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Archive for नवम्बर, 2008

    पिछला हिस्सा । गुरु द्वारा परीक्षण के बाद संगीत के सबक शुरु हुए । गुरु द्वारा सिखाए गए का अभ्यास करना था , कोई सवाल नहीं पूछना था । कभी गुरु गाते और शिष्य सिर्फ गौर से सुनते । सवाई गन्धर्व द्वारा कराए गए सख़्त प्रशिक्षण से भीमसेन की संगीत-यात्रा प्रारम्भ हुई , सन्तुष्टि और आत्मविश्वास के साथ ।  मुश्ताक हुसैन के गायन से अभिभूत हो कर भीमसेन रामपुर गए और छ: माह रहे । इन छ: महीनों में इस गुरु ने उन्हें सिर्फ राग नट मल्हार सिखाया ।

    रामपुर से वे सीधे लखनऊ के आकाशवाणी केन्द्र पहुँचे । एक सुपरिचित आवाज प्रसारित हो रही थी । यह बेगम अख्तर थीं । हाथ में सिगरेट लिए वे बाहर आईं । भीमसेन जोशी ने अपना परिचय दिया । बेगम साहिबा ने कहा , ‘ कुछ सुनाओ ।’ भीमसेन जोशी ने उन्हें भैरव का एक टुकड़ा गा कर सुनाया । बेगम अख्तर ने केन्द्र निदेशक स्वरूप मल्लिक को बुलवा कर कहा , ‘ यह लड़का अच्छा गाता है । इसको कुछ काम दो । ” बतौर स्टाफ आर्टिस्ट बत्तीस रुपे दरमाह पर उनकी नियुक्ति हो गई । उस वक्त बिस्मिल्लाह खान भी वही कार्यरत थे ।

    जनवरी १९४६ में पुणे में सवाई गन्धर्व की शष्ठी पूर्ति का आयोजन था । किराना घराना के इस उस्ताद (सवाई गन्धर्व) के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए विभिन्न घरानों के संगीतज्ञ पहुंचे थे । सिर्फ़ २४ वर्ष का होने के बावजूद भीमसेन आमंत्रित थे । उन्होंने राग मल्हार प्रस्तुत किया । यह राग उन्होंने अपने गुरु से नहीं सीखा था । गुरु की उपस्थिति में यह उनका प्रथम सार्वजनिक कार्यक्रम था । श्रोता मंत्रमुग्ध थे ।  तत्पश्चात उन्होंने खाडिलकर के नाटक मान-अपमान से लिया गया सदाबहार गीत – चन्द्रिका जानू थीया प्रस्तुत किया । इस प्रकार एक गायक का विधिवत आविर्भाव हुआ।

    भीमसेन जोशी जितने संगीत समारोह किसी गायक ने नहीं किए हैं । १९६४ में काबुल के राजकुमार जहीर शाह ने उन्हें एक संगीत समारोह हेतु निमंत्रित किया । ऑक्स्फॉर्ड में अध्ययनरत उसकी बेटी ने भीमसेन जोशी द्वारा राग ललित तथा शुद्ध कल्याण की रेकॉर्डिंग सुनकर अपने पिता को उन्हें निमंत्रित करने के लिए अपने पिता को प्रेरित किया । १९६४ से १९८२ के बीच भीमसेन जोशी इटली , फ्रान्स और अमेरिका का दौरा किया । वे पहले संगीतज्ञ थे जिनके कार्यक्रम पोस्टर द्वारा न्यू यॉर्क शहर में विज्ञापित किया गया था । हमेशा विनोदपूर्ण हाजिर जवाबी से बतियाने वाले भीमसेन जोशी पिछले कुछ समय से व्हील चेयर पर आश्रित हैं और अधिकतर मौन रहते हैं । एक वक्त था जब उन्हें नई गाड़ियाँ खरीदने और उन्हें फर्राटे से चलाने का शौक था । संगीत के शास्त्र की पकड़ की तरह मोटर गाड़ी के यन्त्र की भी उन्हें पूरी जानकारी थी ।

     भीमसेन जोशी इस बात के जीवित प्रमाण है कि कलाकार भाषा और जाति के ऊपर होता है । यद्यपि उन्हें कई सम्मान मिले परन्तु उनके शिष्यों की कतार ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है :

   श्रीपति पाडिगर ,माधव गुड़ी , विनायक तोर्वी , श्रीकान्त देशपाण्डे , रामकृष्ण पटवर्धन , अनन्त तेरदल ……….

   [ लेखक सदानन्द कानावली धारवाड़ स्थित संगीतशास्त्री हैं ।  मूल अंग्रेजी लेख । ]

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    लेखक : सदानन्द कनावल्ली (धारवाड़ स्थित संगीतशास्त्री)

    लुभावना भारत रत्न सम्मान पा कर , भीमसेन जोशी ने कर्नाटक को गौरवान्वित किया है । इस सम्मान का आधार उनकी महान संगीत – साधना है । देश – विदेश में सर्वाधिक लोकप्रिय हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गायकों में उनकी गिनती सहज ही की जा सकती है । कर्नाटक के गड़ग में ४ फरवरी १९२२ को उनका जन्म हुआ । पिता गुरुराज जोशी स्थानीय हाई स्कूल के हेडमास्टर तथा कन्नड़ , अंग्रेजी एवं संस्कृत के विद्वान थे । उनके चाचा जी.बी जोशी चर्चित नाटककार थे तथा उन्होंने धारवाड़ की मनोहर ग्रन्थमाला को प्रोत्साहित किया था । उनके दादा प्रसिद्ध कीर्तनकार थे ।

