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Posts Tagged ‘indian sculpture’

पिछले भाग : एक , दो

विष्णु ने मात्र  भारतीय शिल्पकारों को शिव के जैसा प्रभावित नहीं किया है । तो भी विष्णु के विशेषतापूर्ण कई शिल्प-रूप मालूम होते हैं । मुझे अक्सर लगता है कि विष्णु अपने वस्त्र आवरण के नीचे कुछ छिपा रहा है । हालाँकि वह छिपाना मानवी हित के लिए और और मानव के लोभ को मर्यादित करने हेतु एवं उसके व्यापक संरक्षण की खातिर हो सकता है । विष्णु बिलकुल आराम करते हुए लेटे हैं । जय-पराजय से होने वाले हर्ष विषाद की कक्षा लांघ गये हैं । लगता है अखंड निद्रा लेते हुए वह अपने कृपालय के नीचे रहने वाले विश्व की निगरानी कर रहा है । उदयगिरी का विष्णु का शिल्प मुझे सबसे ज्यादा पसंद है । उसमें दिखाया गया है कि विष्णु वराह का रूप धारण करके एक अलौकिक सुन्दर कुमारिका को ,साक्षात ,  पृथ्वी की मुक्तता कर रहा है । यह पृथ्वी ही विष्णु की पत्नी है । समुद्र उसका वसन और पर्वत , वक्षस्थल । यह वर्णन एक स्तोत्र में है ।

उदयगिरी , वराह अवतार - विष्णु

उदयगिरी , वराह अवतार - विष्णु

आश्चर्य लगता है कि भारतीय शिल्पकारों को राम का कुछ भी आकर्षण क्यों नहीं लगा और कृष्ण को भी उन्होंने अपने कलाविष्कार के विषय में स्थान क्यों नहीं दिया । शायद उन्होंने राम और कृष्ण की शिल्पाकृतियाँ बनाई भी होंगी । एक तो वे नष्ट हुई होंगी या अब तक अज्ञात रही होंगी । अब तक अस्तित्व में दिखाई देने वाला द्वारिका कृष्ण मन्दिर का बालकृष्ण चतुर और होशियार प्रतीत होता है ।

भारतीय शिल्पों के सौन्दर्य की खोज करते समय मुझे उन शिल्पों में प्रकट होने वाले भारतीय इतिहास का अधिकाधिक और बार-बार दर्शन होता गया । रोम के कोलिशियम मानस्तम्भ और कहिरा के पिरामिड्स या स्फिन्क्स जैसे अवशेष जिस तरह इतिहास का दर्शन कराते हैं वैसे ही अन्य पाषाण , ईंटें , धातुओं के टुकड़े वगैरह खास कर जिन पर कुछ खोदा गया है ऐसी चीजें इतिहास खोलकर बताती हैं । हालांकि उनके द्वारा मालूम होने वाला इतिहास प्रत्यक्ष घटित इतिहास होता है ।

ये इतिहास साधन कहीं केन्द्रीय जगह पर वस्तु संग्रहालय में रखे जाते हैं । अन्यत्र कहीं पर मूल रूप में प्रत्यक्ष होने वाली वस्तुओं का वे एक जगह रखे हुए नमूने मात्र होते हैं । अलग – अलग काल की सात दिल्लियों में ऐसे कई ऐतिहासिक पाषाण और धातु के नमूने देखने को मिलते हैं । भिन्न भिन्न सात काल खण्डों की उए सात या आठ दिल्लियाँ एक ही इलाके में बसी हुई हैं ।उनकी रचना का काल और पद्धतियों में एक तरह की विसंगति मालूम होती है । उनमें से हरेक दिल्ली में कुछ आसानी से ध्यान खींचने वाली विशेषताएं भी व्यक्त होती हैं । और उस वजह से ही सभी दिल्लियों की रचना का विशिष्ट काल भी ध्यान में आता है तथापि उनमें से ज्यादातर दिल्लियों की बनावट एक दूसरे जैसी दिखाई देती है । इन दिल्लियों में चार असाधरण सुन्दर वस्तुएं हैं । उनकी रचना कुछ हाले ही के काल की है । मैजिक लैंन्टन की मदद से दिखाई जाने वाली किसी छाया चित्र कथा की चित्र माला के समान मन पर जो छाप छूटती है वह आदमी के सहज भूलने की शक्ति की और भारत के गत हजारों वर्षों की नादानी की । बदकिस्मती से मैं अथेना कभी नहीं जा सका किन्तु मुझे लगता है कि अथेना के अवशेष अथेनियन एवं ग्रीक इतिहास के प्रतीक हैं ।हिन्दुस्तान का उल्टा है । यहाँ का इतिहास ही यहाँ के अवशेषों का चिन्ह हैं ।

