Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘caste’ Category

काशी विश्वविद्यालय आवासीय विश्वविद्यालय है। कला संकाय का डॉ एनी बेसेन्ट छात्रावास परिसर के बाहर है। सुरक्षा की दृष्टि से कम सुरक्षित।शहर से सीधे छात्रावास में घुस कर मार-पीट की संभावना ज्यादा होगी यह मानते हुए उसे परिसर के छात्रावासों से अधिक असुरक्षित माना जा सकता था। 1982 में उस छात्रावास में रहने वाले नन्दलाल,नन्दा राम,राम दुलार सहित 8 छात्रों को छुआछूत और जातिगत भावना से मारा-पीटा गया। समता युवजन सभा ने आवाज उठाई तो मार-पीट करने वाले छात्र प्रो मनोरंजन झा की समिति की जांच के बाद निकाल दिए गए। पीडित छात्रों को सुरक्षा की दृष्टि से परिसर के छात्रावास में कमरे दिए जांए,यह मांग भी थी। प्रशासन ने इन सभी छात्रों को बिडला छात्रावास के 6ठे ब्लॉक के कॉमन रूम से 6-7 कमरे बनवा कर आवण्टित किया गया।

सयुस की इकाई की स्थापना के मौके पर किशन पटनायक 1982 में बोले। परिसर में जाति,पैसे और गुंडागर्दी के बोलबाले का हमने जिक्र किया।किशनजी ने कहा ,”भारतीय समाज में जाति ऐसी गली है जो बन्द है।जन्म,विवाह और मृत्यु इसी गली के भीतर होना तय हो जाता है।गुण्डा वह है जो अपने से कमजोर को सताता है और अपने से मजबूत के पांव चाटता है। छात्र किसी एक वर्ग से नहीं आते लेकिन उनका समूह ऐसा होता है जिसके सदस्यों के गुण- जोखिम उठाने का साहस,बड़ों की बात आंख मूंद कर न मान लेना और दुनिया बदलने का सपना देखना होता है।”

मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के फैसले के बाद उच्च शिक्षा केन्द्रों में लाजमी तौर पर विरोध हुआ। चूंकि उच्च शिक्षा केन्द्र सवर्ण वर्चस्व के केन्द्र हैं।मंडल विरोधी छात्रों द्वारा आत्मदाह के प्रयास के बाद मुझे जला कर मारने की योजना बनी। सिख छात्रों को बचाने,एक छात्रावास के कमरे में मालवीयजी के समय से रखे गए गुरुग्रंथ साहब से छेडछाड करने वालों के खिलाफ शिकायत करने के कारण भी मेरे खिलाफ उन्हीं लोगों में गुस्सा था।जो अखबार राम मन्दिर आन्दोलन के दौर में विहिप का पैम्फलेट बन जाते थे उन्हींमें से एक में एक अध्यापक ने सवर्ण वर्चस्व के पक्ष में लिखा,’घोड़ा खरीदने जाते हैं तो अरबी घोड़ा खोजते हैं।कुत्ता रखना होता है तो अलसेशियन रखते हैं। फिर पढ़ाई और नौकरियों में सवर्णों का होना तो स्वाभाविक है।’ इस लेख के छपने के बाद लाजमी तौर पर वे छापा-तिलक लगाए,जनेऊधारी चिकित्सक हमें बेल्टधारी अलसेशियन लगते थे।

ऐसे माहौल में काशी विश्वविद्यालय में नेल्सन मण्डेला का कार्यक्रम बना।उन्हें मानद उपाधि दी गई। हम हवाई अड्डे पर पहुंचे। नेल्सन मण्डेला के साथ राजमोहन गांधी थे। उन्होंने हमें अपने साथ ले लिया।काफिला प्रह्लाद घाट पहुंचा,जहां स्थानीय प्रशासन ने मण्डेला साहब से ‘गंगा-पूजन’ करवाया। 5 कदम की दूरी पर रविदास मन्दिर था,जिसके बारे में मण्डेला साहब को नहीं बताया गया। हमारे ज्ञापन के बारे में राजमोहनजी ने संक्षेप में बताया और हम लोगों से कहा कि वे विस्तार से बाद में उसके बारे में बात कर लेंगे।

