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Posts Tagged ‘बनारस’

सत्तर के दशक उत्तरार्ध में तथा अस्सी के पूर्वार्ध में देश की हुक्मरान इन्दिरा गांधी या राजीव गांधी  जब भी शहर बनारस में आते कुछ दिन पहले से ही ’शांति भंग की आशंका’ में गिरफ़्तारियां शुरु हो जातीं । गिरफ़्तार लोग उनके लौटने के बाद छोड़ दिए जाते । पुलिस प्रशासन की तमाम मुस्तैदियों के बावजूद शहर के तरुणों की एक जमात इन मुस्तैदियों को धता बताते हुए इन हुक्मरानों को काला झण्डा दिखा ही देते थे । फिर पुलिस और कांग्रेसी गुण्डों द्वारा होती थी उनकी भर हिक पिटाई । कवि विपुल चक्रवर्ती की पंक्तियों को याद दिलाने वाली पिटाई –

“इस तरह पीटो कि
सिर से पांव तक कोड़े का दाग बना रहे
इस तरह पीटो कि
दाग काफ़ी दिनों तक जमा रहे.
इस तरह पीटो कि
तुम्हारी पिटाई का दौर खत्म होने पर
मैं धारीदार शेर की तरह लगूं ”
(‘तुम्हारी पिटाई का दौर खत्म होने पर’ शीर्षक विपुल चक्रवर्ती की कविता से)

सरदार सतनाम सिंह,चंचल मुखर्जी और दिलीप सिंह इन तरुणों में प्रमुख थे । तीनों समाजवादी युवजन । मेरी ऐसी पिटाई  विश्वविद्यालय प्रशासन के द्वारा रखे गये भाड़े के सिपाहियों द्वारा एक बार हुई थी। मेरी साथ पकड़े गए पी.एस.ओ. के राजीव सिंह को मेरी पिटाई के दौरान ’सूरज की ओर देखना ’ था। सतनाम के घर पहुंचने वाले  समन – वारंट और कुर्की के आदेशों से तंग आकर उसके पिताने उसे सचमुच (कानूनी तरीके से) त्याज्य कर दिया । सतनाम कई दिनों के लिए अहोम चला गया । वहीं शादी की।पत्नी के साथ बनारस लौटा । कुछ वर्षों बाद पत्नी गुजर गईं ।

राजनारायण के मंत्र – ’मारेंगे नहीं- मानेंगे नहीं’ लोहिया के ’जालिम का कहना मत मानो,यही सिविल नाफ़रमानी है’ दर्शन को चरितार्थ करने वाला यह सिपाही पिछले  सात महीने से बनारस की जेल में १९८२ के ’अपराध’(पुलिस द्वारा लादे गये फर्जी मुकदमे) में बन्द है । राजनीति के तौर – तरीके भी इन २५-३० वर्षों में बदल गये हैं। संघर्ष का लोप और दलाली का प्रभुत्व हो गया है । तथाकथित ’जेल भरो आन्दोलन’ भी दिन भर के होते हैं।शाम तक पुलिस लाईन से रिहाई हो जाती है।अन्ना हजारे का अनशन अगर पांच दिन और चला तो उनके समर्थन में होने वाला जेल भरो इससे अलग न होगा। सरदार सतनाम की जमानत भी बनारस से सिर्फ़ इसलिए नहीं हो पा रही है कि ’सरकार बनाम सतनाम’ के १९८२ की फाईल प्रस्तुत करने में प्रशासन लिखित रूप से असमर्थता प्रकट कर चुका है।

सतनाम की व्यक्तिगत विडंबना देखिए । आज वह कांग्रेस में है । इंदिरा गांधी को काला झण्डा दिखाने के एक प्रकरण में उसके सिर से आधे केश(सतनाम सिख है) उखाड़ लेने वाला लम्पट सतीश चौबे उसकी पार्टी का जिलाध्यक्ष है ।

बिहार आन्दोलन के दौर की बाबा नागार्जुन की दो पंक्तियां बार-बार दिमाग में आ रही हैं । सतनाम पर पोस्ट का शीर्षक उसीकी पैरोडी है । कोई पाठक यदि अपनी टिप्पणी में उन पंक्तियों को न उद्धृत कर सका तब बताऊंगा।

 

