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क्वचित प्रकाशं क्वचित्प्रकाशं,

नभ: प्रकीर्णाम बुधरम विभाति ।

क्वचित क्वचित पर्वत सनिरुद्धम ,

रुपं यथा शान्त महार्णवस्य ॥

बिलकुल शुरुआती श्लोकों में से एक । आदरणीय गुरु रामचन्द्र शास्त्री का सिखाया हुआ , दरजा छ: में । शायद उनका रचा हुआ भी ।

बस ,फर्क सिर्फ़ यह था कि आज पर्वत की जगह मेघ पहले रह-रह कर प्रकाश को अवरुद्ध कर रहे थे और बाद में जैसा होना था चन्द्रमा की परछाई  ।

काशी में सूर्योदय ५ : २१ पर हुआ था और सूर्य ग्रहण ५ : ३० पर शुरु हुआ और  ७ : २७ तक चला । ६ : २४ से ६ : २७ तक सूर्य पूर्णरूपेण आच्छादित था ।

मैं साढ़े पाँच बजे उठा और खग्रास सूर्यग्रहण के  दौरान मैंने तसवीरें लीं । ’यही है वह जगह’ के पाठको के समक्ष प्रस्तुत है ।

Solar Eclipse Kashi

आखिरी तसवीर में बादलों के बीच किसी जेट विमान के धूँए की सीधी लकीर । इसके यात्रियों से “अदेखाई” भी हुई । कुछ तसवीरों को क्रॉप भी किया है और संजाल पर पूर्ण साइज में अपलोड नहीं किया है ।

सूरज जैसे ही पूरी तरह ढक गया , पक्षी तो शान्त हो गये किन्तु पास के डालमिया छात्रावास से लड़कों का शोर उठा ।

पूरा खेल परछाई का था । सो ,  इस दिव्य दृश्य के दर्शक की परछाइयों को भी खींचा । अखबार में पढ़ा कि यह खगोलीय स्थिति अगली बार  ११ जून २१३२ को बनेगी ।

मैंने अपने कैमेरे के अलावा किसी फिल्टर का प्रयोग नहीं किया है । प्रयोग का चूहा हूँ या नहीं यह वक्त बतायेगा ।
चित्र के कैप्शन पर खटका मारें और पिकासा अलबम पर स्लाईड शो के रूप में देखें । पिकासा का पेज खुलने के बाद F 11 बटन दबाकर पूरे परदे पर स्लाईडशो देखिएगा ।

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