ज्ञापन तो यहां दर्ज करेंगे ही,उस दौर में वि.वि. में जाति प्रथा कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए थी,कुछ उदाहरण जान लीजिए। कृषि विज्ञान संस्थान में स्नातक स्तर पर ही आपको अपनी जाति के हिसाब से इतने अंक मिला करते थे कि स्नातकोत्तर कक्षाओं के विभाग उसी हिसाब से तय हो जाते थे। ब्राहमण के कृषि अर्थशास्त्र,राजपूत और भूमिहार के एग्रोनॉमी,पिछडे और दलित के हॉर्टीकल्चर में जाने की संभावना ज्यादा रहती थी। इसका व्यतिक्रम होने पर – कुर्मी किसान घर का पंचम सिंह  और पांडुरंग राव आत्महत्या करते हैं (दोनों कृषि विज्ञान संस्थान)। भौतिकी विभाग के कुशवाहा प्रोफेसर ने  एक क्षत्रीय शोध छात्र (नाम के साथ उसके भी कुशवाहा था) को परेशान किया तो प्रोफेसर ने चक्कू खाया था। छात्र पर 307 न लगे इसके लिए तत्कालीन कुलपति ने कचहरी जाकर निवेदन किया था।

आम तौर पर दलों,संगठनों से ऊपर उठकर जातियों का एका बन जाता था। जातिवादी मठाधीश प्रोफेसर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए जाति का उपयोग करते थे,जाति के प्रति प्रेम भी उसके लिए आवश्यक नहीं होता था।

एक मजबूत दलित प्रत्याशी लगातार ब्राह्मण प्रत्याशी से हारा-तब सवर्ण गोलबन्दी के लिए,’आजादी की लड़ाई सवर्णों ने लड़ी।छात्र संघ किसका? सवर्णों का’ जैसे परचे बटते। संयोगवश मैं भी उसी पद पर चुनाव लड़्ता था। ‘खटिका को हराना है तो……. को जिताना होगा’ नारा सफल नहीं हो पाया क्योंकि मेरे कारण गोलबन्दी नहीं हो पाई। वि.वि. में महिला महाविद्यालय,चिकित्सा विज्ञान संस्थान,दृश्य कला संकाय और प्रौद्योगिकी संस्थान के छात्र छात्राओं में जाति का असर न्यूनतम था और वहां मैं नम्बर एक पर था-अन्य संकायों में एक बडे गठबंधन के नाम पर सोनकर नम्बर पर एक थे। विश्वविद्यालय के पिछड़े- दलित छात्रों ने इस बात पर गौर किया और अगले साल ऊपर दिए संकायों के अलावा उनका भरपूर समर्थन मुझे मिला।

समता युवजन सभा हाथ के बने पोस्टर लगाती और मोटर साइकिल जुलूस की जगह साइकिल जुलूस निकालती। राजनीति में असरकारी होना जरूरी होता है।जब सयुस असरकारी हुई तब मुख्यधारा वाले समूहों ने भी साइकिल जुलूस निकाला।छात्रों ने उसे नकल माना। ”सयुस की साइकिल देखी,सबने मोटर साइकिल फेंकी”

नेल्सन मण्डेला को दिया गया ज्ञापन-

 

प्रति,

माननीय नेल्सन मण्डेला,

नेता, अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस ।                                        दिनांक 17 अक्टूबर 1990

परम आदरणीय महोदय.

आपके हमारे विश्वविद्यालय आगमन के अवसर पर हमारा मन हर्ष नहीं, अपितु विषाद से भर उठा है। मानवीय मूल्यों के लिए आपकी आजीवन लड़ाई,अपने जीवन मूल्यों के लिए कठोरतम परिस्थिति में विश्वास ज्योति को जलाए रखना, सिर्फ ऐसे समाज के लिए प्रेरणा बननी चाहिए जो स्वयं उन मूल्यों में विश्वास करे और उन्हें प्रतिस्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हो।

