Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Posts Tagged ‘राष्ट्रमंडल खेल’

राष्ट्रमंडल खेलों का अगला आयोजन ३ से १२ अक्टूबर २०१० तक दिल्ली में होने वाला है। जिसके लिए कई वर्षों से बड़ी धूमधाम से तैयारी चल रही हैं। भारत सरकार और दिल्ली सरकार ने इन खेलों के समय पर निर्माण कार्य पूरा करने के लिए पूरी ताकत और धन झोंक दिया है। एक अनुमान के मुताबिक इसमें कुल १ लाख करोड रूपये खर्च होंगे। कहा जा रहा है कि यह अभी तक के सबसे महंगे राष्ट्रमंडल खेल होंगे।

यह भी तब जब भारत प्रति व्यक्ति आय और मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से दुनिया के निम्नतम देशों में से एक है। विश्व भूख सुचकांक में हमारा स्थान इथोपिया से भी नीचे है व ७७ प्रतिशत के लगभग भारत की जनसंख्या २० रूपये प्रति व्यक्ति (प्रति दिन) आय पर गुजारा कर रही है।

राष्ट्रमंडल खेलों के लिए दिल्ली में बन रहे फ्लाईओवरों व पुलों की संख्या शायद सैकड़ा पार कर जाएगी। एक-एक फ्लाईओवर के निर्माण की लागत ६० से ११० करोड रूपये के बीच होगी। हजारों की संख्या में आधुनिक वातानुकूलित बसों के आर्डर दिए गए हैं। कुल ६ क्लस्टर में ११ स्टेडियम या स्पर्धा स्थल तैयार किए जा रहें हैं। यमुना की तलछटी में खेलगांव का निर्माण १५८ एकड के विशाल क्षेत्र में १०३८ करोड रूपये की लागत से हो रहा है। राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी पाने के लिए भारतीय ओलंपिक संघ ने सारे खिलाडियों को मुफ्त प्रशिक्षण, मुफ्त हवाई यात्रा व ठहरने खाने की मुफ्त व्यवस्था का प्रस्ताव दिया था।

दूसरी ओर हमारे देश में लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं। आज दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे, कुपोषित, आवासहीन व अशिक्षित लोग भारत में रह रहे हैं। गरीबों को सस्ता राशन, बिजली, पेयजल, इलाज के लिए पूरी व्यवस्था, बुढ़ापे में पेंशन और स्कूल में पूरे स्थाई शिक्षक एवं भवन व अन्य सुविधाएं देने के लिए सरकार के पास पैसा नहीं है। फिर सरकार के पास इस बारह दिनी आयोजन के लिए इतना पैसा कहां से आया?
वर्ष २०१० के राष्ट्रमंडल खेलों की वेबसाइट में इसका उद्देश्य बताया गया है हरेक भारतीय में खेलों के प्रति जागरूकता और खेल संस्कृति को पैदा करना। क्रिकेट व टेनिस के अलावा अन्य सारे खेल भारत में लंबे समय से उपेक्षित हो रहे हैं। खेलों का तेजी से बाजारीकरण व व्यवसायीकरण हुआ है। पैसे कमाने की होड़ ने खेलों में प्रतिबंधित दवाओं के सेवन, सट्टे और मैच फिक्सिंग को बढ़ावा दिया है। गांव व छोटे शहरों में खिलाडिओं की प्रतिभा को निखारने व प्रोत्साहित करने का कोई प्रयास केंद्र व राज्य सरकारें नहीं कर रही हैं। गांवों के स्कूलो में न तो खेल सामग्री है न प्रशिक्षक और न ही खेल के मैदान।

