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Posts Tagged ‘journalism’

१९३६ में गुजरात साहित्य परिषद के समक्ष परिषद के पत्रकारिता प्रभाग की रपट महादेव देसाई ने प्रस्तुत की थी । उक्त रपट के प्रमुख अनुदित हिस्से इस ब्लॉग पर मैंने दिए थे । नीचे की कड़ी ऑनलाईन पीडीएफ़ पुस्तिका के रूप में पेश है । मुझे उम्मीद है कि पीडीएफ़ फाइल में ऑनलाईन पेश की गई इस पुस्तिका का ब्लॉगरवृन्द स्वागत करेंगे और उन्हें इसका लाभ मिलेगा । महादेव देसाई गांधीजी के सचिव होने के साथ-साथ उनके अंग्रेजी पत्र हरिजन के सम्पादक भी थे । कई बार गांधीजी के भाषणों से सीधे टेलिग्राम के फार्म पर रपट बना कर भाषण खतम होते ही भेजने की भी नौबत आती थी । वे शॉर्ट हैण्ड नहीं जानते थे लेकिन शॉर्ट हैण्ड जानने वाले रिपोर्टर अपने छूटे हुए अंश उनके नोट्स से हासिल करते थे ।

पत्रकारिता : महादेव देसाई-पीडीएफ़

इस ब्लॉग पर पुस्तिका की पोस्ट-माला (लिंक सहित) नीचे दी हुई है :

पत्रकारीय लेखन किस हद तक साहित्य

पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई

पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता , ले. महादेव देसाई

पत्रकारिता (४) : ” क्या गांधीजी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ? ”

पत्रकारिता (५) :ले. महादेव देसाई : ‘ उस नर्तकी से विवाह हेतु ५०० लोग तैयार ‘

पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई

समाचारपत्रों में गन्दगी : ले. महादेव देसाई

क्या पाठक का लाभ अखबारों की चिन्ता है ?

समाचार : व्यापक दृष्टि में , ले. महादेव देसाई

रिपोर्टिंग : ले. महादेव देसाई

तिलक महाराज का ‘ केसरी ‘ और मैंचेस्टर गार्डियन : ले. महादेव देसाई

विशिष्ट विषयों पर लेखन : ले. महादेव देसाई

अखबारों में विज्ञापन , सिनेमा : ले. महादेव देसाई

अखबारों में सुरुचिपोषक तत्त्व : ले. महादेव देसाई

अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक , ले. महादेव देसाई

कुछ प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार (१९३८) : महादेव देसाई

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अग्रगण्य विदेशी पत्रकारों के विषय में बताना ज्यादा अनुकूल है , उनसे हमें जितना सीखने लायक है वह सीखना है , कारण पत्रकारिता अपनी कला नहीं विदेशी कला है ।

लॉईड गैरिसन का नाम लेते ही आँखें भर आती हैं ।   लॉयड गैरीसन जैसे  अमानुषिक अत्याचार तथा घनघोर गुलामी के मुकाबले भयानक परिणामों की परवाह किए बगैर जूझने वाले व्यक्ति को कोई सत्याग्रही कैसे भुला सकता है ! एक बार उनके मुह से यह बात निकल गयी कि गुलामी रफ़्ता रफ़्ता बन्द होनी चाहिए । तुरन्त भूल समझ में आई तब इसका सार्वजनिक पश्चाताप प्रकट करने में उन्हें संकोच नहीं हुआ । उक्त पश्चाताप को प्रकट करना उन्होंने अपना धर्म माना । उस वक्त के उनके यह उद्गार इतिहास प्रसिद्ध हैं :

” पार्क स्ट्रीट के गिरजा में रफ़्ता रफ़्ता गुलामी नाबूद करने के लोकप्रिय किन्तु दूषित विचार मैंने बगैर सोचे-समझे कबूले थे । आज उन्हें पूरी तरह वापस लेने का अवसर ले रहा हूँ ताकि उनका कोई दुरुपयोग न कर सके । ईश्वर से , अपने मुल्क से और गरीब गुलामों से जाहिर तौर पर माफ़ी माँग रहा हूँ – कि मैंने भीरुतापूर्ण , अन्यायपूर्ण और बगैर अक्ल के के विचार को खुद के दिमाग में घुसने दिया तथा मैंने उन्हें प्रकट किया । सार्वजनिक माफ़ी माँग कर मेरे अन्तर को ठण्डक पहुँच रही है । मेरी भाषा की कठोरता कइयों को  पसन्द नहीं , यह मैं जानता हूँ । क्या कठोर भाषा की आवश्यकता नहीं है ?  निश्चित ही मैं सत्य जैसा कठोर बनूँगा , न्याय के समान न झुकने वाला रहूँगा । जिस घर में आग लगी हो उसके मालिक को क्या मद्धिम स्वर में पुकार लगानी चाहिए ? – आपका विवेक यदि कहता हो तो बताएँ । जिसकी पत्नी के साथ बलात्कार हो रहा हो उसे आहिस्ता आहिस्ता बचाने की सलाह आप के दिमाग में आती हो तो दीजिए । आग से घिरे बच्चे को रफ़्ता रफ़्ता बचाने की सलाह देने वाला आपका हृदय कठोर हो तो वह आपको मुबरक ! परन्तु इस गुलामी को रफ़्ता रफ़्ता नाबूद करने की बात मेरे सामने मुँह से मत निकालिएगा । गुलामी को नाबूद करनी की मुझे झक चढ़ी है , मैं फूँक फूँक कर नहीं बोलनी वाला हूँ और न ही किसी पर मुरव्वत करने वाला हूँ। मैं रत्ती भर पीछे हटने को तैय्यार नहीं हूँ । मुझे सुने बिना आपका चारा नहीं है । “

स्टेड कई बार जनता के कोप का शिकार हुआ था । बोर युद्ध में ब्रिटिश  पक्ष को अन्यायी मानते हुए उसकी हार की कामना के सार्वजनिक उद्गार उसने प्रकट किए थे तथा ब्रिटिश फौज द्वारा किए गए अत्याचारों के विवरण अपने पत्र में निडरता से व आग्रहपूर्वक छापे थे । एक बार अनिष्ठ का विरोध करने में वह जेल भी गया था । डीलेन और सी . पी. स्कॉट की कथा मैं कुछ तफ़सील से कहना चाहता हूँ ।

इंग्लैंड के इन दो नामचीन सम्पादकों से हर पत्रकार को कफ़ी कुछ सीखना चाहिए । इनमें सी . पी. स्कॉट की जीवनी तो किसी कर्मयोगी साधु की जीवनी है , जिसे पढ़ कर पवित्र और उन्नत हुआ जाता है । डीलेन स्कॉट का पूर्ववर्ती था । वह एक विलक्षण मूर्ति था। कहा जाता है कि ३६ वर्षों के सम्पादकत्व में उसने ‘टाईम्स ‘ में एक भी लेख नहीं लिखा – हांलाकि यह बात अक्षरश: सही नहीं है – बावजूद इसके ‘टाईम्स ‘ को उसने सरकार का मुखपत्र नहीं परन्तु सरकार का व्यवस्थापक , oragan नहीं organizer बनाया था।उसने अब्राहम लिंकन जैसी हस्ती का प्रमाणपत्र हासिल किया -”  ‘टाइम्स’ जगत की महाशक्ति है , मिसीसिपी के बाद उससे बड़ी और कोई शक्ति नहीं है ।” डीलेन की जीवनी असाधारण प्रतिभा का एक नमूना है । निडरता की मानो वह मुहर था तथा बड़े भूप अथवा बड़े मान्धाता जैसे प्रधानमन्त्रियों पर भी मुरव्वत किए बिना वह अख़बार चलाता था । ” किसी राज्य के धुरंधर का कर्तव्य भले चुप रहना हो, समाचारपत्र का कर्तव्य परिणाम के भय के बिना सत्य प्रगट करना है , अन्याय और अत्याचार को उद्घाटित करना तथा जगत के न्यायासन के समक्ष उसे पेश करना है…….. कोई सरकार चाहे जितना तीन पाँच कर सत्ता में आई हो अथवा उसके कृत्य चाहे जितने कूड़ा हों फिर भी उसके प्रति अन्य सरकारें बाह्य मान से भले बरतें परन्तु अख़बार के ऊपर ऐसा कोई बन्धन नहीं होता । कूटनीतिज्ञ परस्पर विवेकपूर्ण व्यवहार भले न करते हों , परन्तु अख़बार को उन धवल बगुला भगत बने लोगों के काले कृत्य तथा ख़ून कर गद्दी हासिल करने वालों के रक्तिम हाथों को अवश्य उद्घाटित करना चाहिए । समाचार विश्लेषकों का कर्तव्य इतिहासकार की भांति सत्य को खोज कर उसे जनता के समक्ष पेश करना है । ” – यह उद्गार एक ऐतिहासिक प्रसंग में उसने लिखे थे तथा इन्हीं तत्वों पर टिके रहकर उसने ३६ वर्षों तक ‘ टाईम्स ‘ का सम्पादन किया । सत्य ढूँढ़ निकालने तथा उसे प्रगट करने की उसकी रीति भी गजब थी ; प्रत्येक दिन समाज में और राजनेताओं के बीच घूमना , कैयों को दावत देना और कैयों के यहाँ दावत खाने जाना । इतिहास के झोंके को पहचान कर लोकमत को दिशा देने की तैयारी करना ; रात्रि १० से सुबह ४ – ५ बजे तक लगातार जगे रह कर पत्र की एक एक  खबर देखना , उसकी हर पंक्ति को जाँचना , हर लेख को जाँचना , सुधारना , भूल करने वालों के कान पकड़ना तथा अखबार के अंक की पहली प्रति निकलने से पहले दफ़्तर न छोड़ना । ‘ युरोप का सर्वाधिक जानकार व्यक्ति ‘ की उपाधि उसे मिली थी तथा रानी विक्टोरिया भी उसके लेख नियमित पढ़तीं । इस सब के बावजूद इस पद और प्रतिष्ठा से हासिल शक्ति और सत्ता का दुरुपयोग उसने कभी नहीं किया था , किसी के द्वारा दिए गए विश्वास का अघटित उपयोग नहीं किया , किसी के पक्ष के वश में हुए बिना या किसी पर मुरव्वत किए बिना अपने अख़बार की उच्च प्रतिष्ठा को कभी नीचा नहीं होने दिया , अपने पत्र की भाषा एवं विचार को भी उसने सदा उच्च कक्षा में स्थापित रखा ।

इस भाषण के अन्य भाग :

पत्रकारीय लेखन किस हद तक साहित्य

पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई

पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता , ले. महादेव देसाई

पत्रकारिता (४) : ” क्या गांधीजी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ? ”

पत्रकारिता (५) :ले. महादेव देसाई : ‘ उस नर्तकी से विवाह हेतु ५०० लोग तैयार ‘

पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई

समाचारपत्रों में गन्दगी : ले. महादेव देसाई

क्या पाठक का लाभ अखबारों की चिन्ता है ?

समाचार : व्यापक दृष्टि में , ले. महादेव देसाई

रिपोर्टिंग : ले. महादेव देसाई

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विशिष्ट विषयों पर लेखन : ले. महादेव देसाई

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अखबारों में सुरुचिपोषक तत्त्व : ले. महादेव देसाई

अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक , ले. महादेव देसाई

कुछ प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार (१९३८) : महादेव देसाई


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गलत खबरों की बात दूर रही , हम सच्ची किन्तु बेजान खबरों को छाप कर यह मानते हैं कि अखबार की शोभा बढ़ाई । जितनी खबरें हाथ लगती हैं क्या उन सब को छापना जरूरी है ? मेरे पास एक अखबार पड़ा है जिस में दो कॉलम का एक शीर्षक है : “मशहूर सुन्दरी का अन्तिम फैसला : गरीबों के बीच बसेंगी “ । खबर के साथ उस महिला का चित्र है , चित्र के ऊपर एक चौकोर बॉक्स है : ” चार बार शादी ” । ऐसा ही एक अन्य भड़काऊ शीर्षक है : उस नर्तकी से शादी हेतु ५०० लोग तैयार हुए – परन्तु उसने शादी नहीं ही की ।” इन समाचारों को इस रूप में दे कर अथवा मूल रूप में दे कर भी पाठक की कौन सी सेवा सधी होगी ? एक अन्य अखबार में पाँच कॉलम का शीर्षक है : ” सख़्त पिटाई के बाद औरत को मायके भेजा । ” इसके लिए पाँच कॉलम क्यों? पिटाई करने वाला अपनी वीरता पर गर्व कर सके, इसलिए ? एक अन्य अखबार में खबर है : ‘ नाग सन्यासी बना। सब पुजारी दिग्मूढ़ हुए । ‘ जिस संवाददाता ने इस खबर को भेजा उसके सम्पादक ने शायद ही उसे बुलाकर पूछा होगा कि उसकी नज़र के सामने घटित हुआ अथवा सुनी-सुनाई गप्प है । अन्य अखबार जब इस गप्प की नकल करेंगे तब उन्हें तो सोचने की भी जरूरत नहीं होगी । एक अन्य अखबार खबर दे रहा है : ” प्रणयग्रन्थि में बन्धे जोड़े ने की आत्महत्या ” , अन्य ऐसे पागल युगलों को को इस खबर से उत्तेजन नहीं मिलता होगा ?  स्टोव से जल कर मरनेवालियों की खबर बारम्बार छपने से ऐसे किस्सों में कुछ बढ़ोतरी होती होगी , इस बाबत कोई शंका है ? एक प्रसिद्ध अमेरिकी दैनिक क्रिश्चन साइन्स मॉनिटर की नीति जानने लायक है । उसका लंडन संवाददाता मुझसे लंडन में मिला था । वहाँ के अखबारों में हिन्दुस्तान के विषय में जब गलत खबरें छपती थीं , तब – तब वह मेरे पास आता और मुझसे सही खबर ले कर अमेरिका भेजता था । वह अखबार जनहित के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए मशहूर है । इस अखबार के बारे में विलिस ऍबट नामक प्रसिद्ध पत्रकार लिखते हैं : ” उस अखबार में अपराधों और गुनाहों की खबरें दी ही नहीं जातीं – सिवा इसके कि वह समाचार सरकार अथवा समाज की प्रगति का नुकसान करने वाला हो ; इस पत्र में बड़ी बड़ी आपदाओं व विपदाओं की खबर भड़काऊ ढंग से नहीं छापी जाती ; पत्र का एक मालिक नहीं है बल्कि एक मण्डल है । ” विलायत के सम्मानित पत्र ‘टाइम्स’ तथा ‘मैनचेस्टर गार्डियन’ में भी काफ़ी हद तक इस प्रथा का पालन होता है तथा चौंकाने वाली सुर्खियाँ देने की धूर्ततापूर्ण आदत से ये अखबार मुक्त हैं ।हमारे कई अखबारों की खपत ऐसी खबरों के बूते होती है । समाचारपत्र पढ़ने का लोगों में शौक बढ़ा है , एक – एक पैसे की कीमत वाले अखबार हजारों की संख्या में बिकते हैं , उससे भी अखबार मालिक मोटा-नफ़ा कमाते हैं ,  इसके बदले स्वच्छ वाचन की पूर्ति करने की अपनी जिम्मेदारी क्या वे समझते हैं ?

( जारी )

इस भाषण के अन्य भाग :

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समाचारपत्रों में गन्दगी : ले. महादेव देसाई

क्या पाठक का लाभ अखबारों की चिन्ता है ?

समाचार : व्यापक दृष्टि में , ले. महादेव देसाई

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अख़बारों के प्राण यानी समाचार अथवा ख़बर । खबरें हासिल करना और उन्हें पेश करने की भी कला है , तथा जिसने इस कला को उत्तम ढंग से साधा है , वह लोगों की सेवा तो कर ही रहा है ,खुद की भी सेवा कर रहा है । आज दुनिया दिनबदिन छोटी होती जा रही है , पश्चिम के सुदूर कोने की ख़बर पूर्व के सुदूर कोने में कुछेक घण्टे में ही पहुँच रही है । कई बार एक स्थान पर रहने वाले व्यक्तियों को वहीं घटित घटना की खबर मिले इसके पहले वहाँ से हजारों मील दूर रहने वालों को वह ख़बर मिल जाती है । मेरा यह कथन अत्युक्ति नहीं है । श्री रणजीत पण्डित मसूरी रह रहे थे तब गुजरात के ‘अब्बाजान’ कहे जाने वाले अब्बास साहेब तैय्यबजी की मृत्यु वहाँ हुई । श्री रणजीत को इस दुखद घटना की जानकारी तीन दिन बाद अख़बारों से मिली जबकि अब्बास साहेब के कुटुंबीजनों को सैंकड़ों मील से दूर से भेजे गए संवेदना के अनेक तार मिल चुके थे ।

यूँ अख़बार समाचार छाप कर एक अहम सेवा करते ही हैं , मगर यह समाचार सच के बदले झूठ हो तब क्या हो ? और कुछ नुकसान हो या न हो सरकार के डाक तार- विभाग की अच्छी आमदनी ऐसी ग़लत खबरें जरूर करा देती हैं । ‘गाँधीजी २७ तारीख़ को मुम्बई हो कर जाएँगे’- यह गप्प किसी अख़बार वाले ने उड़ा दी, नतीजन मुझे नाहक ही ढेरों लिखा पढ़ी करनी पड़ी ।

यदि समाचार सेवा के बदले असेवा के लिए दिए जाँए, तब ! कौमों के बीच ज़हर बरस रहा हो और वहीं आग भड़काने वाली चिन्गारी छोड़ दी जाए, तो ? जहाँ पल भर में शान्ति से लड़ाई की स्थिति बन सकती हो , वहाँ लड़ाई शुरु करवाने के उद्देश्य से सत्य अथवा अर्धसत्य अथवा संशयपूर्ण तथ्य जारी कर दिए जाँए,तब  क्या हो? मिल मजदूरों और मालिकों के बीच झगड़ा चल रहा हो,उसी बीच बड़ी सामूहिक हड़ताल हो जाए ऐसी उड़ती बातें तथा गप्प प्रकाशित की जाँए ,तब क्या हो ? अख़बारनवीस जनता के सेवक न रहकर शत्रु बन जाते हैं,सत्यरूपी अमृत परोसने की जगह असत्य का जहर परोसते हैं । अख़बार की कुछ अधिक प्रतियाँ बिक जाएँगी ऐसे छोटे स्वार्थवश अख़बार इस बुनियादी उसूल की कितनी बार अवहेलना करते हैं ? गांधीजी जेल में थे तब उनके द्वारा वाइसरॉय को कथित तौर पर लिखे गये पत्रों  को ‘मसौदे’ सहित छाप कर एक अखबार ने जनता के चित्त को झूले की पेंग का मजा चखाया था । अन्य एक पत्रकार ने कुछ समय पूर्व ‘नए वाइसरॉय मिलने के विषय में गांधीजी और लॉर्ड हेलिफ़िक्स के बीच पत्राचार चल रहा है’- यह गप्प छाप कर अपनी ,अपने अखबार की प्रतिष्ठा और देश का कितना अहित किया था ? जब से साम्प्रदायिक द्वेष की बीमारी अपने यहाँ आई है और गाहे बगाहे प्लेग की तरह फूट पड़ती है, तब से विशेष रूप से उत्तर में,कितने चीथड़े जैसे अख़बार निकल रहे हैं जो अनेक सच्ची झूठी खबरों से कितना जहर नित्य फैला रहे हैं ? इस जहर के कारण कितनी हत्याएँ हुई हैं ? हाल ही में एक उर्दू अख़बार ने मुम्बई के संवाददाता का निराधार पत्र छापा । पत्र में लिखा था कि फलाँ व्यक्ति गाँधीजी से मिल कर आया है । उसके साथ हुई इस मुलाकात में गांधीजी ने इस्लाम की बखान की , हिन्दू धर्म की निन्दा – आलोचना की तथा कलमा पढ़ा । लखनऊ के इस अखबार के सम्पादक से मिलने के लिए हमने एक मित्र से निवेदन किया और कहा कि ऐसा कोरा झूठ छापने का मकसद भी पूछ लेना । यह मित्र उस व्यक्ति से मिले तब उसने बेशरमी से जवाब दिया : ‘ हमें तो ऐसी खबर मिली है, आपको यदि इसका इनकार छपवाना हो तो छापने के लिए तैयार हूँ । बस यह समझ लीजि कि इनकार छपवाने का यह अर्थ निकलेगा गांधीजी का इस्लाम के प्रति सम्मान नहीं है !’ इस पर टीका करने का यह स्थान नहीं है और आवश्यकता भी नहीं है । परन्तु यह हमारे अभागे देश की अधोगति की सीमा दरशाता है । पत्रकार लोकमत का प्रतिबिम्ब ग्रहण करता है, तथा लोकमत गढ़ता भी है । इस परतंत्र स्थिति में और विकास के दौर में लोकमत गढ़ना , लोकमत कि ज्ञान से ,सच्चे समाचारों से समृद्ध करना पत्रकार का विशेष धर्म बनता है । अपने देश में लोगों का अज्ञान किस हद तक जाता है इसकी एक मिसाल देता हूँ –  सत्य समाचार देने की जिम्मेदारी कितनी गम्भीर है इसका अन्दाज इस मिसाल से मिलेगा ।कुछ दिन पहले अच्छी खासी तनख्वाह पाने वाला एक व्यक्ति गांधीजी से मिलने आया ।वह अख़बार रोज़ाना तो क्या पढ़ता होगा कभी-कदाच देख लेता होगा । वह एक प्रसिद्ध संस्था में है परन्तु शायद ही अपने काम से बाहर निकल न पाता होगा । वह जब गांधीजी के पास आया तब खान साहब अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान सामने बैठे हुए थे । विवेकवश गांधीजी ने परिचय कराते हुए कहा, ‘ ये ख़ान साहब अब्दुल गफ़्फ़ार खान हैं , नाम तो सुना होगा ? ‘  उसने विनयवश हामी भर दी । मेरे साथ वापस लौटते वक्त रास्तेमें उसने मुझसे पूछा , ‘ यह साहब जो वहां बैठे थे वह तो गांधीजी के पुत्र अब्दुल्ला हैम न, जो कि मुसलमान हुए हैं ?” मैंने उसे वास्तविक बात समझाई । तब उसने दूसरा सवाल दागा , “गांधीजी आजकल यहां बैठे हैं एहमदाबाद में उनकी जो तीन – चार मिलें हैं वह कौन चलाता है ?और यह बड़ा लड़का मुसलमान हुआ तो मिल चलाने वाले कोई दूसरे लड़के हैं ,क्या ?” ऐसा है हमारी जनता का पढ़ना-लिखना जानने वाला एक औसत व्यक्ति !ऐसे लोगों का कितना अहुइत होगा यदि उन्हें गलत खबर दी जाएगी ? उस उर्दू अख़बार के झूठ को कई उर्दू अखबारों ने लिया तथा मेरे पास दर्जनों ख़त यह पूछते हुए आए – ‘गांधीजी के मुसलमान बनने की बाबत सही खबर क्या है ? ‘

[ जारी ]

लेख के अन्य भाग :

पत्रकारीय लेखन किस हद तक साहित्य

पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई

पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता , ले. महादेव देसाई

पत्रकारिता (४) : ” क्या गांधीजी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ? ”

पत्रकारिता (५) :ले. महादेव देसाई : ‘ उस नर्तकी से विवाह हेतु ५०० लोग तैयार ‘

पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई

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साहित्य की परिभाषा और परिधि में आने लायक पत्रकारीय लेखन को हासिल करने के लिए हमें क्या करना होगा ? चिरंजीवी साहित्य लिखने का अधिकार तो गिने-चुने लोगों को है । रस्किन जिसे  कुछ कमतर आँकते हुए  ‘सुवाच्य लेखन’ की कोटि के रूप में परिभाषित करते हैं उसके अन्तर्गत हमारा पत्रकारीय लेखन कैसे आ सकता है ? -मैं इसकी चर्चा करना चाहता हूँ । सुवाच्य लेखन की कोटि में आने की जरूरी शर्त है कि वह लेखन बोधप्रद हो , आनन्दप्रद हो तथा सामान्य तौर पर लोकहितकारी हो : उसके अंग तथा उपांग लोकहितकी परम दृष्टि से तैयार किए गये हों । आधुनिक समाचारपत्र औद्योगिक कारखानों की भाँति पश्चिम की पैदाइश हैं । हमारे देश के कारखाने जैसे पश्चिम के कारखानों के प्रारम्भिक काल का अनुकरण कर रहे हैं , उसी प्रकार हमारे देशी भाषाओं के अखबार देशी अंग्रेजी अखबारों के ब्लॉटिंग पेपर ( सोख़्ता ) जैसे हैं तथा हमारे अंग्रेजी अखबार ज्यादातर पश्चात्य पत्रों का अनुकरण हैं । अनुकरण अच्छे और सबल हों तब कोई अड़चन नहीं होती, क्योंकि जिस कला को सीखा ही है दूसरों से , उसमें अनुकरण तो अनिवार्य होगा । हमारे अखबारों में  मौलिकता हो अथवा अनुकरण, यदि वे जनहितसाधक हो जाँएं तो भी काफ़ी है, ऐसा मुझे लगता है । जैसे यन्त्रों का सदुपयोग और दुरपयोग दोनो है , वैसे ही अखबारों के भी सदुपयोग और दुरपयोग हैं ,कारण अखबार यन्त्र की भाँति एक महाशक्ति हैं । लॉर्ड रोज़बरी ने अखबारों की उपमा नियाग्रा के प्रपात से की है तथा इस उपमा की जानकारी के बिना गांधीजीने स्वतंत्र रूप से कहा था : ” अखबार में भारी ताकत है । परन्तु जैसे निरंकुश जल-प्रपात गाँव के गाँव डुबो देता है,फसलें नष्ट कर देता है , वैसे ही निरंकुश कलम का प्रपात भी नाश करता है । यह अंकुश यदि बाहर से थोपा गया हो तब वह निरंकुशता से भी जहरीला हो जाता है ।भीतरी अंकुश ही लाभदायी हो सकता है । यदि यह विचार-क्रम सच होता तब दुनिया के कितने अख़बार इस कसौटी पर खरे उतरते ? और जो बेकार हैं ,उन्हें बन्द कौन करेगा ? कौन किसे बेकार मानेगा ? काम के और बेकाम दोनों तरह के अखबार साथ साथ चलते रहेंगे । मनुष्य उनमें से खुद की पसन्दगी कर ले । “

इस प्रकार समाचारपत्र दुधारी तलवार जैसे हो सकते हैं क्योंकि उनके दो पक्ष हैं । अख़बार धन्धा बन सकते हैं ,ऐसा हुआ भी है,यह हम जानते हैं । दूसरी तरफ़ अख़बार नगर पालिका की तरह, जल -कल विभाग की तरह, डाक विभाग की तरह लोकसेवा का अमूल्य साधन बन सकते हैं ।जब अख़बार कमाई का साधनमात्र बनता है तब बन्टाधार हो जाता है,जब अपना खर्च किसी तरह निकालने के पश्चात पत्रकार अखबार को सेवा का साधन बना लेता है तब वह लोकजीवन का आवश्यक अंग बन जाता है ।

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[ १९३६ में गुजरात साहित्य परिषद के समक्ष परिषद के पत्रकारिता प्रभाग की अध्यक्षीय रपट महादेव देसाई ने प्रस्तुत की थी ।  उक्त रपट से कुछ हिस्से यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं। अनुवाद मेरा है । अफ़लातून ]

यह पत्रकारों की परिषद नहीं है , पत्रकारों को आश्रय देने के इच्छुक साहित्यकारों की परिषद है । इसके पहले पत्रकारिता की जो परिषद हुईं वे साहित्य परिषद से स्वतंत्र थीं। इस बार स्थिति में फर्क है और मेरा काम कुछ हद तक सुगम बन जाता है । पत्रकारिता को साहित्य परिषद का अंग मानने का यह प्रथम प्रसंग है । इसका यह अर्थ हुआ कि पत्रकारिता साहित्य है अथवा साहित्य के अनेक अंगों में से एक है , यह मान लिया गया है । एक अंग्रेज लेखक ने पत्रकारीय लेखन को ‘जल्दबाजी में लिखा साहित्य’ कहा है ; कई लोग यह कहने वाले भी हैं कि पत्रकारीय लेखन को साहित्य में न गिना जाए । प्रसिद्ध अंग्रेज पत्रकार नेविनसन की एक पुस्तक की समीक्षा करने वाले लेखक इन सब से उलटा कहते हैं ।वे कहते हैं कि वृत्त अथवा घटनाओं के अध्ययन के बाद, स्पष्ट तथा स्वतंत्र रूप से विचारपूर्वक , मुद्देवार ,त्वरित गति से लिखा गया लेखन साहित्य नहीं तो और क्या होगा ?  अतिविलम्बित गति से, कसा कसा सा,अस्पष्ट रूप से लिखा हुआ तथा लेखक हवा में है अथवा जमीन पर इसका मुश्किल से भास कराने वाला लेखन किसी पुस्तक में  शोभायमान भले ही हो जाए, उसे साहित्य कौन कहेगा ?

मुझे लगता है यह झगड़ा बेमानी है, इसकी वजह साहित्य की अस्पष्ट व्याख्या है । रस्किन ने चिरंजीव साहित्य की जो व्याख्या की है , उस पर गौर करें ।पुस्तकों का, अथवा दैनिक या साप्ताहिक पत्रों का लेखन इस व्याख्या में किस हद तक बैठता है , यह देखें । यह है रस्किन की व्याख्या :” जो मैं लिख रहा हूँ वह सत्य है , जनहितकारी है , सुन्दर है – इस भाव से लिखा हुआ साहित्य है।लेखक को इस बात का ख्याल होता है कि किसी और ने यह बात नहीं कही और उसे यह भी लगता है कि उससे बेहतर तरीके से यह बात अन्य कोई नहीं कह सकता । जीवन में खुद के अनुभवमें उसे इस वस्तु का स्पष्ट दर्शन हुआ है,प्रभु द्वारा उसे सुपुर्द स्थूल एवं सूक्ष्म संपत्ति में से यह अमूल्य ज्ञान अथवा दर्शन उसने पाया है।इसे हमेशा के लिए सहेज कर रखने , मुमकिन हो तो शिला पर खोद कर रखने की उसे अभिलाशा रहती है,कारण वह यह मानता है कि : ‘ इसमें मेरा हीरा और नूर निचोड़कर समाया है , बाकी तो दूसरों की तरह जीया,खाया – पीया,लड़ा- डपटा और पृथ्वी से अलोप हुए वैसे मैं भी अलोप होऊँगा: परन्तु मेरा यह जो अनमोल ज्ञान और दर्शन है,वह आपकी स्मृति में भी टिका रहे।” यह उसका लेखन है ; अल्प रीति से ही सही परन्तु ईश्वर ने जिस हद तक दर्शन कराया है , उस हद यह ही उसका शिलालेख है , शास्त्र है । यह पुस्तक है। चिरन्जीव साहित्य है।” इस उद्धरण में मैंने ‘साहित्य’ शब्द का इस्तेमाल किया है।रस्किन ने ‘पुस्तक’ और ‘समाचार पत्रों’ अथवा चिरंजीव- साहित्य तथा क्षणजीवी-लेखन का भेद करते हुए चिरंजीव-पुस्तकों की यह व्याख्या – परिभाषा की है । रस्किन ने ‘क्षणजीवी लेखन’ की परिभाषा यूँ की है, ‘किसी घटना अथवा स्थिति का सुवाच्य वर्णन,अथवा कुछ मित्रों की सुवाच्य चर्चा या भाषण, जिसे आप सुबह नाश्ते के साथ पढ़ना चाहें –  जिसे पढ़ना चाहिए, न पढ़ना या उसका उपयोग न करना शरमाने वाली बात कही जाएगी- यह क्षणजीवी लेखन की कोटि में गिना जाएगा ।यह किसी भी कोण से चिरकालीन साहित्य नहीं है । पत्र-पत्रिकाओं का कितना लेखन चिरकालीन(या कालजयी) साहित्य की इस परिभाषा के अनुरूप है? गुजराती य अन्य देशी भाषाओं में,या अंग्रेजी दैनिक ,साप्ताहिक या मासिक में प्रकाशित कितने लेख उक्त परिभाषा पर खरे उतरेंगे? हद से हद हमें मुट्ठीभर ऐसे लेख मिलेंगे जिन्हें रस्किन ने ‘क्षणजीवी सुवाच्य लेखन’ कहा है। शेष की गिनती क्षणजीवी लेखन की कोटि में भी मुमकिन नहीं है ।

इसके बावजूद एडिसन ,डीफ़ो,हेजलिट, एड्विन आर्नॉल्ड,किपलिंग,गयटे,आनातोल फ्रांस – यह सभी पत्रकार थे और साहित्यकार भी,अथवा यूँ कहें कि पत्रकार थे इसलिए साहित्यकार बने ।

रस्किन द्वारा खींची गयी विभाजन रेखा बहुत पतली हो जाती है । यदि अमुक प्रसंगों में अमुक विषयों सम्बन्धी बातचीत साहित्य में नहीं ही गिनी जाएगी तब डॉ. जॉन्सन की अनेक बातों और संवादों के संग्रह वाली बॉसवेल रचित जीवनी हम आज भी क्यों पढ़ते हैं ,और उसे साहित्य मानते है? गेयटे और एकरमन के संवादों को हम आज भी क्यों पढ़ते हैं और साहित्य मानते हैं? प्लेटो के संवाद – भली ही वे काल्पनिक क्यों न हों- क्यों सैंकड़ों साल से पढ़े जा रहे हैं और भविष्य में भी सैंकड़ों साल तक पढ़े जाएंगे? इनमें से कई संवादों के विषय क्षणिक नहीं शाश्वत थे तथा उन्हें कहने और लिखने वालों की शैली उसे कालजयी बनाने वाली थी । घटनाओं के उदाहरण लें।सॉक्रेटिस के मुकदमे और मृत्यु की घटना का वर्णन भी आज तक पढ़ा जा रहा है।वह आज तक संग्रहित है चूँकि वह उत्तम साहित्य है । आगरा जेल में बैठ कर १९२२ में गांधीजी पर अहमदाबाद में चले मुकदमे का जो वर्णन मैंने ‘मैन्चेस्टर गार्डियन’ में पढ़ा था,उसका स्मरण अब तक है,उसे बार बार पढ़ने में मुझे थकान नहीं होगी ।उसे मैं साहित्य ही कहूँगा।

अपने यहाँ स्व. मणिलाल नभुभाई और नवलराम के ,तिलक महाराज और गांधीजी के कुछ लेख ऐसे हैं जिन्हें शुद्ध साहित्य मानना ही होगा। उन लेखों के विचार पाठक आज तक पढ़ते हैं,भविष्य में भी पढ़ेंगे। काकासाहब के लेखों का पुस्तकाकार संग्रह बन रहा है।वे सभी लेख अखबारों में छप चुके हैं, इससे उनका साहित्यिक मूल्य कम नहीं हो जाता ।

इस भाषण के शेष भाग :

पत्रकारीय लेखन किस हद तक साहित्य

पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई

पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता , ले. महादेव देसाई

पत्रकारिता (४) : ” क्या गांधीजी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ? “

पत्रकारिता (५) :ले. महादेव देसाई : ‘ उस नर्तकी से विवाह हेतु ५०० लोग तैयार ‘

पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई

समाचारपत्रों में गन्दगी : ले. महादेव देसाई

क्या पाठक का लाभ अखबारों की चिन्ता है ?

समाचार : व्यापक दृष्टि में , ले. महादेव देसाई

रिपोर्टिंग : ले. महादेव देसाई

तिलक महाराज का ‘ केसरी ‘ और मैंचेस्टर गार्डियन : ले. महादेव देसाई

विशिष्ट विषयों पर लेखन : ले. महादेव देसाई

अखबारों में विज्ञापन , सिनेमा : ले. महादेव देसाई

अखबारों में सुरुचिपोषक तत्त्व : ले. महादेव देसाई

अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक , ले. महादेव देसाई

कुछ प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार (१९३८) : महादेव देसाई

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