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Archive for the ‘travelogue’ Category

बचपन से ही केन्द्र-शासित अंडमान – निकोबार द्वीप समूह के प्रति आकर्षण उन द्वीपों की भौगोलिक स्थिति के कारण भी था। भूमध्य रेखा से मात्र ६ डिग्री उत्तर से इनकी दक्षिणी सीमा का शुरु होना तथा भारतीय मानक समय निर्धारित करने वाली देशान्तर रेखा से करीब १० डिग्री पूर्व में होना ! यानि सदाबहार वन और मई के अन्त में भी पारिजात की सुवास तथा भोर ४.१५ – ४.३० बजे पौ फटना !

अण्डमान और निकोबार जैसे दुनिया के छोटे टापुओं से लगायत ऑस्ट्रेलिया जैसे विशाल टापुओं तक की स्थिति समुद्र की छोटी मछलियों की तरह रही है । बड़ी मछलियों की आधीनता और इस क्रम में मूल निवासियों का सफ़ाया । अंग्रेजों ने डच लोगों से इन द्वीपों को खरीदा था।

जी , द्वीप खरीदे जाते हैं , दान में भी मिलते हैं और गत दिनों दीवालिया होने वाला मुल्क आईसलैण्ड भी एक द्वीप ही है । स्कॉटलैण्ड का एक द्वीप किसी पोद्दार ने स्वामी रामदेव को अनशन शुरु करने के ऐन पहले दान में दिया । पोर्ट ब्लेयर पहुंच कर मालूम हुआ कि डॉ. फ़ारूख़ अब्दुल्लाह एक टापू के नामी (अथवा बेनामी?) मालिक हैं । इस टापू को खरीद कर काश्मीर से जुड़ी भारतीय संविधान की धारा ३७० की निहायत जरूरत की रक्षा करने की पात्रता को डॉक्टर साहब गँवा देते हैं । राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवाद की नुमाइन्दगी करने वाली भाजपा जब फिरकापरस्त सोच से इस धारा को हटाने की माँग उठाती है तब उसे हिमाचल और पूर्वोत्तर के राज्यों में लागू उसी प्रकार के प्रावधानों का हवाला दिया जाता है जिनके तहत ’पर-प्रान्तीय” नागरिक वहां जमीन नहीं खरीद सकते । दलित तथा आदिवासी की जमीनें भी न छीनी जा सकें इसलिए उनकी जमीनें खरीदने पर भी लाजमी तौर पर रोक रहती है । अण्डमान के हैवलॉक द्वीप का राधानगर समुद्र-तट बहुत सुन्दर है । सुना है कि टाटा इस पूरे तट को ले रहा है । मुमकिन है कि तट की खूबसूरती का लुत्फ़ तब टाटा के पांच -सितारा होटेल में टिके पर्यटक ही उठायें ।

पिछले दिनों जयललिता की सरकार ने तमिलनाडु में विधान परिषद को समाप्त करने का फैसला लिया।विधान सभाओं को दो तिहाई बहुमत से इन्हें (उस राज्य की विधान परिषद को) समाप्त करने का हक है।  अपने दल में विधान परिषद के औचित्य पर चर्चा के क्रम में मैंने कहा था कि आम लोगों के वोट से जीत कर आने का जिन सबल – समूहों में सामर्थ्य नहीं है उन्हें विधायिका तक पहुंचाने का यह एक उपाय है – विलोमारक्षण का नमूना । स्नातकों और शिक्षकों के लिए विधान परिषदों में सीटे होती हैं – सिर्फ़ दलित,सिर्फ़ रिक्शाचालक ,सिर्फ पटरी व्यवसाई ,सिर्फ़ खेतीहर मजदूर के वोटों से उनके नुमाइन्दों को विधायिका में भेजने का प्रावधान क्यों नहीं होता ? इस चर्चा को यहाँ बेवजह नहीं घसीटा गया है ।  केन्द्रशासित होने के कारण अण्डमान-निकोबार में स्थानीय निकायों का महत्व अन्य सूबों की तुलना में बहुत अधिक है । यह सिर्फ़ ग्राम प्रधानों के भव्य दफ़्तरों को देख कर यह नहीं कह रहा हूँ । अण्डमान और निकोबार शिक्षा निदेशालय द्वारा बाँग्ला , तमिळ, तेलुगु और हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूल चलाए जाते हैं । निकोबारियों की पंचायत यह निर्णय लेती है कि हमारे इलाके में पर-प्रान्तीय लोग न आये – स्थानीय प्रशासन इस निर्णय को लागू करने के लिए बाध्य है । यहाँ बताना जरूरी है कि निकोबारी एक मात्र आदिम जाति समूह है जो कथित आधुनिक मुख्यधारा में शरीक है ।

हमारी आधुनिक व्यवस्था ने अण्डमान और निकोबार के मूल निवासी आदिम जाति समूहों को अदृश्य करने की ठान ली है । अमानवीय लापरवाही इन समूहों से होने वाले सरकारी-असरकारी सम्पर्क का मूल द्योतक है । मानों दो वृत्त हों जो कथित आधुनिक सभ्यता की शुरुआत से अब तक असंपृक्त रहे हों । ’ग्रेट अण्डमान ट्रंक रोड’ के द्वारा आदिम जाति समूह के वृत्त का प्रतिच्छेदन ( intersection) किया गया है । पोर्ट ब्लेयर शहर से बाराटांग,रंगत,बेतापुर और डिगलीपुर जैसे कस्बों को जोड़ने के लिए समुद्र-मार्ग का उपयोग होता रहा होगा और अब भी हो सकता है। इस सड़क ने इस जमीन के मूल निवासियों को दिए हैं अजीबोगरीब खाद्य और तम्बाकू-पान से लेकर शराब जैसे मादक द्रव्य ।

तिबीलाछू

तिबीलाछू

बारातांड के निकट तोताटापू व चूना-पत्थर की गुफ़ाओं से लौटते वक्त एक जारवा महिला ने हमारे वाहन के ड्राइवर को यह फलों का गुच्छा दिया ।  ड्राइवर ने उसे तम्बाकू वाले एक पान की पुड़िया पहले ही दे दी थी। यह आदान-प्रदान पल-दो-पल में हुआ । कुछ किशोर तीर-धनुष लिए मोटरगाड़ी वालों के समक्ष नाच रहे थे। अधेड़ स्त्री-पुरुषों की र्निविकार निरीह दृष्टि । यह फल पहली बार चखा । पतला किन्तु कड़ा छिलका,सफ़ेद गूदा और हल्के गुलाबी तीन बीज । अगली सुबह जब यह तसवीर खीची तब गूदा भी रंगीन हो चुका था । गुच्छा वानस्पतिक रेशों से बँधा है(चित्र में प्लास्टिक डोर लग रहा होगा) । स्वाद में एक खट्टापन था । पोर्ट ब्लेयर के नृतत्वशास्त्रीय संग्रहालय में एक संरक्षित गुच्छा तिबीलाछू नाम से रखा गया है। लीची और तिबीलाछू एक ही कुनबे के फल लगे।

तिबीलाछू (बेरी)

संरक्षित तिबीलाछू (बेरी)

जारवा लोगों के इलाके की सीमा पर वन विभाग की चौकी है। निर्धारित समय पर पुलिस पार्टी के साथ वाहनों का काफ़िला चलता है।झारखण्ड के गिरीडीह जिले के एक हिस्से में नक्सलवादियों से डर कर ऐसे काफ़िले चलते हैं,याद आया । इस चौकी पर लिखा है कि यह फोर्स जारवा लोगों की सुरक्षा के लिए है ! काफ़िले में शरीक सभी मान कर चलते हैं कि जारवाओं से सुरक्षा के लिए पुलिस साथ है। सौभाग्य से इस चौकी पर ही अन्डमान आदिम जाति विकास समिति के एक कर्मचारी नवदीप बारोई से मुलाकात हो गई ।  जनगणना जैसे सरकारी काम के लिए सरकार को इनकी मदद मिलती है । वे जारवा भाषा भी जानते हैं । तीन इलाकों में कुल चार हजार की आबादी का अनुमान नवदीप ने बताया । पोर्ट ब्लेयर में एक मित्र ने कुछ चौंकाने वाली सूचनायें दीं । २०११ की जनगणना में अण्डमान-निकोबार की आबादी के घटने की आँकड़े जुटे थे – इस सही या गलत सूचना से प्रशासनिक हल्कों में हड़कम्प मच गया । आंकड़े ’सुधारे गए’ । इन्होंने बताया कि सरकार के द्वारा दिए जाने वाले राशन में भी तम्बाकू आदि शामिल कर लिया जाता है। आदिम जाति विकास समिति में जारवा भाषा जानने वाले तीन कर्मचारी हैं जो नीचे के पदों पर ही हैं । निश्चित तौर पर इस सड़क को बन्द कर दिया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बाबत एक ऐतिहासिक फैसला दिया था। इसे तोड़ने-मरोड़ने के तरीके निकल चुके हैं और हमारा अतिक्रमण जारी है ।

( जारी )

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    पिछले भाग : एक , दो

    युनाइटेड फार्म वर्कर्स आर्गनाइजिंग कमेटी के जिस कार्यक्रम को अधिक सफलता मिली है , वह है बहिष्कार । सीजर ने देखा कि केवल हड़ताल से काम बनता नहीं और एक मजदूर की जगह लेने के लिये अन्य मजदूर तैयार हैं , तो उसने दूसरा उपाय बहिष्कार का सोचा । अमरीका के बड़े – बड़े शहरों में जाकर उसने लोगों को यह समझाया कि केलिफोर्निया के उन उत्पादकों के अंगूर मत खरीदिए , जो अत्याचारी हैं और मजदूरों पर अन्याय कर रहे हैं । ये अंगूर एक खास प्रकार के होते हैं । इसलिए ग्राहकों के लिए पहचानना आसान होता है । बहिष्कार का यह कार्यक्रम काफी सफलता पा रहा है । इस समय अमरीका के कुछ प्रमुख शहरों में तथा इंग्लैण्ड , केनेडा , आयर्लैंड आदि कुछ देशों में भी केलिफोर्निया के उन अंगूरों की दूकानें बन्द हैं । इसके कारण सारे आन्दोलन को काफी प्रसिद्धि भी मिली है ।

    भूपतियों के क्रोध का सीजर को कई बार शिकार बनना पड़ा है । उसकी सभाओं में उस पर अंडे फेंके गये हैं । लेकिन फिर भी उसके व्याख्यान जारी रखने पर उसी श्रोता – मंडली ने उसका उत्साह से अभिनन्दन किया है । आंदोलन को बदनाम करने के लिये कुछ हिंसक उपद्रवियों को उसमें घुसाने की चेष्टा भी की गयी है । लेकिन त्याग और तपस्या पर अधिष्ठित  इस आंदोलन में ऐसे तत्व अधिक दिनों तक टिक नहीं पाये हैं ।

    १९६६ में सीजर और उसके साथियों ने अपने स्थान डेलेनी से केलिफोर्निया की राजधानी सेक्रामेन्टो तक की ३०० मील की पद-यात्रा की । इस पद-यात्रा को बहुत अच्छी प्रसिद्धि मिली । पद-यात्रा का उद्देश्य था राजधानी में गवर्नर से भेंट करना। लेकिन पूरी यात्रा समाप्त करके जब पचास पद-यात्री सेक्रामेन्टो पहुंचे , तब बारिश  में भीगते हुए उनके साथ और कई जाने – माने लोग और हजारों नागरिक शामिल हो गये थे । गवर्नर साहब ने इन लोगों से भेंट करने की अपेक्षा शनि और रविवार की छुट्टी मनाने के लिए चला जाना अधिक पसंद किया । लेकिन उसी समय अंगूर-उत्पादकों की एक बड़ी कम्पनी श्चेन्लीवालों ने मजदूरों के साथ एक कान्ट्रैक्ट पर दस्तख़त किये , जिसके अनुसार मजदूरों को प्रति घण्टे पौने दो डालर मजदूरी देने का तय हुआ । यह मजदूरों के लिए आज तक हुई सबसे बड़ी जीत थी ।

    सीजर की एक पद्धति ने उसे न चाहते हुए भी काफी प्रसिद्धि दी है । वह है अनशन । उसने आज तक अनेक बार अनशन किये हैं । सीजर को गांधी का चेला करार देनेवाला भी शायद यही सबसे बड़ा तत्व होगा ।

    अनशन के बारे में सीजर कहता है :

    ” मैंने अपने काम का आरम्भ ही अनशन से किया था । किसी पर दबाव डालने या अन्याय का प्रतिकार करने के लिए नहीं । मैंने तो सिर्फ़ इतना ही सोचा था कि एक बड़ी जिम्मेवारी का काम ले रहा हूँ । गरीब लोगों की सेवा करनी है । सेवा करने के लिए कष्ट उठाने की जो तैयारी होनी चाहिए , वह मुझमें है या नहीं , इसीकी परीक्षा करने के लिए वे अनशन थे । “

    लेकिन हर वक्त इसी उद्देश्य से उपवास नहीं हो सकते थे । बीच में एक बार उसने उपवास इसलिए किए थे कि उसे लग रहा था कि उसके साथियों में अहिंसा पर निष्ठा कम हो रही है । चुपचाप उपवास शुरु कर दिये । पहले तीन – चार दिन तक तो उसकी पत्नी और आठ बच्चों को भी पता नहीं चला कि सीजर खा नहीं रहा है । लेकिन फिर उसने अपनी शैय्या युनाइटेड फार्म वर्कर्स आर्गनाइजिंग कमेटी के दफ्तर  में लगा ली । सिरहाने गाँधी की एक तसवीर टँगी हुई है । बगल में जोन बाएज़ के भजनों के रेकार्ड पड़े हैं । कमरे के बाहर स्पैनिश क्रांतिकारी एमिलियानो ज़पाटा का एक पोस्टर लिखा था : ‘ विवा ला रेवोल्यूशियो’ जिसका अर्थ होता है – इन्कलाब जिन्दाबाद । दूसरी ओर मार्टिन लूथर किंग की तसवीर । “उपवास का सबसे बड़ा असर मुझ ही पर हुआ ”  सीजर ने कहा । गाँधी के बारे में  मैंने काफी पढ़ा था । लेकिन उसमें से बहुत सारी बातें मैं इस उपवास के समय ही समझ पाया । मैं पहले तो इस समाचार को गुप्त रखना चाहता था , लेकिन फिर तरह तरह की अफवाहें चलने लग गयीं । इसलिए सत्य को प्रकट करना पड़ा कि मैं उपवास कर रहा हूँ । लेकिन मैंने साथ ही यह भी कहा कि मैं इसे अखबार में नहीं देना चाहता हूँ , न हमारी तसवीरें ली जानी चाहिए । बिछौने में पड़े – पड़े मैंने संगठन का इतना काम किया  , जितना पहले कभी नहीं किया था । उपवास के समाचार सुनकर लोग आने लगे । दसेक हजार लोग आये होंगे । खेत – मजदूर आये । चिकानो तो आये ही , लेकिन नीग्रो भी आये , मेक्सिकन आये , फिलिपीन भी आये । मुझे यह पता नहीं था कि इस उपवास का असर फिलिपीन लोगों पर किस प्रकार का होगा । लेकिन उन लोगों की धार्मिक परम्परा में उपवास का स्थान है ।  कुछ फिलिपीन लोगों ने आकर घर के दरवाजे  , खिड़कियों रँग दिया , कुछ ने और तरह से सजाना शुरु किया । ये लोग कोई कलाकार नहीं थे । लेकिन सारी चीज ही सौन्दर्यमय थी । लोगों ने आकर तसवीरें दीं । सुन्दर सुन्दर तसवीरें । अक्सर ये तसवीरें धार्मिक थीं । अधार्मिक तसवीरें थीं तो वह जान केनेडी की । और लोगों ने इस उपवास के समय मार्टिन लूथर किंग और गांधी के बारे में इतना जाना , जितना सालभर के भाषणों से नहीं जान पाये । और एक बहुत खूबसूरत चीज हुई । मेक्सिको के केथोलिक लोग वहाँ के प्रोटेस्टेन्ट लोगों से बहुत अलग – अलग रहते थे । उनके बारे में कुछ जानते तक नहीं थे । हम लोग रोज प्रार्थना करते थे । एक दिन एक प्रोटेस्टेन्ट पादरी आया , जो श्चेन्ली में काम करता है । मैंने उसे प्रार्थना सभा में बोलने के लिए निमंत्रण दिया । पहले तो वह मान ही नहीं रहा था , पर मैंने कहा कि प्रायश्चित का यह अच्छा तरीका होगा । उसने कहा कि मैं यहाँ बोलने की कोशिश करूँगा तो लोग मुझे उठाकर फेंक देंगे । मैंने उनसे कहा कि यदि लोग आपको निकाल देंगे तो मैं भी आपके साथ निकल आऊँगा । उन्होंने कबूल कर लिया । भाषण से पहले उनका पूरा परिचय दिया गया , ताकि किसीके मन में यह भ्रम न रहे कि यह केथोलिक है । उनका भाषण अद्भुत हुआ । मैथ्यू के आधार पर उन्होंने अहिंसा की बात की । लोगों ने भी बहुत ध्यान से और उदारता से उनको सुना । और फिर तो हमारे पादरी ने जाकर उनके गिरजे में भाषण किया । “

     शियुलकिल नदी के किनारे कई घण्टों तक बातें हुई । इन बातों में सीजर की जिज्ञासा ने मुझे श्रोता न रखकर वक्ता बना दिया था । मेरे पिताजी का गांधी से मिलन , प्यारेलाल और पिताजी का सम्बन्ध , राम – नाम पर गांधीजी की आस्था , प्राकृतिक चिकित्सा पर श्रद्धा , विनोबा का व्यक्तित्व , भूदान और ग्रामदान की तफसील , शांति – सेना के बारे में , सब कुछ उसने पूछ डाला । उठने से पहले मैंने सीजर से दो प्रश्न किये । पहला प्रश्न था : ” अहिंसा की प्रेरणा आपको कहाँ से हुई ? ” उसने कहा : ” मेरी माँ से । बचपन ही से वह हम बच्चों को  यही कहती रहती थी कि बड़ों से डरना नहीं चाहिए और झगड़ा हो तो उनको सामने मारना भी नहीं चाहिए । मैंने इस उद्देश्य को अपने खेलों में बड़ों के साथ झगड़ा होने पर आजमाकर देखा । मैं बड़ों से डरता नहीं था , लेकिन उनको मारता भी नहीं था । मैंने देखा कि इसका काफी असर होता है । शायद इसीसे अहिंसा के बारे में मेरी श्रद्धा के बीज डाले गये होंगे । “

      दूसरा प्रश्न था : ” गांधी के बारे में आप कब और किस प्रकार आकर्षित हुए ? “

      उसके जवाब में सीजर ने एक मजेदार किस्सा बताया : ” १९४२ में मैं १५ साल का था । एक सिनेमा की न्यूज रील में गांधी के आन्दोलन के बारे में कुछ चित्र दिखाये गये । मैंने देखा कि एक दुबला – पतला- सा आदमी इतनी बड़ी अंग्रेज सरकार का मुकाबला कर रहा है । मैं प्रभावित तो हुआ ,  लेकिन थियेटर से बाहर आने पर उस दुबले-पतले आदमी का नाम भूल गया । तो उसके बारे में अधिक जानकारी कैसे प्राप्त करता ? लेकिन मेरे मन में उस आदमी का चित्र बन गया । अकस्मात एक दिन अखबार में मैंने उसी आदमी की तसवीर देखी । मैंने लपककर अखबार उठा लिया और उस आदमी का नाम लिख लिया । फिर पुस्तकालय में जाकर उनके बारे में जो कुछ भी मिला , पढ़ लिया । “

    इस लेख का अन्त हम सीजर शावेज के उस वचन से करेंगे , जो उसने अपने एक अनशन के बाद कहे थे : ” हम अगर सचमुच में ईमानदार हों , तो हमें कबूल करना होगा कि हमारे पास कोई चीज हो तो वह अपना जीवन ही है । इसलिए हम किस प्रकार के आदमी हैं , यह देखना होत तो यही देखना चाहिए कि हम अपने जीवन का किस प्रकार उपयोग करते हैं । मेरी यह पक्की श्रद्धा है कि हम जीवन को देकर ही जीवन को पा सकते हैं । मुझे विश्वास है कि सच्ची हिम्मत और असली मर्दानगी की बात तो दूसरों के लिए अपने जीवन को पूरी तरह अहिंसक ढंग से समर्पण करने में ही है । मर्द वह है , जो दूसरों के लिए कष्त सहन करता है । भगवान हमें मर्द बनाने में सहायता करें । “

    

   

 

    

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[ गांधी शताब्दी वर्ष ( १९६९ ) के उपलक्ष्य में सर्वोदय नेता नारायण देसाई दुनिया के कई देशों की यात्रा पर गये थे । उनका यात्रा वृत्तांत ‘ यत्र विश्वं भवत्येकनीड़म ‘ नाम से प्रकाशित हुआ था । अशोक पाण्डे की एक पोस्ट से प्रेरित हो कर जोन बाएज़ के बारे में लिखे इस किताब के एक अध्याय को ब्लॉग पर मैंने प्रकाशित किया था । आज भारत भूषण तिवारी ने गांधी प्रभावित किसान नेता सीजर शावेज़ पर एक पोस्ट लिखी है । इस पोस्ट से प्रेरणा मिली कि उपर्युक्त यात्रा वृत्तांत से सीजर शावेज़ के बारे में लिखे दो अध्याय चिट्ठे पर प्रकाशित किए जांए । ]

सीजर शावेज से मुलाकात

भारत के कवियों के डाक टिकटों का जब एक अलबम छपा , तब जाने किसकी पसंदगी के कारण , गुरुदेव की ये पंक्तियां रवीन्द्रनाथ के टिकट के साथ छापी गयीं :

कतो अजानारे जानाइले तुमि

कतो घरे दिले ठाई ।

दूर के करिले निकट बंधु

पर के करिले भाई ।

कितने अनजानों से तुमने करवाई पहचान । कितने-कितने घरों में दिलवाया स्थान , दूर पड़े को निकट में लाया , पर को किया भाई जान ।

मेरे प्रिय गीतों में से एक यह है । उसका सुर – छंद मैं जानता नहीं ; लेकिन जीवन में बार – बार इस गीत की धुन का अनुभव किया है । अनेक बार नये – नये घरों में अपनत्व का अनुभव किया है , जिनको कल तक देखा भी नहीं था , वे आज अचानक चिर-परिचित हो गये हैं ।

सीजर शावेज से परिचय भी उसी प्रकार की एक अद्भुत अनुभूति थी । पूर्वजन्म के बारे में मैं अज्ञानी आदमी हूँ । लेकिन अगर कभी कभी पूर्व जन्म के बारे में विश्वास होता है तो इसी कारण से । कभी – कभी मैं सोचता हूँ कि पूर्वजन्म में मैं जरूर कोई संतचरणरजअनुरागी रहा होऊँगा । ऐसा न होता तो इस जन्म में इतने संतों की सत्संगति बिना मांगे ही अनायास कैसे मिल जाती है ?

सीजर के साथ की भेंट ने मेरा यह विश्वास पक्का किया ।

पहले से मैं सीजर के विषय में कुछ जानकारी जरूर रखता था । मुझे यह मालूम था कि केलिफोर्निया में अंगूरर की खेती करनेवाले मजदूरों का संगठन करनेवाला नेता सीजर शावेज है । मुझे यह भी पता था कि सीजर को अहिंसा में रुचि है । लेकिन मुझे यह पता नहीं था कि पहली ही भेंट में वह मेरे हृदय में इस प्रकार बस जायेगा ।

बंधु चार्ली वाकर सीजर को अपने ‘गांधी क्वोलोक्वियम’ के लिए लाने को कई दिनों से कोशिश कर रहा था । एक दिन उसने मुझसे आकर कहा , मैं तो उसे यहाँ नहीं ला पाया , लेकिन तुम उससे मिलने का मौका मत चूकना । अमरीका जाने से पहले जिन लोगों से मिलने की मैंने सूची बनाई थी , उसमें सीजर का नाम था ही। पश्चिमी किनारे पर जाने के समय मैं मिल लूँगा , ऐसी कल्पना थी । लेकिन पता चला कि जब मैं पश्चिमी किनारे पर जाऊँगा , तब वह वहाँ होगा नहीं । इसलिए पूर्वी किनारे पर ही कहीं मौका ढूँढ़ने की फिराक में था । अचानक पता चला कि सीजर फिलाडेलफिया आ रहा है । वहाँ उसका कार्यक्रम इतना व्यस्त था कि मिलना संभव होगा या नहीं , पता नहीं था । नीग्रो मित्र वाली नेल्सन से कह रखा था कि सम्भव हो तो परिचय करवा देना ।

एक छोटे-से यहूदी मम्दिर में उनका व्याख्यान था , वहाँ पहुँच गया । आमसभा की भीड़ में भेंट की आशा रखना वृथा था । इसीलिए छोटी सभा चुनी थी ।

सभा के पीछे बैठकर मैं देख रहा था । भारत की किसी भी भीड़ में आसानी से छिप जा सके , ऐसा शरीर । ऊँचाई साढ़े पाँच फुट से अधिक नहीं होगी । वजन १४० से १५० पौंड होगा । मैं अमरीकन आदमी तरह अन्दाज लगा रहा था । रँग साँवला । नाक बिलकुल भारतीय , बुशशर्ट और पैंट अनाकर्षक । भाषण करने से पहले जेब से कुछ कार्ड निकाल लिये । उसमें भाषण के मुद्दे होंगे , इन कार्डों की ओर बीच-बीच में झाँकते हुए , लेकिन अधिकांश में श्रोताओं की ओर सीधा ताकते हुए बोलता था , अत्यन्त सरल शैली , अनाडंबरित , ऋजु । भाषण में अधिकांश समय अहिंसा के ही बारे में बोलता रहा । अमरीका में आने के बाद यह पहला वक्ता , जिसने अहिंसा को अपना मुख्य विषय बनाया । बोलना था उसे अपने द्राक्षश्रमिक आन्दोलन के बारे में , लेकिन अहिंसा पर बोले बिना वह रह नहीं पाता था ।

मार्टिन लूथर किंग की मृत्यु के बाद अमरीका में अगर अहिंसा का कोई सबसे बड़ा भक्त हो तो वह सीजर शावेज है । कुछ लोग उसे मैक्सिकन अमरीकन लोगों का ( जिन्हें बोलचाल की भाषा में चिकानो कहा जाता है। ) गांधी भी कहते हैं ।

सभा के समय मैं पीछे बैठा था । लेकिन इस आदमी का व्यस्त कार्यक्रम देखकर मन में तय कर लिया था कि इससे परिचय करने में भारतीय संकोच छोड़कर अमरीकन आत्मप्रशंसा का तरीका अपनाऊंगा । वाली नेल्सन ने हमारा परिचय कराया ही था कि मैंने कहा : ” मैं गांधी के आश्रमों में पला हूँ । उनके साथ अपने जीवन के पहले अठारह साल बिताये हैं ।” सीजर से समय माँगने की जरूरत ही नहीं रही । हमारा पौरोहित्य करने के लिए गाँधी आ चुके थे । सामने से सीजर ही ने कहा: ” आपके पास समय है ? आपसे मैं बहुत – बहुत बातें करना चाहता हूँ । ” सीजर क्या समझ रहा था कि मेरा समय भी उसके जैसा व्यस्त होगा ?

” आपके पास गाड़ी है ? ” दूसरा प्रश्न । मैंने कहा : ” नहीं ।”

” तो मेरे साथ चल सकते हैं ? ”

मैं तो उसके साथ पैदल चलने को भी तैयार खड़ा था ।

एक स्टेशन वैगन के पीछे की सीट को बदलकर सोने लायक बनाया गया था । यही थी सीजर की प्रवास की गाड़ी । मुझसे क्षमा माँग कर सीजर उस सीट पर लेट गये । सीजर की कमर का दर्द धीरेनदा (वरिष्ट सर्वोदय नेता धीरेन्द्र मजुमदार , तब जीवित थे) की याद दिलानेवाला । दो सभा के बीच समय रहता है तो उस समय में उनकी नर्स मेरिया मोजिज उनको मालिश कर देती है ।

” कहीं खाने के लिए जाने का कार्यक्रम बना है ? ”

” नहीं तो । ”

” तब मेरे साथ ही रूखा – सूखा खा लीजिए । मुझे भी इस समय फुर्सत है । ”

गाड़ी के अन्दर ही बातचीत का आरम्भ हो गया । नर्स मेरिया को भी गांधी में दिलचस्पी थी । और एक फोटोग्राफर बाब फिचर भी जाने कहाँ से इस गाड़ी में घुसा हुआ था । चलती गाड़ी में उसने कितनी ही तस्वीरें खींच लीं । बाद में पता चला कि बाब की हॉबी ही विश्व के शांतिवादियों की तस्वीरें लेने की थी ।

फिलाडेलफिया के एक बाग में सियुलकिल नदी के किनारे हरी दूब पर बातें चलती रहीं । शाम का भोजन भी वहीं बैठकर किया : सेंडविच और काफी । फिर अपने कैमेरे से सीजर ने मेरी तस्वीर ली । फिर बातें चलती रहीं । अन्त में मैंने चार्ली वाकर के निमन्त्रण की बात निकाली । सीजर ने कहा : ” गांधी-शताब्दी के सिलसिले में मुझे इस देश से ३० और विदेशों से ७ निमंत्रण मिले थे । कहाँ जाना और कहाँ नहीं ? अतएव मैंने सभी जगह न जाने का फैसला किया ।” मैंने कहा: “लेकिन चार्ली जो क्वोलोक्वियम बुला रहा है , वह दूसरे निमंत्रणों जैसा नहीं है । यह सरकारी गाँधी शताब्दी नहीं है , जिसकी कमेटी के अध्यक्ष वेयेटनाम युद्ध के समर्थक ह्यूबर्ट हम्फ्री हैं । इसमें न आडम्बर है , जैसा कि मेथर देली की अध्यक्षतावाली शिकागो की कमेटी में आप पायेंगे । यह जनता के अभिक्रम से होने वाला कार्यक्रम है और इस गोष्ठी का विषय भी गांधीजी : रेलेवन्स टु अमरीका टुडे ( आज के अमरीका में गांधी की आवश्यकता एवं उपयोगिता) है ।” सीजर ने जवाब दिया कि ” तुम कहते हो इसलिए मैं इस पर विचार करता हूँ । मेरे मन में भी खटकता था कि कि गांधी-शताब्दी में पूरे कार्यक्रम में मैं कहीं शामिल न होऊँ यह ठीक नहीं है । इसलिए सोचता हूँ कि क्या इसमें जा सकता हूँ ? ” सेक्रेटरी लोगों ने यह सिद्ध करने की कोशिश की कि सीजर के पास समय नहीं है , उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है , कल उनको न्यूयॉर्क तक गाड़ी से जाना है । लेकिन मैं भी गांधी के सेक्रेटरी का लड़का था । इसलिए उनकी किसी बात का इनकार न करते हुए और आवश्यकता से अधिक आग्रह न करते हुए भी मैं यह कहता रहा कि ऐसे लोगों के मानसिक सन्तोष का विचार पहले करना चाहिए । मुझे लगता है कि हेवरफोर्ड कॉलेज के कार्यक्रम में आने से सीजर को स्वयं संतोष होगा । मैं जानता था कि सीजर की अनुमति मैं पहले ही पा चुका था । इसलिए मंत्रिमण्डल को नाखुश करने की मुझे जरूरत ही क्या थी ?

सीजर ने हेवरफोर्ड आने का कबूल किया है , यह समाचार रात को ग्यारह बजे टेलीफोन से चार्ली वाकर को बताया , तब वह खुशी के मारे पागल -सा हो उठा । उससे से बात करने के पहले ही मैं सभा भवन की व्यवस्था कर चुका था और भाषण की सूचना देनेवाले पोस्टर्स बना चुका था। मेरे विद्यार्थी मित्रों से कहकर हर कॉलेज और हर छात्रावास में ये ये पोस्टर्स लगवाने की व्यवस्था भी कर ली गयी थी ।

दूसरे दिन सुबह सीजर के लिए हेवरफोर्ड कॉलेज में जो सभा हुई ,वह शायद गांधी क्वोलोक्वियम की सबसे बड़ी सभा थी । उसमें भी वही जेब से कार्ड निकाल कर भाषण के मुद्दों को ध्यान में रखते हुए , बिना किसी आडंबर के बोलना । वही श्रोताओं के दिल तक पहुंच जाने वाली शैली । भाषण की बीच ही किसीने श्रोताओं में हैट घुमाई । बिना किसी सूचना के आयोजित की हुई इस सभा में सीजर शावेज के ‘ला कॉज़ा’ (उद्देश्य) के लिए १७५ डॉलर का दान प्राप्त हुआ । फिलाडेलफिया की आमसभा की तुलना में यह रकम खराब नहीं थी , ऐसा मुझे बाद में वाली नेल्सन ने बताया । फिलाडेलफिया में श्रोता वर्ग प्रौढ़ों का था । हेवरफोर्ड कालेज में श्रोता-वर्ग तरुणों का था , जिन्हें गांधी आज के अमरीका के लिए उपयोगी मालूम होता था ।

[ जारी, आगे – ‘सीजर शावेज का व्यक्तित्व’https://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2009/03/28/cesar_chavez_gandhi_narayan_desai/ ]

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