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Archive for the ‘Global Economic Crisis’ Category

पिछले भाग से आगे ;
तो भारतीय बुद्धिजीवी को जब पश्चिमी सभ्यता अधूरी लगती है , तब वह प्राचीनता की किसी गुफा में घुस जाता है और जब वह अपनी सभ्यता के बारे में शर्मिन्दा होता है तब पश्चिम का उपनिवेश बन कर रहना स्वीकार कर लेता है । दोनों सभ्यताओं से संघर्ष करने की प्रव्रुत्ति भारतीय बुद्धिजीवी जगत में अभी तक नहीं विकसित हुई है या जो हुई थी , वह खत्म हो गई है । गांधी के अनुयाई गुफाओं में चले गये। रवि ठाकुर के लोग अंग्रेजी और अंग्रेजियत के भक्त हो गये । गांधी के एक शिष्य राममनोहर लोहिया ने ‘इतिहास चक्र’ नामक एक किताब लिखी । एक नई सभ्यता की धारा चलाने के लिए आवश्यक अवधारणाएं प्रस्तुत करना इस किताब का लक्ष्य था । अंग्रेजी में लिखित होने के बावजूद बुद्धिजीवियों ने उसे नहीं पढ़ा । औपनिवेशिक दिमाग नवनिर्माण की तकलीफ को बर्दाश्त नहीं कर सकता । ज्यादा-से-ज्यादा वह प्रचलित और पुरानी धाराओं को साथ-साथ चलाने की कोशिश करता है और दोनों के लिए कम-से-कम प्रतिरोध की रणनीति अपनाता है । आम जनता पर दोनों प्रतिकूल सभ्यताओं का बोझ पड़ता है और वह अपनी तकलीफ के अहसास से आन्दोलित होती है । सभ्यताओं से संघर्ष की इच्छा शक्ति के अभाव में देश के सारे राजनैतिक दल अप्रासंगिक और गतिहीन हो गए हैं । जनता के आन्दोलन को दिशा देने की क्षमता उनमें नहीं रह गई है । जन-आन्दोलनों का केवल हुंकार होता है, आन्दोलन का मार्ग बन नहीं पाता । जहां क्षितिज की कल्पना नहीं है, वहां मार्ग कैसे बने ? इस कल्पना के अभाव में क्रान्ति अवरुद्ध हो जाती है ।
ऐसी स्थिति में यही कहना काफी नहीं होगा कि सभ्यता के स्तर पर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा । मुकाबले की रणनीति भी बनानी पड़ेगी । किन बिन्दुओं पर हम सभ्यता या सभ्यताओं से टकराएंगे ? आधुनिक सभ्यता ने हमें कहां गुलाम बनाया है ? प्राचीन सभ्यता ने हमें कहां दबोच रखा है और पंगु बनाया है ? आज हम किन बिन्दुओं पर किस प्रकार का विद्रोह कर सकते हैं ? इन ठोस सवालों से जो नहीं जूझेगा , वह गांधी की प्रशंसा करेगा तो तो नेहरू का भी समर्थन करेगा । यह एक बौद्धिक बाजीगरी होगी, संघर्ष नहीं होगा,सृजन नहीं होगा । सभ्यताओं से जो तकरायेगा , उसे कुछ झेलना पड़ेगा। अपने वर्ग और तबके में उसे अप्रिय और कटु होना पड़ेगा ।
आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह दुनिया को अपने मानदंडों के अनुसार आधुनिक नहीं बना नहीं सकती । बारी – बारी से वह कुछ इलाकों को प्रलोभित करती है कि ‘ तुमको आधुनिक बना सकती हूं अमरीकी ढंग से नहीं , तो रूसी ढंग से ।’ पूरी दुनिया को एक समय के अन्दर आधुनिक बना सकने का दावा अभी तक वह कर नहीं सकी है। अतः यह सभ्यता दुनिया के बड़े हिस्से को उपनिवेश बना कर ही रख सकती है , जिसके लिए आधुनिक सभ्यता का अर्थ उपभोग का कुछ सामान मात्र है ।
प्राचीन सभ्यता का सबसे बड़ा अपराध यह है कि राष्ट्रीयता और सामाजिक समता के मूल्य उसमें नहीं हैं । जो भारतीय सभ्यता अब बची हुई है , उसकी सारी प्रवृत्ति इन मूल्यों के विरुद्ध है । मनुष्य , मनुष्य की बराबरी या आपसी प्रेम पारम्परिक भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है । ऐसे मनुष्य की संवेदनहीनता , यन्त्र की संवेदनाहीनता से कम खतरनाक नहीं है । मानव के प्रति उदासीनता प्राचीन हिन्दू संस्कृति का गुण था या नहीं , या यह वर्तमान की एक विकृति है , यह स्पष्ट नहीं है । प्राचीन भारतीय मान्यता न सिर्फ सामाजिक समता के विरुद्ध है , बल्कि वह आध्यात्मिक समता की अवधारणा को भी नकारती है । उसके अनुसार कुछ लोगों की आत्मा ही घटिया दरजे की होती है । बुद्ध ने इस मानवविरोधी प्रवृत्ति को बदलने की कोशिश की थी । लेकिन आधुनिक हिन्दू मनुष्य की विरासत में बुद्ध की धारा नहीं है । पश्चिमी सभ्यता का सबसे बड़ा गुण यह है कि उसने मानव की गरिमा और सामाजिक समानता को मूल्यों के तौर पर विकसित किया है । राष्ट्रीयता और अन्तरराष्ट्रीयता की भावना भी इन मूल्यों पर आधारित है । हिन्दू मनुष्य जब तक इन मूल्यों को आत्मसात नहीं कर लेता है , तब तक वह पश्चिम से बेहतर एक नई सभ्यता बनाने का दावा नहीं कर सकता ।
आधुनिक सभ्यता ने हमें उपनिवेश बनाया है । प्राचीन सभ्यता ने हमें समता विरोधी और मानव विरोधी बनाया है । इन बिन्दुओं पर अगर हम सभ्यता का संघर्ष नहीं चलाते हैं तो हमारी राजनीति , प्रशासन , अर्थव्यवस्था कुछ भी नहीं बदलनेवाली है । इसके बिना हमारे साहित्य , कला , विज्ञान के क्षेत्र में भी कोई उड़ान नहीं हो सकेगी । आधुनिक सभ्यता से संघर्ष की शुरुआत औपनिवेशिक मानस को झकझोरने से होगी । उपभोगवाद , बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और सांस्कृतिक परनिर्भरता को निशाना बनाकर ही यह कार्यक्रम हो सकेगा । दूसरी ओर , हिन्दू मानसिकता और हिन्दू समाज को सुधारने के लिए उग्र कार्यक्रम की जरूरत है ।
किशन पटनायक और डॉ. लोहिया यह मानसिकता कितनी अपरिवर्तित है ही , इसका प्रमाण हरिजनों की प्रतिक्रिया से मिलता है । हाल की घटनाएं बतलाती हैं कि हरिजनों को धर्म-परिवर्तन के लिए बड़ी संख्या में तैयार किया जा सकता है । हरिजनों के लिए मानव का दरजा प्राप्त करने के दो ही रास्ते दीखते हैं – धर्म-परिवर्तन और आरक्षण । आरक्षण का मतलब है हिन्दू मन की उदारता । क्या इस वक्त हिन्दू मन उतनी उदारता के लिए पूरी तरह तैयार है ? जिन दिनों दयानन्द , विवेकानन्द या गांधी हिन्दू समाज के नेता थे , उनका प्रयास और प्रभाव हिन्दू मन को मानवीय बनाने का था । हिन्दू समाज को पिघलाना उनका काम था । जब हिन्दू समाज पिघलता है तब भारतीय राष्ट्र बनता है , हिन्दू समाज जहां जड़ होता है , वहां भारतीय राष्ट्र के सिकुड़ने का डर रहता है ।
दो सभ्यताओं से एक साथ टकराना सत्ता की अल्पकालीन राजनीति में संभव नहीं है । मौजूदा राजनीतिक दलों की क्षमता के अनुसार उनका एकमात्र जायज लक्ष्य हो सकता है – लोकतंत्र के ढांचे की रक्षा करना । अगर ये दल इतना भी नहीं कर सकते तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि सभ्यताओं से लड़े बिना लोकतंत्र की रक्षा सम्भव नहीं है । ऐसी स्थिति में आम जनता के विद्रोहों का राजनीतिकरण नहीं होगा । कभी – कभी विद्यार्थियों में , कभी किसानों में , कभी दलितों में , कभी उपेक्षित इलाकों में खंड-विद्रोह होते हैं । इन तबकों और इलाकों पर दोनों सभ्यताओं का बोझ पड़ता है । मौजूदा राजनैतिक दलों का जो वैचारिक ढांचा है , उसमें इन समूहों की मुक्ति हो नहीं सकती । उनकी मुक्ति के लिए एक नया वैचारिक ढांचा चाहिए । जनता के खंड – विद्रोहों और नए वैचारिक ढांचे के सम्मिश्रण से एक नई राजनीति पैदा हो सकती है ।
वैचारिक संघर्ष बुद्धिजीवी ही करेगा । बुद्धिजीवी का मतलब बुद्धिजीवी वर्ग नहीं है । भारत का बुद्धिजीवी वर्ग अभी मानसिक स्तर पर दोगला ही रहेगा । लेकिन टोलियों में या व्यक्ति के तौर पर बुद्धिजीवी एक नई सभ्यता-निर्माण के लिए प्रतिबद्ध हो सकता है । सारे बुद्धिजीवियों से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वे संगठन या हड़ताल चलायें । लेकिन यह अपेक्षा जरूर रहेगी कि आचरण के स्तर पर वे अपने विचार-संघर्ष को झेलें , ताकि विचारों का सामाजिक प्रभाव बने ।
( स्रोत : सामयिक वार्ता , जनवरी ,१९८२ )

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जैसे – जैसे देश की समस्याएं गहरा रही हैं और समाधान समझ के बाहर हो रहा है , वैसे – वैसे कुछ सोचनेवालों की नजर राजनीति और प्रशासन के परे जाकर समस्याओं की जड़ ढ़ूंढ़ने की कोशिश कर रही है । वैसे तो औसत राजनेता , औसत पत्रकार , औसत पढ़ा – लिखा आदमी अब भी बातचीत और वाद – विवाद में सारा दोष राजनैतिक नेताओं , चुनाव – प्रणाली या प्रशासन के भ्रष्ताचार में ही देखता है । लेकिन , क्या वही आदमी कभी आत्मविश्लेषण के क्षणों में यह सोच पाता है कि वह भी उस भ्रष्टाचार में किस तरह जकड़ा हुआ है । वह यह सोच नहीं पाता है कि वह भी उस भ्रष्टाचार में किस तरह जकड़ा हुआ है । वह यह सोच नहीं पाता कि किस तरह वह खुद के भ्रष्टाचार को रोक सकता है ।

कुछ लोग अपने को प्रगतिशील मानते हैं । वे कहीं-न-कहीं समाजवादी या साम्यवादी राजनीति से जुड़े हुए हैं । कुछ साल पहले तक ऐसे लोग जोश और जोर के साथ बता सकते थे कि आर्थिक व्यवस्था के परिवर्तन से सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा । पिछले वर्षों में उनका यह आत्मविश्वास क्षीण हुआ है । साम्यवादी और समाजवादी कई गुटों में विभक्त हो चुके हैं । उनकी राजनीति के जरिए तीसरी दुनिया का आम आदमी एक नए भविष्य की कल्पना नहीं कर पा रहा है । बढ़ती हुई सामाजिक हिंसा , सर्वव्यापी भ्रष्टाचार , आदमी की अनास्था जैसी समस्याओं को समझने – समझाने में समाजवादी या साम्यवादियों के पुराने सूत्र और मन्त्र विश्वसनीय नहीं रह गये हैं ।

ऐसी स्थिति में कुछ संवेदनशील दिमागों को यह लगने लगा है कि समस्याओं की जड़ में राजनैतिक अनैतिकता नहीं , अथवा नैतिक गलतियां नहीं , बल्कि सभ्यता का संकट है । चर्चाओं में यह बात बार – बार आने लगी है । प्रसिद्ध विचारक डॉ. जयदेव सेठी ने भी ऐसी ही बात कही है । देश के अंग्रेजी में लिखनेवाले विचारकों में उनका प्रमुख स्थान है । पिछले दिनों उन्होंने गांधी का अध्ययन किया है और वर्तमान के लिए गांधी की प्रासंगिकता को सिद्ध किया है । कारण , गांधी ने समस्याओं की चुनौती को सभ्यता के स्तर पर लिया । गांधी ने सभ्यता के स्तर पर एक टकराव की रणनीति भी बनाई थी ।

प्रशासन और सत्ता-राजनीति से परे , अर्थव्यवस्था और उत्पादन-व्यवस्था के परे जा कर सभ्यता के परिवर्तन द्वारा समस्याओं का समाधान ढ़ूंढ़ना ही गहराई में जाना और दीर्घकालिक सोच और रणनीति बनाना है । सोचने के इस ढंग को गम्भीरता से लेने के पहले कुछ सावधानी बरतनी पड़ेगी , क्योंकि भारतीय संस्कृति और समाज में रहनेवाला जब गहराई में जाता है , तब वह इतना डूब जाता है कि उसको ऊपर की दुनिया नहीं दिखाई देती । उसके लिए राजनीति , व्यवस्था , संघर्ष , आन्दोलन सब कुछ अप्रासंगिक हो जाते हैं । वह खुद इस सभ्यता के जंजाल से हट जाता है । महर्षि अरविन्द , सन्त विनोबा , अच्युत पटवर्धन , पंडित रामनन्दन मिश्र जैसे लोग संघर्ष की राजनीति से , समस्याओं से दूर चले गए क्योंकि समस्याओं की जड़ बहुत गहराई में जाकर दीखने लगी । भारतीय संस्कृति में यह एक जबरदस्त अवगुण है कि आदमी को गहराई में ले जाने की प्रक्रिया में वह उसे समाज से ही अलग कर देती है । गांधीजी के साथ ऐसा नहीं हुआ । सभ्यता से टकराने के लिए गांधीजी को सारी तात्कालिक समस्याओं से राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर लड़ना पड़ा । लेकिन , गांधीजी की पचास फीसदी बातें ऐसी हैं , जो एक भारतीय को जड़ और उदासीन बना सकती हैं । खुद गांधीजी व्यवहार में आधुनिक और भारतीय दोनों सभ्यताओं से लड़ रहे थे । लेकिन प्रतिपादन में , लेखन तथा प्रचार में , उनका एक ही निशाना रहा – आधुनिक पश्चिमी सभ्यता । भारतीय सभ्यता और हिन्दू व्यवस्था से उनको हर कदम टकराना पड़ा । मृत्यु भी उसी टकराहट से हुई । लेकिन , हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ बताना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा । यह या तो एक प्रकार का छद्म था , या फिर सन्तुलित विचार की कमी थी । इसी कारण अभी तक एक सन्तुलित गांधी-विचार नहीं बन सका है ।

गांधी का व्यवहार सन्तुलित था , किन्तु उनमें वैचारिक सन्तुलन नहीं था । दूसरे लोग जब आधुनिक सभ्यता से टकराते हैं , अक्सर दोनों स्तर पर सन्तुलन खोते हैं । प्राचीन सभ्यता के कुछ प्रतीकों को ढ़ूंढ़ कर वे एक गुफा बना लेते हैं और उसमें समाहित हो जाते हैं । उनके लिए समस्या नहीं रह जाती है , संघर्ष की जरूरत नहीं रह जाती है । अधिकांश भारतीय बुद्धिजीवी यह नहीं जानते कि हमारी ‘सभ्यता का संकट’ क्या है ? उनका एक वर्ग आधुनिक पश्चिमी सभ्यता को नकार कर या उससे घबराकर प्राचीन सभ्यता के गर्भ में चला जाता है । योग , गो-सेवा या कुटीर उद्योग उनके लिए कोई नवनिर्माण की दिशा नहीं है बल्कि एक सुरंग है , जिससे वे प्राचीन सभ्यता की गोदमें पहुंचकर शान्ति की नींद लेने लगते हैं । बुद्धिजीवियों का दूसरा वर्ग पश्चिमी सभ्यता से आक्रांत रहता है , या घोषित तौर पर उसे अपनाता है । उसको अपनाने के क्रम में पश्चिमी सभ्यता का उपनिवेश बनने के लिए वह अपनी स्वीकृति दे देता है । लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है । हम सब कमोबेश आधुनिक सभ्यता से आक्रांत हैं । उसको आंशिक रूप से या पूर्ण रूप से स्वीकारने की कोशिश करते हैं । लेकिन हमारी रगों में प्राचीन भारतीय सभ्यता का भूत भी बैठा हुआ है । उसके सामने हम बच्चे जैसे भीत या शिथिल हो जाते हैं । वह हमें व्यक्ति या समूह के तौर पर निष्क्रिय , तटस्थ और अप्रयत्नशील बना देता है । जो लोग पश्चिमी सभ्यता को बेहिचक ढ़ंग से अपनाते हैं, वे भी साईं बाबा के चरण-स्पर्श से ही अपनी सार्थकता महसूस करते हैं । सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व न्यायाधीश वी. आर. कृष्ण अय्यर मार्क्सवादी रहे हैं और महेश योगी के भक्त भी हैं । नाम लेना अपवाद का उल्लेख करना नहीं है । यह अपवाद नहीं , नियम है । यह विविधता का समन्वय नहीं है , यह केवल वैचारिक दोगलापन है । दोगली मानसिकता की यह प्रवृत्ति होती है कि वह किसी पद्धति की होती नहीं और खुद भी कोई पद्धति नहीं बना सकती । दूसरी विशेषता यह होती है कि वह केवल बने बनाये पिंडों को जोड़ सकती है , उनमें से किसी को बदल नहीं सकती , उनमें से किसी को बदल नहीं सकती । तीसरी विशेषता यह है कि वह आत्मसमीक्षा नहीं कर सकती । आत्मसमीक्षा करेगी , तो बने-बनाए पिंडों से संघर्ष करना पड़ेगा । इसलिए बाहर की तारीफ से गदगद हो जाती है और आलोचना को अनसुना कर देती है । इसकी चौथी विशेषता यह है कि वह मौलिकता से डरती है । एक दोगले व्यक्तित्व का उदाहरण होगा ,’श्री आरक्षण-विरोधी जनेऊधारी कम्प्यूटर विशेषज्ञ’ !  इस तरह के व्यक्तित्व को हम क्या कहेंगे – ‘विविधता का समन्वय ?’

