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Archive for the ‘Uncategorized’ Category

… अब आखरी सवाल रह जाता है दखल वाला कि जीवन के ऐसे कुछ दायरे होने चाहिए कि जिनमें राज्य का,सरकार का,संगठन का,गिरोह का ,दखल न हो।जिस तरह हमारे जमीन की बेदखालियाँ हो जाती हैं,उसी तरह सरकार और राजनीतिक पार्टियां हमारे जीवन में बेदखालियाँ कर डालती हैं।कभी-कभी सोशलिस्ट पार्टी के लोगों के मन में भी आ जाया करता है कि वे व्यक्ति के जीवन में बेदखलियाँ शुरू कर दें।मान लो आदमी सार्वजनिक पैसा खा लेता है तो उसमें दखल देना समझ में आता है। लेकिन मान लो कोई आदमी है,मिसाल देने में झंझट भी खड़ी हो जाती है,कई लोग तिलमिला उठेंगे, पुरानी धारणाएं हैं इस कारण।वह मिसाल न लेकर हम दूसरी मिसाल लेंगे।जैसे,जब यह निश्चित हो जाए कि कोई आदमी मरने ही वाला है,एक नहीं कई डॉक्टर इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं,तो क्या उस आदमी को यह अधिकार होना चाहिए कि वह कोई ऐसी सूई लगवा कर खत्म हो जाए और डॉक्टर का ऐसी सूई देना उचित है क्या? विशेष रूप में,ऐसी बीमारी में,जिसमें महीनों ही नहीं,बरसों रगड़ा लगता है,जिसमें बीमार ही नहीं,उसके घर वाले भी तबाह होते हैं । ऐसी चीज को दया-हत्या बोलते हैं।दया-हत्या का ऐसा दायरा है जिस पर सोच विचार करना चाहिए।मैं अपनी कोई आखिरी राय नहीं दे सकता।लेकिन आत्महत्या के बारे में तो मेरी पक्की राय है की हर मर्द-औरत को हक़ होना चाहिए कि वह अपनी जान ले ले।इसमें दूसरे को दखल देने का क्या हक है।लेकिन कई देशों में इसके खिलाफ कानून बने हुए हैं।अगर आत्महत्या करने में कोई सफल हो जाए तब तो ठीक है,और अगर असफल हो जाए तो ऐसा सिलसिला चलता है कि क्या कहने।बहुत कम ऐसे बेवकूफ जज होंगे जो दो-चार महीने की सजा दे दें।

इस मिसाल के अलावा और भी हैं जैसे घर मे कैसे रहें,शादी-विवाह के मामले-इन सबको लेकर राजनैतिक पार्टियों और सरकार को दखल नहीं देना चाहिए।किस राजनैतिक पार्टी में कोई रहे ,सरकार के नौकर भी,इसमें भी दखल नहीं होना चाहिए।ये कुछ बातें मैंने सिर्फ गिना दी हैं।असल में इन्हें उदाहरण स्वरूप ही लेना।इनके पीछे तर्क या सिद्धांत यह है कि व्यक्ति के जीवन में राज्य या राजनैतिक पार्टी को दखल देने का हक नही होना चाहिए ।हर एक व्यक्ति को एक हद तक अपने जीवन को अपने मन के मुताबिक चलाने का अधिकार होना चाहिए।हो सकता है कि वह उस अधिकार का दुरुपयोग करे।लेकिन जब उस अधिकार को मान लेते हैं और दुरुपयोग होता है तो क्या कर सकते हैं,सिर्फ अपना मुंह मटका के रह जाओ और क्या किया जा सकता है? उस पर ज्यादा चर्चा भी नहीं करनी चाहिए। समाज का गठन वैसा बन जाएगा तो उस पर चर्चा भी बहुत नहीं होगी।यूरोप के देशों में इन सब चीजों पर लोग चर्चा भी नहीं किया करते और कहीं करते भी हैं तो सैद्धांतिक तौर पर कर करा लिया करते हैं।रूस और अमेरिका का मुकाबला करें तो,मुक़ाबलतन,ऐसा नहीं कि रूस को मैं कोई प्रमाणपत्र दे रहा हूँ,रूस अच्छा है।अमरीका और फ्रांस भी इस दखल वाले मामले में अच्छे हैं।

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…सातवीं क्रांति का लक्ष्य समूह के हस्तक्षेप से व्यक्ति के निजी जीवन की रक्षा करना है। संगठन लगातार व्यक्ति की स्वतंत्रता का अपहरण करता रहा है।इसका यह मतलब नहीं कि व्यक्ति के महत्त्व और कल्याण में जरूरी तौर पर कमी आई है।वास्तव में उसका महत्व भी बढ़ा है,हालत भी सुधरी है,खास तौर पर उन्हीं इलाकों में जहां स्वतंत्रता में कमी आई है।व्यक्ति का कल्याण और सुख,शिक्षा और स्वास्थ्य,और उसका आराम भी,दरअसल उसके जीवन और विचार का बड़ा हिस्सा विभिन्न प्रकार की योजनाओं का विषय बन गया है।यह नियोजन साम्यवादी देशों में अधिक कठोर है, लेकिन संगठनात्मक बाध्यता का एक तत्व हर जगह मौजूद है।व्यक्ति की स्वतंत्रता की क्रांति पर विचार करते हुए हमें भलाई के लिए आयोजन संबंधी अपने युग की ख़ासियत को ध्यान में रखना चाहिए।

सरकारी आयोजन का लक्ष्य हमेशा भलाई करना ही होता है।उसमें अगर कोई बुराई पैदा होती है तो अनिच्छित और प्रासंगिक परिणाम के रूप में।इस बुराई की जड़ बाध्यता में होती है।जब लोगों को मजबूर किया जाता है कि वे बुरे की जगह अच्छे को चुनें, तो अनिवार्य ही उसके कुछ बुरे परिणाम निकलते हैं।अच्छाई के विभिन्न प्रकार होते हैं और उनमें अलग अलग प्राथमिकताएं होती हैं।लेकिन इसके अलावा,क्या अच्छा है और क्या बुरा,यह बात हमेशा इतनी साफ नहीं होती जितनी योजनाएं बनाने वाले सोचते हैं।इसके अतिरिक्त सुरुचि,विवेक,ज्ञान और समझ का विकास ज्यादा अच्छा होता है जब चुनाव करने और गलती करने की आजादी होती है।जिन देशों में सरकारी नियोजन नही है,वहां निजी मुनाफे के संगठनों के भी लगभग वैसे ही परिणाम निकलते हैं।वरण की सारी घोषित स्वतंत्रता के बावजूद,जिन देशों में सरकारी नियोजन नहीं है,वहां भी शिक्षा,सूचना और मनोरंजन एक खास स्वीकृत दायरे के अंदर ही रहते हैं।इसके अलावा,इनका ज्यादा और नीचा एयर एकरसता-भर स्तर ही आमतौर पर चलता है।लक्ष्य चाहे मुनाफा हो या कोई आदर्श,संगठन व्यक्ति को बाध्य करते हैं।यद्यपि इससे इनकार करना व्यर्थ है कि तानाशाही बाध्यता ज्यादा गहरी और चतुराई भरी होती है।

भलाई करने का संगठित प्रयत्न हमारे युग की खासियत है।जो बिल्कुल पूंजीवादी समाज हैं,उनमें भी किसी प्रकार वे बेकारी भत्ते या बीमारी-बीमे की व्यवस्था जरूरी हो गई है।जिन क्षेत्रों या उद्योगों की ओर निजी पूंजी आकर्षित नहीं होती,उनमें राज्य का पूंजी लगाना भी काफी आम बात हो गई है।इसलिए ऐसा माना जा सकता है कि भलाई के उद्देश्य से नियोजन और बढ़ेगा।इसके साथ निजी जीवन में हस्तक्षेप भी बढ़ेगा।

क्या निजी हैऔर क्या सार्वजनिक इसकी परिभाषा करना आसान नहीं है।बहुत कुछ देश और पीढी की मान्यताओं पर निर्भर होता है।लेकिन बाध्यता और सार्वजनिकता के वातावरण से अलग स्वतंत्रता और निजता के वातावरण को पहचानना उतना मुश्किल नहीं।

सोवियत रूस में जो इस समय हो रहा है,वह इस संदर्भ में एक प्रवृत्ति के रूप में महत्वपूर्ण है।आज संगीत और अमूर्त चित्रकला की संगठन द्वारा जितनी आलोचना होती है,उतना ही कुछ निजी क्षेत्रों में उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है।कवि और उपन्यासकार गाने या रोने की स्वतंत्रता माँग रहे हैं।किसी दिन ये सभी क्षेत्र निजी मान लिए जाएंगे जिन्हें राज्य या संगठन के हस्तक्षेप से बचाया जाए।इसके साथ ही संपत्ति सबंधी कुछ रूढ़ धारणाओं में भी ढीलापन आ रहा है।

गोरे लोगों के बीच यही असली बहस चल रही है।उनमें जो लोकतंत्र के समर्थक हैं उनका आग्रह है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकार करने पर किसी-न-किसी रूप में निजी संपत्ति और उसके पुरस्कार को भी मान्यता देने होगी।लेकिन तर्क की दृष्टि से संपत्ति और व्यक्ति-स्वातंत्र्य के बीच कोई सीधा संबंध आवश्यक नही प्रतीत होता।व्यवहार में संपत्ति के साम्यवादी स्वामित्व के फलस्वरूप बच्चे पैदा करने से लेकर भाषण देने तक सभी प्रकार के संबंधों में निजी जीवन में हस्तक्षेप हुआ है।अतः ख़तरे के ये संकेत हमेशा रहेंगे।निजी जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को उन सभी क्षेत्रों में स्वीकार करना होगा जिनका संपत्ति से कोई सीधा संबंध नहीं है।आधुनिक जीवन में पारस्परिक संबंध दरअसल इतने पेचीदा हैं कि सीधी या सरल परिभाषाओं से काम नहीं चल सकता।मिसाल के लिए घरेलू प्रबंध या मनोरंजन में निजी जीवन की स्वतंत्रता का संपत्ति की व्यवस्था पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।तब क्या किया जाए? हमें जोखिम उठाने को तैयार रहना चाहिए।मिसाल के लिए संपत्ति की व्यवस्था अगर प्रभावित नही होती ,तो इस आधार पर निजी जीवन मे हस्तक्षेप की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए कि निजी संपत्ति की भावना को प्रोत्साहन मिलता है।

(यह लेख डॉ लोहिया की अंग्रेजी किताब ‘ मार्क्स,गांधी एन्ड सोशलिज्म’ की भूमिका से उनके निकट साथी ओमप्रकाश दीपक द्वारा अनुदित है।लेख उन्होंने 1963 में लिखा था।अनुवाद 1970 में प्रकाशित हुआ।लोहिया का यह अंतिम लेख है।)

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बहुत लंबे इंतजार के बाद नया युग आरंभ हुआ है

अब सुबह समय से होती है और प्रफुल्लित वातावरण में

वैसी ही हवा बहती है जैसी

अंधकार युग के विदा होने के बाद बहनी चाहिए

 

जिसके फलस्वरूप फूल खिलने लगे हैं

फसलें लहलहाने लगी हैं चिड़ियां गाने लगी हैं।

 

जिन्हें रास्ते से हटाना था हटा दिया गया है

जिन्हें रास्ते पर लाना था ला दिया गया है

सारे रास्तों की सारी बाधाएं दूर कर दी गई हैं

अब जाकर विकास ने पकड़ी है रफ्तार।

विकास इतना तेज चल रहा है कि लोग पीछे छूट जाते हैं

मगर उन्हें उनके हाल पर छोड़ नहीं दिया गया है

उन्हें विकास से जोड़ने के लिए कमेटियां

और योजनाएं बना दी गई हैं

और उन्हें बुलाकर या लाकर

जगह-जगह संबोधित भी किया जाता है।

 

विकास के रफ्तार पकड़ने के साथ ही

या उसके पहले से

आंकड़े एकदम दुरुस्त आने लगे हैं

अब आंकड़े जान लेने के बाद अलग से

सच्चाई जानने की जरूरत नहीं रहती।

 

जिसे वापस लाना था ला दिया गया है

जिसे भगाना था भगा दिया गया है

जिसे डराना था डरा दिया गया है

जिसे बचाना था बचा लिया गया है

कीमतों पर काबू पा लिया गया है

वे लोग काबू में हैं जिनकी कुछ कीमत है

जिसकी अभी -अभी कीमत लगी

उसकी खुशी देखते ही बनती है

बाकी यह सोचकर मुस्कराते हैं

कि मायूस दिखने से रही-सही कीमत भी जाती रहेगी।

 

इस तरह बने चतुर्दिक खुशनुमा माहौल में

नकारात्मक नजरिए के लिए गुंजाइश ही कहां बचती है

अब ना कहने के लिए बहुत हिम्मत जुटानी पड़ती है

सकारात्मक सोच का जोश इस कदर हावी है

कि घोषणा होती ही काम हुआ मान लिया जाता है

आश्वासन मात्र से होता है प्राप्ति का अहसास

वर्णन मात्र से छा जाता है संबंधित वस्तु के होने का विश्वास।

 

इस नवयुग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ऊंची-ऊंची कुर्सियों पर पहली बार ऐसे लोग बिठाये गए हैं

जिनका कद पद के अनुरूप है जिनको काबिलियत पर

शक नहीं किया जा सकता जो भरोसे के काबिल हैं

जो अलिखित निर्देशों को भी पढ़-समझ लेते हैं

और उन पर अमल करने को तत्पर रहते हैं

जिन्हें स्वयं सोचने की इच्छा या अवकाश नहीं

इसलिए जिनसे गलतियां नहीं होतीं और जो अपराध-बोध से दूर

सदा प्रसन्न रहते हैं बड़े फख्र से कहते हैं

हमारी अमूल्य सेवाओं के लिए

एक ही पुरस्कार पर्याप्त है

कि हमें निजाम में असीम निष्ठा रखने का

परम सौभाग्य प्राप्त है।

  • राजेन्द्र राजन
  • सभार-‘गांव के लोग’ से

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सन 1952 में मैं ‘साम्ययोगी विनोबा’ नामक पुस्तक की तैयारी कर रहा था। उसी सिलसिले में मैं एक सूची बना रहा था – विनोबा कितनी भाषाएं जानते हैं, कितने धर्मों का अभ्यास,उन धर्मों के मूल ग्रंथों के  मार्फत उन्होंने किया है,उन्होंने किस-किस प्रकार के शारीरिक परिश्रम के काम किए हैं आदि। इस सूची में कहीं कोई गलती न रह जाए,इसलिए वह सारी जानकारी जांच के लिए विनोबा को दे दी।शरीर-परिश्रम के कामों की सूची खासी लंबी थी।किसान,बुनकर,रंगरेज,धोबी,बढ़ई,लुहार,पत्थर तोड़ने वाले आदि अनेक प्रकार के श्रमजीवियों के साथ विनोबा अपने जीवन का तार मिला चुके थे।

इस सूची को देखकर विनोबा ने कहा”इसमें एक मजदूरी का उल्लेख नहीं आता।”भाषा ज्ञान की सूची में मैंने ऐसी भाषाएं शामिल की थीं,जिनको विनोबा को थोड़ा परिचय था,लेकिन पूरा ज्ञान नहीं था,इसलिए उस सूची को संक्षिप्त करने का उन्होंने प्रयत्न किया था। लेकिन वही विनोबा शरीर परिश्रम की सूची बढ़ाने के लिए कह रहे हैं,इससे मुझे आश्चर्य हुआ।मैंने पूछा-कौन-सी मजदूरी बाकी रह गई?

विनोबा ने बड़ी गंभीरता से कहाः मैंने लिखने की मजदूरी की है,उसे तुमने सूची में नहीं लिखा है।मुझे लगा कि विनोबा विनोद कर रहे हैं।पर विनोद करते समय उनके चेहरे पर जिस प्रकार की रेखाएं उभरती हैं,वे इस समय नहीं थीं।

मैंने पूछा कि लिखना क्या मजदूरी कही जा सकती है?

” जिससे हाथ में आंटन (गांठ),भट्ट पड़ जाए,वह काम शरीर परिश्रम का गिना जाएगा या नहीं?” विनोबा ने पूछा।मैंने कहा,”जी हां,वह तो जरूर गिना जाएगा।”

“तो देखो,मेरी ये उंगलियां!इसमें आंटन पड़ गए हैं।उंगलियों की पोर थोडी सख्त हो गई है।आज से 38 वर्ष पहले मैंने जो लिखा,उसके कारण ऐसा हुआहै।”

“आज से 38 वर्ष पहले।” विनोबा की जीवनी लिखने वाले की हैसियत से मुझे इस बात में ज्यादा दिलचस्पी थी।उस समय आपको ऐसा क्या लिखना पडा था?”

“उस समय मैं कविता लिखता था।कविता लिख-लिख करके ही मेरे आंटन पड़े हैं” विनोबा हंस कर बोले।

इतनी सारी कविताएं।मिल जाएं तो एक बहुत बडा काम हो जाए। मैंने पूछा- “ये कविताएं आज कहां होंगी?”

“ये काव्य मैंने काशी में गंगा के किनारे लिखे थे।इनमें से जिनके बारे में मुझे समाधान नहीं था,जो मुझे ठीक जंचे नहीं,वे तो मैंने अग्नि को समर्पित किए और जिनके बारे में समाधान था,वे मैंने गंगाजी में बहा दिए थे।”

मैं चकित होकर सुनता रहा।ये काव्य प्रसिद्धि के लिए नहीं लिखे गए थे,प्रशस्ति के लिए भी नहीं लिखे गए थे।पाठ के लिए भी नहीं लिखे गए थे।गीता का अनुवाद करने के लिए मां रुक्मिणीबाई ने कहा था।बस उसके अभ्यास के तौर पर एक ओर गीता को जीवन में उतारने का प्रयास शुरु किया और दूसरी ओर व्याकरण,काव्य शास्त्र इत्यादि का अभ्यास।ये काव्य तो स्वान्तः सुखाय लिखे गये थे।विनोबा के लिए साहित्य मनोरंजन या शोक का विषय नहीं है,जीवन साधना का एक साधन है।

विनोबा की संपूर्ण साहित्य साधना एक वांगमय तप ही बनी है।मां की इच्छा थी कि उनका बेटा श्रीमदभगवद्गीता का मराठी अनुवाद करे।मां की यह इच्छा मां की मृत्यु के बाद पूरी हुई।इस अनुवाद को विनोबा ने नाम दिया गीताई और उसकी प्रस्तावना एक अनुष्टुप में कीः गीताई माऊली माझी,मी तिचा बाल नेणता,पडता रडता थेई उचलून कडेवरी।

विनोबा मानते हैं कि यदि ईश्वर ने उनके पास से दूसरी कोई और सेवा नहीं कराई होती और गीताई ही लिखाई होती तो भी ये अपने कृतकृत्य मानते।मराठी और संस्कृत भाषा के विशेषज्ञ गीताई के साहित्यिक गुणों पर मुग्ध हैं।उत्तर भारत की अधिकांश भाषाओं में गीता के समश्लोकी अनुवाद सुने हैं।पर गीताई में जो ओज है,सरलता और शुद्धता का जो मेल है,वैसा दूसरे किसी भाषांतर में मन्हीं मिलता। मराठी भाषियों में विनोबा की इस पुस्तक की लोकप्रियता असाधारण है।अब तक गीताई की 40 लाख से ऊपर प्रतियां छप चुकी हैं।

नोआखली में पदयात्रा करते समय गांधीजी से किसी अमेरिकी पत्रकार ने संदेश मांगा था। 79 वर्ष की उम्र विद्यार्थी के रूप में गांधीजी उस समय बंगाली भाषा सीखते थे।उन्होंने बंगाली में लिखकर संदेश दिया’आमार जीवन इ आमार वाणी।”

विनोबा पर भी यह वाक्य अक्षरशः लागू होता है।उनका जीवन ही उनकी वाणी है,और उनकी वाणी ही उनका जीवन है।

इस वांगमयी तपास,खोज के आरंभ की तपस्या कठोर थी।दिन के हर क्षण का निश्चित हिसाब पसीने से सराबोर हो जाए,इतना परिश्रम,बुजुर्ग ज्ञानियों को भी मात करे,अभ्यास की ऐसी गहराई-ये विनोबा की आरंभिक तपस्या के क्षण थे।उनके आरंभकाल के साहित्य में यह तेजस्विता और साथ-साथ थोड़ी कठोरता की झलक मिलती हैं। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध कवि मामा वरेरकर के शब्दों में कहूं तो ‘उनकी भाषा में मिठास थी थी,लेकिन यह मिठास मिश्री जैसी सख्त थी।जीवन के प्रौढ़काल  में यह मिठास अंगूर की तरह रसीली बन गई।’

विनोबा वांगमय एक विशाल सागर जैसा है।विनोबा ने जो कुछ लिखा और आगे आगे चलकर जो कुछ बोला, वह साहित्य की एक विशिष्ट निधि बन गया है।

आज लोग यद्यपि उन्हें एक आन्दोलन के नेता और क्रांतिकारी संत के रूप में ही जानते हैं पर उनका साहित्यकार का रूप भी कम लुभावना नहीं है।

स्वयं विनोबा द्वारा लिखी गई और उनके प्रवचनों के आधार पर तैयार की गई पुस्तकों की कुल संख्या पचासों में है। उनके विचारों में हमें एक निष्पक्ष,सजीव और मौलिक दिशा मिलती है।

[नारायण भाई ने यह लेख सन 1965 में लिखा था।]

 

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आज अपराह्न में भदैनी, वाराणसी स्थित तुलसी पुस्तकालय में चर्चित और प्रखर कवि राजेन्द्र राजन ने अपनी लगभग बीस कविताओं का पाठ करके यह स्पष्ट कर दिया कि सरल सहज भाषा में सभी कुछ इतनी तीव्रता के साथ व्यंजित किया जा सकता है कि फ़िर और किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं पड़ती। निश्चय ही कुछ कविताएं एक-दो दशक पहले से हमारे सामने आ रही हैं, पर वे वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक संदर्भों और राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में इतनी ताजगी लिए हुए हैं, मानों उन्हें अभी-अभी कहा गया हो।

 