    पाठशाल के रास्ते में भूषण ग्रामोफोन शॉप  थी । ग्राहकों को सुनाए जा रहे रेकॉर्ड सुनने के लिए किशोर भीमसेन खड़ा हो जाता था । एक दिन उसने अब्दुल करीम ख़ान का गाया राग वसंत में फगवा बृज देखन को तथा पिया बिना नहि आवत चैन – यह ठुमरी सुनी । कुछ ही दिनों बाद उसने कुंडगोल के समारोह में सवाई गंधर्व को सुना । मात्र ग्यारह वर्षीय भीमसेन के मन में उन्हें ही गुरु बनाने की इच्छा जागृत हुई । पुत्र की संगीत में रुचि का पता चलने पर गुरुराज ने अगसरा चनप्पा को भीमसेन को संगीत सिखाने के लिए रक्खा । एक बार पंचाक्षरी गवई ने भीमसेन को गाते हुए सुनकर चनप्पा से कहा , ‘ इस लड़के को सिखाना तुम्हारे बस की बात नहीं , इसे किसी बेहतर गुरु के पास भेजो ।’

   एक दिन भीमसेन घर से भाग लिए । अब उस घटना को याद करके वे विनोद में कहते हैं कि ऐसा करके उन्होंने परिवार की परम्परा ही निभाई थी । मंजिल तय नहीं थी । एक रेल में बिना टिकट सवार हो गये और बीजापुर तक का सफर किया । टिकट जाँचने वाले को राग भैरव में जागो मोहन प्यारे और  कौन – कौन गुन गावे सुना कर मुग्ध कर दिया । हमराहियों पर भी गायन का जादू असर कर गया । उन्होंने रास्ते भर उसे खिलाया – पिलाया। पहुँचे बीजापुर । गलियों में गा – गा कर और लोगों के घरों के पिछवाड़े रात गुजार कर दो हफ़्ते बिता दिए । एक संगीत प्रेमी ने सलाह दी , ‘ संगीत सीखना हो तो ग्वालियर जाओ ।’

    उसे पता नहीं था ग्वालियर कहाँ है । एक अन्य ट्रेन पर सवार हो गया । इस बार पहुँचा पुणे । लड़के को कहाँ पता था कि पुणे उसका स्थायी ठौर बनेगा । बहरहाल रेल गाड़ियाँ बदलते हुए और रेलकर्मियों से बचते-बचाते भीमसेन ग्वालियर पहुँच गया । वहाँ माधव संगीत विद्यालय में दाखिला तो ले लिया लेकिन लेकिन भीमसेन को किसी क्लासरूम की नहीं एक अदद गुरु की जरूरत थी ।

     भीमसेन तीन साल तक गुरु की तलाश में जगह जगह भटके । फिर उन्हें करवल्लभ संगीत सम्मेलन में विनायकराव पटवर्धन मिले । विनयकराव को अचरज हुआ कि सवाई गन्धर्व उसके घर के इतना करीब रहते हैं फिर क्यों दर – दर भटकते हुए इतना दूर चला आया है । इस बात पर घर वापसी की यात्रा हुई और शुरु हुई एक विख्यात गुरु- शिष्य सम्बन्ध की कथा ।

    सवाई गन्धर्व ने भीमसेन को सुनकर कहा , ” मैं इसे सिखाऊँगा यदि यह अब तक सीखा हुआ सब भुला सके ।” डेढ़ साल तक उन्होंने भीमसेन को कुछ नहीं सिखाया । भीमसेन के पिता जब एक बार बेटे की प्रगति का जायजा लेने आए तब यह देख कर चकरा गए कि वह अपने गुरु के घर के लिए पानी से भरे बड़े – बड़े घड़े ढो रहे हैं । हाँलाकि भीमसेन ने अपने पिता को आश्वस्त किया , ‘ मैं यहाँ खुश हूँ ।आप चिन्ता न करें । “

[ अगली कड़ी में बेगम अख़्तर और बिस्मिल्लाह ख़ान से संगत ]

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        इस संस्था में बोलने में एक बड़ी जिम्मेदारी-सी आ जाती है । काशी विश्वविद्यालय मेरे लिए मिथक-सा रहा है । मेरे मन में इसकी तसवीर गरिमामयी रही है । इस विश्वविद्यालय का हिन्दी के प्रति अवदान भी गरिमामय रहा है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी यहाँ के हिन्दी विभाग से जुड़े रहे ।

    मैं समीक्षक नहीं पाठक हूँ । युवावस्था से ही महादेवी के लेखन के प्रति आकर्षण रहा है । न समझ पाना भी आकर्षण का कारण रहा होगा । IMG_0130_edited  तमाम समीक्षकों ने पहले ही लिख रखा है कि महादेवी का लेखन गूढ़ है ।

    महादेवी का विमर्श नए सिरे से होना चाहिए । यदि हम विभिन्न कवियों के काव्य-नमूने किसी छात्र के समक्ष रख दें तो उसमें से महादेवी का पद्य छाँटने में उसे कोई कठिनाई नहीं होगी । परन्तु उनके गद्य में जितनी विविधता है , इतनी शैलियाँ हैं कि आप कई लेखकों के गद्य -नमूनों में से महादेवी का लिखा गद्य न छाँट सकेंगे ।

     गद्य कब लिखा गया ? गद्य को पढ़ा कैसे जाए ? समाज में संवाद का संस्कार किस हद तक विकसित हो चुका है ? यह सब गद्य से पता चलता है । गद्य वाचिक संस्कृति से आगे की वस्तु है । जिस समाज में तर्क बन्द हो वहाँ संवाद का स्वास्थ्य कैसा है यह लगन से गद्य पढ़ने से पता चल जाता है ।

    ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ के निबन्ध तीस के दशक शुरुआती वर्षों में लिखे गए लेकिन पुस्तक-रूप में १९४२ में प्रकाशित हुए । इनमें छोटी लड़कियों की शिक्षा का सन्दर्भ है । महादेवी ने खुद लड़कियों की तालीम के लिए ठोस काम किए यह विदित है ।

   महादेवी पर लिखे एक भी समीक्षा – लेख से मुझे संतोष नहीं हुआ । दरअसल पुस्तक को समझने की समस्या हमारे भीतर है । हमारे पूर्वाग्रह समझदारी में अवरोध के रूप में उपस्थित हो जाते हैं । इन पूर्व-स्थापित धारणाओं पर जब  कुछ नए का वज्रपात होता है तब अरक्षित हो , घबड़ा कर मस्तिष्क तुरंत कवच निकाल लेता है जिसके फलस्वरूप हम पढ़ने से खुद को असमर्थ बना लेते हैं ।

   ‘संस्कृति के प्रश्न’ के अधिकांश लेख ‘३४ – ‘३५ में लिखे गए हैं । पुस्तक के लेखन का समय , अंदाज और बयान पर गौर करें । पुस्तक का समर्पण यूँ है :

जनम से अभिशप्त , जीवन से संतप्त किंतु सर्वदा वात्सल्यभरी भारतीय नारी को

    यह लेख भारत में हुए पहले चुनाव (१९३३) के तुरन्त बाद के हैं । मैं आजादी के बाद के इतिहास में १९६६ को विभाजन वर्ष मानता हूँ । इस वर्ष की बाबत मैंने ‘ मेरा देश , तुम्हारा देश’ में तफ़सील से लिखा है ।  मैं जब भारत और पाकिस्तान के साहित्य पर अध्ययन कर रहा था तब मैंने पाया कि आतिया हसन की पाकिस्तान में प्रकाशित ‘Sunlight on a broken column’ में भी १९६६ के महत्व की चर्चा है । मताधिकार दे देने मात्र से जी सकने लायक मनुष्य नहीं बन जाता – यह बात गांधी ने हिन्द-स्वराज(जिस पुस्तक की शताब्दी आ रही है) में कही है । फिर भी आजादी के पूर्व का १९३३ ऐसा विभाजक वर्ष है – युगान्तकारी । तर्क से प्रभावित करने कीIMG_0131_edited व्यग्रता इन लेखों में प्रगट होती है । पुस्तक ‘निर्माण के लिए ध्वंस’ की बात करती है । ध्वंस का औजार तर्क है । इस प्रकार यह रचनात्मक ध्वंस है । समीक्षकों ने इसे स्त्री-वेदना का गद्य कहा है । मुझे लगता है कि ऐसा कहना वेदना के स्रोत को कर्तव्य बता ने की साजिश है । पुस्तक के निबन्ध-शीर्षकों की बानगी देखें – हिंसा-क्रूरता का ढाँचा , हिंदू स्त्री पत्नीत्व , जीवन का व्यवसाय आदि हैं । ‘जीवन का व्यवसाय’ में वेश्यावृत्ति पर विचार है परंतु उसमें एक बार भी ‘वेश्या’ शब्द का प्रयोग नहीं है। महादेवी कहती हैं ,’नारी का अपमान पहले से निबद्ध है इसलिए मैं उस शब्द का प्रयोग नहीं करूँगी ।’

    यदि हम फुट नोट्स और सन्दर्भ-सूची वाले लेखों का ही आग्रह न रखें तो ‘संस्कृति के प्रश्न’ विश्वविद्यालयों के समाजशास्त्र के पाठ्यक्रमों में आधुनिकता की बाबत पढ़ाई जा सकती है ।

   इस पुस्तक को आप स्वयं की लैंगिकता में प्रविष्ट हो कर पढ़ें । यानि पुरुष हैं तो पुरुष हो कर पढ़ें , स्त्री हैं तो स्त्री हो कर पढ़ें ।

[ प्रख्यात शिक्षाविद और राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद (NCERT) के अध्यक्ष प्रोफेसर कृष्ण कुमार द्वारा काशी विश्वविद्यालय में दिए गए भाषण के आधार पर मेरे द्वारा प्रस्तुत। सभागृह से निकलते हुए मैंने कृष्ण कुमार को सूचित किया कि इस संस्था में महादेवी को औरत और गैर ब्राह्मण होने के कारण  वेद की पढ़ाई करने का मौका नहीं दिया गया था । फिर वि.वि. कोर्ट में दस वर्ष चली बहस के बाद ‘जन्मना’ की बजाय’ ‘कर्मणा’ वालों के पक्ष में फैसला हो सका था।

    मेरे छात्र-जीवन के दौरान एक दीक्षान्त समारोह में स्वयं महादेवी ने यह प्रसंग सुनाया था । उस दीक्षान्त समारोह में महादेवी,सुब्बलक्षमी,मदर टेरेसा और मक़बूल फ़िदा हुसैन को मानद उपाधियाँ दी गईं थीं । यह तय हुआ कि मदर टेरेसा को वि.वि. की तरफ़ से थैली दी जाए तब मैंने तत्कालीन कुलपति प्रख्यात भू-भौतिकीविद प्रोफ़ेसर हरि नारायण से चन्दा माँग कर शुरुआत की थी ।]

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देव दीपावली

देव दीपावली

 

 

 

 

 

 

 

 

सांस्कृतिक टोली

सांस्कृतिक टोली

 

 

 

 

 

 

 

 

सलीम शिवालवी

सलीम शिवालवी

 

 

 

 

 

 

 

 

अंजुम सलीमी

अंजुम सलीमी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गुरु नानक जयन्ती , कार्तिक पूर्णिमा और देवदीपावली । काशी की घाट दीप मालिकाओं से पट जाते हैं । सड़क की तरह गंगा जी में नावों और बजड़ों का भी जाम लग जाता है, उस दिन । नावों और बजड़ों का सट्टा पहले से हो जाता है । लिहाजा उस शाम के लिए ‘सामने घाट’ के बाद और अस्सी से पहले अब्दुल्लाहदा ने अपने मित्र पीताम्बर मिश्र का ऐन घाट पर स्थित ‘योग-मन्दिर’ चुना । पाकिस्तान से आई सांस्कृतिक टोली अभिभूत थी गंगा से । क्वेटा के शायर अली बाबा ताज ने अपने एक मित्र की लिखी कविता सुनाई – बामियान की बुद्ध प्रतिमा के तालिबान द्वारा ध्वंस की बाबत । फिर अपनी रचना में कहा – ‘ बात बढ़ तो सकती है,जुस्तजू से आगे भी ,बोलते रहेंगे हम,गुफ़्तगू से आगे भी’  उस रात्रि भोज के मेज़बान प्रोफेसर गजेन्द्र सिंह ( निदेशक , आयुर्विज्ञान संस्थान , का.हि.वि.वि.) का जन्मस्थान भी क्वेटा का था । विभाजन के ठीक पहले गजेन्द्रजी के पिता वहाँ के फौजी अस्पताल में डॉक्टर थे । रुख-ए-निलोफ़र ने एक बागी स्त्री-चेतना की रचना सुनाई । निलोफ़र स्कूली बच्चों में दृश्य कला के पाठ्यक्रम बनाने में लगी हैं और लाहौर में अध्यापन करती हैं । मेज़बानों की ओर से शायर शमीम शिवालवी और कबीर ने स्वागत में मिल्लत का आवाहन करते हुए नज़्म पढ़ी , डॉ. स्वाति ने रवीन्द्र संगीत गाया और   रामिश  ने जाल द बैण्ड का  गीत- ‘वो लमहे’ सुनाया ।

    ‘हिन्द – पाक – सफ़र-ए-दोस्ती’ पिछले २० वर्षों से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए टोलियों की यात्राएं कराने में पहल करता आया है । संगठन के सतपाल ग्रोवर पाकिस्तानी टीम के साथ पधारे थे ।

    सांस्कृतिक टोली की सबसे छोटी सदस्य ११ साल की फ़रीहा है जो हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीख रही है । फ़रीहा राग माधुरी में ,’मोरे मन भावे श्याम मुरारी’ सुनाती है तो स्थानीय अखबार का संवाद दाता उससे पूछता है कि वह यह पाकिस्तान में सुनाती है या नहीं ? उसको यह अन्दाज नहीं है कि वहीं सीख कर उसे यहाँ भी गा रही है ।

    इस सांस्कृतिक टोली के अगुआ शायर अंजुम सलीमी कहते हैं, ‘मैं पलट आया था दीवार पर दस्तक देकर।अब सुना है,वहाँ दरवाजा निकल आया है’ । पेन्टर रेहाना क़ाज़मी कहती हैं , ‘ सियासत से हटकर देखें तो दोनों मुल्कों की आत्मा की आवाज मिलती है ।

    बनारस में इस टोली की आगवानी डॉ. मुनीज़ा रफ़ीक खाँ और गांधी विद्या संस्थान के निदेशक प्रोफेसर दीपक मलिक ने की । टीम के सदस्यों का रात्रि विश्राम बनारस के अलग अलग परिवारों मे हुआ ।

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मूल डिजिटल बाजारों को संचालित करेंगे , उद्योगों , शिक्षा और विश्व राजनीति को बदलेंगे । जैसे – जैसे यह पीढ़ी हमारे कामगारों के रूप में शामिल होते जाएगी वैसे वैसे वह हमारी दुनिया पर अत्यन्त सकारात्मक असर डालेगी। लब्बोलुआब , डिजिटल क्रान्ति ने इस दुनिया को बेहतर जगह बना ही दिया है । समाज को असंख्य तरीकों से आगे ले जाने की रहनुमाई वे कर सकते हैं – यदि हम उन्हें ऐसा करने दें । यह ध्यान रहे कि हम से कोई चूक न हो जाए क्योंकि हम दोराहे पर हैं । दो रास्ते हैं – एक जिसमें हम युवा पीढ़ी द्वारा इन्टरनेट के उपयोग और उसकी अच्छाइयों को नष्ट कर सकते हैं  तथा दूसरा जिसमें हम उचित राह चुन कर डिजिटल युग में उज्जवल भविष्य की ओर बढ़ेंगे । हमारी कार्रवाई पर बहुत ज्यादा दाँव लगा हुआ है । हमारे द्वारा चुने गये रास्ते के मुताबिक हमारे बच्चे , नाती-पोतोंकी जीवन शैली की कई जरूरी बातें तय होंगी : अपनी अस्मिता को वे कैसा आकार देते हैं ? अपनी गोपनीयता की रक्षा कैसे करते हैं ? खुद को सुरक्षित कैसे रखते हैं ? अपनी पीढ़ी का नीति निर्धारण निर्धारित करने वाली सूचनाओं का निर्माण कैसे करते हैं और कैसे उनके बारे में समझदारी विकसित करते हैं और उन सूचनाओं को किस रूप में ढ़ालते हैं ? नागरिक होने की जिम्मेदारियों को कैसे सीखते हैं , विकसित करते हैं और ग्रहण करते हैं ? इनमें से एक रास्ता निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में उनकी सृजनात्मकता , आत्माभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने वाला है |दूसरी तरफ़ नये युग से जुड़े खतरों को न्यूनतम करते हुए हम उसे अपना सकते हैं ।

    book-top दूसरे रास्ते पर चलना शुरु करने में एक मात्र बड़ी बाधा भय है । डिजिटल तकनीक की क्षमता और मूल-डिजिटल उसका जैसे इस्तेमाल कर रहे हैं उनसे पैदा होने वाला भय । जिस डिजिटल माहौल में युवा इतना समय बिता रहे हैं उसकी बाबत अभिभावकों , शिक्षकों और मनोवैज्ञानिकों की चिन्ता आधारहीन नहीं है । एक बाद एक उद्योगों को आमदनी पर खतरा दिखाई दे रहा है – रेकॉर्ड द्वारा मनोरंजन , फोन , अखबार इत्यादि। संकट का आभास पा कर विधि-निर्माताओं को डर है कि यदि समय रहते इन गलतियों को पारम्परिक तरीकों से सुधारने के लिए कदम नहीं उठाये गये तो भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है ।

    मीडिया से इस भय को खुराक मिलती है । साइबर ब्लैक मेलिंग , ऑनलाइन लूट , इन्टरनेट का नशा , ऑनलाइन पोर्नोग्राफी के मामलों की खबरों से अखबार पटे रहते हैं । अनियन्त्रित डिजिटल वातावरण में घण्टों समय बिताने वाले बच्चों के अभिवावकों भय लगा रहता है कि उनके बच्चों का कहीं अपहरण न हो जाए । अभिभावकों को  अपने बच्चों के ऑनलाइन दादागिरी का शिकार होने , हिन्स्र विडियो गेम्स की लत लग जाने तथा पोर्नोग्राफी देखने की चिन्ता भी बनी रहती है ।

    युवाओं पर इन्टरनेट के असर को ले कर सिर्फ़ अभिभावकों को ही चिन्ता नहीं है । शिक्षकों को यह लगता है कि मूल डिजिटलों को पढ़ाने लायक वे नहीं रह गये हैं , लम्बा समय लगा कर वे जो हुनर प्रदान करते हैं वह बिना काम का रह गया है , डिजिटल परिदृश्य से जो तब्दीलियाँ आई हैं उनसे मौजूदा शिक्षण व्यवस्था कदम मिला कर नहीं चल पा रही है। लाइब्रेरियन अपनी भूमिका के बारे में नये सिरे से सोच रहे हैं : धूलग्रस्त ,मलिन कार्डों पर किताबों के शीर्षकों को व्यवस्थित करने और सही अलमारियों में किताबों को तरतीब से रखने के बजाय वे सूचना के सतरंगे परिवेश में मात्र एक गाइड बन कर हैं । मनोरंजन उद्योग की कम्पनियों को चिन्ता है कि नेट-चोरी से उनका मुनाफ़ा छिना जा रहा है तथा अखबारों के व्यवस्थापक इस बात से चिन्तित हैं कि उनके पाठक अब खबरों के लिए अखबार के बजाए ड्रज , गूगल , चिट्ठों  जैसे कमतर माध्यमों पर आश्रित हो रहे हैं ।

    मूल डिजिटलों के अभिवावक होने के नाते हम डिजिटल संस्कृति की चुनौतियों तथा अवसरों दोनों को ही गंभीरता से ले रहे  हैं । बच्चों की शिक्षा , उनकी सुरक्षा और उनके गोपन की सुरक्षा के बारे में कई पालकों की चिन्ता को हम भी समझ सकते हैं । सूचना की बाढ़ तथा हिस्र खेलों और भयावह ऑनलाईन छबियों की बाबत हम भी चिन्तित हैं । ऑनलाइन माहौल को घेर कर जो भय की संस्कृति उभर रही है , उसके मद्दे नज़र इन आपदाओं को हमें सही परिपेक्ष्य में रखना होगा ; हमारे बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के पास प्रचुर अवसर उपलब्ध हैं – डिजिटल युग के बावजूद नहीं अपितु उसकी वजह से ।

    मूल डिजिटल और सूचनायें जैसे परस्पर प्रभावित हो रही हैं , तथा सामाजिक वातावरण में मूल डिजिटल जैसे खुद को अभिव्यक्त कर रहे हैं,नये कला रूप सृजित कर , व्यापार के नये नये मॉडल की कल्पना कर तथा नये प्रतिकार अथवा आन्दोलन शुरु कर उससे एक आशा जगती है । 

     इस किताब का मकसद  चिन्ता पैदा करने वाले विषयों और कम डरावने विषयों को अलग-अलग करके रखना है ताकि पता चल सके किससे बचना है और किसे अपनाना है । समाज के रूप में हमारे समक्ष एक बहुत बड़ी चुनौती है – यदि हम इन अवसरों से पैदा होने वाली अच्छाइयों का उपयोग न कर सके तथा आसन्न समस्याओं में उलझ कर रह जाते हैं । कई बार भय के कारण हम कुछ ज्यादा ही प्रतिक्रिया व्यक्त कर देते हैं जिसकी वजह से हम जिन बाधाओं को खड़ा करते हैं उनसे बचने के लिए युवा   नये रास्ते चुन लेते हैं ।

    खुद को सुरक्षित रखने के लिए युवाओं को जिस तरह की शिक्षा और जिन हुनरों की तालीम दिए जाने पर  जोर दिया जाना चाहिए उसके बजाये हमारे कानून बनाने वाले कुछ वेबसाइटों को प्रतिबन्धित करने की और कतिपय सामाजिक नेटवर्कों से अठारह साल तक के बच्चों को दूर रखने की बात करते हैं । डिजिटल-माध्यमों में बच्चों के बीच क्या हलचल है यह जानने के बजाए मनोरंजन उद्योग ने हजारों ग्राहकों पर मुकदमे ठोक कर उनके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है । जटिल एवं विस्फोटक सूचना माहौल का सामना करने के लिए बच्चों को तैय्यार करने के बजाए , दुनिया भर की कई सरकारें कई तरह के प्रकाशनों को रोकने के लिए कानून बना रही हैं , किताबों पर रोक लगाना ताकि अनोखा और निरापद लगने लगे । इसके साथ साथ हम बच्चों की वास्तविक समस्याओं से मुख़ातिब होने के लिए कोई भी कदम नहीं उठा रहे हैं , जिनकी आवश्यकता है ।

    इस किताब को लिखने का हमारा मकसद अच्छे-बुरे को उचित परिपेक्ष्य में रखना तथा यह सलाह देना है कि हम  – अभिभावक , शिक्षक , कम्पनियों के प्रमुख , विधि-निर्माता सबको इस अभूतपूर्व परिवर्तन द्वारा बने वैश्विक समाज को बिना सब कुछ ठप किए कैसे प्रबन्धन किया जाए ।

[ यह किताब हार्वर्ड लॉ स्कूल के बर्कमैन सेन्टर फ़ॉर इन्टरनेट एण्ड सोसाइटी तथा स्विट्ज़रलैण्ड स्थित सेन्ट गैलेन विश्वविद्यालय के रिसर्च सेन्टर फॉर इन्फ़ॉर्मेशन लॉ  के संयुक्त शोध अभिक्रम का परिणाम है । पुस्तकांश का हिन्दी अनुवाद अफ़लातून का है । यूट्यूब पर। ]

   

  
 

 

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   आप्रवासी डिजिटलों से विपरीत , मूल- डिजिटल अपने जीवन का ज्यादातर वक्त ऑनलाइन गुजारते हैं , दरअसल  वे ऑनलाइन और ऑफलाइन के बीच भेद ही नहीं करते। डिजिटल अस्मिता और वास्तविक अस्मिता का अलग अलग अहसास होने की जगह ,उनकी एक ही अस्मिता रह जाती है (जिसका प्रतिनिधित्व दो , तीन अथवा ज्यादा दिक्कालों (spaces)में होता है) । यह अलग – अलग अस्मिताएं कुछ सामान्य व्यावहारिकताओं के जरिए आपस में सम्बन्धित होती हैं- डिजिटल तकनीक का प्रयोग करने में बिताया गया समय ,एक साथ कई ऐसे (डिजिटल टेक्नॉलॉजी वाले) कार्य करने की प्रवृत्ति(multi tasking),डिजिटल तकनीक द्वारा स्वयं को प्रकट करने और डिजिटल तकनीक की मध्यस्थता से अन्य लोगों से सम्बन्ध बनाने तथा सूचना पाने , ज्ञान-निर्माण तथा कला-रूपों के निर्माण में इस तकनीक के प्रयोग  की शैली । इन तरुण-तरुणियों के लिए कम्प्यूटर,सेल फोन , साइडकिक आदि मानव-मानव के बीच सम्बन्ध के बुनियादी मध्यस्थ हैं । इन्होंने हफ़्ते में सातों दिन और दिन में २४ घण्टों के लिए ऐसे नेटवर्क का निर्माण किया है जिसमें मानव और तकनीक का ऐसा अभूतपूर्व सम्मिश्रण है जो मानव-सम्बन्धों का बुनियादी तौर पर कायापलट कर रहा है । यह युवा ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों में समान रूप से सहज होते हैं । खुद के इस संकर-जीवन को वे कत्तई गौरतलब या विशेष नहीं मानते । डिजिटल मूलनिवासी एक दूसरे तथा ‘बिट्स की दुनिया’ से सिर्फ़ इसी तरह जुड़े़ जीवन को जानते हैं ।

       डिजिटल मूलनिवासी लगातार एक दूसरे से जुड़े़ होते हैं । उनके ढेर मित्र होते है । वास्तविक दुनिया में होते हैं और आभासी दुनिया में तो होते ही हैं ।   उनकी लगातार बढ़ते दोस्तों की जमात की गिनती आप रख सकते हैं ,और शेष दुनिया भी उन्हें ओर्कुट जैसी सामाजिक नेटवर्क साइट से जान सकती है । वे जब नींद में होते हैं तब भी नेपथ्य में उनके सम्बन्ध स्थापित हो रहे होते हैं । रोज जागते ही सब से पहले वे इनका पता लगाते हैं । कभी कभी ऐसे मूल- डिजिटलों से सम्बन्ध बनते हैं जिनसे ऑफ़लाइन दुनिया में उनका कभी कोई साबका नहीं पड़ता । cnts_me सामाजिक नेटवर्क साइटों के जरिए मूल-डिजिटल दुनिया भर में फैले दोस्तों से जुड़ते हैं , सूचनाओं और चित्रों का तत्काल आदान-प्रदान करते हैं  । यह भी संभव है कि वे सृजनात्मक अथवा राजनैतिक तौर पर इस प्रकार का सहयोग करें  जिसकी तीस साल पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । परन्तु इस अनवरत योगा-योग (सम्पर्क) की प्रक्रिया में,सम्बन्धों का मूल-स्वरूप ही बदल जा रहा है- ‘किसी को मित्र बनाना’ – इसके माने ही बदल जा रहे हैं । ऑनलाइन मित्रता भी पारम्परिक मित्रता की तरह – समान रुचियों , अक्सर होने वाले संवाद पर आधारित होती है फिर भी उसकी प्रकृति जुदा होती हैं : ऑनलाइन मित्रता शुरु होना और समाप्त होना बहुत सरल होता है , उसके तौर तरीके अभी तक समझे नहीं गये हैं इसलिए झेलाऊ भी हो जाते हैं।

    मूल-डिजिटलों का न सिर्फ अपने अभिवावकों से मित्रता का जुदा अनुभव होता है अपितु सूचनाओं से भी उनका नाता अलग-सा बनता है । गौर करें , संगीत की अनुभूति मूल-डिजिटल को कैसी होती है  । बहुत पुरानी बात नहीं है जब नया रेकॉर्ड सुनने के लिए किशोर अपने किसी मित्र के यहाँ जुटते थे । संगीत उन दिनों एक साझा अंतरंगता का नमूना हुआ करता था। अपने नये बॉयफ़्रेन्ड को कोई किशोरी अलग-अलग आल्बम से चुने गीतों का टेप देती थी,हर गीत का मुखड़ा बहुत सावधानी से कैसेट के कवर पर हाथ से लिखा हुआ होता ताकि उसका पनप रहा लगाव प्रकट हो ।  

    सब कुछ ही बदल गया हो ऐसा नहीं है : मूल-डिजिटल भी प्रचुर प्रमाण में संगीत सुनते हैं। और एक-दूसरे से ढेर सारा संगीत वे साझा भी करते हैं । परन्तु पहले से बहुत कम संभावना रहती है कि यह अनुभूति  मित्रों के साथ  , किसी स्टीरियो सिस्टम पर साथ-साथ सुनते हुए, किसी भौतिक स्थान पर हुई हो । नेटवर्क यह सुविधा मुहैया करवाता है कि उससे जुड़ा प्रत्येक शक्स अपने तईं हेडफोन लगाए गली से गुजरते हुए अथवा हॉस्टल के कमरे में अपनी हार्ड ड्राइव में स्थित आई पॉड अथवा आई-टून्स मुज़िक सिस्टम की मध्यस्थता(माध्यम नहीं) से सुन सकता है । मिश्रित गीतों के टेप का स्थान अब प्लेलिस्ट ने ले लिया है जिसे सामाजिक नेटवर्कों के जरिए अपने मित्रों और अजनबियों के साथ आप साझा करते हैं । एक ऐसी पीढ़ी आ गयी है जो उम्मीद करती है कि संगीत डिजिटल फॉरमैट में ही होगा,अमूमन मुफ़्त होगा , अन्तहीन रूप से साझा किया जा सकता होगा तथा अबाध रूप से कही भी स्थानान्तरित किया जा सकता होगा ।

    मूल-डिजिटल विस्मयकारी हद तक सृजनात्मक होते हैं। यह कहना नामुमकिन है कि वे अपने पहले की पीढ़ी से ज्यादा सृजनात्मक होते हैं अथवा नहीं , परन्तु इतना तय है कि उनके माँ-बाप उस उम्र में जैसे खुद को व्यक्त करते थे उनसे बिलकुल भिन्न तरीकों से वे खुद को अभिव्यक्त करते हैं । कई मूल-डिजिटलों की मान्यता है कि सूचना को किसी भी नये सुरुचिपूर्ण रूप में ढाला जा सकता है और उस पर उनका नियन्त्रण है । नए रूप में ढाले जाने की प्रक्रिया  माई स्पेस में प्रोफाइल अथवा विकीपीडिया की कोई प्रविष्टी  सम्पादित करना हो सकता है या फिर कोई लोकप्रिय गीत वैध अथवा अवैध रूप से डाउनलोड करना । इस पीढ़ी को इस बात का भान हो अथवा नहीं लेकिन यह तय है कि अपने आस-पास के सांस्कृतिक माहौल पर उनका नियन्त्रण अपूर्व हद तक बढ़ा है । मूल-डिजिटल फोटो पर किसी नये सॉफ़्टवेयर का प्रयोग जानता है । उनके दोस्त नींद में हो उसी बीच उनके फोटो खींचना, डाउनलोड करना,सम्पादित करना और मित्रों में साझा करना हो जाता है । ‘सेकण्ड लाइफ़ ‘ जैसी साइटों पर अपनी चरम सृजनात्मकता द्वारा वह समानान्तर दुनिया बनाते हैं । फिर उस ‘दुनिया’ के कुछ हिस्सों को रेकॉर्ड कर वे यूट्यूब पर उसका विडियो भी चढ़ा सकते हैं (यदि आप कैलिफोर्निया में हों) अथवा डेली मोशन (यदि आप केन्स में रहते हों) में एक ‘मशीनिमा’ नामक एक नए कला रूप anya_cello में प्रस्तुत कर सकते हैं । मूल-डिजिटल कुछ विशिष्ट कम्प्यूटर प्रोग्राम के जरिए मीडिया का ऐसा पुनर्निर्माण कर सकते हैं जिसकी कल्पना भी कुछ साल पहले नहीं की जा सकती थी ।

    मूल-डिजिटल अपने जीवन के लिए लिए आवश्यक लगभग सभी सूचनाओं के लिए इस कनेक्टेड स्पेस पर निर्भर होने लगे हैं ।  कभी ‘शोध’ का मतलब फफूँद लगे कार्डों के कैटलॉगों की खाक छानना और क्लासिफिकेशन प्रणाली के अंकों के सहारे अलमारियों से कोई किताब हासिल करना होता था । आज शोध का मतलब गूगल सर्च हो गया है अथवा अधिक से अधिक विकीपीडिया देख लेने के बाद ही किसी विषय में गोता लगाना हो गया है । अब तो बस एक ब्राउज़र खोल कर सर्च करने के लिए शब्द टाइप करना और फिर तब तक डुबकी लगा कर खोज जारी रखना जब तक आप जो चाहते है वह न मिल जाए अथवा जो आपको लगता हो कि यही आप चाहते थे- वह मिल न जाए ।

    अधिकतर मूल-डिजिटल कभी भी अखबार नहीं खरीदते । ऐसा नहीं कि वे खबरें नहीं पढ़ते , फर्क बस इतना है कि उन्हें खबरें नये तरीकों से मिलती हैं तथा कई रूप में मिलती हैं। अब उन्हें करीने-से मोड़ कर सहेजे जाने वाले बड़े नक्शों की भी जरूरत नहीं, टेवि के कार्यक्रमों की सूची , पर्यटन गाइड अथवा पर्चों का छपना बन्द हो गया हो ऐसा नहीं है परन्तु यह सब मूल डिजिटलों को अनूठे लगते हैं । यह तय है कि यह सभी परिवर्तन अच्छे नहीं हैं परन्तु वे स्थायी हैं ।

     मूल-डिजिटल जैसे अपनी जिन्दगी बिताते हैं ,उसके कई पक्ष कई बार चिन्ता का विषय बन जाते हैं । ‘निजता की सुरक्षा’ की बाबत मूल डिजिटल की धारणा अपने अभिभावकों और दादा-नाना से अलग होती है । डिजिटल माहौल में इतना समय बिताने के कारण मूल-डिजिटल  उनकी ढेरों निशानियाँ ऑनलाइन छूट जाती हैं । अपनी आस की दुनिया , आकांक्षा को दुनिया के समक्ष प्रकट करते वक्त तो अत्यन्त सृजनात्मक अभिव्यक्ति करते हैं परन्तु बुरा तो तब होता है जब वे ऐसी सूचनाएं ऑनलाइन छोड़ते हैं जिनके कारण बरसों बाद उन्हें अवमानना का सामना करना पड़ सकता है । ऑनलाइन गुजारे गये हर घण्टे के साथ वे बालक-भोगियों के लिए निशानियाँ छोड़ रहे होते हैं जिनके सहारे उनका पीछा किया जा सकता है । प्रवेश देने वाले अधिकारियों , संभावित नौकरी देने वालों अथवा संभावित सखा/सहेलियों को जिन सूचनाओं की जरूरत होती है उनके बारे में उनसे कहीं ज्यादा सूचनाएं मौजूद होती हैं ।  दशकों बाद तक इन परिवर्तनों  के गहरे अप्रत्यक्ष प्रभाव हम सभी के सामने होंगे।  लेकिन जो मूल-डिजिटल के रूप में बढ़ रहे उन्हें सर्वाधिक कीमत चुकानी पड़ेगी ।

[जारी]

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