अन्य देशो में ऐतिहासिक अवशेष और प्राचीन कला वस्तुओं की अपेक्षा लिखित इतिहास ज्यादा विपुल पैमाने पर मिला है । भारत में मात्र लिखित इतिहास की तुलना में प्राचीन कला वस्तु और अवशेष ज्यादा पैमाने पर मिलते हैं । मानवी विस्मृति  अपने को मिटा न पाये , अपनी कला की अभिव्यक्ति अधिक लम्बे समय तक टिकने वाले धार्मिक माध्यम से करना संभव हो  और स्त्री सुन्दरता एवं मानवी जीवन की खुशनुमा कृतियाँ  बढ़िया ढंग से चित्रित की जाए इस दृष्टि से भारतीय कलावंतों ने कोशिश की और उनके प्रयत्नों के कारण ही सही माने में भारतीय इतिहास के वे श्रेष्ठ उद्गाने बने । उनकी कलाकृतियों में केवल भारतीय इतिहास के प्रसंग नहीं चित्रित किए गए , तो भारतीय आत्मा की कथा चित्रित की हई है । प्रत्येक बदलने वाले युग के साथ भारतीय आत्मा ने अलग अलग  रूप धारण किया है ।

संपूर्ण इटली में अथवा पूरे इजिप्त में देखना असंभव ऐसी शिल्प कला खजुराहो , भुवनेश्वर , कोणारक , धारवाड़ भाग के एक एक शिल्प में दिखाई देती है । अजंता , वेरूल या चितुर के बारे में तो बोलना ही नहीं चाहिए । इस विशाल देश में जगह जगह ऐसे साठ से अधिक शिल्प फैले हैं । विविध मानवी समाजों द्वारा शिल्पकला और वास्तुकला में की  हुई प्रगति तोलने के लिए तराजू के एक पलड़े में भारतीय कला वस्तुएँ और दूसरे पलड़े में उर्वरित सारी दुनिया की कला वस्तुएँ रखो तो पलड़ा किस तरफ़ झुकेगा कहना मुश्किल है ।

भारतीय कला केन्द्र शौकीन यात्रियों के नियमित मार्ग पर नहीं हैं । ज्यादातर जगह शहरों से दूर हैं । महाबलीपुरम मद्रास से चालीस मील पर तो धारापुरी समुद्र मार्ग द्वारा बम्बई से लगभग १ घण्टे के रास्ते पर है । खजुराहो , अजंता , वेरुल , कोणारक नजदीक के रेल स्टेशन से इसी तरह चालीस मील पर है ।सारे कला केन्द्र बड़े शहरों से दूर हैं और यह स्वाभाविक भी है ।चूँकि भारतीय इतिहास की ’आत्मा’ माने परदेशियों की नजर के जिस पर लगातार आघात होते हैम , ऐसी वह एक नाजुक सुन्दरी है । इस वजह से ही आने जाने वालों की आकस्मिक नजर नहीं पहुंचेगी । इसलिए दूर और निर्जन जगह पर यह खूबसूरत स्त्री छिपी है ।

( जारी )

