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बनारस के पटरी व्यवसाइयों के प्रति  जिला प्रशासन ने एक धन-पशु (रियल एस्टेट में लिप्त ‘आज’ अखबार समूह वाले) की इच्छापूर्ति के लिए जो गैर जिम्मेदार रुख अपनाया है (देखें ) उसे समझने के लिए समतावादी चिन्तक सच्चिदानन्द सिन्हा के यह उद्धरण सहायक होंगे :

“यह मानसिकता हिटलर वाली है जो गरीब , विकलांग , असुंदर और अन्य तरह से अस्वस्तिकर लगने वाले लोगों और सबसे बढ़कर उन लोगों से जो जीवन के संघर्ष में पिछ्ड़ गए हैं छुटकारा पाना चाहती है ।अगर व्यवस्था अनुकूल हो तो यह मानसिकता गरीबों के लिए गैस चेम्बर का आयोजन करने से भी नहीं चूकेगी । बुनियादी बात यह है कि देश का अभिजात वर्ग आदमी आदमी के बीच के निहित , मानवीय सम्बन्ध से इनकार करता है और इस स्थिति पर पहुंच जाने पर किसी भी संवेदनशीलता की संभावना समाप्त हो जाती है ।”

“असल में न ‘मत्स्य न्याय’ जल में चलता है और न ‘जंगल का कानून’ जंगल में; ये दोनों मानव समाज में और खासकर वर्तमान औद्योगिक समाज में चलते हैं और मनुष्य अपने आपसी सम्बन्धों को जल या जंगलों पर आरोपित करता है । न तो जंगल के बड्क्षे पशु निरर्थक सिर्फ अपना सामर्थ्य बताने के लिए छोटे पशुओं को मारते हैं और न बडी मछलियां निरर्थक छोटी मछलियों को निगलती चलती हैं । मनुष्य एक मात्र जीव है जो अपनी महत्ता बतलाने के लिए अपनी प्रजाति के अन्य सदस्यों को अवर्णनीय यातनाओं में रखता है और उनकी हत्या करता है या करवाता है । अगर सिंह हिरण को मारता है तो इसलिए कि हिरण सिंह का भोजन है और इसका शिकार उसके जिन्दा रहने के लिए प्रथम शर्त है । लेकिन युद्धों में करोडों लोगों के मारे जाने का क्या औचित्य हो सकता है ? मनुष्य तो मनुष्य का खाद्य पदार्थ नहीं ? शहरी संस्कृति जिसे हम सभ्यता कहते हैं, का खास अर्थ है शांतिकाल में देश के नागरिकों के बीच वर्ग युद्ध जारी रखना और कुछ अंतराल पर दूसरे देशों के लोगों के साथ अंतर्राष्ट्रीय युद्ध जारी रखना , सिर्फ इसलिए ताकि देश की भीतर व्यक्तियों के खास समूहों की विशिष्टता बनी रहे,एवं राष्ट्रों के बीच खास राष्ट्रों की विशिष्टता,जो असल में राष्ट्र के भीतर के खास वर्गों के लोग और उनके नेताओं की विशिष्टता ही होती है । इसीलिए सभ्यता ने महानता का खिताब अपने समाज के सबसे हिंसक ,युद्धखोर और क्रूर व्यक्तियों को दिया गया है । सिकन्दर महान ,फ्रेडरिक महान,पीटर महान आदि । ये व्यक्ति सचमुच में शहरी सभ्यता के प्रतीक हैं ।”

बनारस के जिलाधिकारी को यदि कल्पना के स्तर पर बडा अफसर मान लें तो रघुवीर सहाय की यह कविता उनकी याद दिलायेगी –

इस विषय पर विचार का कोई प्रश्न नहीं

निर्णय का प्रश्न नहीं

वक्तव्य – अभी नहीं

फिर से समीक्षा का प्रश्न नहीं

प्रश्न से भागता गया

उत्तर देते हुए इस तरह बडा अफसर ।

– रघुवीर सहाय

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