शेष भाग

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पश्चिम के पर्यावरणवादी आन्दोलन में यूरोपवासियों की यह एक मुख्य चिन्ता है – ‘प्राकृतिक संसाधनों के सीमित भंडारों से हमारा दिन पर दिन बढ़ता उपभोग सीमित न होने पाए और अधिक दिन तक उपभोग के लिए हम बचे रहें ’। रासायनिक खाद के बिना पैदा किए गए अनाज और फलों की अच्छी खासी माँग इन अमीर देशों में पैदा हुई है – यह है उपभोक्तावाद का परिष्कार !

समतावादी नेता किशन पटनायक के अनुसार ,’उनकी उपभोक्तावाद और पर्यावरण की चिन्ताएं गरीब मुल्कों में बढ़ रही भूखमरी और गैरबराबरी का समाधान नहीं ढूंढती हैं ”

इंग्लैण्ड की आन्दोलनकारी मिरियम रोज़ से मैंने किशन पटनायक द्वारा व्यक्त इस चिन्ता की बाबत जानना चाहा।

मिरियम ने बताया कि युरोप के शुरुआती पर्यावरणवादियों को प्राकृतिक संसाधनों की सीमा का आभास था । १९७२ के लगभग जब यह मुद्दा चर्चा का विषय बनने लगा तब सरकारें और सत्ता प्रतिष्ठान काफ़ी सतर्क हो गए । सत्ता – प्रतिष्ठानों ने तब ही से ’ग्रीन-कैपि्टलिज़्म ’ जैसे जुमले उछालने शुरु किए । उपभोग और मुनाफ़ा ज्यों का त्यों बनाए रख कर कम्पनियों की ’सामाजिक जिम्मेदारी ’ की बात शुरु की गई । सत्ता प्रतिष्ठान मुख्य बहस को पचा लेने में काफ़ी हद तक कामयाब रहा । ग्रीन पीस , वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फ़न्ड और फ़्रेन्ड्स ऑफ़ अर्थ जैसी नामी और बड़ी संस्थायें सत्ता प्रतिष्ठानों की इस सोच के अनुरूप ढलती गयीं । तीसरी दुनिया के मुल्कों में चल रहे आन्दोलनों की सूचनाओं की बाबत अमीर देशों के नागरिकों के लिए मुख्य स्रोत यह बड़ी-बड़ी संस्थायें ही रही हैं । गरीब देशों में जिन स्वयंसेवी संस्थाओं को ये मदद देती हैं उनकी गतिविधियों के अलावा उन्हें कुछ दिखाई ही क्यों देगा ? गरीब देशों में पैसे बाँटने वाली स्वयंसेवी संस्थायें पक्षपातपूर्ण होती हैं तथा यह खुद को गरीब देशों के लोगों का प्रश्रयदाता मान कर चलती हैं ।

मिरियम बताती हैं कि बड़ी स्वयंसेवी संस्थायें ग्रीन कैपिटलिज़्म,कम्पनियों द्वारा कथित सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वाह आदि के द्वारा वैश्वीकरण के मानवीय चेहरे के निर्माण में सहयोगी बन गई हैं । इसके बावजूद युरोपीय देशों में भी कई छोटे समूह वैश्वीकरण के विरुद्ध सक्रिय हैं। ’प्लेन स्टुपिड’ नामक एक समूह हवाई अड्डों के विस्तार के खिलाफ़ आन्दोलनरत है। इंग्लैण्ड की ग्रीन पार्टी सुश्री कैरोलिन लुकास को दल की पहली सांसद के रूप में चुनवा कर भेज सकी है।

आबादी के लिहाज से नन्हा-सा देश आईसलैण्ड गत वर्षों में बड़ी उथल-पुथल से गुजरा है। बॉक्साइट न पाए जाने के बावजूद अलुमिनियम बनाने के लिए बड़े बड़े कारखाने खोले गये।इन्हें चलाने के लिए बड़े बांध और बिजली घर बनाए गए।इनका विरोध हुआ।मिरियम भी ’सेव आइसलैण्ड’ आन्दोलन से जुड़कर वहां की जेल की यात्रा का लाभ ले चुकी हैं । इसके सकारात्मक परिणाम भी निकले हैं।उस देश में लेफ़्ट ग्रीन नामक दल काउदय हुआ है जो मौजूदा शासक गठबन्धन का हिस्सा है।

मिरियम की कल्पना है कि  जन-आन्दोलनों का वैश्विक स्तर पर सम्पर्क,संवाद और सम्बन्ध बने।

डॉ. स्वाति तथा मिरियम रोज़

डॉ. स्वाति तथा मिरियम रोज़

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लेख का प्रथम भाग

(4)
    दरअसल, पंजीवाद को फलते-फूलते रहने के लिए लगातार बढ़ते हुए मुनाफे, बढ़ता हुआ बाजार और दुनिया के श्रम व प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता हुआ दोहन चाहिए। तीस के दशक की जबरदस्त मंदी से उसे उबारने में द्वितीय विश्वयुद्ध जनित मांग ने काफी मदद की और इसके बाद दो-तीन दशक तक सब कुछ बढ़िया चलता रहा। लेकिन सत्तर के दशक में अमरीका-यूरोप के पूंजीवादी मुनाफे कम होने लगे, क्योंकि संगठित होकर मजदूर अपनी मजदूरी बढ़वाने में सफल रहे थे और विकासशील देशों से प्रतिस्पर्धा का भी सामना करना पड़ रहा था। तब इस संकट के समाधान के रुप में वैश्वीकरण का दौर आया। एक ओर, अमीर देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना साम्राज्य फैलाया, जिससे विकासशील देशों में उद्योग स्थानान्तरित होने पर भी मुनाफा, रायल्टी आदि उनको ही मिलते रहे। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को ‘मुक्त’ करने के साथ ही पूरी दुनिया के बाजार पर कब्जा करने का मौका उन्हें मिला, साथ ही पूरी दुनिया के संसाधनों के बढ़ते हुये दोहन का मौका मिला। वित्तीय वैश्वीकरण भी एक प्रकार से दुनिया के संसाधनों को बेरोकटोक खींचने एवं नियंत्रण के तंत्र के रुप में आया, जिससे बिना उत्पादन किए उन्हें दूसरों की मेहनत का फल हड़पने का मौका मिलता रहे। गौरतलब है कि संयुक्त राज्य अमरीका के कंपनी मुनाफों में वित्तीय मुनाफों का हिस्सा अस्सी के दशक में 17-25 प्रतिशत था, जो चालू दशक में बढ़कर 27-40 प्रतिशत हो गया।
    दुनिया के बाजार पर नियंत्रण के साथ मुद्रा और कर्ज की बहुतायत से अमरीका-यूरोप के घरेलू बाजार में तेजी आई , उससे भी अमरीकी पूंजीवाद को मदद मिली। अमरीका-यूरोप के लगातार बढ़ते उपभोग ने अंतहीन विकास एवं समृद्धि का भ्रम पैदा किया और बनाए रखा। लेकिन जैसा कि अब साफ हो रहा है, यह उधार की समृद्धि थी और पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों व श्रम की लूट पर आधारित थी। उदाहरण के लिए, पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति पेट्रोल खपत अमरीका में ही है। वहां पहले, 1973 के पहले तेल संकट के समय 33 प्रतिशत तेल बाहर से आता था। अब 60 प्रतिशत आता है और अनुमान है कि 2020 तक वह 70 प्रतिशत तेल आयात करने लगेगा। दुनिया के संसाधनों पर अपने कब्जे के लिए अमरीका आर्थिक, व्यापारिक, कूटनीतिक, सैनिक सभी तरीकों का इस्तेमाल करता है। लेकिन उसका भी प्रतिरोध हो रहा है और दुनिया के संसाधनों के दोहन की भी सीमा आती जा रही है। यह संकट एक प्रकार से साम्राज्यवाद पर टिकी आधुनिक जीवन -शैली और अंतहीन भोगवाद का भी संकट है।
(5)
दुनिया को लूटकर समृद्धि के महल खड़ा करने की इस अमरीका-केन्द्रित अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवादी व्यवस्था में जो देश जितना जुड़ा है और एकाकार हुआ है, वह उतना ही प्रभावित हो रहा है। भारत जैसे देशों का एकीकरण पूरी तरह नहीं हुआ है , इसलिए भारत पर उतना असर नहीं हुआ है। हालांकि पिछले 18 वर्षों में भारत की सरकारों की इच्छा, सोच व दिशा तो वही रही है, किन्तु यहां कि लोकतांत्रकि व्यवस्था ने एक प्रकार की थोड़ी बहुत रोक का काम किया है। चुनाव में जाने की मजबूरी के कारण सरकारों द्वारा पूरी तरह जन-हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। लेकिन चीन, यूरोप के कई देशों और अमरीका से काफी ज्यादा जुड़े़ मध्य अमरीका व अफ्रीका के कई देशों के हालात काफी खराब हैं। चीन तो बुरा फंसा है। वहां पिछले काफी समय से राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर 10-11 प्रतिशत रही है और इसे चमत्कार माना जा रहा था। किन्तु यह वृद्धि मुख्यत: निर्यातों पर आधारित थी। चीन की राष्ट्रीय आय का लगभग 30 प्रतिशत निर्यातों से मिलने लगा था। अब मंदी के चलते निर्यात काफी कम हो गए हैं, चीन की अनेक औद्योगिक इकाइयां बंद हो गई हैं और बड़े पैमाने पर बेरोजगारी फैल गई है। डॉलर के जाल में भी चीन बुरी तरह फंसा है। निर्यातों के चलते और विदेशी पूंजी के आगमन के चलते चीन के पास विदेशी मुद्रा और विदेशी प्रतिभूतियों का विशाल भंडार जमा हो गया है, तो ज्यादातर डॉलर में है। अनुमान है कि चीन के पास लगभग 2000 अरब डॉलर मूल्य की विदेशी परिसंपत्तियां हैं, जिनमें 70 प्रतिशत डॉलर में है। डॉलर की वर्तमान विनिमय दर कृ्त्रिम रुप से बहुत ऊँची है और यह नीचे आ सकती है। किन्तु डॉलर की कीमत नीचे आई , तो चीन के इस भंडार का मूल्य भी कम हो जाएगा। डॉलर के रुप में जमा चीन की सालों की कमाई चंद दिनों में हवा हो सकती है। चीन डॉलर के इस जाल से मुक्त होने के लिए अपनी डॉलर-परिसंपत्तियां बेचता है तो ये इतनी ज्यादा हैं कि स्वयं चीन के बेचना शुरु करने पर डॉलर की कीमत नीचे जाने लगेगी और चीन को भारी नुकसान हो जाएगा। इसलिए पिछले दिनों चीन ने अमरीका के ऊपर अपने कर्ज की सुरक्षा के लिए बार-बार चिंता प्रकट की है। समूह-20 की लंदन बैठक के पहले चीन ने एक नई अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा की जरुरत का मुद्दा भी उछाला था।
लेकिन महज एक मुद्दा उछालने से कुछ होने वाला नहीं है। समूह-20 की बैठक में भी कुछ फौरी राहत की बातें हुई हैं। सिर्फ वित्तीय कारोबारों पर सरकारी नियंत्रण एवं देखरेख बढ़ा देने तथा अर्थव्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप की कीन्सवादी नीतियों से भी यह संकट दूर नहीं होने वाला है। विनियंत्रण-विनियमन इस संकट का मूल कारण नहीं है, वह तो एक प्रकार का औजार था, पूंजीवादी ताकतों द्वारा संसाधनों एवं कमाई हड़पने का। कीन्स के अर्थशास्त्र एवं कीन्सवादी उपायों ने पिछली मंदी के समय सरकारी हस्तक्षेप से प्रभावी मांग की कमी को दूर करके पूंजीवाद को बचाने का रास्ता सुझाया था। लेकिन इस बार संकट सिर्फ बाजार या मांग की कमी का नहीं है। पूंजीवादी मुनाफों की भूख ने सारी मर्यादाओं को तोड़कर दुनिया की कमाई और संसाधनों को हड़पने के नए-नए तरीके निकाले हैं, उनसे यह संकट पैदा हुआ है। आज जरुरत लालच, भोगवाद, गैरबराबरी और लूट पर आधारित इस पूंजीवादी सभ्यता को बचाने की नहीं है, बल्कि इसका एक सही विकल्प खोजने की है, जिसके लिए यह सबसे अच्छा मौका है। इसमें गांधी, मार्क्स, लोहिया व शुमाखर हमारी मदद कर सकते है। और तभी पूंजीवाद के मौजूदा संकट तथा अन्य संकटों का स्थायी समाधान हो सकेगा।

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(लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय अध्यक्ष है।)
सुनील सुनील
ग्राम पोस्ट -केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461 111
फोन नं० – 09425040452

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यह लूट, लालच, भोग की सभ्यता का संकट है।

सुनील (1)
दुनिया का आर्थिक संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। अमरीका के जिस दोयम कर्ज (सब प्राइम लोन) संकट से यह शुरु हुआ, उसको 19 महीने बीत चुके है। निवेश बैंक नाम की जो नयी बैंकिंग प्रजाति अस्तित्व में आई है, उसमें शीर्ष के बीयर स्टर्न्स बैंक को बचाने की घटना को 13 महीने  तथा लेहमन ब्रदर्स के बैठ जाने की घटना को भी सात महीने हो चुके हैं। अभी भी कोई यह विश्वास के साथ नहीं कह सकता कि इस संकट का सबसे बुरा दौर गुजर चुका है। इसका मतलब है कि इस संकट की जड़े बहुत गहरी है। यह वित्तीय कारोबार से शुरु हुआ, लेकिन यह सिर्फ वित्तीय संकट नहीं है। जिसे ‘असली’  अर्थव्यवस्था कहते हैं, उसके बुनियादी असंतुलनों, विसंगतियों व सीमाओं में इस संकट की जड़ें छिपी हैं। एक तरह से देखें तो यह आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता का संकट है।
अभी भी पूंजीवाद की अजेयता और शाश्वतता में विश्वास रखने वाले इसे महज व्यापार चक्र की एक और कड़ी के रुप में देख रहे हैं। तेजी और मंदी तो आती-जाती रहती है। इस मंदी के बाद फिर ग्राफ ऊपर उठेगा, ऐसा अंधा विश्वास उनका है। लेकिन कब तक ? और तब तक दुनिया के करोड़ों लोगों पर जो बीतेगी ,उसका क्या ? दुनिया के करोड़ों लोगों का रोजगार छिन चुका है, करोड़ों लोग भूख और कुपोषण के शिकंजे में आ चुके हैं। खुद संयुक्त राज्य अमरीका में लाखों लोग बेघर हो चुके हैं। यूरोप में लाखों लोगों के प्रदर्शन, हड़तालें व दंगे हो रहे हैं। आत्महत्याओं की संख्या बढ़ रही है। फिर अभी यह भी तय नहीं है कि पूंजीवाद पूरी तरह इस संकट से उबर पायेगा या नहीं। अभी भी चान्स फिफ्टी-फिफ्टी ही है।
इस संकट ने बाजारवाद की हवा निकाल दी है। जो कल तक कह रहे थे कि बाजार ही सबसे कुशल आबंटनकर्ता है, स्व-नियामक है, उस पर सरकार का नियंत्रण, नियमन और हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, वे ही अब बड़े-बड़े  बैंकों व कंपनियों को बचाने के लिये तथा अर्थव्यवस्था  को मंदी से उबारने के लिये सरकारों के बड़े-बड़े पैकेजों का मुंह जोह रहे है। अब अधिकांश लोग कबूल कर रहे हैं कि बाजारों को पूरी तरह खुला नहीं छोड़ा जा सकता। वित्तीय कारोबारों पर नियमन व नियंत्रण रखना ही होगा। ये नियंत्रण और नियमन हटा लेने के कारण ही ये हालातें पैदा हुई है। सट्टा अभूतपूर्व ऊँचाइयों पर पहुच गया। शेयर बाजार और अन्य सट्टा बाजारों के सूचकांको के इशारे पर सरकारें नाचने लगी थी। बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थाओं का मूल काम था बचतों और निवेश के बीच पुल बनाना। बचतकर्ता व निवेशकर्ता के बीच मध्यस्थता करना। यह मूल काम छोड़कर वे भी सट्टे, जुए और कृत्रिम कमायी में लग गए। इसके लिये नए-नए तरीके निकाले गए, जिन्हें ‘वित्तीय नवाचारों’ का सम्मानजनक शब्द दिया गया। वित्तीय बाजार, जुआघर बन गए। जैसे कोई जादूगर हवा में से या टोप में से चीजें निकाल देता है, वैसी ही बिना कोई आधार के, हवा में समृद्धि बन रही थी। वास्तविक अर्थव्यवस्था के वास्तविक उत्पादन से इसका कोई मेल नहीं था। इसलिए यह एक बुलबुला था, जो फूटना ही था। विडंबना यह थी कि कुछ लोग इस बुलबुले को ही ठोस प्रगति मानने लगे थे। अमरीका-यूरोप के लोग मानने लगे थे कि उनकी समृद्धि, कमाई, उपभोग, कर्ज का विस्तार और  अर्थव्यवस्था की तेजी अंतहीन है। उसकी कोई सीमा नहीं है।
रीगन व थैचर के समय से पूरी वैधता पाए इस विनियंत्रण से एनरॉन और सत्यम जैसे घोटाले होना स्वाभाविक था। इसमें बर्नार्ड मेनाफ जैसे ठग पनपना ही थे। पूंजी निवेश में आकर्षक कमाई का लालच देकर इस अमरीकी नटवरलाल ने 5000 करोड़ डॉलर की ठगी की। उसकी बड़ी धूम व इज्जत थी। पिछले दिसंबर में उसका भंडा फूटा और वह जेल में है। लेकिन बात सिर्फ एक दो आदमी या कंपनी के घोटालों की नहीं है। यह ठगी और लूट अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रही है। इस मामले में पिछले वर्ष ही नोबल पुरस्कार पाने वाले अमरीकी  अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमेन की यह स्वीकरोक्ति महत्वपूर्ण है –
‘‘ वास्तव में इन दिनों दुनिया की  अर्थव्यवस्थाओं के बीच अमरीका बर्नार्ड मेडोफ जैसा दिख  रहा है। कई सालों तक उसका बहुत सम्मान था, उसका बड़ा रोब भी था। अंत में पता चला कि वह शुरु से ही एक धोखेबाज ठग था।’’
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अमरीका-यूरोप द्वारा दुनिया की ठगी व लूट का ताजे आर्थिक संकट से गहरा संबंध है। यह लूट किस तरह की है, यह समझने के लिये कुछ तथ्यों पर गौर करें।
एक, पिछले ढाई दशकों से संयुक्त राज्य अमरीका का व्यापार संतुलन लगातार ऋणात्मक रहा है, यानि अमरीका का आयात ज्यादा है, निर्यात कम है। वह शेष दुनिया से जितने मूल्य की वस्तुएं व सेवाएं ले रहा है, उतने मूल्य की बदले में नहीं दे रहा है। यह घाटा समय के साथ बढ़ता गया है। वर्ष 2004 आते-आते यह घाटा संयुक्त राज्य अमरीका की कुल राष्ट्रीय आय के 6 प्रतिशत के बराबर हो गया था। इसका मतलब यह है कि अमरीका अपनी राष्ट्रीय आय का 6 प्रतिशत हिस्सा, बदले में कोई वस्तुएं या सेवाएं दिए बगैर हासिल कर रहा है। बदले में वह डॉलर देता है, जो वापस उसे कर्ज के रुप में मिल जाता है।
दो, अमरीका-यूरोप का शेष दुनिया के साथ व्यापार और भी कई मायनो में एकतरफा, गैरबराबर व शोषणकारी है। जैसे कीमतों का गैरबराबर ढांचा। वर्ष 1980 और 2004 के बीच विकासशील देशों की व्यापार शर्तों में 15 प्रतिशत की गिरावट आई है। यानि अमीर देशों के निर्यात महंगे हुए हैं, गरीब देशों के निर्यात सस्ते हुए हैं। पिछले कुछ दशकों में विकासशील देशों का कुछ औद्योगीकरण हुआ है। उनके निर्यातों में औद्योगिक वस्तुओं का हिस्सा बढ़ा है, जबकि पहले प्राथमिक वस्तुओं(कृषि उपज, पशु उपज, वनोपज, खनिज आदि) का ही प्राधान्य रहता था। दूसरी ओर अमीर देशों के निर्यातों में ‘सेवाओं’ का हिस्सा बढ़ा है जिनमें वित्तीय सेवाएं, परिवहन, मनोरंजन, दूरसंचार, पर्यटन, होटल, चिकित्सा, शिक्षा आदि शामिल हैं। अमीर देशों के अनेक उद्योग गरीब देशों को स्थानांतरित हो गए हैं, ताकि वहां के सस्ते श्रम, सस्ते कच्चे माल , पर्यावरण के शिथिल नियमों और स्थानीय बाजार का फायदा उठा सकें । दुनिया के स्तर पर यह एक प्रकार का नया श्रम-विभाजन है। अब अमीर देश स्वयं उत्पादन का काम ज्यादा नहीं करते। दुनिया के गरीब देशों में उत्पादन होता है और वे चीजें अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के जरिये सस्ती उनको मिल जाती है। बदले में वे अपनी महंगी कथित ‘सेवाएं’ देते हैं।
तीन, डालर की विनिमय दर भी लगातार कृत्रिम रुप से ऊँची चली आ रही है। उदाहरण के लिए क्रयशक्ति-समता के हिसाब से एक डालर 14-15 रुपए के बराबर होना चाहिए, लेकिन वह 40-50 रुपए बना हुआ है। इससे दुनिया के बाजार में अमरीकियों की क्रयशक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
मुद्राओं व कीमतों के ढांचे से अलग करके देखें, तो यह गैरबराबरी और ज्यादा स्पष्ट होती है। जैसे आयात व निर्यात के वजन की तुलना करें, तो दक्षणि अमरीका महाद्वीप जितने टन का आयात करता है, उससे 6 गुना ज्यादा टन निर्यात करता है। इससे उल्टा यूरोपीय संघ जितने टन निर्यात करता है, उससे 4 गुना ज्यादा आयात करता है।
स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और विनिमय पूरी दुनिया के संसाधनों और श्रम को बहुत सस्ते में अमरीका-यूरोप की सेवा में लगाने का तंत्र बन गया है। ‘मुक्त व्यापार’ पर जोर तथा विश्व व्यापार संगठन की स्थापना को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
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इस गैर-बराबर व एकतरफा व्यापार का ही दूसरा पहलू वित्तीय था। डॉलर के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा होने और उसका अंतर्राष्ट्रीय वर्चस्व होने से ही संयुक्त राज्य अमरीका लगातार इतना बड़ा व्यापार घाटा रख सका । जबसे दुनिया में वित्तीय उदारीकरण हुआ और विदेशी मुद्रा व पूंजी के लेनदेन पर नियंत्रण खत्म होते गए, इससे बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ गए। इससे निपटने के लिये हर देश अब अपने पास विदेशी मुद्रा का पर्याप्त भंडार रखना चाहता है और यह भंडार डॉलर में रखना चाहता है। इसलिए जापान, चीन, भारत, कोरिया आदि सभी देश अमरीका से अपने निर्यातों के बदले डॉलर खुशी-खुशी लेते रहे। अमरीका के लिए यह बहुत सुविधाजनक था – कागज पर डॉलर छापना और दुनिया से चीजें खरीदते जाना। क्रुगमेन संभवत: इस ठगी की बात कर रहे है।
दिलचस्प बात यह भी है कि ये डॉलर भी घूम-फिर कर वापस अमरीका पहुंच जाते हैं। दुनिया की सरकारें अपना डॉलर भंडार बेकार पड़ा रखने के बजाय निवेश करना बेहतर समझती हैं। इसका सबसे सुरक्षति तरीका अमरीका सरकार की प्रतिभूतियां खरीदना है, भले ही उनका ब्याज डेढ़ – दो प्रतिशत ही मिले। वित्तीय कारोबार में भी अमरीका का ही वर्चस्व है, अतएव डॉलरों का एक हिस्सा अमरीका के निजी बैंकों में भी पहुंच जाता है। यह सब एक तरह से संयुक्त राज्य अमरीका पर कर्ज बनता गया, लेकिन उसकी परवाह उसे नहीं रही। काफी समय से वह दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी कर्ज वाला देश है। पिछले 5 वर्षों में उस पर विदेशी कर्ज 72 प्रतिशत बढ़ा।
इस तरह, दुनिया के विकासशील देश ‘निर्यातोन्मुखी विकास’ के भुलावे में अमरीका को निर्यात करते रहे और बदले में अमरीका उनको डॉलर की कागजी मुद्रा या फिर अपने सरकारी बॉन्ड पकड़ाता रहा। चीन के बारे में इन दिनों अमरीका में एक मजाक प्रचलित है, ‘चीन ने हमें विषैले खिलौने और सड़ी मछलियां बेची, हमने उनको जाली प्रतिभूतियां बेची।’
इस तरह पूरी दुनिया से आते पेट्रो डॉलर, यूरो डॉलर, जापानी डॉलर और फिर चीनी डॉलरों ने अमरीका म पूंजी की बहुतायत कर दी। उन्होनें अपने नागरिकों को सस्ते उपभोग कर्ज बांटना शुरु कर दिया। इससे अमरीका में एक तरह की तेजी एवं समृ्द्धि का आभास बनाए रखने में मदद मिली। क्रेडिट कार्ड वाली संस्कृति का विस्फोट इसी समय हुआ। अमरीकियों ने बचत करना बंद कर दिया। पूरा देश उधार पर चलने लगा और ‘ऋणम् कृत्वा घृतम् पिबेत्’ की उक्ति को चरितार्थ करने लगा।
पूंजी और कर्ज की इस बहुतायत और मुनाफों के लालच ने ही सब प्राईम लोन जैसे संकट को जन्म दिया। अमरीका के बैंकों ने ऐसे नागरिकों को घर बनाने के लिए ऐसे कर्ज दिए, जिनको चुकाने लायक कमाई उनकी नहीं थी। फिर इन कर्जों को बैंकों ने दूसरी वित्तीय संस्थाओं को बेच दिया या बंधक बना कर और पूंजी उठा ली। उनकी वित्तीय संस्थाओं ने पुन: उनके पैकेज बनाकर बेच दिया। इस तरह कर्जों का एक ऐसा जटिल, अपारदर्शी, बहुपरती कारोबार खड़ा हो गया, जिसमें वास्तविक जोखिम का पता ही नहीं चलता था।
गृह ऋण देने वाले बैंक, जोखिम के बारे में इसलिए भी आश्वस्त थे कि किश्त न मिलने पर मकान कुर्क करके नीलाम कर देगें। मकानों और जमीनों की कीमतें लगातार बढ़ रही थी, जिसका एक कारण खुद गृह ऋणों की भारी संख्या से आई तेजी थी। लेकिन ये बैंक इस पूरी व्यवस्था मे बडे स्तर पर बन रही कृत्रमिता, अस्थिरता व जोखिम को समझ नहीं पाए और यही उनकी गलती थी। जब बड़ी संख्या में मकानों को नीलाम करना शुरु किया, तो उनकी कीमतें तेजी से गिरने लगी। नतीजा यह हुआ कि मकानों की कुर्की-नीलामी से भी ऋण वसूली संभव नहीं हुई। यही संकट की शुरुआत थी। बैंक फेल होने लगे। चूंकि इन कर्जों मे कई तरह की वित्तीय संस्थाओं की पूंजी फंसी थी, और आपस में काफी लेन-देन था, कई अन्य बैंक व बीमा कंपनियां संकट में आ गए। फिर तो यह संकट फैलता गया और पूरी दुनिया में छा गया।
पॉल क्रुगमेन ने इसी हालत का जिक्र करते हुए लिखा है- ‘‘पिछले दशक के ज्यादातर हिस्से में अमरीका उधार लेने और खर्च करने वालों का राष्ट्र था, बचतकर्ताओं का नहीं। निजी बचत दर अस्सी के दशक में 9 प्रतिशत से गिरकर नब्बे के दशक में 5 प्रतिशत हुई और 2005 से 2007 के बीच मात्र 0.6 प्रतिशत रह गई। घरेलू कर्ज निजी आय के मुकाबले तेजी से बढ़ा। किन्तु हाल तक अमरीकी लोग विश्वास करते रहे कि वे ज्यादा अमीर बन रहे हैं, क्योंकि उनके मकानों और शेयरों के मूल्य उनके कर्जों से ज्यादा तेजी से बढ़ रहे थे। उनका विश्वास था कि वे इस पूंजी-लाभ पर हमेशा के लिए भरोसा कर सकते हैं। अंत में असलियत सामने आई। संपत्ति के मूल्यों में बढ़ोत्तरी एक भ्रम था, किन्तु कर्जों की बढ़ोत्तरी वास्तविक थी।’’
एक अन्य जगह पर क्रुगमेन ने इस संकट को ‘अति-भोग का प्रतिशोध’ कहा है।

( जारी )

( लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय अध्यक्ष है।)

सुनील
ग्राम पोस्ट -केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461 111
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