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Posts Tagged ‘भवानी प्रसाद मिश्र’

कल तक जिन्हें आप ढंग से पहचानते भी न हो और वे आपके चिरपरिचित परिवारजन बन जाएं – आप जीवन में ऐसे कितने लोगों से मिले हैं? हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र की बाबत मेरे साथ ऐसा ही हुआ था। हमेशा की अपनी भागमभाग में शहर (वाराणसी) के बाहर गया हुआ था। वाराणसी लौटा तब उत्तरा ने बताया ‘भवानी बाबू आए हैं। टिके तो मेहमान-घर में हैं लेकिन बच्चों के आग्रह पर हमारे धर भोजन करना स्वीकार किया है। अभी चाय के वक्त आ पहुंचेगे।’ तभी, ‘दीदी, मैं पहुंच गया हूँ। अरे, आज भैया भी आ गए।’ कहते हुए भवानी बाबू आ पहुंचे। हम दोनों उन से दस बरस छोटे तो होगे ही, परन्तु उन्होंने उत्तरा को ‘दीदी’ कहने का संबंध बना लिया था।
भवानी बाबू के विषय में बहुत सुन रखा था किन्तु निकट आने का संयोग ही नहीं बना था। वैसे हम दोनों ही वर्धा-परिवार के थे। परन्तु एक दूजे के परिवार के बने वाराणसी में ही। जब वे वर्धा के महिला आश्रम में थे ,तब मैं वहां न था । जब मैं वहा था, तब वे न थे। अनेक मित्रों से उनके बारे में सुना था। परन्तु उनकी स्नेहमयी दृष्टि में सरोबार होने का यह पहला मौका था। सर्व सेवा संघ के प्रकाशन के काम से वे वाराणसी आए होंगे किन्तु इस काम से इतर बतियाने के हमारे बीच पर्याप्त विषय थे। उनकी हिन्दी साहित्य की दुनिया के अलावा पहली बात तो यह थी कि उनकी और मेरी दुनिया समूची एक ही थी। उसमें भी हम दोनों के प्रिय विषय थे -बापू ।फिर प्रथम परिचय का संकोच कितनी देर टिका रहता?
एक शाम मेरे दामाद ने कहा कि भवानीबाबू को सुनना है- थकान के बावजूद हजारों की मेदिनी को मंत्रमुग्ध कर देने वाले भवानी बाबू कुटुंब के दो चार लोगों के समक्ष कविता पाठ करने के लिए तैयार हो गए। ‘भला बेटी दामाद कहे और मैं कैसे इनकार करूँ?’
भवानीबाबू एक बार शुरू करे फिर उन्हें दूसरा सुनाने का आग्रह करने की जरूरत नहीं पड़ती थी। एक के बाद दूसरी कविता निकलती जाती थी,…….. पंचतंत्र की कथाओं की भांति। कई बार तो एक कविता कब पूरी हुई और दूसरी कब शुरू हुई इसका श्रोता को भान नहीं रहता। मेघाणी भाई (गुजराती के प्रख्यात कवि झवेरचंद मेघाणी) के अलावा इतनी अधिक स्वरचित रचनाओं को कंठस्थ रखने वाले किसी अन्य कवि से मैं तो कभी नहीं मिला। जब वे काव्य-पाठ करते तब मानो श्रोता उन पर उपकार कर रहे हे हों वैसे कृतज्ञ दृष्टि से उन्हें देख रहे होते थे। परन्तु ज्यों-ज्यों गीतों में वे गहरे उतरते त्यों-त्यों उनका पाठ, स्वान्तः सुखाय हो जाता। बावजूद इसके श्रोताओं को भी वे सरोबार कर देते थे। कई बार तो उनका छंद श्रोताओं को साथ गाने की प्रेरणा दे जाता था।
चलो गीत गाओ चलो गीत गाओ।
कि गा गा के दुनिया को सर पर उठाओ

अभागों की टोली अगर गा उठेगी
तो दुनिया पे दहशत बड़ी छा उठेगी
सुरा-बेसुरा कुछ न सोचेंगे गाओ
कि जैसा भी सुर पास में है चढ़ाओ ।