आज हमारा समाज , विशेषतः इस विश्वविद्यालय का छात्र-युवा,अध्यापक समाज, विशेष अवसर द्वारा विषमता मूलक समाज संरचना को दूर करने के खिलाफ खड़ा है। उसकी वाणी,उसकी लेखनी में जातिवाद के साथ-साथ नस्लवाद साफ-साफ परिलक्षित होता है। जात्यिवाद को वैज्ञानिक व्यवस्था करार देने के साथ हर जाति को अलसेशियन कुत्ता,अरेबियन घोड़ा की विशिष्टता के साथ जोड़ा जा रहा है। आज की तारीख में ऐसी मानसिकता को प्रश्रय देने वाला यह प्रशासन, छात्रावासों में अनुसूचित जाति, जनजाति के छात्रों को अलग लॉबी में रखता है। खुले कमरों में रहने की जुर्रत करने वाले,राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में मुखर दलित छात्रों को पीटा जाता है।लिखित शिकायत करने पर भी कुलपति,प्रशासन सिर्फ आश्वासन देते हैं। दोषी छात्रों अथवा छात्रावास संरक्षकों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाता।

यहां मंडल कमीशन की संस्तुतियों के खिलाफ आन्दोलनकारियों के प्रति वि.वि. प्रशासन ने अतिशय नरम व सहयोगी रुख अपनाया है। ऐसे में यहां की विद्वत परिषद द्वारा आपका अभिनन्दन एक विडंबना ही है। यदि आपको सही वस्तुस्थिति की जानकारी होती तो आप कदापि इस मानद उपाधि को सम्मान नहीं मानते व इसे ग्रहण करने से इंकार कर देते।

विषमता मूलक समाज के पोषक , विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा आयोजित इस समारोह का विरोध करते हुए भी महात्मा गांधी के देश में हम अपने प्रेरणा स्रोत के रूप में आपका स्वागत करते हैं।

विनीत,

( डॉ स्वाति )                                          (हरिशंकर)

समता संगठन                                    समता युवजन सभा

Advertisements

Read Full Post »

आज सुबह से तमाम हत्यारे भाई दिमाग में घूम रहे हैं । अपनी बहन की हत्या करने वाले । पिछले साल भर में ऐसे हत्यारों की तादाद का कोई अन्दाज है ? निश्चित तौर पर अब तक की सर्वाधिक संख्या रही होगी , इस प्रकार के जुर्म करने वालों की। जिनकी बहनों ने अपनी पसंदगी से शादी की , कईयों ने अपने गोत्र में की – यह अपराध उनके भाइयों के आन-बान-शान पर इतना बड़ा धब्बा था कि इन तरुण जोड़ों की जान ले ली जाए ।

आज रक्षा बन्धन के मौके पर समाज में तेजी से बढ़ी इस बीमारी के मद्देनजर लोहिया को याद कर रहा हूँ :

हिन्दुस्तान आज विकृत हो गया है ; यौन पवित्रता की लम्बी चौड़ी बातों के बावजूद , आमतौर पर विवाह और यौन के सम्बन्ध में लोगों के विचार सड़े हुए हैं ।

… नाई या ब्राह्मण के द्वारा पहले जो शादियाँ तय की जाती थीं उसकी बनिस्बत फोटू देख कर या सकुचाती शरमाती लड़की द्वारा चाय की प्याली लाने के दमघोंटू वातावरण में शादी तय करना हर हालत में बेहुदा है। यह ऐसा ही है जैसे किसी घोड़े को खरीदते समय घोड़ा ग्राहक के सामने तो लाया जाए , पर न उसके खुर छू सकते हैं और न ही उसके दाँत गिन सकते हैं ।

..लड़की की शादी करना माँ बाप की जिम्मेदारी नहीं ; अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी शिक्षा दे देने पर उनकी जिम्मेदारी ख़तम हो जाती है । अगर कोई लड़की इधर उधर घूमती है और किसी के साथ भाग जाती है और दुर्घटना वश उसके अवैध बच्चा , तो यह औरत और मर्द के बीच स्वाभाविक सम्बन्ध हासिल करने के सौदे का एक अंग है , और उसके चरित्र पर किसी तरह का कलंक नहीं ।

