के मामले में राष्ट्रवाद को परिभाषित करना ही होगा।यहां से शुरू करके राष्ट्र संबंधी पूर्णांग धारणा विकसित हो सकती है। – किशन पटनायक

भारतीय संस्कृति का स्थान भी साम्प्रदायिकता ले रही है,मानो पश्चिमी संस्कृति को मानने वाले ही साम्प्रदायिकता का विरोध कर रहे हैं।बात बिल्कुल ऐसी नहीं है क्योंकि पश्चिमी संस्कृति को मानने वाले राजनीतिक स्तर पर अब बड़ी संख्या में भाजपा के समर्थक बनते जा रहे हैं।इसलिए भारतीय संस्कृति का एक ग़ैरसाम्प्रदायिक आधुनिक रूप प्रचारित होना बहुत जरूरी है।आजादी के पहले रवींद्रनाथ ठाकुर इसके प्रभावी प्रतीक थे।आजादी के बाद पश्चिमीकृत संस्कृति के विकल्प में सिर्फ सती प्रथा और आसाराम स्थापित हो रहे हैं।
-किशन पटनायक

गैर भाजपाई दलों में सपा और बसपा का अकेला मोर्चा है जो संघ परिवार से भयभीत नहीं जान पड़ रहा है।इससे एक सबक लेना है-एक सीधा और गहरा सबक।संघ परिवार से मुकाबला करने के लिए जिस जनाधार की जरूरत है वह शूद्र-दलित समन्वय से बनता है ।जिस राजनैतिक दल का नेतृत्व मुख्य रूप से उच्च जातिवाला है,जिसके कार्यकर्ता भी सामान्यतया उच्च जाति से आते हैं,उसके पांव संघ परिवार से लड़ते वक्त लड़खड़ाते हैं।कई सामाजिक और ऐतिहासिक कारणों से उसके अंदर दुविधाएं और कमजोरियां पैदा होती हैं।
– किशन पटनायक

अंततोगत्वा संघ परिवार की धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक नीतियों का लक्ष्य समाज में ब्राह्मणवाद को पुनः स्थापित करना है।इसलिए ब्राह्मण-बनिया-राजपूत जातियों का एक स्वाभाविक आकर्षण इन नीतियों के प्रति होता है।यह सही है कि कई बार राजपूत और यादव,कायस्थ और कुर्मी समान रूप से मुसलमान विरोधी यानी साम्प्रदायिक दिखाई देते हैं।लेकिन गहराई में जाने पर पिछड़ों और दलितों का साम्प्रदायिक विद्वेष बहुत सतही मालूम होगा। ब्राह्मणवादी विचारों के हिसाब से ब्राह्मण ही पूरी तरह हिन्दू है या फिर द्विज जातियां।शूद्र जातियां अपेक्षाकृत कम हिन्दू हैं और दलितों का हिंदुत्व नगण्य है।अतः जिस दाल का नेतृत्व जितना द्विज प्रधान होगा,साम्प्रदायिकता के मुकाबले वह अपने को उतना दुविधाग्रस्त पाएगा।भाजपा से लड़ने में उसका आत्मविश्वास उतना कमजोर पाया जाएगा।उसका नेता प्रबल धर्मनिरपेक्षतावादी हो सकता है,लेकिन उसके अपने परिवार और स्वजनों के बीच उसकी बातें प्रभावी नहीं होंगी।
-किशन पटनायक
(धर्मनिरपेक्षता का घोषणापत्र 4)

