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Archive for the ‘hind swaraj’ Category

प्रख्यात चिन्तक बर्ट्रेण्ड रसल ने अपनी लम्बी आत्मकथा के आखिरी हिस्से में कहा था कि दुनिया की सभी समस्याएं तीन श्रेणियों में रखी जा सकती हैं :

जो मनुष्य की खुद से या खुद में पैदा होने वाली समस्याएं हैं ,  जो समस्याएं समाज के अन्य लोगों से जुड़ी हैं तथा मनुष्य और प्रकृति के द्वन्द्व से पैदा समस्याएं । विनोबा भावे ने १९३० में इन तीन प्रकारों को व्यक्ति ,समष्टि तथा सृष्टि के रूप में मन्त्रबद्ध किया ।

नारायण देसाई

नारायण देसाई

गत दो वर्षों में हमारे देश में दो लाख से ज्यादा लोगों नी आत्मह्त्या की । इनमें से ज्यादातर किसान थे। इनकी आत्महत्या की जड़ में हमारी अर्थव्यवस्था से जुड़े कारण भले ही रहे हों ,इन लोगों ने अपनी सबसे मूल्यवान वस्तु को समाप्त करने का फैसला व्यक्तिगत स्तर पर लिया होगा। अमीर देशों के अस्पतालों में भर्ती होने वालों में सड़क दुर्घटनाओं में मृत तथा घायल हुए लोगों के बाद मानसिक समस्याओं वाले रोगियों का ही नम्बर आता है । अवसाद एक प्रमुख व्याधि बन गया है । हृदय रोग से प्रभावित होने वालों की उम्र लगातार घटती जा रही है । तलाक लेने वाले जोड़ों की संख्या में वृद्ध हो रही है ।

समष्टि से जुड़ी समस्याओं में सबसे अहम है आर्थिक विषमता । डांडी यात्रा से पहले गांधी द्वारा वाइसरॉय को लिखे पत्र में कहा गया था यदि आप हमारे देश के कल्याण के बारे में सचमुच गंभीर हैं तो देश से जुड़ी प्रमुख समस्याओं और मांगों के सन्दर्भ में क्या कर रहे हैं बतायें । इस पत्र में चौथे नम्बर पर नमक कानून वापस लेने की बात जरूर थी लेकिन देश की न्यूनतम मजदूरी पाने वाले से लगायत प्रधान मन्त्री के वेतन के अनुपात तथा इन सबसे कई गुना ज्यादा वाईस रॉय को मिलने वाले वेतन का हवाला दिया गया था तथा इन ऊँची तनख्वाहों को आधा करने की मांग की गयी थी ।

दारिद्र्य का मूल्यांकन औसत से किया जाना एक धोखा देने वाली परिकल्पना है । भारत वर्ष में ऊपर के तथा मध्य वर्गों में आई आर्थिक मजबूती के कारण यह भ्रम पाल लेना गलत होगा की गरीबी मिट गयी । गरीब की मौत सौ फीसदी का मानक है , ऊंचे औसतों से उसमें फरक नहीं आता ।

संगठित हिंसा का स्वरूप चिन्ताजनक हो गया है । अखबारों में विज्ञापनों के बाद हत्याओं की खबरें सर्वाधिक होती हैं । अणुशस्त्रों के समर्थकों द्वारा कहा जाता है  कि  इतने बम बन गये हैं कि उनके ’निरोधक गुण’ के कारण तीसरे महायुद्ध का खतरा टल गया । दुनिया के युद्धों के स्वरूप पर गौर करने से हम पाते हैं कि प्रथम विश्व युद्ध में समर में प्रत्यक्ष लगे सैनिक असैनिक नागरिकों की तुलना में ज्यादा मारे गये थे । दूसरे विश्वयुद्ध में तथा इसके बाद के सभी युद्धों में यह प्रक्रिया उलट गयी है । अब युद्धों में असैनिक नागरिकों की मौत प्रत्यक्ष लड़ रहे सैनिकों से कहीं ज्यादा हो रही हैं ।

आतंकवाद , हमारे देश में व्याप्त जातिगत विषमता , आदिवासी का शोषण तथा दुनिया भर में व्याप्त लैंगिक भेद भाव प्रमुख सामाजिक समस्याएं हैं । उपभोगवाद द्वारा राग ,द्वेष और घृणा पोषित हुए हैं ।

’ओज़ोन परत मे छि्द्र” कहने पर उक्त छिद्र के बहुत छोटा होने की छवि दिमाग में बनती है। हकीकत है कि वह ’छिद्र’ आकार में एशिया महादेश से भी बड़ा है । हम साधु को स्वामी कह कर सम्बोधित करते हैं लेकिन पश्चिमी सभ्यता का ’सामाजिक अहंकार’ मनुष्य को प्रकृति का स्वामी मानता है । धरती के विनाश का खतरा है। गांधी ने मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं प्रकृति को शिरोधार्य माना ।