लेकिन समाज क्रूर है । और औरतें भी बेहद क्रूर बन सकती हैं । उन औरतों के बारे में , विशेषत: अगर वे अविवाहित हों और अलग अलग आदमियों के साथ घूमती फिरती हैं , तो विवाहित स्त्रियां उनके बारे में जैसा व्यवहार करती हैं और कानाफूसी करती हैं उसे देख कर चिढ़ होती है । इस तरह के क्रूर मन के रहते मर्द का औरत से अलगाव कभी नहीं खतम होगा।

….समय आ गया है कि जवान औरतें और मर्द ऐसे बचकानेपन के विरुद्ध विद्रोह करें । उन्हें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि यौन आचरण में केवल दो ही अक्षम्य अपराध हैं : बलात्कार और झूठ बोलना या वादों को तोड़ना । दूसरे को तकलीफ़ पहुँचाना या मारना एक और तीसरा भे जुर्म है,जिससे जहां तक हो सके बचना चाहिए।

…. धर्म , राजनीति , व्यापार और प्रचार सभी मिल कर उस कीचड़ को संजो कर रखने की साजिश कर रहे हैं जिसे संस्कृति के नाम पुकारा जाता है । यथास्थिति की यह साजिश अपने आप में इतनी अधिक शक्तिशाली है कि उससे बदनामी और मौत होगी । मुझे पूरा यकीन है है कि मैंने जो कुछ लिखा है उसका और भी भयंकर बदला चुकाया जाएगा , चाहे यह लाजमी तौर पर प्रत्यक्ष या तात्कालिक भले ही न हो ।

जब जवान मर्द और औरतें अपनी ईमानदारी के लिए बदनामी झेलते हैं , तो उन्हें याद रखना चाहिए कि पानी फिर से निर्बन्ध बह सके इसलिए कीचड़ साफ़ करने की उन्हें यह कीमत चुकानी पड़ती है ।

आज जाति और योनि के इन वीभत्स कटघरों को तोड़ने से बढ़ कर और कोई पुण्यकार्य नहीं है। वे सिर्फ इतना ही याद रखें कि चोट या तकलीफ़ न पहुँचाएँ और अभद्र न हों,क्योंकि मर्द और औरत के बीच का रिश्ता बड़ा नाजुक होता है । हो सकता है,हमेशा इससे न बच पायें। किन्तु प्रयत्न करना कभी नहीं बंद होना चाहिए । सर्वोपरि , इस भयंकर उदासी को दूर करें,और जोखिम उठा कर खुशी हासिल करें ।

१९५३, जनवरी । (जाति-प्रथा,समता विद्यालय न्यास,हैदराबाद)

फैसला करो कि कैसा संसार रचाना है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि सबसे अच्छी बात होगी , नर-नारी के सम्बन्ध में,एकव्रत रहें, यानी एक तरफ़ पतिव्रत और दूसरी तरफ़ पत्नीव्रत । यह सबसे अच्छी चीज है ,लेकिन अगर वह नहीं रहता है तो फिर क्या अच्छी चीज है । आधुनिक दिमाग के सामने एक संकट आ गया है कि जब तक संसार रहेगा, तब तक मनुष्य रहेगा और तब तक यह आफ़त रहेगी कि बलात्कार और व्यभिचार,दो में से कोई एक प्राय: निश्चित ही रहेगा । अब किसको चाहते हो ? बलात्कार को या व्यभिचार को चाहते हो ? जिस समाज में व्यभिचार को इतना ज्यादा बुरा कह दिया जाता है कि उसको पाप सिर्फ़ नहीं नरक(मिलेगा) और उसके लिए यातना सजा ऐसी कि बहुत बुरी बुरी , उस समाज में बलात्कार हो करके रहता है और बहुत अधिक होता है। आधुनिक दिमाग पसंद करेगा वही एकव्रत वाली अवस्था को । कहीं गलत मत समझ लेना कि मैं व्यभिचार पसंद कर रहा हूँ। लेकिन फिर दूसरे नम्बर की चीज में कहेगा कि मनुष्य है ही ऐसा,तो फिर किया क्या जाए ? बलात्कारी से व्यभिचारी अच्छा। यह आगे देखू दृष्टि है ।