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पिछले भाग से आगे ;
तो भारतीय बुद्धिजीवी को जब पश्चिमी सभ्यता अधूरी लगती है , तब वह प्राचीनता की किसी गुफा में घुस जाता है और जब वह अपनी सभ्यता के बारे में शर्मिन्दा होता है तब पश्चिम का उपनिवेश बन कर रहना स्वीकार कर लेता है । दोनों सभ्यताओं से संघर्ष करने की प्रव्रुत्ति भारतीय बुद्धिजीवी जगत में अभी तक नहीं विकसित हुई है या जो हुई थी , वह खत्म हो गई है । गांधी के अनुयाई गुफाओं में चले गये। रवि ठाकुर के लोग अंग्रेजी और अंग्रेजियत के भक्त हो गये । गांधी के एक शिष्य राममनोहर लोहिया ने ‘इतिहास चक्र’ नामक एक किताब लिखी । एक नई सभ्यता की धारा चलाने के लिए आवश्यक अवधारणाएं प्रस्तुत करना इस किताब का लक्ष्य था । अंग्रेजी में लिखित होने के बावजूद बुद्धिजीवियों ने उसे नहीं पढ़ा । औपनिवेशिक दिमाग नवनिर्माण की तकलीफ को बर्दाश्त नहीं कर सकता । ज्यादा-से-ज्यादा वह प्रचलित और पुरानी धाराओं को साथ-साथ चलाने की कोशिश करता है और दोनों के लिए कम-से-कम प्रतिरोध की रणनीति अपनाता है । आम जनता पर दोनों प्रतिकूल सभ्यताओं का बोझ पड़ता है और वह अपनी तकलीफ के अहसास से आन्दोलित होती है । सभ्यताओं से संघर्ष की इच्छा शक्ति के अभाव में देश के सारे राजनैतिक दल अप्रासंगिक और गतिहीन हो गए हैं । जनता के आन्दोलन को दिशा देने की क्षमता उनमें नहीं रह गई है । जन-आन्दोलनों का केवल हुंकार होता है, आन्दोलन का मार्ग बन नहीं पाता । जहां क्षितिज की कल्पना नहीं है, वहां मार्ग कैसे बने ? इस कल्पना के अभाव में क्रान्ति अवरुद्ध हो जाती है ।
ऐसी स्थिति में यही कहना काफी नहीं होगा कि सभ्यता के स्तर पर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा । मुकाबले की रणनीति भी बनानी पड़ेगी । किन बिन्दुओं पर हम सभ्यता या सभ्यताओं से टकराएंगे ? आधुनिक सभ्यता ने हमें कहां गुलाम बनाया है ? प्राचीन सभ्यता ने हमें कहां दबोच रखा है और पंगु बनाया है ? आज हम किन बिन्दुओं पर किस प्रकार का विद्रोह कर सकते हैं ? इन ठोस सवालों से जो नहीं जूझेगा , वह गांधी की प्रशंसा करेगा तो तो नेहरू का भी समर्थन करेगा । यह एक बौद्धिक बाजीगरी होगी, संघर्ष नहीं होगा,सृजन नहीं होगा । सभ्यताओं से जो तकरायेगा , उसे कुछ झेलना पड़ेगा। अपने वर्ग और तबके में उसे अप्रिय और कटु होना पड़ेगा ।
आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह दुनिया को अपने मानदंडों के अनुसार आधुनिक नहीं बना नहीं सकती । बारी – बारी से वह कुछ इलाकों को प्रलोभित करती है कि ‘ तुमको आधुनिक बना सकती हूं अमरीकी ढंग से नहीं , तो रूसी ढंग से ।’ पूरी दुनिया को एक समय के अन्दर आधुनिक बना सकने का दावा अभी तक वह कर नहीं सकी है। अतः यह सभ्यता दुनिया के बड़े हिस्से को उपनिवेश बना कर ही रख सकती है , जिसके लिए आधुनिक सभ्यता का अर्थ उपभोग का कुछ सामान मात्र है ।
प्राचीन सभ्यता का सबसे बड़ा अपराध यह है कि राष्ट्रीयता और सामाजिक समता के मूल्य उसमें नहीं हैं । जो भारतीय सभ्यता अब बची हुई है , उसकी सारी प्रवृत्ति इन मूल्यों के विरुद्ध है । मनुष्य , मनुष्य की बराबरी या आपसी प्रेम पारम्परिक भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है । ऐसे मनुष्य की संवेदनहीनता , यन्त्र की संवेदनाहीनता से कम खतरनाक नहीं है । मानव के प्रति उदासीनता प्राचीन हिन्दू संस्कृति का गुण था या नहीं , या यह वर्तमान की एक विकृति है , यह स्पष्ट नहीं है । प्राचीन भारतीय मान्यता न सिर्फ सामाजिक समता के विरुद्ध है , बल्कि वह आध्यात्मिक समता की अवधारणा को भी नकारती है । उसके अनुसार कुछ लोगों की आत्मा ही घटिया दरजे की होती है । बुद्ध ने इस मानवविरोधी प्रवृत्ति को बदलने की कोशिश की थी । लेकिन आधुनिक हिन्दू मनुष्य की विरासत में बुद्ध की धारा नहीं है । पश्चिमी सभ्यता का सबसे बड़ा गुण यह है कि उसने मानव की गरिमा और सामाजिक समानता को मूल्यों के तौर पर विकसित किया है । राष्ट्रीयता और अन्तरराष्ट्रीयता की भावना भी इन मूल्यों पर आधारित है । हिन्दू मनुष्य जब तक इन मूल्यों को आत्मसात नहीं कर लेता है , तब तक वह पश्चिम से बेहतर एक नई सभ्यता बनाने का दावा नहीं कर सकता ।
आधुनिक सभ्यता ने हमें उपनिवेश बनाया है । प्राचीन सभ्यता ने हमें समता विरोधी और मानव विरोधी बनाया है । इन बिन्दुओं पर अगर हम सभ्यता का संघर्ष नहीं चलाते हैं तो हमारी राजनीति , प्रशासन , अर्थव्यवस्था कुछ भी नहीं बदलनेवाली है । इसके बिना हमारे साहित्य , कला , विज्ञान के क्षेत्र में भी कोई उड़ान नहीं हो सकेगी । आधुनिक सभ्यता से संघर्ष की शुरुआत औपनिवेशिक मानस को झकझोरने से होगी । उपभोगवाद , बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और सांस्कृतिक परनिर्भरता को निशाना बनाकर ही यह कार्यक्रम हो सकेगा । दूसरी ओर , हिन्दू मानसिकता और हिन्दू समाज को सुधारने के लिए उग्र कार्यक्रम की जरूरत है ।
किशन पटनायक और डॉ. लोहिया यह मानसिकता कितनी अपरिवर्तित है ही , इसका प्रमाण हरिजनों की प्रतिक्रिया से मिलता है । हाल की घटनाएं बतलाती हैं कि हरिजनों को धर्म-परिवर्तन के लिए बड़ी संख्या में तैयार किया जा सकता है । हरिजनों के लिए मानव का दरजा प्राप्त करने के दो ही रास्ते दीखते हैं – धर्म-परिवर्तन और आरक्षण । आरक्षण का मतलब है हिन्दू मन की उदारता । क्या इस वक्त हिन्दू मन उतनी उदारता के लिए पूरी तरह तैयार है ? जिन दिनों दयानन्द , विवेकानन्द या गांधी हिन्दू समाज के नेता थे , उनका प्रयास और प्रभाव हिन्दू मन को मानवीय बनाने का था । हिन्दू समाज को पिघलाना उनका काम था । जब हिन्दू समाज पिघलता है तब भारतीय राष्ट्र बनता है , हिन्दू समाज जहां जड़ होता है , वहां भारतीय राष्ट्र के सिकुड़ने का डर रहता है ।
दो सभ्यताओं से एक साथ टकराना सत्ता की अल्पकालीन राजनीति में संभव नहीं है । मौजूदा राजनीतिक दलों की क्षमता के अनुसार उनका एकमात्र जायज लक्ष्य हो सकता है – लोकतंत्र के ढांचे की रक्षा करना । अगर ये दल इतना भी नहीं कर सकते तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि सभ्यताओं से लड़े बिना लोकतंत्र की रक्षा सम्भव नहीं है । ऐसी स्थिति में आम जनता के विद्रोहों का राजनीतिकरण नहीं होगा । कभी – कभी विद्यार्थियों में , कभी किसानों में , कभी दलितों में , कभी उपेक्षित इलाकों में खंड-विद्रोह होते हैं । इन तबकों और इलाकों पर दोनों सभ्यताओं का बोझ पड़ता है । मौजूदा राजनैतिक दलों का जो वैचारिक ढांचा है , उसमें इन समूहों की मुक्ति हो नहीं सकती । उनकी मुक्ति के लिए एक नया वैचारिक ढांचा चाहिए । जनता के खंड – विद्रोहों और नए वैचारिक ढांचे के सम्मिश्रण से एक नई राजनीति पैदा हो सकती है ।
वैचारिक संघर्ष बुद्धिजीवी ही करेगा । बुद्धिजीवी का मतलब बुद्धिजीवी वर्ग नहीं है । भारत का बुद्धिजीवी वर्ग अभी मानसिक स्तर पर दोगला ही रहेगा । लेकिन टोलियों में या व्यक्ति के तौर पर बुद्धिजीवी एक नई सभ्यता-निर्माण के लिए प्रतिबद्ध हो सकता है । सारे बुद्धिजीवियों से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वे संगठन या हड़ताल चलायें । लेकिन यह अपेक्षा जरूर रहेगी कि आचरण के स्तर पर वे अपने विचार-संघर्ष को झेलें , ताकि विचारों का सामाजिक प्रभाव बने ।
( स्रोत : सामयिक वार्ता , जनवरी ,१९८२ )

