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पिछले भाग से आगे :

यह कहा जा रहा है कि राष्ट्रमंडल खेलों के लिए जो इन्फ्रास्ट्रक्चर बन रहा है, वह बाद में भी काम आएगा। लेकिन किनके लिए ? निजी कारों को दौड़ाने और हवाई जहाज में उडने वाले अमीरों के लिए तो दिल्ली विश्व स्तरीय शहर बन जाएगा। (वह भी कुछ समय के लिए, क्योंकि निजी कारों की बढती संख्या के लिए तो सड़कें और पार्किंग की जगहें फिर छोटी पड़ जाएंगी।) लेकिन तब तक दिल्ली के ही मेहनतकश झुग्गी झोपड़ी वासियों और पटरी-फेरी वालों को दिल्ली के बाहर खदेड़ा जा चुका होगा। उनको हटाने और प्रतिबंधित करने की जो मुहिम पिछले कुछ समय से चल रही है, उसके पीछे भी राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन है। किन्तु सवाल यह भी है कि पूरे देश का पैसा खींचकर दिल्ली के अमीरों के ऐशो-आराम के लिए लगाने का क्या अधिकार सरकार को है ? देश के गांवो और पिछड़े इलाकों को वंचित करके अमीरों-महानगरों के पक्ष में यह एक प्रकार का पुनर्वितरण हो रहा है।

एक दलील यह है कि राष्ट्रमंडल खेलों के सफल आयोजन के बाद भारत ओलंपिक खेलों की मेजबानी का दावा कर सकेगा और यह इन्फ्रास्ट्रक्चर उसके काम आएगा। लेकिन यह तो और बड़ा घपला व अपराध होगा। कई गुना और ज्यादा खर्च होगा, और ज्यादा गरीबों को खदेड़ा जाएगा एवं वंचित किया जाएगा। चीन में बीजिंग ओलंपिक के मौके पर यही हुआ। चीन में तो तानाशाही है, क्या भारत में भी हम वहीं करना चाहेंगे ?
चीन ने बीजिंग ओलंपिक के मौके पर विशाल राशि खर्च करके बड़े-बड़े स्टेडियम बनाए, वे बेकार पड़े हैं। उनके रखरखाव का खर्च निकालना मुद्गिकल हो रहा है और उनको निजी कंपनियों को देकर किसी तरह काम चलाने की कोशिश हो रही है।  उसी तरह सफेद हाथी पालने की तैयारी हम क्यों कर रहे हैं ?
राष्ट्रमंडल खेलों के पक्ष में एक दलील यह दी जा रही है कि बड़ी संखया में विदेशों से दर्शक आएंगे और पर्यटन से भी आय होगी। पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन जितना विशाल खर्च हो रहा है, उसका १० प्रतिशत भी टिकिटों की बिक्री और पर्यटन की आय से नहीं निकलेगा। सवाल यह भी है कि विदेशी दर्शकों और पर्यटकों के मनोरंजन के खातिर हम अपने देश की पूरी प्राथमिकताएं बदल रहे हैं और देश के लोगों की ज्यादा जरुरी जरुरतों को नजरअंदाज कर रहे हैं। क्या यह जायज है ?

गलत खेल संस्कृति

यह भी दलील दी जा रही है कि इस आयोजन से देश में खेलों को बढ़ावा मिलेगा। यह भी एक भ्रांति है। उल्टे, ऐसे आयोजनों से बहुत महंगे, खर्चीले एवं हाई-टेक खेलों की एक नई संस्कृति जन्म ले रही है, जो खेलों को आम जनता से दूर ले जा रही है और सिर्फ अमीरों के लिए आरक्षित कर रही है। आज खर्चीले कोच, विदेशी प्रशिक्षण, अत्याधुनिक स्टेडियम और महंगी खेल-सामग्री के बगैर कोई खिलाड़ी आगे नहीं बढ  सकता। पिछले ओलिंपिक में स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाला भारतीय निशानेबाज अभिनव बिन्द्रा एक उदाहरण है, जिसके परिवार ने खुद अपना शूटिंग रेन्ज बनाया था और उसे यूरोप में प्रशिक्षण दिलवाया था। उसके परिवार ने एक करोड  रु. से ज्यादा खर्च किया होगा। इस देश के कितने लोग इतना खर्च कर सकते हैं ?
इन खेलों और उससे जुड़े़ पैसे व प्रसिद्धि ने एक अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है, जिसमें प्रतिबंधित दवाओं, सट्‌टे और मैच-फिक्सिंग का बोलबाला हो चला है जबरदस्त व्यवसायीकरण  के साथ खेलों में खेल भावना भी नहीं रह गई है और खेल साधारण भारतवासी से दूर होते जा रहे हैं। टीवी चैनलों ने भारतीयों को खेलने के बजाय टीवी के परदे पर देखना, खिलाडियों के फैन बनना, ऑटोग्राफ लेना आदि जरुर सिखा दिया है। व्यापक दीवानगी पैदा करके टीवी चैनल और विज्ञापनदाता कंपनियों की खूब कमाई होती है। मशहूर खिलाड़ी विज्ञापनों में उनके प्रचारक बन जाते हैं। अब तो खेल आयोजनों में चियर गर्ल्स और ड्रिंक्स गर्ल्स के रुप में इनमें भौंडेपन, अश्लीलता और नारी की गरिमा गिराने का नया अध्याय शुरु हुआ है। जनजीवन के हर क्षेत्र की तरह खेलों का भी बाजारीकरण हो रहा हैं, जिससे अनेक विकृतियां पैदा हो रही हैं। क्रिकेट और टेनिस जैसे कुछ खेलों में तो बहुत पैसा है। इनमें जो खिलाड़ी प्रसिद्धि पा लेते हैं, वे मालामाल हो जाते हैं।  लेकिन हॉकी, फुटबाल, वॉलीबाल, कबड्‌डी, खो-खो, कुश्ती, दौड -कूद जैसे पारंपरिक खेल उपेक्षित होते गए हैं। इनमें चोटी के खिलाड़ि यों की भी उपेक्षा व दुर्दशा के किस्से बीच-बीच में आते रहते हैं। हमारे खेलों का एक पूंजीवादी और औपनिवेशिक चरित्र बनता जा रहा है। सारे अन्य खेलों की कीमत पर क्रिकेट छा गया है। यह मूलतः अंग्रेजों का खेल है और दुनिया के उन्हीं मुट्‌ठी भर देशों में खेला जाता है जहां अंग्रेज बसे हैं या जो अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं।
भारत ने १९८२ में एशियाई खेलों का आयोजन किया था और उसमें विशाल धनराशि खर्च की थी। लेकिन उसके बाद न तो देश के अंदर खेलों को विशेष बढ़ावा मिला और न अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में भारत की स्थिति में कुछ सुधार हुआ। पदक तालिका में १०० करोड  से ज्यादा आबादी के इस देश का स्थान कई ४-५ करोड  के देशों से भी नीचे रहता है। इस अनुभव से भी हम ऐसे आयोजनों की व्यर्थता को समझ सकते हैं (२)

राष्ट्रमंडल खेलों के बजाय इसका आधा पैसा भी देश के गांवों और कस्बों में खेल-सुविधाओं के प्रदाय और निर्माण में, देहाती खेल आयोजनों में और देश के  बच्चों का कुपोषण दूर करने  में लगाया जाए तो देश में खेलों को कई गुना ज्यादा बढ़ावा मिलेगा। खेलों में छाये भ्रष्टाचार, पक्षपात और असंतुलन को भी दूर करने की जरुरत है। तभी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में भारत की दयनीय हालत दूर होगी और वह पदक तालिका में ऊपर उठ सकेगा।

प्रतिस्पर्धा में खजाना लुटाया

कुछ साल पहले २००७ में जब भारतीय ओलंपिक संघ ने २०१४ के एशियाई खेलों की मेजबानी पाने के की असफल कोशिश की थी, तब स्वयं भारत के तत्कालीन खेल मंत्री श्री मणिशंकर अय्यर ने इसकी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि भारत के करोड़ों वंचित बच्चों, किशोरों और युवाओं को खेल-सुविधाएं न देकर इस तरह के अंतरराष्ट्रीय आयोजनों से कुछ नहीं होगा और सिर्फ भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने के लिए इतनी फिजूलखर्ची उचित नहीं है। किन्तु श्री अय्यर की बात सरकार में बैठे अन्य लोगों को पसंद नहीं आई और जल्दी ही खेल मंत्रालय उनसे ले लिया गया।
राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी भी भारत ने जिस तरह से पाई, वह गौरतलब और शर्मनाक है। वर्ष २०१० की मेजबानी के लिए कनाडा के हेमिल्टन शहर का भी दावा था। कनाडा को प्रतिस्पर्धा से बाहर करने के लिए भारतीय ओलंपिक संघ ने सारे खिलाडि यों के मुफ्त प्रशिक्षण पर ७० लाख डॉलर (३३ करोड  रु. लगभग) का खर्च अपनी तरफ से करने का प्रस्ताव दिया। इतना ही नहीं सारे खिलाड़ियों की मुफ्त हवाई यात्रा और उनके ठहरने-खाने की मुफ्त व्यवस्था का प्रस्ताव भी उसने दिया, जो इसके पहले नहीं होता था। जो खर्च कनाडा जैसा अमीर देश नहीं कर सकता, वे खर्च भारत जैसा गरीब देश उदारता से कर रहा है।

असली एजेण्डा

वर्ष २०१० के राष्ट्रमंडल खेलों की वेबसाईट में इसका उद्देश्य बताया गया है। हरेक भारतीय में खेलों के प्रति जागरुकता और खेल संस्कृति को पैदा करना। आयोजकों ने इसके साथ की तीन लक्ष्य सामने रखे हैं – अभी तक का सबसे बढिया राष्ट्रमंडल खेल आयोजन, दिल्ली को दुनिया की मंजिल (ग्लोबल डेस्टिनेशन) के रुप में प्रोजेक्ट करना और भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रुप में पेश करना। बाकी तो महज लफ्फाजी है, किन्तु इन अंतिम बातों में ही इस विशाल खर्चीले आयोजन का भेद खुलता है। भारत की सरकारें विदेशी पूंजी को देद्गा में किसी भी तरह, किसी भी कीमत पर बुलाने के लिए बेचैन है। विदेशी कंपनियों और उनके मालिकों-मैनेजरों-प्रतिनिधियों को आने-ठहरने-घूमने के लिए अमीर देशों जैसी ही सुविधाएं चाहिए, जिसे गलत ढंग से ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ कहा जाता है। राष्ट्रमंडल खेलों ने भारत सरकार को दिल्ली जैसे महानगरों में अमीरों की सुविधाओं पर देश का विशाल पैसा खर्च करने का बहाना व मौका दे दिया, जो अन्यथा इस लोकतांत्रिक देश में आसान नहीं होता। भारत को ‘आर्थिक महा्शक्ति’ के रुप में पेश करना भी इसी एजेण्डा का हिस्सा है, जिससे देश के लोग अपनी असलियतों और हकीकत को भूलकर झूठे राष्ट्रीय गौरव और जयजयकार में लग जाएं। राष्ट्रमंडल खेलों से भारतीय शासकों के इस अभियान में मदद मिलती है। चीन सरकार ने भी बीजिंग ओलम्पिक का उपयोग देश में उमड़ रहे जबरदस्त असंतोष को ढकने व दबाने तथा आम नागरिको को एक झूठी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा में भरमाने को किया। (स्वयं चीन सरकार की जानकारी के मुताबिक वहां एक वर्ष में एक लाख से ज्यादा स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शन हुए हैं।) भारत सरकार उसी राह पर चलने की कोशिश कर रही है।

लब्बो-लुआब यह है कि राष्ट्रमंडल खेल इस देश की गुलामी, संसाधनों की लूट, बरबादी, विलासिता और गलत खेल संस्कृति के प्रतीक हैं। सभी देशभक्त लोगों को पूरी ताकत से इसके विरोध में आगे आना चाहिए। विद्यार्थी युवजन सभा और समाजवादी जन परिषद्‌ ने तय किया है कि पूरी ताकत से इस राष्ट्र-विरोधी एवं जन विरोधी आयोजन का विरोध करेंगे। आप भी इसमें शामिल हों।
यह देश अब अंग्रेज साम्राज्य का हिस्सा नहीं है। न ही यह देश मनमोहन सिंह, शीला दीक्षित और सुरेद्गा कलमाड़ी का है। उन्हें दे्श को लूटने, लुटाने और बरबाद करने का कोई हक नहीं है। यह दे्श हमारा है। यहां रहने वाले करो्ड़ों मेहनतकश लोगों का है। हम किसी को इस देश के संसाधनों को लूटने-लुटाने, अय्य्याशी करने और गुलामी को प्रतिष्ठित करने की इजाजत नहीं देंगे।

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फुटनोट :-    १.    अक्टूबर २००९ में मशहूर टेनिस खिलाड़ी और आठ बार के ग्रांड स्लैम चैंपियन आन्द्रे अगासी की आत्मकथा में की गई इस स्वीकारोक्ति ने खेल- जगत में खलबली मचा दी कि वह एक प्रतिबंधित दवा- क्रिस्टल मैथ- का सेवन करता था। एक बार जांच में पकड़ाने पर उसने झूठ बोल दिया था। (द हिन्दू, २९ अक्टूबर २००९) १५ दिसंबर २००९ को लोकसभा में खेलमंत्री ने बताया कि पिछले वर्ष से २४ खिलाडियों पर प्रतिबंधित दवाओं के सेवन का दोषी पाए जाने पर दो वर्ष की पाबंदी लगायी गयी है, ११ का मामला अभी लंबित है तथा १३ नए मामले सामने आए हैं। ( पत्रिका, भोपाल, १६ दिसंबर २००९)

२.    इसके बाद १५ दिसंबर २००९ को खेल राज्य मंत्री प्रकाश बाबू पाटील ने भी लोकसभा में स्वीकार किया कि बीजिंग ओलंपिक में भारतीय खिलाडियों के प्रदर्शन में कुछ सुधार हुआ है, किन्तु यह अभी भी संतोषजनक नहीं है। इसका कारण संगठित खेल अधोसंरचना तक पहुंच की कमी और खासतौर से ग्रामीण इलाकों में प्रतियोगिताओं की कमी है। इन कमियों के कारण हमारे पास प्रतिभावान खिलाडियों का सीमित भंडार है। (पत्रिका, भोपाल,१६ दिसंबर २००९)

[ सुनील समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं । उनका पता ग्राम/पोस्ट- केसला,वाया इटारसी , जि. होशंगाबाद,म.प्र. है । ]

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