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सूर्य के उदय – अस्त भी हमारे लिए बोधदायक हैं । सूर्य के उदय – अस्त की भांति मनुष्य की वृत्ति का भी उदय – अस्त होता रहता है । इन प्रक्रियाओं के कारण सृष्टि में ताजगी रहती है , बासीपन नहीं आता । सूर्योदय , सूर्यास्त हमेशा ताजे लगते हैं । यदि हम प्रकृति के साथ एकरूप हो जाते हैं तथा सूर्य के उदय – अस्त पर गौर करने की आदत डालते हैं , तब हमारे जागने पर हमारे लिए जीवन नया होगा , हमारा मन ताजा होगा । हर शाम मन को तथा उसकी आदतों को व्यवहार से , जीवन से तथा खुद से अलग कर परमात्मा की गोद में सो जांए , गहरी नि:स्वप्न निद्रा का अनुभव करें , तब सुबह मन के ताजे होने की अनुभूति होगी तथा जीवन में दु:ख न होगा । नाहक ही हम भांति भांति के बोझ लादे घूमते हैं । ईश्वर हम पर बोझ नहीं डालना चाहता , हम खुद अपने माथे पर बोझ उठा लेते हैं । उसीसे हमारे आनन्द का ह्रास होता है । सही देखा जाए तो ऐसा नहीं होना चाहिए ।

    समझने लायक बात यह है कि मानव – जीवन में सुख – दु:ख के प्रसंग टाले नहीं जा सकते , यह निश्चित है । वे आते – जाते रहेंगे , यह पक्का है । परन्तु हमें इन अवसरों पर चित्त को शांत रखने की युक्ति  साधनी चाहिए । कभी भी हमारे उत्साह में कमी नहीं आनी चाहिए । तभी मनुष्य टिका रह सकता है तथा उसका आनंद – उत्साह कायम रह सकता है । सूर्यनारायण सदैव ताजे रहते हैं । हमारे मन को भी बराबर , निरंतर वैसा ही ताजा रहना चाहिए ।

    सूर्य अपनी आभा और प्रभा निरंतर फैलाता है । भोर में जब सूर्य उगता है – वह उसकी आभा है तथा उगने के बाद चारों दिशाओं मेंउसकी किरणें फैल जाती हैं , वह उसकी प्रभा है । सूर्य में यदि सिर्फ आभा होती और प्रभा न होती , तो उसका प्रचार न होता । विचार की मात्र आभा ही नहीं , प्रभा भी फैलती रहती रहनी चाहिए । तब क्रांति का प्रसार होता है । क्रांति का अर्थ है प्रचार शक्ति । अंदर तेजविता हो और बाहर वह फैली हुई हो , उसी का नाम क्रांति है । सूर्य जैसी तेजस्विता हमारे भीतर होगी , हमारे विचारों में होगी तो उसकी क्रांति फैलेगी । जारी

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