आज से १०० साल पहले ये समस्याएं कुछ कम जटिल रूप में मौजूद थीं । लेकिन इनकी बुनियाद उससे भी करीब डेढ़ सौ साल पहले औद्योगिक क्रान्ति के साथ पड़ चुकी थी । डार्विन के सिद्धान्त survival of the fittest से पश्चिम के सामाजिक अहंकार को बल मिला था। गांधी ने विश्व में व्यक्ति केन्द्रित पूंजीवाद और समष्टि केन्द्रित समाजवाद को समझा । पूंजीवाद और साम्यवाद इस आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था की जु्ड़वा सन्ताने हैं, यह गांधी समझ सके। आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था के दुष्परिणामों और उसके भविष्य के संकेतों को समझने के पश्चात एक कवि के समान सृजन की विह्वलता के साथ उन्होंने ’हिन्द स्वराज’ की रचना की । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ’निर्झरेर स्वप्नभंग’ को अपनी प्रथम रचना मानते हैं , उसके पहले की कविताओं को तुकबन्दियां मात्र मानते हैं । ठीक उसी प्रकार ’हिन्द स्वराज’ गांधी की प्रथम स्रुजनात्मक रचना है । जहाज के कप्तान से स्टेशनरी की मांग करना , दाहिने हाथ से लिखते लिखते थक जाने पर बांए हाथ से लिखना उनकी उत्कटता के द्योतक थे।(हिन्द स्वराज की रचना इंग्लैंण्ड से अफ़्रीका पानी के जहाज से जाते वक्त लिखी गयी थी) । उन्होंने यह स्पष्ट कहा भी जब मुझसे बिलकुल नहीं रुका गया तब ही मैंने इसकी रचना की।

तेनसिंग और हिलेरी ने आपस में यह समझदारी बना ली थी कि वे दुनिया को यह नहीं बतायेंगे कि किसने एवरेस्ट की चोटी पर पहला कदम रखा । परन्तु ऊपर पहुंचने के बाद उन दोनों ने जो किया वह गौर तलब है । हिलेरी ने अपना झण्डा गाड़ा और तेनसिंग ने वहाँ की बरफ़ उठा कर मस्तक पर लगाई।

मौजूदा अर्थव्यवस्था अब उत्पादन से ज्यादा कीमतों और ब्याज के हेर-फेर पर निर्भर है । मौजूदा संकट सभ्यता के अंत का प्रथम भूचाल है । सत्य ,अहिंसा,साधन शुद्धि आदि के गांधी के ’तत्व ’ हैं । यह तत्व हमेशा प्रासंगिक रहेंगे । चरखा गांधी का तन्त्र है जो सतत परिवर्तनशील रहेगा। अपने जीवन काल में ही गांधी ने स्थानीय तकनीक से १०० गज धागा बनाने वाले चरखे की खोज के लिए एक लाख रुपये के ईनाम की घोषणा की थी ।

गांधी ने स्वराज का अर्थ सिर्फ़ राजनैतिक स्वराज से नहीं लिया था। उसका सन्दर्भ समूची संस्कृति से था। जरूरतों को अनिर्बन्ध बढ़ाना नहीं स्वेच्छया नियन्त्रित करना ताकि हर व्यक्ति स्वराज का अनुभव करे। ’हिन्द स्वराज” ने आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था के शक्तिवाद , उद्योगवाद , उपभोक्तावाद,बाजारवाद के विकल्प में सत्याग्रह,प्रकृति के साथ साहचर्य ,सादगी,प्रेम,स्वावलंबन पर आधारित विकास की परिकल्पना दी।

[ काशी विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में मौजूदा वैश्विक संकट और ’हिन्द स्वराज’ विषयक श्री नारायण देसाई द्वारा दिए गए व्याख्यान के आधार पर । व्याख्यान का आयोजन प्रोफेसर किरन बर्मन ने किया था। ]

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( लेख का पिछला भाग ) पत्रकारों में एक निपुणता होती है । उनकी भाषा चुस्त होती है । वे तर्क और भावना का पुट देकर विषयों पर रोशनी डालते हैं । लेकिन विज्ञापन सामग्री के रचनाकारों में भी तो ये सारी योग्यतायें होती हैं । कुछ विज्ञापनों को पढ़ते वक्त भ्रम हो जाता है कि हम साहित्य या दर्शन पढ़ रहे हैं । विज्ञापन सामग्री बनाने वाले का नाम नहीं छपता है । कुछ अरसे के बाद छप सकता है । क्यों नहीं ? राजनैतिक – सामाजिक मुद्दों पर समाचार – टिप्पणी लिखनेवालों की ज्यादा चर्चा होती है । उनकी प्रतिष्ठा बनती है ।  उस प्रतिष्ठा का बड़ा हिस्सा यह है कि वे एक दैत्याकार उद्योग के बुद्धिजीवी हैं । प्रतिष्ठा का दूसरा हिस्सा यह है कि कुछ पत्रकारों में लेखकवाला अंश भी होता है । यहाँ हम ’लेखक’ शब्द का इस्तेमाल बहुत संकुचित अर्थ में कर रहे हैं । लेखक वह है जो अपनी समग्र चेतना के बल पर अभिव्यक्ति करता है । लेखक की कसौटी पर पत्रकार की कोटि लेखक और लिपिक के बीच की है । जैसे किसी जाँच आयोग का प्रतिवेदन लिखनेवाला कर्मचारी , कनूनी बहस की अरजी लिखनेवाला वकील या पर्यटन गाइड लिखनेवाला भी लेखक ही होता है। आज के दिन आप नहीं कह सकते हैं कि एक अच्छा पत्रकार एक घटिया साहित्यकार से बेहतर है । दोनोंके प्रेरणा स्रोत अलग हैं । यह हो सकता है कि कोई व्यक्ति साहित्य लिखना छोड़कर  पत्रकार के रूप में अच्छा नाम कमाए । अभी सिर्फ भारतीय भाषाओं की पिछड़ी हुई पत्र – पत्रिकाओं में साहित्यिकों को पत्रकारिता के काम के लिए बुलाया जाता है।अत्याधुनिक पत्र-पत्रिकाओं में ऐसी परिपाटी खत्म हो गई है , क्योंकि साहित्यिकों में ऐसे संस्कार होते हैं , जो पत्रकारिता के लिए अयोग्यता के लक्षण हैं ।

अगर किसी बड़े समाचार-पत्र का सम्पादक दावा करता है कि उसके काम – काज में सेठजी ने कभी दखल नहीं दिया , तो उस सम्पादक को यह भी मालूम होना चाहिए कि आधुनिक सेठजी दखल नहीं दिया करते । ऐसे अनेक सेठजी होंगे , जिन्होंने कभी अपने बावरची , खजांची या दरजी के काम में दखल नहीं दिया हो । बड़े समाचार-पत्रों का सम्पादक चुने जाने की एक योग्यता यह है कि  उसको अक्लमन्द होना चाहिए , ताकि उसके काम में मालिक को दखल देना न पड़े । जिस पत्रकार में लेखक वाला संस्कार बचा है  , उसके काम में दखल देना पड़ जाता है । इसीलिए मुम्बई के हमारे एक दोस्त को बहुत समय तक सम्पादक नहीं बनाया गया । दिल्ली में हमारे एक दूसरे दोस्त एक बड़े उद्योगपति के प्रमुख अखबार के पत्रकार हैं । उस अखबार में एक वरिष्ठ पत्रकार थे , जो अपने व्यक्तिगत जीवन में घोर साम्यवादी हैं । उनका लेखन उच्च कोटि का था , जिस पर अखबार को गर्व था । जब उनकी सेवा-निवृत्ति का समय आया , तो हमारे दोस्त ने चुटकी ली ,” कामरेड , आपका जो लम्बा जीवन बाकी है उसमें मैं आशा करता हूं कि आप हमारे उद्योगपति – मालिक के धन्धों के बारे में एक पुस्तक लिखेंगे ।” “क्यों ?” ” उनमें स्वतंत्र-लेखन शक्ति बच नहीं गई है , अगर उनमें ऐसी कोई शक्ति बची होगी तो मालिक की ओर से पत्र में नियमित कॉलम के माध्यम से उनको अच्छी रकम मिलती रहेगी । “

नई पीढ़ी के पत्रकारों के मामलों में यह जोखिम नहीं है । वे लेखक या विचारक के रूप में नहीं , शुरु से ही पत्रकार के रूप में प्रशिक्षित हो रहे हैं । यहाँ विचारों को दबाने के लिए अधिक भत्ता देना नहीं पड़ता है – सिर्फ इस काम को आकर्षक बनाने के लिए खूबसूरत वेतन – भत्ते का प्रबन्ध रहता है । यह वेतन – भत्ता विशिष्टजनों के लायक है । इस वेतन-भत्ते के लायक होने के लिए प्रतिबद्धताविहीन बुद्धिजीवी होने का प्रशिक्षण उन्हें मिलता रहता है । समाचार-पत्र उद्योग के प्रसार के लिए यह एक शर्त है कि समाज में प्रतिबद्धताविहीन लेखकों का एक बुद्धिजीवी वर्ग पैदा किया जाये । यानी शिक्षा और प्रशिक्षण की प्रक्रिया में ही उन्हें मालिक वर्ग की विचारदृष्टि में दीक्षित कर लिया जाए , ताकि किसी आदरणीय सम्पादक के बारे में यह कहना न पड़े कि वे अपने विचारों को दबाकर लिख रहे हैं । हम सीधे कह सकते हैं कि सम्पादक की विश्वदृष्टि और सेठजी की विश्वदृष्टि में एक अपूर्व मेल का संयोग है ।

( अगली किश्त में समाप्य )

भाग – तीन

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[ गांधी जी द्वारा लिखी गयी पुस्तिका ‘हिन्द स्वराज’ की शताब्दी के अवसर पर गांधी विद्यापीठ , अहमदाबाद तथा केन्द्रीय तिब्बती विश्वविद्यालय , सारनाथ के तत्वाधान में प्रारम्भ हु दस दिवसीय शिबिर में निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रमुख एवं प्रख्यात तिब्बती मनीषी रिनपोचे द्वारा दिया गया प्रारम्भिक वक्तव्य ]

'हिन्द स्वराज' शिबिर , सारनाथ

'हिन्द स्वराज' शिबिर , सारनाथ

३१ मार्च , २००९ को दलाई लामा के भारत में आने की स्वर्ण जयन्ती सम्पन्न हुई । इस अवसर पर उन दिनों का सिंहावलोकन मैं भी कर रहा हूँ ।  ९ वर्ष की उम्र में मैं तिब्बत के बौद्ध विहार में प्रविष्ट हुआ था । चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे के समय मेरी उम्र २० वर्ष थी । शरीर और मन कच्चे थे । इस हमले और आधिपत्य द्वारा हुए संस्कृति और परम्परा को विध्वंस होने के कगार पर देखा । पूरा विश्व यह देख रहा था लेकिन असहाय और चुप था ।

३ मास शरणार्थी शिबिर में रहने के बाद कालिंगपोंग पहुँचा । इस परिस्थिति से उत्पन्न सैंकड़ों प्रश्नों के उत्तर न पाने के झंझावात के साथ हम रह रहे थे । उसी समय  ‘सत्य के प्रयोग’ (गांधीजी की आत्मकथा ) का तिब्बती में किया गया संक्षिप्त अनुवाद  मेरे हाथ लगा । करीब २०० पृष्ट की उस किताब के अनुवादक बाद में आकाशवाणी के तिब्बती सेवा में शामिल हुए । वह किताब मेरे लिए वरदान साबित हुई । दो तीन दिन उसे पढ़ा । मानसिक राहत , दिशा और प्रकाश मिले ।

दलाई लामा ने ५६ में लिखी अपनी प्रथम आत्मकथा में बताया है कि कैसे वे राजघाट में गांधी समाधि पर काफ़ी समय बैठे रहे । हम गांधी के प्रति ऋणी हैं ।

मुझे काफ़ी विलम्ब से ‘हिन्द स्वराज’ मिली । १९९१ में पता चला कि यह लघु पुस्तक पठानकोट के सर्वोदय बुक स्टॉल पर उपलब्ध है । वहाँ से मँगवाई । पुस्तिका में उपदेशों की दार्शनिक पृष्टभूमि में स्पष्ट दिशा देने वाला मूल शास्त्र दिया गया है । गांधीजी ने बिना किसी निहित ध्येय के लोगों के सामने सत्य रखा है। आधुनिक सभ्यता को साफ़ तौर पर चुनौती देने वाले वे प्रथम व्यक्ति थे । यह पुस्तिका चक्षु खोलने वाली है और इसका मूल्य अपरम्पार है ।

इस पुस्तिका में जहाँ – जहाँ ब्रिटेन का उल्लेख है वहाँ चीन रख दें और जहाँ भारतीय प्रजा का उल्लेख है वहाँ तिब्बत रख दें – आपको स्पष्ट हो जाएगा कि चीन क्यों तिब्बत पर कब्जा कर सका ।

हिन्द स्वराज के छपने के सौ वर्ष और तिब्बत पर चीन के कब्जे के पचास वर्ष हुए हैं । मैं ऐसे अवसरों को महत्व देता हूँ । बर्मा में १० दिवसीय विपश्यना की परम्परा है । उसी प्रकार दस दिनों के इस शिबिर में आप हिन्द स्वराज की अवधारणा को समझें । हिन्द स्वराज पर इस शिबिर को अपने व्यक्तिगत जीवन में एक उपलब्धि मानूंगा ।

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