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Archive for the ‘literature’ Category

भालू की आँखें तुझे देख रही हैं
तूने उसे जो पानी का सोता दिखाया था
वह ऊपर गुफा तक जाता है
भालू की आँखें कहती हैं
तुझे गुफा तक ले जाऊँ
वहाँ तू भालू को सीने से लगा सोएगी
बीच रात उठ पेड़ों से डर मेरा कंधा माँगेगी
भालू पड़ा होगा जहाँ तू सोई थी
कीट पतंगों की आवाज के बीच बोलेगी चिड़िया
तुझे प्यार करने के लिए
भालू को पुचकारुँगा
तू ले लेगी भालू को फिर देगी अपना नन्हा सीना
बहुत कोशिश कर पूछेगी
बापू भालू 
मैं सुनूँगा भालू भालू 
गाऊँगा सो जा भालू सो जा भालू 
नहीं कह पाऊँगा उस वक्त दिमाग में होगी सुधा
छत्तीसगढ़ में मजदूर औरत की बाँहों से तुझे लेती
तब तक कहता रहूँगा  सो जा भालू सो जा 
जब तक तेरी आँखों में फिर से आ जाएगा जंगल
जहाँ वह सोता है
जो ऊपर गुफा तक जाता है..........

किस डर से आया हूँ यहाँ
डरों की लड़ाई में कहाँ रहेगा हमारा डर
तेरा भविष्य बोस्निया से भागते अंतिम क्षण
हे यीशुः कितनी बार क्षमा


क्या अयोध्या में आए सभी निर्दोषों को करेगा ईश्वर मुआफ
तू क्या जाने ईश्वर बड़ा पाखंडी
वह देगा और ताकत उन्हें जो हमें डराते
भालू को थामे रख
यह पानी का सोता जंगल में बह निकल जहाँ जाता है
वहाँ पानी नहीं खून बहता है
तब चाँद नहीं दिखता भालू डर जाएगा.........

भालू को थामे रख
वह नहीं हिंदू मुसलमान
खेल और गा भालू खा ले आलू
कोई मसीहा नहीं जो भालू को बचा पाएगा
कोई नहीं माता पिता बंधुश्चसखा
इस जंगल से बाहर ...

भालू को थामे रख।

(रविवारी जनसत्ता  १९९२)
 

 

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श्यामबहादुर ‘नम्र’ आज सुबह गुजर गए | अविश्वसनीय | सम्पादक , कवि , क्रान्तिधर्मी सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में हमारे दिलों में वे हमेशा रहेंगे | अमन , अनुराग और अनुराधा बहन के कष्ट और शोक में हम सब शरीक हैं | नन्हे -से अमन को हल्की सी चपत लगा कर ‘मार खाओ’ कहने पर  वह उस जगह से ‘मार’ को अपने हाथ में लेकर मुंह में डालता और चबाकर खाने लगता – यह था श्यामबहादुर भाई द्वारा घुट्टी में हिंसा की अप्रासंगिकता पिलाना , सिखाना |उनकी स्मृति को प्रणाम | उनकी तीन कवितायें जिन्हें पहले भी प्रकाशित किया था |

1

हमे नहीं चाहिए शिक्षा का ऐसा अधिकार,
जो गैर-जरूरी बातें जबरन सिखाये ।
हमारी जरूरतों के अनुसार सीखने पर पाबन्दी लगाये,

हमें नहीं चाहिए ऐसा स्कूल
जहाँ जाकर जीवन के हुनर जाँए भूल।
हमें नहीं चाहिए ऐसी किताब
जिसमें न मिलें हमारे सवालों के जवाब

हम क्यों पढ़ें वह गणित,
जो न कर सके जिन्दगी का सही-सही हिसाब।
क्यों पढ़ें पर्यावरण के ऐसे पाठ
जो आँगन के सूखते वृक्ष का इलाज न बताये॥
गाँव में फैले मलेरिया को न रोक पायें
क्यों पढ़ें ऐसा विज्ञान,
जो शान्त न कर सके हमारी जिज्ञासा ।
जीवन  में जो समझ में न आये,