१९६२ ,सितम्बर

Read Full Post »

किसी आबादी के छोटे हिस्से की गणना (सैम्पल सर्वे ) और उस के आधार पर पूरी मूल आबादी के आँकड़ों के अनुमान लगाने के फायदों में प्रमुख पैसे और समय की बचत बताया जाता है । परन्तु जब पूरी आबादी की गणना यूँ भी हर दस साल पर होती है तब सिर्फ़ कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों को मर्दुम शुमारी की प्रश्नावली में जोड़ लेना तो खर्चीला भी नहीं होगा । विद्वानों का एक तबका सोच – समझ कर सोचने – समझने की गलतियाँ करना चाहता है इसलिए पूरी आबादी में जातियों की गिनती की मुख़ालफ़त कर रहा है । भारत में जाति – प्रथा को समझने तथा उसको समाप्त करने की दिशा में कदम उठाने की बाबत डॉ. राममनोहर लोहिया ने अपनी पैनी मेधा से प्रकाश डाला । अपनी बातों को बल प्रदान करने के लिए लोहिया आँकड़ों और अनुमानों का जगह – जगह हवाला देते हैं । इन्हें पढ़ते हुए लगता है कि मुल्क के पैमाने पर काश इस प्रकार के आँकड़े उपलब्ध होते।

इस आलेख में लोहिया के ऐसे वैचारिक उद्धरण लिए जा रहे हैं जिनमें उन्होंनेआँकड़े या अनुमानों का हवाला दिया है :

* सारे देश के पैमाने पर अहीर , जिन्हें ग्वाला , गोप भी कहा जाता है , और चमार , जिन्हें महार भी कहा जाता है , सबसे ज्यादा संख्या की छोटी जातियाँ हैं । अहीर तो हैं शूद्र और चमार हैं हरिजन। हिन्दुस्तान की जाति प्रथा के वे वृहत्काय हैं , जैसे द्विजों में ब्राह्मण और क्षत्रीय । अहीर , चमार, ब्राह्मण और क्षत्रीय , हर एक २ से ३ करोड़ हैं । सब मिला कर ये हिन्दुस्तान की आबादी के करीब १० से १२ करोड़ हैं । फिर इनकी सीमा से हिन्दुस्तान की कुल आबादी के तीन चौथाई से कुछ कम बाहर ही रह जाते हैं । कोई भी आन्दोलन जो उनकी हैसियत और हालत को बदलता नहीं , उसे थोथा ही मानना चाहिए । इन चार वृहत्कायों की हैसियत और हालत के परिवर्तन में उन्हें ही बहुत दिलचस्पी हो सकती है पर पूरे समाज के लिए उनका कोई खास महत्व नहीं है ।

उत्तर हिन्दुस्तान के अहीरों और चमारों ने भी , शायद पर्याप्त जागरूक न रहते हुए , रेड्डियों और मराठों जैसे ही प्रयत्न किये हैं । उन्हें असफल होना ही था, पहले तो इसलिए उत्तर में द्विज बहुत संख्या में हैं और दूसरे इसलिए कि उत्तर की नीची जातियों के बीच संख्या में वे उतने शक्तिशाली नहीं हैं । इसके बावजूद कुछ दब कर प्रयत्न हो ही रहा है । कई मानी में जनतंत्र है संख्या का ही शासन । ऐसे देश में जहाँ समुदायों का संसर्ग जन्म और पुरानी परम्परा के आधार पर होता है , सबसे ज्यादा संख्या वाले समुदाय राजनैतिक और आर्थिक विशेषाधिकार प्राप्त कर ही लेते हैं । संसद और विधायिकाओं के लिए उन्हीं के बीच से उम्मीदवारों का चयन करने के लिए राजनीतिक दल उनके पीछे भागते फिरते हैं । और व्यापार और नौकरियों में अपने हिस्से के लिए ये ही सबसे ज्यादा शोर मचाते हैं । इसके परिणाम बहुत ही भयंकर होते हैं । सैंकड़ों नीची जातियाँ जो संख्या में प्रत्येक कमजोर हैं, पर सब मिला आबादी का बहुत बड़ा तबका हैं ,निश्चल हो जाती हैं । जाति पर हमले का मतलब होना चाहिए सबकी उन्नति न कि सिर्फ किसी एक तबके की उन्नति । एक ही तबके की उन्नति से जातिप्रथा के अन्दर कुछ रिश्ते परिवर्तित होते हैं , किन्तु जातियों के आधार में कोई बदलाव नहीं आता ।