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जैसे – जैसे देश की समस्याएं गहरा रही हैं और समाधान समझ के बाहर हो रहा है , वैसे – वैसे कुछ सोचनेवालों की नजर राजनीति और प्रशासन के परे जाकर समस्याओं की जड़ ढ़ूंढ़ने की कोशिश कर रही है । वैसे तो औसत राजनेता , औसत पत्रकार , औसत पढ़ा – लिखा आदमी अब भी बातचीत और वाद – विवाद में सारा दोष राजनैतिक नेताओं , चुनाव – प्रणाली या प्रशासन के भ्रष्ताचार में ही देखता है । लेकिन , क्या वही आदमी कभी आत्मविश्लेषण के क्षणों में यह सोच पाता है कि वह भी उस भ्रष्टाचार में किस तरह जकड़ा हुआ है । वह यह सोच नहीं पाता है कि वह भी उस भ्रष्टाचार में किस तरह जकड़ा हुआ है । वह यह सोच नहीं पाता कि किस तरह वह खुद के भ्रष्टाचार को रोक सकता है ।

कुछ लोग अपने को प्रगतिशील मानते हैं । वे कहीं-न-कहीं समाजवादी या साम्यवादी राजनीति से जुड़े हुए हैं । कुछ साल पहले तक ऐसे लोग जोश और जोर के साथ बता सकते थे कि आर्थिक व्यवस्था के परिवर्तन से सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा । पिछले वर्षों में उनका यह आत्मविश्वास क्षीण हुआ है । साम्यवादी और समाजवादी कई गुटों में विभक्त हो चुके हैं । उनकी राजनीति के जरिए तीसरी दुनिया का आम आदमी एक नए भविष्य की कल्पना नहीं कर पा रहा है । बढ़ती हुई सामाजिक हिंसा , सर्वव्यापी भ्रष्टाचार , आदमी की अनास्था जैसी समस्याओं को समझने – समझाने में समाजवादी या साम्यवादियों के पुराने सूत्र और मन्त्र विश्वसनीय नहीं रह गये हैं ।

ऐसी स्थिति में कुछ संवेदनशील दिमागों को यह लगने लगा है कि समस्याओं की जड़ में राजनैतिक अनैतिकता नहीं , अथवा नैतिक गलतियां नहीं , बल्कि सभ्यता का संकट है । चर्चाओं में यह बात बार – बार आने लगी है । प्रसिद्ध विचारक डॉ. जयदेव सेठी ने भी ऐसी ही बात कही है । देश के अंग्रेजी में लिखनेवाले विचारकों में उनका प्रमुख स्थान है । पिछले दिनों उन्होंने गांधी का अध्ययन किया है और वर्तमान के लिए गांधी की प्रासंगिकता को सिद्ध किया है । कारण , गांधी ने समस्याओं की चुनौती को सभ्यता के स्तर पर लिया । गांधी ने सभ्यता के स्तर पर एक टकराव की रणनीति भी बनाई थी ।

प्रशासन और सत्ता-राजनीति से परे , अर्थव्यवस्था और उत्पादन-व्यवस्था के परे जा कर सभ्यता के परिवर्तन द्वारा समस्याओं का समाधान ढ़ूंढ़ना ही गहराई में जाना और दीर्घकालिक सोच और रणनीति बनाना है । सोचने के इस ढंग को गम्भीरता से लेने के पहले कुछ सावधानी बरतनी पड़ेगी , क्योंकि भारतीय संस्कृति और समाज में रहनेवाला जब गहराई में जाता है , तब वह इतना डूब जाता है कि उसको ऊपर की दुनिया नहीं दिखाई देती । उसके लिए राजनीति , व्यवस्था , संघर्ष , आन्दोलन सब कुछ अप्रासंगिक हो जाते हैं । वह खुद इस सभ्यता के जंजाल से हट जाता है । महर्षि अरविन्द , सन्त विनोबा , अच्युत पटवर्धन , पंडित रामनन्दन मिश्र जैसे लोग संघर्ष की राजनीति से , समस्याओं से दूर चले गए क्योंकि समस्याओं की जड़ बहुत गहराई में जाकर दीखने लगी । भारतीय संस्कृति में यह एक जबरदस्त अवगुण है कि आदमी को गहराई में ले जाने की प्रक्रिया में वह उसे समाज से ही अलग कर देती है । गांधीजी के साथ ऐसा नहीं हुआ । सभ्यता से टकराने के लिए गांधीजी को सारी तात्कालिक समस्याओं से राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर लड़ना पड़ा । लेकिन , गांधीजी की पचास फीसदी बातें ऐसी हैं , जो एक भारतीय को जड़ और उदासीन बना सकती हैं । खुद गांधीजी व्यवहार में आधुनिक और भारतीय दोनों सभ्यताओं से लड़ रहे थे । लेकिन प्रतिपादन में , लेखन तथा प्रचार में , उनका एक ही निशाना रहा – आधुनिक पश्चिमी सभ्यता । भारतीय सभ्यता और हिन्दू व्यवस्था से उनको हर कदम टकराना पड़ा । मृत्यु भी उसी टकराहट से हुई । लेकिन , हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ बताना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा । यह या तो एक प्रकार का छद्म था , या फिर सन्तुलित विचार की कमी थी । इसी कारण अभी तक एक सन्तुलित गांधी-विचार नहीं बन सका है ।

गांधी का व्यवहार सन्तुलित था , किन्तु उनमें वैचारिक सन्तुलन नहीं था । दूसरे लोग जब आधुनिक सभ्यता से टकराते हैं , अक्सर दोनों स्तर पर सन्तुलन खोते हैं । प्राचीन सभ्यता के कुछ प्रतीकों को ढ़ूंढ़ कर वे एक गुफा बना लेते हैं और उसमें समाहित हो जाते हैं । उनके लिए समस्या नहीं रह जाती है , संघर्ष की जरूरत नहीं रह जाती है । अधिकांश भारतीय बुद्धिजीवी यह नहीं जानते कि हमारी ‘सभ्यता का संकट’ क्या है ? उनका एक वर्ग आधुनिक पश्चिमी सभ्यता को नकार कर या उससे घबराकर प्राचीन सभ्यता के गर्भ में चला जाता है । योग , गो-सेवा या कुटीर उद्योग उनके लिए कोई नवनिर्माण की दिशा नहीं है बल्कि एक सुरंग है , जिससे वे प्राचीन सभ्यता की गोदमें पहुंचकर शान्ति की नींद लेने लगते हैं । बुद्धिजीवियों का दूसरा वर्ग पश्चिमी सभ्यता से आक्रांत रहता है , या घोषित तौर पर उसे अपनाता है । उसको अपनाने के क्रम में पश्चिमी सभ्यता का उपनिवेश बनने के लिए वह अपनी स्वीकृति दे देता है । लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है । हम सब कमोबेश आधुनिक सभ्यता से आक्रांत हैं । उसको आंशिक रूप से या पूर्ण रूप से स्वीकारने की कोशिश करते हैं । लेकिन हमारी रगों में प्राचीन भारतीय सभ्यता का भूत भी बैठा हुआ है । उसके सामने हम बच्चे जैसे भीत या शिथिल हो जाते हैं । वह हमें व्यक्ति या समूह के तौर पर निष्क्रिय , तटस्थ और अप्रयत्नशील बना देता है । जो लोग पश्चिमी सभ्यता को बेहिचक ढ़ंग से अपनाते हैं, वे भी साईं बाबा के चरण-स्पर्श से ही अपनी सार्थकता महसूस करते हैं । सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व न्यायाधीश वी. आर. कृष्ण अय्यर मार्क्सवादी रहे हैं और महेश योगी के भक्त भी हैं । नाम लेना अपवाद का उल्लेख करना नहीं है । यह अपवाद नहीं , नियम है । यह विविधता का समन्वय नहीं है , यह केवल वैचारिक दोगलापन है । दोगली मानसिकता की यह प्रवृत्ति होती है कि वह किसी पद्धति की होती नहीं और खुद भी कोई पद्धति नहीं बना सकती । दूसरी विशेषता यह होती है कि वह केवल बने बनाये पिंडों को जोड़ सकती है , उनमें से किसी को बदल नहीं सकती , उनमें से किसी को बदल नहीं सकती । तीसरी विशेषता यह है कि वह आत्मसमीक्षा नहीं कर सकती । आत्मसमीक्षा करेगी , तो बने-बनाए पिंडों से संघर्ष करना पड़ेगा । इसलिए बाहर की तारीफ से गदगद हो जाती है और आलोचना को अनसुना कर देती है । इसकी चौथी विशेषता यह है कि वह मौलिकता से डरती है । एक दोगले व्यक्तित्व का उदाहरण होगा ,’श्री आरक्षण-विरोधी जनेऊधारी कम्प्यूटर विशेषज्ञ’ !  इस तरह के व्यक्तित्व को हम क्या कहेंगे – ‘विविधता का समन्वय ?’

शेष भाग

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पश्चिम के पर्यावरणवादी आन्दोलन में यूरोपवासियों की यह एक मुख्य चिन्ता है – ‘प्राकृतिक संसाधनों के सीमित भंडारों से हमारा दिन पर दिन बढ़ता उपभोग सीमित न होने पाए और अधिक दिन तक उपभोग के लिए हम बचे रहें ’। रासायनिक खाद के बिना पैदा किए गए अनाज और फलों की अच्छी खासी माँग इन अमीर देशों में पैदा हुई है – यह है उपभोक्तावाद का परिष्कार !

समतावादी नेता किशन पटनायक के अनुसार ,’उनकी उपभोक्तावाद और पर्यावरण की चिन्ताएं गरीब मुल्कों में बढ़ रही भूखमरी और गैरबराबरी का समाधान नहीं ढूंढती हैं ”

इंग्लैण्ड की आन्दोलनकारी मिरियम रोज़ से मैंने किशन पटनायक द्वारा व्यक्त इस चिन्ता की बाबत जानना चाहा।

मिरियम ने बताया कि युरोप के शुरुआती पर्यावरणवादियों को प्राकृतिक संसाधनों की सीमा का आभास था । १९७२ के लगभग जब यह मुद्दा चर्चा का विषय बनने लगा तब सरकारें और सत्ता प्रतिष्ठान काफ़ी सतर्क हो गए । सत्ता – प्रतिष्ठानों ने तब ही से ’ग्रीन-कैपि्टलिज़्म ’ जैसे जुमले उछालने शुरु किए । उपभोग और मुनाफ़ा ज्यों का त्यों बनाए रख कर कम्पनियों की ’सामाजिक जिम्मेदारी ’ की बात शुरु की गई । सत्ता प्रतिष्ठान मुख्य बहस को पचा लेने में काफ़ी हद तक कामयाब रहा । ग्रीन पीस , वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फ़न्ड और फ़्रेन्ड्स ऑफ़ अर्थ जैसी नामी और बड़ी संस्थायें सत्ता प्रतिष्ठानों की इस सोच के अनुरूप ढलती गयीं । तीसरी दुनिया के मुल्कों में चल रहे आन्दोलनों की सूचनाओं की बाबत अमीर देशों के नागरिकों के लिए मुख्य स्रोत यह बड़ी-बड़ी संस्थायें ही रही हैं । गरीब देशों में जिन स्वयंसेवी संस्थाओं को ये मदद देती हैं उनकी गतिविधियों के अलावा उन्हें कुछ दिखाई ही क्यों देगा ? गरीब देशों में पैसे बाँटने वाली स्वयंसेवी संस्थायें पक्षपातपूर्ण होती हैं तथा यह खुद को गरीब देशों के लोगों का प्रश्रयदाता मान कर चलती हैं ।

मिरियम बताती हैं कि बड़ी स्वयंसेवी संस्थायें ग्रीन कैपिटलिज़्म,कम्पनियों द्वारा कथित सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वाह आदि के द्वारा वैश्वीकरण के मानवीय चेहरे के निर्माण में सहयोगी बन गई हैं । इसके बावजूद युरोपीय देशों में भी कई छोटे समूह वैश्वीकरण के विरुद्ध सक्रिय हैं। ’प्लेन स्टुपिड’ नामक एक समूह हवाई अड्डों के विस्तार के खिलाफ़ आन्दोलनरत है। इंग्लैण्ड की ग्रीन पार्टी सुश्री कैरोलिन लुकास को दल की पहली सांसद के रूप में चुनवा कर भेज सकी है।

आबादी के लिहाज से नन्हा-सा देश आईसलैण्ड गत वर्षों में बड़ी उथल-पुथल से गुजरा है। बॉक्साइट न पाए जाने के बावजूद अलुमिनियम बनाने के लिए बड़े बड़े कारखाने खोले गये।इन्हें चलाने के लिए बड़े बांध और बिजली घर बनाए गए।इनका विरोध हुआ।मिरियम भी ’सेव आइसलैण्ड’ आन्दोलन से जुड़कर वहां की जेल की यात्रा का लाभ ले चुकी हैं । इसके सकारात्मक परिणाम भी निकले हैं।उस देश में लेफ़्ट ग्रीन नामक दल काउदय हुआ है जो मौजूदा शासक गठबन्धन का हिस्सा है।

मिरियम की कल्पना है कि  जन-आन्दोलनों का वैश्विक स्तर पर सम्पर्क,संवाद और सम्बन्ध बने।

डॉ. स्वाति तथा मिरियम रोज़

डॉ. स्वाति तथा मिरियम रोज़

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पिछले भाग : एक , दो , तीन , चार

दृढ़ इच्छा के साथ समाधान ढूँढने पर सैकड़ों तरीके निकल सकते हैं लेकिन इस वक्त आम आदमी के अलावा दूसरा कोई समूह भ्रष्टाचार मिटाने के लिए आतुर नहीं है । आम आदमी की आतुरता असहायता में व्यक्त होती है । राजनेता या बुद्धिजीवी समूह अगर आतुर होगा तो उससे उपाय निकलेगा । इस बढ़ते हुए अन्धविश्वास को खतम करना होगा कि भ्रष्टाचार विकास का एक अनिवार्य नतीजा है । विकासशील देशों के सारे अर्थशास्त्री इस अन्धविश्वास के शिकार बन चुके हैं कि मूल्यवृद्धि विकास के लिए जरूरी है । अब भ्रष्टाचार के बारे में इस प्रकार की धारणा बनती जा  रही है । बुद्धिजीवियों की चुप्पी से लगता है वे इसको सिद्धान्त के रूप में मान लेंगे । जवाहरलाल विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री ईश्वरी प्रसाद का कहना है कि विश्व बैंक अपनी रपट और विश्लेषण आदि में इस प्रकार की टिप्पणी करने लगा है कि लोग टैक्स चोरी , रि्श्वत , तस्करी आदि को नैतिकता का सवाल न बनायें , इनको व्यापारिक कुशलता जैसा गुण समझें । विश्व बैंक के साथ विकाशील देशों के प्रतिभासम्पन्न अर्थशास्त्रियों का एक खास सम्बन्ध रहता है । विकासशील देशों के अर्वश्रेष्ठ समाजशास्त्रियों , अर्थशास्त्रियों को विश्वबैंक , अमरीका आदि की संस्थायें बड़ी- बड़ी नौकरियाँ देती हैं । विकासशील देशों के बारे में पश्चिम के विद्वान जिस प्रकार का शास्त्र बनाना चाहते हैं , उसी के अनुकूल निबन्ध और शोध लिखनेवालों को वे प्रोत्साहित करना चाहते हैं । इसलिए जाने-अनजाने विकासशील देशों के विद्वान उन्हीं सिद्धान्तों को पुष्ट करने लगते हैं जो पश्चिम के विद्वानों के मनमुताबिक हों । इस तरह हमारे सर्वश्रेष्ठ विद्वानों के अन्दर भ्रष्ताचार फैला हुआ है । राष्ट्र का मस्तिष्क भ्रष्टाचार का शिकार बनता जा रहा है ।

( स्रोत – सामयिक वार्ता , फरवरी , १९८८ )

आगे : भ्रष्टाचार की बुनियाद कहाँ है ?

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पिछले भाग :  एक , दो

फिजूलखर्ची और विलास

फिजूल खर्च या विलासी खर्च दिखाई देता है , उसका हिसाब किया जा सकता है । रिश्वत , गबन , सार्वजनिक धन की चोरी आदि के लिए विशेष प्रकार के अनुसन्धान और प्रमाणों की जरूरत होती है । भारत जैस गरीब या पिछड़े देशों में भ्रष्टाचार की शुरुआत फिजूल खर्च और विलासी खर्च से होती है । शायद यह बात सारे मानव समाज के लिए सही होगी , लेकिन इस वक्त हम सिर्फ़ एशिया और अफ़्रीका के देशों के लिए यह समाजशास्त्रीय – अर्थशास्त्रीय नियम बता रहे हैं कि जैसे – जैसे इन समाजों में आर्थिक गैर-बराबरियाँ , खासकर जीवन स्तर की गैर-बराबरियाँ बढ़ती जाएँगी , सामाजिक भ्रष्टाचार की मात्रा भी बढ़ती जाएगी । अगर आज के चीन में माओ के जमाने के चीन के मुकाबले में अधिक भ्रष्टाचार है तो कारण यह है कि आज का चीन गैर-बराबरियों को प्रोत्साहित कर रहा है । इन समाजों में एक विचित्र विरोधाभास है – इनकी अर्थनीति जितने किस्म के आराम और विलास का सामान निजी उपभोग के लिए उत्पादन या आयात की इजाजत दे रही है , वह किसके लिए ? सरकारी गजटी अफ़सर , विधायक , जज या मंत्रियों की जो तनख्वाह है या वकील , डॉक्टरों की आय पर जो टैक्स की व्यवस्था है , उस आय के अन्दर पाँच सितारा होटल ,  वातानुकूलित मकान आदि का उपभोग कैसे हो सकता है ? वेतनमान और बाजार में स्पष्ट विरोधाभास है । विलासिता – बाजार का यह दबाव है कि लोग अपने वेतनमान से दो गुना – दस गुना अधिक उपार्जन करें । विलासिता के बाजार को बन्द कर देना , कम-से-कम बीस साल के लिए विलास की सामग्रियों को समाज और बाजार से बहिष्कृत कर देना – एशिया और अफ़्रीका के देशों में भ्रष्टाचार से मुक्ति का एकमात्र तरीका है । इसके बगैर सामाजिक , आर्थिक और राजनैतिक अनुशासन की परम्परा विकासशील देशों में बन नहीं पाएगी । औपनिवेशिक काल में यह अनुशासन खतम हो गया था । पुन: विकास के काल में इन समाजों को स्वस्थ बनाने के लिए सबसे पहले आर्थिक अनुशासन की जरूरत होगी ।

खर्च पर टैक्स लगाने से खर्च रुकेगा नहीं । किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि खर्च पर टैक्स लगाने का विचार एक प्रगतिशील विचार है । जनसाधारण को गुमराह करने के लिए बीच – बीच में इस प्रकार की चर्चाएँ चलाई जाती हैं । औपनिवेशिक प्रभाव वाले समाज में खर्च रोकने का एक ही तरीका है कि खर्चीले सामान को समाज और बाजार से बहिष्कृत कर दो । यह एक आर्थिक नीति होगी , लेकिन यह सचमुच एक सामाजिक नीति है जो राजनीति , संस्कृति , अर्थव्यवस्था – हर क्षेत्र को सशक्त ढंग से प्रभावित करेगी । इस नीति को कारगर बनाने के लिए एक नई संस्कृति का प्रचार आवश्यक होगा । रूस और चीन में खर्च पर काफ़ी रोक लगाई गई थी , क्रान्ति के बाद के अरसे में उनका जो भी विकास हुआ उसके पीछे खर्च रोकने की नीति का एक मौलिक योगदान है । शास्त्र और ग्रंथ लिखनेवालों ने अभी तक इसको महत्व नहीं दिया है । कम्युनिस्टों ने इस नीति को दीर्घकाल तक स्थायी बनाने के लिए कोई संस्कृति पैदा नहीं । मार्क्स ने एक नई मानव-सभ्यता का वायदा किया था , एक नई संस्कृति होगी जिसमें मनुष्य की प्रवृत्तियाँ भी बुर्जुआ समाज के मनुष्य से भिन्न होंगी । कम्युनिस्टों ने ऐसी संस्कृति बनाने की दिशा में  कोई प्रयास भी नहीं किया । वे भौतिकवाद के दबाव में आकर अमरीकी नागरिक को आदर्श मानने लगे ।रूस के बाद अब चीन भी कहता है कि हम इतने साल के अन्दर अमरीका के समकक्ष हो जाएँगे । जो आर्थिक बराबरी क्रान्ति के फलस्वरूप आई थी उसको भी नष्ट करने में रूस और चीन लगे हुए हैं ; क्योंकि एक नया जीवन दर्शन , एक नई संस्कृति का निर्माण वे कर नहीं सके ।

( जारी , अगला भाग : प्रशासनिक सुधार )

यह भी देखें : राजनीति में मूल्य : किशन पटनायक

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आजादी के बाद से सबसे अधिक चर्चा का विषय भ्रष्टाचार है । गरीबी , बेरोजगारी , महँगाई , सीमा सुरक्षा या क्रिकेट से भी अधिक चर्चा का विषय भ्रष्टाचार है । देश का कोई भी वर्ग नहीं है जो इससे विचलित नहीं है। फिर भी हमारे बुद्धिजीवियों ने इसको एक खोज का विषय , सामाजिक चिन्तन का विषय नहीं बनाया। जानकार व्यक्तियों से हमने पूछा कि इस विषय पर लिखी गई किसी किताब का नाम बताएँ । उन्होंने कहा कि ऐसी कोई किताब नहीं है जो भ्रष्टाचार की व्यापकता और उसके कारण तथा प्रतिकार से सम्बन्धित हो। एक-दो किताबें हैं ( ज्यादा भी हो सकती है ) जिनमें भ्रष्टाचार की घटनाओं का विवरण है ; विभिन्न जाँच आयोगों की रपटों पर यह किताबें आधारित हैं । प्रशासनिक सुधार के उद्देश्य से एक संथानम आयोग नियुक्त हुआ था । प्रशासनिक दायरे में लिखी गई यह रिपोर्ट अभी तक भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में सर्वाधिक प्रसिद्ध दस्तावेज है । इसी तरह बाद के दिनों की बोहरा कमेटी की रिपोर्ट है ।

भारत पर लिखने वाले विदेशी बुद्धिजीवियों को हमने ढूँढ़ा तो एक दशक पहले लिखा गया स्वीडेन के अर्थशास्त्री गुन्नार मिर्डल (अर्थशास्त्र के नोबल पुरस्कार विजेता) का विशाल ग्रंथ एशियन ड्रामा मिला । दक्षिण एशिया के राष्ट्रों की गरीबी और उसके कारणों को समझने के लिए ग्रंथ लिखा गया था । मिर्डल को हम यह श्रेय देते हैं कि भ्रष्टाचार की समस्या पर उन्होंने एक स्वतंत्र अध्याय लिखा है ( अध्याय २० , भाग – २)। मिर्डल ने भी यह टिप्पणी की है कि भारत पर लिखनेवाले देशी-विदेशी बुद्धिजीवियों ने इस समस्या पर चिन्तन या विश्लेषण की कोई किताब नहीं लिखी है ।

इस कमी का का जो भी कारण मिर्डल की समझ में आया हो , हमारे लिए इसका एक कारण बहुत स्पष्ट है । भारतीय बुद्धिजीवियों ने नहीं लिखा है तो उसकी एक वजह यह है कि पश्चिमी बुधिजीवियों ने अभी तक भ्रष्टाचार की समस्या को एक विषय नहीं बनाया है और इस विषय पर सोचने का कोई तरीका पेश नहीं किया है। न ही किसी विदेशी संस्था ने इस विषय पर अनुसंधान के लिए अनुदान दिया है । इन दिनों भारतीय अनुसंधान का विषय काफ़ी हद तक अनुदान देनेवाली विदेशी संस्थाओं द्वारा निर्धारित होता है । जहाँ तक विदेशी बुधिजीवियों द्वारा किताब न लिखने का सवाल है , आजकल विदेशी बुद्धिजीवियों का जो हिस्सा एशिया के देशों पर किताब लिखता है , वह उच्च कोटि का नहीं होता । इन विदेशी बुद्धिजीवियों की दृष्टि में एशिया के लोग पश्चिम के लोगों से घटिया होते हैं , इसलिए भ्रष्टाचार जैसी चीजें उनके लिए स्वाभाविक हैं, पारम्परिक हैं । ये लोग ’विकास’ को एक विशेष अर्थ में समझते हैं ,और इस विकास के चलते अगर महँगाई , बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं तो उन्हें विकास के लिए आवश्यक भी मानते हैं । (मनमोहन सिंह द्वारा हाल ही में लोक सभा में ’विकास’ बनाम मंहगाई और भ्रष्टाचार की बाबत  ऐसी बकवास किए जाने को सुनकर किशनजी के इन शब्दों को मैंने बोल्ड किया है – अफ़लातून। )

इस प्रकार के विदेशी बुद्धिजीवियों के मुकाबले में काफ़ी ऊँचे दरजे का विचारक होने के बावजूद मिर्डल की दृष्टि बहुत साफ़ नहीं है , एक स्थान पर वह कहता है कि एशिया के देशों में भ्रष्टाचार की एक परम्परा है, इसी अध्याय के दूसरे स्थान पर कहता है कि यूरोप के देशों में काफ़ी पहले इस पर काबू पा लिया गया है । ऐसी मान्यता के कारण मिर्डल कोई समाधान नहीं सुझा पाता । लेकिन उसने भ्रष्टाचार को एक मौलिक समस्या का दरजा दिया है क्योंकि एशिया के देशों में रजनैतिक हलचल का और गद्दी पलटने का सबसे बड़ा मुद्दा यही है । यह तानाशाही के मार्ग को भी प्रशस्त करता है , आर्थिक क्षेत्र में भी इसका दुष्परिणाम निर्णायक होता है , विकास की योजनाओं का कार्यान्वयन सम्भव नहीं हो पाता है। ( जारी , अगला हिस्सा- राजनैतिक दल और भ्रष्टाचार ).( यह भी देखें : राजनीति में मूल्य : किशन पटनायक )

 

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