क्यों पढ़ें वह भाषा ।
हम क्यों पढे़ वह इतिहास जो धार्मिक उन्माद बढ़ाए
नफ़रत का बीज बोकर,
आपसी भाई-चारा घटाये।

हम क्यों पढ़ें ऐसी पढ़ाई जो कब कैसे काम आएगी,
न जाए बताई ।
परीक्षा के बाद, न रहे याद,
हुनर से काट कर जवानी कर दे बरबाद ।

हमे चाहिए शिक्षा का अधिकार,
हमे चाहिए सीखने के अवसर
हमे चाहिए किताबें ,
हमें चाहिए स्कूल।
लेकिन जो हमें चाहिए हमसे पूछ कर दीजिए।
उनसे पूछ कर नहीं जो हमें कच्चा माल समझते हैं ।
स्कूल की मशीन में ठोक-पीटकर
व्यवस्था के पुर्जे में बदलते हैं,

हमें नहीं चाहिए शिक्षा का ऐसा अधिकार जो
गैर जरूरी बातें जबरन सिखाये
हमारी जरूरतों के अनुसार सीखने पर पाबन्दी लगाये ।

-श्याम बहादुर ’ नम्र ’

2

एक बच्ची स्कूल नहीं जाती, बकरी चराती है
वह लकडियां बटोरकर घर लाती है
फिर मां के साथ भात पकाती है
एक बच्ची किताब का बोझ लादे स्कूल जाती है
शाम को थकी मांदी घर आती है
वह स्कूल से मिला होमवर्क मां-बाप से करवाती है
बोझ किताब का हो या लकडी का
बच्चियां ढोती हैं
लेकिन लकडी से चूल्हा जलेगा
तब पेट भरेगा
लकडी लाने वाली बच्ची यह जानती है
वह लकडी की उपयोगिता पहचानती है
किताब की बातें कब किस काम आती हैं
स्कूल जाने वाली बच्ची
बिना समझे रट जाती है
लकडी बटोरना
बकरी चराना
और मां के साथ भात पकाना
जो सचमुच घरेलू काम हैं
होमवर्क नहीं कहे जाते
लेकिन स्कूलों से मिले पाठों के अभ्यास
भले ही घरेलू काम न हों
होमवर्क कहलाते हैं
कब होगा
जब किताबें
सचमुच
होमवर्क से जुडेंगी
और लकडी बटोरने वाली बच्चियां भी
ऐसी किताबें पढेंगी

श्याम बहादुर “नम्र”

3.


तुम तरुण हो या नहीं

 

तुम तरुण हो या नहीं यह संघर्ष बतायेगा ,

 

जनता के साथ हो या और कहीं यह संघर्ष बतायेगा ।

 

तुम संघर्ष में कितनी देर टिकते हो ,

 

सत्ता के हाथ कबतक नहीं बिकते हो ?

 

इससे ही फैसला होगा –

 

कि तुम तरुण हो या नहीं –

 

जनता के साथ हो या और कहीं ।

 

 

 

तरुणाई का रिश्ता उम्र से नहीं, हिम्मत से है,

 

आजादी के लिए बहाये गये खून की कीमत से है ,

 

जो न्याय-युद्ध में अधिक से अधिक बलिदान करेंगे,

 

आखिरी साँस तक संघर्ष में ठहरेंगे ,

 

वे सौ साल के बू्ढ़े हों या दस साल के बच्चे –

 

सब जवान हैं ।

 

और सौ से दस के बीच के वे तमाम लोग ,

 

जो अपने लक्ष्य से अनजान हैं ,

 

जिनका मांस नोच – नोच कर

 

खा रहे सत्ता के शोषक गिद्ध ,

 

फिर भी चुप सहते हैं, वो हैं वृद्ध ।

 

 