एक और मानी में भी किसी एक तबके की उन्नति घातक होती है । नीची जातियों के जो लोग ऊँची  जगहों पर पहुँच जाते हैंवे मौजूदा ऊँची जातियों में घुल मिल जाना चाहते हैं । इस प्रक्रिया में वे लाजमी तौर पर ऊँची जातियों के दुर्गुण सीख जाते हैं । ऊँची जगह पर पहुँचने के बाद , सभी जानते हैं कि नीची जाति के लोग कैसे अपनी औरतों को परदे में कर देते हैं जो कि उच्च जातियों नहीं होता , बल्कि बिचली उच्च जाति में ही होता है । इसके अलावा, ऊँची उठने वाली नीची जातियाँ द्विज की तरह जनेऊ पहनने लगती हैं ,जिससे वे अब तक वंचित रखे गये , लेकिन जिसे अब सच्ची ऊँची जाति उतारने लगी है । इस तरह की उन्नति से नीची जातियों के बीच कोई गरमी नहीं आती । जो उन्नत हो जाते हैं वे अपने ही समुदाय से अलग हो जाते हैं, अपने ही मूल नीचे समुदायों को गरमाने के बजाय , वे जिन जगहों पर पहुँचते हैं वहां की ही ऊंची जातियों का अंग बन जाने की कोशिश करते हैं । इस उन्नति को अच्छे गुण सीखने या योग्य बनने का टेक नहीं मिलता, बल्कि जाति भड़काने और लड़ाने का भिड़ाने का टेक मिलता है ।

……. औरत , शूद्र , हरिजन,मुसलमान और आदिवासी , समाज के इन ५ दबे हुए समुदायों को , उनकी योग्यता आज जैसी भी हो , उसका लिहाज किए बिना , उन्हें नेतृत्व के स्थानों पर बैठाना इस आन्दोलन का लक्ष्य होगा । योग्यता का प्रेक्षण भी ऐसा होता है कि वह ऊँची जाति के ही पक्ष में जाता है । इतिहास के हजारों बरसों ने जो किया उसे धर्मयुद्ध के द्वारा ही दूर किया जा सकता है । समाज के दबे हुए समुदायों में सभी औरतों को ,द्विज औरतों समेत जो कि उचित ही है , शामिल कर लेने पूरी आबादी में इनका अनुपात ९० प्रतिशत हो जाता है ।

….इस बात बार बार जोर डालना चाहिए कि नीची जातियों के सैंकड़ों , जिन पर अन्यथा ध्यान नहीं जा पाता, उन पर पूर्व नियोजित नीति द्वारा ध्यान देना चाहिए,बनिस्बत उन दो वृहत्काया वालों के जो किसी न किसी तरह ध्यान आकर्षित कर ही लेते हैं ।

…. हिन्दुस्तान की जनता को हम तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं १. द्विज या जनेऊधारी , २. हरिजन या अछूत , और ३. शूद्र ।पहले की जनसंख्या ७ करोड़ के आसपास है, हरिजनों की ५ करोड़ और शूद्रों की १७ करोड़ ।

…द्विज लाख की चोरी करके भी उसे आदर्शवाद का जामा पहना सकता है , जबकि शूद्र अठन्नी-चवन्नी की चोरी में भी बुरी तरह पकड़ा जाता है ।

काफ़ी हाउस में बैठ कर बातें करने वालों में एक दिन मैं भी बैठा था जब किसी ने कहा कि काफ़ी के प्यालों पर होने वाली ऐसी बातचीत ने ही फ्रांस की क्रान्ति को जन्म दिया । मैं गुस्से में उबल पड़ा । हमारे बीच एक भी शूद्र नहीं था । हमारे बीच एक भी औरत न थी । हम सब ढीले ढाले , चुके हुए और निस्तेज लोग थे , कल के खाये चारे की जुगाली करते हुए ढोर की तरह ।

