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Posts Tagged ‘सच्चिदानन्द सिन्हा’

देश फिलहाल सांप्रदायिकता और पृथकतावादी दौर से गुजर रहा है । अविश्वास भरे माहौल में लोग जीने को विवश हैं,पंजाब तो पहले से ही आतंक के साये में जी रहा था,देश के अन्य भाग भी सांप्रदायिकता की आग में जलने लगे हैं।पहले जहां हिन्दू और मुसलमानीक दूसरे के पर्वों में खुले दिल और दिमाग से हिस्सा लिया करते थे,वहीं अब धार्मिक जुलूस और जलसे लोगों के बीच की दूरी को बढ़ाने के सबल हथियार बन रहे हैं।कारण क्या है ? क्या धर्म की तीव्र अनुभूति के कारण ऐसा हो रहा है? महज पूजन प्रणाली के अन्तर के आधार पर आदमी-आदमी के बीच दुराव को बढ़ावा देना ही धर्म की भूमिका है ? इन प्रश्नों के उत्तर की तलाश ही सांप्रदायिकता की दिशा में उठाया गया सही कदम होगा।
कुछ लोग, खासकर कुछ वामपंथी समूह मानते हैं कि साम्प्रदायिकता की जड़ धर्म ही है और जब तक धर्म रहेगा साम्प्रदायिकता भी रहेगी । वे मानते हैं कि धर्म का काम लोगों को सम्मोहित कर उन्हें इतना जड़ बना देना है कि वे अपने शोषण का प्रतिकार भी न कर सकें ।इस तरह उनकी दृष्टि में धर्म शोषकों का हथियार है और समस्या का सली समाधान धर्मों का उन्मूलन है । लेकिन धर्म के सम्बन्ध में सही वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है। इसी तरह धर्मों के उन्मूलन की बात भी व्यावहारिक नहीं मालूम पड़ती। समाजवादी कहे जाने वाले देश रूस और चीन में ऐसे प्रयासों के नतीजे उत्साहवर्धक नहीं रहे हैं । सत्तर वर्ष के कम्युनिस्ट प्रयासों के बावजूद आज पूर्वी यूरोप में जिस तरह ईसाई मत फिर से लोगों को आकृष्ट कर रहा है या सोवियत यूनियन के अजरबेजान मणराज्य में जिस तरह इस्लामी कट्टरता बढ़ी है , उस पर विचार करने से धर्मों को नष्ट करने का समाधान ढूंढ़ना व्यावहारिक नहीं लगता ।

ऐसे प्रयासों की असफलता का कारण यह है कि धर्म के सम्बन्ध में कम्युनिस्ट विचार बुनियादी तौर पर गलत हैं।किसी भी समाज में कुछ मूल्य अनिवार्य रूप से धुरी का काम करते हैं, जिनके इर्द-गिर्द उस समाज के लोगों के सामाजिक और निजी व्यवहार नियन्त्रित होते हैं ; और ये मूल्य किसी-न-किसी रूप में धार्मिक मान्यताओं के अंग होते हैं।
इसके अलावा इतिहास बतलाता है कि अत्याचार और उत्पीड़न के खिलाफ आंदोलन अक्सर धर्म द्वारा स्थापित मूल्यों के आधार पर ही होते रहे हैं। यूरोप में किसान आन्दोलन के पीछे ,और बहुत कुछ समाजवादी आन्दोलन के पीछे भी,ईसाई धर्म द्वारा प्रतिपादित समता और बंधुत्व के मूल्य काम कर सके।कुछ धार्मिक मठाधीशों द्वारा शोषण का समर्थन यह सिद्ध नहीं करता कि धर्म हर हालत में शोषकों का माध्यम है । सच तो यह है कि धर्म का हठपूर्ण दुराग्रह उसकी आत्मा के क्षरणकाल में ही शुरु होता है और तभी साम्प्रदायिकता जन्म लेती है।

  अपने व्यवहार में मनुष्य मूलतः आवेगों का दास होता है । धर्म का मुख्य काम मनुष्य के स्वभावगत आवेगों को नियंत्रित कर उनके विनाशकारी नतीजों से बचाना है । अब यह बात लगभग मानी जाने लगी है कि पशुओं और मनुष्यों में अपनी प्रजाति के अन्य सदस्यों के खिलाफ पाया जाने वाला आक्रामक संवेग उनका आनुवंशिक गुण है । लेकिन पशुओं के चरित्र में कुछ ऐसी प्रक्रियाएं होती हैं , जिससे उनकी आक्रामकता पर पर स्वतः आंतरिक अवरोध लग जाता है,और उनकी आक्रामकता अन्य सदस्यों की हत्या या उन्हें गंभीर रूप से जख्मी करने की हद तक नहीं जाती , वहीं मनुष्य के चरित्र में आक्रामकता पर कोई अन्तरनिहित अवरोध नहीं लगाता, मनुष्य में यह अवरोध उनकी संस्कृति और धर्म के जरिए आता है जो उन्हें अपनी प्रजाति के अन्य सदस्यों पर घातक प्रहार करने से रोकता है । लेकिन चूंकि धर्म और संस्कृति पर अनेक तरह के विपरीत दबाव पड़ते रहते हैं , इसलिए इतिहास व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से मनुष्यों द्वारा अन्य मनुष्यों की संहारलीला से भरा पड़ा है । फिर भी आदमी को धर्मों द्वारा प्रतिपादित उदात्त मूल्यों को लेकर चलने की उर्जा भी परोपकार के आनुवंशिक गुण से ही प्राप्त होती है। यह परोपकार भाव , यानी दूसरे मनुष्यों के लिए हित के लिए अपना उत्सर्ग करना धर्म का प्राण होता है ।
लेकिन आनुवंशिकी से प्राप्त परोपकार भाव बिल्कुल दोषमुक्त नहीं होता । आचारशास्त्री कौनरॉड लैरेंज के अनुसार मनुष्य या पशु में अपने समूह के प्रति यह परोपकार भाव उसी अनुपात में तीव्र होता है , जिस अनुपात में दूसरे समूहों के खिलाफ आक्रामकता का भाव तेज होता है । मानव स्वभाव में इन दो विपरीत गुणों का जोड़ा होना बड़ा ही अनर्थकारी सिद्ध होता है । धर्मभाव , जो संपूर्ण मानव समाज के कल्याण को लेकर चलता है जब अपने को छोटे समुदायों के साथ एकाकार कर चलने लगता है , तभी दूसरे धार्मिक या अन्य मानव समुदायों के खिलाफ आक्रामक हो जाता है । यही भावना साम्प्रदायिकता की जड़ में है । इसलिए सम्प्रदायवाद की स्थिति अत्यधिक विरोधाभास की होती है । इसका जन्म धर्मभाव से होता है , जिसका लक्ष्य सम्पूर्ण मानवतंत्र का कल्याण है , लेकिन यह अपने को एक छोते समूह के साथ जोड़कर दूसरे धार्मिक समूहों के प्रति इतना आक्रामक हो जाता है कि अपने धर्म की मूल मान्यताओं को तिलांजलि दे देता है और अपने समूह के ‘हित’ में अन्य मानव समूहों को समूल नष्ट करने की आकांक्षा से भी पीछे नहीं हटता । इस कमजोरी को समझ कुछ लोग इस भाव का अपने स्वार्थ में उपयोग करते हैं । इसी का नतीजा है कि इतिहास धर्मयुद्धों तथा एक धर्म के अनुयायिओं द्वारा दूसरे धर्म के अनुयायिओं के उत्पीड़न की घटनाओं से भरा पड़ा है ।

