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Archive for नवम्बर 28th, 2008

    पिछला हिस्सा । गुरु द्वारा परीक्षण के बाद संगीत के सबक शुरु हुए । गुरु द्वारा सिखाए गए का अभ्यास करना था , कोई सवाल नहीं पूछना था । कभी गुरु गाते और शिष्य सिर्फ गौर से सुनते । सवाई गन्धर्व द्वारा कराए गए सख़्त प्रशिक्षण से भीमसेन की संगीत-यात्रा प्रारम्भ हुई , सन्तुष्टि और आत्मविश्वास के साथ ।  मुश्ताक हुसैन के गायन से अभिभूत हो कर भीमसेन रामपुर गए और छ: माह रहे । इन छ: महीनों में इस गुरु ने उन्हें सिर्फ राग नट मल्हार सिखाया ।

    रामपुर से वे सीधे लखनऊ के आकाशवाणी केन्द्र पहुँचे । एक सुपरिचित आवाज प्रसारित हो रही थी । यह बेगम अख्तर थीं । हाथ में सिगरेट लिए वे बाहर आईं । भीमसेन जोशी ने अपना परिचय दिया । बेगम साहिबा ने कहा , ‘ कुछ सुनाओ ।’ भीमसेन जोशी ने उन्हें भैरव का एक टुकड़ा गा कर सुनाया । बेगम अख्तर ने केन्द्र निदेशक स्वरूप मल्लिक को बुलवा कर कहा , ‘ यह लड़का अच्छा गाता है । इसको कुछ काम दो । ” बतौर स्टाफ आर्टिस्ट बत्तीस रुपे दरमाह पर उनकी नियुक्ति हो गई । उस वक्त बिस्मिल्लाह खान भी वही कार्यरत थे ।

    जनवरी १९४६ में पुणे में सवाई गन्धर्व की शष्ठी पूर्ति का आयोजन था । किराना घराना के इस उस्ताद (सवाई गन्धर्व) के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए विभिन्न घरानों के संगीतज्ञ पहुंचे थे । सिर्फ़ २४ वर्ष का होने के बावजूद भीमसेन आमंत्रित थे । उन्होंने राग मल्हार प्रस्तुत किया । यह राग उन्होंने अपने गुरु से नहीं सीखा था । गुरु की उपस्थिति में यह उनका प्रथम सार्वजनिक कार्यक्रम था । श्रोता मंत्रमुग्ध थे ।  तत्पश्चात उन्होंने खाडिलकर के नाटक मान-अपमान से लिया गया सदाबहार गीत – चन्द्रिका जानू थीया प्रस्तुत किया । इस प्रकार एक गायक का विधिवत आविर्भाव हुआ।

    भीमसेन जोशी जितने संगीत समारोह किसी गायक ने नहीं किए हैं । १९६४ में काबुल के राजकुमार जहीर शाह ने उन्हें एक संगीत समारोह हेतु निमंत्रित किया । ऑक्स्फॉर्ड में अध्ययनरत उसकी बेटी ने भीमसेन जोशी द्वारा राग ललित तथा शुद्ध कल्याण की रेकॉर्डिंग सुनकर अपने पिता को उन्हें निमंत्रित करने के लिए अपने पिता को प्रेरित किया । १९६४ से १९८२ के बीच भीमसेन जोशी इटली , फ्रान्स और अमेरिका का दौरा किया । वे पहले संगीतज्ञ थे जिनके कार्यक्रम पोस्टर द्वारा न्यू यॉर्क शहर में विज्ञापित किया गया था । हमेशा विनोदपूर्ण हाजिर जवाबी से बतियाने वाले भीमसेन जोशी पिछले कुछ समय से व्हील चेयर पर आश्रित हैं और अधिकतर मौन रहते हैं । एक वक्त था जब उन्हें नई गाड़ियाँ खरीदने और उन्हें फर्राटे से चलाने का शौक था । संगीत के शास्त्र की पकड़ की तरह मोटर गाड़ी के यन्त्र की भी उन्हें पूरी जानकारी थी ।

     भीमसेन जोशी इस बात के जीवित प्रमाण है कि कलाकार भाषा और जाति के ऊपर होता है । यद्यपि उन्हें कई सम्मान मिले परन्तु उनके शिष्यों की कतार ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है :

   श्रीपति पाडिगर ,माधव गुड़ी , विनायक तोर्वी , श्रीकान्त देशपाण्डे , रामकृष्ण पटवर्धन , अनन्त तेरदल ……….

   [ लेखक सदानन्द कानावली धारवाड़ स्थित संगीतशास्त्री हैं ।  मूल अंग्रेजी लेख । ]

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