तथा
अगर गा न पाये तो हल्ला करेंगे
इस हल्ले में मौत आ गयी तो मरेंगे
कई बार मरने से जीना बुरा है
कि गुस्से को हर बार पीना बुरा है
बुरी जिन्दगी को न अपनी बचाओ
कि इज्जत के पैरों पे इसको चढ़ाओ ।
मुझे मालूम था कि भवानी बाबू पर एकाधिक बार हृदय रोग का आघात हो चुका था। हृदय के कार्य की सहायता हेतु ‘गतिसाधक’ (पेसमेकर) भी लगाया गया था। अतएव मैंने अधिक गाने का आग्रह न करने के लिए बच्चों को समझाया। इस पर वे ही बोले ‘‘गाने के बल पर तो मैं जी रहा हूँ। उसमें थकान का प्रश्न ही कहा?’’
एक सुगंध के बल पर
जी रहा हूं मैं
सुगंध यह कदाचित
गर्भ में समझे हुए
परिवेशों की है –
छूटे घने केशों की है……

और इतनी घनी है
कि धूल और धुएं के बीच
जैसी की तैसी बनी है
बरसों से मैं
धूल और धुएं के शहरों में हूं
लगता है मगर
कमल और पारिजात की
बहती हुई बहारों में हूं
सद्यस्नात किसी
देश के मन की तरह
स्नेहसे सहलाये हुए
किसी तन की तरह
खुश हूं और इल्म इतना
कि बोझ नहीं लगता प्राणों को
बीते हुए तमाम दिनों का
आए हुए नितांत अजाने
भीषण पल का ………

जानी अनजानी लहरों में
धुएं और धूल के भी शहरों में
मैं इस सुगंध के बल पर जी रहा हूं
और चाहता हूं कि सब इसके बल पर जीएं…
क्योंकि जानता हूं मैं
सबने अपने प्रारंभिक परिवेशों में
सांद्र और निबिड इन
गंधों को पीया है ।

और फिर भी जाने क्यों
भूल जा कर इन्हें केवल धूल
और धुएं को जीया है ।

आत्मा को
सिवा आदिम सुगंधों के
कौन बचा सकता है
धूल और धुएं में
डूबने से ।

इन आदिम सुगंधों को पीते-पीते भवानीबाबू जीये। जीये यानि जीवन का क्षण-क्षण जीए। सात-सात बार उन पर हृदय रोग का आघात हुआ। परन्तु खुद तो मानो मरणोत्तर जीवन जी रहे हों वैसी मस्ती में थे ‘ अरे भाई, मैं तो किसी दूसरी बीमारी के लिए अस्पताल में पड़ा था, तब ही मुझ पर हृदय रोग का पहला हमला हुआ। डॉक्टर भी न समझे और मैं भी।’ परन्तु फिर मानो नया जन्म लिया हो वैसी ताजगी महसूस की। हफ्ते भर के सहवास से भवानी बाबू हमारे परिवार के सदस्य ही बन गए। कुटुम्ब के हर सदस्य को लगा कि उसका उनके साथ खास संबंध है। मेंरा पौत्र सुकरात पढ़ना सीख ही रहा था, तब दिल्ली में उससे हुई पहली मुलाकात में उन्होंने उस पर मोहिनी फेर दी थी। खुद कविता सुनाते जा रहे थे। इतनी बार सुनाई कि सुकरात को बिना पढ़े ही बोलनी आ गई। हम उन्हें परिवार के नाम से – मन्ना जी कह कर संबोधित करते। परन्तु प्रथम मुलाकात में कविता सुनकर सुकरात ने पूछा, ‘आपका नाम?’ उन्होंने कहा, भवानी प्रसाद। उनके घर से निकलते वक्त सुकरात ने पूरे सम्मान के साथ कहा ‘भवानी प्रसाद तो कवि हैं ? मुझे लगता है कि जीवन में मिले, अथवा छोड़ दिए गए पुरस्कारों की तुलना में भवानी बाबू के मन में सुकरात के दिए इस प्रमाण पत्र की कीमत कम नहीं थी।
भवानी बाबू एक ओर कविहृदय थे तो दूसरी ओर दुनियादार भी। इसीलिए उनके घर पर हमेशा मेहमानों का ताता लगा रहता था। सरला भाभी और परिवार के अन्य लोगों को इससे कठिनाई होती होगी। परन्तु सरला भाभी ने कभी इसे प्रकट नहीं होने दिया। मन्नाजी के मन जो भाता था, वही उन्हें भी भाता था। भवानी बाबू परिवार में सबसे बड़े भाई न थे फिर भी परिवार के लोग किसी भी मुसीबत में उन्हीं के पास दौड़े आते। खुद से बेहतर स्थिति वालों की भी सहायता किए बिना भवानी बाबू नहीं रह पाते। कई बार तो वह यह भी जान रहे होते थे कि उन्हे ठगने की कोशिश हो रही है। जब कोई जान-बूझकर ठगा रहा हो तब उसे कौन ठग सकता है? स्वयं कभी गलत खर्च नहीं करते थे परन्तु जिसकी मदद कर दी उससे कभी हिसाब नहीं मांगते।
खुद के परिवारजनों के प्रति भवानी बाबू अत्यन्त ममत्व का भाव रखते थे। जेल में बैठे-बैठे कुटुंबीजनों के लिखी कविता का अथवा हृदय रोग के हमले के बाद भी रोज मुगदर फेरने की आदत न छोड़ने वाले पिता का स्मरण कर वे फफक-फफक कर रो पड़ते।
एक बार आर्थिक कठिनाइयों की वजह से भवानी बाबू को फिल्मों के लिए गीत लिखने पड़े थे। इसका कष्ट उन्हें ताउम्र रहा। इस वेदना को उन्होंने कविता ‘गीत फरोश’ नामक कविता में उलीचा था तथा यह कविता लाचारीवश गीत लिखने वाले कितने ही कवियों के मन की चीख की पुकार बन गई थी।
आजादी के बाद भवानी बाबू अधिकतर दिल्ली की ‘धूल और धुएं के बीच’ शहर में रहे। परन्तु देश के कल्याण की कामना ने उन्हें कभी दिल्ली की माया में फंसने नहीं दिया। यूँ बड़े लोगों के साथ जान-पहचान की कमी न थी। गांधी विनोबा, नेहरू जैसों के साथ उनका परिचय था। बजाज कुटुम्ब के साथ घरोपा था। श्रीमन्नारायण तो उनके मुक्त प्रशंसक थे परन्तु इनसे पहचान का खुद लाभ कभी नहीं लिया। विचारों से भवानी बाबू सच्चे गांधीवादी थे, मगर उनका कवि हृदय किसी वाद के खांचे में समा जाए ऐसा न था। इसीलिए वे गांधीवादी कवि बनने के बदले मानववादी कवि बने रहे। उनकी कविता घरेलू विषयों से लगायत आध्यात्मिकता के शिखरों तक का भ्रमण करती है। उन्हें ऐहिक सुख की परवाह न थी। वे कहते ‘सुख अगर मेरे धर में आ जाए तो उसे बैठायेंगे कहां? उनकी मस्ती देख ‘होगा चकित’ की अवस्था बन जाती थी।
हिन्दी में आत्मा शब्द का प्रयोग स्त्रीलिंग में होता है। आत्मा से भवानी बाबू कहते है –
सुनती हो मेरी बहन आत्मा
किसी नदी के हरहराने कैसी यह आवाज
यह रगों में दौड़ता हुआ मेरा खून है……
मेरा खून
जिसमें मेरी खुशी डूब गयी है
और मन का रक्तकमल जिसमें
दिन-भर भी खिला नहीं रह सका है

शायद मेरी रगोंमें यह खून
इसी शर्त पर बह रहा है
कि खुशियां डुबाई जायेंगी
बिखराये जायेंगे दल रक्तकमल के
शाम आने के भी पहले ।
बता सकती हो तुम
मेरी बहन आत्मा कि कहीं
तट भी हैं इस नदी के या नहीं
तट जहां से बिना तैरे
पार जा सके मेरी खुशी
पांव – पांव जा सके जहां से मेरा रक्तकमल
किनारे के उस पार शांत जल के थमे-से सरोवर में …
स्वराज के बाद का भारत जिस तरह गांधी के दिखाए मार्ग से विचलित हुा उससे भवानी बाबू का हृदय टीस उठता। 1959 में लिखी एक कविता में उन्होंने इस टीस पहुंचाने वाली दिशा की ओर इंगित करते हुए कहा था –
पहले इतने बुरे नहीं थे तुम
याने इससे अधिक सही थे तुम
किन्तु सभी कुछ तुम्ही करोगे इस इच्छाने
अथवा और किसी इच्छाने , आसपास के लोगोंने
या रूस-चीन के चक्कर-टक्कर संयोगोंने
तुम्हें देश की प्रतिभाओंसे दूर कर दिया
तुम्हें बड़ी बातोंका ज्यादा मोह हो गया
छोटी बातों से सम्पर्क खो गया
धुनक-पींज कर , कात-बीन कर
अपनी चादर खुद न बनाई