१९८२ में भारत में विशाल धनराशि खर्च करके एशियाई खेलों का आयोजन किया गया था। उसके बाद न तो देश के अंदर खेलों को विशेष बढ़ावा मिला और न ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में भारत की स्थिति में कुछ सुधार हुआ। कई सारे स्टेडियम जो उस समय बने थे वे या तो खाली पड़े रहे या दूसरे तरह को कामों जैसे शादी-विवाह में इस्तेमाल होते रहे। इसी तरह बीजिंग ओलंपिक में चीन में बने बड़े-बड़े स्टेडियम बेकार पड़े हुए हैं। और उनके रख-रखाव का खर्च निकालना मुश्किल पड रहा है। राष्ट्रमंडल खोलों के निमार्ण कार्यों में पर्यावरण नियमों व श्रम नियमों का भी उल्लघंन हो रहा है। ठेकेदारों के माध्यम से बाहर से सस्ते मजदूरों को बुलाया गया है। जिन्हें संगठित होने, बेहतर मजदूरी मांगने, कार्यस्थल पर सुरक्षा, आवास व अन्य सुविधाएं मांगने का कोई अधिकार नहीं है। इन कानूनों के उल्लंघन पर सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार दोनों चुप हैं। आखिर क्यों? मजदूरों के शोषण व पर्यावरण के विनाश के बदले ये थोड़े समय की अंतरराष्ट्रीय वाहवाही क्या हमें ज्यादा प्रिय है? इस पूरे आयोजन में किसे फायदा होने वाला है? देश के खिलाडियों को तो लगता नहीं, आम आदमी को भी नहीं। फायदा होने वाला है- बड़ी-बड़ी भारतीय व बहुराष्ट्रीय कंपनियों, ठेकेदारों व कमीशनखोर नेताओं को।
दूसरी तरफ झुग्गी बस्तियों में रहने वाली ६५ प्रतिशत जनता को शहर के दूर फेंका जा रहा है। तथाकथित सौंदर्यीकरण के नाम पर लाखों रेड़ी खोमचे वालों का व्यवसाय बंद करने की नीति बनाई गई है। दिल्ली उच्च न्यायालय के हालिया आदेश के मुताबिक दिल्ली में रह रहे अधिकांश भिखारियों को अक्तूबर २०१० के पहले उनके राज्य वापस भेजा जाएगा। इस तरह के आयोजनों में बड़ी-बड़ी कंपनियों को प्रायोजक बनाया जाता है। जिन्हें इन आयोजनों में विज्ञापनों इत्यादि से बहुत कमाने को मिलता है। मीडिया को भी भारी विज्ञापन मिलते हैं सो वो भी इनके गुणगान में लगा रहता है।

कहा जा रहा है कि इस आयोजन में बड़ी मात्रा में विदेशी पर्यटक आएंगे। पर्यटन से आय होगी। पर्यटन को बढ़ा वा मिलेगा। प्रश्न ये है कितनी आय होगी? और उसके लिए हमारे देश के संसाधनों का दुरूपयोग लोगों की बुनियादी जरूरतों को नजरंदाज करके करना कितना जायज है? क्या इस विशाल खर्चे का १० प्रतिशत भी टिकटों की बिक्री और पर्यटन की आय से मिलेगा? हमें आजाद हुए ६२ साल हो चुके हैं। लेकिन हमने गुलामी को ऐसे आत्मसात कर लिया है कि कोई ये प्रश्न ही नहीं पूछता की आखिर राष्ट्रमंडल खेल है क्या? राष्ट्रमंडल उन देशों का समूह है जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रहें हैं। इन खेलों की शुरूआत १९१८ में ‘साम्राज्य के उत्सव’ के रूप में हुई थी। फिर आज जब हम एक स्वतंत्र व सार्वभौम देश हैं हम क्यों इसमें शामिल हैं? गुलामी के प्रतीकों को ढोने में राष्ट्रगौरव व राष्ट्रसम्मान का अनुभव करते है?

एक झूठी राष्ट्रीयता व राष्ट्र भावना को फैलाकर लोगों को बहलाने का व जनता का ध्यान मूल मुद्दों से ध्यान हटाने का कार्य हमारी सरकार कर रही है। इस आयोजन का उद्देश्य है भारत को आर्थिक माहशक्ति के रूप में पेश करना। जिससे लोग अपनी हकीकत व असलियत को भूलकर झूठे राष्ट्रीय गर्व व जय-जयकार में लग जाएं।

राष्ट्रमंडल खेल इस देश की गुलामी, संसाधनों की लूट, बरबादी, विलासिता और गलत खेल संस्कृति का प्रतीक है। हमारे देश की सरकार को कोई अधिकार नहीं है कि वो देश के संसाधनों को गुलामी और ऐय्याशी को प्रतिष्ठित करने वाले ऐसे आयोजनों में लूटे और लुटाए।
विद्यार्थी युवजन सभा ने तय किया है कि वो पूरी ताकत से इस राष्ट्रविरोधी, जन-विरोधी आयोजन का विरोध करेगी। इसी सिलसिले में २३ फरवरी २०१० को दिल्ली में एक रैली व धरने का आयोजन किया गया है। आपसे गुजारिश है आप भी इसमें शामिल हों।

निवेदकः-

विद्यार्थी युवजन सभा

६१२२, सिद्धिकी बिल्डिंग, बाड़ा हिंदूराव, दिल्ली-११०००६.

सम्बन्धित लेख :

खेल नीति
क्या एशियाई खेल वास्तव में खेल हैं ?

