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Archive for the ‘news’ Category

गत दिनों हुए विधान सभा चुनावों तथा उसके पहले लोक सभा के लिए हुए आम चुनाव में अख़बारों द्वारा प्रत्याशियों द्वारा ‘ पैसे लेकर खबरें छापने’ का मुद्दा ठंडा नहीं पड़ा है | लोक सभा चुनाव के दौरान समाजवादी जनपरिषद की तरफ से मैंने चुनाव आयोग और प्रेस परिषद् को इसकी शिकायत दर्ज कराई थी | अखबार के उन पृष्टों को अपने चिट्ठे पर छापा था – पूरे पेज पर एक ही उम्मीदवार से जुडी सिर्फ ‘पेड़ न्यूज ‘ ही थी | अगले दिन ,जो मतदान का दिन  था, उस अखबार की तत्कालीन सम्पादक मृणाल पांडे ने एक नन्हा -सा स्पष्टीकरण भी छापा था | मृणाल पांडे बरसों से एडिटर्स गिल्ड के जिम्मेदार पदों पर रही हैं | ‘हिन्दुस्तान’ से मुक्त किए जाने के बाद मृणाल पांडे ने ‘पेड खबरों’ के खिलाफ ‘द हिन्दू ‘ में एक लेख भी लिख दिया | ‘हिन्दुस्तान’ में अपने  संपादकत्व में इस बाबत चली नीति का उल्लेख किए बगैर | बनारस में एक बहुराष्ट्रीय शीतल पेय कंपनी द्वारा भूगर्भ जल-दोहन के खिलाफ चले आन्दोलन के बाद उस कंपनी का एक राष्ट्रीय स्तर का अधिकारी बनारस आया था | पांच सितारा होटल में प्रमुख अखबारों के स्थानीय सम्पादक बुलाये गए थे उसके द्वारा | उस कंपनी ने अखबारों से कहा था कि आप हमारा साथ दीजिए क्योंकि आपकी तरह हम भी ‘व्यावसायिक प्रतिष्ठान’ हैं |  ‘हिन्दुस्तान’ से राष्ट्रीय स्तर पर (अन्य शहरों के संस्करण तथा ग्रुप के अन्य अखबारों के लिए) करोड़ों के विज्ञापन की ‘डील’ हो गई थी | तब भी सम्पादक मृणाल पांडे ही थीं |
बहरहाल,

हाल ही में हुई एडिटर्स गिल्ड की बैठक में बी. जी. वर्गीज और मधु कीश्वर जैसों की एक समिति  बनाई गयी है | इन नामों से उम्मीद तो बनती है  | वर्गीज साहब वरिष्ट पत्रकार होने के अलावा मानवाधिकार के मसलों जैसे ओडिशा में फर्जी मुठभेड़ में नक्सलवादियों (जनता पार्टी की सरकार में गठित समिति ) की हत्या,  संघी संगठनों द्वारा काश्मीर में मंदिर जलाए जाने की झूठी खबरों को बेनकाब करने के लिए प्रसिद्ध रहे हैं | मधु कीश्वर भारत की महिला आन्दोलन की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं,भले ही बाद में  महिला आन्दोलनों से उनकी दूरी बन गयी हो  | एडिटर्स गिल्ड इसका ठीकरा चुनाव आयोग के सर पर फोड़ना चाहता है जबकि चुनाव आयोग पहले ही अखबारों से ‘पेड न्यूज’ की परिभाषा पूछ कर ‘सूक्ष्म में प्रवेश’ ( विनोबा इस जुमले का प्रयोग करते थे और इस क्रिया का भी | तब वे बड़े  मसलों पर नहीं बोलते थे | ) कर चुका है | गिल्ड की बैठक में यह कहा गया कि समस्या कुछ  अखबारों ने पैदा की है और सब अखबार और मीडिया  उनके कारण बदनाम हो रहे हैं | क्या बदनाम करने वाले अखबारों के सम्पादक गिल्ड , इन्डियन न्यूजपेपर एसोशियेशन अथवा प्रेस परिषद् जैसे निकायों के सदस्य नहीं हैं | मेरी इस मसले पर लोक सभा चुनाव के दौरान प्रेस परिषद् के दो सदस्यों से बात हुई थी – दोनों व्यक्ति आई एन ए से भी जुड़े रहे हैं | यह थे ‘जनमोर्चा’ के शीतला सिंह तथा गांडीव के राजीव अरोड़ा | इस मुलाक़ात के तुरंत बाद प्रेस परिषद् के अध्यक्ष का एक कार्यक्रम इन्हीं सम्पादक द्वय द्वारा आयोजित था, लखनऊ में | उस मौके पर परिषद् के अध्यक्ष ने पेड न्यूज छापने वाले अखबारों की जमकर खबर ली थी |
नख-दन्त विहीन होने के बावजूद प्रेस परिषद् की संस्तुतियों का एक नैतिक दबाव अखबारों पर पड़ता है | ‘९२ के दौर में  पूर्वी उ.प्र के प्रमुख अखबार विहिप -बजरंग दल के परचों की तरह छप रहे थे | जैसे एक दिन ‘आज’ ने अपने सभी संस्करणों में मुख पृष्ट पर आठ कालम का बैनर दिया था ‘राम लला की मूर्ती गायब’ ! हमारे जैसे समूहों ने  इन अखबारों  शिकायत प्रेस परिषद् से की थी |अखबारों के दफ्तरों के सामने परचे बांटे थे | और जब परिषद् ने रघुवीर सहाय की सदारत में मसले की जांच के लिए समिति बनाई थी तब उसके समक्ष शआदत भी दी थी | सहाय जी की समिति ने अखबारों की इस भूमिका की कड़े  शब्दों में निंदा की थी | हालांकि वह पूरा मसला ही काठ की हांडी किस्म का था लेकिन उस समिति की सिफारिशों का असर सकारात्मक हुआ था |
प्रख्यात पत्रकार पी.साईनाथ ने महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव में अखबारों की इस प्रकार की भूमिका पर लिखा और अभी भी लिख रहे हैं |
इस पूरे मसले पर गौर करने पर हम पाते हैं कि प्रेस परिषद् , चुनाव आयोग , एडिटर्स गिल्ड ‘पेड न्यूज’ के खतरों पर बोल चुके हैं | राजनैतिक दल भी  अखबारों के ये ‘पॅकेज’ खरीदने को मजबूर हो जाते हैं इसलिए उनकी तरफ से भी यह आवाज उठ सकती है | समाजवादी जनपरिषद जैसे छोटे दलों के खिलाफ यह नीति ज्यादा जाती है इसलिए हमने तो शुरू से इसके खिलाफ बोला ही है |
आप सोचेंगे कि तब कौन सा तबका बचा जो इस प्रकार के जम्हूरियत विरोधी व्यावसायीकरण के हक़ में होगा ? यह तबका कम चर्चा में रहता है | राष्ट्रपति , प्रधान मंत्री , मुख्य न्यायाधीश और संपादकों से भी यह तबका एक माने में विशिष्ट है | अन्य सभी की तनख्वाहें वे खुद तय नहीं करते परन्तु यह तबका अपना वेतन और पॅकेज खुद तय करता है | यह तबका है मीडिया संस्थानों के मैनेजरों का | यह तबका अखबारों के लेखों के पारिश्रमिक और सम्पादकों की तनख्वाह घटवाता है और अपनी बढ़वाता है |
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इस मसले पर लिखी गयी अन्य पोस्ट :

चुनावों में अखबारों की गलीज भूमिका

( अप्रैल ४ , २००९ )

चुनाव से सम्बन्धित रिपोर्टिंग के लिए प्रेस परिषद के दिशा – निर्देश

(  अप्रैल ६ , २००९ )

चुनाव में मीडिया की संदिग्ध भूमिका पर ऑनलाईन प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर करें

( मई १२ , २००९)

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लेख का भाग एक , दो 

    समाचार-पत्र अगर समाचारों के पत्र होते , तो इतनी सारी बहस की जरूरत नहीं होती । अगर दुनिया मे कभी समाचारों का पत्र होगा तो वह एक बिलकुल भिन्न चीज होगी । मौजूदा सभ्यता में समाचार-पत्र एक तरह से देखें तो जनमत का प्रहरी है , दूसरे ढंग से देखें तो वह जनमत का निर्माता है । यह मत-निर्माण सिर्फ तात्कालिक मुद्दों के बारे में नहीं होता है , बल्कि गहरी मान्यताओं और दीर्घकालीन समस्याओं के स्तर पर भी होता है । यह मत-निर्माण या प्रचार इतना मौलिक और प्रभावशाली है कि इसे मानस-निर्माण ही कहा जा सकता है । प्रचार का सबसे प्रभावशाली रूप है समाचार वाला रूप । अगर आप यह कहें कि ’ गन्दगी से घृणा करनी चाहिए’, तो यह गन्दगी के खिलाफ़ एक कमजोर प्रचार है । अगर आप कहें कि ’गन्दगी बढ़ गयी है’, तो गन्दगी के खिलाफ़ यह ज्यादा प्रभावशाली वाक्य है । आप कहे कि ’पाकिस्तान को दुश्मन समझो’, तो इसका असर कम लोगों पर होगा । कुछ लोग पूछेंगे , क्यों ? लेकिन वही लोग जब पढ़ेंगे कि ’ पाकिस्तान को अमरीका से हथियारों का नया भंडार मिला’ तो दुश्मनी अपने आप मजबूत हो जायेगी । आप प्रचार करेंगे कि ’ हमें पाँच-सितारा होटलों की जरूरत है’, तो लोग कहेंगे – नहीं । लेकिन वे जब पढ़ेंगे कि ’ होटल व्यवसाय से सरकार ने १० करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा कमाई’ तो उन्हें खुशी होगी । प्रचार में द्वन्द्व रहता है । शिक्षा – दान में द्वन्द्व रहता है । समाचार में द्वन्द्व नहीं होता है – इसलिए समाचारों से मान्यतायें बनती हैं , मानस पैदा होता है । इसीसे अनुमान लगाना चाहिए कि दैत्याकार बहुराष्ट्रीय पत्र – पत्रिकाओं का कितना प्रभाव तीसरी दुनिया के शिक्षित वर्ग पर होता है ।

     गांधीजी ने जब ’हिन्द-स्वराज्य’ लिखा, डॉक्टरों और वकीलों के पेशे को समाज-विरोधी पेशे के रूप में दिखाया । हो सकता है कि वे उदाहरणॊं की संख्या बढ़ाना नहीं चाहते थे या हो सकता है कि पत्रकारों के समाज – विरोधी चरित्र का साक्षात्कार उन दिनों उन्हें नहीं हुआ था । गांधी अति अव्यावहारिक विचारकों की श्रेणी में आते हैं । उनके सपने का समाज नहीं बनने वाला है । हम वकीलों-डॉक्टरों के पेशे को समाज -विरोधी नहीं कह सकते । साधारण नागरिक के लिए पग-पग पर वकील-डॉक्टर की सेवा की जरूरत पड़ जाती है । जैसे हम जानते हैं कि स्कूलों में अच्छी शिक्षा नहीं दी जाती है, लेकिन हम अगर स्कूलों को समाज विरोधी कहेंगे, तो हमारे बच्चे मूर्ख रह जायेंगे । इसी तरह समाचार-पत्र के आधुनिक मनुष्य के लिए  एक बहुत बड़ा बोझ होने पर भी उसे पढ़े बिना रहने पर हम अज्ञानी रह जायेंगे । समाज में बात करने लायक नहीं रह जायेंगे । ज्यादा से ज्यादा आप इसे एक विडम्बनापूर्ण स्थिति कह सकते हैं , जहाँ समाचार-पत्रों की स्वाधीनता है , लेकिन पत्रकार पराधीन है । समाचार-पत्र आधुनिक मनुष्य के ऊपर एक बहुत बड़ा अत्याचार है । साथ ही , वह हमारी सांवैधानिक आजादी का माध्यम भी है ।

– स्रोत : सामयिक वार्ता , अक्टूबर , १९८८

 

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( लेख का पिछला भाग ) पत्रकारों में एक निपुणता होती है । उनकी भाषा चुस्त होती है । वे तर्क और भावना का पुट देकर विषयों पर रोशनी डालते हैं । लेकिन विज्ञापन सामग्री के रचनाकारों में भी तो ये सारी योग्यतायें होती हैं । कुछ विज्ञापनों को पढ़ते वक्त भ्रम हो जाता है कि हम साहित्य या दर्शन पढ़ रहे हैं । विज्ञापन सामग्री बनाने वाले का नाम नहीं छपता है । कुछ अरसे के बाद छप सकता है । क्यों नहीं ? राजनैतिक – सामाजिक मुद्दों पर समाचार – टिप्पणी लिखनेवालों की ज्यादा चर्चा होती है । उनकी प्रतिष्ठा बनती है ।  उस प्रतिष्ठा का बड़ा हिस्सा यह है कि वे एक दैत्याकार उद्योग के बुद्धिजीवी हैं । प्रतिष्ठा का दूसरा हिस्सा यह है कि कुछ पत्रकारों में लेखकवाला अंश भी होता है । यहाँ हम ’लेखक’ शब्द का इस्तेमाल बहुत संकुचित अर्थ में कर रहे हैं । लेखक वह है जो अपनी समग्र चेतना के बल पर अभिव्यक्ति करता है । लेखक की कसौटी पर पत्रकार की कोटि लेखक और लिपिक के बीच की है । जैसे किसी जाँच आयोग का प्रतिवेदन लिखनेवाला कर्मचारी , कनूनी बहस की अरजी लिखनेवाला वकील या पर्यटन गाइड लिखनेवाला भी लेखक ही होता है। आज के दिन आप नहीं कह सकते हैं कि एक अच्छा पत्रकार एक घटिया साहित्यकार से बेहतर है । दोनोंके प्रेरणा स्रोत अलग हैं । यह हो सकता है कि कोई व्यक्ति साहित्य लिखना छोड़कर  पत्रकार के रूप में अच्छा नाम कमाए । अभी सिर्फ भारतीय भाषाओं की पिछड़ी हुई पत्र – पत्रिकाओं में साहित्यिकों को पत्रकारिता के काम के लिए बुलाया जाता है।अत्याधुनिक पत्र-पत्रिकाओं में ऐसी परिपाटी खत्म हो गई है , क्योंकि साहित्यिकों में ऐसे संस्कार होते हैं , जो पत्रकारिता के लिए अयोग्यता के लक्षण हैं ।

अगर किसी बड़े समाचार-पत्र का सम्पादक दावा करता है कि उसके काम – काज में सेठजी ने कभी दखल नहीं दिया , तो उस सम्पादक को यह भी मालूम होना चाहिए कि आधुनिक सेठजी दखल नहीं दिया करते । ऐसे अनेक सेठजी होंगे , जिन्होंने कभी अपने बावरची , खजांची या दरजी के काम में दखल नहीं दिया हो । बड़े समाचार-पत्रों का सम्पादक चुने जाने की एक योग्यता यह है कि  उसको अक्लमन्द होना चाहिए , ताकि उसके काम में मालिक को दखल देना न पड़े । जिस पत्रकार में लेखक वाला संस्कार बचा है  , उसके काम में दखल देना पड़ जाता है । इसीलिए मुम्बई के हमारे एक दोस्त को बहुत समय तक सम्पादक नहीं बनाया गया । दिल्ली में हमारे एक दूसरे दोस्त एक बड़े उद्योगपति के प्रमुख अखबार के पत्रकार हैं । उस अखबार में एक वरिष्ठ पत्रकार थे , जो अपने व्यक्तिगत जीवन में घोर साम्यवादी हैं । उनका लेखन उच्च कोटि का था , जिस पर अखबार को गर्व था । जब उनकी सेवा-निवृत्ति का समय आया , तो हमारे दोस्त ने चुटकी ली ,” कामरेड , आपका जो लम्बा जीवन बाकी है उसमें मैं आशा करता हूं कि आप हमारे उद्योगपति – मालिक के धन्धों के बारे में एक पुस्तक लिखेंगे ।” “क्यों ?” ” उनमें स्वतंत्र-लेखन शक्ति बच नहीं गई है , अगर उनमें ऐसी कोई शक्ति बची होगी तो मालिक की ओर से पत्र में नियमित कॉलम के माध्यम से उनको अच्छी रकम मिलती रहेगी । “

नई पीढ़ी के पत्रकारों के मामलों में यह जोखिम नहीं है । वे लेखक या विचारक के रूप में नहीं , शुरु से ही पत्रकार के रूप में प्रशिक्षित हो रहे हैं । यहाँ विचारों को दबाने के लिए अधिक भत्ता देना नहीं पड़ता है – सिर्फ इस काम को आकर्षक बनाने के लिए खूबसूरत वेतन – भत्ते का प्रबन्ध रहता है । यह वेतन – भत्ता विशिष्टजनों के लायक है । इस वेतन-भत्ते के लायक होने के लिए प्रतिबद्धताविहीन बुद्धिजीवी होने का प्रशिक्षण उन्हें मिलता रहता है । समाचार-पत्र उद्योग के प्रसार के लिए यह एक शर्त है कि समाज में प्रतिबद्धताविहीन लेखकों का एक बुद्धिजीवी वर्ग पैदा किया जाये । यानी शिक्षा और प्रशिक्षण की प्रक्रिया में ही उन्हें मालिक वर्ग की विचारदृष्टि में दीक्षित कर लिया जाए , ताकि किसी आदरणीय सम्पादक के बारे में यह कहना न पड़े कि वे अपने विचारों को दबाकर लिख रहे हैं । हम सीधे कह सकते हैं कि सम्पादक की विश्वदृष्टि और सेठजी की विश्वदृष्टि में एक अपूर्व मेल का संयोग है ।

( अगली किश्त में समाप्य )

भाग – तीन

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मनुष्य की आज़ादी एक टेढ़ी खीर है । किसी भी व्यवस्थित समाज में अभिव्यक्ति की पगडंडियां बन जाती हैं । आजादी के औजार बने बनाये रहते हैं । औसत मनुष्य उन औजारों के सहारे अपनी स्वतंत्रता का बोध कर लेता है । आजादी की जो पगडंडियां बनी हुई हैं , उनमें से समाचार – पत्र एक है । रोज सबेरे एक अखबार खरीदकर आप इस पगडंडी पर चल सकते हैं । वोट देने , वकील नियुक्त करने , अखबार खरीदने की प्रक्रियाओं में हमारी सांवैधानिक आजादी प्रतिफलित होती है । अगर राजनैतिक दलों , अखबारों , वकीलों की आजादी नहीं रहेगी , तो हमारी आजादी भी नही रहेगी ।

आधुनिक टेकनोलौजी ने समाचार-पत्रों तथा दूसरे संचार माध्यमों की क्षमता बढ़ा दी है । करोड़ों – अरबों लोगों की अभिव्यक्ति का ठेका एक समाचार-पत्र ले सकता है । ऐसे समाचार-पत्रों का संचालन सिर्फ सत्ताधारी पूंजीपति कर सकते हैं। संचार और अभिव्यक्ति – इन दो शब्दों का कुछ लोग एक ही अर्थ लगाते हैं । संचार आसान हो गया है तो कहते हैं कि अभिव्यक्ति आसान हो गयी है । बात उलटी है । संचार माध्यमों के द्वारा सिर्फ उन सारे लोगों की अभिव्यक्ति बनी रहेगी , जिनको संचार-माध्यमों के मालिक चुन लेंगे ।IMG_0314 बड़े समाचार-पत्रों ने छोटे पत्रों की अभिव्यक्ति छीन ली है । अब जो स्थानीय पत्र होते हैं , वे बड़े पत्रों के स्थानीय संस्करण जैसे ही होते हैं । अलग अभिव्यक्ति हो नहीं सकती। पुरानी टेकनौलोजी में यह संभव था कि सत्ता में रहे बगैर भी समाजवादी , साम्यवादी , ग्रामोद्योगवादी , नास्तिकवादी दृ्ष्टिकोण की पत्रिकाएँ समाज में प्रतिष्ठित हो सकती थीं । अब सिर्फ़ अपने समर्थकों के बीच ही उनका वितरण सीमित रहता है । तात्कालिक राजनैतिक प्रश्नों को छोड़कर हर चीज पर सारे प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों का स्वर एक-जैसा होता है । ’टाइम’ और ’न्यूजवीक’ के बीच , हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के बीच अभिव्यक्तियों का संसार पूरा हो जाता है ।

कुछ लोग आजादी के बाद और उसके पहले की पत्रकारिता की तुलना करते हैं और कहते हैं कि पहले के पत्रकार अच्छे थे । ऐसा कहना गलत है । अच्छे और बुरे पत्रकार की बात नहीं है । टेकनौलोजी बदल गयी है । आधुनिक टेकनौलोजी के फलस्वरूप पत्रकारिता एक बड़ा उद्योग बन चुकी है और पत्रकार नामक एक नये किस्म के सम्पन्न कर्मचारी-वर्ग का उदय हुआ है । दूसरे बड़े उद्योगों को चलानेवाला कोई पूंजीपति इस उद्योग को भी चला सकता है या अपनी औद्योगिक शुरुआत समाचार-पत्र के ’उत्पादन’ से कर सकता है । इस उद्योग के सारे कर्मचारी उद्योगपति समेत पत्रकार हैं । हम जब समाचार-पत्र की आजादी की बात कहते हैं , तो उसे पत्रकारों की आजादी कहना एक भयंकर भूल होगी । आधुनिक टेकनौलोजी ने पत्रकार के साथ यही किया है , जो हर प्रकार के श्रमिक-उत्पादकों के साथ किया है  । आधुनिक टेकनौलोजी ने बुनकरों , चर्मकारों , लोहारों जैसे श्रमिक-उत्पादकों के हाथ में ऐसा कोई कौशल नहीं दिया जिससे उनकी उत्पादन-कार्यक्षमता बढ़ जाए । इस टेकनौलोजी ने ऐसा यन्त्र और ऐसी व्यवस्था पैदा की है , जिसमें श्रमिक खुद उत्पादक न हो सके , वह किसी व्यवस्थापक या प्रबन्धक के अधीन एक मजदूर बन कर रह जाए । लेखकों -पत्रकारों के साथ यही हुआ । आधुनिक टेकनौलोजी के पहले जो पत्र निकलते थे,उनमें अधिकांश पत्रों को निकालने वाले लोग लेखक-साहित्यिक-विचारक थे । औपचारिक या अनौपचारिक ढंग से उनका समूह होता था और उस समूह की ओर से पत्र प्रकाशित होते थे । नई टेकनौलोजी के बाद लेखक अपना पत्र नहीं निकाल सकता। पत्रकार अपना लेख भी नहीं लिख सकता । उसका लिखना एक व्यवस्थापक के संयोजन के तहत होता है ।  किसी प्रतिष्ठित पत्र के मालिक अब प्रेमचन्द , बाल गंगाधर तिलक , गांधी या गोपबन्धु दास नहीं हो सकते । इसका मतलब यह नहीं कि कोई लेखक समाचार-पत्र का मालिक नहीं हो सकता है । होने के लिए उसे अपना लेखक-साहित्यिक-विचारक का जीवन छोड़कर व्यवस्थापक या उद्योगपति का जीवन अपनाना होगा । कहने का मतलब यह भी नहीं है कि हरेक लेखक या विचारक का अपना पत्र होना चाहिए । लेकिन पत्र अवश्य लेखकों का होना चाहिए । समाचार-पत्र हो या कपड़ा , आज की उत्पादन – व्यवस्था में उद्योगपति-व्यवस्थापक को छोड़कर कोई नहीं कह सकता है कि यह ’मेरा उत्पाद है ।’ कुछ लोग अपने को धोखा देने के लिए कह सकते हैं कि यह हमारा सामूहिक उत्पादन है । इस धोखे को विश्वसनीयता प्रदान करने के लिए ’प्रबन्धन में मजदूरों की हिस्सेदारी’ का सिद्धान्त कुछ दिनों तक चला । आधुनिक टेकनौलोजी ने इस सिद्धान्त का मखौल उड़ाया है । अत्याधुनिक टेकनौलोजी में मजदूरों का जो स्थान है , दैत्याकार समाचार-पत्रों में पत्रकारों का वही स्थान है । इसलिए उनको वास्तविक रूप में पत्रकार माना और कहा जाए या नहीं , यह प्रश्न उठ सकता है ।

( जारी – भाग दो , तीन )

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बुरे दिनों में साथ निभाना दोस्ती का असली मानदण्ड है । आपात काल के दौरान सेंसरशिप द्वारा अभिव्यक्ति की आज़ादी गला दबा दिया गया था । देश भर से निकलने वाली साइक्लोस्टाइल्ड (कई तरुण इस मुद्रण-तकनीक से परिचित न होंगे) बुलेटिनों के अलावा लन्दन से प्रसारित हिन्दी , उर्दू , बांग्ला में बीबीसी की पूर्वी विश्व सेवा(Eastern service) की खबरें , विश्लेषण और साक्षात्कार समाचारों का प्रमुख स्रोत था । उत्तर भारत के घर-घर में रत्नाकर भारतीय , कैलाश बुधवार ,ओंकारनाथ श्रीवास्तव के नाम आत्मीय हो गये थे ।

बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौर में भी जब दुनिया भर की सरकारों ने इस नये मुल्क को मान्यता नहीं दी थी परन्तु दुनिया भर की लोकतांत्रिक मूल्यों में यकीन रखने वाली जनता ने अपने दिलों में जगह दे दी थी तब भी बीबीसी की रेडियो सेवा खबरों का एक विश्वसनीय स्रोत थी ।

उन दिनों भी भारत में लोग यह कहना न भूलते कि बीबीसी सौ ‘सच’ बोलने के बाद जब एक ‘झूठ’ बोलता है तब वह विश्वसनीय हो जाता है । भारत में जब प्रसार भारती द्वारा प्रसारण संस्थानों को स्वायत्तता देने की बात आई तब भी बीबीसी के मॉडल का अध्ययन किया गया था।

निश्चित ही पाकिस्तान , बांग्लादेश और नेपाल के लोगों को भी इस सेवा का लाभ मिलता होगा।खास तौर पर राजशाही ,सैनिकशाही और अधिनायकतंत्र के दौर में ।

बहरहाल पिछले शुक्रवार से इस संवाद सेवा के अन्त की शुरुआत हो चुकी है । कोका-कोला और पेप्सी कोला जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जैसे भारत ,पाकिस्तान,बांग्लादेश में अपनी आनुषंगिक कम्पनियां बना लेती हैं और फिर कीटनाशक अवशेषों के यूरो-मानकों से मुक्त हो जाती हैं ,ठीक वैसे ही बीबीसी लन्दन को समाप्त कर भारत , पकिस्तान , बांग्लादेश , नेपाल में प्रदूषित उत्पादों की दुकाने खोल दी हैं । पाकिस्तान में एक एफ़ एम चैनल से समझौता हुआ तो भारत में भी अप्रशिक्षित कर्मियों को प्रसारण की कमान सौंप दी गयी है । कुल मिला जुला कर विश्व सेवा के खात्मे से उन तमाम सद्गुणों का खात्मा हो रहा है जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है ।

नैशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स बीबीसी के इस कदम के खिलाफ संघर्षरत है ।  हम इन पत्रकारों की लड़ाई के प्रति समर्थन जताते हैं ।

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