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Archive for नवम्बर 3rd, 2008

   आप्रवासी डिजिटलों से विपरीत , मूल- डिजिटल अपने जीवन का ज्यादातर वक्त ऑनलाइन गुजारते हैं , दरअसल  वे ऑनलाइन और ऑफलाइन के बीच भेद ही नहीं करते। डिजिटल अस्मिता और वास्तविक अस्मिता का अलग अलग अहसास होने की जगह ,उनकी एक ही अस्मिता रह जाती है (जिसका प्रतिनिधित्व दो , तीन अथवा ज्यादा दिक्कालों (spaces)में होता है) । यह अलग – अलग अस्मिताएं कुछ सामान्य व्यावहारिकताओं के जरिए आपस में सम्बन्धित होती हैं- डिजिटल तकनीक का प्रयोग करने में बिताया गया समय ,एक साथ कई ऐसे (डिजिटल टेक्नॉलॉजी वाले) कार्य करने की प्रवृत्ति(multi tasking),डिजिटल तकनीक द्वारा स्वयं को प्रकट करने और डिजिटल तकनीक की मध्यस्थता से अन्य लोगों से सम्बन्ध बनाने तथा सूचना पाने , ज्ञान-निर्माण तथा कला-रूपों के निर्माण में इस तकनीक के प्रयोग  की शैली । इन तरुण-तरुणियों के लिए कम्प्यूटर,सेल फोन , साइडकिक आदि मानव-मानव के बीच सम्बन्ध के बुनियादी मध्यस्थ हैं । इन्होंने हफ़्ते में सातों दिन और दिन में २४ घण्टों के लिए ऐसे नेटवर्क का निर्माण किया है जिसमें मानव और तकनीक का ऐसा अभूतपूर्व सम्मिश्रण है जो मानव-सम्बन्धों का बुनियादी तौर पर कायापलट कर रहा है । यह युवा ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों में समान रूप से सहज होते हैं । खुद के इस संकर-जीवन को वे कत्तई गौरतलब या विशेष नहीं मानते । डिजिटल मूलनिवासी एक दूसरे तथा ‘बिट्स की दुनिया’ से सिर्फ़ इसी तरह जुड़े़ जीवन को जानते हैं ।

       डिजिटल मूलनिवासी लगातार एक दूसरे से जुड़े़ होते हैं । उनके ढेर मित्र होते है । वास्तविक दुनिया में होते हैं और आभासी दुनिया में तो होते ही हैं ।   उनकी लगातार बढ़ते दोस्तों की जमात की गिनती आप रख सकते हैं ,और शेष दुनिया भी उन्हें ओर्कुट जैसी सामाजिक नेटवर्क साइट से जान सकती है । वे जब नींद में होते हैं तब भी नेपथ्य में उनके सम्बन्ध स्थापित हो रहे होते हैं । रोज जागते ही सब से पहले वे इनका पता लगाते हैं । कभी कभी ऐसे मूल- डिजिटलों से सम्बन्ध बनते हैं जिनसे ऑफ़लाइन दुनिया में उनका कभी कोई साबका नहीं पड़ता । cnts_me सामाजिक नेटवर्क साइटों के जरिए मूल-डिजिटल दुनिया भर में फैले दोस्तों से जुड़ते हैं , सूचनाओं और चित्रों का तत्काल आदान-प्रदान करते हैं  । यह भी संभव है कि वे सृजनात्मक अथवा राजनैतिक तौर पर इस प्रकार का सहयोग करें  जिसकी तीस साल पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । परन्तु इस अनवरत योगा-योग (सम्पर्क) की प्रक्रिया में,सम्बन्धों का मूल-स्वरूप ही बदल जा रहा है- ‘किसी को मित्र बनाना’ – इसके माने ही बदल जा रहे हैं । ऑनलाइन मित्रता भी पारम्परिक मित्रता की तरह – समान रुचियों , अक्सर होने वाले संवाद पर आधारित होती है फिर भी उसकी प्रकृति जुदा होती हैं : ऑनलाइन मित्रता शुरु होना और समाप्त होना बहुत सरल होता है , उसके तौर तरीके अभी तक समझे नहीं गये हैं इसलिए झेलाऊ भी हो जाते हैं।

    मूल-डिजिटलों का न सिर्फ अपने अभिवावकों से मित्रता का जुदा अनुभव होता है अपितु सूचनाओं से भी उनका नाता अलग-सा बनता है । गौर करें , संगीत की अनुभूति मूल-डिजिटल को कैसी होती है  । बहुत पुरानी बात नहीं है जब नया रेकॉर्ड सुनने के लिए किशोर अपने किसी मित्र के यहाँ जुटते थे । संगीत उन दिनों एक साझा अंतरंगता का नमूना हुआ करता था। अपने नये बॉयफ़्रेन्ड को कोई किशोरी अलग-अलग आल्बम से चुने गीतों का टेप देती थी,हर गीत का मुखड़ा बहुत सावधानी से कैसेट के कवर पर हाथ से लिखा हुआ होता ताकि उसका पनप रहा लगाव प्रकट हो ।  

    सब कुछ ही बदल गया हो ऐसा नहीं है : मूल-डिजिटल भी प्रचुर प्रमाण में संगीत सुनते हैं। और एक-दूसरे से ढेर सारा संगीत वे साझा भी करते हैं । परन्तु पहले से बहुत कम संभावना रहती है कि यह अनुभूति  मित्रों के साथ  , किसी स्टीरियो सिस्टम पर साथ-साथ सुनते हुए, किसी भौतिक स्थान पर हुई हो । नेटवर्क यह सुविधा मुहैया करवाता है कि उससे जुड़ा प्रत्येक शक्स अपने तईं हेडफोन लगाए गली से गुजरते हुए अथवा हॉस्टल के कमरे में अपनी हार्ड ड्राइव में स्थित आई पॉड अथवा आई-टून्स मुज़िक सिस्टम की मध्यस्थता(माध्यम नहीं) से सुन सकता है । मिश्रित गीतों के टेप का स्थान अब प्लेलिस्ट ने ले लिया है जिसे सामाजिक नेटवर्कों के जरिए अपने मित्रों और अजनबियों के साथ आप साझा करते हैं । एक ऐसी पीढ़ी आ गयी है जो उम्मीद करती है कि संगीत डिजिटल फॉरमैट में ही होगा,अमूमन मुफ़्त होगा , अन्तहीन रूप से साझा किया जा सकता होगा तथा अबाध रूप से कही भी स्थानान्तरित किया जा सकता होगा ।

    मूल-डिजिटल विस्मयकारी हद तक सृजनात्मक होते हैं। यह कहना नामुमकिन है कि वे अपने पहले की पीढ़ी से ज्यादा सृजनात्मक होते हैं अथवा नहीं , परन्तु इतना तय है कि उनके माँ-बाप उस उम्र में जैसे खुद को व्यक्त करते थे उनसे बिलकुल भिन्न तरीकों से वे खुद को अभिव्यक्त करते हैं । कई मूल-डिजिटलों की मान्यता है कि सूचना को किसी भी नये सुरुचिपूर्ण रूप में ढाला जा सकता है और उस पर उनका नियन्त्रण है । नए रूप में ढाले जाने की प्रक्रिया  माई स्पेस में प्रोफाइल अथवा विकीपीडिया की कोई प्रविष्टी  सम्पादित करना हो सकता है या फिर कोई लोकप्रिय गीत वैध अथवा अवैध रूप से डाउनलोड करना । इस पीढ़ी को इस बात का भान हो अथवा नहीं लेकिन यह तय है कि अपने आस-पास के सांस्कृतिक माहौल पर उनका नियन्त्रण अपूर्व हद तक बढ़ा है । मूल-डिजिटल फोटो पर किसी नये सॉफ़्टवेयर का प्रयोग जानता है । उनके दोस्त नींद में हो उसी बीच उनके फोटो खींचना, डाउनलोड करना,सम्पादित करना और मित्रों में साझा करना हो जाता है । ‘सेकण्ड लाइफ़ ‘ जैसी साइटों पर अपनी चरम सृजनात्मकता द्वारा वह समानान्तर दुनिया बनाते हैं । फिर उस ‘दुनिया’ के कुछ हिस्सों को रेकॉर्ड कर वे यूट्यूब पर उसका विडियो भी चढ़ा सकते हैं (यदि आप कैलिफोर्निया में हों) अथवा डेली मोशन (यदि आप केन्स में रहते हों) में एक ‘मशीनिमा’ नामक एक नए कला रूप anya_cello में प्रस्तुत कर सकते हैं । मूल-डिजिटल कुछ विशिष्ट कम्प्यूटर प्रोग्राम के जरिए मीडिया का ऐसा पुनर्निर्माण कर सकते हैं जिसकी कल्पना भी कुछ साल पहले नहीं की जा सकती थी ।

    मूल-डिजिटल अपने जीवन के लिए लिए आवश्यक लगभग सभी सूचनाओं के लिए इस कनेक्टेड स्पेस पर निर्भर होने लगे हैं ।  कभी ‘शोध’ का मतलब फफूँद लगे कार्डों के कैटलॉगों की खाक छानना और क्लासिफिकेशन प्रणाली के अंकों के सहारे अलमारियों से कोई किताब हासिल करना होता था । आज शोध का मतलब गूगल सर्च हो गया है अथवा अधिक से अधिक विकीपीडिया देख लेने के बाद ही किसी विषय में गोता लगाना हो गया है । अब तो बस एक ब्राउज़र खोल कर सर्च करने के लिए शब्द टाइप करना और फिर तब तक डुबकी लगा कर खोज जारी रखना जब तक आप जो चाहते है वह न मिल जाए अथवा जो आपको लगता हो कि यही आप चाहते थे- वह मिल न जाए ।

    अधिकतर मूल-डिजिटल कभी भी अखबार नहीं खरीदते । ऐसा नहीं कि वे खबरें नहीं पढ़ते , फर्क बस इतना है कि उन्हें खबरें नये तरीकों से मिलती हैं तथा कई रूप में मिलती हैं। अब उन्हें करीने-से मोड़ कर सहेजे जाने वाले बड़े नक्शों की भी जरूरत नहीं, टेवि के कार्यक्रमों की सूची , पर्यटन गाइड अथवा पर्चों का छपना बन्द हो गया हो ऐसा नहीं है परन्तु यह सब मूल डिजिटलों को अनूठे लगते हैं । यह तय है कि यह सभी परिवर्तन अच्छे नहीं हैं परन्तु वे स्थायी हैं ।

     मूल-डिजिटल जैसे अपनी जिन्दगी बिताते हैं ,उसके कई पक्ष कई बार चिन्ता का विषय बन जाते हैं । ‘निजता की सुरक्षा’ की बाबत मूल डिजिटल की धारणा अपने अभिभावकों और दादा-नाना से अलग होती है । डिजिटल माहौल में इतना समय बिताने के कारण मूल-डिजिटल  उनकी ढेरों निशानियाँ ऑनलाइन छूट जाती हैं । अपनी आस की दुनिया , आकांक्षा को दुनिया के समक्ष प्रकट करते वक्त तो अत्यन्त सृजनात्मक अभिव्यक्ति करते हैं परन्तु बुरा तो तब होता है जब वे ऐसी सूचनाएं ऑनलाइन छोड़ते हैं जिनके कारण बरसों बाद उन्हें अवमानना का सामना करना पड़ सकता है । ऑनलाइन गुजारे गये हर घण्टे के साथ वे बालक-भोगियों के लिए निशानियाँ छोड़ रहे होते हैं जिनके सहारे उनका पीछा किया जा सकता है । प्रवेश देने वाले अधिकारियों , संभावित नौकरी देने वालों अथवा संभावित सखा/सहेलियों को जिन सूचनाओं की जरूरत होती है उनके बारे में उनसे कहीं ज्यादा सूचनाएं मौजूद होती हैं ।  दशकों बाद तक इन परिवर्तनों  के गहरे अप्रत्यक्ष प्रभाव हम सभी के सामने होंगे।  लेकिन जो मूल-डिजिटल के रूप में बढ़ रहे उन्हें सर्वाधिक कीमत चुकानी पड़ेगी ।

[जारी]

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