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भाग : एक

    मुझे इस प्रसंग में अमरीका के राष्ट्रीय नेताओं की चार मूर्तियों की याद आती है । वे प्रचंड हैं । एक दफ़ा अमरीका में हवाई जहाज से जाते समय उन पुतलों पर से मेरा हवाई जहाज उड़ा । मैंने मेरे हवाई जहाज चालक को फिर से उन मूर्तियों पर से हवाई जहाज लेने को कहा। इच्छा थी कि हो सका तो उन अखंड मूर्तियों की कला का सार जान लूँ । यह कहना संभव Dean_Franklin_-_06.04.03_Mount_Rushmore_Monument_(by-sa) है कि वास्तविक दृष्टि से वे मूर्तियाँ भारतीय मूर्तियों की अपेक्षा ज्यादा अच्छी हैं । वे मूर्तियाँ ग्रीक और रोमन शिल्प परम्परा को सम्मान पूर्वक आगे चला रही हैं । लेकिन मैं नहीं कह सकता कि उन मूर्तियों से कुछ संदेश मिलता है या नहीं । हालाँकि उन मूर्तियों की पृष्टभूमि की कथाएं ज्यादा वेधक पद्धति से चित्रांकित करने में उस शिल्प ने सफलता हासिल की है । और वे कथाएं ही एक महान संदेश हैं ।  मूर्तियाँ केवल चेहरों की हैं । मान लीजिए कि शरीर  का उर्वटित हिस्सा यदि बनाया जाता तो ज्यादा से ज्यादा लिंकन और वाशिंग्टन के आगे की ओर उठाए हुए पैरों में अविष्कृत जादू केवल प्रेक्षकों को महसूस होता । ऐसा भी कहना संभव है कि मुझे ही मूर्तियों का मतलब पूरी तरह से मालूम नहीं हुआ । जो कि जल्दी में देखने वालों को महान कृतियाँ अपना रहस्य कभी भी बता नहीं सकतीं । लेकिन मुझे वे अमरीकी मूर्तियाँ प्यारी लगीं । खूबसूरती रेखांकित करने में में व्यक्त हुई प्रतिभा और कारीगरी के कारण वे पुतले भारतीय कलाकृतियों से ज्यादा पसंद आये । भारतीय पुतलों में ऐसी सुन्दरता और ऐसी कारीगरी प्रतीत नहीं होती ।

    यद्यपि भारतीय मूर्तिकरण की एक अलग विशेषता है । मूर्ति में मानव की केवल शरीराकृति चित्रित करने पर भारतीय शिल्पाकृति चित्रित करने पर भारतीय शिल्प ज्यादा जोर नहीं देता । भारतीय शिल्प में तो उस व्यक्ति के जीवन और आशय को ज्यादा महत्व दिया गया है । उस व्यक्ति का एकाध भाव  अथवा सारे के सारे के भाव शिल्पांकित करने में भारतीय कलाकारों को समाधान नहीं मिलता तो जिस अमूर्त जीवन शक्ति के आधार से उस व्यक्ति को , उसकी पाषाण मूर्ति को या हम सभी को अस्तित्व उपलब्ध होता है वह जिंदापन , वह जीवन शक्ति भारतीय शिल्पों में संक्षिप्त रूप में चित्रित होने का अहसास होता है जिसको देखकर आदमी (मोहित) पागल होता है । शायद ऐसा लगेगा कि सभी भारतीय कलाकार बौद्ध व जैन पंथ के प्रभाव में चले गये और उन्हें हिंदू धर्म के बारे में आस्था नहीं रही । लेकिन ऐसा नहीं हुआ ।

    शिवशंकर पर अन्य किसी भी देवता की अपेक्षा भारतीय शिल्पकारों को ज्यादा प्रेम है । शिव के शांत , स्तब्ध व्यक्तित्व ने तत्ववेत्तओं को अधिक सर्वांगीण विचार करने की प्रेरणा दी । उसी तरह शिव के व्यक्तित्व ने शिल्पकारों को शिल्पकला का सम्पन्न रूप ज्यादा पैमाने पर दुनिया के सामने रखा । सातवीं सदी के और उसके बाद काल  के शिल्पों में अथवा बारहवीं सदी के और उसके बाद के काल में खजुराहो के शिल्प में शंकर पार्वती के शरीर को लपेटकर और वक्ष:स्थल के नीचे हाथ घेरकर बैठा हुआ है और पार्वती उसके बायीं गोदमें बैठी है । निहायत संतुष्ट अवस्था में वे दोनों बैठे दिखाई देते हैं । काल निश्चल खड़ा है । कालगति पर नियंत्रण रखनी की चाह कहीं भी दिखाई नहीं देती । क्षय अनन्त है । भविष्यकाल अपने पीछे दौड़े ऐसी उत्कंठा वर्तमान काल में नहीं दिखायी देती । भूतकाल को भी चिंता नहीं है ।  तत्काल स्वयंपूर्ण होती है और अपने अस्तित्व का औचित्य स्वयं ही बताती है । तत्काल कृति एक निस्तब्ध कृति है । अचर का चर कर्म । क्या आदमी अपने व्यवहार में तात्कालिकता का यह तत्व अमल में ला सकता है ? कहना मुश्किल है । शिल्पकार द्वारा खोदा गया शिव का सनातन व्यक्तित्व मात्र आदमी को उस दिशा की ओर गति दिखाता है । अगले क्षण के बारे में आदमी की उत्सुकता शायद पूरी तरह से कभी भी खत्म नहीं होगी । लेकिन वर्तमान काल में स्वयं को काफ़ी उलझाकर , उससे ज्यादा से ज्यादा फल प्राप्त करना उससे संभव हो सकता है।