इस एकल काव्य कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति ने कहा कि कवि ने विद्रूपता के किसी भी कोने को छोड़ा नहीं है। सत्ता और ताकत से सम्पन्न शासक-वर्ग के मन की कुरूपता को यदि नग्न किया है तो उस जनता को भी नहीं छोड़ा है, जो विजेता के पक्ष में होने के सुखद अहसास को महसूस करना चाहती है। कवि ने स्वयं को भी नहीं छोड़ा है, जो अपनी ज़िन्दगी को चलाने के लिए दूसरों के द्वारा दिए गए विषय पर सोचता है और दूसरों के द्वारा निर्धारित भाषा में सुर में सुर मिलाकर बोलता है; और कवि ऐसा पेड़ हो गया है, जो छाया फ़ल और वसंत की अनुभूति देने में सक्षम नहीं रहा। कवि शब्दों को भी नहीं छोड़ता है क्योंकि फूल, पहाड़, नदियों का सौन्दर्य और बाकी सब कुछ शब्दों से ढंका हुआ है और वह वास्तविक सौन्दर्य को नहीं देख पाता है।

 

श्रेय पाने की लिप्सा में पहले के लोगों की कोशिशों को नकार दिया जाए और नया इतिहास लिखने की कोशिश हो, इससे कवि सहमत नहीं है। इतिहास में जगह बनाने के लिए आतुर लोग जानते हैं कि इतिहास में कितनी जगह है, अत: वे अपनी जगह बनाने के लिए एक-दूसरे को धकियाते हैं। मज़े की बात है कि कुछ लोग अपनी छोटी-सी जगह पर इस कारण चुप रहते हैं कि उनसे वह जगह भी न छिन जाए। ‘विकास’ में विकास के नाम पर सभी प्राकृतिक अवदानों के कम होते जाने पर और ‘नया युग’ असहमत लोगों को हटाने मात्र से विकास का अहसास कराए जाने की कुत्सित चेष्टा को सामने लाती है। ‘प्रतिमाओं के पीछे’ में स्वयं के वास्तविक रूप को छिपाने की चेष्टा करने वालों पर तीखी टिप्पणी है। ‘ताकत बनाम आज़ादी’ में निस्सार सत्ता-सुख में डूबे लोगों को आज़ादी के सुख को याद दिलाया गया। ‘छूटा हुआ रास्ता’ और ‘लौटना’ कविताओं में कवि अपने वास्तविक व्यक्तित्व के क्षय से पीड़ित होता है और लौटना चाहता है।

 

तालिबान द्वारा ‘बामियान में बुद्ध’ की विशालकाय मूर्तियों को तोड़ा जाना कवि को आहत करता है और उसे खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान याद आते हैं, जो बुद्ध की तलाश में बामियान में भटक रहे हैं। ‘बाजार में कबीर’ कबीर अपनी चादर इसलिए नहीं बेच पाते हैं क्योंकि वह किसी कंपनी का नहीं है। उस चादर का खरीदार नौकरशाहों द्वारा संचालित कंपनी-अधिनियम और राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चमक में कबीर को भला कैसे खोज पाएगा। ‘मनुष्यता के मोर्चे पर’ इस विडंबना को सामने लाती है कि आदमी ज़िन्दगी में उठने के लिए गिरता है और ऐसी स्थिति में कवि आत्मकेन्द्रित होता चला जाता है। ‘हत्यारों का गिरोह’ कविता उस षड्यंत्र को नग्न करती है जो संवेदनशून्य-तंत्र नित्य हमारे आस-आस रच रहा है। ‘तुम थे हमारे समय के राडार” कविता में कवि ने समाजवाद के पुरोधा और अपने गुरु किशन पटनायक जी को शिष्य के रूप में तथा अहोभाव से याद किया है।

 

 

कार्यक्रम के आरंभ में संजय गौतम ने बताया कि किस प्रकार राजेन्द्र राजन ने स्वयं को विचारधाराओं और संगठनों की सीमाओं से बचाए रखा और शब्दों के अर्थ को सुनिश्चित करते हुए आज के समय की प्रत्येक मूर्त और अमूर्त घटना और समस्या को पैनी निगाह से देखा है। इसीलिए उनकी कविताएं उद्वेलित करती हैं। कवि एवं आलोचक राम प्रकाश कुशवाहा ने राजेन्द्र राजन की कविताओं पर विशद टिप्पणी की। कार्यक्रम के संचालक अफ़लातून ने छात्र-जीवन मे राजेन्द्र राजन द्वारा लिखी गयी कविताओं का उल्लेख करते हुए बताया कि किस प्रकार उनकी कविताएं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र-आंदोलनों में अपनी भूमिकाएं निभाती रहीं। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए चंचल मुखर्जी ने कहा कि राजन की कविताओं से उन्हें अपने सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यों में सदैव सहयोग मिला है। – राजेश प्रसाद

रामप्रकाश कुशवाहा :

वरिष्ठ कवि ज्ञानेंद्रपति की अध्यक्षता में सम्पन्न सामाजिक परिवर्तन के लिए लिखने वाले अति-महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कवि राजेंद्र राजन की कविताओं का एकल पाठ अस्सी(भदैनी)स्थित तुलसी पुस्तकालय के सभागार में दो अक्टूबर को गाँधी जयंती के दिन संपन्न हुआ..नगर में तीन कार्यक्रमों में बंटे होने के बावजूद पर्याप्त संख्या में साहित्यप्रेमी स्रोतागण राजेन्द्र राजन की कविताएँ सुनने तुलसी पुस्तकालय पहुंचे .इस अवसर पर राजेंद्र राजन नें
अपनी चुनीहुई श्रेष्ठ कविताएँ -‘इतिहास में जगह’, ‘बामियान में बुद्ध’ ,’श्रेय ‘,’हत्यारे ‘ ‘पेड़’,’ विजेता की प्रतीक्षा.’,’इतिहासका नक्शा;,’नयायुग’,’बाजार’ ,’प्रतिमाओं के पीछे’,’लौटना तथा ,’छूटा हुआ रास्ता ‘ आदि का पाठ किया.
श्रोताओं नें राजन की नए ज़माने के कबीर रूप को खूब पसंद किया .उनकी बाजार में खड़े कबीरऔर शेयर बाजार के प्रतीक सांड को आधार बनाकर लिखी गयी कविता बहुत पसंद की गयी..काव्यपाठ के बाद विशेषज्ञ वक्तव्य देते हुए मैंने उन्हें इतिहस के निर्णायक मोड़ों और क्षणों की शिनाख्त करने वाला कवि बताया.उनकी बाजार कविता बाजार की नैतिकता की पड़ताल करती है.शेयर बाजार का प्रतीक-चिन्ह सांड बाजार के अस्थिर चरित्र पर प्रकाश डालता है. बामियान में बुद्ध कविता सौन्दर्य,सम्मान एवं करुणा कीभाषाको मिटाकर हिंसा की लिखी जा रही नयी इबारत को अंकित करती है .अंततःमहत्त्व धर्म के सम्मान का नहीं मनुष्य के सम्मान का है.यह कविता ऐतिहासिक चरित्रों को मानवता के पक्ष में नैतिक मूल्यों के प्रतिमान के रूप में प्रस्तुत करती है.
. राजेंद्र राजन की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति नें कहा कि –
‘राजेन्द्र राजन कविता की कबीरी परंपरा में हैं.वे किसी को भी नहीं छोड़ते हैं-विजेताओं और जनता को भी नहीं छोड़ते -स्वयं को भी नहीं.राजेंद्र राजन के यहाँ कविता आत्मा के रूप में बची हुई है .पेड़ नहीं बन पाने की पीड़ा या अहसास इन की काव्यालोचना को आत्मिक आधार देता है. उनका कवि उस मनुष्य से अलग नहीं है.वह सबसे जुड़ने की आकांक्षा का नाम है.कवि को अपने अंतर्वस्तु पर भरोसा है.. उसे भाषा-बद्धकर पाना उसकी चुनौती है.

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राजेंद्र राजन की कविताएँ-

कविता : पेड़ : राजेन्द्र राजन

छुटपन में ऐसा होता था अक्सर
कि कोई टोके
कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज
इसलिए पेड़ उगेगा तुम्हारे भीतर

मेरे भीतर पेड़ उगा या नहीं
पता नहीं
क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट

लेकिन आज जब मैंने
एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
तो मैंने सुनी अपने भीतर
एक हरी – भरी चीख

एक डरी – डरी चीख
मेरे भीतर से निकली

मेरी चीख लोगों ने सुनी या नहीं
पता नहीं
क्योंकि लोगों के भीतर
मैं पेड़ की तरह उगा नहीं

क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट.

। । इतिहास पुरुष अब आयें। ।

काफ़ी दिनों से रोज़-रोज़ की बेचैनियां इकट्ठा हैं हमारे भीतर
सीने में धधक रही है भाप
आंखों में सुलग रही हैं चिनगारियां हड्डियों में छिपा है ज्वर
पैरों में घूम रहा है कोई विक्षिप्त वेग
चीज़ों को उलटने के लिये छटपटा रहे हैं हाथ

मगर हम नहीं जानते किधर जायें क्या करें
किस पर यकीन करें किस पर संदेह
किससे क्या कहें किसकी बांह गहें
किसके साथ चलें किसे आवाज़ लगाएं
हम नहीं जानते क्या है सार्थक क्या है व्यर्थ
कैसे लिखी जाती है आशाओं की लिपि

हम इतना भर जानते हैं
एक भट्ठी जैसा हो गया है समय
मगर इस आंच में हम क्या पकायें

ठीक यही वक्त है जब अपनी चौपड़ से उठ कर
इतिहास-पुरुष आयें
और अपनी खिचड़ी पका लें-

राजेन्द्र राजन .

संतोष कुमार ,फेसबुक परः

तुलसी पुस्तकालय भदैनी के हाल मे एकाकी पंखा अपनी गति से बल्ब की पीली रोशनी मे राजेन्द्र राजन के शब्दों को इतिहास से लेकर वर्तमान तक बिखेर रहा था। बमियान मे घायल बुद्ध से एक बुर्जग पख्तून से संवाद के बहाने वर्तमान की निर्ममता को उकेरते राजेन्द्र राजन बाजार मे बिकने के लिए विवश कबीर को हाल मे बैठे श्रोतागण के समक्ष दो-चार कर रहे थे । अफलातून ने सुधी श्रोताओ के लिए राजेन्द्र राजन की कविता का एकल पाठ और ज्ञानेन्द्रपति के सभापतित्व का सुनहरा अवसर दिया था । बहुत सारी त्रासदियां और उनके बीच से निकलती उम्मीद की किरणों को टटोलते कवि ने श्रोतागण को इस कदर बांधे रखा कि समय कम पड़ गया । प्रस्तुत है राजेन्द्र राजन की दो कविताएं-
विकास
कम हो रहीं है चिड़ियां
गुम हो रही है गिलहरियां
अब दिखती नही है तितलियां
लुप्त हो रही हैं जाने कितनी प्रजातियां

कम हो रहा है
धरती के घड़े म ेजल
पौधों मे रस
अन्न मे स्वाद
कम हो रही है फलो मे मिठास
फूलों मे खुशबू
शरीर मे सेहत
कम हो रहा है
जमीन मे उपजाऊपन
हवा मे आक्सीजन

सब कुछ कम हो रहा है
जो जरुरी है जीने के लिए
मगर चुप रहो
विकास हो रहा है इसलिए। राजेन्द्र राजन
पेंड़
छुटपन मे ऐसा होता था अक्सर
कि कोई टोके
कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज
इसलिए पेंड़ उगेगा तुम्हारे भीतर
मेरे भीतर पेड़ उगा या नहीं
पता नही
क्योंकि मैने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट
लेकिन आज जब मैने
एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
ते मैने सुनी अपने भीतर
एक हरी भरी चीख
मेरी चीख लोगो ने सुनी या नही
पता नही
क्योेंकि लोगो के भीतर
मैं पेड़ की तरह उगा नही
क्योंकि मैने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट ।

राजेन्द्र राजन

 

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काशी विश्वविद्यालय आवासीय विश्वविद्यालय है। कला संकाय का डॉ एनी बेसेन्ट छात्रावास परिसर के बाहर है। सुरक्षा की दृष्टि से कम सुरक्षित।शहर से सीधे छात्रावास में घुस कर मार-पीट की संभावना ज्यादा होगी यह मानते हुए उसे परिसर के छात्रावासों से अधिक असुरक्षित माना जा सकता था। 1982 में उस छात्रावास में रहने वाले नन्दलाल,नन्दा राम,राम दुलार सहित 8 छात्रों को छुआछूत और जातिगत भावना से मारा-पीटा गया। समता युवजन सभा ने आवाज उठाई तो मार-पीट करने वाले छात्र प्रो मनोरंजन झा की समिति की जांच के बाद निकाल दिए गए। पीडित छात्रों को सुरक्षा की दृष्टि से परिसर के छात्रावास में कमरे दिए जांए,यह मांग भी थी। प्रशासन ने इन सभी छात्रों को बिडला छात्रावास के 6ठे ब्लॉक के कॉमन रूम से 6-7 कमरे बनवा कर आवण्टित किया गया।

सयुस की इकाई की स्थापना के मौके पर किशन पटनायक 1982 में बोले। परिसर में जाति,पैसे और गुंडागर्दी के बोलबाले का हमने जिक्र किया।किशनजी ने कहा ,”भारतीय समाज में जाति ऐसी गली है जो बन्द है।जन्म,विवाह और मृत्यु इसी गली के भीतर होना तय हो जाता है।गुण्डा वह है जो अपने से कमजोर को सताता है और अपने से मजबूत के पांव चाटता है। छात्र किसी एक वर्ग से नहीं आते लेकिन उनका समूह ऐसा होता है जिसके सदस्यों के गुण- जोखिम उठाने का साहस,बड़ों की बात आंख मूंद कर न मान लेना और दुनिया बदलने का सपना देखना होता है।”

मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के फैसले के बाद उच्च शिक्षा केन्द्रों में लाजमी तौर पर विरोध हुआ। चूंकि उच्च शिक्षा केन्द्र सवर्ण वर्चस्व के केन्द्र हैं।मंडल विरोधी छात्रों द्वारा आत्मदाह के प्रयास के बाद मुझे जला कर मारने की योजना बनी। सिख छात्रों को बचाने,एक छात्रावास के कमरे में मालवीयजी के समय से रखे गए गुरुग्रंथ साहब से छेडछाड करने वालों के खिलाफ शिकायत करने के कारण भी मेरे खिलाफ उन्हीं लोगों में गुस्सा था।जो अखबार राम मन्दिर आन्दोलन के दौर में विहिप का पैम्फलेट बन जाते थे उन्हींमें से एक में एक अध्यापक ने सवर्ण वर्चस्व के पक्ष में लिखा,’घोड़ा खरीदने जाते हैं तो अरबी घोड़ा खोजते हैं।कुत्ता रखना होता है तो अलसेशियन रखते हैं। फिर पढ़ाई और नौकरियों में सवर्णों का होना तो स्वाभाविक है।’ इस लेख के छपने के बाद लाजमी तौर पर वे छापा-तिलक लगाए,जनेऊधारी चिकित्सक हमें बेल्टधारी अलसेशियन लगते थे।

ऐसे माहौल में काशी विश्वविद्यालय में नेल्सन मण्डेला का कार्यक्रम बना।उन्हें मानद उपाधि दी गई। हम हवाई अड्डे पर पहुंचे। नेल्सन मण्डेला के साथ राजमोहन गांधी थे। उन्होंने हमें अपने साथ ले लिया।काफिला प्रह्लाद घाट पहुंचा,जहां स्थानीय प्रशासन ने मण्डेला साहब से ‘गंगा-पूजन’ करवाया। 5 कदम की दूरी पर रविदास मन्दिर था,जिसके बारे में मण्डेला साहब को नहीं बताया गया। हमारे ज्ञापन के बारे में राजमोहनजी ने संक्षेप में बताया और हम लोगों से कहा कि वे विस्तार से बाद में उसके बारे में बात कर लेंगे।

ज्ञापन तो यहां दर्ज करेंगे ही,उस दौर में वि.वि. में जाति प्रथा कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए थी,कुछ उदाहरण जान लीजिए। कृषि विज्ञान संस्थान में स्नातक स्तर पर ही आपको अपनी जाति के हिसाब से इतने अंक मिला करते थे कि स्नातकोत्तर कक्षाओं के विभाग उसी हिसाब से तय हो जाते थे। ब्राहमण के कृषि अर्थशास्त्र,राजपूत और भूमिहार के एग्रोनॉमी,पिछडे और दलित के हॉर्टीकल्चर में जाने की संभावना ज्यादा रहती थी। इसका व्यतिक्रम होने पर – कुर्मी किसान घर का पंचम सिंह  और पांडुरंग राव आत्महत्या करते हैं (दोनों कृषि विज्ञान संस्थान)। भौतिकी विभाग के कुशवाहा प्रोफेसर ने  एक क्षत्रीय शोध छात्र (नाम के साथ उसके भी कुशवाहा था) को परेशान किया तो प्रोफेसर ने चक्कू खाया था। छात्र पर 307 न लगे इसके लिए तत्कालीन कुलपति ने कचहरी जाकर निवेदन किया था।

आम तौर पर दलों,संगठनों से ऊपर उठकर जातियों का एका बन जाता था। जातिवादी मठाधीश प्रोफेसर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए जाति का उपयोग करते थे,जाति के प्रति प्रेम भी उसके लिए आवश्यक नहीं होता था।

एक मजबूत दलित प्रत्याशी लगातार ब्राह्मण प्रत्याशी से हारा-तब सवर्ण गोलबन्दी के लिए,’आजादी की लड़ाई सवर्णों ने लड़ी।छात्र संघ किसका? सवर्णों का’ जैसे परचे बटते। संयोगवश मैं भी उसी पद पर चुनाव लड़्ता था। ‘खटिका को हराना है तो……. को जिताना होगा’ नारा सफल नहीं हो पाया क्योंकि मेरे कारण गोलबन्दी नहीं हो पाई। वि.वि. में महिला महाविद्यालय,चिकित्सा विज्ञान संस्थान,दृश्य कला संकाय और प्रौद्योगिकी संस्थान के छात्र छात्राओं में जाति का असर न्यूनतम था और वहां मैं नम्बर एक पर था-अन्य संकायों में एक बडे गठबंधन के नाम पर सोनकर नम्बर पर एक थे। विश्वविद्यालय के पिछड़े- दलित छात्रों ने इस बात पर गौर किया और अगले साल ऊपर दिए संकायों के अलावा उनका भरपूर समर्थन मुझे मिला।

समता युवजन सभा हाथ के बने पोस्टर लगाती और मोटर साइकिल जुलूस की जगह साइकिल जुलूस निकालती। राजनीति में असरकारी होना जरूरी होता है।जब सयुस असरकारी हुई तब मुख्यधारा वाले समूहों ने भी साइकिल जुलूस निकाला।छात्रों ने उसे नकल माना। ”सयुस की साइकिल देखी,सबने मोटर साइकिल फेंकी”

नेल्सन मण्डेला को दिया गया ज्ञापन-

 

प्रति,

माननीय नेल्सन मण्डेला,

नेता, अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस ।                                        दिनांक 17 अक्टूबर 1990

परम आदरणीय महोदय.

आपके हमारे विश्वविद्यालय आगमन के अवसर पर हमारा मन हर्ष नहीं, अपितु विषाद से भर उठा है। मानवीय मूल्यों के लिए आपकी आजीवन लड़ाई,अपने जीवन मूल्यों के लिए कठोरतम परिस्थिति में विश्वास ज्योति को जलाए रखना, सिर्फ ऐसे समाज के लिए प्रेरणा बननी चाहिए जो स्वयं उन मूल्यों में विश्वास करे और उन्हें प्रतिस्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हो।

आज हमारा समाज , विशेषतः इस विश्वविद्यालय का छात्र-युवा,अध्यापक समाज, विशेष अवसर द्वारा विषमता मूलक समाज संरचना को दूर करने के खिलाफ खड़ा है। उसकी वाणी,उसकी लेखनी में जातिवाद के साथ-साथ नस्लवाद साफ-साफ परिलक्षित होता है। जात्यिवाद को वैज्ञानिक व्यवस्था करार देने के साथ हर जाति को अलसेशियन कुत्ता,अरेबियन घोड़ा की विशिष्टता के साथ जोड़ा जा रहा है। आज की तारीख में ऐसी मानसिकता को प्रश्रय देने वाला यह प्रशासन, छात्रावासों में अनुसूचित जाति, जनजाति के छात्रों को अलग लॉबी में रखता है। खुले कमरों में रहने की जुर्रत करने वाले,राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में मुखर दलित छात्रों को पीटा जाता है।लिखित शिकायत करने पर भी कुलपति,प्रशासन सिर्फ आश्वासन देते हैं। दोषी छात्रों अथवा छात्रावास संरक्षकों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाता।

यहां मंडल कमीशन की संस्तुतियों के खिलाफ आन्दोलनकारियों के प्रति वि.वि. प्रशासन ने अतिशय नरम व सहयोगी रुख अपनाया है। ऐसे में यहां की विद्वत परिषद द्वारा आपका अभिनन्दन एक विडंबना ही है। यदि आपको सही वस्तुस्थिति की जानकारी होती तो आप कदापि इस मानद उपाधि को सम्मान नहीं मानते व इसे ग्रहण करने से इंकार कर देते।

विषमता मूलक समाज के पोषक , विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा आयोजित इस समारोह का विरोध करते हुए भी महात्मा गांधी के देश में हम अपने प्रेरणा स्रोत के रूप में आपका स्वागत करते हैं।

विनीत,

( डॉ स्वाति )                                          (हरिशंकर)

समता संगठन                                    समता युवजन सभा

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भारतीय न्याय व्यवस्था की एक बहुत बड़ी विडंबना है कि वह जिसरूप में आज मौजूद है वह अंग्रेजों द्वारा खड़ी की गई थी। एक आम भारतीय केसाथ न्याय करना इस व्यवस्था का ध्येय नहीं था। उसका मकसद तो ‘अपराधी’ मूलबाशिंदों को दंडित करना और भारत में रह रहे ब्रिटिश भद्र लोक केबीच के दीवानी मामले सुलटाना था। आज भी अगर यह सवाल किया जाए कि इस न्यायव्यवस्था से कितने प्रतिशत भारतीयों को न्याय मिलता है तो शायद उसकाईमानदार जवाब होगा 1% से भी कम। इस देश की 20% से ज्यादा आबादी वकील करनेका माद्दा नहीं रखती- जो 78% प्रतिशत जनता(अर्जुन सेनगुप्ता कमेटीकी रपट केअनुसार) रोजाना 20 रुपये से कम में गुजारा करती है वो जाहिर है कि वकीलकरने में सक्षम नहीं होगी। जो खुद के वकील कर पाते हैं वो अंतिम फैसला आनेतक सालों साल अदालतों के धक्के खाते रहते है। न्याय प्रक्रिया इतनी लम्बी, जटिल और महँगी होती है कि अंत आते-आते मुवक्किल आर्थिक और मानसिक रूप सेनिचुड़ चुका होता है। ऊपर से काफी संभावना रहती है कि आपका सामना भ्रष्ट, जातिवादी, मर्दवादी, साम्प्रदायिक, संभ्रांतवादी अथवा अक्षम जज से हो। इसप्रकार अततः जिन चंद लोगों को इस न्याय-व्यवस्था में न्याय मिलता है वोजनसँख्या के 1% से भी कम हैं। फिर भी आज तक सरकार या प्रभुत्वशाली वर्गोंके द्वारा शोषित लोग थक-हार कर न्यायालयों का ही दरवाजा खटखटाते है, इसउम्मीद के साथ के साथ कि जज की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति निष्पक्षता के साथउनसे न्याय करेगा। वह निष्पक्षता, जो संविधान में निहित है।
वर्तमान सरकार जबसे सत्ता में आई है तब से लगातार जजों सेजुड़े कई विवादित फैसले लेती रही है। सबसे पहला था जून महीने में सर्वोच्चन्यायलय के कॉलेजियम द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति के लिए प्रस्तावित 4 नामों में से एक वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मणियम का नाम अलग कर उसेवापिस भेजना और फिर यह कदम और उसके पीछे के ‘कारण’ जगजाहिर करवा देना। नामवापसी को जाहिर करना बहुत ही शातिर कदम था। सरकार जानती थी कि नाम वापसकरने के बाद भी यदि कॉलेजियम दोबारा वही नाम भेजे तो कानून उसे स्वीकारकरने के अलावा उसके पास और कोई चारा नहीं होता। लेकिन सार्वजनिक रूप सेअपनी ईमानदारी पर शक का दाग लगने के बाद गोपाल सुब्रह्मनियम ने पद के लिएअपनी सहमति वापस ले ली। ऐसे में प्रमुख न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम.लोधाद्वारा सार्वजनिक तौर पर सरकार के कदम की आलोचना करना और गोपाल सुब्रह्मणियमकेसमर्थन में आना किसी काम न आया। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय एक निष्पक्ष, संवेदनशील और प्रखर न्यायविद जज से मरहूम हो गया।दूसरा था अगस्त महीने में संविधान संशोधन करके और नया कानून ला कर उच्चतरन्यायपालिका की नियुक्ति की प्रक्रिया बदलना। इस पर हम इस लेख में विस्तारसे चर्चा करेंगे।और तीसरा था अभी हाल में सेवानिर्वित्त हुए प्रमुख न्यायाधीश एस. सदाशिवमको केरल का गवर्नर नियुक्त करना। न्यायिक स्वतंत्रता के संवैधानिक सिद्धांतके परखच्चे उड़ाता यह फैसला न्यायपालिका की गरिमा पर भी बट्टा लगाता है। कईकानूनों में सेवानिवृत्त जजों को विभिन्न कमीशनों का अध्यक्ष या सदस्यबनाने का प्रावधान है और ज्यादातर सभी सरकारें अपने प्रिय जजों को यहलालीपॉप पकड़ाती हैं। लेकिन देश के पिछले प्रमुख न्यायाधीश को गवर्नर जैसीराजनैतिक पदवी देना तो बहुत ही गंभीर मसला है। न्यायमूर्ति सदाशिवम का यहकहना कि अगर वह गवर्नर नहीं बनते तो उन्हें किसानी करना पड़ता शोचनीय है। इसदेश में किसान की हालत इतनी कमजोर है कि सदाशिवम अपने जीवन भर की कमाईप्रतिष्ठा दाँव पर लगाने को तैयार हैं लेकिन किसानी करने को नहीं। काश किवे वापस अपने गाँव जा कर खेती करते तो हम भारतीय भी गर्व से दुनिया को कहसकते कि हमारा राष्ट्रपति भले ही उरुग्वे के राष्ट्रपति के जैसा सादा जीवन नजीता हो मगर हमारे देश का प्रमुख न्यायाधीश सेवानिवृत्त हो कर गाँव मेंएक आम नागरिक की तरह जीवन यापन कर रहा है।यह तीनों फैसले न्यायिक स्वतंत्रता पर करारी चोट हैं, इमरजेंसी के युग कीयाद दिलाते हैं और केंद्र सरकार के बेशर्म और अधिनायकवादी रवैये के द्योतकहैं। इतिहास गवाह है कि तानाशाह हमेशा देश के संविधान और जजों को अपने वशमें करना चाहता है।
न्यायिक नियुक्ति कमीशन बिल, 2014
पिछले महीने लोकसभा ने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय केजजों की नियुक्ति का यह बिल पारित कर दिया। अब इसका राज्यसभा द्वारा पारितहोना और राष्ट्रपति की मुहर लगना बाकी है। माने तय है कि यह बिल कानून बनजाएगा। सरकार चाहती है कि मानसून सत्र में ही यह प्रक्रिया पूरी हो जाए।आखिर पूरे देश पर असर डालने वाले इस कानून को लागू करने में इतनी जल्दीबाजीक्यों? सरकार ने न्यायपालिका को साफ़ इशारा कर दिया है कि हमारे द्वारानिर्धारित सीमा में रहोगे तो पदोन्नति के साथ साथ कार्यविधि के बाद भीमलाईदार पोस्टिंग मिल सकती है नहीं तो अब तुम्हारा केरियर हम चौपट कर सकतेहैं।1993 के पहले इस देश में उच्चतर न्यायालयों में जजों की नियुक्तिकार्यपालिका के हाथ में होती थी। इसके कारण काफी सारी नियुक्तियाँ राजनीतिककारणों से प्रेरित होती थीं। आपातकाल के दौरान हमें इसका सबसे वीभत्स रूपदेखने को मिला। केशवानंद भारती केस को मनचाहा मोड़ देने के लिए इंदिरा गाँधीने नियुक्तियाँ कीं। यह बात दीगर है कि अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने 7:6 के अनुपातसे अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसमें संविधान के मूलभूत ढाँचे के सिद्धांतकी नींव पड़ी। इसी ढाँचे में निहित है न्यायिक स्वतंत्रता का सिद्धांत। बादमें हेबिअस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) केस में जब न्यायपालिका सरकार के सामने झुक गई तब एकनिर्भीक और निष्पक्ष जज एच.आर. खन्ना, जिन्होंने अपना संवैधानिक दायित्वनहीं छोड़ा और विपक्ष में फैसला दिया, उन्हें प्रमुख न्यायाधीश बनने से हाथधोना पड़ा, उनसे जूनियर जज को प्रमुख सर्वोच्च न्यायाधीश बनाया गया और इसके विरोधस्वरूप उन्होंने इस्तीफा दे दिया।1993 में सर्वोच्च न्यायाधीश ने अपने फैसले से इस नियुक्ति प्रक्रिया में आमूलचूलबदलाव ला दिया। अब सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में नियुक्तिप्रक्रिया पूरी तरह से सर्वोच्च न्यायलय के 5 सबसे वरिष्ठ जजों यानी कॉलेजियम के हाथमें आ गयी। सरकार एक बार कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित नाम वापस भेज सकतीहै लेकिन उसके बाद अगर दोबारा कॉलेजियम वही नाम भेजे तो राष्ट्रपति को उसपरमुहर लगानी ही पड़ती है। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता का पूरा अभाव है।जजों के बेटों-भतीजों की नियुक्तियाँ बेतहाशा होती हैं।न्यायपालिकासंभ्रांत वर्ग के पुरुषों का क्लब बन के रह गई है जिसमें औरतों, दलितों औरआदिवासियों का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है। सरकारी मनमानी से बचने के लिएबनी यह व्यवस्था पूरी तरह से विफल हो गई है।न्यायाधीश नियुक्ति का नया कानून इन दोनों उपरोक्त प्रणालियों की बुराइयाँलिए हुए है। संविधान को संशोधित कर एक न्यायाधीश नियुक्ति कमीशन बनाया गयाहै, जो उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और प्रमुखन्यायाधीश की नियुक्ति करेगा। इस कमीशन में 6 सदस्य होंगे जिनमें 3 सर्वोच्च न्यायलय के तीन सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश, कानून मंत्री और 2 गणमान्य हस्तियाँ होंगी (देश के प्रमुख न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और सबसे बड़े विपक्षी दल के नेताद्वारा मनोनीत किये गए)।किसी भी जज को प्रस्तावित करने के लिए 6 में से 5 सदस्यों की सहमति आवश्यकहोगी। अगर किन्हीं 2 सदस्यों ने विरोध में मत दिया तो प्रस्ताव वहीँ रद्दहो जाएगा। इस प्रकार यदि कानून मंत्री ने यदि एक सदस्य को भी अपने पक्ष मेंमना लिया तो सरकार की नापसंदगीवाला उम्मीदवार जज नहीं बन पाएगा। इससे भी घातकप्राविधान था सर्वसम्मति का। उसके अनुसार अगर एकबार राष्ट्रपति कोईप्रस्तावित नाम वापस भेज देते हैं तो कमीशन सर्वसम्मति से ही उस नाम कोपारित कर पाएगा। इस प्रकार कानून मंत्री को वीटो की शक्ति मिल गयी थी। ऐसाहोता वो दिन दूर नहीं था जबन्यायपालिका पूरी तरह सरकार के कब्जे में होती।खैर, विपक्षी दलों ने काफी विरोध कर यहप्रावधान हटवा लिया। वैसे अगर यहप्रावधान बना रहता और कोर्ट के सामने आता तो अवश्य ही गैरसंवैधानिक घोषितहोता। लेकिन कानून मंत्री की कमीशन में मौजूदगी ही न्यायपालिका औरकार्यपालिका की अलग-अलग सत्ताओं के सिद्धांत की अवमानना है। मनमोहन सिंह सरकार द्वारा 2010 में लाए गए बिल में भी कमीशन में कानून मंत्री को रखने का प्रावधानथा।कॉलेजियम प्रणाली की सबसे बड़ी खामीगैरपारदर्शिता इस कानून में बरकरारहै, बस उस गैरपारदर्शी प्रणाली में न्यायपालिका के साथ-साथ सरकार को भीघुसा दिया गया है। किसी भी न्यायिक कमीशन में वर्तमान जज और कानून मंत्रीनहीं रहने चाहिए।एक और महत्वपूर्ण पहलू है कमीशन के पास समय की कमी। कमीशन को 30 सर्वोच्च न्यायालय के जजों, 1 भारत के प्रमुख न्यायाधीश और 906 उच्च न्यायालय के जज और प्रमुखन्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानान्तरण करने का दायित्व और अधिकार होगा।हमारी न्याय-व्यवस्था पहले से ही रिक्त पदों की समस्या से त्रस्त और ग्रस्त है। उच्चन्यायालयों में करीब 300 पद रिक्त पड़े हैं। नियुक्ति कमीशन को हर साल करीब 1000 अभ्यार्थियों में से करीब 100 जज नियुक्त करने होंगे। ऐसे में इननियुक्तियों को विश्वसनीय बनाने के लिए ज़रूरी है कि यह कमीशन पूर्णकालिकहो। फिलहाल जो सदस्य इस कानून में हैं उन सभी के पास अपने ही इतने काम हैंकि पूरी सम्भावना है कि रिक्त पदों की समस्या वहीँ की वहीँ रह जाएगी या फिरजल्दबाजी में नियुक्त हुए जजों से न्यायपालिका के स्तर में और भी गिरावटआएगी।
कैंपेन फॉर ज्यूडिसियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफ़ोर्म्स नामक समूह जो कई वर्षोंसे न्याय व्यवस्था में जवाबदेही और मूलभूत सुधारों की माँग उठाता आया है, ने काफी पहले से एक ऐसे पूर्णकालिक कमीशन की माँग रखी है जो जजों कीनियुक्ति करेगा और उनके खिलाफ शिकायतें सुनेगा। जजों की बर्खास्तगी(जोफिलहाल बहुत जटिल है) भी उसके हाथ में होगी।कमीशन की नियुक्ति सी.ए.जी., सी.वी.सी., मुख्य चुनाव आयुक्तसर्वोच्च न्यायालय के 2 वरिष्ठ जज, प्रधान मंत्री औरनेता विपक्षी दल की 7 सदस्यीय टीम करेगी। इंग्लैंड, फ्रांस, और न्यू यॉर्कके न्यायिक कमीशनों की तर्ज पर इस कमीशन में भी कम से कम 3 ऐसे जाने-मानेईमानदार व्यक्ति हों जो न्याय व्यवस्था से ताल्लुक न रखते हों।मेरा मानना है कि अगर प्रक्रिया को इतना जटिल न भी किया जाय तो भी भारत केप्रमुख न्यायाधीश, प्रधान मंत्री और सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता- इन तीनसदस्यों टीम द्वारा चुने गए एक पूर्णकालिक कमीशन की ज़रूरत है, जिसमें वर्तमानजज या कानून मंत्री न हों। यह कमीशन कोई भी पद खाली होने पर सार्वजनिकघोषणा करे और अभ्यर्थियों की सूची भी घोषित करे। जनता को यह मौका मिले किवह अभ्यार्थियों के बारे में अपनी आपत्तियाँ दर्ज कर सके जिनको परख कर कमीशननियुक्तियाँ करे।इसके अलावा नियुक्तियों के ठोस और सार्वजनिक पैमाने होने चाहिए। वर्तमानकानून ने न्यायिक कमीशन को यह अधिकार दिया गयाहै कि वह यह पैमाने निर्धारितकरे। कानून की समझ, समय के साथ बदलते कानूनों की जानकारी और ईमानदारी केसाथ यह भी बहुत ज़रूरी है कि न्यायाधीश बनने के अभ्यार्थी कमजोर और हाशिये परखड़े समुदायों के प्रति संवेदनशील हों, समय के साथ बदलते सामाजिक मूल्योंके प्रति संवेदनशील हों मेहनती हों और धैर्यवान भी। कमीशन सुनिश्चित करेकि न्यायालयों में महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और विकलांगव्यक्तियों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व हो।इसके अलावा उच्चतर न्यायालयों के जजों की बर्खास्तगी की प्रक्रिया भी बहुतजटिल है और उसमें भी आमूलचूल बदलाव की ज़रूरत है। न्याय व्यवस्था को औरजवाबदेह और सरल बना कर अंतिम औरत तक लाना होगा। लेकिन उस पर फिर कभी और।

(सामयिक वार्ता ,सितम्बर 2014)

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