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Posts Tagged ‘अंग्रेजी’

यह कविता नहीं है। यह गर्दन दबाकर करवाई गई बहस का नतीज़ा है। हो सकता है कि साल दो साल काम करने के बाद कभी इसमें कविता जैसा भी कुछ आ जाए।

मैं पहले भी ‘कविता नहीं’ शीर्षक से एक कविता लिख चुका हूँ, इसलिए इसे क्या शीर्षक दूँ। जैसा है वैसा ही।

ला.

टोनी मॉरिसन इंग्लिशवालों के खिलाफ लिखती है

चाहो तो मुझे हिंदीवाला कह लो

पर उस वक्त मैं इंग्लिशवाला होता हूँ जब जातिसंघर्ष की बात करते हुए मैं बड़े कवियोंकी ही कविताएँ पढ़ता हूँ;

अंग्रेज़ी बोलना और इंग्लिशवाला होना दो अलग बातें होती हैं

इंग्लिशवाले चिल्लाते हैं कि टोनी मॉरिसन अंग्रेज़ी में लिखती है, पर सचमुच वह इंग्लिशवालों के खिलाफ लिखती है

मसलन दुनिया के तमाम मुल्कों में इंग्लिशवालों के खिलाफ जिहाद छिड़ा हुआ है

इंग्लिशवाले हिंदी, स्वाहिली, कोंकणी या इस्पानी ही नहीं, अंग्रेज़ी में भी

बेताबी से इस कोशिश में हैं कि हम उनकी इंग्लिशवाला होने की पहचान कर लें

वे दुनिया की हर भाषा में हमें सीख देते हैं कि हमारी भाषा में हम कुछ पढ़े न पढ़ें

पर उनकी अंग्रेज़ी हम ज़रूर पढ़ें, क्योंकि उनकी और उनकी ही भाषा में ज्ञान उपलब्ध है

 

अगर तुम ग़लती से कह बैठो कि तुम अंग्रेज़ी पढ़ लेते हो और जानते हो कि वे बकवास कर रहे हैं

वे तुम्हें सलाह देंगे कि तुम अंग्रेज़ी पढ़ना बोलना छोड़ दो हालाँकि ऐसा कहने की योग्यता प्राप्त करने के लिए उनको दोचार ज़िंदगियाँ और जीनी होंगी

 

क्या कीजे कि हम पुनर्जन्म में यकीन नहीं करते और उनके प्रति दया की भावना रखते हुए उन्हें अनसुना कर देते हैं

यह हमारी क्रूरता है कि हम मानते हैं कि इस ज़माने में इंग्लिशवाले असली ब्राह्मण हैं। कितनी ग़लत बात कि हम जानते हैं कि ब्राह्मण कौन और डोम कौन – अपनी कीरत अपनी कीमत।

——-लाल्टू

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[” मार्क टली भारत में एक परिचित नाम है । वे तीन दशक से ज्यादा समय तक भारत में बीबीसी के संवाददाता रहे हैं । भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किए जा चुके हैं । यह लेख कुछ साल पहले लिखा गया था । भारतीय संस्कृति पर नाज करने वाले मार्क टली ने हाल ही में टीवी पर एक इंटरव्यू के दौरान कारन थापर को जो कुछ कहा , वह गौरतलब है । करन थापर ने गुस्से से पूछा की क्या आप चाहते हैं की हम इस तरह से कपड़ा पहनना छोड़ दें , जमीन पर बैठने लगें ? मार्क टली ने कहा – “नहीं – नहीं , मैं ऐसा नहीं चाहता । मैं आपसे एक बात पूछता हूं कि आप क्या चाहते हैं – असली भारत या नकली अमेरिका ? ” यह सामग्री जिला शिक्षा अधिकार मंच  व्  विद्यार्थी युवजन सभा – जिला होशंगाबाद द्वारा प्रकाशित ‘जागो भारत श्रृंखला ‘ के परचे से साभार ली गई है । ]

दिल्ली में ,जहां मैं रहता हूं उसके आस-पास अंग्रेजी पुस्तकों की तो कई दर्जनों दुकानें हैं , हिंदी की एक भी नहीं । हकीकत यह है की दिल्ली में मुश्किल से ही हिंदी पुस्तकों की कोई दुकान मिलेगी । टाइम्स आफ इंडिया समूह के समाचार पत्र नवभारत टाइम्स की प्रसार संख्या कहीं ज्यादा होने के बावजूद भी विज्ञापन दरें अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले अत्यंत कम है । इन तथ्यों के उल्लेख का एक विशेष कारण है । हिंदी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली पांच भाषाओं में से एक है । जबकि भारत में बमुश्किल पांच प्रतिशत लोग अंग्रेजी समझते हैं ।

कुछ लोगों का मानना है यह प्रतिशत दो से ज्यादा नहीं है । नब्बे करोड़ की आबादी वाले देश में दो प्रतिशत जानने वालों की संख्या १८ लाख होती है और अंग्रेजी प्रकाशकों के लिए यही बहुत है । यही दो प्रतिशत बाकी भाषा – भाषियों पर प्रभुत्व जमाए हुए है । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के इस दबदबे का कारण गुलाम मानसिकता तो है ही , उससे भी ज्यादा भारतीय विचार को लगातार दबाना और चंद कुलीनों के आधिपत्य को बरकरार रखना है ।

इंग्लैण्ड में मुझसे अक्सर संदेह भरी नज़रों से यह सवाल पूछा जाता है की तुम क्यों भारतीयों को अंग्रेजी के इस वरदान से वंचित करना चाहते हो जो इस समय विज्ञान , कम्प्युटर ,प्रकाशन और व्यापार की अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन चुकी है ? तुम क्यों दंभी -देहाती (स्नाब – नेटिव )बनाते जा रहे हो ? मुझे बार – बार बताया जाता है की भारत में संपर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी क्यों जरूरी है, गोया यह कोई शाश्वत सत्य हो । इन तर्कों के अलावा जो बात मुझे अखरती है वह है भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी का विराजमान होना । क्योंकि मेरा यकीन है की बिना भारतीय भाषाओं के भारतीय संस्कृति ज़िंदा नहीं रह सकती ।

कोढ़ में खाज का काम अंग्रेजी पढ़ाने का ढंग भी है । पुराना पारंपरिक अंग्रेज़ी साहित्य अभी भी पढ़ाया जाता है । मेरे भारतीय मित्र मुझे अपने शेक्सपियर  के ज्ञान से खुद शर्मिन्दा कर देते हैं । अंग्रेजी लेखकों के बारे में उनका ज्ञान मुझसे कई गुना ज्यादा है । एन . कृष्णस्वामी और टी . श्रीरामन ने इस बाबत ठीक ही लिखा है जो  अंग्रेज़ी जानते हैं उन्हें भारतीय साहित्य की जानकारी नहीं है और जो भारतीय साहित्य के पंडित हैं वे अपनी बात अंग्रेज़ी में नहीं कह सकते । जब तक हम इस दूरी को समाप्त नहीं करते ,अंग्रेजी ज्ञान जड़विहीन ही रहेगा । यदि अंग्रेजी पढ़ानी ही है तो उसे भारत समेत विश्व के बाकी साहित्य के साथ जोड़िये न की ब्रिटिश संस्कृति के इकहरे द्वीप से ।

चलो इस बात पर भी विचार कर लेते हैं की अंग्रेजी को कुलीन लोगों तक मात्र सीमित करने के बजाय वाकई सारे देश की संम्पर्क भाषा क्यों न बना दिया जाए ? नंबर एक , मुझे नहीं लगता इसमें सफलता मिल पाएगी (आंशिक रूप से राजनैतिक कारणों से भी ) । दो, इसका मतलब होगा भविष्य की पीढ़ियों के हाथ से उनकी भाषा संस्कृति को जबरन छीनना । निश्चित रूप से भारतीय राष्ट्र की इमारत किसी विदेशी भाषा की नींव पर नहीं खड़ी हो सकती है । भारत , अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया की तरह महज भाषाई समूह नहीं है । यह उन भाषाओं की सभ्यता है जिसकी जड़ें इतनी गहरी हैं की उन्हें सदियों की औपनिवेशिक गुलामी भी नहीं हिला पाई ।

संपर्क भाषा का प्रश्न निश्चित रूप से अत्यंत कठिन है । यदि हिन्दी के लंबरदारों ने यह आभास नहीं दिया होता की वे सारे देश पर हिन्दी थोपना चाहते हैं तो समस्या सुलझ गई होती । अभी भी देर नहीं हुई है । हिन्दी को अभी भी अपने सहज रूप में बढाने की जरूरत है और साथ ही प्रांतीय भाषाओं को भी , जिससे की यह भ्रम न फैले की अंग्रेजी साम्राज्यवाद की जगह हिन्दी साम्राज्यवाद लाया जा रहा है । यहाँ सबसे बड़ी बाधा हिन्दी के प्रति तथाकथित कुलीनों की नफरत है । आप बंगाली , तमिल , या गुजराती पर नाज़ कर सकते हैं , पर हिन्दी पर नहीं । क्योंकि कुलीनों को प्यारी अंग्रेजी को सबसे ज्यादा खतरा हिन्दी से है । भारत में अंग्रेजी की मौजूदा स्थिति के बदौलत ही उन्हें इतनी ताकत मिली है और वे इसे इतनी आसानी से नहीं खोना चाहते ।

मार्क टली

 

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हिन्दी दिवस पर पेश हैं मेरे चिट्ठों पर भाषा के सवाल पर लिखे गये आलेख और बहस:

१. अंग्रेजी की दमघोटू दीवार : सुनील

२.हिन्दी दिवस ( १४ सितंबर ): महात्मा गांधी के विचार

३.भाषा पर गांधीजी : एक बहस

४.भाषा पर गांधी और लोहिया भी

५.परिचर्चा पर बहस जारी है

६.गाय नहीं , ‘काऊ’ : ले . सुनील

७.महारानी अंग्रेजी , दासी हिन्दी : ले. सुनील

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