   इस तरह सांप्रदायिकता धर्मभाव से पैदा होती , लेकिन इसका आचरण धर्मभाव के ठीक विपरीत होता है । यानि जहां धर्म का मूल उद्देश्य होता है , मनुष्यों के बीच वैमनस्य दूर कर प्रेम-भाव पैदा करना ,वहां संप्रदायवाद प्रेमभाव को अपने समुदाय तक सीमित रखता है और इस प्रेमभाव की कीमत वह दूसरे धर्मावलंबियों के खिलाफ अनियंत्रित हिंसा को बढ़ावा देकर वसूलता है। इसी का नतीजा है कि अठारहवीं शताब्दी तक ईसाइयों के विभिन्न सम्प्रदाय एक दूसरे के खिलाफ हिंसा मचाते रहे हैं और ‘इंक्विजिशन’ के काम में तो छोटे-छोटे मतभेदों के लिए लोगों को जिंदा जलाया जाता रहा। इसी तरह हिंदू धर्म के अनुयाई ,जिनके धर्म में अबला,बच्चे और निरल दुश्मनों तक पर हमला करना निषिद्ध है,सांप्रदायिक दंगों में निरपराध और निहत्थे औरतों,बच्चों या अन्य लोगों की हत्या करने या उन पर दूसरे तरह के अत्याचार करने से बाज नहीं आते । यही हाल इस्लाम का भी है,जिसमें वैसे दुश्मनों पर भी हमला करना निषिद्ध है,जो पहले हमला न करें ।फिर भी दंगों में प्रायः निरपराध लोगों पर ही हमला किया जाता है।इस तरह संप्रदायवाद से सबसे पहले उन धार्मिक सिद्धान्तों की ही बलि होती है,जिनकी रक्षा का दावा साम्प्रदायिक समूह करते हैं ।

लेकिन अगर मानव प्रजाति में अपने समूह के लिए आत्मोत्सर्ग का भाव मनुष्यों के ही दूसरे के प्रति आक्रामकता से जुड़ा है, जैसा कि आचारशास्त्री बतलाते हैं तथा जैसा कि मानव समूहों के व्यवहार से भी ज्ञात होता है , तो धर्म को मिटाकर भी सांप्रदायिकता की समस्या खत्म न होगी ! तब ऐसी आक्रामकता धार्मिक जमातों की जगह ऐसी दूसरी जमातों की ओर मुड़ेगी , जिन्हें बाहरी समझा जाता है । इतिहास का अनुभव यही बतलाता है कि कहीं यह आक्रामकता वैसे दूसरे मूल या नस्ल के खिलाफ, कहीं दूसरी जाति के खिलाफ, कहीं वैसी दूसरी भाषा या राष्ट्रीय जमातों के खिलाफ मोड़ दी जाती है , जिन्हें बाहरी समझा जाता है । अमरीका में नीग्रो लोगों के खिलाफ सफेद लोगों की आक्रामकता ऐसी ही है,क्योंकि सफेद और रंगीन दोनों प्रायः ईसाई हैं,सोवियत यूनियन के विभिन्न राष्ट्रीय समूहों के बीच जो संघर्ष अभी उभरे हैं, वे भी ऐसे ही हैं । अफ्रीका के देशों- जैसे नाइजीरिया, सूडान आदि – में ऐसे ही संघर्ष विभिन्न कबीलों के बीच चल रहे हैं। भारत में जातीय संघर्षों के पीछे भी ऐसी ही आक्रामकता काम करती है।
ऊपर की बातों से साफ है कि धर्म का उन्मूलन सांप्रदायिक भावना को रोकने का उपाय नहीं हो सकता । असल में धर्म से जुड़ी सांप्रदायिकता को मिटाने का एक उपाय धर्म की सच्ची समझदारी फैलाना हो सकता है। चाहे वह ईसाई,इस्लाम,बौद्ध या हिन्दू धर्म हो,उनके केन्द्र में समस्त मानव वंश के कल्याण की कामना है । अगर इन धर्मों के अन्यायी अपने धर्मों की मूल भावना को समझने लगें तो धर्म और सांप्रदायिकता का भेद उन्हें दिखाई देने लगेगा। इसलिए सांप्रदायिक तनाव खत्म करने का एक उपाय तो लोगों को धर्म और सांप्रदायिकता का भेद साफ तौर पर बतलाना हो सकता है ।
लेकिन सिर्फ उपदेश ही काफी नहीं है। धर्मानुयायियों को संप्रदायों में बांधने वाले कुछ बाहरी प्रतीक और अनुष्ठान होते हैं ,जिनसे धार्मिक समूहों का अलग अस्तित्व बना है । अपने आप में यह कोई बुरी चीज नहीं है। लेकिन अगर समाज में ऐसे दूसरे प्रतीक या अनुष्ठान न हों,जो लोगों में समूचे विश्व के प्रति नैसर्गिक तादात्म्य भाव स्फूरित कर सकें तो लोग अपने अपने संप्रदायों और समूहों में सिमटने लगते हैं और संप्रेषण छीजने लगता है , इससे दूसरों पर संदेह और निर्मूल आशंका पैदा होती है। अलगाव से संप्रेषण घटता है,इसलिए सुनियोजित ढंग से ऐसे प्रयास होने चाहिए,जिसमें मिले-जुले कामों का दायरा बढ़ता रहे और लोग दूसरे समूह को दूसरे समूह के सदस्यों के बजाय एक इंसान के रूप में पहचान सकें। स्थायी रूप से सांप्रदायिक या अन्य सामूहिक झगड़ों को मिटाने के ऐसे ही उपाय कारगर हो सकते हैं ।

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पिछले हिस्से : एक , दो

    आधुनिक केंद्रित व्यवस्थाओं में ऊँचे ओहदे वाले लोग अपने फैसले से किसी भी व्यक्ति को विशाल धन राशि का लाभ या हानि  पहुँचा सकते हैं । लेकिन इन लोगों की अपनी आय अपेक्षतया कम होती है। इस कारण एक ऐसे समाज में जहाँ धन सभी उपलब्धियों का मापदंड मान लिया जाता हो व्यवस्था के शीर्ष स्थानों पर रहने वाले लोगों पर इस बात का भारी दबाव बना रहता है कि वे अपने पद का उपयोग नियमों का उल्लंघन कर नाजायज ढंग से धन अर्जित करने के लिए करें और धन कमाकर समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त प्राप्त करें । यहीं से राजनीति में भ्रष्टाचार शुरु होता है । लेकिन विकसित औद्योगिक समाजों में व्यवस्था की क्षमता को कायम रखने के लिए नियम कानून पर चलने और बराबरी की प्रतिस्पर्धा के द्वारा सही लोगों के चयन का दबाव ऐसा होता है जो ऐसे भ्रष्टाचार के विपरीत काम करता है । ऐसे समाजों में लोग भ्रष्ट आचरण के खिलाफ सजग रहते हैं क्योंकि इसे कबूल करना व्यवस्था के लिए विघटनकारी हो सकता है । हमारे समाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसे व्यवस्थागत मूल्यों का निर्माण नहीं हो पाया है । इसके विपरीत जहां हमारी परंपरा में संपत्ति और सामाजिक सम्मान को अलग – अलग रखा गया था वहीं आज के भारतीय समाज संपत्ति ही सबसे बड़ा मूल्य बन गई है और लोग इस विवेक से शून्य हो रहे हैं कि संपत्ति कैसे अर्जित की गई है इसका भी लिहाज रखें । इस कारण कोई भी व्यक्ति जो चोरी , बेईमानी , घूसखोरी तथा हर दूसरी तरह के कुत्सित कर्मों से धन कमा लेता है वह सम्मान पाने लगता है । इस तरह कर्म से मर्यादा का लोप हो रहा है ।

    आधुनिकतावादियों पर , जो धर्म और पारंपरिक मूल्यों को नकारते हैं तथा आधुनिक उपकरणों से सज्जित ठाठबाट की जिंदगी को अधिक महत्व देते हैं , भ्रष्ट आचरण का दबाव और अधिक होता है । इस तरह हमारे यहाँ भ्रष्टाचार सिर्फ वैयक्तिक रूप से लोगों की ईमानदारी के ह्रास का परिणाम नहीं है बल्कि उस सामाजिक मूल्यहीनता का परिणाम है जहां पारंपरिक मूल्यों का लोप हो चुका है पर पारंपरिक वफादारियां अपनी जगह पर जमी हुई है । इसीका नतीजा है कि आधुनिकता की दुहाई देने वाले लोग बेटे पोते को आगे बढ़ाने में किसी भी मर्यादा का उल्लंघन करने से बाज नहीं आते । चूँकि हमारे समाज में विस्तृत परिवार के प्रति वफादारी के मूल्य को सार्वजनिक रूप से सर्वोपरि माना जाता रहा है कुनबापरस्ती या खानदानशाही  के खिलाफ सामाजिक स्तर पर कोई खास विरोध नहीं बन पाता । आम लोग इसे स्वाभाविक मानकर नजरअंदाज कर देते हैं । ऐसी स्थिति में इनका विरोध प्रतिष्ठानों के नियम कानून के आधार पर ही संभव हो पाता है ।

    ऊपर की बातों पर विचार करने से लगता है कि जब तक संपत्ति और सत्ता का ऐसा केंद्रीयकरण रहेगा जहाँ थोड़े से लोग अपने फैसले से किसी को अमीर और किसीको गरीब बना सकें और समाज में घोर गैर-बराबरी भी रहेगी तब तक भ्रष्टाचार के दबाव से समाज मुक्त नहीं हो सकता । यही कारण है कि दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी और आदर्शवादी लोग सत्ता में जाते ही नैतिक फिसलन के शिकार बन जाते हैं । एक ऐसे समाज में ही जहाँ जीवन का प्रधान लक्ष्य संपत्ति और इसके प्रतीकों का अंबार लगाकर कुछ लोगों को विशिष्टता प्रदान करने की जगह लोगों की बुनियादी और वास्तविक जरूरतों की पूर्ति करना है भ्रष्ट आचरण नीरस बन सकता ।

    भ्रष्टाचार का उन्मूलन एक समता मूलक समाज बनाने के आंदोलन के क्रम में ही हो सकता है जहाँ समाज के ढाँचे को बदलने के रा्ष्ट्रव्यापी आंदोलन के संदर्भ में स्थानीय तौर से भ्रष्टाचार के संस्थागत बिंदुओं पर भी हमला हो सके । बिहार में चलने वाले १९७४ के छात्र आंदोलन की कुछ घटनायें इसका उदाहरण हैं, जिसमें एक अमूर्त लेकिन महान लक्ष्य ’संपूर्ण क्रांति’ के संदर्भ में नौजवानों में एक ऐसी उर्जा पैदा हुई कि बिहार के किशोरावस्था के छात्रों ने प्रखंडों में और जिलाधीशों के बहुत सारे कार्यालयों में घूसखोरी आदि पर रोक लगा दी थी । लेकिन न तो संपूर्ण क्रांति का लक्ष्य स्पष्ट था और न उसके पीछे कोई अनुशासित संगठन ही था । इसलिए जनता पार्टी को सत्ता की राजनीति के दौर में वह सारी उर्जा समाप्त हो गई ।

    अंतत: हर बड़ी क्रांति कुछ बुनियादी मूल्यों के इर्दगिर्द होती है । इन्हीं मूल्यों से प्रेरित हो लोग समाज को बदलने की पहल करेते हैं । हमारे देश में , जहां परंपरागत मूल्यों का ह्रास हो चुका है और आधुनिक औद्योगिक समाज की संभावना विवादास्पद है , भ्रष्टाचार पर रोक लगाना तभी संभव है जब देश को एक नयी दिशा में विकसित करने का कोई व्यापक आंदोलन चले । इसके बिना भ्रष्टाचार को रोकने के प्रयास विफलताओं और हताशा का चक्र बनाते रहेंगे ।

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भ्रष्टाचार पर कुछ अन्य महत्वपूर्ण लेख :

भ्रष्टाचार / तहलका से उठे सवाल / किशन पटनायक : एक , दो , तीन

भ्रष्टाचार / असहाय सत्य / किशन पटनायक / एक , दो

भ्रष्टाचार की बुनियाद कहाँ है ? / किशन पटनायक / एक , दो , तीन , चार

भ्रष्टाचार की एक पड़ताल / किशन पटनायक / एक , दो , तीन , चार , पाँच

राजनीति में मूल्य / किशन पटनायक / एक , दो

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बनारस के पटरी व्यवसाइयों के प्रति  जिला प्रशासन ने एक धन-पशु (रियल एस्टेट में लिप्त ‘आज’ अखबार समूह वाले) की इच्छापूर्ति के लिए जो गैर जिम्मेदार रुख अपनाया है (देखें ) उसे समझने के लिए समतावादी चिन्तक सच्चिदानन्द सिन्हा के यह उद्धरण सहायक होंगे :

“यह मानसिकता हिटलर वाली है जो गरीब , विकलांग , असुंदर और अन्य तरह से अस्वस्तिकर लगने वाले लोगों और सबसे बढ़कर उन लोगों से जो जीवन के संघर्ष में पिछ्ड़ गए हैं छुटकारा पाना चाहती है ।अगर व्यवस्था अनुकूल हो तो यह मानसिकता गरीबों के लिए गैस चेम्बर का आयोजन करने से भी नहीं चूकेगी । बुनियादी बात यह है कि देश का अभिजात वर्ग आदमी आदमी के बीच के निहित , मानवीय सम्बन्ध से इनकार करता है और इस स्थिति पर पहुंच जाने पर किसी भी संवेदनशीलता की संभावना समाप्त हो जाती है ।”

“असल में न ‘मत्स्य न्याय’ जल में चलता है और न ‘जंगल का कानून’ जंगल में; ये दोनों मानव समाज में और खासकर वर्तमान औद्योगिक समाज में चलते हैं और मनुष्य अपने आपसी सम्बन्धों को जल या जंगलों पर आरोपित करता है । न तो जंगल के बड्क्षे पशु निरर्थक सिर्फ अपना सामर्थ्य बताने के लिए छोटे पशुओं को मारते हैं और न बडी मछलियां निरर्थक छोटी मछलियों को निगलती चलती हैं । मनुष्य एक मात्र जीव है जो अपनी महत्ता बतलाने के लिए अपनी प्रजाति के अन्य सदस्यों को अवर्णनीय यातनाओं में रखता है और उनकी हत्या करता है या करवाता है । अगर सिंह हिरण को मारता है तो इसलिए कि हिरण सिंह का भोजन है और इसका शिकार उसके जिन्दा रहने के लिए प्रथम शर्त है । लेकिन युद्धों में करोडों लोगों के मारे जाने का क्या औचित्य हो सकता है ? मनुष्य तो मनुष्य का खाद्य पदार्थ नहीं ? शहरी संस्कृति जिसे हम सभ्यता कहते हैं, का खास अर्थ है शांतिकाल में देश के नागरिकों के बीच वर्ग युद्ध जारी रखना और कुछ अंतराल पर दूसरे देशों के लोगों के साथ अंतर्राष्ट्रीय युद्ध जारी रखना , सिर्फ इसलिए ताकि देश की भीतर व्यक्तियों के खास समूहों की विशिष्टता बनी रहे,एवं राष्ट्रों के बीच खास राष्ट्रों की विशिष्टता,जो असल में राष्ट्र के भीतर के खास वर्गों के लोग और उनके नेताओं की विशिष्टता ही होती है । इसीलिए सभ्यता ने महानता का खिताब अपने समाज के सबसे हिंसक ,युद्धखोर और क्रूर व्यक्तियों को दिया गया है । सिकन्दर महान ,फ्रेडरिक महान,पीटर महान आदि । ये व्यक्ति सचमुच में शहरी सभ्यता के प्रतीक हैं ।”

बनारस के जिलाधिकारी को यदि कल्पना के स्तर पर बडा अफसर मान लें तो रघुवीर सहाय की यह कविता उनकी याद दिलायेगी –

इस विषय पर विचार का कोई प्रश्न नहीं

निर्णय का प्रश्न नहीं

वक्तव्य – अभी नहीं

फिर से समीक्षा का प्रश्न नहीं

प्रश्न से भागता गया

उत्तर देते हुए इस तरह बडा अफसर ।

– रघुवीर सहाय

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सम्बन्धित :

‘क्या मेरे निमन्त्रण पर पटरी व्यवसाई ,नगर में आए थे?’-एक गैर जिम्मेदार जिलाधिकारी का बयान

बनारस के पटरी व्यवसाइयों का महापौर के नाम पत्र


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