    शिव के असीम व्यक्तित्व के कारण भारतीय शिल्पकारों को हिंदुओं का धर्म सम्बन्धी चिन्तन श्रेष्ठ और संपन्न रूप में और संक्षिप्त रीति से व्यक्त करना संभव हुआ । धारापुरी के आठवीं सदी के और नौवीं व सोलहवीं सदी के चितुर की गुफाओं में शिव की तीन विभिन्न रूप की मोहक मूर्तियाँ हैं । एक ध्यानमग्न दूसरी रौद्र और तीसरी लारयुक्त ।  शिल्पकारों ने शिव का एक भी रूप चित्रित करने से बहीं छोड़ा । तन्हाई में महान और प्रसिद्ध तांडवनृत्य शिव करता है ।   उस शिल्प में शिव की निश्चलता में चलता , और चलता में निश्चलता प्रत्यक्षकारक है । सिंह और भेड़ को एक जगह रखने जैसा बुद्धि का अगम्य चमत्कार उस मूर्ति में शिल्पित 3026465933_f75b1b8bd4किया है । आधे हिस्से में स्त्री और आधे हिस्से में पुरुष ,अर्धाँग शंकर वह अर्ध नारी नटेश्वर का रूप सर्वोच्च और सजीव जैसे सभी भेद मिटाने वाला सृजन लगता है ।

  

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तिहास के ग्रन्थों का कभी ना कभी नाश होना अटल है । यह जान कर ही शायद भारतीय जनता ने अनंत काल तक प्रचलन में रहने वाली  कथा कहानियों के माध्यम से इतिहास बनाया है। इतिहास को क्रोध आया । उसने बदला लिया और सबसे ज्यादा समय तक अभंग रहने वाले पाषाणों पर उसने अपनी आत्मा खोदकर रखी । भारतीय धर्म ने भी अपनी कथा पाषाणों पर ही चित्रित की है ।

भारतीयों का धर्म जैसे जैसे उत्कर्ष तक पहुंचने लगा वैसे वैसे उसका रूप अधिकाधिक सत्वहीन और चिंतनहीन बनता गया । पाषाण जैसी सबसे भारी चीज पर जब भारत का धर्म ज्यादा पैमाने पर खोदा जा रहा था , उसी समय चिंतन में खोखलापन बढ़ रहा था । दुनिया के किसी भी अन्य देश ने अपनी आत्मा के इतिहास को  और अपने इतिहास की आत्मा को भारत के समान पत्थर पर खोदकर लुभावनी शकल नहीं दी होगी । एक तरफ इतिहास और धर्म विषयक चिंतन में स्मिता और वहीं दूसरी तरफ धार्मिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं के काल्पनिक चित्रों में श्वास रोकने वाली लगभग चिरंतन सुन्दरता ।

भगवान बुद्ध व महावीर न जाने वास्तव में कैसे दिखाई देते थे । मगर उनकी मृत्यु के के करीबन ३ सौ साल बीत जाने के बाद जिन शिल्पकारों ने उनकी मूर्तियाँ खोदीं , उन्होंने उन मूर्तियों में महापुरुषों की शिक्षा का मर्म  इस तरह साकार किया है कि वे गोया सजीव प्रतीत होती हैं । कई तरह के रूपों में बुद्ध  और महावीर को मूर्तियों में चित्रित किया गया है । कहीं चिंतन मग्न तो कहीं करुणा निधि , कहीं अभय मुद्रा में तो कहीं विकारों पर विजय प्राप्त किये हुए । जिस तरह  हाथों और पैरों पर ठोंकी हुई कीलों की एक ही शकल में ईसा मसीह का स्वरूप दिखाई देता है वैसे बुद्ध और महावीर की मूर्तियों का नहीं । भारतीय शिल्पकारों ने उनका एक ही एक रूप  चित्रित करने का बन्धन नहीं स्वीकारा। अपनी इच्छा के अनुसार अपने आराध्य देवता का चित्र रेखांकित करने की आजादी युरोपीय चित्रकारों को होगी । लेकिन शिल्पकारों को नहीं होगी भारतीय शिल्पकार ही इस सम्बन्ध में पूर्णतया स्वतंत्र मालूम होते हैं ।