 

ऐसे वृद्धों का चूसा हुआ खून

 

सत्ता की ताकत बढ़ाता है ,

 

और सड़कों पर बहा युवा-लहू

 

रंग लाता है , हमें मुक्ति का रास्ता दिखाता है ।

 

 

 

इसलिए फैसला कर लो

 

कि तुम्हारा खून सत्ता के शोषकों के पीने के लिए है,

 

या आजादी की खुली हवा में,

 

नई पीढ़ी के जीने के लिए है ।

 

तुम्हारा यह फैसला बतायेगा

 

कि तुम वृद्ध हो या जवान हो,

 

चुल्लू भर पानी में डूब मरने लायक निकम्मे हो

 

या बर्बर अत्याचारों की जड़

 

उखाड़ देने वाले तूफान हो ।

 

 

 

इसलिए फैसले में देर मत करो,

 

चाहो तो तरुणाई का अमृत पी कर जीयो ,

 

या वृद्ध बन कर मरो ।

 

 

 

तुम तरुण हो या नहीं यह संघर्ष बतायेगा ,

 

जनता के साथ हो या और कहीं यह संघर्ष बतायेगा ।

 

तुम संघर्ष में कितनी देर टिकते हो ,

 

सत्ता के हाथ कबतक नहीं बिकते हो ?

 

इससे ही फैसला होगा –

 

कि तुम तरुण हो या नहीं –

 

जनता के साथ हो या और कहीं ।

 

 

 

श्याम बहादुर नम्र

 


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यह तो कुमार विकल को भी ठीक ठीक नहीं पता था

कि वह पीता क्यों था

हम नाहक़ दोस्तों को कोसते रहे

पीने के वजहें सबसे अधिक तब मिलती हैं

जब पास कोई न हो

अनजान किसी ग्रह से वायलिन की आवाज़ आती है

आँखों में छलकने लगता है जाम

उदास कविताएँ लिखी जाती हैं

जिन्हें बाद में सजा धजा हम भेज देते हैं

पत्रिकाओं में

कोई नहीं जान पाता

कि शब्दों ने मुखौटे पहने होते हैं

मुखौटों के अंदर

रो रहे होते हैं शब्द ईसा की तरह

सारी दुनिया की यातनाएँ समेटे।

लिख डालो, लिख डालो

बहुत देर तक अकेलापन नहीं मिलेगा

नहीं मिलेगी बहुत देर तक व्यथा

जल्दी उंडेलो सारी कल्पनाएँ, सारी यादें

टीस की दो बूँदें सही, टपकने दो इस संकरी नली से

लिख डालो, लिख डालो।

बहुत देर तक बादल बादल न होंगे

नहीं सुनेगी सरसराहट हवा में बहुत देर तक

जल्दी बहो, निचोड़ लो सभी व्यथाएँ, सभी आहें

अभ्यास ही सही, झरने दो जो भी झरता स्मृति से

लिख डालो, लिख डालो।

लाल्टू

[ कवि-मित्र लाल्टू के जन्म दिन पर उन्हीकी कविता सप्रेम पेश ]

लाल्टू की कुछ और कवितायें : वह प्यार

लाल्टू से सुनो ,

लाल्टू की अभिव्यक्ति

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तुम तरुण हो या नहीं

तुम तरुण हो या नहीं यह संघर्ष बतायेगा ,

जनता के साथ हो या और कहीं यह संघर्ष बतायेगा ।

तुम संघर्ष में कितनी देर टिकते हो ,

सत्ता के हाथ कबतक नहीं बिकते हो ?

इससे ही फैसला होगा –

कि तुम तरुण हो या नहीं –

जनता के साथ हो या और कहीं ।

 

तरुणाई का रिश्ता उम्र से नहीं, हिम्मत से है,

आजादी के लिए बहाये गये खून की कीमत से है ,

जो न्याय-युद्ध में अधिक से अधिक बलिदान करेंगे,

आखिरी साँस तक संघर्ष में ठहरेंगे ,

वे सौ साल के बू्ढ़े हों या दस साल के बच्चे –

सब जवान हैं ।

और सौ से दस के बीच के वे तमाम लोग ,

जो अपने लक्ष्य से अनजान हैं ,

जिनका मांस नोच – नोच कर

खा रहे सत्ता के शोषक गिद्ध ,

फिर भी चुप सहते हैं, वो हैं वृद्ध ।

 

ऐसे वृद्धों का चूसा हुआ खून

सत्ता की ताकत बढ़ाता है ,

और सड़कों पर बहा युवा-लहू

रंग लाता है , हमें मुक्ति का रास्ता दिखाता है ।

 

इसलिए फैसला कर लो

कि तुम्हारा खून सत्ता के शोषकों के पीने के लिए है,

या आजादी की खुली हवा में,

नई पीढ़ी के जीने के लिए है ।

तुम्हारा यह फैसला बतायेगा

कि तुम वृद्ध हो या जवान हो,

चुल्लू भर पानी में डूब मरने लायक निकम्मे हो

या बर्बर अत्याचारों की जड़

उखाड़ देने वाले तूफान हो ।

 

इसलिए फैसले में देर मत करो,

चाहो तो तरुणाई का अमृत पी कर जीयो ,

या वृद्ध बन कर मरो ।

 

तुम तरुण हो या नहीं यह संघर्ष बतायेगा ,

जनता के साथ हो या और कहीं यह संघर्ष बतायेगा ।

तुम संघर्ष में कितनी देर टिकते हो ,

सत्ता के हाथ कबतक नहीं बिकते हो ?

इससे ही फैसला होगा –

कि तुम तरुण हो या नहीं –

जनता के साथ हो या और कहीं ।

 

श्याम बहादुर नम्र

अंकुर फार्म , जमुड़ी , अनूपपुर , मप्र – ४८४२२४

namrajee@gmail.com

 

 

 

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मै गोताखोर, मुझे गहरे जाना होगा,
तुम तट पर बैठ भंवर से बातें किया करो.

मै पहला खोजी नहीं अगम भवसागर का,
मुझसे पहले इसको कितनो ने थाहा है,
तल के मोती खोजे परखे बिखराए हैं,
डूबे हैं पर मिट्टी का कौल निबाहा है.

मैं भी खोजी हूं, मुझमे उनमे भेद यही,
मैं सबसे महंगे उस मोती का आशिक हूं,
जो मिला नहीं, वो पा लेने की धुन मेरी,
तुम मिला सहेजो घर की बातें किया करो
मै गोताखोर, मुझे…..

पथ पर तो सब चलते हैं, चलना पड़ता है,
पर मेरे चरण नया पथ चलना सीखे हैं,
तुम हंसो मगर मेरा विश्वास ना हारेगा,
जीने के अपने अपने अलग तरीके हैं.

जिस पथ पर कोई पैर निशानी छोड़ गया,
उस पथ पर चलना मेरे मन को रुचा नहीं,
कांटे रौदूंगा, अपनी राह बनाउंगा,

तुम फ़ूलों भरी डगर की बातें किया करो,
कोई बोझा अपने सिर पर मत लिया करो.
मै गोताखोर, मुझे…

नैनो के तीखे तीर, कुन्तलों की छांया,
मन बांध रही जो यह रंगो की डोरी है,
इन गीली गलियों मे भरमाया कौन नहीं,
यह भूख आदमी की सचमुच कमजोरी है.

पर अपने पे विजय नहीं जिसने पायी,
मैं उसको कायर कहता हूं पशु कहता हूं,
बस इसीलिए मैं वीरानो में रहता हूं,

तुम जादू भरे नगर की बातें किया करो,
जब जब हो जरा उतार और पी लिया करो
मै गोताखोर, मुझे…

पथ पर चलते उस रोज़ बहार मिली मुझे,
बोली गायक मैं तुमसे ब्याह रचाऊंगी,
ऐसा मनमौजी मिला नहीं दूजा कोई,
जग के सारे फ़ूल तुम्हारे घर ले आऊंगी,

मैं बोला मेरा प्यार, सदा तुम सुखी रहो,
मेरे मन को कोई बंधन स्वीकार नहीं,
तब से बहार से मेरा नाता टूट गया,

तुम फ़ूलों को अपनी झोली में सहेज रख लिया करो,
मुझसे केवल पतझड़ की बातें किया करो.
मै गोताखोर, मुझे…

– पं. आनंद शर्मा
बड़े भाई अशोक भार्गव द्वारा पाठ

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पहले भाग से आगे :

कुटज के नीचे खुले बाल , खुली आँखों और चमकीली हँसी के साथ जैसे उस ने खुद अपना आविष्कार किया हो । फन फैलाये काले सर्प की तरह बालों की लटें , लहरा – लहरा कर मंजरी भरी कुटज की शाखाओं पर लिपट गईं । बारिश की तरह बरसते फूलों की गन्ध में तर रहते हुए भी कुटज की छाया वाली भूमि बालों की सुगंध से भर गई । सुगंध में भरे हुओं के बीच से गोविन्द ने धीमी आवाज़ में , इस प्रकार कि कोई और न सुन पाए , पुकारा – ’भगवती ।’

उसके ध्यान में लाये बिना गोविन्द ने कई बार उस को हाथ जोड़ कर प्रणाम किया – ’ भगवती , भगवती । ’

भरे हुए बालों की वेणी बना , साड़ी के पल्ले से उसे छिपाए , पैरों के नखों पर दृष्टि डाल कर सकुचाती हुई चलने वाली लड़कियों ने गोविन्द की पुकार सुन ली । बिजली जैसे चमकते हुए उस के जुड़े हुए हाथों को देख , कुटज वृक्ष के छाया तल में देखने से वे डरीं । लेकिन दूर खड़ी , आराधनापूर्ण किन्तु असूया से भरी बड़ी – बड़ी आँखों से वे ललिता की आरती उतारती रहीं ।

फूटती हँसी होठों में दबा ,आँखों में चमक लिए , पायल की झंकार फैलाती ललिता बरामदे ,कॉरीडोर और सीढ़ियों से थिरकती हुई चली । ललिता ने लाल दुकूल पहना हुआ था । आभूषण भी लाल ही थे । माथे पर काले रंग की बिन्दी लगाई हुई थी ।

ललिता की ललाई देख पिताजी और भाई गु़स्से में पागल हो गये । उन्होंने फ़रमान जारी किया – आज से ललिता आगे पढ़ने नहीं जायेगी ।

जब सनातन ने उससे शादी की तो ललिता ने चाहा कि बिना किसी आवरण या दुराव के अपना हृदय पति के सामने खोल कर रख दे । उसके मन ने चाहा कि मुस्कान होठों में दबा , आँखें झुकाये, बालों को खोल कर सनातन के सामने नाचती रहे ।

लेकिन पहली ही रात , बालों से कुंदमाला उतार कर रखने से पहले ही सेज पर धक्का दे कर सनातन ने उससे सहवास किया ।

पलंग पर , मुँह पर , छाती पर , फ़र्श पर , दीवार पर रेंगने वाले बालों के सर्प ! हटाने पर भी न हटते देख , परिभ्रांत हो हाँफते हुए , बत्ती जला कर सनातन बोला : बालों को बाँध लो ।’

ललिता का लाल रत्न जड़ा नाक का बेसर चमक उठा । हाथों और कानों के लाल रत्नजड़ित आभूषण चमक उठे । सोने के किनारे वाली लाल रेशमी साड़ी भी चमक उठी । तेल में तर बालों को रोएँ मुख पर दाएँ – बाएँ फैले थे। माँग का सिन्दूर पसीने के साथ बह कर नाक तक आ गया था । ललिता के सभी अंग चमचमाते देख सनातन भय से एक क़दम पीछे हट गया ।

दूसरे दिन देवी के मन्दिर में पूजा करते समय रोज़ की तरह ’भगवती’ जैसी पुकार सुनने का चाव लिए ललिता हिचक के साथ खड़ी थी ।

देवी का भी लाल रंग का नाक का बेसर…लाल तिलक… लाल रत्नों के आभूषण , जलता सिन्दूर… लहलहाते बालों की उठती – गिरती लहरों के फन । बह कर आने वाली कमल की गंध । ’तो भी योनि ले कर अवतार !’

खड़े हो कर हिचक के साथ देखते समय , अधखिले लाल कमल की तरह एक मोटी भग जैसी बैठी (देवी) को देख कर ललिता काँप उठी । उस के चारों ओर मुँडे सिर से बरसते बालों की बदली उमड़ आई। बालों की बदली के ऊपर खड़े पिता , भाई और सनातन पूरे शरीर में तेल लगा कर मालिश करते-से लगे ।

लाल आँखें – जया पुष्प जैसी लाल आँखें लिये, बालों से उलझती-पुलझती , लाल दुकूल को फाड़े, गालों पर जलते क्रोध की ज्वाला जलाए ललिता मम्दिर से निकल कर चली गई । सनातन दुर्मान्त्रिकों को बुला लाया ।

ललिता ने विशाल तालाब का स्वप्न देखा । पानी से भरे तालाब में गले तक डूबी हुई । बालों को फैलाये । गरजते सागर के किनारे , बालों को फैला कर नाचती हुई । ऊँचे पर्वत-शिखरों पर बालों के साँप रेंगते हुए । खुद अपने आपको अभिव्यक्त करने वाला स्वप्न ललिता ने देखा ।

उस ने सनातन और दुर्मान्त्रिकों से स्वप्न की व्याख्या करने के लिए कहा । तेल की मालिश से मजबूत हुए पुट्ठे दिखा कर सनातन ने स्वप्न की व्याख्या की । दुर्मान्त्रिकों को खूब चावल नमक खिलाया गया। उन्होंने ललिता के बालों का आह्वान कर उन्हें करील के वृक्ष की डाल से बाँध दिया ।

लेकिन जिस भरी दोपहरी में सनातन और दुर्मान्त्रिक सोए पड़े थे ललिता बाहर घूम रही थी । धीरे-धीरे बालों को सहलाते हुए , पायल बजा-बजा कर नाचने लगी । माँग का सिन्दूर बह कर नासाग्र से टपकने तक , गालों पर छिटकी हल्दी-पसीने से तर स्तनों पर फैलने तक उस का नाच जारी रहा ।

फिर थकी-माँदी ,शिथिल क़दमों से , टीलों पर चढ़ उतर कर , ललिता देवी के मंदिर में कई बार देवी के सामने आ खड़ी हुई । मन्दिर के गर्भ गृह के हल्के प्रकाश में  कमल रूपी भग जैसी अवतरित देवी की पूजा देखती रही ।

दुर्मान्त्रिकों ने आज्ञा दी , ’ बालों को काटना ही होगा । ’

स्नान के बाद बालों को सँवारते हुए ललिता आँगन में खड़ी थी । ललिता के लहराते बालों को सनातन शयन कक्ष की खिड़की से देख रहा था । निराशा से उस का चेहरा पीला पड़ गया था । बंधन से मुक्त दुर्मान्त्रिक चिल्ला उठे , ’ बालों को बाँध लो । हमारा कहना है बालों को बाँध लो । ’

ललिता को हँसी आई । सिर पीछे की ओर हिला कर ललिता हँस उठी । फिर हँसी को आँखों में पसारते हुए उसने कनखियों से सनातन की ओर देखा । बालों को बाँए हाथ की मुट्ठी में भर चमकती धूप की ओर बढ़ाया । कुंडली खोल नीचे की ओर घिसटते साँपों की तरह तेल में  तर बालों की लटें धूप में लहराने लगीं ।

ग़ुस्से में पागल हो सनातन ने खिड़की की सलाख़ों पर मुट्ठियाँ दे मारीं ।

हाँफते- हाँफते दुर्मान्त्रिक एक-दूसरे से सिर जोड़ कर बैठ गये । ललिता बार-बार तेल लगे बालों को  धूप में चमकाते हुए सहला रही थी और रसपान की तरह बालों की सुरभि पी रही थी । बालों की लहलहाती कालिमा से थिरक रही थी ।  गर्व से पायल झनकाते हुए नाच रही थी ।

सनातन को विश्वास आने तक ललिता आँगन की सीमाओं में नाचती रही । खुले नाग-फनों के बीच कुटज के फूल की तरह ललिता का मुख घूम रहा था । धूप , हवा और शिराओं के कंपन के साथ बालों की सुगंध गमक रही थी ।

खिड़की की सलाखों का सहारा लिए सनातन घूर कर ललिता को देख रहा था । मणि-नागों के बीच कुटज के फूल जैसी ललिता नाचते-नाचते भगवती के मंदिर की ओर दौड़ पड़ी ।

पद्म गंध देने वाली अधखिली लाल कमल कलिका समान एक बड़ी ’योनि’ जैसी वह देवी खड़ी थी । चमकते लाल प्रकाश में उलझे सनातन और दुर्मान्त्रिक खड़े हुए देख रहे थे । बालों के बादल फैलाये नाचते-नाचते ललिता ने उसे अधखिली लाल कमल कलिका का आह्वान किया । फिर…

त्रिशूल उठा कर , आँखों में खून झलकाती , रक्त को कुचलती , घुँघरुओं को तोड़ कर , बालों को फैलाये ,छाती उठा कर ललिता मंदिर से निकल भागी ।

मंदिर के अंदर , महादेवी के पत्थर से बने स्तनों से दूध की बूँदें निकलीं और रक्त की तरह टपकती रहीं ।

अनुवाद: डॉ. चेन्नित्तला कृ्णन नायर

 

 

 

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यूनिफार्म

एक-सी वर्दी पहने हुए
सड़क पर मार्च करती भीड़ के लोगों से
मुझे डर लगता है।
चाहे वह केसरिया वाले साधु हों
चाहे आर्मी के जवान
चाहे श्‍वेत साड़ी वाली बहनें
चाहे ईद पर जा रहे नमाजी
या फिर खादी वाले गांधीवादी।
न जाने कब जुनून सवार हो जाए
औरों की शामत आ जाए।

यूनिफार्म व्‍यक्तित्‍व का हनन है
और इंसान की नुमाईश
बस यह स्‍कूली बच्‍चों के लोक नृत्‍य में ही अच्‍छी लगती है।
अभी रंग-बिरंगे गंदे और मटमैले कपड़े वाले
लोग दिखे हैं
जो रिक्‍शे चला रहे हैं
जो चाय बना रहे हैं
और गुब्‍बारे बेच रहे हैं
तभी तो हौंसला बना है मुझमें
भीड़ की विपरीत दिशा में चलने का।

अबे मुन्‍ना !

छीलते रहो तुम घास खुरपी से
ताकि हमारे लॉन सुंदर बने रहें
देते रहो सब्जियों में पानी

ताकि हम उनका स्‍वाद उठा सकें
फूल उगाते रहो तुम
ताकि हम ” फ्लावर शो ” में इनाम पा सकें,
छत पर चढ़ जाया करो तुम
जब बच्‍चे हमारे क्रिकेट खेलें
ताकि गेंद वापिस लाने में देर न लगे,
हम गोल्‍फ की डंडी घुमायेंगे चहलकदमी में
गेंद उठाने तुम दौड़ते हुए जाना
तभी तो हमारी बिटिया रानी ‘ सानिया ‘ बनेगी
तुम बाल-ब्‍वाय की प्रेक्टिस करो।
ढोते रहो तुम फाइलों का बोझा सिर पर
हुसैनपुर से तिलक‍ब्रिज तक
और तिलकब्रिज से हुसैनपुर तक

ताकि हम उन पर चिडिया-बैठाते रहे
और काटते छॉंटते रहें अपनी ही लिखावट
और रेल उड़ाते रहे आकाश में।
तुम्‍हें नौकरी हमने दी है
हम तुम्‍हारे मालिक हैं
हम अपने भी मालिक हैं

तुम तो भोग रहे हो अपने कर्म
हमें तो राज करने का वर्सा मिला है
गुलामी तुम्‍हारा जन्‍म-सिद्ध फर्ज है
और अफसरी हमारा स्‍थायी हक ।

मुन्‍ना भाई-

लगे रहो
तुम हो गांधी की जमात के गंवार स्‍वदेशी
हम बढ़ते जायेंगे आगे-

नेहरू की जमात के शहरी अंग्रेज
तुम चुपचाप खाना बनाते रहो
परोसते रहो
डॉंट खाते रहो।

प्रार्थना

मन हो जिसका सच्चा

विश्‍वास हो जिसका पक्का

ईश्वर उसके साथ ही होता

हर पल उसके साथ ही होता।

1. खुद भूखा रहकर भी जो

औरों की भूख मिटाता

हृदय – सागर उसका

कभी न खाली होता।

ईश्वर उसके साथ ही होता

हर पल उसके साथ ही होता ।

2. अर्न्तवाणी सुनकर जो

काज प्रभु का करता

मुक्त रहे चिंता से

शांत सदा वो रहता।

ईश्वर उसके साथ ही होता

हर पल उसके साथ ही होता ।

3.              जीवन रहते ही जो

मौत का अनुभव करता

संसार में रहकर भी

संसार से दूरी रखता।

ईश्वर उसके साथ ही होता

हर पल उसके साथ ही होता ।

4.              अन्याय कहीं भी हो

कैसा भी हो किसी का

खुद का दाँव लगाकर

हिम्मत से जो लड़ता

ईश्वर उसके साथ ही होता

हर पल उसके साथ ही होता ।

5.              दु:ख और सुख में जो दिल

ध्यान प्रभु का रखता

दूर रहे दुविधा से

नहीं व्यापत उसमें जड़ता।

ईश्वर उसके साथ ही होता

हर पल उसके साथ ही होता ।
समर्पण

सौंप दो प्यारे प्रभु को

सब सरल हो जाएगा

जीना सहज हो जाएगा

मरना सफल हो जायेगा।

1. जिन्दगी की राह में

ऑंधियां तो आयेंगी

उसकी ही रहमत से

हमको हौसला मिल पायेगा।

2.              सोचता है हर कोई

अपने मन की बात हो

होगा जो मंजूर उसको

वक्त पर हो जाएगा।

3. मोड़ ले संसार वाले

नजरें तुमसे जिस घडी

हो यकीं तो आसरा

उसका तुम्हें मिल जाएगा।

4. माँगने से मिलता है

केवल वही जो माँगा था

कुछ न माँगो तो

खुदा खुद ही तुम्हें मिल जाएगा।

5. काटोगे फसलें वही

जैसी तुमने बोयी थी

कर्मो का चक्कर है

इससे कोई न बच पायेगा।

हमारे जमाने में यह होता था

केवल बूढ़ों की बातें ही नहीं

न ही अफसाने – किस्से

ये हो सकते हैं-

कभी चिडियों की चूँ-चूँ से हम जगते थे।

कभी बिना रूमाल मुँह पर रखे हम सांस ले सकते थे।

कभी सूरज बादलों की धुंध के पीछे नहीं छुपता था।

कभी पेड़ पर हरे पत्तो की छाया होती थी।

हाँ कभी –

हमारे जमाने की वो बात है

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