Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘hindi’ Category

आज अपराह्न में भदैनी, वाराणसी स्थित तुलसी पुस्तकालय में चर्चित और प्रखर कवि राजेन्द्र राजन ने अपनी लगभग बीस कविताओं का पाठ करके यह स्पष्ट कर दिया कि सरल सहज भाषा में सभी कुछ इतनी तीव्रता के साथ व्यंजित किया जा सकता है कि फ़िर और किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं पड़ती। निश्चय ही कुछ कविताएं एक-दो दशक पहले से हमारे सामने आ रही हैं, पर वे वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक संदर्भों और राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में इतनी ताजगी लिए हुए हैं, मानों उन्हें अभी-अभी कहा गया हो।

 

इस एकल काव्य कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति ने कहा कि कवि ने विद्रूपता के किसी भी कोने को छोड़ा नहीं है। सत्ता और ताकत से सम्पन्न शासक-वर्ग के मन की कुरूपता को यदि नग्न किया है तो उस जनता को भी नहीं छोड़ा है, जो विजेता के पक्ष में होने के सुखद अहसास को महसूस करना चाहती है। कवि ने स्वयं को भी नहीं छोड़ा है, जो अपनी ज़िन्दगी को चलाने के लिए दूसरों के द्वारा दिए गए विषय पर सोचता है और दूसरों के द्वारा निर्धारित भाषा में सुर में सुर मिलाकर बोलता है; और कवि ऐसा पेड़ हो गया है, जो छाया फ़ल और वसंत की अनुभूति देने में सक्षम नहीं रहा। कवि शब्दों को भी नहीं छोड़ता है क्योंकि फूल, पहाड़, नदियों का सौन्दर्य और बाकी सब कुछ शब्दों से ढंका हुआ है और वह वास्तविक सौन्दर्य को नहीं देख पाता है।

 

श्रेय पाने की लिप्सा में पहले के लोगों की कोशिशों को नकार दिया जाए और नया इतिहास लिखने की कोशिश हो, इससे कवि सहमत नहीं है। इतिहास में जगह बनाने के लिए आतुर लोग जानते हैं कि इतिहास में कितनी जगह है, अत: वे अपनी जगह बनाने के लिए एक-दूसरे को धकियाते हैं। मज़े की बात है कि कुछ लोग अपनी छोटी-सी जगह पर इस कारण चुप रहते हैं कि उनसे वह जगह भी न छिन जाए। ‘विकास’ में विकास के नाम पर सभी प्राकृतिक अवदानों के कम होते जाने पर और ‘नया युग’ असहमत लोगों को हटाने मात्र से विकास का अहसास कराए जाने की कुत्सित चेष्टा को सामने लाती है। ‘प्रतिमाओं के पीछे’ में स्वयं के वास्तविक रूप को छिपाने की चेष्टा करने वालों पर तीखी टिप्पणी है। ‘ताकत बनाम आज़ादी’ में निस्सार सत्ता-सुख में डूबे लोगों को आज़ादी के सुख को याद दिलाया गया। ‘छूटा हुआ रास्ता’ और ‘लौटना’ कविताओं में कवि अपने वास्तविक व्यक्तित्व के क्षय से पीड़ित होता है और लौटना चाहता है।

 

तालिबान द्वारा ‘बामियान में बुद्ध’ की विशालकाय मूर्तियों को तोड़ा जाना कवि को आहत करता है और उसे खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान याद आते हैं, जो बुद्ध की तलाश में बामियान में भटक रहे हैं। ‘बाजार में कबीर’ कबीर अपनी चादर इसलिए नहीं बेच पाते हैं क्योंकि वह किसी कंपनी का नहीं है। उस चादर का खरीदार नौकरशाहों द्वारा संचालित कंपनी-अधिनियम और राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चमक में कबीर को भला कैसे खोज पाएगा। ‘मनुष्यता के मोर्चे पर’ इस विडंबना को सामने लाती है कि आदमी ज़िन्दगी में उठने के लिए गिरता है और ऐसी स्थिति में कवि आत्मकेन्द्रित होता चला जाता है। ‘हत्यारों का गिरोह’ कविता उस षड्यंत्र को नग्न करती है जो संवेदनशून्य-तंत्र नित्य हमारे आस-आस रच रहा है। ‘तुम थे हमारे समय के राडार” कविता में कवि ने समाजवाद के पुरोधा और अपने गुरु किशन पटनायक जी को शिष्य के रूप में तथा अहोभाव से याद किया है।

 

 

कार्यक्रम के आरंभ में संजय गौतम ने बताया कि किस प्रकार राजेन्द्र राजन ने स्वयं को विचारधाराओं और संगठनों की सीमाओं से बचाए रखा और शब्दों के अर्थ को सुनिश्चित करते हुए आज के समय की प्रत्येक मूर्त और अमूर्त घटना और समस्या को पैनी निगाह से देखा है। इसीलिए उनकी कविताएं उद्वेलित करती हैं। कवि एवं आलोचक राम प्रकाश कुशवाहा ने राजेन्द्र राजन की कविताओं पर विशद टिप्पणी की। कार्यक्रम के संचालक अफ़लातून ने छात्र-जीवन मे राजेन्द्र राजन द्वारा लिखी गयी कविताओं का उल्लेख करते हुए बताया कि किस प्रकार उनकी कविताएं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र-आंदोलनों में अपनी भूमिकाएं निभाती रहीं। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए चंचल मुखर्जी ने कहा कि राजन की कविताओं से उन्हें अपने सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यों में सदैव सहयोग मिला है। – राजेश प्रसाद

रामप्रकाश कुशवाहा :

वरिष्ठ कवि ज्ञानेंद्रपति की अध्यक्षता में सम्पन्न सामाजिक परिवर्तन के लिए लिखने वाले अति-महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कवि राजेंद्र राजन की कविताओं का एकल पाठ अस्सी(भदैनी)स्थित तुलसी पुस्तकालय के सभागार में दो अक्टूबर को गाँधी जयंती के दिन संपन्न हुआ..नगर में तीन कार्यक्रमों में बंटे होने के बावजूद पर्याप्त संख्या में साहित्यप्रेमी स्रोतागण राजेन्द्र राजन की कविताएँ सुनने तुलसी पुस्तकालय पहुंचे .इस अवसर पर राजेंद्र राजन नें
अपनी चुनीहुई श्रेष्ठ कविताएँ -‘इतिहास में जगह’, ‘बामियान में बुद्ध’ ,’श्रेय ‘,’हत्यारे ‘ ‘पेड़’,’ विजेता की प्रतीक्षा.’,’इतिहासका नक्शा;,’नयायुग’,’बाजार’ ,’प्रतिमाओं के पीछे’,’लौटना तथा ,’छूटा हुआ रास्ता ‘ आदि का पाठ किया.
श्रोताओं नें राजन की नए ज़माने के कबीर रूप को खूब पसंद किया .उनकी बाजार में खड़े कबीरऔर शेयर बाजार के प्रतीक सांड को आधार बनाकर लिखी गयी कविता बहुत पसंद की गयी..काव्यपाठ के बाद विशेषज्ञ वक्तव्य देते हुए मैंने उन्हें इतिहस के निर्णायक मोड़ों और क्षणों की शिनाख्त करने वाला कवि बताया.उनकी बाजार कविता बाजार की नैतिकता की पड़ताल करती है.शेयर बाजार का प्रतीक-चिन्ह सांड बाजार के अस्थिर चरित्र पर प्रकाश डालता है. बामियान में बुद्ध कविता सौन्दर्य,सम्मान एवं करुणा कीभाषाको मिटाकर हिंसा की लिखी जा रही नयी इबारत को अंकित करती है .अंततःमहत्त्व धर्म के सम्मान का नहीं मनुष्य के सम्मान का है.यह कविता ऐतिहासिक चरित्रों को मानवता के पक्ष में नैतिक मूल्यों के प्रतिमान के रूप में प्रस्तुत करती है.
. राजेंद्र राजन की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति नें कहा कि –
‘राजेन्द्र राजन कविता की कबीरी परंपरा में हैं.वे किसी को भी नहीं छोड़ते हैं-विजेताओं और जनता को भी नहीं छोड़ते -स्वयं को भी नहीं.राजेंद्र राजन के यहाँ कविता आत्मा के रूप में बची हुई है .पेड़ नहीं बन पाने की पीड़ा या अहसास इन की काव्यालोचना को आत्मिक आधार देता है. उनका कवि उस मनुष्य से अलग नहीं है.वह सबसे जुड़ने की आकांक्षा का नाम है.कवि को अपने अंतर्वस्तु पर भरोसा है.. उसे भाषा-बद्धकर पाना उसकी चुनौती है.

img_0110

राजेंद्र राजन की कविताएँ-

कविता : पेड़ : राजेन्द्र राजन

छुटपन में ऐसा होता था अक्सर
कि कोई टोके
कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज
इसलिए पेड़ उगेगा तुम्हारे भीतर

मेरे भीतर पेड़ उगा या नहीं
पता नहीं
क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट

लेकिन आज जब मैंने
एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
तो मैंने सुनी अपने भीतर
एक हरी – भरी चीख

एक डरी – डरी चीख
मेरे भीतर से निकली

मेरी चीख लोगों ने सुनी या नहीं
पता नहीं
क्योंकि लोगों के भीतर
मैं पेड़ की तरह उगा नहीं

क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट.

। । इतिहास पुरुष अब आयें। ।

काफ़ी दिनों से रोज़-रोज़ की बेचैनियां इकट्ठा हैं हमारे भीतर
सीने में धधक रही है भाप
आंखों में सुलग रही हैं चिनगारियां हड्डियों में छिपा है ज्वर
पैरों में घूम रहा है कोई विक्षिप्त वेग
चीज़ों को उलटने के लिये छटपटा रहे हैं हाथ

मगर हम नहीं जानते किधर जायें क्या करें
किस पर यकीन करें किस पर संदेह
किससे क्या कहें किसकी बांह गहें
किसके साथ चलें किसे आवाज़ लगाएं
हम नहीं जानते क्या है सार्थक क्या है व्यर्थ
कैसे लिखी जाती है आशाओं की लिपि

हम इतना भर जानते हैं
एक भट्ठी जैसा हो गया है समय
मगर इस आंच में हम क्या पकायें

ठीक यही वक्त है जब अपनी चौपड़ से उठ कर
इतिहास-पुरुष आयें
और अपनी खिचड़ी पका लें-

राजेन्द्र राजन .

संतोष कुमार ,फेसबुक परः

तुलसी पुस्तकालय भदैनी के हाल मे एकाकी पंखा अपनी गति से बल्ब की पीली रोशनी मे राजेन्द्र राजन के शब्दों को इतिहास से लेकर वर्तमान तक बिखेर रहा था। बमियान मे घायल बुद्ध से एक बुर्जग पख्तून से संवाद के बहाने वर्तमान की निर्ममता को उकेरते राजेन्द्र राजन बाजार मे बिकने के लिए विवश कबीर को हाल मे बैठे श्रोतागण के समक्ष दो-चार कर रहे थे । अफलातून ने सुधी श्रोताओ के लिए राजेन्द्र राजन की कविता का एकल पाठ और ज्ञानेन्द्रपति के सभापतित्व का सुनहरा अवसर दिया था । बहुत सारी त्रासदियां और उनके बीच से निकलती उम्मीद की किरणों को टटोलते कवि ने श्रोतागण को इस कदर बांधे रखा कि समय कम पड़ गया । प्रस्तुत है राजेन्द्र राजन की दो कविताएं-
विकास
कम हो रहीं है चिड़ियां
गुम हो रही है गिलहरियां
अब दिखती नही है तितलियां
लुप्त हो रही हैं जाने कितनी प्रजातियां

कम हो रहा है
धरती के घड़े म ेजल
पौधों मे रस
अन्न मे स्वाद
कम हो रही है फलो मे मिठास
फूलों मे खुशबू
शरीर मे सेहत
कम हो रहा है
जमीन मे उपजाऊपन
हवा मे आक्सीजन

सब कुछ कम हो रहा है
जो जरुरी है जीने के लिए
मगर चुप रहो
विकास हो रहा है इसलिए। राजेन्द्र राजन
पेंड़
छुटपन मे ऐसा होता था अक्सर
कि कोई टोके
कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज
इसलिए पेंड़ उगेगा तुम्हारे भीतर
मेरे भीतर पेड़ उगा या नहीं
पता नही
क्योंकि मैने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट
लेकिन आज जब मैने
एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
ते मैने सुनी अपने भीतर
एक हरी भरी चीख
मेरी चीख लोगो ने सुनी या नही
पता नही
क्योेंकि लोगो के भीतर
मैं पेड़ की तरह उगा नही
क्योंकि मैने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट ।

राजेन्द्र राजन

 

Read Full Post »

मैं भारत का रहने वाला हूं
अपनी मातृभाषा में लड़ने का
कुदरती हक हासिल है मुझे ,
मै कुर्सी की इज्जत करता हूं
पर तुम्हें ‘ लार्ड ‘ नहीं कह सकता
न ही अंग्रेजी में पैरवी करूंगा
तुम जज हो भगवान नहीं
आखिर मुकदमा क्या है
वकील क्या कहता है
आप क्‍या सुनते हो
सबको समझ तो आना चाहिये
भाषा और भूषा बदलनी होगी
मुझे खैरात नहीं , न्याय चाहिये ।
– जसवीर सिंह

श्यामरुद्र पाठक कांग्रेस मुख्यालय के समक्ष धरनारत

श्यामरुद्र पाठक कांग्रेस मुख्यालय के समक्ष धरनारत

Read Full Post »

भालू की आँखें तुझे देख रही हैं
तूने उसे जो पानी का सोता दिखाया था
वह ऊपर गुफा तक जाता है
भालू की आँखें कहती हैं
तुझे गुफा तक ले जाऊँ
वहाँ तू भालू को सीने से लगा सोएगी
बीच रात उठ पेड़ों से डर मेरा कंधा माँगेगी
भालू पड़ा होगा जहाँ तू सोई थी
कीट पतंगों की आवाज के बीच बोलेगी चिड़िया
तुझे प्यार करने के लिए
भालू को पुचकारुँगा
तू ले लेगी भालू को फिर देगी अपना नन्हा सीना
बहुत कोशिश कर पूछेगी
बापू भालू 
मैं सुनूँगा भालू भालू 
गाऊँगा सो जा भालू सो जा भालू 
नहीं कह पाऊँगा उस वक्त दिमाग में होगी सुधा
छत्तीसगढ़ में मजदूर औरत की बाँहों से तुझे लेती
तब तक कहता रहूँगा  सो जा भालू सो जा 
जब तक तेरी आँखों में फिर से आ जाएगा जंगल
जहाँ वह सोता है
जो ऊपर गुफा तक जाता है..........

किस डर से आया हूँ यहाँ
डरों की लड़ाई में कहाँ रहेगा हमारा डर
तेरा भविष्य बोस्निया से भागते अंतिम क्षण
हे यीशुः कितनी बार क्षमा


क्या अयोध्या में आए सभी निर्दोषों को करेगा ईश्वर मुआफ
तू क्या जाने ईश्वर बड़ा पाखंडी
वह देगा और ताकत उन्हें जो हमें डराते
भालू को थामे रख
यह पानी का सोता जंगल में बह निकल जहाँ जाता है
वहाँ पानी नहीं खून बहता है
तब चाँद नहीं दिखता भालू डर जाएगा.........

भालू को थामे रख
वह नहीं हिंदू मुसलमान
खेल और गा भालू खा ले आलू
कोई मसीहा नहीं जो भालू को बचा पाएगा
कोई नहीं माता पिता बंधुश्चसखा
इस जंगल से बाहर ...

भालू को थामे रख।

(रविवारी जनसत्ता  १९९२)
 

 

Read Full Post »

कल तक जिन्हें आप ढंग से पहचानते भी न हो और वे आपके चिरपरिचित परिवारजन बन जाएं – आप जीवन में ऐसे कितने लोगों से मिले हैं? हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र की बाबत मेरे साथ ऐसा ही हुआ था। हमेशा की अपनी भागमभाग में शहर (वाराणसी) के बाहर गया हुआ था। वाराणसी लौटा तब उत्तरा ने बताया ‘भवानी बाबू आए हैं। टिके तो मेहमान-घर में हैं लेकिन बच्चों के आग्रह पर हमारे धर भोजन करना स्वीकार किया है। अभी चाय के वक्त आ पहुंचेगे।’ तभी, ‘दीदी, मैं पहुंच गया हूँ। अरे, आज भैया भी आ गए।’ कहते हुए भवानी बाबू आ पहुंचे। हम दोनों उन से दस बरस छोटे तो होगे ही, परन्तु उन्होंने उत्तरा को ‘दीदी’ कहने का संबंध बना लिया था।
भवानी बाबू के विषय में बहुत सुन रखा था किन्तु निकट आने का संयोग ही नहीं बना था। वैसे हम दोनों ही वर्धा-परिवार के थे। परन्तु एक दूजे के परिवार के बने वाराणसी में ही। जब वे वर्धा के महिला आश्रम में थे ,तब मैं वहां न था । जब मैं वहा था, तब वे न थे। अनेक मित्रों से उनके बारे में सुना था। परन्तु उनकी स्नेहमयी दृष्टि में सरोबार होने का यह पहला मौका था। सर्व सेवा संघ के प्रकाशन के काम से वे वाराणसी आए होंगे किन्तु इस काम से इतर बतियाने के हमारे बीच पर्याप्त विषय थे। उनकी हिन्दी साहित्य की दुनिया के अलावा पहली बात तो यह थी कि उनकी और मेरी दुनिया समूची एक ही थी। उसमें भी हम दोनों के प्रिय विषय थे -बापू ।फिर प्रथम परिचय का संकोच कितनी देर टिका रहता?
एक शाम मेरे दामाद ने कहा कि भवानीबाबू को सुनना है- थकान के बावजूद हजारों की मेदिनी को मंत्रमुग्ध कर देने वाले भवानी बाबू कुटुंब के दो चार लोगों के समक्ष कविता पाठ करने के लिए तैयार हो गए। ‘भला बेटी दामाद कहे और मैं कैसे इनकार करूँ?’
भवानीबाबू एक बार शुरू करे फिर उन्हें दूसरा सुनाने का आग्रह करने की जरूरत नहीं पड़ती थी। एक के बाद दूसरी कविता निकलती जाती थी,…….. पंचतंत्र की कथाओं की भांति। कई बार तो एक कविता कब पूरी हुई और दूसरी कब शुरू हुई इसका श्रोता को भान नहीं रहता। मेघाणी भाई (गुजराती के प्रख्यात कवि झवेरचंद मेघाणी) के अलावा इतनी अधिक स्वरचित रचनाओं को कंठस्थ रखने वाले किसी अन्य कवि से मैं तो कभी नहीं मिला। जब वे काव्य-पाठ करते तब मानो श्रोता उन पर उपकार कर रहे हे हों वैसे कृतज्ञ दृष्टि से उन्हें देख रहे होते थे। परन्तु ज्यों-ज्यों गीतों में वे गहरे उतरते त्यों-त्यों उनका पाठ, स्वान्तः सुखाय हो जाता। बावजूद इसके श्रोताओं को भी वे सरोबार कर देते थे। कई बार तो उनका छंद श्रोताओं को साथ गाने की प्रेरणा दे जाता था।
चलो गीत गाओ चलो गीत गाओ।
कि गा गा के दुनिया को सर पर उठाओ

अभागों की टोली अगर गा उठेगी
तो दुनिया पे दहशत बड़ी छा उठेगी
सुरा-बेसुरा कुछ न सोचेंगे गाओ
कि जैसा भी सुर पास में है चढ़ाओ ।

तथा
अगर गा न पाये तो हल्ला करेंगे
इस हल्ले में मौत आ गयी तो मरेंगे
कई बार मरने से जीना बुरा है
कि गुस्से को हर बार पीना बुरा है
बुरी जिन्दगी को न अपनी बचाओ
कि इज्जत के पैरों पे इसको चढ़ाओ ।
मुझे मालूम था कि भवानी बाबू पर एकाधिक बार हृदय रोग का आघात हो चुका था। हृदय के कार्य की सहायता हेतु ‘गतिसाधक’ (पेसमेकर) भी लगाया गया था। अतएव मैंने अधिक गाने का आग्रह न करने के लिए बच्चों को समझाया। इस पर वे ही बोले ‘‘गाने के बल पर तो मैं जी रहा हूँ। उसमें थकान का प्रश्न ही कहा?’’
एक सुगंध के बल पर
जी रहा हूं मैं
सुगंध यह कदाचित
गर्भ में समझे हुए
परिवेशों की है –
छूटे घने केशों की है……

और इतनी घनी है
कि धूल और धुएं के बीच
जैसी की तैसी बनी है
बरसों से मैं
धूल और धुएं के शहरों में हूं
लगता है मगर
कमल और पारिजात की
बहती हुई बहारों में हूं
सद्यस्नात किसी
देश के मन की तरह
स्नेहसे सहलाये हुए
किसी तन की तरह
खुश हूं और इल्म इतना
कि बोझ नहीं लगता प्राणों को
बीते हुए तमाम दिनों का
आए हुए नितांत अजाने
भीषण पल का ………

जानी अनजानी लहरों में
धुएं और धूल के भी शहरों में
मैं इस सुगंध के बल पर जी रहा हूं
और चाहता हूं कि सब इसके बल पर जीएं…
क्योंकि जानता हूं मैं
सबने अपने प्रारंभिक परिवेशों में
सांद्र और निबिड इन
गंधों को पीया है ।

और फिर भी जाने क्यों
भूल जा कर इन्हें केवल धूल
और धुएं को जीया है ।

आत्मा को
सिवा आदिम सुगंधों के
कौन बचा सकता है
धूल और धुएं में
डूबने से ।

इन आदिम सुगंधों को पीते-पीते भवानीबाबू जीये। जीये यानि जीवन का क्षण-क्षण जीए। सात-सात बार उन पर हृदय रोग का आघात हुआ। परन्तु खुद तो मानो मरणोत्तर जीवन जी रहे हों वैसी मस्ती में थे ‘ अरे भाई, मैं तो किसी दूसरी बीमारी के लिए अस्पताल में पड़ा था, तब ही मुझ पर हृदय रोग का पहला हमला हुआ। डॉक्टर भी न समझे और मैं भी।’ परन्तु फिर मानो नया जन्म लिया हो वैसी ताजगी महसूस की। हफ्ते भर के सहवास से भवानी बाबू हमारे परिवार के सदस्य ही बन गए। कुटुम्ब के हर सदस्य को लगा कि उसका उनके साथ खास संबंध है। मेंरा पौत्र सुकरात पढ़ना सीख ही रहा था, तब दिल्ली में उससे हुई पहली मुलाकात में उन्होंने उस पर मोहिनी फेर दी थी। खुद कविता सुनाते जा रहे थे। इतनी बार सुनाई कि सुकरात को बिना पढ़े ही बोलनी आ गई। हम उन्हें परिवार के नाम से – मन्ना जी कह कर संबोधित करते। परन्तु प्रथम मुलाकात में कविता सुनकर सुकरात ने पूछा, ‘आपका नाम?’ उन्होंने कहा, भवानी प्रसाद। उनके घर से निकलते वक्त सुकरात ने पूरे सम्मान के साथ कहा ‘भवानी प्रसाद तो कवि हैं ? मुझे लगता है कि जीवन में मिले, अथवा छोड़ दिए गए पुरस्कारों की तुलना में भवानी बाबू के मन में सुकरात के दिए इस प्रमाण पत्र की कीमत कम नहीं थी।
भवानी बाबू एक ओर कविहृदय थे तो दूसरी ओर दुनियादार भी। इसीलिए उनके घर पर हमेशा मेहमानों का ताता लगा रहता था। सरला भाभी और परिवार के अन्य लोगों को इससे कठिनाई होती होगी। परन्तु सरला भाभी ने कभी इसे प्रकट नहीं होने दिया। मन्नाजी के मन जो भाता था, वही उन्हें भी भाता था। भवानी बाबू परिवार में सबसे बड़े भाई न थे फिर भी परिवार के लोग किसी भी मुसीबत में उन्हीं के पास दौड़े आते। खुद से बेहतर स्थिति वालों की भी सहायता किए बिना भवानी बाबू नहीं रह पाते। कई बार तो वह यह भी जान रहे होते थे कि उन्हे ठगने की कोशिश हो रही है। जब कोई जान-बूझकर ठगा रहा हो तब उसे कौन ठग सकता है? स्वयं कभी गलत खर्च नहीं करते थे परन्तु जिसकी मदद कर दी उससे कभी हिसाब नहीं मांगते।
खुद के परिवारजनों के प्रति भवानी बाबू अत्यन्त ममत्व का भाव रखते थे। जेल में बैठे-बैठे कुटुंबीजनों के लिखी कविता का अथवा हृदय रोग के हमले के बाद भी रोज मुगदर फेरने की आदत न छोड़ने वाले पिता का स्मरण कर वे फफक-फफक कर रो पड़ते।
एक बार आर्थिक कठिनाइयों की वजह से भवानी बाबू को फिल्मों के लिए गीत लिखने पड़े थे। इसका कष्ट उन्हें ताउम्र रहा। इस वेदना को उन्होंने कविता ‘गीत फरोश’ नामक कविता में उलीचा था तथा यह कविता लाचारीवश गीत लिखने वाले कितने ही कवियों के मन की चीख की पुकार बन गई थी।
आजादी के बाद भवानी बाबू अधिकतर दिल्ली की ‘धूल और धुएं के बीच’ शहर में रहे। परन्तु देश के कल्याण की कामना ने उन्हें कभी दिल्ली की माया में फंसने नहीं दिया। यूँ बड़े लोगों के साथ जान-पहचान की कमी न थी। गांधी विनोबा, नेहरू जैसों के साथ उनका परिचय था। बजाज कुटुम्ब के साथ घरोपा था। श्रीमन्नारायण तो उनके मुक्त प्रशंसक थे परन्तु इनसे पहचान का खुद लाभ कभी नहीं लिया। विचारों से भवानी बाबू सच्चे गांधीवादी थे, मगर उनका कवि हृदय किसी वाद के खांचे में समा जाए ऐसा न था। इसीलिए वे गांधीवादी कवि बनने के बदले मानववादी कवि बने रहे। उनकी कविता घरेलू विषयों से लगायत आध्यात्मिकता के शिखरों तक का भ्रमण करती है। उन्हें ऐहिक सुख की परवाह न थी। वे कहते ‘सुख अगर मेरे धर में आ जाए तो उसे बैठायेंगे कहां? उनकी मस्ती देख ‘होगा चकित’ की अवस्था बन जाती थी।
हिन्दी में आत्मा शब्द का प्रयोग स्त्रीलिंग में होता है। आत्मा से भवानी बाबू कहते है –
सुनती हो मेरी बहन आत्मा
किसी नदी के हरहराने कैसी यह आवाज
यह रगों में दौड़ता हुआ मेरा खून है……
मेरा खून
जिसमें मेरी खुशी डूब गयी है
और मन का रक्तकमल जिसमें
दिन-भर भी खिला नहीं रह सका है

शायद मेरी रगोंमें यह खून
इसी शर्त पर बह रहा है
कि खुशियां डुबाई जायेंगी
बिखराये जायेंगे दल रक्तकमल के
शाम आने के भी पहले ।
बता सकती हो तुम
मेरी बहन आत्मा कि कहीं
तट भी हैं इस नदी के या नहीं
तट जहां से बिना तैरे
पार जा सके मेरी खुशी
पांव – पांव जा सके जहां से मेरा रक्तकमल
किनारे के उस पार शांत जल के थमे-से सरोवर में …
स्वराज के बाद का भारत जिस तरह गांधी के दिखाए मार्ग से विचलित हुा उससे भवानी बाबू का हृदय टीस उठता। 1959 में लिखी एक कविता में उन्होंने इस टीस पहुंचाने वाली दिशा की ओर इंगित करते हुए कहा था –
पहले इतने बुरे नहीं थे तुम
याने इससे अधिक सही थे तुम
किन्तु सभी कुछ तुम्ही करोगे इस इच्छाने
अथवा और किसी इच्छाने , आसपास के लोगोंने
या रूस-चीन के चक्कर-टक्कर संयोगोंने
तुम्हें देश की प्रतिभाओंसे दूर कर दिया
तुम्हें बड़ी बातोंका ज्यादा मोह हो गया
छोटी बातों से सम्पर्क खो गया
धुनक-पींज कर , कात-बीन कर
अपनी चादर खुद न बनाई

बल्कि दूरसे कर्जे लेकर मंगाई
और नतीजा चचा-भतीजा दोनों के कल्पनातीत है
यह कर्जे की चादर जितनी ओढ़ो उतनी कड़ी शीत है ।

भवानी बाबू जिस आध्यात्मिक पीठ पर आसीन थे उसने उन्हें कभी निराशा में डूबने नहीं दिया। जैसे सात-सात बार मौत से वे लड़े वैसे ही आजादी के पहले गुलामी से लड़े और आजादी के बाद, तानाशाही से भी लड़े। आपातकाल में जब मैंने ‘यकीन’ नामक हिन्दी पत्रिका शुरू की तब मेरे एक ही पत्र के जवाब में उन्होंने ढेर सारी कविताएं भेज दीं । उस समय दिल्ली में भय का साम्राज्य था। खास तौर पर बौद्धिक वर्ग भयभीत था। जीवन के आदर्शों और मूल्यों के लिए जो खुद को घिसने के लिए तैयार नहीं होते वे उन्हें भीरू ही बनना पड़ता है । उन्हीं दिनों कई बौद्धिक मित्रों ने भवानी बाबू को यह सयानी सलाह दी थी – ‘कविता भेजी ही हो तो कम से कम यह सावधानी बरतिएगा कि उसके साथ आपका नाम न छपे।’ नाम की कभी चाह न रखने वाले ऐसे प्रसंगों में नाम देने के लिए उत्साहित होते हैं।
चंडीगढ़ से बीमारी के कारण पेरोल पर छूटे जय प्रकाश जी ने उन्हें सहज ही पूछा – आज कल क्या कर रहे हैं? कवि का और क्या जबाव हो सकता था? उन्होंने कहा, ‘कविता लिखता हूँ। ’ पूरे आपातकाल रोज तीन-तीन कविताएं लिखते रहे, जो बाद में ‘त्रिकाल संध्या’ के नाम से प्रकाशित हुई।

तुम्हे जानना चाहिए कि हम
मिट कर फिर पैदा हो जायेंगे
हमारे गले जो घोंट दिए गए हैं
फिर से उन्हीं गीतों को गायेंगे
जिनकी भनक से
तुम्हें चक्कर आ जाता है !
तुम सोते से चौंक कर चिल्लाओगे
कौन गाता है ?
इन गीतों को तो हमने
दफना दिया था !
तुम्हें जानना चाहिए कि
लाशें दफनाई जा कर सड़ जातीं हैं
मगर गीत मिट्टी में दबाओ
तो फिर फूटते हैं
खेत में दबाये गए दाने की तरह !

बच्चों की एक पत्रिका ने आपातकाल के दौरान भवानी बाबू से उनकी रचना मांगी। उन्होंनें मुक्त अभिव्यक्ति पर एक सरल कविता लिखकर भेज दी, फिर ख्याल आया कि कदाचित संपादक महोदय, ऐसी कविता को कबूलना कठिन न हो जाए। इसलिए उस कविता के नीचे ही सम्मानपूर्वक लिख दिया ‘छापने योग्य लगे तब ही छापिएगे। अयोग्य लगे तो, लौटाने की जरूरत नहीं है घर के बच्चे लौटाई गई कविता देखेंगे तो मेरे बारे में क्या सोचेंगे? ‘गांधी पंचशती’ नामक संग्रह में गांधी विचार को केन्द्र में रख लिखी गई पांच सौ कविताएं है। दिल्ली में उनके राजघाट स्थित घर में पहलीबार गया तब प्रेमपूर्वक परोस कर भोजन कराया और जाते वक्त मेरे हाथ में उस पुस्तक की एक प्रति रख दी। पहले पन्ने पर लिखा था ‘प्रिय भाई नारायण देसाई को पहली घर आने के प्रसंग से सुख पाकर।’’ पुस्तक की ‘प्रारम्भिक कविता में आज के युग की पीड़ा, इस युग को बदलने की उनकी आशा, उस आशा को चरितार्थ करने में कविता साधक बनेगी। ऐसी उनकी आस्था तथा उस आस्था के लिए खुद से बन पड़ने लायक सब कर गुजरने की छटपटाहट प्रकट होती है। इस लम्बी कविता के कुछ भाग देखे।
कविताएं ये ज्यादातर उस भविष्य की है।
जो वर्तमान हुआ था
जिसने हमें कण-कण पोर-पोर छुआ था
मगर किसी झंझट में हमने जाना अनजाना कर दिया उसे…..
यह कोई भविष्यवाणी नहीं है न सपना है
इसे गांधी ने खुली आखों से देखा था
और एक हद तक साकार करवाया था हमसे
इस लिए तो हमारा है अपना है
बेहतर दुनिया की एक तस्वीर खिंचती है इसमें
लगभग अब तक की बंजर समूची एक दुनिया
सिंचती है इसमें ।

हम सब चाहते हैं दुनिया को आज जैसी है उससे अच्छी
मगर मेरी लाचारी कहिए मेरी आंख में
हमसे-तुमसे ज्यादा झूलता है वह बच्चा
जो हमारे बच्चों से भी अगली पीढ़ी का होगा
विचित्र कोई चोगा पहन कर
वह अणु बम फेंकता फिरे जहां तहां
इस संभावना को मैं कविता लिख कर
खत्म करना चाहता हूं
मुझे जो ताकत दी गई है
वह दिन उसके बल पर अपने वश- भर
मैं हारना चाहता हूं.
ये कवितायें इस प्रतीति से लिखी जा रही हैं
कि मेरे देश में कुछ ऐसे गहरे तत्त्व थे ही नहीं हैं
जो देश के जड़ से जड़ अंशों में समाये हुए हैं
जिन्हें जरा-सा पानी मिल जाए समय पर
तो देखेंगे कि आप कि वे सूखे नहीं हरयाए हुए हैं
और उत्स तो पड़ा है लगभग खुला गांधी के विचारों का
उस पर पड़ी एक चट्टान को थोड़ी-सी शक्ति लगा कर
खिसका- भर देना है बस
कलकल छलछल हो जाएगा सब….
गांधी त्यौहार तो मनेगा तब
जब आज और आगे के माथे से
छोटी बड़ी क्रूरता का कलंक धुल जायेगा
जब धरती पर हर जीव के निर्भय समंजस
जीने का द्वार खुल जाएगा …..

मगर तब तक के लिए रुक नहीं रहा हूं मैं
शुरु कर रहा हूं
जितना बन सकता है मुझसे उतना छोटा एक काम
लेकर समूची मानवता की परम्परा में
अब तक के सबसे सीधे सादे
निर्भय और स्नेही आदमी
गांधी का नाम !

भवानी बाबू के विशाल साहित्य में मेरा सम्पर्क उनके गांधी साहित्य के साथ ही अधिक था। ऊपर दिए उदाहरण में जिसे हम देख सकते है वैसी उनकी भाषा भी गांधी जैसी चाहते है वैसी उनकी भाषा भी गांधी जैस चाहते थे, वैसी, सीधी-सादी, सरल हिन्दुस्तानी ही थी। वे उस जमाने में लिख रहे थे जब बड़े साहित्यकार हिन्दी भाषा से चुन चुन कर उर्दू शब्द निकाल देते थे। भाषा को कठिन और क्लीष्ट बनाने में मानो पांडित्य प्रकट होता हो। ऐसे वकत में भवानी बाबू ने आदर्श रखा:
जिस तरह हम बोलते है उस तरह तू लिख
और इसके बाद भी हम से बड़ा तू दिख।
भवानी बाबू सामान्य जन के जन थे। इसलिए सामान्य जन की बात वे प्रथम पुरुष में सहजता से कहते। इसके बावजूद सामान्य जनों को असामान्य ऊँचाई तक उठा सकने की ताकत उनकी भाषा में थी।
‘‘मैं और तुम’ नामक कविता में गांधी जी को ध्यान में रख करू वे कहते हैं –
कई बार जब क्रोध उमड़ता है मैं पागल हो जाता हूँ
और फेंक कर हाथ फाड़ कर गला चीखता चिल्लाता हूँ
ऐसा लगता है कि काट कर धर दूं शत्रुगणों को अपने
और सांग कर डालूं पल में युगों युगों तक देखे सपने
किन्तु तभी स्वर शान्त तुम्हारा मुझे सुनाई पड़ जाता है
क्रोधोन्मत्त शीश लज्जा से गड़ जाता है।
जीवन के आखिरी वर्ष उन्होंने दिल्ली में बिताए ।संयोगों ने उन्हें दिल्ली लाकर बसा दिया था परन्तु उनकी आत्मा थी देहात में जहां गांधी ने असली भारत देखा था। ‘दुर्घटना’ नामक एक कविता में वे लिखते है –
मुझे अपने गांव में रहना था
वहां की धूल कीचड़ धुआं सहना था
यह ठीक नहीं हुआ कि छोड़कर वह कीचड़ धूल और धुआं
मैं यहां आ गया दीद ओ दानिश्त ; धोखा खा गया ।
फाइलों की धूल , दोस्तों का उछाला हुआ कीचड़
बसों का धुआं : ना यह ठीक नहीं हुआ
मुझे अपने गांव में रहना था
वहां का धुआं , धूल कीचड़ सहना था ।

भाग मुझ पर भले उखड़ा था
मगर मेरे पास जमीन का टुकड़ा था
घर था , घर की शाक सब्जी थी
अन्न था ;
हाय दिमाग कैसा सन्न था
कि मैं यहां आ गया
दीद ओ दानिश्त धोखा खा गया !
इस धोखे से छूटने के लिए ही मानो जीवन के अन्तिम क्षणों में मध्य प्रदेश के अपने मूल गांव नरसिंहपुर में बिता कर हमारे निमंत्रण पर वे वउछी आकर कुछ दिन रहे। दो-चार कक्षाएं ली थीं दर्जन-दो दर्जन कविताएं सुनाई थीं वेड़छी आश्रम में घटादार वृक्षों पर आकर बैठने वाले तथा सांझ-सबेरे वैतालिक गान गाते विहंगों पर वे लट्टू थे। एक दिन आश्रम का एक विद्यार्थी मुख्य मेहमान को प्रार्थना के लिए बुलाने आया तो कह दिया – ‘भाई मुझे माफ करना। मैं तो इन पंहियों की प्रार्थना सुन रहा हूं, बरसों बाद ऐसी प्रार्थना में शरीकर होने का मौका मिला है। मुझे यह प्रार्थना ही करने दो। ‘
जाते वक्त मुझे छाती से भींच कर बोले, ‘भाई, आप तो बनारस से फिर गांव में आ गए। मेरी भी यही इच्छा है कि दिल्लीर से फिर नरसिंहपुर चला जाऊ। मेरा जी वहीं लगता है। वहीं जन्मा था, वहीं मरना चाहता हूँ। सचमुच वैसा ही हुआ। गए तो थे कुटुंबीजन के विवाह में। वहीं रूक गए, संक्षिप्त बीमारी भोग कर विदा हो गए। आजीवन सहधर्मचारिणी सरला भाभी ने कहा ‘मृत देह को दिल्ली लाने की आवश्यकता नहीं है। बावजूद इसके कि पूरा कुटुम्ब दिल्ली में ही था। सब काम वहीं होगा। ज्यादा लोगों को दिल्ली से नरसिंहपुर भी जाने की जरूरत नहीं है। ‘
भवानी बाबू के परिवार में मेरा सबसे अधिक परिचय छोटे बेटे अनुपम के साथ है। गांधी शांति प्रतिष्ठान के पर्यावरण विभाग में सुन्दर काम कर रहा है। प्रतिभा और स्वभाव से मोर का अंडा, उसने लिखा ‘ हम सब हिम्मत बांधे हुए है। बस आप जैसे किसी का पत्र पढ़कर बांध टूट जाता है। पिताजी हमें बहुत बड़े परिवार में छोड़ गए।
विराम कहां ?
मन में सोचा था की यहीं अब पूर्ण विराम कर दूंगा !
किन्तु विराम कहां हुआ ? तेरी सभा में फिर लौट आया ।

अब नये गीतों , नए रागों के लिए मेरा प्रफुल्लित ह्रदय उत्सुक हो गया है !
स्वरों के विराम पर मेरी क्या दशा होती है , इसका मुझे ज्ञान ही नहीं रहता ।

संध्या की वेला में स्वर्ण-किरणों से अपनी तान मिलाकर
जब मैं अपने गीतों को पूर्ण करता हूँ तो मध्यरात्री
के गंभीर स्वर मेरे जीवन में फिर से भरने के लिए जाग उठाते हैं !
तब मेरी आँखों में तिलभर नींद नहीं रहती , मेरे गीतों को
विराम नहीं मिलता !
रवीन्द्रनाथ ठाकुर , – अनुवाद सत्यकाम विद्यालंकार

लेख का अनुवाद – अफलातून
(गुजराती अखबार ‘गुजरातमित्र’ में ‘मने केम वीसरे रे’ नामक लेखमाला और उसी नाम से बालगोविंद प्रकाशन से छपी पुस्तक (मार्च,१९८६) से मूल लेख लिया गया है।)

Read Full Post »

मित्र गोपाल राठी ने सूचित किया है की आज मैथिलीशरण गुप्त की जन्म तिथि है । अपने नाना के संग्रह से उनकी लिखी एक छोटी सी पुस्तिका लाया हूं – ‘भूमि-भाग ‘। विनोबा के भूदान के दौर में लिखी गई कविताओं का संग्रह है ।

एक खेत

रहते हम यों जीवित-मृत क्यों ? ज्यों मरघट के भूत-प्रेत ,

कहीं हमारा भी होता हां ! छोटा-मोटा एक खेत ,

बैल न होते , हम तो होते ,

श्रम-जल सींच जोतते बोते ,

उगते आशा के-से अंकुर रहता फिर क्यों रक्त श्वेत ?

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

बांध मचान रखाते गाते  ,

हम कितना आनंद मनाते ,

जग में हरा खेत हैं जिनका भरा उन्हींका है निकेत ।

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

आती फिर गोमाता मोटी ,

बच्चे खाते  माखन – रोटी ,

देती उन्हें गर्व से गृहिणी घर के तिल गुड़ के समेत ।

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

क्या-क्या फूल फूलते-फलते ,

रंहट और रंहटे सब चलते ,

मोती बरसाती तब मिट्टी मणि-कणिकाएं धुल रेत ।

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

स्वप्न देखते हैं हम झूठे ,

देश काल दोनों हैं रूठे ,

दुर्लभ हुई धुल भी हमको , व्यर्थ कल्पना , चित्त ,चेत ।

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

– मैथिलीशरण गुप्त

Read Full Post »

[” मार्क टली भारत में एक परिचित नाम है । वे तीन दशक से ज्यादा समय तक भारत में बीबीसी के संवाददाता रहे हैं । भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किए जा चुके हैं । यह लेख कुछ साल पहले लिखा गया था । भारतीय संस्कृति पर नाज करने वाले मार्क टली ने हाल ही में टीवी पर एक इंटरव्यू के दौरान कारन थापर को जो कुछ कहा , वह गौरतलब है । करन थापर ने गुस्से से पूछा की क्या आप चाहते हैं की हम इस तरह से कपड़ा पहनना छोड़ दें , जमीन पर बैठने लगें ? मार्क टली ने कहा – “नहीं – नहीं , मैं ऐसा नहीं चाहता । मैं आपसे एक बात पूछता हूं कि आप क्या चाहते हैं – असली भारत या नकली अमेरिका ? ” यह सामग्री जिला शिक्षा अधिकार मंच  व्  विद्यार्थी युवजन सभा – जिला होशंगाबाद द्वारा प्रकाशित ‘जागो भारत श्रृंखला ‘ के परचे से साभार ली गई है । ]

दिल्ली में ,जहां मैं रहता हूं उसके आस-पास अंग्रेजी पुस्तकों की तो कई दर्जनों दुकानें हैं , हिंदी की एक भी नहीं । हकीकत यह है की दिल्ली में मुश्किल से ही हिंदी पुस्तकों की कोई दुकान मिलेगी । टाइम्स आफ इंडिया समूह के समाचार पत्र नवभारत टाइम्स की प्रसार संख्या कहीं ज्यादा होने के बावजूद भी विज्ञापन दरें अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले अत्यंत कम है । इन तथ्यों के उल्लेख का एक विशेष कारण है । हिंदी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली पांच भाषाओं में से एक है । जबकि भारत में बमुश्किल पांच प्रतिशत लोग अंग्रेजी समझते हैं ।

कुछ लोगों का मानना है यह प्रतिशत दो से ज्यादा नहीं है । नब्बे करोड़ की आबादी वाले देश में दो प्रतिशत जानने वालों की संख्या १८ लाख होती है और अंग्रेजी प्रकाशकों के लिए यही बहुत है । यही दो प्रतिशत बाकी भाषा – भाषियों पर प्रभुत्व जमाए हुए है । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के इस दबदबे का कारण गुलाम मानसिकता तो है ही , उससे भी ज्यादा भारतीय विचार को लगातार दबाना और चंद कुलीनों के आधिपत्य को बरकरार रखना है ।

इंग्लैण्ड में मुझसे अक्सर संदेह भरी नज़रों से यह सवाल पूछा जाता है की तुम क्यों भारतीयों को अंग्रेजी के इस वरदान से वंचित करना चाहते हो जो इस समय विज्ञान , कम्प्युटर ,प्रकाशन और व्यापार की अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन चुकी है ? तुम क्यों दंभी -देहाती (स्नाब – नेटिव )बनाते जा रहे हो ? मुझे बार – बार बताया जाता है की भारत में संपर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी क्यों जरूरी है, गोया यह कोई शाश्वत सत्य हो । इन तर्कों के अलावा जो बात मुझे अखरती है वह है भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी का विराजमान होना । क्योंकि मेरा यकीन है की बिना भारतीय भाषाओं के भारतीय संस्कृति ज़िंदा नहीं रह सकती ।

कोढ़ में खाज का काम अंग्रेजी पढ़ाने का ढंग भी है । पुराना पारंपरिक अंग्रेज़ी साहित्य अभी भी पढ़ाया जाता है । मेरे भारतीय मित्र मुझे अपने शेक्सपियर  के ज्ञान से खुद शर्मिन्दा कर देते हैं । अंग्रेजी लेखकों के बारे में उनका ज्ञान मुझसे कई गुना ज्यादा है । एन . कृष्णस्वामी और टी . श्रीरामन ने इस बाबत ठीक ही लिखा है जो  अंग्रेज़ी जानते हैं उन्हें भारतीय साहित्य की जानकारी नहीं है और जो भारतीय साहित्य के पंडित हैं वे अपनी बात अंग्रेज़ी में नहीं कह सकते । जब तक हम इस दूरी को समाप्त नहीं करते ,अंग्रेजी ज्ञान जड़विहीन ही रहेगा । यदि अंग्रेजी पढ़ानी ही है तो उसे भारत समेत विश्व के बाकी साहित्य के साथ जोड़िये न की ब्रिटिश संस्कृति के इकहरे द्वीप से ।

चलो इस बात पर भी विचार कर लेते हैं की अंग्रेजी को कुलीन लोगों तक मात्र सीमित करने के बजाय वाकई सारे देश की संम्पर्क भाषा क्यों न बना दिया जाए ? नंबर एक , मुझे नहीं लगता इसमें सफलता मिल पाएगी (आंशिक रूप से राजनैतिक कारणों से भी ) । दो, इसका मतलब होगा भविष्य की पीढ़ियों के हाथ से उनकी भाषा संस्कृति को जबरन छीनना । निश्चित रूप से भारतीय राष्ट्र की इमारत किसी विदेशी भाषा की नींव पर नहीं खड़ी हो सकती है । भारत , अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया की तरह महज भाषाई समूह नहीं है । यह उन भाषाओं की सभ्यता है जिसकी जड़ें इतनी गहरी हैं की उन्हें सदियों की औपनिवेशिक गुलामी भी नहीं हिला पाई ।

संपर्क भाषा का प्रश्न निश्चित रूप से अत्यंत कठिन है । यदि हिन्दी के लंबरदारों ने यह आभास नहीं दिया होता की वे सारे देश पर हिन्दी थोपना चाहते हैं तो समस्या सुलझ गई होती । अभी भी देर नहीं हुई है । हिन्दी को अभी भी अपने सहज रूप में बढाने की जरूरत है और साथ ही प्रांतीय भाषाओं को भी , जिससे की यह भ्रम न फैले की अंग्रेजी साम्राज्यवाद की जगह हिन्दी साम्राज्यवाद लाया जा रहा है । यहाँ सबसे बड़ी बाधा हिन्दी के प्रति तथाकथित कुलीनों की नफरत है । आप बंगाली , तमिल , या गुजराती पर नाज़ कर सकते हैं , पर हिन्दी पर नहीं । क्योंकि कुलीनों को प्यारी अंग्रेजी को सबसे ज्यादा खतरा हिन्दी से है । भारत में अंग्रेजी की मौजूदा स्थिति के बदौलत ही उन्हें इतनी ताकत मिली है और वे इसे इतनी आसानी से नहीं खोना चाहते ।

मार्क टली

 

Read Full Post »

श्यामबहादुर ‘नम्र’ आज सुबह गुजर गए | अविश्वसनीय | सम्पादक , कवि , क्रान्तिधर्मी सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में हमारे दिलों में वे हमेशा रहेंगे | अमन , अनुराग और अनुराधा बहन के कष्ट और शोक में हम सब शरीक हैं | नन्हे -से अमन को हल्की सी चपत लगा कर ‘मार खाओ’ कहने पर  वह उस जगह से ‘मार’ को अपने हाथ में लेकर मुंह में डालता और चबाकर खाने लगता – यह था श्यामबहादुर भाई द्वारा घुट्टी में हिंसा की अप्रासंगिकता पिलाना , सिखाना |उनकी स्मृति को प्रणाम | उनकी तीन कवितायें जिन्हें पहले भी प्रकाशित किया था |

1

हमे नहीं चाहिए शिक्षा का ऐसा अधिकार,
जो गैर-जरूरी बातें जबरन सिखाये ।
हमारी जरूरतों के अनुसार सीखने पर पाबन्दी लगाये,

हमें नहीं चाहिए ऐसा स्कूल
जहाँ जाकर जीवन के हुनर जाँए भूल।
हमें नहीं चाहिए ऐसी किताब
जिसमें न मिलें हमारे सवालों के जवाब

हम क्यों पढ़ें वह गणित,
जो न कर सके जिन्दगी का सही-सही हिसाब।
क्यों पढ़ें पर्यावरण के ऐसे पाठ
जो आँगन के सूखते वृक्ष का इलाज न बताये॥
गाँव में फैले मलेरिया को न रोक पायें
क्यों पढ़ें ऐसा विज्ञान,
जो शान्त न कर सके हमारी जिज्ञासा ।
जीवन  में जो समझ में न आये,

क्यों पढ़ें वह भाषा ।
हम क्यों पढे़ वह इतिहास जो धार्मिक उन्माद बढ़ाए
नफ़रत का बीज बोकर,
आपसी भाई-चारा घटाये।

हम क्यों पढ़ें ऐसी पढ़ाई जो कब कैसे काम आएगी,
न जाए बताई ।
परीक्षा के बाद, न रहे याद,
हुनर से काट कर जवानी कर दे बरबाद ।

हमे चाहिए शिक्षा का अधिकार,
हमे चाहिए सीखने के अवसर
हमे चाहिए किताबें ,
हमें चाहिए स्कूल।
लेकिन जो हमें चाहिए हमसे पूछ कर दीजिए।
उनसे पूछ कर नहीं जो हमें कच्चा माल समझते हैं ।
स्कूल की मशीन में ठोक-पीटकर
व्यवस्था के पुर्जे में बदलते हैं,

हमें नहीं चाहिए शिक्षा का ऐसा अधिकार जो
गैर जरूरी बातें जबरन सिखाये
हमारी जरूरतों के अनुसार सीखने पर पाबन्दी लगाये ।

-श्याम बहादुर ’ नम्र ’

2

एक बच्ची स्कूल नहीं जाती, बकरी चराती है
वह लकडियां बटोरकर घर लाती है
फिर मां के साथ भात पकाती है
एक बच्ची किताब का बोझ लादे स्कूल जाती है
शाम को थकी मांदी घर आती है
वह स्कूल से मिला होमवर्क मां-बाप से करवाती है
बोझ किताब का हो या लकडी का
बच्चियां ढोती हैं
लेकिन लकडी से चूल्हा जलेगा
तब पेट भरेगा
लकडी लाने वाली बच्ची यह जानती है
वह लकडी की उपयोगिता पहचानती है
किताब की बातें कब किस काम आती हैं
स्कूल जाने वाली बच्ची
बिना समझे रट जाती है
लकडी बटोरना
बकरी चराना
और मां के साथ भात पकाना
जो सचमुच घरेलू काम हैं
होमवर्क नहीं कहे जाते
लेकिन स्कूलों से मिले पाठों के अभ्यास
भले ही घरेलू काम न हों
होमवर्क कहलाते हैं
कब होगा
जब किताबें
सचमुच
होमवर्क से जुडेंगी
और लकडी बटोरने वाली बच्चियां भी
ऐसी किताबें पढेंगी

श्याम बहादुर “नम्र”

3.


तुम तरुण हो या नहीं

 

तुम तरुण हो या नहीं यह संघर्ष बतायेगा ,

 

जनता के साथ हो या और कहीं यह संघर्ष बतायेगा ।

 

तुम संघर्ष में कितनी देर टिकते हो ,

 

सत्ता के हाथ कबतक नहीं बिकते हो ?

 

इससे ही फैसला होगा –

 

कि तुम तरुण हो या नहीं –

 

जनता के साथ हो या और कहीं ।

 

 

 

तरुणाई का रिश्ता उम्र से नहीं, हिम्मत से है,

 

आजादी के लिए बहाये गये खून की कीमत से है ,

 

जो न्याय-युद्ध में अधिक से अधिक बलिदान करेंगे,

 

आखिरी साँस तक संघर्ष में ठहरेंगे ,

 

वे सौ साल के बू्ढ़े हों या दस साल के बच्चे –

 

सब जवान हैं ।

 

और सौ से दस के बीच के वे तमाम लोग ,

 

जो अपने लक्ष्य से अनजान हैं ,

 

जिनका मांस नोच – नोच कर

 

खा रहे सत्ता के शोषक गिद्ध ,

 

फिर भी चुप सहते हैं, वो हैं वृद्ध ।

 

 

 

ऐसे वृद्धों का चूसा हुआ खून

 

सत्ता की ताकत बढ़ाता है ,

 

और सड़कों पर बहा युवा-लहू

 

रंग लाता है , हमें मुक्ति का रास्ता दिखाता है ।

 

 

 

इसलिए फैसला कर लो

 

कि तुम्हारा खून सत्ता के शोषकों के पीने के लिए है,

 

या आजादी की खुली हवा में,

 

नई पीढ़ी के जीने के लिए है ।

 

तुम्हारा यह फैसला बतायेगा

 

कि तुम वृद्ध हो या जवान हो,

 

चुल्लू भर पानी में डूब मरने लायक निकम्मे हो

 

या बर्बर अत्याचारों की जड़

 

उखाड़ देने वाले तूफान हो ।

 

 

 

इसलिए फैसले में देर मत करो,

 

चाहो तो तरुणाई का अमृत पी कर जीयो ,

 

या वृद्ध बन कर मरो ।

 

 

 

तुम तरुण हो या नहीं यह संघर्ष बतायेगा ,

 

जनता के साथ हो या और कहीं यह संघर्ष बतायेगा ।

 

तुम संघर्ष में कितनी देर टिकते हो ,

 

सत्ता के हाथ कबतक नहीं बिकते हो ?

 

इससे ही फैसला होगा –

 

कि तुम तरुण हो या नहीं –

 

जनता के साथ हो या और कहीं ।

 

 

 

श्याम बहादुर नम्र

 


Read Full Post »

Older Posts »

%d bloggers like this: