शब्द वही हो तो भी : राजेन्द्र राजन

चिराग़ की तरह पवित्र और जरूरी शब्दों को

अंधेरे घरों तक ले जाने के लिए

हम आततायियों से लड़ते रहे

थके-हारे होकर भी

और इस लड़त में

जब हमारी कामयाबी का रास्ता खुला

और वे शब्द

लोगों के घरों

और दिलो-दिमाग़ में जगह पा गये

तो आततायियों ने बदल दिया है अपना पैंतरा

अब वे हमारे ही शब्दों को

अपने दैत्याकार प्रचार-मुखों से

रोज – रोज

अपने पक्ष में दुहरा रहे हैं

मेरे देशवासियों ,

इसे समझो

शब्द वही हों तो भी

जरूरी नहीं कि अर्थ वही हों

फर्क करना सीखो

अपने भाइयों और आततायियों में

फर्क करना सीखो

उनके शब्द एक जैसे हों तो भी .

- राजेन्द्र राजन

१९९५.


गांधी का ’निर्झरेर स्वप्नभंग’ था ’हिन्द स्वराज’

प्रख्यात चिन्तक बर्ट्रेण्ड रसल ने अपनी लम्बी आत्मकथा के आखिरी हिस्से में कहा था कि दुनिया की सभी समस्याएं तीन श्रेणियों में रखी जा सकती हैं :

जो मनुष्य की खुद से या खुद में पैदा होने वाली समस्याएं हैं ,  जो समस्याएं समाज के अन्य लोगों से जुड़ी हैं तथा मनुष्य और प्रकृति के द्वन्द्व से पैदा समस्याएं । विनोबा भावे ने १९३० में इन तीन प्रकारों को व्यक्ति ,समष्टि तथा सृष्टि के रूप में मन्त्रबद्ध किया ।

नारायण देसाई

नारायण देसाई

गत दो वर्षों में हमारे देश में दो लाख से ज्यादा लोगों नी आत्मह्त्या की । इनमें से ज्यादातर किसान थे। इनकी आत्महत्या की जड़ में हमारी अर्थव्यवस्था से जुड़े कारण भले ही रहे हों ,इन लोगों ने अपनी सबसे मूल्यवान वस्तु को समाप्त करने का फैसला व्यक्तिगत स्तर पर लिया होगा। अमीर देशों के अस्पतालों में भर्ती होने वालों में सड़क दुर्घटनाओं में मृत तथा घायल हुए लोगों के बाद मानसिक समस्याओं वाले रोगियों का ही नम्बर आता है । अवसाद एक प्रमुख व्याधि बन गया है । हृदय रोग से प्रभावित होने वालों की उम्र लगातार घटती जा रही है । तलाक लेने वाले जोड़ों की संख्या में वृद्ध हो रही है ।

समष्टि से जुड़ी समस्याओं में सबसे अहम है आर्थिक विषमता । डांडी यात्रा से पहले गांधी द्वारा वाइसरॉय को लिखे पत्र में कहा गया था यदि आप हमारे देश के कल्याण के बारे में सचमुच गंभीर हैं तो देश से जुड़ी प्रमुख समस्याओं और मांगों के सन्दर्भ में क्या कर रहे हैं बतायें । इस पत्र में चौथे नम्बर पर नमक कानून वापस लेने की बात जरूर थी लेकिन देश की न्यूनतम मजदूरी पाने वाले से लगायत प्रधान मन्त्री के वेतन के अनुपात तथा इन सबसे कई गुना ज्यादा वाईस रॉय को मिलने वाले वेतन का हवाला दिया गया था तथा इन ऊँची तनख्वाहों को आधा करने की मांग की गयी थी ।

दारिद्र्य का मूल्यांकन औसत से किया जाना एक धोखा देने वाली परिकल्पना है । भारत वर्ष में ऊपर के तथा मध्य वर्गों में आई आर्थिक मजबूती के कारण यह भ्रम पाल लेना गलत होगा की गरीबी मिट गयी । गरीब की मौत सौ फीसदी का मानक है , ऊंचे औसतों से उसमें फरक नहीं आता ।

संगठित हिंसा का स्वरूप चिन्ताजनक हो गया है । अखबारों में विज्ञापनों के बाद हत्याओं की खबरें सर्वाधिक होती हैं । अणुशस्त्रों के समर्थकों द्वारा कहा जाता है  कि  इतने बम बन गये हैं कि उनके ’निरोधक गुण’ के कारण तीसरे महायुद्ध का खतरा टल गया । दुनिया के युद्धों के स्वरूप पर गौर करने से हम पाते हैं कि प्रथम विश्व युद्ध में समर में प्रत्यक्ष लगे सैनिक असैनिक नागरिकों की तुलना में ज्यादा मारे गये थे । दूसरे विश्वयुद्ध में तथा इसके बाद के सभी युद्धों में यह प्रक्रिया उलट गयी है । अब युद्धों में असैनिक नागरिकों की मौत प्रत्यक्ष लड़ रहे सैनिकों से कहीं ज्यादा हो रही हैं ।

आतंकवाद , हमारे देश में व्याप्त जातिगत विषमता , आदिवासी का शोषण तथा दुनिया भर में व्याप्त लैंगिक भेद भाव प्रमुख सामाजिक समस्याएं हैं । उपभोगवाद द्वारा राग ,द्वेष और घृणा पोषित हुए हैं ।

’ओज़ोन परत मे छि्द्र” कहने पर उक्त छिद्र के बहुत छोटा होने की छवि दिमाग में बनती है। हकीकत है कि वह ’छिद्र’ आकार में एशिया महादेश से भी बड़ा है । हम साधु को स्वामी कह कर सम्बोधित करते हैं लेकिन पश्चिमी सभ्यता का ’सामाजिक अहंकार’ मनुष्य को प्रकृति का स्वामी मानता है । धरती के विनाश का खतरा है। गांधी ने मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं प्रकृति को शिरोधार्य माना ।

आज से १०० साल पहले ये समस्याएं कुछ कम जटिल रूप में मौजूद थीं । लेकिन इनकी बुनियाद उससे भी करीब डेढ़ सौ साल पहले औद्योगिक क्रान्ति के साथ पड़ चुकी थी । डार्विन के सिद्धान्त survival of the fittest से पश्चिम के सामाजिक अहंकार को बल मिला था। गांधी ने विश्व में व्यक्ति केन्द्रित पूंजीवाद और समष्टि केन्द्रित समाजवाद को समझा । पूंजीवाद और साम्यवाद इस आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था की जु्ड़वा सन्ताने हैं, यह गांधी समझ सके। आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था के दुष्परिणामों और उसके भविष्य के संकेतों को समझने के पश्चात एक कवि के समान सृजन की विह्वलता के साथ उन्होंने ’हिन्द स्वराज’ की रचना की । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ’निर्झरेर स्वप्नभंग’ को अपनी प्रथम रचना मानते हैं , उसके पहले की कविताओं को तुकबन्दियां मात्र मानते हैं । ठीक उसी प्रकार ’हिन्द स्वराज’ गांधी की प्रथम स्रुजनात्मक रचना है । जहाज के कप्तान से स्टेशनरी की मांग करना , दाहिने हाथ से लिखते लिखते थक जाने पर बांए हाथ से लिखना उनकी उत्कटता के द्योतक थे।(हिन्द स्वराज की रचना इंग्लैंण्ड से अफ़्रीका पानी के जहाज से जाते वक्त लिखी गयी थी) । उन्होंने यह स्पष्ट कहा भी जब मुझसे बिलकुल नहीं रुका गया तब ही मैंने इसकी रचना की।

तेनसिंग और हिलेरी ने आपस में यह समझदारी बना ली थी कि वे दुनिया को यह नहीं बतायेंगे कि किसने एवरेस्ट की चोटी पर पहला कदम रखा । परन्तु ऊपर पहुंचने के बाद उन दोनों ने जो किया वह गौर तलब है । हिलेरी ने अपना झण्डा गाड़ा और तेनसिंग ने वहाँ की बरफ़ उठा कर मस्तक पर लगाई।

मौजूदा अर्थव्यवस्था अब उत्पादन से ज्यादा कीमतों और ब्याज के हेर-फेर पर निर्भर है । मौजूदा संकट सभ्यता के अंत का प्रथम भूचाल है । सत्य ,अहिंसा,साधन शुद्धि आदि के गांधी के ’तत्व ’ हैं । यह तत्व हमेशा प्रासंगिक रहेंगे । चरखा गांधी का तन्त्र है जो सतत परिवर्तनशील रहेगा। अपने जीवन काल में ही गांधी ने स्थानीय तकनीक से १०० गज धागा बनाने वाले चरखे की खोज के लिए एक लाख रुपये के ईनाम की घोषणा की थी ।

गांधी ने स्वराज का अर्थ सिर्फ़ राजनैतिक स्वराज से नहीं लिया था। उसका सन्दर्भ समूची संस्कृति से था। जरूरतों को अनिर्बन्ध बढ़ाना नहीं स्वेच्छया नियन्त्रित करना ताकि हर व्यक्ति स्वराज का अनुभव करे। ’हिन्द स्वराज” ने आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था के शक्तिवाद , उद्योगवाद , उपभोक्तावाद,बाजारवाद के विकल्प में सत्याग्रह,प्रकृति के साथ साहचर्य ,सादगी,प्रेम,स्वावलंबन पर आधारित विकास की परिकल्पना दी।

[ काशी विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में मौजूदा वैश्विक संकट और ’हिन्द स्वराज’ विषयक श्री नारायण देसाई द्वारा दिए गए व्याख्यान के आधार पर । व्याख्यान का आयोजन प्रोफेसर किरन बर्मन ने किया था। ]

हिन्दी में जाल पतों की इजाजत

वेब ठिकानों का पर्यवेक्षण करने वाली संस्था ने कल (शुक्रवार,३० अक्टूबर २००९) को हिब्रू , हिन्दी , अरबी और कोरियन जैसी उन भाषाओं में इन्टरनेट पते बनाने की अनुमति दे दी है जिनकी वर्णमाला लैटिन वर्णमाला पर आधारित नहीं है । हफ़्ते भर की चर्चा करने के बाद इन्टरनेट कॉर्पोरेशन फॉर असाईन्ड नेम्स एन्ड नम्बर्स  (ICANN) की दक्षिण कोरिया की राजधानी में हुई बोर्ड-बैठक में मतदान द्वारा यह फैसला लिया गया । यह उम्मीद की जा रही है कि इस फैसले से इन्टरनेट का आधार व्यापक होगा । उल्लेखनीय है कि इस मसले पर विगत एक साल से बहस और परीक्षण चल रहे थे ।

दुनिया के देशों की सरकारें तथा वेब ठिकाने बनाने वाले आगामी १६ नवम्बर से निश्चित पते निर्धारित करने के लिए आवेदन करना शुरु कर सकेंगे । ICANN के एक अधिकारी ने बताया कि अरबी , चीनी जैसी भाषाओं में URL रखने की सर्वाधिक मांग है । उम्मीद है कि आगामी साल की शुरुआत से इन भाषाओं में URL देखे जा सकेंगे ।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कमजोर तबकों के ,कम शिक्षित , अंग्रेजी न जानने वाले तबकों में तेजी के साथ इन्तरनेट का प्रसार बढ़ सकता है ।

आठवें दशक में जब जाल पतों की शुरुआत हुई तब से अंग्रेजी के २६ अक्षर (A से Z) तथा १० अंकों से ही पते बनते रहे हैं । कुछ तकनीकी उपायों से जाल पतों के शुरुआती अक्षरों में अन्य भाषाओं की लिपियों को शामिल किया जा सकता था किन्तु पतों के .com ,.in,.org जैसे प्रत्यय अथवा पुछल्लों में उक्त (अंग्रेजी के) ३७ अंक या अक्षर का प्रयोग संभव था । (स्रोत : AP)

[ क्या आपने यह खबर इससे पहले  मुख्यधारा की मीडिया में  पढ़ी थी ? ]

उजड़े-उखड़े लोगों की कहानी : ‘ढोल बजाकर मस्ती से नाचने की बहुत याद आती है‘

“जिस प्रकार कोई किसी चिड़िया का घोंसला नष्ट कर देता है, उसे नया घोंसला बनाने में कितनी मु्श्किल होती है। फिर तो हमारा पुराना घर था, जमीन थी। पेड़ों की घनी छांव थी। वहां का ठंडा वातावरण था। हमें वहां से हटा दिया। न कोई मुआवजा मिला, न जमीन। 30 साल बाद भी हमें बार-बार पुराने गांव की वैसी ही याद आती है, जैसे यह कल ही बात हो।” यह कहना है इंदिरा नगर के मंशाराम का। इंदिरानगर मध्यप्रदेश के हो्शंगाबाद जिले के पिपरिया विकासखंड से दक्षिण में 8 किलोमीटर दूर है।

इन्दिरा नगर : जहां बसाया गया

इन्दिरा नगर : जहां बसाया गया

नीमघान के लोगों को वर्ष 1981 के आसपास सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान से हटाया गया था, जो बाद में इधर-उधर भटकते इंदिरा नगर में बस गए। हालांकि जब नीमघान से इस गांव के लोगों को हटाया गया तब मंशाराम बहुत छोटा था। लेकिन उसने अपने पिताजी लखन सिंह और अन्य लोगों से नीमघान के बारे में काफी सुना है। उसकी कहानियां सुनी हैं। जबसे उसने होश संभाला है तबसे वह भी नीमघान कई बार जा चुका है। वहां आसपास उनके बहुत से रिश्तेदार भी रहते हैं। नीमघान पचमढ़ी की तलहटी में बसा था, यह जगह अब सैर-सपाटे के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन दूसरी तरफ वहां से उजड़े लोगों की जिंदगी फटेहाल है।

मंशाराम कहता है कि वहां दहिया खेती होती थी जिसमें खूब कोदो-कुटकी पकती थी।

झूम खेती के बारे में बताते हैं कि उसे करने का तरीका यह है कि बारिश के पहले ललताना (विदेशी खरपतवार) या छोटी झाडी काटके जंगल की जमीन पर बिछा देते है, उसमे आग लगा देते हैं। यह खेती बड़े-बड़े पत्थरों के बीच में भी हो जाती है। जब ललताना जलकर राख हो जाता है तो उसी राख में कुटकी, कांगनी फेंक देते है। पानी गिरता है तो वह उग जाती है। बाद में दो-तीन बार निंदाई-गुड़ाई करनी पड़ती है। और फसल पक जाती है बस। इस खेती में एक या दो साल में जगह बदलनी पड़ती है। इसलिए इसे अंग्रेजी में शिफ्टिंग कल्टीवेशन कहते है। एक परिवार एक या दो जगह चिन्हित कर लेता है और बारी-बारी से वहां खेती करता है। इसमें किसी का मालिकाना हक नहीं होता। इसमें भूमि स्वामित्व जैसा कुछ नहीं होता। यहां जो थोड़ी-बहुत जमीन है वह उबड़-खाबड़ हैं, उसमें बारिश का पानी ही नही रूकता तो फसल कहां से होगी? उसमें मक्का वगैरह ही होता है।

यादों में खोया रहता है मंशाराम

यादों में खोया रहता है मंशाराम

वह कहता है वहां हमारे बुजुर्ग बड़ी संख्या में ढोर (मवेशी) रखते थे। उन्हें चराने के लिए जंगल में नि:शुल्क घास मिल जाती थी। शुद्ध घी खाने को मिलता था। घी की बहुतायत इतनी होती थी कि हम अपने बदन और सिर में भी घी चुपड़ते थे। जंगल  ही उनकी जिंदगी और रोजी-रोटी का मुख्य आधार था। वहां से ही हमारी रोजाना की जरूरतें पूरी हो जाती थी। लकड़ी-बांस व अपनी जरूरत की चीजें मिल जाती थी। महुआ, गुल्ली(महुए का बीज जिससे तेल मिलता है), तेंदूपत्ता, अचार ( साबुत चिरौंजी), आंवला, शहद, पत्तल-दोने, भाभर घास आदि को बेचकर अपना गुजारा कर दिया। जंगल में आम और जामुन के बहुत पेड़ हैं। पत्थरों की बड़ी-बड़ी चट्टानें हैं और घने बड़े पेड़ों की ठंडी छांव हैं। वहां नदी-नाले हैं जिनमें साल भर पानी भरा रहता है। इतना अच्छा और मनमोहक वातावरण था। लेकिन हमें वहां से भगा दिया गया। यहां हमें किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं है। न रोजगार है और न ही खेती। सूखे में पानी की बहुत दिक्कत है। इसलिए यहां बहुत कम मवेशी रखते हैं। सिर्फ जंगल से जलाऊ लकड़ी के भरोसे गुजर-बसर चल रही है।

इसी इलाके से हर्राकोट का जमींदार भभूतसिंह रहता था। अंग्रेजों से उसने जंगल के अधिकार की लड़ाई लड़ी। भारत के इतिहास में इसी जमींदार से जंगल छीनकर पहला आर्क्षित वन बनाया गया। 1861 में उसे धोखे से पकड़कर जबलपुर जेल में फांसी दे गई। 1862 में बोरी देश का पहला आरक्षित जंगल बनाया गया। मंशाराम के अनुसार नीमघान में भभूतसिंह की गुफा भी है। यानी इस इलाके के साथ एक संघर्षका इतिहास भी जुड़ा है। इंदिरा नगर, डापका ग्राम पंचायत में आता है, वहां कोरकू राजा की पुरानी हवेली है। यहां निवासरत रेबाबाई अपने आपको भभूतसिंह का वंशज बताती हैं।

सतपुड़ा के घने जंगल

सतपुड़ा के घने जंगल

वह बताता है उनके बुजु्र्ग बाजार से सिर्फ नमक, कपड़ा और कुछ मसाले भर खरीदते थे। बाकी सभी चीजें उन्हें जंगल से मिल जाती थी या खुद अपने खेतों में पैदा कर लेते थे। यह पूछने पर कि क्या उनके बच्चे वहां पढ़-लिख पाते ? उसने कहा- यहां कौन से पढ़ पा रहे हैं, इतने सालों बाद भी रोज जंगल जाना, जलाऊ गट्ठा लाना, उसें बेचना और फिर राशन लाकर पेट भरना, यही दिनचर्या है।

लेकिन मंशाराम की बात सही होने के बावजूद अब पहले जैसा वातावरण नहीं रहा।  जंगल क्षेत्र में रहने वाले लोग भी पढ़ाई-लिखाई के महत्व को समझते हैं। अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। कई पढ़ा भी रहे हैं। लेकिन हमारी छाननेवाली (फिल्ट्रेट) शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी है उसमें ये बच्चे पिछड़ जाते हैं। जाने-माने पत्रकार पी. सांईनाथ लिखते है कि हमारे देश में स्कूल जानेवाले आयु के प्रत्येक 100 बच्चों में से लगभग 70 बच्चे पहली कक्षा में पढ़ते हैं। इनमें से आधे  प्राइमरी स्कूल की पढ़ाई करने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं। बाकी 35 में से 10 से भी कम कक्षा आठ से ऊपर तक पहुंचते हैं। अंत में पांच से कम हाई स्कूल तक पहुंचते है। आदिवासियों में साक्षरता बहुत कम है। अब तक नीमघान से विमलेश नाम के युवक को छोड़कर कोई महाविद्यालय तक तो क्या हाई स्कूल तक भी नहीं पहुंचा।

नीमघान में लोग श्रावण, हरिज्योति और पोला त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाते थे। दीवाली और होली में उमंग और उत्साह होता था। बड़े-बड़े ढोल बजते थे। अगर एक गोल घेरे 15 व्यक्ति होते थे, सबके पास ढोल होते थे। वे बजाते थे और खूब मस्ती से नाचते-गाते थे। अब यहां किसी के पास ढोल नहीं है। हमें इसकी बहुत याद आती है। लखन दादा जैसे कुछ बुजुर्ग लोग हैं, उनका जब कभी गाने का मन करता है तब खुद ही गुनगुना लेते हैं। न अब गाने वाले लोग है और न ही वे ढोल हैं।

अब जंगल वाले इलाके में ढोल वगैरह बजाने पर अप्रत्यक्ष रूप से रोक लग गई है जिसके पक्ष में दलील दी जाती है कि जंगली जानवर चमकते है। जंगलों को मनुष्यविहीन इसलिए किया जा रहा है कि आदिवासियों के रहने से शेरों को खतरा है। जबकि आदिवासी और शेर बरसों से साथ-साथ रहते आए हैं। मंशाराम कहता है कि जंगली जानवर खुद जंगलों में गांवों के आसपास ही रहना पसंद करते हैं।

सतपुड़ा के पहाड़

सतपुड़ा के पहाड़

यानी इंदिरा नगर के लोगों को सब कुछ याद है। वहां के नदी, पहाड़, पेड़, पत्थर, तीज, त्यौहार, दहिया खेती और जंगली जानवर सब कुछ। इसी प्रकार यहां हाल ही में सतपुड़ा टाईगर रिजर्व से विस्थापित नई धांई के बच्चे भी बड़े रोमांच और उत्साह से नदी और जंगल के बारे में बताते हैं। इन बचपन की सुखद स्मृतियों का पन्ना उनके जीवन में अभिन्न रूप जुड़ा रहेगा। लेकिन वे सदैव विस्थापन की पीड़ा का अहसास कर जिंदगी जीने को मजबूर होंगे।

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि  विस्थापन सिर्फ भौतिक रूप से ही नहीं होता, मानसिंक भी होता है। इससे पैदा हुए खालीपन को सिर्फ कुछ नगद पैसों और जमीन (वह भी नहीं मिली) से नही भरा जा सकता। खासतौर से बच्चे अपने बचपन के दिनों को कभी नहीं भुला पाते, जहां उनका जन्म हुआ है। जिन गलियों में खेले, कूदे और बड़े हुए हैं। विस्थापन पर अध्ययनरत चिन्मय मिश्र कहते हैं विस्थापन की यंत्रणा से जहां तक संभव हो बचना चाहिए, इसका असर दीर्घकाल तक बना रहता है।

बाबा मायाराम

अग्रवाल भवन

रामनगर कॉलोनी

पिपरिया- 461 775

जिला- होशंगाबाद

मप्र

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गरीबी नहीं, अमीरी की रेखा हो – सुनील -

भारत सरकार के प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक ने देश में एक बहस छेड़ दी है। सरकार ने इस खाद्य सुरक्षा का मतलब सस्ती दरों पर खाद्यान्नों की सार्वजनिक वितरण प्रणाली से माना है और इसे वह गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों तक सीमित करना चाहती है। राज्य सरकारों को लिखे एक पत्र में भारत सरकार के खाद्य मंत्रालय ने यह भी कहा है कि ये सरकारें अपनी मर्जी से गरीबो की संख्या बढ़ाना तथा बीपीएल राशन कार्ड बांटना बंद करें और योजना आयोग द्वारा हर प्रांत के लिए तय की गई गरीबों की संख्या पर ही कायम रहें।

पत्र में इस बात पर चिंता जाहिर की गई है कि योजना आयोग के अनुसार देश में 6.52 करोड़ गरीब परिवार होना चाहिए, लेकिन देश में 10.68 करोड़ बीपीएल कार्ड हो गए हैं, यानी 4.16 करोड़ कार्ड ज्यादा बन गए हैं। गरीबी के नए अनुमानों के मुताबिक तो देश में अब बीपीएल कार्डों की संख्या 5.91 करोड़ ही होना चाहिए।

यदि शरद पवार वाले इस मंत्रालय की चली, तो देश के गरीबों की जिन्दगियों पर यह एक और हमला होगा। भारत सरकार का योजन आयोग जिस तरह गरीबी रेखा का निर्धारण कर रहा है, उस पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। योजना आयोग के आंकड़ोंमें तो देश की गरीबी कम होती जा रही है और विकास व प्रगति की एक उजली तस्वीर उभरती है। इन के मुताबिक देश में 1973-74 में 55 प्रतिशत लोग गरीब थे, जो 1983 में घटकर 44 प्रतिशत, 1993-94 में36 प्रतिशत, 1999-2000 में 26 प्रतिशत रह गए। वर्ष 2004-05 में मामूली बढ़कर यह प्रतिशत 27.5 हो गया। इन्ही आंकड़ों के दम पर सरकार दावा करती है कि विकास के फायदे नीचे तक ‘रिस’ रहे हैं और वह लोगों को धीरज रखने को कहती है।

योजना आयोग का गरीबी का आकलन सत्तर के दशक में न्यूनतम कैलोरी उपभोग पर आधारित है। वर्ष 1973 में ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी (प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति) वाला भोजन करने वाले परिवारों की आय देखी गई और उसे ही गरीबी रेखा मान लिया गया। बाद के वर्षों में उसी आय को कीमतों के सूचकांक में वृद्धि के अनुपात में बढ़ाया जाता रहा। लेकिन इस बीच साधारण भारतवासी के बजट में अन्य वस्तुओं व सेवाओं के खर्च व उनकी कीमतों में काफी वृ्द्धि हुई, जिसे योजना आयोग ने नजरअंदाज कर दिया। नतीजा यह हुआ कि बाद के वर्षों मेंसरकारी गरीबी रेखा वाली आय के परिवार अब पहले से काफी कम कैलोरी वाला भोजन कर पा रहे हैं। उनके भोजन में कटौती हो गई है।

उदाहरण के लिए वर्ष 2004-05 में सरकार ने जिस आय को गरीबी रेखा माना है, राष्ट्रीय सेम्पल सर्वेक्षण के मुताबिक उस आय वाले परिवार मात्र 1800 कैलोरी का ही उपभोग कर रहे थे। यदि निर्धारित न्यूनतम 2400 (ग्रामीण) और 2100 (शहरी) कैलोरी भोजन वाले परिवारों की आय निकाली जाए तो वह सरकारी गरीबी रेखा आय से लगभग दुगुनी होगी। देश में गरीबों का प्रतिशत 27.5 के स्थान पर 75.8 हो जाएगा। स्पष्ट है कि 48 प्रतिशत से ज्यादा आबादी या 54 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा के बाहर रखकर सरकारी योजनाओं व मदद से वंचित किया जा रहा है।

डॉ. उत्सा पटनायक जैसे कई मूर्धन्य अर्थशास्त्रियों ने इस विसंगति को बार-बार उजागर किया है। लेकिन लगता है कि योजना आयोग जानबूझकर आंकड़ों का यह घपला जारी रखना चाहता है, ताकि सरकार की जिम्मेदारी कम रहे, विकास का भ्रम बना रहे और नवउदारवादी सुधारों की गाड़ी चलती रहे। विश्व बैंक एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय ताकतें भी यही चाहती है।

पिछले दिनों एक सरकारी समिति ने भी गरीबी रेखा के आकलन में इस अंतर्विरोध को स्वीकार किया है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने डॉ. एन.सी.सक्सेना की अध्यक्षता में गरीबों को चिन्हित करने के लिए विशेषज्ञ समूह का गठन किया है। इस की अंतरिम रपट में स्वीकार किया गया है कि गरीबी रेखा का यह निर्धारण दोषपूर्ण है। इसके पहले अर्जुन सेनगुप्ता की अध्यक्षता में बने असंगठित  क्षेत्र आयोग ने भी बताया था कि देश की 77 प्रतिशत आबादी या 83 करोड़ लोग 20 रु. रोज से नीचे गुजारा कर रहे है। इसे ही गरीबी का सबसे अच्छा आकलन मानना चाहिए।

गरीबी रेखा के गलत व त्रुटिपू्र्ण नि्र्धारण के पीछे एक राजनीति भी है। इससे देश के गरीबों की बड़ी संख्या को किसी भी प्रकार की सरकारी मदद से वंचित किया जा सकता है। साथ ही गरीबों को आपस मे बांटा व उलझाया जा सकता है। देश के गांवों और शहरी झोपड़पटि्टयों के गरीब लोग इसी मुद्दे पर उलझे रहते हैं कि फलां का नाम कैसे गरीबी रेखा की सूची में है और उनका नाम क्यों नहीं है। आपसी द्वेष और द्वन्द्व भी पैदा होता है। कई समझदार लोग भी मान लेते हैं कि  भ्रष्टाचार एवं गलत लोगों के नाम इस सूची में शामिल होने से समस्या पैदा हुई है। लेकिन कुछ संपन्न लोगों के नाम हटा देने से यह समस्या हल नहीं होने वाली है, क्योंकि गरीबी रेखा की सूची को जरुरत से काफी छोटा रखा जाता है। यह मामला क्रियान्वयन में कमी या भ्रष्टाचार का नहीं, सरकार की नीति व नियत में ही खोट का है।

कुल मिलाकर, गरीबी रेखा के इस भ्रमजाल को समझना और इससे बाहर आना जरुरी है। अर्थशास्त्रियों और विद्वानों की बौद्धकि कसरतों के लिए यह ठीक है, किन्तु सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों के लिए इसे आधार बनाना ठीक नहीं हैं। जनकल्याण की समस्त योजनाएं व सुविधाएं देश की साधारण जनता के लिए होने चाहिए, सिर्फ गरीबी रेखा की सूची के परिवारों तक उन्हें सीमित नहीं किया जाए। जिस देश में 75-80 प्रतिशत आबादी गरीबी एवं अभावों में जी रही हो, वहां इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। यदि कोई भेद करना है, तो वह अमीरों को बाहर करके किया जा सकता है। आयकर का भुगतान करने वाले, निजी मोटरगाड़ी रखने वाले, जैसे कुछ मानक बनाकर अमीर परिवारों की एक नकारात्मक सूची बनाई जा सकती है। यह ज्यादा सरल एवं व्यवहारिक भी होगा। दूसरे शब्दों में, देश को गरीबी रेखा के बजाय एक अमीरी रेखा की जरुरत है। इस अमीरी रेखा की सूची के लोगों को सरकारी मदद व अनुदान से वंचित किया जा सकता है और उन पर भारी टैक्स लगाए जा सकते हैं। देश में जमीन की हदबंदी की ही तरह संपत्ति व आमदनी की एक ऊपरी सीमा बनाने पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। आखिर हम यह नहीं भूल सकते कि अमीरी और गरीबी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
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(लेखक समाजवादी जन परिषद् का राष्ट्रीय अध्यक्ष है।)

सुनील, ग्राम पोस्ट -केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461 111

फोन नं० – 09425040452, फोन 09425040452]  ईमेल & sjpsunilATgmailDOTcom

कुँवरनारायण को ज्ञानपीठ मिलने की खुशी में उनकी चार कवितायें

जल्दी में

प्रियजन

मैं बहुत जल्दी में लिख रहा हूं

क्योंकि मैं बहुत जल्दी में हूं लिखने की

जिसे आप भी अगर

समझने की उतनी ही बड़ी जल्दी में नहीं हैं

तो जल्दी समझ नहीं पायेंगे

कि मैं क्यों जल्दी में हूं ।

जल्दी का जमाना है

सब जल्दी में हैं

कोई कहीं पहुंचने की जल्दी में

तो कोई कहीं लौटने की …

हर बड़ी जल्दी को

और बड़ी जल्दी में बदलने की

लाखों जल्दबाज मशीनों का

हम रोज आविष्कार कर रहे हैं

ताकि दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती हुई

हमारी जल्दियां हमें जल्दी से जल्दी

किसी ऐसी जगह पर पहुंचा दें

जहां हम हर घड़ी

जल्दी से जल्दी पहुंचने की जल्दी में हैं ।

मगर….कहां ?

यह सवाल हमें चौंकाता है

यह अचानक सवाल इस जल्दी के जमाने में

हमें पुराने जमाने की याद दिलाता है ।

किसी जल्दबाज आदमी की सोचिए

जब वह बहुत तेजी से चला जा रहा हो

-एक व्यापार की तरह-

उसे बीच में ही रोक कर पूछिए,

‘क्या होगा अगर तुम

रोक दिये गये इसी तरह

बीच ही में एक दिन

अचानक….?’

वह रुकना नहीं चाहेगा

इस अचानक बाधा पर उसकी झुंझलाहट

आपको चकित कर देगी ।

उसे जब भी धैर्य से सोचने पर बाध्य किया जायेगा

वह अधैर्य से बड़बड़ायेगा ।

‘अचानक’ को ‘जल्दी’ का दुश्मान मान

रोके जाने से घबड़ायेगा । यद्यपि

आपको आश्चर्य होगा

कि इस तरह रोके जाने के खिलाफ

उसके पास कोई तैयारी नहीं….

क्या वह नहीं होगा

क्या फिर वही होगा
जिसका हमें डर है ?
क्या वह नहीं होगा
जिसकी हमें आशा थी?

क्या हम उसी तरह बिकते रहेंगे
बाजारों में
अपनी मूर्खताओं के गुलाम?

क्या वे खरीद ले जायेंगे
हमारे बच्चों को दूर देशों में
अपना भविष्य बनवाने के लिए ?

क्या वे फिर हमसे उसी तरह
लूट ले जायेंगे हमारा सोना
हमें दिखाकर कांच के चमकते टुकडे?

और हम क्या इसी तरह
पीढी-दर-पीढी
उन्हें गर्व से दिखाते रहेंगे
अपनी प्राचीनताओं के खण्डहर
अपने मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे?

अजीब वक्त है

अजीब वक्त है -

बिना लड़े ही एक देश-का देश

स्वीकार करता चला जाता

अपनी ही तुच्छताओं की अधीनता !

कुछ तो फर्क बचता

धर्मयुद्ध और कीटयुद्ध में -

कोई तो हार जीत के नियमों में

स्वाभिमान के अर्थ को

फिर से ईजाद करता ।

- कुंवर नारायण

[ वरिष्ट कवि कुंवर नारायण की राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'कोई दूसरा नहीं' तथा 'सामयिक वार्ता' (अगस्त-सितंबर १९९३) से साभार ]

अयोध्या , १९९२

हे राम ,

जीवन एक कटु यथार्थ है

और तुम एक महाकव्य !

तुम्हारे बस की नहीं

उस अविवेक पर विजय

जिसके दस बीस नहीं

अब लाखों सिर – लाखों हाथ हैं

और विवेक भी अब

न जाने किसके साथ है ।

इससे बड़ा क्या हो सकता है

हमारा दुर्भाग्य

एक विवादित स्थल में सिमट कर

रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं

योद्धाओं की लंका है ,

‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं

चुनाव का डंका है !

हे राम , कहाँ यह समय

कहाँ तुम्हारा त्रेता युग ,

कहाँ तुम मर्यादा पुरुषोत्तम

और कहाँ यह नेता – युग !

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ

किसी पुराण – किसी धर्मग्रंथ में

सकुशल सपत्नीक….

अब के जंगल वो जंगल नहीं

जिनमें घूमा करते थे बाल्मीक !

- कुँवरनारायण

( फरवरी ,१९९३ में राजेन्द्र राजन द्वार सम्पादित तथा समकालीन सहित्य मंच , वाराणसी द्वारा प्रकाशित ’उन्माद के खिलाफ’ से )

बिखर चुका है गरीबों का शिराजा बापू : सलीम शिवालवी

[गांधी जयन्ती को बीते कल दो ही दिन हुए थे । सलीम मिले तो चार पंक्तियां सुनाईं । मैंने कहा लिख दीजिए तो लिखते - लिखते चार पंक्तियां और जुड़ गयीं । कवि और शायर के अलावा सलीम और मैं राजनैतिक साथी भी हैं। ]

बिखर चुका है गरीबों का शिराजा बापू ।

कैसे रह पाये मुफ़लिस भी यहां जिन्दा बापू ।

पूँजीपतियों के अब चंगुल में है निजाम-ए-चमन ।

खुदकु्शी के सिवा अब कुछ नहीं चारा बापू । ।

ये चादर छीन लेते हैं, बिछौने छीन लेते हैं ।

यहां तक के नेवाले और ठिकाने छीन लेते हैं ।

कहाँ अब खेलने जायें गरीब-ए-शहर के बच्चे ?

अमीर-ए-शहर के बच्चे खिलौने छीन लेते हैं । ।

- सलीम शिवालवी .

(शिराजा = व्यवस्था )

्सलीम शिवालवी

्सलीम शिवालवी

्सलीम शिवालवी

्सलीम शिवालवी


साथी चंचल मुखर्जी बाजार में क्यों खोजते हैं- किनहे बैगन ?

शीतल पेयों में कीटनाशक अवशेषों के पाये जाने की जाँच संयुक्त संसदीय जाँच समिति ने की थी और सभी आरोपों को सही पाया था । संसद की कैन्टीन से धड़ाधड़ कोक – पेप्सी की बोतलें बाहर कर दी गयी थीं । कई शैक्षणिक परिसरों में इन्हें न बेचने का निर्णय लिया गया था । इस सब के बावजूद न तो इन पेयों पर रोक लगाई गई और न ही सरकार द्वारा इनकी शुद्धता के मानदण्ड अब तक निर्धारित हुए हैं । चूँकि यूरोपियन यूनियन का उपभोक्तावाद हमसे से ज्यादा परिष्कृत है इसलिए ऐसे मामलों में उनके द्वारा निर्धारित मानदण्ड ज्यादा कड़े हैं । सैंकड़ों देशों में एक ही ब्राण्ड का पेय बनाने  वाली ये दानवाकार कम्पनियाँ भारत में बनाये अपने पेय को यूरोप अथवा अमेरिका में नहीं बेच सकतीं , चूँकि वहाँ कीटनाशक अवशेषों के मानदण्ड कड़े हैं ।

अपनी जड़ें जमाने के बाद उपभोक्तावाद को नफ़ीस बनाने की माँग व्यापक होने लगती है । यूरोप और अमेरिका में सशक्त बन चुका उपभोक्ता आन्दोलन अक्सर सेहत और नैतिकता से जुड़े सवाल कारगार ढंग से उठाता है । पश्चिम के पर्यावरणवादी आन्दोलन में भी यूरोपवासियों की यह चिन्ता मुख्य है – ‘प्राकृतिक संसाधनों के सीमित भंडारों से हमारा दिन पर दिन बढ़ता उपभोग सीमित न होने पाए और अधिक दिन तक उपभोग के लिए हम बचे रहें ’। रासायनिक खाद के बिना पैदा किए गए अनाज और फलों की अच्छी खासी माँग इन अमीर देशों में पैदा हुई है – उपभोक्तावाद का परिष्कार !

समतावादी नेता किशन पटनायक के अनुसार ,’उनकी उपभोक्तावाद और पर्यावरण की चिन्ताएं गरीब मुल्कों में बढ़ रही भूखमरी और गैरबराबरी का समाधान नहीं ढूंढती हैं ”

बहरहाल , दुनिया भर में गला – काट स्पर्धा के नमूने के रूप में जानी जाने वाली कोक और पेप्सी बनाने वाली कम्पनियाँ कीटनाशक पाए जाने के बाद आए ’संकट’ (उन पर ) के दौर में संयुक्त प्रेस कॉन्फ़रेन्स कर रही थीं और अब तक मानदण्ड न बन पाने के पीछे भी इनका सम्मिलित प्रयास ही कारगर रहा है ।  इन दोनों कम्पनियों ने किसानों के द्वारा अबाध कीटनाशक उपयोग को अपने पेयों में पाए गए कीटनाशक – अवशेषों का स्रोत बताया था । इस बात की चर्चा शरद पवार की अध्यक्षता में बनी संयुक्त संसदीय समिति की रपट में भी हुई है । समिति ने नैसर्गिक खेती को बढ़ावा देने की बात भी सरसरी और सतही तौर पर कह कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर दी थी ।

बाजार में फल , सब्जी , अनाज की नई किस्मों के बीज अकेले नहीं आते हैं । उनके साथ निर्दिष्ट कीटनाशक ,  निर्दिष्ट रासायनिक खाद और सिंचाई की भारी मात्रा का एक पैकेज होता है । लाखों देशी किस्मों को खत्म करने में यह पैकेज वाली खेती मूल कारण रही है । फलस्वरूप इस किस्म की खेती में सबसे आगे रहने वाले सूबे – पंजाब , हरियाणा , महारा्ष्ट्र , आन्ध्र प्रदेश आज भूगर्भ जल-स्तर भयंकर नीचे जाने और किसानों की खुदकुशी में भी अगुवाई कर रहे हैं ।

एक ट्रेन यात्रा में बीज व्यवसाइयों का एक समूह मेरा सहयात्री था । उन्होंने मुझे बताया कि वे बाजार से सब्जी नहीं खरीदते , खुद के खाने के लिए बिना खाद , कीटनाशक वाली सब्जी पैदा करते हैं।

बाजार में बिकने वाली सब्जियों में मौजूद कीटनाशक अवशेषों की छँटाई और जाँच बिना प्रयोगशाला में ले जाये मेरे साथी चंचल मुखर्जी कर लेते हैं । कीटनाशक अवशेषों को अलग नहीं किया जा सकता लेकिन कीटों वाले हिस्सों को काटकर आसानी से अलग किया जा सकता है । यह मान लेना कि कीट-युक्त बैंगन कीटनाशक – विहीनता का प्रमाण है , एक वैज्ञानिक परिकल्पना नहीं हुई ?

साथी चंचल मुखर्जी

साथी चंचल मुखर्जी

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