हिटलर और खेल

खेल और व्यापार

सरकार और खेल

साम्यवादी रूस और खेल

राष्ट्रमण्डल खेल : कैसा इन्फ़्रास्ट्रक्चर ? किसके लिए – सुनील
कॉमनवेल्थ गेम्स : गुलामी और लूट का तमाशा : सुनील

Advertisements

Read Full Post »

पिछले भाग से आगे :

यह कहा जा रहा है कि राष्ट्रमंडल खेलों के लिए जो इन्फ्रास्ट्रक्चर बन रहा है, वह बाद में भी काम आएगा। लेकिन किनके लिए ? निजी कारों को दौड़ाने और हवाई जहाज में उडने वाले अमीरों के लिए तो दिल्ली विश्व स्तरीय शहर बन जाएगा। (वह भी कुछ समय के लिए, क्योंकि निजी कारों की बढती संख्या के लिए तो सड़कें और पार्किंग की जगहें फिर छोटी पड़ जाएंगी।) लेकिन तब तक दिल्ली के ही मेहनतकश झुग्गी झोपड़ी वासियों और पटरी-फेरी वालों को दिल्ली के बाहर खदेड़ा जा चुका होगा। उनको हटाने और प्रतिबंधित करने की जो मुहिम पिछले कुछ समय से चल रही है, उसके पीछे भी राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन है। किन्तु सवाल यह भी है कि पूरे देश का पैसा खींचकर दिल्ली के अमीरों के ऐशो-आराम के लिए लगाने का क्या अधिकार सरकार को है ? देश के गांवो और पिछड़े इलाकों को वंचित करके अमीरों-महानगरों के पक्ष में यह एक प्रकार का पुनर्वितरण हो रहा है।

एक दलील यह है कि राष्ट्रमंडल खेलों के सफल आयोजन के बाद भारत ओलंपिक खेलों की मेजबानी का दावा कर सकेगा और यह इन्फ्रास्ट्रक्चर उसके काम आएगा। लेकिन यह तो और बड़ा घपला व अपराध होगा। कई गुना और ज्यादा खर्च होगा, और ज्यादा गरीबों को खदेड़ा जाएगा एवं वंचित किया जाएगा। चीन में बीजिंग ओलंपिक के मौके पर यही हुआ। चीन में तो तानाशाही है, क्या भारत में भी हम वहीं करना चाहेंगे ?
चीन ने बीजिंग ओलंपिक के मौके पर विशाल राशि खर्च करके बड़े-बड़े स्टेडियम बनाए, वे बेकार पड़े हैं। उनके रखरखाव का खर्च निकालना मुद्गिकल हो रहा है और उनको निजी कंपनियों को देकर किसी तरह काम चलाने की कोशिश हो रही है।  उसी तरह सफेद हाथी पालने की तैयारी हम क्यों कर रहे हैं ?
राष्ट्रमंडल खेलों के पक्ष में एक दलील यह दी जा रही है कि बड़ी संखया में विदेशों से दर्शक आएंगे और पर्यटन से भी आय होगी। पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन जितना विशाल खर्च हो रहा है, उसका १० प्रतिशत भी टिकिटों की बिक्री और पर्यटन की आय से नहीं निकलेगा। सवाल यह भी है कि विदेशी दर्शकों और पर्यटकों के मनोरंजन के खातिर हम अपने देश की पूरी प्राथमिकताएं बदल रहे हैं और देश के लोगों की ज्यादा जरुरी जरुरतों को नजरअंदाज कर रहे हैं। क्या यह जायज है ?