महावीरबुद्ध और महावीर की मूर्तियाँ अनेक रूपों में होने पर भी उन सभी की आस्था व शिल्पशैली एक जैसी है । सभी मूर्तियाँ किसी एक्च ही शिल्पकार ने नहीं खोदीं हैं । कितने भी महान शिल्पकार के लिए यह असंभव था । पीढ़ी पीढियों के अथक परिश्रमों का वह फल है । तो भी बुद्ध और महावीर की मूर्तियाँ एक जैसी दिखती हैं ऐसा शायद ही कोई कह सकता है ।

बुद्ध की प्रतिमा में बुद्ध निश्चिंत दिखाई देते हैं तो महावीर की मुद्रा एक तरह से तंग दिखाई देती है ।  दोनों की मूर्तियाँ देखने पर लगता है कि मानव को उपलब्ध होने वाली श्रेष्ठ विजय दोनों को प्राप्त हुई है । मगर विजीत बुद्ध मुद्रा पर निश्चिंतता है तो विजयी महावीर का चेहरा जो तंग है । इन धर्म प्रवर्तकों की सीख समझाने का जो काम बड़े बड़े ग्रन्थ और धर्म प्रबन्ध कर नहीं पाये , वह काम इन शिल्पकारों ने अपने धर्म पुरुषों की प्रतिमाएं खोदकर अत्यधिक संक्षिप्त लेकिन साफ साफ तय किया है ।

सारनाथ उसी तरह मथुरा , नालंदा , अजंता , वेरूळ के महान बुद्ध की मूर्ति के चेहरे पर सब जगह प्रसन्न विजेता का भाव मालूम होता है । श्रवण बेळगोळा में महावीर परम्परा के बाहुबली की एक बहुत ही प्रचंड मूर्ति है । जो कि दुनिया की सबसे प्रचंड मूर्ति है । विजयी बाहुबली की मुद्रा पर अन्यत्र के समान यहां भी आत्मनिग्रह प्रतीत होता है ।उस मुद्रा की तरह ही लगता है कि यह मुद्रा गोया हमें कहती है कि आदमी कभी भी स्वयं पर अति विजय नहीं पा सकता । मन के बैल को पकड़ने में सफलता मिल जाने के बाद भी उसे अनिर्बंध नहीं छोड़ना चाहिए । जैन धर्म और उसके अनुयायिओं की , विशेष रूप से जैन मुनियों कीकठोर व्रत साधना उस धर्म के कट्टर पंथ की एवं निरंतर दक्षता वृत्ति की साख है । बुद्ध का ऐसा नहीं है । बुद्ध मूर्ति देखने पर ऐसा लगता है कि विजय प्राप्ति के बाद भी विजय के बारे में ज्यादा कुछ नहीं लगेगा ऐसी मनोदशा प्राप्त करना संभव है । यहाँ यह सवाल ही नहीं उपस्थित होता कि दोनों में से कौन सी प्रवृत्ति ठीक है । जो कि दोनों धर्म पंथों का आगे चलकर अध:पतन ही हुआ है । कौन अधिक अच्छा था यह सवाल भी अप्रस्तुत है । चूंकि कहा जा सकता है कि मानवीय दृष्टि से बुद्ध ज्यादा योग्य था  तो ऐसा भी कहना संभव है कि तार्किक दृष्टि से महावीर ज्यादा ठीक थे । मैं यहाँ केवल इतना ही कहना चाहता हूँ कि शिल्पकारों ने उन दोनों की विचार प्रणाली को उनकी शरीराकृतियों के और मुद्राओं के माध्यम के द्वारा उत्तम रीति से पाषाणांकित की है । 

बुद्ध

( जारी )

जारी( भाग २ )

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