बल्कि दूरसे कर्जे लेकर मंगाई
और नतीजा चचा-भतीजा दोनों के कल्पनातीत है
यह कर्जे की चादर जितनी ओढ़ो उतनी कड़ी शीत है ।

भवानी बाबू जिस आध्यात्मिक पीठ पर आसीन थे उसने उन्हें कभी निराशा में डूबने नहीं दिया। जैसे सात-सात बार मौत से वे लड़े वैसे ही आजादी के पहले गुलामी से लड़े और आजादी के बाद, तानाशाही से भी लड़े। आपातकाल में जब मैंने ‘यकीन’ नामक हिन्दी पत्रिका शुरू की तब मेरे एक ही पत्र के जवाब में उन्होंने ढेर सारी कविताएं भेज दीं । उस समय दिल्ली में भय का साम्राज्य था। खास तौर पर बौद्धिक वर्ग भयभीत था। जीवन के आदर्शों और मूल्यों के लिए जो खुद को घिसने के लिए तैयार नहीं होते वे उन्हें भीरू ही बनना पड़ता है । उन्हीं दिनों कई बौद्धिक मित्रों ने भवानी बाबू को यह सयानी सलाह दी थी – ‘कविता भेजी ही हो तो कम से कम यह सावधानी बरतिएगा कि उसके साथ आपका नाम न छपे।’ नाम की कभी चाह न रखने वाले ऐसे प्रसंगों में नाम देने के लिए उत्साहित होते हैं।
चंडीगढ़ से बीमारी के कारण पेरोल पर छूटे जय प्रकाश जी ने उन्हें सहज ही पूछा – आज कल क्या कर रहे हैं? कवि का और क्या जबाव हो सकता था? उन्होंने कहा, ‘कविता लिखता हूँ। ’ पूरे आपातकाल रोज तीन-तीन कविताएं लिखते रहे, जो बाद में ‘त्रिकाल संध्या’ के नाम से प्रकाशित हुई।

तुम्हे जानना चाहिए कि हम
मिट कर फिर पैदा हो जायेंगे
हमारे गले जो घोंट दिए गए हैं
फिर से उन्हीं गीतों को गायेंगे
जिनकी भनक से
तुम्हें चक्कर आ जाता है !
तुम सोते से चौंक कर चिल्लाओगे
कौन गाता है ?
इन गीतों को तो हमने
दफना दिया था !
तुम्हें जानना चाहिए कि
लाशें दफनाई जा कर सड़ जातीं हैं
मगर गीत मिट्टी में दबाओ
तो फिर फूटते हैं
खेत में दबाये गए दाने की तरह !

बच्चों की एक पत्रिका ने आपातकाल के दौरान भवानी बाबू से उनकी रचना मांगी। उन्होंनें मुक्त अभिव्यक्ति पर एक सरल कविता लिखकर भेज दी, फिर ख्याल आया कि कदाचित संपादक महोदय, ऐसी कविता को कबूलना कठिन न हो जाए। इसलिए उस कविता के नीचे ही सम्मानपूर्वक लिख दिया ‘छापने योग्य लगे तब ही छापिएगे। अयोग्य लगे तो, लौटाने की जरूरत नहीं है घर के बच्चे लौटाई गई कविता देखेंगे तो मेरे बारे में क्या सोचेंगे? ‘गांधी पंचशती’ नामक संग्रह में गांधी विचार को केन्द्र में रख लिखी गई पांच सौ कविताएं है। दिल्ली में उनके राजघाट स्थित घर में पहलीबार गया तब प्रेमपूर्वक परोस कर भोजन कराया और जाते वक्त मेरे हाथ में उस पुस्तक की एक प्रति रख दी। पहले पन्ने पर लिखा था ‘प्रिय भाई नारायण देसाई को पहली घर आने के प्रसंग से सुख पाकर।’’ पुस्तक की ‘प्रारम्भिक कविता में आज के युग की पीड़ा, इस युग को बदलने की उनकी आशा, उस आशा को चरितार्थ करने में कविता साधक बनेगी। ऐसी उनकी आस्था तथा उस आस्था के लिए खुद से बन पड़ने लायक सब कर गुजरने की छटपटाहट प्रकट होती है। इस लम्बी कविता के कुछ भाग देखे।
कविताएं ये ज्यादातर उस भविष्य की है।
जो वर्तमान हुआ था
जिसने हमें कण-कण पोर-पोर छुआ था
मगर किसी झंझट में हमने जाना अनजाना कर दिया उसे…..
यह कोई भविष्यवाणी नहीं है न सपना है
इसे गांधी ने खुली आखों से देखा था
और एक हद तक साकार करवाया था हमसे
इस लिए तो हमारा है अपना है
बेहतर दुनिया की एक तस्वीर खिंचती है इसमें
लगभग अब तक की बंजर समूची एक दुनिया
सिंचती है इसमें ।

हम सब चाहते हैं दुनिया को आज जैसी है उससे अच्छी
मगर मेरी लाचारी कहिए मेरी आंख में
हमसे-तुमसे ज्यादा झूलता है वह बच्चा
जो हमारे बच्चों से भी अगली पीढ़ी का होगा
विचित्र कोई चोगा पहन कर
वह अणु बम फेंकता फिरे जहां तहां
इस संभावना को मैं कविता लिख कर
खत्म करना चाहता हूं
मुझे जो ताकत दी गई है
वह दिन उसके बल पर अपने वश- भर
मैं हारना चाहता हूं.
ये कवितायें इस प्रतीति से लिखी जा रही हैं
कि मेरे देश में कुछ ऐसे गहरे तत्त्व थे ही नहीं हैं
जो देश के जड़ से जड़ अंशों में समाये हुए हैं
जिन्हें जरा-सा पानी मिल जाए समय पर
तो देखेंगे कि आप कि वे सूखे नहीं हरयाए हुए हैं
और उत्स तो पड़ा है लगभग खुला गांधी के विचारों का
उस पर पड़ी एक चट्टान को थोड़ी-सी शक्ति लगा कर
खिसका- भर देना है बस
कलकल छलछल हो जाएगा सब….
गांधी त्यौहार तो मनेगा तब
जब आज और आगे के माथे से
छोटी बड़ी क्रूरता का कलंक धुल जायेगा
जब धरती पर हर जीव के निर्भय समंजस
जीने का द्वार खुल जाएगा …..

मगर तब तक के लिए रुक नहीं रहा हूं मैं
शुरु कर रहा हूं
जितना बन सकता है मुझसे उतना छोटा एक काम
लेकर समूची मानवता की परम्परा में
अब तक के सबसे सीधे सादे
निर्भय और स्नेही आदमी
गांधी का नाम !

भवानी बाबू के विशाल साहित्य में मेरा सम्पर्क उनके गांधी साहित्य के साथ ही अधिक था। ऊपर दिए उदाहरण में जिसे हम देख सकते है वैसी उनकी भाषा भी गांधी जैसी चाहते है वैसी उनकी भाषा भी गांधी जैस चाहते थे, वैसी, सीधी-सादी, सरल हिन्दुस्तानी ही थी। वे उस जमाने में लिख रहे थे जब बड़े साहित्यकार हिन्दी भाषा से चुन चुन कर उर्दू शब्द निकाल देते थे। भाषा को कठिन और क्लीष्ट बनाने में मानो पांडित्य प्रकट होता हो। ऐसे वकत में भवानी बाबू ने आदर्श रखा:
जिस तरह हम बोलते है उस तरह तू लिख
और इसके बाद भी हम से बड़ा तू दिख।
भवानी बाबू सामान्य जन के जन थे। इसलिए सामान्य जन की बात वे प्रथम पुरुष में सहजता से कहते। इसके बावजूद सामान्य जनों को असामान्य ऊँचाई तक उठा सकने की ताकत उनकी भाषा में थी।
‘‘मैं और तुम’ नामक कविता में गांधी जी को ध्यान में रख करू वे कहते हैं –
कई बार जब क्रोध उमड़ता है मैं पागल हो जाता हूँ
और फेंक कर हाथ फाड़ कर गला चीखता चिल्लाता हूँ
ऐसा लगता है कि काट कर धर दूं शत्रुगणों को अपने
और सांग कर डालूं पल में युगों युगों तक देखे सपने
किन्तु तभी स्वर शान्त तुम्हारा मुझे सुनाई पड़ जाता है
क्रोधोन्मत्त शीश लज्जा से गड़ जाता है।
जीवन के आखिरी वर्ष उन्होंने दिल्ली में बिताए ।संयोगों ने उन्हें दिल्ली लाकर बसा दिया था परन्तु उनकी आत्मा थी देहात में जहां गांधी ने असली भारत देखा था। ‘दुर्घटना’ नामक एक कविता में वे लिखते है –
मुझे अपने गांव में रहना था
वहां की धूल कीचड़ धुआं सहना था
यह ठीक नहीं हुआ कि छोड़कर वह कीचड़ धूल और धुआं
मैं यहां आ गया दीद ओ दानिश्त ; धोखा खा गया ।
फाइलों की धूल , दोस्तों का उछाला हुआ कीचड़
बसों का धुआं : ना यह ठीक नहीं हुआ
मुझे अपने गांव में रहना था
वहां का धुआं , धूल कीचड़ सहना था ।

भाग मुझ पर भले उखड़ा था
मगर मेरे पास जमीन का टुकड़ा था
घर था , घर की शाक सब्जी थी
अन्न था ;
हाय दिमाग कैसा सन्न था
कि मैं यहां आ गया
दीद ओ दानिश्त धोखा खा गया !
इस धोखे से छूटने के लिए ही मानो जीवन के अन्तिम क्षणों में मध्य प्रदेश के अपने मूल गांव नरसिंहपुर में बिता कर हमारे निमंत्रण पर वे वउछी आकर कुछ दिन रहे। दो-चार कक्षाएं ली थीं दर्जन-दो दर्जन कविताएं सुनाई थीं वेड़छी आश्रम में घटादार वृक्षों पर आकर बैठने वाले तथा सांझ-सबेरे वैतालिक गान गाते विहंगों पर वे लट्टू थे। एक दिन आश्रम का एक विद्यार्थी मुख्य मेहमान को प्रार्थना के लिए बुलाने आया तो कह दिया – ‘भाई मुझे माफ करना। मैं तो इन पंहियों की प्रार्थना सुन रहा हूं, बरसों बाद ऐसी प्रार्थना में शरीकर होने का मौका मिला है। मुझे यह प्रार्थना ही करने दो। ‘
जाते वक्त मुझे छाती से भींच कर बोले, ‘भाई, आप तो बनारस से फिर गांव में आ गए। मेरी भी यही इच्छा है कि दिल्लीर से फिर नरसिंहपुर चला जाऊ। मेरा जी वहीं लगता है। वहीं जन्मा था, वहीं मरना चाहता हूँ। सचमुच वैसा ही हुआ। गए तो थे कुटुंबीजन के विवाह में। वहीं रूक गए, संक्षिप्त बीमारी भोग कर विदा हो गए। आजीवन सहधर्मचारिणी सरला भाभी ने कहा ‘मृत देह को दिल्ली लाने की आवश्यकता नहीं है। बावजूद इसके कि पूरा कुटुम्ब दिल्ली में ही था। सब काम वहीं होगा। ज्यादा लोगों को दिल्ली से नरसिंहपुर भी जाने की जरूरत नहीं है। ‘
भवानी बाबू के परिवार में मेरा सबसे अधिक परिचय छोटे बेटे अनुपम के साथ है। गांधी शांति प्रतिष्ठान के पर्यावरण विभाग में सुन्दर काम कर रहा है। प्रतिभा और स्वभाव से मोर का अंडा, उसने लिखा ‘ हम सब हिम्मत बांधे हुए है। बस आप जैसे किसी का पत्र पढ़कर बांध टूट जाता है। पिताजी हमें बहुत बड़े परिवार में छोड़ गए।
विराम कहां ?
मन में सोचा था की यहीं अब पूर्ण विराम कर दूंगा !
किन्तु विराम कहां हुआ ? तेरी सभा में फिर लौट आया ।

अब नये गीतों , नए रागों के लिए मेरा प्रफुल्लित ह्रदय उत्सुक हो गया है !
स्वरों के विराम पर मेरी क्या दशा होती है , इसका मुझे ज्ञान ही नहीं रहता ।

संध्या की वेला में स्वर्ण-किरणों से अपनी तान मिलाकर
जब मैं अपने गीतों को पूर्ण करता हूँ तो मध्यरात्री
के गंभीर स्वर मेरे जीवन में फिर से भरने के लिए जाग उठाते हैं !
तब मेरी आँखों में तिलभर नींद नहीं रहती , मेरे गीतों को
विराम नहीं मिलता !
रवीन्द्रनाथ ठाकुर , – अनुवाद सत्यकाम विद्यालंकार

लेख का अनुवाद – अफलातून
(गुजराती अखबार ‘गुजरातमित्र’ में ‘मने केम वीसरे रे’ नामक लेखमाला और उसी नाम से बालगोविंद प्रकाशन से छपी पुस्तक (मार्च,१९८६) से मूल लेख लिया गया है।)

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तुम्हे जानना चाहिए कि हम

मिट कर फिर पैदा हो जायेंगे

हमारे गले जो घोंट दिए गए हैं

फिर से उन्हीं गीतों को गायेंगे

जिनकी भनक से

तुम्हें चक्कर आ जाता है !

तुम सोते से चौंक कर चिल्लाओगे

कौन गाता है ?

इन गीतों को तो हमने

दफना दिया था !

तुम्हें जानना चाहिए कि

लाशें दफनाई जा कर सड़ जातीं हैं

मगर गीत मिट्टी में दबाओ

तो फिर फूटते हैं

खेत में दबाये गए दाने की तरह !

– भवानीप्रसाद मिश्र .

 

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[ स्वराज के बाद का भारत जिस प्रकार गांधी वाले रास्ते से विचलित हुआ उससे भवानी बाबू का हृदय हिल उठता था । १९५९ में लिखी यह कविता , विश्व बैंक से पहली बार कर्जा लेने की बात उसी समय शुरु हुई थी । ]

पहले इतने बुरे नहीं थे तुम

याने इससे अधिक सही थे तुम

किन्तु सभी कुछ तुम्ही करोगे इस इच्छाने

अथवा और किसी इच्छाने , आसपास के लोगोंने

या रूस-चीन के चक्कर-टक्कर संयोगोंने

तुम्हें देश की प्रतिभाओंसे दूर कर दिया

तुम्हें बड़ी बातोंका ज्यादा मोह हो गया

छोटी बातों से सम्पर्क खो गया

धुनक-पींज कर , कात-बीन कर

अपनी चादर खुद न बनाई

बल्कि दूरसे कर्जे लेकर मंगाई

और नतीजा चचा-भतीजा दोनों के कल्पनातीत है

यह कर्जे की चादर जितनी ओढ़ो उतनी कड़ी शीत है ।

– भवानीप्रसाद मिश्र .

[ चित्र स्रोत : अनहदनाद ]

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[ ‘भवानी प्रसाद मिश्र के आयाम’ , संपादक लक्ष्मण केड़िया,विशेषांक ‘समकालीन सृजन’ , २० बलमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता – ७००००७ से साभार ]

तुम काग़ज़ पर लिखते हो

वह सड़क झाड़ता है

तुम व्यापारी

वह धरती में बीज गाड़ता है ।

एक आदमी घड़ी बनाता

एक बनाता चप्पल

इसीलिए यह बड़ा और वह छोटा

इसमें क्या बल ।

सूत कातते थे गाँधी जी

कपड़ा बुनते थे ,

और कपास जुलाहों के जैसा ही

धुनते थे

चुनते थे अनाज के कंकर

चक्की पिसते थे

आश्रम के अनाज याने

आश्रम में पिसते थे

जिल्द बाँध लेना पुस्तक की

उनको आता था

भंगी-काम सफाई से

नित करना भाता था ।

ऐसे थे गाँधी जी

ऐसा था उनका आश्रम

गाँधी जी के लेखे

पूजा के समान था श्रम ।

एक बार उत्साह-ग्रस्त

कोई वकील साहब

जब पहुँचे मिलने

बापूजी पीस रहे थे तब ।

बापूजी ने कहा – बैठिये

पीसेंगे मिलकर

जब वे झिझके

गाँधीजी ने कहा

और खिलकर

सेवा का हर काम

हमारा ईश्वर है भाई

बैठ गये वे दबसट में

पर अक्ल नहीं आई ।

भवानी प्रसाद मिश्र

[ १९६९ ]

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