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Posts Tagged ‘banaras’

साझा संस्कृति मंच

वाराणसी

माननीय श्री अण्णा हजारे ,

कबीर , तुलसी और रैदास की बनारस की इस कर्मभूमि में हम आपका हृदय से स्वागत करते हैं । वाराणसी के सामाजिक सरोकारों के संगठनों का यह साझा मंच आप से यह नम्र निवेदन कर रहा है :

राज्य व्यवस्था भ्रष्टाचार और हिंसा को नियंत्रित करने के लिए बनी हुई है । आज भ्रष्टाचार एक केन्द्रीय समस्या बन गया है क्योंकि उसके कारण एक औसत नागरिक के लिए सामान्य ढंग से ईमानदारी का जीवन जीना मुश्किल हो गया है । भ्रष्टाचार का शिकार हुए बगैर रोजमर्रा का काम नहीं चल पा रहा है इसलिए भ्रष्टाचार से मुक्त होने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है । सामान्य अवस्था में भ्रष्टाचार सिर्फ लोभी और बेशर्म आदमियों तक सीमित रहता है और अधिकांश घटनाओं में लोग आश्वस्त रहते हैं कि दोषी दण्डित होंगे । मौजूदा समय में नेक आदमी भी भ्रष्टाचार करने लगा है और कोई आदमी ईमानदारी से अपना काम करता है तो उसकी हालत दयनीय हो जाती है ।

भ्रष्टाचार को जड़ से समझने के लिए निम्नलिखित आधारभूत विकृतियों को समझना होगा:

(१) प्रशासन के ढांचे की गलतियां – जवाबदेही की स्पष्ट और समयबद्ध प्रक्रिया का न होना भारतीय शासन प्रणाली का मुख्य दोष है । प्रशासन और अर्थनीति जैसे हैं वैसे ही बने रहें लेकिन भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा –  यह हमें मुमकिन नहीं दिखता ।

(२) समाज में आय-व्यय की गैर-बराबरियां अत्यधिक हैं । जहां ज्यादा गैर बराबरियां रहेंगी , वहां भ्रष्टाचार अवश्य व्याप्त होगा । गांधीजी के शब्दों में ,’थोड़े लोगोंको करोड़  और बाकी सब लोगोंको सूखी रोटी भी नहीं , ऐसी भयानक असमानतामें रामराज्य का दर्शन करनेकी आशा कभी नहीं रखी जा सकती ’(दिनांक १०६-’४७) ।

(३) गांववासियों के लिए कचहरी और पुलिस में कोई फर्क नहीं होता । कचहरी वह है , जिसके द्वारा पटवारी-पुलिस किसानों को सताते हैं । सैकड़ों बार कचहरी आ कर अदालत में घूस और वकीलों की फीस में किसानों के करोडों रुपए लूट लिए जाते हैं । देश का पेट भरने वाले किसान के जीवन में बड़े   बड़े निजी निगमों का हस्तक्षेप बढ़ाया जा रहा है , इसे हम अपनी संस्कृति पर हमला मानते हैं और इसलिए इस पर रोक की माग करते हैं । किसान से जुड़े समस्त कार्य एक ही व्यवहार पटल (खिड़की) से क्यों नहीं निपटाये जा सकते ।

(४) हमारी यह स्पष्ट समझदारी है कि भ्रष्टाचार के इस अहम सवाल के अलावा हमें बेरोजगारी ,  दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली , विकास की गलत अवधारणा से उत्पन्न विस्थापन के मसलों को भी समाज के व्यापक आन्दोलन का हिस्सा बनाना ही होगा ।

इन विकृतियों को समझते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के निम्नलिखित बिन्दु उभरते हैं :

(१) समाज के दलित , किसान , मजदूर , पिछड़े , आदिवासियों के कल्याण के लिए नरेगा तथा अन्य कल्याणकारी योजनाएं बनाई गई हैं उसके पैसे भ्रष्ट अधिकारी , बिल्डर ,ठेकेदार एक गठबन्धन बना कर लूटते हैं । इस पर रोक सुनिश्चित होनी चाहिए ।

(२) भोंडी फिजूलखर्ची पर रोक लगाई जाए तथा आर्थिक विषमता को सीमित करने के उपाए किए जांए ।

(३) प्राकृतिक संसाधनों की लूट को रोकने के लिए आर्थिक नीतियों में परिवर्तन करने होंगे । मौजूदा उदार नीतियों से भ्रष्टाचार और लूट का सीधा सम्बन्ध है ।