…. देश की सारी राजनीति में – कांग्रेसी , कम्युनिस्ट अथवा समाजवादी चाहे जानबूझ कर अथवा प्रम्परा के द्वारा राष्ट्रीय सहमति का एक बहुत बड़ा क्षेत्र है , और वह यह कि शूद्र और औरत को , जो कि पूरी आबादी का के तीन चौथाई हैं, दबा कर और राजनीति से अलग रखो ।

जनगणना में जाति की गिनती और विधायिका में महिला आरक्षण की बहस में कितनी औरते और शूद्र शरीक हैं ?




Read Full Post »

मेरी बहन डॉ. संघमित्रा की शादी हुई डॉ. सुरेन्द्र गाड़ेकर के साथ । शादी सुबह सार्वजनिक संडास-सफ़ाई और गौशाला सफ़ाई से शुरु हुई थी। शाम को आशीर्वाद -गोष्ठी में सर्वोदयी मनीषी दादा धर्माधिकारी ने कहा कि इस दम्पति की संतान ’महागुजबंगोड़िया’ होगी । दादा संविधान सभा के सदस्य भी रहे । दादा के इस सम्बोधन में तीन पीढ़ी ऊपर और एक पीढ़ी बाद तक का तार्रुफ़ हो जाता है। मेरे ओड़िया नाना , बंगाली नानी ,और गुजराती पिता के अलावा महाराष्ट्र के जीजाजी का उल्लेख दादा द्वारा दिए गए सम्बोधन में आ गए। इस प्रकार मेरी भान्जी चारुस्मिता महागुजबंगोड़िया हुई ।

इस सम्बोधन के सभी शब्दांश प्रान्त और भाषा का संकेत देते हैं , जाति का नहीं । मेरी माँ ने मुझे सिखाया था कि तुम्हारी जाति ’वर्ण शंकर’ है । बहुत ताव से मैं यह बताता था। काफ़ी बाद में पता चला कि गीता के अनुसार वर्ण शंकर काफ़ी ’खतरनाक” विचार है । [ पहले अध्याय के ४१वें से ४४वें श्लोक में अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं,’हे कृष्ण ! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां अत्यन्त प्रदूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दूषित चरित्र वाली हो जाने पर वर्णशंकर संतान उत्पन्न होती है । वर्ण शंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। गुप्त शारीरिक विलास जो नर-मादा के बीज और रज रूप जल की क्रिया से इनके वंश भी अधोगति को प्राप्त होते हैं । इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं । हे जनार्दन ! जिनका कुल धर्म नष्ट हो गया है ऐसे मनुष्यों का अनिश्चितकाल तक नरक में वास होता है ऐसा हम सुनते आये हैं । ]

अर्जुन के मुख से इन समस्त गालियों को सुनने के बावजूद जाति तोड़ने में अन्तर्जातीय विवाह का महत्व (खास कर सवर्ण-अवर्ण) गौण नहीं किया जा सकता। जहाँ तक जनगणना में मुझ जैसे वर्ण शंकरों के वर्गीकरण की बात है हजारों अलग-अलग जातियों की तरह एक समूह इनका भी निर्दिष्ट हो सकता है । यह कत्तई जनगणना में जाति को न गिनने के हक़ में  गिनाया नहं जाना चाहिए। जनगणना की सांस्कृतिक सारिणियों के खण्ड में धर्म न बताने वालों की भी अलग गिनती होती है।

केन्द्र सरकार की नौकरियों में मण्डल कमीशन की संस्तुतियों को लागू करने की घोषणा के बाद सामाजिक यथास्थिति को बनाये रखने में जिनका स्वार्थ था वे तमाम ताकतें सक्रिय हो उठी थीं। इनमें खुद को आग लगाने वाले तरुणों से लगायत भारत के बड़े व्यापारियों की संस्थायें और तमाम अखबारों में अग्रलेख लिखने वाले भी थे । देश के सर्वोच्च न्यायालय ने पक्ष-विपक्ष के तमाम तर्कों को सुनने के बाद क्रीमी लेयर की शर्त के साथ इसे वैधानिक माना। उच्च शिक्षा में पिछड़े वर्गों के आरक्षण के मामले को भी सर्वोच्च न्यायालय में ले जाया गया , जहाँ उसे भी वैध ठहराया गया।

मंडल संस्तुतियों के विरोध को भाजपा और कांग्रेस उकसाने का काम कर रही हैं ऐसा जान पड़ता था। हाल ही में जब लोक सभा में जनगणना में जाति की गिनती पर चर्चा हुई तब भाजपा के हुकुम देव यादव , कांग्रेस के बेनी प्रसाद वर्मा , मुस्लिम लीग तथा नैशनल कॉनफ़रेंस के नुमाइन्दों की वक्तृता ने मुझे प्रभावित किया। सदन में आम सहमति दीख रही थी- मानो देश की आबादी का अक्स दीख रहा हो।

न्यायपालिका , विधायिका में आए ये सकारात्मक परिवर्तन स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं । इसके बावजूद अखबारों के अग्रलेखों में मर्दुम शुमारी की बाबत लिए गए इस अहम फैसले की नुक्ताचीनी वाले लेख आना जारी है। मंडल कमीशन के विरोध से अपने असामाजिक जीवन की शुरुआत करने वाले अरुण त्रिपाठी ’हिन्दुस्तान’ के एसोशियेट एडिटर हैं। तमाम समाज शास्त्रियों और विद्वानों के नाम अपने लेख में चुआने के बाद उन्हें यह समझ में आता है कि जाति को गिनने से उसे भूलाना आसान न होगा। इसी अखबार में टेवि पत्रकार सुधांशु रंजन एक ओर अपने से ऊपर की जाति में गिनती कराने तथा उसी वाक्य में जातीय वोट बैंक के कारण तादाद बढ़ाने की प्रवृत्ति का उल्लेख करते हैं। पिछली शताब्दी की शुरुआत में कई अत्यन्त पिछड़ी जातियों द्वारा अछूत जातियों के साथ खुद को न गिने जाने,कुछ पिछड़ी जातियों द्वारा खुद को क्षत्रीय गिनाने की प्रक्रिया अपनाई गई थी। इसे ’ऊँचा बनो आन्दोलन’ कहा गया। इन तबकों ने अपने समूह के विकास में इससे हुए नुकसान को अच्छी तरह महसूस किया तथा मुश्किल है कि वे इस गलती को दोहरायें ।

बहरहाल , मुझ जैसे पतित वर्ण शंकर को भी एक दलित युवा ने इस मुल्क में जाति की सच्चाई से रू-ब-रू करवा दिया था। एक बार बाबा साहब के परिनिर्वाण दिवस पर मेरे भाषण से प्रभावित होकर उस तेज-तर्रार दलित युवा ने मुझसे कहा था, ’भाषण तो जबरदस्त दिया,अब अपनी जाति भी बता दीजिए’-बिलकुल मुक्तिबोध द्वारा कौन सी पॉलिटिक्स है वाले सवाल के तेवर में। मैंने कहा,’मैं जाति में नहीं मानता।’ इस पर तपाक से उसने पूछा ,’ उस जाति का नाम ही बता दीजिए जो आपको अपने में मानती है !’ मैं निरुत्तर था।

किसी जुलूस में जब तक कुछ पागल , कुछ विकलांग नहीं दिखते तब तक उसे ’काएदे की तादाद वाला जुलूस’ नहीं कहा जा सकता- यह मेरा साथी अजय द्विवेदी कहता था।

[कम्प्यूटर के मॉनिटर के सामने बैठ कर हिन्दी में विचार व्यक्त करने वालों की तादाद अब इतनी हो चुकी है कि इसे काएदे का कहा जाए! अपने खेत में निपटने से जिनका मन हल्का नहीं होता वे घूम घूम कर निपटते हैं -ऐसी छिटपुट बूँदा-बाँदी और गरज के साथ छीटें की अनुमति यहाँ न होगी।]

Read Full Post »

%d bloggers like this: