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राजनैतिक दल और भ्रष्टाचार

राजनैतिक और आर्थिक दोनों क्षेत्रों में अवरोध पैदा करनेवाले इस सामाजिक रोग का निदान और प्रतिकार ढूँढ़ने का कोई गम्भीर प्रयास न होना मौजूदा भारतीय स्थिति का एक स्वाभाविक पहलू है । बुद्धिजीवी और राजनेता , दोनों एक सर्वग्रासी जड़ता के शिकार हैं । भ्रष्टाचार का मुद्दा पिछले कई महीनों से भारतीय राजनीति का सबसे गरम मुद्दा बना हुआ है । राजीव गांधी की गद्दी हिल गई है । इस मुद्दे को हथियार बनाकर सारा विपक्ष चुनाव लड़ेगा । लेकिन किसी दल की ओर से यह नहीं बताया जाता है कि भ्रष्टाचार मिटाने के लिए उसके पास क्या कार्यक्रम है ? कम्युनिस्ट राजनेता और बुद्धिजीवी यह कहकर छुटकारा पा लेते हैं कि क्रांति के द्वारा भ्रष्टाचार का उन्मूलन हो जायेगा ।यह उस तरह की बात है जैसे कुछ लोग कहते हैं कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए तानाशाही चाहिए ।

जब कम्युनिस्ट चीन को भी भ्रष्टाचार बढ़ने की चिन्ता होने लगी और भारत में क्रांति होने के पहले ही कम्युनिस्टों ने राज्यों की सरकार सँभालने के लिए रणनीति बनाई है तो कम्युनिस्ट प्रवक्ताओं को भी क्रांति की सपाट बात न कहकर अधिक ब्यौरे में जाकर इस प्रश्न का उत्तर देना पड़ेगा ।

जब तक भ्रष्टाचार के सामाजिक – आर्थिक कारणों के बारे में समझ पैदा नहीं होगी , तब तक यह सिद्धान्त प्रचलित रहेगा कि शासकों के व्यक्तिगत चरित्र को उन्नत करना ही भ्रष्टाचार निरोध का निर्णायक उपाय है । यही वजह है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए जाँच और छापे मारने की कार्रवाइयों के अलावा दूसरे उपाय भी हो सकते हैं , यह बात लोगों के दिमाग में नहीं आती ।

सबसे पहले यह समझना होगा कि भ्रष्टाचार का कारण न व्यक्ति है , न विकास है । अगर विकास के ढाँचे में भ्रष्टाचार का बढ़ना अनिवार्य है तो तो वह फिर विकास ही नहीं है । मनुष्य स्वभाव की विचित्रता में बुराइयाँ भी हैं , कमजोरियाँ भी हैं । मनुष्य स्वभाव में जिस मात्रा में बुराई होती है वह तो मनुष्य समाज में रहेंगी ही । उस पर नियंत्रण रखने के लिए सभ्यता में धर्म , संस्कृति , राज्यव्यवस्था आदि की उत्पत्ति हुई है । अगर उन पर नियंत्रण नहीं रह पाया तो धर्म , संस्कृति , राज्य, अर्थव्यवस्था – हरेक पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा । अगर प्रशासन और अर्थव्यवस्था सही है तो समाज में भ्रष्ट आचरण की मात्रा नियंत्रित रहेगी । उससे राज्य को कोई खतरा नहीं होगा । उतना भ्रष्टाचार प्रत्येक समाज में स्वाभाविक रूप से रहेगा । परंतु जब प्रशासन और अर्थव्यवस्था असंतुलित है और सांस्कृतिक परिवेश भी प्रतिकूल है तब भ्रष्टाचार की मात्रा इतनी अधिक हो जाएगी  कि वह नियंत्रण के बाहर होगा , उससे जनजीवन और राज्य दोनों के लिए खतरा पैदा हो जाएगा । इसी अर्थ में हम कहते हैं कि विकसित देशों में भ्रष्टाचार की समस्या नगण्य है। इसका मतलब यह नहीं है कि वहाँ भ्रष्टाचार की घटनायें नहीं होती हैं । उन देशों में भ्रष्टाचार राज्य और समाज के इतने नियंत्रण में है कि उसकी मात्रा खतरे की सीमा से ऊपर नहीं जाती ।

यह भी समझना चाहिए कि बड़ा’ और ’छोटा’ भ्रष्टाचार एक जैसा नहीं होता है ।जनसाधारण को यह सिखाया गया है कि छोटा चोर और बड़ा चोर दोनों एक हैं । कानून में भी वे दोनों एक नहीं हैं । भ्रष्टाचार की जिस घटना से राज्य और मानव समाज को अधिक हानि पहुँचती है उसे अक्षम्य अपराध माना जाना चाहिए । सत्ता में प्रतिष्ठित व्यक्तियों का भ्रष्टाचार अधिक हानिकारक होता है । रक्षक का भक्षक होना अधिक जघन्य है । सर्वोच्च पदों पर प्रतिष्ठित व्यक्तियों के गलत तौर- तरीकों को नीचेवाले लोग सहज ढंग से अपनाते हैं । इसीलिए नीचे के स्तर का भ्रष्टाचार अपेक्षाकृत कम दोषवाला होगा । इस आपेक्षिक दृष्टि को बगैर अपनाये हम भ्रष्टाचार की जड़ तक नहीं पहुँच पाएँगे । १९६२ में राममनोहर लोहिया ने जब यह सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री पर इतना अधिक तामझाम , फिजूल खर्च क्यों होता है ? तब देश के राजनेताओं ने और बुद्धिजीवियों ने इस सवाल को अप्रासंगिक मानकर या तो मखौल उड़ाया या चुप्पी साध ली ।मंत्रियों का खर्च और उनकी नकल करने वालों का खर्च इस दरमियान बढ़ गया । वर्तमान प्रधा्नमंत्री का फिजूल खर्च तो इतना बढ़ गया है कि अखबारवाले भी ताना कस रहे हैं । जो लोग लोहिया के आरोपों को बकवास या द्वेषपूर्ण कहते थे इस वर्ग के लोग भी प्रधामंत्री , मंत्रियों और सांसदों की फिजूलखर्ची से चिन्तित हैं । लोहिया ने उन्हीं दिनों कहा था कि सर्वोच्च पद पर बैठे हुए आदमी का फिजू्ल खर्च तथा भोग-विलास पूरे समाज को भ्रष्ट बनाता है । अगर उसको हटाया नहीं गया तो उसके सहयोगियों में , नौकरशाहों में भोगवृत्ति बढ़ जाएगी ।

( जारी ,अगला भाग – फिजूलखर्ची और विलास) पिछला भाग (१) , सम्बन्धित आलेख (राजनीति में मूल्य : किशन पटनायक )

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