(४) यह आन्दोलन व्यापक स्तर पर ’ घूस देंगे नहीं , घूस लेंगे नहीं ’  के साथ जन-जागरण चलायेगा ।

(५) अधिकांश अदालती मामलों के निपटारे के लिए समय की सीमा बाँधी जाए और झूठे मामलों की छानबीन की कोई कारगर प्रक्रिया तय हो जाए ताकि यह जलालत और घूसखोरी घट सके ।

(६) समाज और देश में वैमनस्य फैलाने वाली शक्तियों की सक्रियता की वजह से तमाम लोकहित के मुद्दे पीछे चले जाते हैं तथा इससे भ्रष्ट यथास्थितिवादी ताकतों को शक्ति मिल जाती है । इसलिए इस प्रश्न को हम गौण समझ कर नहीं चल सकते तथा इसके प्रति सतत सचेत रहेंगे ।

(७) प्रशासन के कई सुधारों के लिए संविधान या आर्थिक व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन की जरूरत भी नहीं होती है ।फिर भी आम नागरिक की आजादी को दबाने के लिए और प्रशासन के भ्रष्ट तत्वों को कवच प्रदान करने के लिए भारतीय दण्ड प्रक्रिया में जिन धाराओं से मुकदमा चलाने के लिए राज्यपाल,राष्ट्रपति आदि की अनुमति लेनी पड़ती है उन्हें बदलना होगा । भ्रष्ट और अपराधी अधिकारियों पर मामला चले ही नहीं इसके लिए इन प्राविधानों का उपयोग होता है ।

इसी प्रकार विश्वविद्यालय जैसे सरकारी वित्त से चलने वाली संस्थाओं में भ्रष्टाचार के मामलों की समग्र निष्पक्ष जांच के लिए विजिटर (राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल ) ही जांच गठित कर सकता है । इस वजह से से आजादी के बाद सिर्फ दो बार ही विजिटोरियल जांच हो पाई है (मुदालियर आयोग तथा गजेन्द्र गड़कर आयोग )।इसके समाधान के लिए समाज और विश्वविद्यालय के बीच पुल का काम करने वाली ’कोर्ट’ को अधिकारसम्पन्न और लोकतांत्रिक बनाना होगा।

(८) उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था कायम रखने के लिए बनाई गई पुलिस द्वारा बिना विभाग का पैसा खर्च किए भ्रष्ट बिल्डरों , कॉलॉनाईजरों,निर्माण कम्पनियों से पुलिस विभाग के निर्माण करवाये जा रहे हैं । इस दुर्नीति के चलते यह भ्रष्ट अपने गलत काम सम्पन्न करने की छूट पा जा रहे हैं तथा उसका परिणाम अन्तत: प्रदेश की गरीब जनता पर उतारा जा रहा है ।

माननीय अण्णा , उत्तर प्रदेश में अभियान की शुरुआत वाराणसी से करने के लिए हम आपके आभारी हैं तथा आप से यह अपील करेंगे कि आन्दोलन को व्यापक आधार देने के लिए आप अन्य समन्वयों ,मोर्चों से सम्पर्क , संवाद और समन्वय स्थापित करने के लिए पहल करेंगे ।

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क्वचित प्रकाशं क्वचित्प्रकाशं,

नभ: प्रकीर्णाम बुधरम विभाति ।

क्वचित क्वचित पर्वत सनिरुद्धम ,

रुपं यथा शान्त महार्णवस्य ॥

बिलकुल शुरुआती श्लोकों में से एक । आदरणीय गुरु रामचन्द्र शास्त्री का सिखाया हुआ , दरजा छ: में । शायद उनका रचा हुआ भी ।

बस ,फर्क सिर्फ़ यह था कि आज पर्वत की जगह मेघ पहले रह-रह कर प्रकाश को अवरुद्ध कर रहे थे और बाद में जैसा होना था चन्द्रमा की परछाई  ।

काशी में सूर्योदय ५ : २१ पर हुआ था और सूर्य ग्रहण ५ : ३० पर शुरु हुआ और  ७ : २७ तक चला । ६ : २४ से ६ : २७ तक सूर्य पूर्णरूपेण आच्छादित था ।

मैं साढ़े पाँच बजे उठा और खग्रास सूर्यग्रहण के  दौरान मैंने तसवीरें लीं । ’यही है वह जगह’ के पाठको के समक्ष प्रस्तुत है ।

Solar Eclipse Kashi

आखिरी तसवीर में बादलों के बीच किसी जेट विमान के धूँए की सीधी लकीर । इसके यात्रियों से “अदेखाई” भी हुई । कुछ तसवीरों को क्रॉप भी किया है और संजाल पर पूर्ण साइज में अपलोड नहीं किया है ।

सूरज जैसे ही पूरी तरह ढक गया , पक्षी तो शान्त हो गये किन्तु पास के डालमिया छात्रावास से लड़कों का शोर उठा ।

पूरा खेल परछाई का था । सो ,  इस दिव्य दृश्य के दर्शक की परछाइयों को भी खींचा । अखबार में पढ़ा कि यह खगोलीय स्थिति अगली बार  ११ जून २१३२ को बनेगी ।

मैंने अपने कैमेरे के अलावा किसी फिल्टर का प्रयोग नहीं किया है । प्रयोग का चूहा हूँ या नहीं यह वक्त बतायेगा ।
चित्र के कैप्शन पर खटका मारें और पिकासा अलबम पर स्लाईड शो के रूप में देखें । पिकासा का पेज खुलने के बाद F 11 बटन दबाकर पूरे परदे पर स्लाईडशो देखिएगा ।

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बनारस की शान्ति में खलल डालने की नापाक कोशिशों के बारे में कल मैंने लिखा था ।

कर्नाटक कैडर के प्रशासनिक अधिकारी जो यहां केन्द्रीय पर्यवेक्षक हैं ने मुझे आश्वस्त किया था कि मेरी सलाह के अनुरूप हॉकरों द्वारा जिन स्थानों से अखबार लिए जाते हैं वहां चौकसी बरती जाएगी। ठीक इसी प्रक्रिया से तीन उतपाती कल दबोच लिए गये । इनमें एक महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले का था । मौके से २ हजार के ऊपर आपत्तिजनक परचे भी बरामद किए गये । बन्द किए गये इन तीन लोगों को छुड़ाने के लिए जो सफ़ेदपोश ’नेता’ थाने पहुंचे उनमें स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष , भाजपा की पूर्व अध्यक्ष वीरेन्द्र सिह ’मस्त’ उर्फ़ पहलवान भी थे । पहलवान की भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से अनबन और मुरली जोशी से विशेष नाता छिपा नहीं है । वीरेन्द्र पहलवान ,रामबहादुर राय और मनोज सिन्हा की धुरी मुरली जोशी हैं । राय साहब भी पिछली दस तारीख से पत्रकारिता छोड़ जोशी के चुनाव की रणनीति बनाने में लगे हैं । रामबहादुर राय विद्यार्थी परिषद के नेता रहे हैं तथा संघ की समाचार एजेन्सी हिन्दुस्तान समाचार के जरिए पत्रकारिता के क्षेत्र में आये थे । उनके लगभग (कुछ वरिष्ट) समकालीन समाजवादी छात्र नेता रामबचन पाण्डे के अनुसार-’रामबहादुर राय पत्रकारों के बीच खुद को नेता बताता है और नेताओं के बीच पत्रकार।’

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पिछले बुधवार (२४ दिसम्बर , ‘०८ ) से बनारस से छपने वाला कोई अखबार बँट नहीं रहा है । न बँटने का कारण जान लेने के बाद सुबह-सुबह अखबार न पाना अखर नहीं रहा है । यदि एक हफ़्ते अखबार छप नहीं रहे होते तब शायद मीडिया में कोहराम मच गया होता ।

दरअसल पिछले एक हफ़्ते से बनारस शहर में यहाँ से छपने वाले अखबारों को घर-घर पहुँचाने वाले करीब ढाई हजार हॉकर हड़ताल पर हैं । ‘अमर उजाला’ , ‘हिन्दुस्तान’ और ‘दैनिक जागरण’ ने अपनी कीमत तीन से साढ़े तीन रुपये की और हॉकरों का कमीशन सिर्फ़ पाँच पैसे बढ़ाया । अखबारों की कमाई उस पर छपी कीमत से कहीं अधिक विज्ञापनों से मिलने वाले धन से होती है इसलिए हॉकरों की जायज माँग मानने में अखबार छापने वाले व्यवसाइयों को दिक्कत नहीं होनी चाहिए थी । अखबार व्यवसाइयों ने अपना घिनौना स्वरूप प्रकट करना शुरु किया है । नगर के तमाम पुलिस- बूथों से अखबार बँटवाना शुरु किया है । यह अलग बात है कि अखबार-पुलिस के इस चोली-दामन के साथ(या चोर-चोर मौसेरे भाइयों वाले नाते) से घर-घर अखबार पहुँचाने की भरपाई मुमकिन नहीं है ।

बनारस के निकट मेंहदीगंज के किसानों ने कोका कोला कम्पनी द्वारा भूगर्भ जल के दोहन के विरुद्ध जब आन्दोलन छेड़ा था तब हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन समूह ने शीतल पेय कम्पनी से करोड़ों रुपये का विज्ञापन ले कर आन्दोलन की खबरों को ब्लैक-आउट कर दिया था । नगर के एक मात्र पाँच सितारा होटल में शीतल पेय कम्पनी का राष्ट्रीय स्तर का अधिकारी आया था और उसने अखबार वालों से अपील की थी , ‘ अखबार भी हमारी तरह व्यवसाय है इसलिए हमारा साथ दीजिए ।’

दीए और तूफ़ान की इस लड़ाई में दीए बुलन्द रहें , कामना है ।

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    कल सुबह कभी मेरे पड़ोसी प्रयाग पुरी चल बसे ।  मैं उन्हें बाबाजी बुलाता था । उनका अभिवादन होता था , ‘ महादेव !’ मेरी तरफ़ से उत्तर होता ,’बम’। वे काशी विश्वविद्यालय में इटालवी भाषा के प्राध्यापक थे । वेनिस से एम.ए करने के पश्चात करीब २६ वर्ष पहले वे बनारस आए । इटली में उनका नाम कोर्राडि पुचेत्ती Corrado Puchetti था । काशी विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग जिसे कभी ‘भारती विद्यालय’ कहा जाता था से उन्होंने पीएच.डी की – महाभारतकालीन किसी शहर पर ।

   उनका  इन आधुनिक शिक्षा प्रतिष्ठानों से अधिक  आकर्षण काशी और भारत के पारम्परिक ज्ञान और साधना  से था । शंकराचार्य स्वरूपानन्दजी के श्री मठ से वे जुड़े थे। एक सन्यासी ने ही उनको नाम दिया था ।

  प्रयाग पुरी के एक गुर्दा था तथा उन्हें डाइलिसिस पर जाना पड़ता था । इस गम्भीर व्याधि के अलावा वे हृदय रोग से पीडित हो गये थे। मेरे आयुर्वेद से जुड़े मित्र डॉ. मनोज सिंह उनके चिकित्सक थे । गुर्दे की बीमारी के कारण हृदय की शल्य चिकित्सा सम्भव नहीं थी। इसके बावजूद मृत्यु के एक दिन पहले तक उन्होंने क्लास ली ।

      कुछ माह पूर्व इटली में वे गंभीर रूप से बीमार पड़े । कोमा में जा कर लौटे तब भी उन्होंने काशी में प्राण त्यागने की और हिन्दू विधि से अग्नि को समर्पित करने की इच्छा जतायी थी ।

   प्रयाग पुरी की पत्नी इंग्लैंड की हैं और भाषा विज्ञानी हैं । चार-पाँच साल के बेटे  चेतन बालू ने अपने पिता को मुखाग्नि दी । इसके पूर्व केदार-गौरी मन्दिर के समक्ष उनके शव को कुछ समय रक्खा गया तथा श्री मठ के महन्त ने रुद्राक्ष की माला अर्पित की ।

   चेतन बालू हिन्दी , इटालवी और अंग्रेजी तीनों भाषाएं बोलता है । पिता के unwell होने की बात घर पर होती थी और कल सुबह उसने अपनी माँ से पूछा कि क्या अब वे well हैं ?

    एक अन्य इटालवी साधू से उसने पूछा कि पिता कहां गये ? उस साधु ने कहा -‘हिमालय’।

    लेकिन जब घाट पर एक दक्षिण भारतीय साधु ने चेतन से पूछा कि प्रयाग पुरी कहां गये तो वह बोला ,’प्रयाग पुरी आग में गए।’

  बाबाजी की स्मृति को प्रणाम ।

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    saksuka001

    यह हैं काशी के शिवाला मोहल्ले के हयात मोहम्मद खाँ। हमारे पोलू भाई । मोहल्ले के ज्यादातर लोगों की तरह जरदोजी , बैज ( ब्लेजर पर लगने वाला ) बनाने अथवा बनारसी साड़ी बिनने का काम वे नहीं करते हैं । पोलू भाई कभी ऑटो रिक्शा चलाते थे , कभी बिजली का काम ।

    उनका पसंदीदा काम है रसोइए का । छोटी-सी चाय की गुमटी है । गरमियों में चाय बनना बन्द हो जाती है । उसकी जगह आम का पन्ना , लस्सी , नीबू पानी और रूह आफ़ज़ा चलने लगता है । उन दिनों ‘यह कोक-पेप्सी मुक्त क्षेत्र है’ का बैनर अथवा ‘दूध – दही के देश में ,पेप्सी-कोक नहीं चलेगा’ के स्टिकर उनकी दुकान की शोभा बढ़ाते हैं । पोलू भाई जब ‘अनरसे की गोलियाँ’ छानते हैं तब बच्चों की भीड़ लग जाती है ।

    आज , पोलू भाई की अंतर्राष्ट्रीय पाक कला निपुणता की चर्चा करेंगे । पोलू भाई आस – पास के लॉजों में रसोइए का काम भी करते रहे हैं । बनारसी पंडे तीर्थ यात्रियों का हाव – भाव , चाल – चलन , वेश-भूषा ‘तजबीज’ कर उनका प्रान्त बता देते हैं । पोलू भाई उसी गुण से विदेशी पर्यटकों का देश बता देते हैं । जब वे लॉजों में रसोई बनाते थे तब इसराईली लड़कियाँ उनसे पूरी-सब्जी , मसालेदार सब्जी , दाल और चपाती बनाना सीखती थीं । उन्हीं लड़कियों से पोलू भाई ने ‘सकसूका’ और ‘मलावा’ जैसे इसराईली पकवान बनाने सीखे । त्योहारों और विशिष्ट अवसरों पर ‘ मलावा’ और ‘सकसूका’ का बनना जरूरी होता है । “पुरुष नहीं सीखते – भारतीय पकवान बनाना?” पोलू भाई गंभीरता से बताते है अपने देश में रेस्टरॉं चलाने वाले इक्का दुक्का पुरुष भी सीखते थे ।

    बहरहाल , इसराईली महमानों से उनके देश के व्यंजन बनाना सीखने के बाद पोलू भाई ने एक लॉज के मेनू में सकसूका और मलावा को शामिल करवाया । इनकी लोकप्रियता को देख कर मेनू चोरी हुआ और अब शिवाला के अन्य गेस्ट हाउसों में भी यह इसराईली व्यंजन उपलब्ध हो गये हैं ।

    पोलू भाई नरीमन हाउस में इसराईली नागरिकों के साथ आतंकियों की नृशंसता से आहत हैं। उनके मोहल्ले के रेस्टरां तथा स्वयं उनकी चर्चा भारत के बारे में हिब्रू में लिखी गई पर्यटन गाइडों और इन पर्यटकों के ब्लॉगों में हुई है ।

    पोलू भाई की दिली इच्छा है कि काशी आने वाले इसराईली पर्यटकों की पसंद शिवाला है- यह भी दुनिया जाने ।

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    क्या आप इन बोर्डों को पढ़ सकते हैं ? कौन सी लिपि है , यह ? काशी विश्वविद्यालय से काशी स्टेशन तक गंगाजी के समानांतर जाने वाली बनारस की एक मुख्य सड़क पर यह बोर्ड हैं । जॉन ज़ैदी द्वारा संचालित इन्टरनेट कैफ़े की सूचना है, इन पर । महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद जॉन जिन्हें मोहल्ले में ‘लिटिल’ के नाम से पुकारा जाता है ने यह इन्टरनेट कैफ़े शुरु किया । इसराईली पर्यटकों का यह अति प्रिय केन्द्र है । लिटिल को एक मनोरंजन चैनल में नौकरी मिल गयी इसलिए उन्हें बनारस छोड़ना पड़ा । उनके बड़े भाई अली नवाज जैदी अब उस कैफ़े के संचालक हैं । लिटिल की चर्चा पर्यटक स्वदेश लौट कर भी करते हैं इसलिए बनारस आने वाले इसराईली पर्यटक अभी भी उसकी दुकान और उसे खोजते हुए पहुंचते हैं ।

    १८५७ से ७६ साल पहले अंग्रेज सैनिकों के छक्के छुड़ाने वाले इस मोहल्ले की चर्चा इस चिट्ठे पर पहले हुई है । साहित्यकार रत्नाकर के नाम पर बने इस मोहल्ले के रत्नाकर पार्क के समक्ष १९६७ में अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन के प्रदर्शनकारियों पर गोली चालन हुआ था । आतंकी मुम्बई के नरीमन हाउस पर हमले द्वारा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को जो घिनौना संकेत देना चाहते थे उसकी काट भी शिवाला के पोलू भाई और जॉन ज़ैदी बनेंगे , यह हमारी दुआ है ।

 

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देव दीपावली

देव दीपावली

 

 

 

 

 

 

 

 

सांस्कृतिक टोली

सांस्कृतिक टोली

 

 

 

 

 

 

 

 

सलीम शिवालवी

सलीम शिवालवी

 

 

 

 

 

 

 

 

अंजुम सलीमी

अंजुम सलीमी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गुरु नानक जयन्ती , कार्तिक पूर्णिमा और देवदीपावली । काशी की घाट दीप मालिकाओं से पट जाते हैं । सड़क की तरह गंगा जी में नावों और बजड़ों का भी जाम लग जाता है, उस दिन । नावों और बजड़ों का सट्टा पहले से हो जाता है । लिहाजा उस शाम के लिए ‘सामने घाट’ के बाद और अस्सी से पहले अब्दुल्लाहदा ने अपने मित्र पीताम्बर मिश्र का ऐन घाट पर स्थित ‘योग-मन्दिर’ चुना । पाकिस्तान से आई सांस्कृतिक टोली अभिभूत थी गंगा से । क्वेटा के शायर अली बाबा ताज ने अपने एक मित्र की लिखी कविता सुनाई – बामियान की बुद्ध प्रतिमा के तालिबान द्वारा ध्वंस की बाबत । फिर अपनी रचना में कहा – ‘ बात बढ़ तो सकती है,जुस्तजू से आगे भी ,बोलते रहेंगे हम,गुफ़्तगू से आगे भी’  उस रात्रि भोज के मेज़बान प्रोफेसर गजेन्द्र सिंह ( निदेशक , आयुर्विज्ञान संस्थान , का.हि.वि.वि.) का जन्मस्थान भी क्वेटा का था । विभाजन के ठीक पहले गजेन्द्रजी के पिता वहाँ के फौजी अस्पताल में डॉक्टर थे । रुख-ए-निलोफ़र ने एक बागी स्त्री-चेतना की रचना सुनाई । निलोफ़र स्कूली बच्चों में दृश्य कला के पाठ्यक्रम बनाने में लगी हैं और लाहौर में अध्यापन करती हैं । मेज़बानों की ओर से शायर शमीम शिवालवी और कबीर ने स्वागत में मिल्लत का आवाहन करते हुए नज़्म पढ़ी , डॉ. स्वाति ने रवीन्द्र संगीत गाया और   रामिश  ने जाल द बैण्ड का  गीत- ‘वो लमहे’ सुनाया ।

    ‘हिन्द – पाक – सफ़र-ए-दोस्ती’ पिछले २० वर्षों से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए टोलियों की यात्राएं कराने में पहल करता आया है । संगठन के सतपाल ग्रोवर पाकिस्तानी टीम के साथ पधारे थे ।

    सांस्कृतिक टोली की सबसे छोटी सदस्य ११ साल की फ़रीहा है जो हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीख रही है । फ़रीहा राग माधुरी में ,’मोरे मन भावे श्याम मुरारी’ सुनाती है तो स्थानीय अखबार का संवाद दाता उससे पूछता है कि वह यह पाकिस्तान में सुनाती है या नहीं ? उसको यह अन्दाज नहीं है कि वहीं सीख कर उसे यहाँ भी गा रही है ।

    इस सांस्कृतिक टोली के अगुआ शायर अंजुम सलीमी कहते हैं, ‘मैं पलट आया था दीवार पर दस्तक देकर।अब सुना है,वहाँ दरवाजा निकल आया है’ । पेन्टर रेहाना क़ाज़मी कहती हैं , ‘ सियासत से हटकर देखें तो दोनों मुल्कों की आत्मा की आवाज मिलती है ।

    बनारस में इस टोली की आगवानी डॉ. मुनीज़ा रफ़ीक खाँ और गांधी विद्या संस्थान के निदेशक प्रोफेसर दीपक मलिक ने की । टीम के सदस्यों का रात्रि विश्राम बनारस के अलग अलग परिवारों मे हुआ ।

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