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’ यह अब तक का सर्वाधिक समझदार ,सन्तुलित और नैतिक हथियार है । ’ सिर्फ़ जीवन हरण करते हुए तमाम निर्जीव इमारतों आदि को जस – का – तस बनाये रखने की विशिष्टता वाले न्यूट्रॉन बम के आविष्कारक सैमुएल कोहेन ने अपने ईजाद किए इस संहारक हथियार के बारे में यह कहा था। इस ६ दिसम्बर को उसके बेटे ने खबर दी कि उसकी कैन्सर से मृत्यु हो गई । युद्ध के बाद इमारतें जस की तस बनी रहेंगी तो निर्माण उद्योग को बढ़ावा कैसे मिलेगा ? संभवत: इसीलिए न्यूट्रॉन बम के प्रति बड़े मुल्कों में आकर्षण नहीं बना होगा । इराक के ’पुनर्निर्माण’ से अमेरिकी उपराष्ट्रपति डिक चेनी से जुड़ी कम्पनियां जुड़ी थीं , यह छिपा नहीं है ।

कल बनारस के शीतला घाट पर हुए ’ मध्यम श्रेणी के विस्फोट ’ के बाद से समस्त मीडिया का ध्यान काशी की कानून और न्याय – व्यवस्था पर है । यहां के नागरिकों और पर्यटकों के जान – माल की रक्षा में विफल जिला प्रशासन पर है ।

सैमुएल कोहेन की तरह बनारस के जिला प्रशासन ने भी एक ’समझदार ,सन्तुलित किन्तु संहारक हथियार ’ गत ढाई महीने से इस्तेमाल किया है । इस हथियार का प्रयोग बनारस के शहरी-जीवन के हाशिए पर मौजूद पटरी व्यवसाइयों पर हुआ है । इस माएने में जिला प्रशासन न्यूट्रॉन बम से भी एक दरजा ज्यादा ’समझदार’ है। वह जीवितों में भी भी गरीबों को छांट लेता है । ढाई महीने से आधा पेट खाकर लड़ रहे इन पटरी व्यवसाइयों के बीच से दो फल विक्रेता – रामकिशुन तथा दस्सी सोनकर रोजगार छीने जाने के आघात से अपनी जान गंवा चुके हैं । जिला प्रशासन की इस दमनात्मक कारगुजारी में ’रियल एस्टेट’ लॉबी तथा पुलिस बतौर गठबन्धन के शरीक है । इस गठबन्धन ने खुले रूप से एक घिनौना स्वरूप ग्रहण कर लिया है । लंका स्थित शॉपिंग कॉम्प्लेक्स को बनारस की सबसे चौड़ी पटरी और नगर निगम का रिक्शा स्टैण्ड उपहार स्वरूप भेंट दे दिया गया है , इसके बदले रियल एस्टेट मालिक द्वारा लंका थाना परिसर में कमरे बनवाना तथा पुताई करवाई गई है । इसी परिवार द्वारा बनाये गई बहुमंजली इमारतों में कई ’आदर्श घोटाले’ छुपे हैं ।

मुख्यधारा की मीडिया जिला प्रशासन रूपी न्यूट्रॉन बम को देखे-समझे यह भी सरल नहीं है ।

उत्तर प्रदेश में शासन कैसे चल रहा है इसका नमूना बनारस के पटरी व्यवसाइयों के ढाई महीने से चल रहे संघर्ष से समझा जा सकता है । मुख्यमन्त्री के कान-हाथ दो तीन नौकरशाह हैं । जो जिलाधिकारी इनसे तालमेल बैठा लेता है वह कोई भी अलोकतांत्रिक कदम उठा सकता है । वाराणसी नगर निगम के किसी भी अधिकारी द्वारा कोई भी आदेश न दिए जाने के बावजूद जिलाधिकारी के मौखिक आदेश का डंडा स्थानीय थानध्यक्ष के सिर पर है और थानाध्यक्ष के हाथ का डंडा पटरी व्यवसाइयों के सिर पर । गत दिनों सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पटरी पर व्यवसाय को मौलिक अधिकार का दरजा दिए जाने को भी जिलाधिकारी नजरअंदाज करते आए हैं । वाराणसी के कमीशनर को विधानसभाध्यक्ष , सत्ताधारी दल के कॉडीनेटर,शासन द्वारा नामित सभासदों द्वारा लिखितरूप से कहने को स्थानीय प्रशासन नजरअंदाज करता आया है ।सत्ताधारी दल के इन नुमाइन्दों ने स्थानीय प्रशासन को यह भी बताना उचित समझ कि अधिकांश  पटरी व्यवसाई दलित हैं । लोगों का कहना है कि इन महत्वपूर्ण सत्ता -पदों पर बैठे राजनैतिक कार्यकर्ताओं का महत्व गौण होने के पीछे स्वयं मुख्यमन्त्री का तौर तरीका है । माना जाता है कि नौकरशाह दल के नेताओं से ज्यादा चन्दा पहुंचाते हैं । लाजमी तौर पर दल के कार्यकर्ताओं का इन अफ़सरों से गौण महत्व होगा।

 

 

 

 

 

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पटरी व्यवसायी संगठन

वाराणसी

प्रति ,

श्री कौशलेन्द्र सिंह ,

महापौर – वाराणसी ।

 

विषय : पटरी व्यवसाइयों की बाबत ।

माननीय महापौर महोदय़ ,

फेरीवाले , पटरी ब्यवसाई , खोमचे वालों का नगर – जीवन में एक अहम योगदान रहा है । बनारस शहर के फेरीवाले ही १२५ वर्ष से पहले लिखे गये भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के प्रसिद्ध नाटक ’अन्धेर नगरी’ के पात्र हैं । इतने वर्षों बाद भी मानो अब भी वे अन्यायपूर्ण नीतियों के शिकार हैं । असंगठित क्षेत्र के इन व्यवसाइयों के हित में बनाई गई तमाम नीतियों तथा सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के बावजूद नगर प्रशासन में मौजूद निहित स्वार्थी तत्वों के कारण उन्हें अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है ।

उत्तर प्रदेश में इस श्रेणी के व्यवसाइयों से कई वर्षों तक तहबाजारी वसूली जाती थी । तदुपरान्त निजी ठेकेदारों को यह काम दिया गया परन्तु फिलहाल तहबाजारी समाप्त करने के साथ ही प्रदेश सरकार ने संसद द्वारा पारित ’नगरीय फेरी वालों हेतु राष्ट्रीय नीति’ को लागू करने की घोषणा की है । इस नीति के अनुरूप नगरवासी फेरीवालों , पटरी व्यवसाइयों को नगर निगम द्वारा लाइसेंस जारी किए जाने तथा पटरी व्यवसायी संगठन के प्रतिनिधियों को नगर निगम में प्रतिनिधित्व दिए जाने की बातें हैं ।

गत १९ अक्टूबर २०१० को मा. सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यन्त महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि पटरी पर व्यवसाय करना मौलिक अधिकार है ।

इन नीतियों तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद नगर लंका क्षेत्र के पटरी व्यवसाइयों को गत २३ सितम्बर से जिलाधिकारी के निर्देश पर स्थानीय पुलिस व्यवसाय करने से रोक रही है तथा उत्पीडित कर रही है । यह उल्लेखनीय है कि नगर में सड़क के दोनों ओर सर्वाधिक चौड़ी बीस-बीस फुट की पटरी सिर्फ़ लंका स्थित मालवीय चौराहे से रविदास द्वार तक है । स्थान उपलब्ध होने के कारण ही रविदास गेट के निकट वर्षों तक नगर निगम का रिक्शा स्टैण्ड था । गत कुछ वर्षों में एक रियल – एस्टेट लॉबी द्वारा सड़क के दोनों ओर मार्केटिंग कॉम्प्लेक्स तथा दुकानें ( बहुमंजली आवासीय भवन के पार्किंग स्पेस में ) खोल दी गई हैं । इन्हीं लोगों द्वारा महेन्द्रवी छात्रावास को खरीदने की बाबत भी सतर्कता आयोग द्वारा जांच कराई जा रही है ।

प्रदेश शासन द्वारा देश के एक बड़े उद्योगपति की फुटकर फल-सब्जी श्रृंखला को अनुमति न दिए जाने के निर्णय का भी हमें स्मरण है तथा इसे हम फुटकर व्यवसाय के हित में लिया कदम मानते हैं।

लंका पर विश्वविद्यालय के शिक्षक सड़क पर ही अपनी निजी गाड़ियां खड़ा कर बाजार करते हैं। आप से निवेदन है कि विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय से आप अनुरोध करें कि वे परिसरवासियों से गाड़ियां परिसर में रख कर पैदल लंका बाजार करने आने की अपील करें । कुछ समझदार शिक्षक ऐसा करते हैं । विश्वविद्यालय परिसर को टाउन एरिया तथा नोटिफाइड एरिया के रूप में न रख कर नगर निगम के विभिन्न वार्डों से जोड़ दिया गया इसलिए आपके द्वारा यह अनुरोध अति उपयुक्त होगा ।

आप से सविनय निवेदन है कि उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में आप वाराणसी के पटरी व्यवसाइयों द्वारा नगर निगम वाराणसी को रचनात्मक सहयोग सुनिश्चित कराने के लिए स्वयं हस्तक्षेप करेंगे ताकि नगर के इस अहम किन्तु कमजोर तबके के साथ न्याय हो सके ।

आप के सहयोग की अपेक्षा में , हम हैं :

 

 

( काशीनाथ )                         (मोहम्मद भुट्टो)                                  ( काली प्रसाद )

अध्यक्ष                                    महामन्त्री                                          उपाध्यक्ष

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देव दीपावली

देव दीपावली

 

 

 

 

 

 

 

 

सांस्कृतिक टोली

सांस्कृतिक टोली

 

 

 

 

 

 

 

 

सलीम शिवालवी

सलीम शिवालवी

 

 

 

 

 

 

 

 

अंजुम सलीमी

अंजुम सलीमी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गुरु नानक जयन्ती , कार्तिक पूर्णिमा और देवदीपावली । काशी की घाट दीप मालिकाओं से पट जाते हैं । सड़क की तरह गंगा जी में नावों और बजड़ों का भी जाम लग जाता है, उस दिन । नावों और बजड़ों का सट्टा पहले से हो जाता है । लिहाजा उस शाम के लिए ‘सामने घाट’ के बाद और अस्सी से पहले अब्दुल्लाहदा ने अपने मित्र पीताम्बर मिश्र का ऐन घाट पर स्थित ‘योग-मन्दिर’ चुना । पाकिस्तान से आई सांस्कृतिक टोली अभिभूत थी गंगा से । क्वेटा के शायर अली बाबा ताज ने अपने एक मित्र की लिखी कविता सुनाई – बामियान की बुद्ध प्रतिमा के तालिबान द्वारा ध्वंस की बाबत । फिर अपनी रचना में कहा – ‘ बात बढ़ तो सकती है,जुस्तजू से आगे भी ,बोलते रहेंगे हम,गुफ़्तगू से आगे भी’  उस रात्रि भोज के मेज़बान प्रोफेसर गजेन्द्र सिंह ( निदेशक , आयुर्विज्ञान संस्थान , का.हि.वि.वि.) का जन्मस्थान भी क्वेटा का था । विभाजन के ठीक पहले गजेन्द्रजी के पिता वहाँ के फौजी अस्पताल में डॉक्टर थे । रुख-ए-निलोफ़र ने एक बागी स्त्री-चेतना की रचना सुनाई । निलोफ़र स्कूली बच्चों में दृश्य कला के पाठ्यक्रम बनाने में लगी हैं और लाहौर में अध्यापन करती हैं । मेज़बानों की ओर से शायर शमीम शिवालवी और कबीर ने स्वागत में मिल्लत का आवाहन करते हुए नज़्म पढ़ी , डॉ. स्वाति ने रवीन्द्र संगीत गाया और   रामिश  ने जाल द बैण्ड का  गीत- ‘वो लमहे’ सुनाया ।

    ‘हिन्द – पाक – सफ़र-ए-दोस्ती’ पिछले २० वर्षों से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए टोलियों की यात्राएं कराने में पहल करता आया है । संगठन के सतपाल ग्रोवर पाकिस्तानी टीम के साथ पधारे थे ।

    सांस्कृतिक टोली की सबसे छोटी सदस्य ११ साल की फ़रीहा है जो हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीख रही है । फ़रीहा राग माधुरी में ,’मोरे मन भावे श्याम मुरारी’ सुनाती है तो स्थानीय अखबार का संवाद दाता उससे पूछता है कि वह यह पाकिस्तान में सुनाती है या नहीं ? उसको यह अन्दाज नहीं है कि वहीं सीख कर उसे यहाँ भी गा रही है ।

    इस सांस्कृतिक टोली के अगुआ शायर अंजुम सलीमी कहते हैं, ‘मैं पलट आया था दीवार पर दस्तक देकर।अब सुना है,वहाँ दरवाजा निकल आया है’ । पेन्टर रेहाना क़ाज़मी कहती हैं , ‘ सियासत से हटकर देखें तो दोनों मुल्कों की आत्मा की आवाज मिलती है ।

    बनारस में इस टोली की आगवानी डॉ. मुनीज़ा रफ़ीक खाँ और गांधी विद्या संस्थान के निदेशक प्रोफेसर दीपक मलिक ने की । टीम के सदस्यों का रात्रि विश्राम बनारस के अलग अलग परिवारों मे हुआ ।

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