गलत खेल संस्कृति

यह भी दलील दी जा रही है कि इस आयोजन से देश में खेलों को बढ़ावा मिलेगा। यह भी एक भ्रांति है। उल्टे, ऐसे आयोजनों से बहुत महंगे, खर्चीले एवं हाई-टेक खेलों की एक नई संस्कृति जन्म ले रही है, जो खेलों को आम जनता से दूर ले जा रही है और सिर्फ अमीरों के लिए आरक्षित कर रही है। आज खर्चीले कोच, विदेशी प्रशिक्षण, अत्याधुनिक स्टेडियम और महंगी खेल-सामग्री के बगैर कोई खिलाड़ी आगे नहीं बढ  सकता। पिछले ओलिंपिक में स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाला भारतीय निशानेबाज अभिनव बिन्द्रा एक उदाहरण है, जिसके परिवार ने खुद अपना शूटिंग रेन्ज बनाया था और उसे यूरोप में प्रशिक्षण दिलवाया था। उसके परिवार ने एक करोड  रु. से ज्यादा खर्च किया होगा। इस देश के कितने लोग इतना खर्च कर सकते हैं ?
इन खेलों और उससे जुड़े़ पैसे व प्रसिद्धि ने एक अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है, जिसमें प्रतिबंधित दवाओं, सट्‌टे और मैच-फिक्सिंग का बोलबाला हो चला है जबरदस्त व्यवसायीकरण  के साथ खेलों में खेल भावना भी नहीं रह गई है और खेल साधारण भारतवासी से दूर होते जा रहे हैं। टीवी चैनलों ने भारतीयों को खेलने के बजाय टीवी के परदे पर देखना, खिलाडियों के फैन बनना, ऑटोग्राफ लेना आदि जरुर सिखा दिया है। व्यापक दीवानगी पैदा करके टीवी चैनल और विज्ञापनदाता कंपनियों की खूब कमाई होती है। मशहूर खिलाड़ी विज्ञापनों में उनके प्रचारक बन जाते हैं। अब तो खेल आयोजनों में चियर गर्ल्स और ड्रिंक्स गर्ल्स के रुप में इनमें भौंडेपन, अश्लीलता और नारी की गरिमा गिराने का नया अध्याय शुरु हुआ है। जनजीवन के हर क्षेत्र की तरह खेलों का भी बाजारीकरण हो रहा हैं, जिससे अनेक विकृतियां पैदा हो रही हैं। क्रिकेट और टेनिस जैसे कुछ खेलों में तो बहुत पैसा है। इनमें जो खिलाड़ी प्रसिद्धि पा लेते हैं, वे मालामाल हो जाते हैं।  लेकिन हॉकी, फुटबाल, वॉलीबाल, कबड्‌डी, खो-खो, कुश्ती, दौड -कूद जैसे पारंपरिक खेल उपेक्षित होते गए हैं। इनमें चोटी के खिलाड़ि यों की भी उपेक्षा व दुर्दशा के किस्से बीच-बीच में आते रहते हैं। हमारे खेलों का एक पूंजीवादी और औपनिवेशिक चरित्र बनता जा रहा है। सारे अन्य खेलों की कीमत पर क्रिकेट छा गया है। यह मूलतः अंग्रेजों का खेल है और दुनिया के उन्हीं मुट्‌ठी भर देशों में खेला जाता है जहां अंग्रेज बसे हैं या जो अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं।
भारत ने १९८२ में एशियाई खेलों का आयोजन किया था और उसमें विशाल धनराशि खर्च की थी। लेकिन उसके बाद न तो देश के अंदर खेलों को विशेष बढ़ावा मिला और न अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में भारत की स्थिति में कुछ सुधार हुआ। पदक तालिका में १०० करोड  से ज्यादा आबादी के इस देश का स्थान कई ४-५ करोड  के देशों से भी नीचे रहता है। इस अनुभव से भी हम ऐसे आयोजनों की व्यर्थता को समझ सकते हैं (२)

राष्ट्रमंडल खेलों के बजाय इसका आधा पैसा भी देश के गांवों और कस्बों में खेल-सुविधाओं के प्रदाय और निर्माण में, देहाती खेल आयोजनों में और देश के  बच्चों का कुपोषण दूर करने  में लगाया जाए तो देश में खेलों को कई गुना ज्यादा बढ़ावा मिलेगा। खेलों में छाये भ्रष्टाचार, पक्षपात और असंतुलन को भी दूर करने की जरुरत है। तभी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में भारत की दयनीय हालत दूर होगी और वह पदक तालिका में ऊपर उठ सकेगा।

प्रतिस्पर्धा में खजाना लुटाया

कुछ साल पहले २००७ में जब भारतीय ओलंपिक संघ ने २०१४ के एशियाई खेलों की मेजबानी पाने के की असफल कोशिश की थी, तब स्वयं भारत के तत्कालीन खेल मंत्री श्री मणिशंकर अय्यर ने इसकी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि भारत के करोड़ों वंचित बच्चों, किशोरों और युवाओं को खेल-सुविधाएं न देकर इस तरह के अंतरराष्ट्रीय आयोजनों से कुछ नहीं होगा और सिर्फ भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने के लिए इतनी फिजूलखर्ची उचित नहीं है। किन्तु श्री अय्यर की बात सरकार में बैठे अन्य लोगों को पसंद नहीं आई और जल्दी ही खेल मंत्रालय उनसे ले लिया गया।
राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी भी भारत ने जिस तरह से पाई, वह गौरतलब और शर्मनाक है। वर्ष २०१० की मेजबानी के लिए कनाडा के हेमिल्टन शहर का भी दावा था। कनाडा को प्रतिस्पर्धा से बाहर करने के लिए भारतीय ओलंपिक संघ ने सारे खिलाडि यों के मुफ्त प्रशिक्षण पर ७० लाख डॉलर (३३ करोड  रु. लगभग) का खर्च अपनी तरफ से करने का प्रस्ताव दिया। इतना ही नहीं सारे खिलाड़ियों की मुफ्त हवाई यात्रा और उनके ठहरने-खाने की मुफ्त व्यवस्था का प्रस्ताव भी उसने दिया, जो इसके पहले नहीं होता था। जो खर्च कनाडा जैसा अमीर देश नहीं कर सकता, वे खर्च भारत जैसा गरीब देश उदारता से कर रहा है।

असली एजेण्डा

वर्ष २०१० के राष्ट्रमंडल खेलों की वेबसाईट में इसका उद्देश्य बताया गया है। हरेक भारतीय में खेलों के प्रति जागरुकता और खेल संस्कृति को पैदा करना। आयोजकों ने इसके साथ की तीन लक्ष्य सामने रखे हैं – अभी तक का सबसे बढिया राष्ट्रमंडल खेल आयोजन, दिल्ली को दुनिया की मंजिल (ग्लोबल डेस्टिनेशन) के रुप में प्रोजेक्ट करना और भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रुप में पेश करना। बाकी तो महज लफ्फाजी है, किन्तु इन अंतिम बातों में ही इस विशाल खर्चीले आयोजन का भेद खुलता है। भारत की सरकारें विदेशी पूंजी को देद्गा में किसी भी तरह, किसी भी कीमत पर बुलाने के लिए बेचैन है। विदेशी कंपनियों और उनके मालिकों-मैनेजरों-प्रतिनिधियों को आने-ठहरने-घूमने के लिए अमीर देशों जैसी ही सुविधाएं चाहिए, जिसे गलत ढंग से ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ कहा जाता है। राष्ट्रमंडल खेलों ने भारत सरकार को दिल्ली जैसे महानगरों में अमीरों की सुविधाओं पर देश का विशाल पैसा खर्च करने का बहाना व मौका दे दिया, जो अन्यथा इस लोकतांत्रिक देश में आसान नहीं होता। भारत को ‘आर्थिक महा्शक्ति’ के रुप में पेश करना भी इसी एजेण्डा का हिस्सा है, जिससे देश के लोग अपनी असलियतों और हकीकत को भूलकर झूठे राष्ट्रीय गौरव और जयजयकार में लग जाएं। राष्ट्रमंडल खेलों से भारतीय शासकों के इस अभियान में मदद मिलती है। चीन सरकार ने भी बीजिंग ओलम्पिक का उपयोग देश में उमड़ रहे जबरदस्त असंतोष को ढकने व दबाने तथा आम नागरिको को एक झूठी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा में भरमाने को किया। (स्वयं चीन सरकार की जानकारी के मुताबिक वहां एक वर्ष में एक लाख से ज्यादा स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शन हुए हैं।) भारत सरकार उसी राह पर चलने की कोशिश कर रही है।

लब्बो-लुआब यह है कि राष्ट्रमंडल खेल इस देश की गुलामी, संसाधनों की लूट, बरबादी, विलासिता और गलत खेल संस्कृति के प्रतीक हैं। सभी देशभक्त लोगों को पूरी ताकत से इसके विरोध में आगे आना चाहिए। विद्यार्थी युवजन सभा और समाजवादी जन परिषद्‌ ने तय किया है कि पूरी ताकत से इस राष्ट्र-विरोधी एवं जन विरोधी आयोजन का विरोध करेंगे। आप भी इसमें शामिल हों।
यह देश अब अंग्रेज साम्राज्य का हिस्सा नहीं है। न ही यह देश मनमोहन सिंह, शीला दीक्षित और सुरेद्गा कलमाड़ी का है। उन्हें दे्श को लूटने, लुटाने और बरबाद करने का कोई हक नहीं है। यह दे्श हमारा है। यहां रहने वाले करो्ड़ों मेहनतकश लोगों का है। हम किसी को इस देश के संसाधनों को लूटने-लुटाने, अय्य्याशी करने और गुलामी को प्रतिष्ठित करने की इजाजत नहीं देंगे।

————००———-

फुटनोट :-    १.    अक्टूबर २००९ में मशहूर टेनिस खिलाड़ी और आठ बार के ग्रांड स्लैम चैंपियन आन्द्रे अगासी की आत्मकथा में की गई इस स्वीकारोक्ति ने खेल- जगत में खलबली मचा दी कि वह एक प्रतिबंधित दवा- क्रिस्टल मैथ- का सेवन करता था। एक बार जांच में पकड़ाने पर उसने झूठ बोल दिया था। (द हिन्दू, २९ अक्टूबर २००९) १५ दिसंबर २००९ को लोकसभा में खेलमंत्री ने बताया कि पिछले वर्ष से २४ खिलाडियों पर प्रतिबंधित दवाओं के सेवन का दोषी पाए जाने पर दो वर्ष की पाबंदी लगायी गयी है, ११ का मामला अभी लंबित है तथा १३ नए मामले सामने आए हैं। ( पत्रिका, भोपाल, १६ दिसंबर २००९)

२.    इसके बाद १५ दिसंबर २००९ को खेल राज्य मंत्री प्रकाश बाबू पाटील ने भी लोकसभा में स्वीकार किया कि बीजिंग ओलंपिक में भारतीय खिलाडियों के प्रदर्शन में कुछ सुधार हुआ है, किन्तु यह अभी भी संतोषजनक नहीं है। इसका कारण संगठित खेल अधोसंरचना तक पहुंच की कमी और खासतौर से ग्रामीण इलाकों में प्रतियोगिताओं की कमी है। इन कमियों के कारण हमारे पास प्रतिभावान खिलाडियों का सीमित भंडार है। (पत्रिका, भोपाल,१६ दिसंबर २००९)

[ सुनील समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं । उनका पता ग्राम/पोस्ट- केसला,वाया इटारसी , जि. होशंगाबाद,म.प्र. है । ]

Read Full Post »

आजाद भारत के लिए यह एक शर्म का दिन था। २९ अक्टूबर २००९ को आजाद और लोकतांत्रिक भारत की निर्वाचित राष्ट्रपति सुश्री प्रतिभा पाटील अगले राष्ट्रमंडल खेलों के प्रतीक डंडे ब्रिटेन की महारानी से लेने के लिए स्वयं चलकर लंदन में उनके महल बकिंघम पैलेस में पहुंची थी। मीडिया को इसमें कुछ भी गलत नहीं लगा। वह तो इसी से अभिभूत था कि भारतीय राष्ट्रपति को सलामी दी गई तथा शाही किले में ठहराया गया। किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि ब्रिटिश साम्राज्य के समाप्त होने और भारत के आजाद होने के ६२ वर्ष बाद भी हम स्वयं को ब्रिटिश सिंहासन के नीचे क्यों मान रहे हैं। साम्राज्य की गुलामी की निशानी को हम क्यों ढो रहे हैं ?

राष्ट्रीय शर्म का ऐसा ही एक अवसर कुछ साल पहले आया था, जब भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में मानद उपाधि मिलने के बाद दिए अपने भाषण में अंग्रेजों की गुलामी की तारीफों के पुल बांधे थे। उन्होंने कहा था कि भारत की भाषा, शास्त्र, विश्वविद्यालय, कानून, न्याय व्यवस्था, प्रशासन, किक्रेट, तहजीब सब कुछ अंग्रेजों की ही देन है। किसी और देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ऐसा कह देता तो वहां तूफान आ जाता। लेकिन यहां पत्ता भी नहीं खड़का। ऐसा लगता है कि गुलामी हमारे खून में ही मिल गई है। राष्ट्रीय गौरव और स्वाभिमान की बातें हम महज किताबों और भाषणों में रस्म अदायगी के लिए ही करते हैं।

साम्राज्य के खेल

३ से १४ अक्टूबर २०१० तक दिल्ली में होने वाले जिन ब्रिटिश राष्ट्रमंडल खेलों के लिए भारत सरकार और दिल्ली सरकार दिन-रात एक कर रही है, पूरी ताकत व अथाह धन झोंक रही है, वे भी इसी गुलामी की विरासत है। इन खेलों में वे ही देश भाग लेते हैं जो पहले ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहे हैं। दुनिया के करीब १९० देशों में से महज ७१ देश इसमें शामिल होंगे। इन खेलों की शुरुआत १९१८ में ‘साम्राज्य के उत्सव’ के रुप में हुई थी। राष्ट्रमंडल खेलों की संरक्षक ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय है और उपसंरक्षक वहां के राजकुमार एडवर्ड हैं। हर आयोजन के करीब १ वर्ष पहले महारानी ही इसका प्रतीक डंडा आयोजक देश को सौंपती हैं और इसे ‘महारानी डंडा रिले’ कहा जाता है। इस डंडे को उन्हीं देशों में घुमाया जाता है, जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य में रहे हैं। यह रैली हर साल बकिंघम पैलेस से ही शुरु होती है।

पूरे देश का पैसा दिल्ली में

साम्राज्य और गुलामी की याद दिलाने वाले इन खेलों के दिल्ली में आयोजन की तैयारी कई सालों से चल रही है। ऐसा लगता है कि पूरी दिल्ली का नक्शा बदल जाएगा। कई स्टेडियम, खेलगांव, चौड़ी सडकें , फ्लाईओवर, रेल्वे पुल, भूमिगत पथ, पार्किंग स्थल और कई तरह के निर्माण कार्य चल रहे हैं। पर्यावरण नियमों को ताक में रखकर यमुना की तलछटी में १५८ एकड  में विशाल खेलगांव बनाया जा रहा है, जिससे इस नदी और जनजीवन पर नए संकट पैदा होंगे।

इस खेलगांव से स्टेडियमों तक पहुंचने के लिए विशेष ४ व ६ लेन के भूमिगत मार्ग और विशाल खंभों पर ऊपर ही चलने वाले मार्ग बनाए जा रहे हैं। दिल्ली की अंदरी और बाहरी, दोनों रिंगरोड को सिग्नल मुक्त बनाया जा रहा है, यानी हर क्रॉसिंग पर फ्लाईओवर होगा। दिल्ली में फ्लाईओवरों व पुलों की संखया शायद सैकड़ा पार हो जाएगी। एक-एक फ्लाईओवर की निर्माण की लागत ६० से ११० करोड  रु. के बीच होती है। उच्च क्षमता बस व्यवस्था के नौ कॉरिडोर बनाए जा रहे हैं। हजारों की संख्या में आधुनिक वातानुकूलित बसों के ऑर्डर दे दिए गए हैं, जिनकी एक-एक की लागत सवा करोड  रु. से ज्यादा है।

राष्ट्रमंडल खेलों के निर्माण कार्यों के लिए पर्यावरण के नियम ही नहीं, श्रम नियमों को भी ताक में रख दिया गया है। ठेकेदारों के माध्यम से बाहर से सस्ते मजदूरों को बुलाया गया है, जिन्हें संगठित होने, बेहतर मजदूरी मांगने, कार्यस्थल पर सुरक्षा, आवास एवं अन्य सुविधाओं के कोई अधिकार नहीं है। एशियाड १९८२ के वक्त भी मजदूरों का शोषण हुआ था, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था। किन्तु आज श्रम एवं पर्यावरण कानूनों के खुले उल्लंघन पर सरकार एवं सर्वोच्च न्यायालय दोनों चुप हैं, क्योंकि यह आयोजन एक झूठी ‘राष्ट्रीय प्रतिष्ठा’ का सवाल बना दिया गया है।

दिल्ली मेट्रो का तेजी से विस्तार हो रहा है और २०१० यानी राष्ट्रमंडल खेलों तक यह दुनिया का दूसरा सबसे लंबा मेट्रो रेल नेटवर्क बन जाएगा। तेजी से इसे बनाने के लिए एशिया में पहली बार एक साथ १४ सुरंग खोदनें वाली विशाल विदेशी मशीनें इस्तेमाल हो रही हैं। इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्‌डे पर ९००० करोड़ रुपए की लागत से नया टर्मिनल और रनवे बनाया जा रहा है ताकि एक घंटे में ७५ से ज्यादा उड़ानें भर सकें। इस हवाई अड्‌डे को शहर से जोड ने के लिए ६ लेन का हाईवे बनाया जा रहा है और मेट्रो से भी जोड़ा जा रहा है।
मात्र बारह दिन के राष्ट्रमंडल खेलों के इस आयोजन पर कुल खर्च का अनुमान लगाना आसान नहीं है, क्योंकि कई विभागों और कई मदों से यह खर्च हो रहा है। सरकार के खेल बजट में तो बहुत छोटी राशि दिखाई देगी। उदाहरण के लिए, हाई-टेक सुरक्षा का ही ठेका एक कंपनी को ३७० करोड  रु. में दिया गया। किन्तु यह उस खर्च के अतिरिक्त होगा, जो सरकारी पुलिस, यातायात पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती के रुप में होगा और सरकारी सुरक्षा एजेन्सियां स्वयं विभिन्न उपकरणों की विशाल मात्रा में खरीदी करेंगी।
जब सबसे पहले दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन की बात चलाई गई थी तो कहा गया था कि इसमें २०० करोड  रु. खर्च होंगे। जब २०१० की मेजबानी दिल्ली को दे दी गई, तो बताया गया कि ८०० करोड  रु. खर्च होंगे। फिर इसे और कई गुना बढ़ाया गया। इसमें निर्माण कार्यों का विशाल खर्च नहीं जोड़ा गया और जानबूझकर बहुत कम राशि बताई गई। ‘तहलका’ पत्रिका के १५ नवंबर २००९ के अंक में अनुमान लगाया गया है कि राप्ट्रमंडल खेलों के आयोजन पर कुल मिलाकर ७५,००० करोड  रु. खर्च होने वाला है। इसमें से लगभग ६०,००० करोड  रु. दिल्ली में इन्फ्रास्ट्रक्चर यानी बुनियादी ढांचा बनाने पर खर्च होगा। एक वर्ष पहले इंडिया टुडे ने अनुमान लगाया था कि राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन पर कुल मिलाकर ८०,००० करोड  रु. खर्च होंगे। अब यह अनुमान और बढ  जाएगा।   कहा जा रहा है कि ये अभी तक के सबसे महंगे राष्ट्रमंडल खेल होंगे। ये सबसे महंगे खेल एक ऐसे देश में होगें, जो प्रति व्यक्ति आय और मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से दुनिया के निम्नतम दे्शों में से एक है। हर ४ वर्ष पर होने वाले राप्ट्रमंडल खेल अक्सर अमीर देशों में ही होते रहे हैं। सिर्फ जमैका ने १९६६ और मलेशिया ने १९९८ में इनके आयोजन की हिम्मत की थी। लेकिन तब आयोजन इतना खर्चीला नहीं था। भारत से बेहतर आर्थिक हालात होने के बावजूद मलेशिया ने उस राशि से बहुत कम खर्च किया था, जितना भारत खर्च करने जा रहा है।

देश के लिए क्या ज्यादा जरुरी है ?

सवाल यह है भारत जैसे गरीब देश में साम्राज्यवादी अवशेष के इस बारह-दिनी तमाशे पर इतनी विशाल राशि खर्च करने का क्या औचित्य है ? देश के लोगों की बुनियादी जरुरतें पूरी नहीं हो रही हैं। आज दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे, कुपोषित, आवासहीन और अशिक्षित लोग भारत में रहते हैं। इलाज के अभाव में मौतें होती रहती है। गरीबों को सस्ता राशन, पेयजल, इलाज की पूरी व्यवस्था, बुढ़ापे की पेन्शन और स्कूलों में पूरे स्थायी शिक्षक एवं भवन व अन्य सुविधाएं देने के लिए सरकार पैसे की कमी का रोना रोती है और उनमें कटौती करती रहती है। निजी-सरकारी भागीदारी और निजीकरण के लिए भी वह यही दलील देती है कि उसके पास पैसे की कमी है। फिर राष्ट्रमंडल खेलों के इस तमाशे के लिए इतना पैसा कहां से आ गया ? इस एक आयोजन के लिए उसका खजाना कैसे खुला हो जाता है और वह इतनी दरियादिल कैसे बन जाती है ? सरकार का झूठ और कपट यहीं पकड़ा जाता है।

देश के ज्यादातर स्कूलों में पूरे शिक्षक और पर्याप्त भवन नहीं है। प्रयोगशालाओं , पुस्तकालयों और खेल सुविधाओं का तो सवाल ही नहीं उठता। पैसा बचाने के लिए विश्व बैंक के निर्दे्श पर सरकारों ने स्थायी शिक्षकों की जगह पर कम वेतन पर, ठेके पर, अस्थाई पैरा – शिक्षक लगा लिए हैं। संसद में पारित शिक्षा अधिकार कानून ने भी इस हालत को बदलने के बजाय चतुराई से ढकने का काम किया है। उच्च शिक्षा के बजट में भी कटौती हो रही है तथा कॉलेजों और विद्गवविद्यालयों में ‘स्ववित्तपोषित’ पाठ्‌यक्रमों पर जोर दिया जा रहा है। इसका मतलब है गरीब एवं साधारण परिवारों के बच्चों को शिक्षा के अवसरों से वंचित करना।
भारत सरकार देश के सारे गरीबों को सस्ता रा्शन, मुफ्त इलाज, मुफ्त पानी, पेन्शन और दूसरी मदद नहीं देना चाहती है। एक झूठी गरीबी रेखा बनाकर विशाल आबादी को किसी भी तरह की मदद व सुविधाओं से वंचित कर दिया गया है। सवाल यह है कि देश की प्राथमिकताएं क्या हो ? देश के लिए क्या ज्यादा जरुरी है – देश के सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा देना, सबको इलाज, सबको भोजन, सबको पीने का पानी, सिंचाई आदि मुहैया कराना या फिर भयानक फिजूलखर्ची वाले राष्ट्रमंडल खेलों जैसे आयोजन ? क्या यह झूठी शान और विलासिता नहीं है।
भारत की सरकारें इसी तरह हथियारों, फौज, अंतरिक्ष अभियानों, अणुबिजलीघरों जैसी कई झूठी शान वाली गैरजरुरी चीजों पर इस गरीब देश के संसाधनों को बरबाद करती रहती हैं। इसी तरह १९८२ में दिल्ली में एशियाई खेलों के आयोजन में वि्शाल फिजूलखर्च किया गया था। दिल्ली में फ्लाईओवर बनाने का सिलसिला उसी समय शुरु हुआ। दिल्ली में कई नए पांच सितारा होटलों को इजाजत भी उस समय दी गई थी, उन्हें सरकारी जमीन और मदद दी गई थी और विलासिता व अय्याशी की संस्कृति को बढ़ावा दिया गया था। राप्ट्रमंडल खेलों से एक बार फिर नए होटलों को इजाजत व मदद देने का बहाना सरकार में बैठे अमीरों को मिल गया है।

सारे नेता, सारे प्रमुख दल, बुद्धिजीवी और मीडिया झूठी शान वाले इस आयोजन की जय-जयकार में लगे हैं। विपक्षी नेता और मीडिया आलोचना करते दिख रहे हैं तो इतनी ही कि निर्माण कार्य समय पर पूरे नहीं होंगे। लेकिन इसके औचित्य पर वे सवाल नहीं उठाते। इस तमाशे में ठेकेदारों, कंपनियों तथा कमीशनखोर नेताओं की भारी कमाई होगी। उनकी पीढ़ियां तर जाएगी। विज्ञापनदाता देशी-विदेशी कंपनियों की ब्रिकी बढ़ेगी। मीडिया को भी भारी विज्ञापन मिलेंगे। घाटे में सिर्फ देश के साधारण लोग रहेंगे। यह लूट और बरबादी है।

( जारी )

अगली किश्त में – कैसा इन्फ़्रास्ट्रक्चर ? किसके लिए ?

Read Full Post »

%d bloggers like this: