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भारत सरकार के प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक ने देश में एक बहस छेड़ दी है। सरकार ने इस खाद्य सुरक्षा का मतलब सस्ती दरों पर खाद्यान्नों की सार्वजनिक वितरण प्रणाली से माना है और इसे वह गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों तक सीमित करना चाहती है। राज्य सरकारों को लिखे एक पत्र में भारत सरकार के खाद्य मंत्रालय ने यह भी कहा है कि ये सरकारें अपनी मर्जी से गरीबो की संख्या बढ़ाना तथा बीपीएल राशन कार्ड बांटना बंद करें और योजना आयोग द्वारा हर प्रांत के लिए तय की गई गरीबों की संख्या पर ही कायम रहें।

पत्र में इस बात पर चिंता जाहिर की गई है कि योजना आयोग के अनुसार देश में 6.52 करोड़ गरीब परिवार होना चाहिए, लेकिन देश में 10.68 करोड़ बीपीएल कार्ड हो गए हैं, यानी 4.16 करोड़ कार्ड ज्यादा बन गए हैं। गरीबी के नए अनुमानों के मुताबिक तो देश में अब बीपीएल कार्डों की संख्या 5.91 करोड़ ही होना चाहिए।

यदि शरद पवार वाले इस मंत्रालय की चली, तो देश के गरीबों की जिन्दगियों पर यह एक और हमला होगा। भारत सरकार का योजन आयोग जिस तरह गरीबी रेखा का निर्धारण कर रहा है, उस पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। योजना आयोग के आंकड़ोंमें तो देश की गरीबी कम होती जा रही है और विकास व प्रगति की एक उजली तस्वीर उभरती है। इन के मुताबिक देश में 1973-74 में 55 प्रतिशत लोग गरीब थे, जो 1983 में घटकर 44 प्रतिशत, 1993-94 में36 प्रतिशत, 1999-2000 में 26 प्रतिशत रह गए। वर्ष 2004-05 में मामूली बढ़कर यह प्रतिशत 27.5 हो गया। इन्ही आंकड़ों के दम पर सरकार दावा करती है कि विकास के फायदे नीचे तक ‘रिस’ रहे हैं और वह लोगों को धीरज रखने को कहती है।

योजना आयोग का गरीबी का आकलन सत्तर के दशक में न्यूनतम कैलोरी उपभोग पर आधारित है। वर्ष 1973 में ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी (प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति) वाला भोजन करने वाले परिवारों की आय देखी गई और उसे ही गरीबी रेखा मान लिया गया। बाद के वर्षों में उसी आय को कीमतों के सूचकांक में वृद्धि के अनुपात में बढ़ाया जाता रहा। लेकिन इस बीच साधारण भारतवासी के बजट में अन्य वस्तुओं व सेवाओं के खर्च व उनकी कीमतों में काफी वृ्द्धि हुई, जिसे योजना आयोग ने नजरअंदाज कर दिया। नतीजा यह हुआ कि बाद के वर्षों मेंसरकारी गरीबी रेखा वाली आय के परिवार अब पहले से काफी कम कैलोरी वाला भोजन कर पा रहे हैं। उनके भोजन में कटौती हो गई है।

उदाहरण के लिए वर्ष 2004-05 में सरकार ने जिस आय को गरीबी रेखा माना है, राष्ट्रीय सेम्पल सर्वेक्षण के मुताबिक उस आय वाले परिवार मात्र 1800 कैलोरी का ही उपभोग कर रहे थे। यदि निर्धारित न्यूनतम 2400 (ग्रामीण) और 2100 (शहरी) कैलोरी भोजन वाले परिवारों की आय निकाली जाए तो वह सरकारी गरीबी रेखा आय से लगभग दुगुनी होगी। देश में गरीबों का प्रतिशत 27.5 के स्थान पर 75.8 हो जाएगा। स्पष्ट है कि 48 प्रतिशत से ज्यादा आबादी या 54 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा के बाहर रखकर सरकारी योजनाओं व मदद से वंचित किया जा रहा है।

डॉ. उत्सा पटनायक जैसे कई मूर्धन्य अर्थशास्त्रियों ने इस विसंगति को बार-बार उजागर किया है। लेकिन लगता है कि योजना आयोग जानबूझकर आंकड़ों का यह घपला जारी रखना चाहता है, ताकि सरकार की जिम्मेदारी कम रहे, विकास का भ्रम बना रहे और नवउदारवादी सुधारों की गाड़ी चलती रहे। विश्व बैंक एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय ताकतें भी यही चाहती है।

पिछले दिनों एक सरकारी समिति ने भी गरीबी रेखा के आकलन में इस अंतर्विरोध को स्वीकार किया है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने डॉ. एन.सी.सक्सेना की अध्यक्षता में गरीबों को चिन्हित करने के लिए विशेषज्ञ समूह का गठन किया है। इस की अंतरिम रपट में स्वीकार किया गया है कि गरीबी रेखा का यह निर्धारण दोषपूर्ण है। इसके पहले अर्जुन सेनगुप्ता की अध्यक्षता में बने असंगठित  क्षेत्र आयोग ने भी बताया था कि देश की 77 प्रतिशत आबादी या 83 करोड़ लोग 20 रु. रोज से नीचे गुजारा कर रहे है। इसे ही गरीबी का सबसे अच्छा आकलन मानना चाहिए।

गरीबी रेखा के गलत व त्रुटिपू्र्ण नि्र्धारण के पीछे एक राजनीति भी है। इससे देश के गरीबों की बड़ी संख्या को किसी भी प्रकार की सरकारी मदद से वंचित किया जा सकता है। साथ ही गरीबों को आपस मे बांटा व उलझाया जा सकता है। देश के गांवों और शहरी झोपड़पटि्टयों के गरीब लोग इसी मुद्दे पर उलझे रहते हैं कि फलां का नाम कैसे गरीबी रेखा की सूची में है और उनका नाम क्यों नहीं है। आपसी द्वेष और द्वन्द्व भी पैदा होता है। कई समझदार लोग भी मान लेते हैं कि  भ्रष्टाचार एवं गलत लोगों के नाम इस सूची में शामिल होने से समस्या पैदा हुई है। लेकिन कुछ संपन्न लोगों के नाम हटा देने से यह समस्या हल नहीं होने वाली है, क्योंकि गरीबी रेखा की सूची को जरुरत से काफी छोटा रखा जाता है। यह मामला क्रियान्वयन में कमी या भ्रष्टाचार का नहीं, सरकार की नीति व नियत में ही खोट का है।

कुल मिलाकर, गरीबी रेखा के इस भ्रमजाल को समझना और इससे बाहर आना जरुरी है। अर्थशास्त्रियों और विद्वानों की बौद्धकि कसरतों के लिए यह ठीक है, किन्तु सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों के लिए इसे आधार बनाना ठीक नहीं हैं। जनकल्याण की समस्त योजनाएं व सुविधाएं देश की साधारण जनता के लिए होने चाहिए, सिर्फ गरीबी रेखा की सूची के परिवारों तक उन्हें सीमित नहीं किया जाए। जिस देश में 75-80 प्रतिशत आबादी गरीबी एवं अभावों में जी रही हो, वहां इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। यदि कोई भेद करना है, तो वह अमीरों को बाहर करके किया जा सकता है। आयकर का भुगतान करने वाले, निजी मोटरगाड़ी रखने वाले, जैसे कुछ मानक बनाकर अमीर परिवारों की एक नकारात्मक सूची बनाई जा सकती है। यह ज्यादा सरल एवं व्यवहारिक भी होगा। दूसरे शब्दों में, देश को गरीबी रेखा के बजाय एक अमीरी रेखा की जरुरत है। इस अमीरी रेखा की सूची के लोगों को सरकारी मदद व अनुदान से वंचित किया जा सकता है और उन पर भारी टैक्स लगाए जा सकते हैं। देश में जमीन की हदबंदी की ही तरह संपत्ति व आमदनी की एक ऊपरी सीमा बनाने पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। आखिर हम यह नहीं भूल सकते कि अमीरी और गरीबी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
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(लेखक समाजवादी जन परिषद् का राष्ट्रीय अध्यक्ष है।)

सुनील, ग्राम पोस्ट -केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461 111

फोन नं० – 09425040452, फोन 09425040452]  ईमेल & sjpsunilATgmailDOTcom

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