यह लूट, लालच, भोग की सभ्यता का संकट है।
(1)
दुनिया का आर्थिक संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। अमरीका के जिस दोयम कर्ज (सब प्राइम लोन) संकट से यह शुरु हुआ, उसको 19 महीने बीत चुके है। निवेश बैंक नाम की जो नयी बैंकिंग प्रजाति अस्तित्व में आई है, उसमें शीर्ष के बीयर स्टर्न्स बैंक को बचाने की घटना को 13 महीने तथा लेहमन ब्रदर्स के बैठ जाने की घटना को भी सात महीने हो चुके हैं। अभी भी कोई यह विश्वास के साथ नहीं कह सकता कि इस संकट का सबसे बुरा दौर गुजर चुका है। इसका मतलब है कि इस संकट की जड़े बहुत गहरी है। यह वित्तीय कारोबार से शुरु हुआ, लेकिन यह सिर्फ वित्तीय संकट नहीं है। जिसे ‘असली’ अर्थव्यवस्था कहते हैं, उसके बुनियादी असंतुलनों, विसंगतियों व सीमाओं में इस संकट की जड़ें छिपी हैं। एक तरह से देखें तो यह आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता का संकट है।
अभी भी पूंजीवाद की अजेयता और शाश्वतता में विश्वास रखने वाले इसे महज व्यापार चक्र की एक और कड़ी के रुप में देख रहे हैं। तेजी और मंदी तो आती-जाती रहती है। इस मंदी के बाद फिर ग्राफ ऊपर उठेगा, ऐसा अंधा विश्वास उनका है। लेकिन कब तक ? और तब तक दुनिया के करोड़ों लोगों पर जो बीतेगी ,उसका क्या ? दुनिया के करोड़ों लोगों का रोजगार छिन चुका है, करोड़ों लोग भूख और कुपोषण के शिकंजे में आ चुके हैं। खुद संयुक्त राज्य अमरीका में लाखों लोग बेघर हो चुके हैं। यूरोप में लाखों लोगों के प्रदर्शन, हड़तालें व दंगे हो रहे हैं। आत्महत्याओं की संख्या बढ़ रही है। फिर अभी यह भी तय नहीं है कि पूंजीवाद पूरी तरह इस संकट से उबर पायेगा या नहीं। अभी भी चान्स फिफ्टी-फिफ्टी ही है।
इस संकट ने बाजारवाद की हवा निकाल दी है। जो कल तक कह रहे थे कि बाजार ही सबसे कुशल आबंटनकर्ता है, स्व-नियामक है, उस पर सरकार का नियंत्रण, नियमन और हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, वे ही अब बड़े-बड़े बैंकों व कंपनियों को बचाने के लिये तथा अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने के लिये सरकारों के बड़े-बड़े पैकेजों का मुंह जोह रहे है। अब अधिकांश लोग कबूल कर रहे हैं कि बाजारों को पूरी तरह खुला नहीं छोड़ा जा सकता। वित्तीय कारोबारों पर नियमन व नियंत्रण रखना ही होगा। ये नियंत्रण और नियमन हटा लेने के कारण ही ये हालातें पैदा हुई है। सट्टा अभूतपूर्व ऊँचाइयों पर पहुच गया। शेयर बाजार और अन्य सट्टा बाजारों के सूचकांको के इशारे पर सरकारें नाचने लगी थी। बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थाओं का मूल काम था बचतों और निवेश के बीच पुल बनाना। बचतकर्ता व निवेशकर्ता के बीच मध्यस्थता करना। यह मूल काम छोड़कर वे भी सट्टे, जुए और कृत्रिम कमायी में लग गए। इसके लिये नए-नए तरीके निकाले गए, जिन्हें ‘वित्तीय नवाचारों’ का सम्मानजनक शब्द दिया गया। वित्तीय बाजार, जुआघर बन गए। जैसे कोई जादूगर हवा में से या टोप में से चीजें निकाल देता है, वैसी ही बिना कोई आधार के, हवा में समृद्धि बन रही थी। वास्तविक अर्थव्यवस्था के वास्तविक उत्पादन से इसका कोई मेल नहीं था। इसलिए यह एक बुलबुला था, जो फूटना ही था। विडंबना यह थी कि कुछ लोग इस बुलबुले को ही ठोस प्रगति मानने लगे थे। अमरीका-यूरोप के लोग मानने लगे थे कि उनकी समृद्धि, कमाई, उपभोग, कर्ज का विस्तार और अर्थव्यवस्था की तेजी अंतहीन है। उसकी कोई सीमा नहीं है।
रीगन व थैचर के समय से पूरी वैधता पाए इस विनियंत्रण से एनरॉन और सत्यम जैसे घोटाले होना स्वाभाविक था। इसमें बर्नार्ड मेनाफ जैसे ठग पनपना ही थे। पूंजी निवेश में आकर्षक कमाई का लालच देकर इस अमरीकी नटवरलाल ने 5000 करोड़ डॉलर की ठगी की। उसकी बड़ी धूम व इज्जत थी। पिछले दिसंबर में उसका भंडा फूटा और वह जेल में है। लेकिन बात सिर्फ एक दो आदमी या कंपनी के घोटालों की नहीं है। यह ठगी और लूट अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रही है। इस मामले में पिछले वर्ष ही नोबल पुरस्कार पाने वाले अमरीकी अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमेन की यह स्वीकरोक्ति महत्वपूर्ण है -
‘‘ वास्तव में इन दिनों दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के बीच अमरीका बर्नार्ड मेडोफ जैसा दिख रहा है। कई सालों तक उसका बहुत सम्मान था, उसका बड़ा रोब भी था। अंत में पता चला कि वह शुरु से ही एक धोखेबाज ठग था।’’
(2)
अमरीका-यूरोप द्वारा दुनिया की ठगी व लूट का ताजे आर्थिक संकट से गहरा संबंध है। यह लूट किस तरह की है, यह समझने के लिये कुछ तथ्यों पर गौर करें।
एक, पिछले ढाई दशकों से संयुक्त राज्य अमरीका का व्यापार संतुलन लगातार ऋणात्मक रहा है, यानि अमरीका का आयात ज्यादा है, निर्यात कम है। वह शेष दुनिया से जितने मूल्य की वस्तुएं व सेवाएं ले रहा है, उतने मूल्य की बदले में नहीं दे रहा है। यह घाटा समय के साथ बढ़ता गया है। वर्ष 2004 आते-आते यह घाटा संयुक्त राज्य अमरीका की कुल राष्ट्रीय आय के 6 प्रतिशत के बराबर हो गया था। इसका मतलब यह है कि अमरीका अपनी राष्ट्रीय आय का 6 प्रतिशत हिस्सा, बदले में कोई वस्तुएं या सेवाएं दिए बगैर हासिल कर रहा है। बदले में वह डॉलर देता है, जो वापस उसे कर्ज के रुप में मिल जाता है।
दो, अमरीका-यूरोप का शेष दुनिया के साथ व्यापार और भी कई मायनो में एकतरफा, गैरबराबर व शोषणकारी है। जैसे कीमतों का गैरबराबर ढांचा। वर्ष 1980 और 2004 के बीच विकासशील देशों की व्यापार शर्तों में 15 प्रतिशत की गिरावट आई है। यानि अमीर देशों के निर्यात महंगे हुए हैं, गरीब देशों के निर्यात सस्ते हुए हैं। पिछले कुछ दशकों में विकासशील देशों का कुछ औद्योगीकरण हुआ है। उनके निर्यातों में औद्योगिक वस्तुओं का हिस्सा बढ़ा है, जबकि पहले प्राथमिक वस्तुओं(कृषि उपज, पशु उपज, वनोपज, खनिज आदि) का ही प्राधान्य रहता था। दूसरी ओर अमीर देशों के निर्यातों में ‘सेवाओं’ का हिस्सा बढ़ा है जिनमें वित्तीय सेवाएं, परिवहन, मनोरंजन, दूरसंचार, पर्यटन, होटल, चिकित्सा, शिक्षा आदि शामिल हैं। अमीर देशों के अनेक उद्योग गरीब देशों को स्थानांतरित हो गए हैं, ताकि वहां के सस्ते श्रम, सस्ते कच्चे माल , पर्यावरण के शिथिल नियमों और स्थानीय बाजार का फायदा उठा सकें । दुनिया के स्तर पर यह एक प्रकार का नया श्रम-विभाजन है। अब अमीर देश स्वयं उत्पादन का काम ज्यादा नहीं करते। दुनिया के गरीब देशों में उत्पादन होता है और वे चीजें अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के जरिये सस्ती उनको मिल जाती है। बदले में वे अपनी महंगी कथित ‘सेवाएं’ देते हैं।
तीन, डालर की विनिमय दर भी लगातार कृत्रिम रुप से ऊँची चली आ रही है। उदाहरण के लिए क्रयशक्ति-समता के हिसाब से एक डालर 14-15 रुपए के बराबर होना चाहिए, लेकिन वह 40-50 रुपए बना हुआ है। इससे दुनिया के बाजार में अमरीकियों की क्रयशक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
मुद्राओं व कीमतों के ढांचे से अलग करके देखें, तो यह गैरबराबरी और ज्यादा स्पष्ट होती है। जैसे आयात व निर्यात के वजन की तुलना करें, तो दक्षणि अमरीका महाद्वीप जितने टन का आयात करता है, उससे 6 गुना ज्यादा टन निर्यात करता है। इससे उल्टा यूरोपीय संघ जितने टन निर्यात करता है, उससे 4 गुना ज्यादा आयात करता है।
स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और विनिमय पूरी दुनिया के संसाधनों और श्रम को बहुत सस्ते में अमरीका-यूरोप की सेवा में लगाने का तंत्र बन गया है। ‘मुक्त व्यापार’ पर जोर तथा विश्व व्यापार संगठन की स्थापना को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
(3)
इस गैर-बराबर व एकतरफा व्यापार का ही दूसरा पहलू वित्तीय था। डॉलर के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा होने और उसका अंतर्राष्ट्रीय वर्चस्व होने से ही संयुक्त राज्य अमरीका लगातार इतना बड़ा व्यापार घाटा रख सका । जबसे दुनिया में वित्तीय उदारीकरण हुआ और विदेशी मुद्रा व पूंजी के लेनदेन पर नियंत्रण खत्म होते गए, इससे बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ गए। इससे निपटने के लिये हर देश अब अपने पास विदेशी मुद्रा का पर्याप्त भंडार रखना चाहता है और यह भंडार डॉलर में रखना चाहता है। इसलिए जापान, चीन, भारत, कोरिया आदि सभी देश अमरीका से अपने निर्यातों के बदले डॉलर खुशी-खुशी लेते रहे। अमरीका के लिए यह बहुत सुविधाजनक था – कागज पर डॉलर छापना और दुनिया से चीजें खरीदते जाना। क्रुगमेन संभवत: इस ठगी की बात कर रहे है।
दिलचस्प बात यह भी है कि ये डॉलर भी घूम-फिर कर वापस अमरीका पहुंच जाते हैं। दुनिया की सरकारें अपना डॉलर भंडार बेकार पड़ा रखने के बजाय निवेश करना बेहतर समझती हैं। इसका सबसे सुरक्षति तरीका अमरीका सरकार की प्रतिभूतियां खरीदना है, भले ही उनका ब्याज डेढ़ – दो प्रतिशत ही मिले। वित्तीय कारोबार में भी अमरीका का ही वर्चस्व है, अतएव डॉलरों का एक हिस्सा अमरीका के निजी बैंकों में भी पहुंच जाता है। यह सब एक तरह से संयुक्त राज्य अमरीका पर कर्ज बनता गया, लेकिन उसकी परवाह उसे नहीं रही। काफी समय से वह दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी कर्ज वाला देश है। पिछले 5 वर्षों में उस पर विदेशी कर्ज 72 प्रतिशत बढ़ा।
इस तरह, दुनिया के विकासशील देश ‘निर्यातोन्मुखी विकास’ के भुलावे में अमरीका को निर्यात करते रहे और बदले में अमरीका उनको डॉलर की कागजी मुद्रा या फिर अपने सरकारी बॉन्ड पकड़ाता रहा। चीन के बारे में इन दिनों अमरीका में एक मजाक प्रचलित है, ‘चीन ने हमें विषैले खिलौने और सड़ी मछलियां बेची, हमने उनको जाली प्रतिभूतियां बेची।’
इस तरह पूरी दुनिया से आते पेट्रो डॉलर, यूरो डॉलर, जापानी डॉलर और फिर चीनी डॉलरों ने अमरीका म पूंजी की बहुतायत कर दी। उन्होनें अपने नागरिकों को सस्ते उपभोग कर्ज बांटना शुरु कर दिया। इससे अमरीका में एक तरह की तेजी एवं समृ्द्धि का आभास बनाए रखने में मदद मिली। क्रेडिट कार्ड वाली संस्कृति का विस्फोट इसी समय हुआ। अमरीकियों ने बचत करना बंद कर दिया। पूरा देश उधार पर चलने लगा और ‘ऋणम् कृत्वा घृतम् पिबेत्’ की उक्ति को चरितार्थ करने लगा।
पूंजी और कर्ज की इस बहुतायत और मुनाफों के लालच ने ही सब प्राईम लोन जैसे संकट को जन्म दिया। अमरीका के बैंकों ने ऐसे नागरिकों को घर बनाने के लिए ऐसे कर्ज दिए, जिनको चुकाने लायक कमाई उनकी नहीं थी। फिर इन कर्जों को बैंकों ने दूसरी वित्तीय संस्थाओं को बेच दिया या बंधक बना कर और पूंजी उठा ली। उनकी वित्तीय संस्थाओं ने पुन: उनके पैकेज बनाकर बेच दिया। इस तरह कर्जों का एक ऐसा जटिल, अपारदर्शी, बहुपरती कारोबार खड़ा हो गया, जिसमें वास्तविक जोखिम का पता ही नहीं चलता था।
गृह ऋण देने वाले बैंक, जोखिम के बारे में इसलिए भी आश्वस्त थे कि किश्त न मिलने पर मकान कुर्क करके नीलाम कर देगें। मकानों और जमीनों की कीमतें लगातार बढ़ रही थी, जिसका एक कारण खुद गृह ऋणों की भारी संख्या से आई तेजी थी। लेकिन ये बैंक इस पूरी व्यवस्था मे बडे स्तर पर बन रही कृत्रमिता, अस्थिरता व जोखिम को समझ नहीं पाए और यही उनकी गलती थी। जब बड़ी संख्या में मकानों को नीलाम करना शुरु किया, तो उनकी कीमतें तेजी से गिरने लगी। नतीजा यह हुआ कि मकानों की कुर्की-नीलामी से भी ऋण वसूली संभव नहीं हुई। यही संकट की शुरुआत थी। बैंक फेल होने लगे। चूंकि इन कर्जों मे कई तरह की वित्तीय संस्थाओं की पूंजी फंसी थी, और आपस में काफी लेन-देन था, कई अन्य बैंक व बीमा कंपनियां संकट में आ गए। फिर तो यह संकट फैलता गया और पूरी दुनिया में छा गया।
पॉल क्रुगमेन ने इसी हालत का जिक्र करते हुए लिखा है- ‘‘पिछले दशक के ज्यादातर हिस्से में अमरीका उधार लेने और खर्च करने वालों का राष्ट्र था, बचतकर्ताओं का नहीं। निजी बचत दर अस्सी के दशक में 9 प्रतिशत से गिरकर नब्बे के दशक में 5 प्रतिशत हुई और 2005 से 2007 के बीच मात्र 0.6 प्रतिशत रह गई। घरेलू कर्ज निजी आय के मुकाबले तेजी से बढ़ा। किन्तु हाल तक अमरीकी लोग विश्वास करते रहे कि वे ज्यादा अमीर बन रहे हैं, क्योंकि उनके मकानों और शेयरों के मूल्य उनके कर्जों से ज्यादा तेजी से बढ़ रहे थे। उनका विश्वास था कि वे इस पूंजी-लाभ पर हमेशा के लिए भरोसा कर सकते हैं। अंत में असलियत सामने आई। संपत्ति के मूल्यों में बढ़ोत्तरी एक भ्रम था, किन्तु कर्जों की बढ़ोत्तरी वास्तविक थी।’’
एक अन्य जगह पर क्रुगमेन ने इस संकट को ‘अति-भोग का प्रतिशोध’ कहा है।
( जारी )
( लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय अध्यक्ष है।)
सुनील
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