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Archive for the ‘education’ Category

काशी विश्वविद्यालय आवासीय विश्वविद्यालय है। कला संकाय का डॉ एनी बेसेन्ट छात्रावास परिसर के बाहर है। सुरक्षा की दृष्टि से कम सुरक्षित।शहर से सीधे छात्रावास में घुस कर मार-पीट की संभावना ज्यादा होगी यह मानते हुए उसे परिसर के छात्रावासों से अधिक असुरक्षित माना जा सकता था। 1982 में उस छात्रावास में रहने वाले नन्दलाल,नन्दा राम,राम दुलार सहित 8 छात्रों को छुआछूत और जातिगत भावना से मारा-पीटा गया। समता युवजन सभा ने आवाज उठाई तो मार-पीट करने वाले छात्र प्रो मनोरंजन झा की समिति की जांच के बाद निकाल दिए गए। पीडित छात्रों को सुरक्षा की दृष्टि से परिसर के छात्रावास में कमरे दिए जांए,यह मांग भी थी। प्रशासन ने इन सभी छात्रों को बिडला छात्रावास के 6ठे ब्लॉक के कॉमन रूम से 6-7 कमरे बनवा कर आवण्टित किया गया।

सयुस की इकाई की स्थापना के मौके पर किशन पटनायक 1982 में बोले। परिसर में जाति,पैसे और गुंडागर्दी के बोलबाले का हमने जिक्र किया।किशनजी ने कहा ,”भारतीय समाज में जाति ऐसी गली है जो बन्द है।जन्म,विवाह और मृत्यु इसी गली के भीतर होना तय हो जाता है।गुण्डा वह है जो अपने से कमजोर को सताता है और अपने से मजबूत के पांव चाटता है। छात्र किसी एक वर्ग से नहीं आते लेकिन उनका समूह ऐसा होता है जिसके सदस्यों के गुण- जोखिम उठाने का साहस,बड़ों की बात आंख मूंद कर न मान लेना और दुनिया बदलने का सपना देखना होता है।”

मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के फैसले के बाद उच्च शिक्षा केन्द्रों में लाजमी तौर पर विरोध हुआ। चूंकि उच्च शिक्षा केन्द्र सवर्ण वर्चस्व के केन्द्र हैं।मंडल विरोधी छात्रों द्वारा आत्मदाह के प्रयास के बाद मुझे जला कर मारने की योजना बनी। सिख छात्रों को बचाने,एक छात्रावास के कमरे में मालवीयजी के समय से रखे गए गुरुग्रंथ साहब से छेडछाड करने वालों के खिलाफ शिकायत करने के कारण भी मेरे खिलाफ उन्हीं लोगों में गुस्सा था।जो अखबार राम मन्दिर आन्दोलन के दौर में विहिप का पैम्फलेट बन जाते थे उन्हींमें से एक में एक अध्यापक ने सवर्ण वर्चस्व के पक्ष में लिखा,’घोड़ा खरीदने जाते हैं तो अरबी घोड़ा खोजते हैं।कुत्ता रखना होता है तो अलसेशियन रखते हैं। फिर पढ़ाई और नौकरियों में सवर्णों का होना तो स्वाभाविक है।’ इस लेख के छपने के बाद लाजमी तौर पर वे छापा-तिलक लगाए,जनेऊधारी चिकित्सक हमें बेल्टधारी अलसेशियन लगते थे।

ऐसे माहौल में काशी विश्वविद्यालय में नेल्सन मण्डेला का कार्यक्रम बना।उन्हें मानद उपाधि दी गई। हम हवाई अड्डे पर पहुंचे। नेल्सन मण्डेला के साथ राजमोहन गांधी थे। उन्होंने हमें अपने साथ ले लिया।काफिला प्रह्लाद घाट पहुंचा,जहां स्थानीय प्रशासन ने मण्डेला साहब से ‘गंगा-पूजन’ करवाया। 5 कदम की दूरी पर रविदास मन्दिर था,जिसके बारे में मण्डेला साहब को नहीं बताया गया। हमारे ज्ञापन के बारे में राजमोहनजी ने संक्षेप में बताया और हम लोगों से कहा कि वे विस्तार से बाद में उसके बारे में बात कर लेंगे।

ज्ञापन तो यहां दर्ज करेंगे ही,उस दौर में वि.वि. में जाति प्रथा कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए थी,कुछ उदाहरण जान लीजिए। कृषि विज्ञान संस्थान में स्नातक स्तर पर ही आपको अपनी जाति के हिसाब से इतने अंक मिला करते थे कि स्नातकोत्तर कक्षाओं के विभाग उसी हिसाब से तय हो जाते थे। ब्राहमण के कृषि अर्थशास्त्र,राजपूत और भूमिहार के एग्रोनॉमी,पिछडे और दलित के हॉर्टीकल्चर में जाने की संभावना ज्यादा रहती थी। इसका व्यतिक्रम होने पर – कुर्मी किसान घर का पंचम सिंह  और पांडुरंग राव आत्महत्या करते हैं (दोनों कृषि विज्ञान संस्थान)। भौतिकी विभाग के कुशवाहा प्रोफेसर ने  एक क्षत्रीय शोध छात्र (नाम के साथ उसके भी कुशवाहा था) को परेशान किया तो प्रोफेसर ने चक्कू खाया था। छात्र पर 307 न लगे इसके लिए तत्कालीन कुलपति ने कचहरी जाकर निवेदन किया था।

आम तौर पर दलों,संगठनों से ऊपर उठकर जातियों का एका बन जाता था। जातिवादी मठाधीश प्रोफेसर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए जाति का उपयोग करते थे,जाति के प्रति प्रेम भी उसके लिए आवश्यक नहीं होता था।

एक मजबूत दलित प्रत्याशी लगातार ब्राह्मण प्रत्याशी से हारा-तब सवर्ण गोलबन्दी के लिए,’आजादी की लड़ाई सवर्णों ने लड़ी।छात्र संघ किसका? सवर्णों का’ जैसे परचे बटते। संयोगवश मैं भी उसी पद पर चुनाव लड़्ता था। ‘खटिका को हराना है तो……. को जिताना होगा’ नारा सफल नहीं हो पाया क्योंकि मेरे कारण गोलबन्दी नहीं हो पाई। वि.वि. में महिला महाविद्यालय,चिकित्सा विज्ञान संस्थान,दृश्य कला संकाय और प्रौद्योगिकी संस्थान के छात्र छात्राओं में जाति का असर न्यूनतम था और वहां मैं नम्बर एक पर था-अन्य संकायों में एक बडे गठबंधन के नाम पर सोनकर नम्बर पर एक थे। विश्वविद्यालय के पिछड़े- दलित छात्रों ने इस बात पर गौर किया और अगले साल ऊपर दिए संकायों के अलावा उनका भरपूर समर्थन मुझे मिला।

समता युवजन सभा हाथ के बने पोस्टर लगाती और मोटर साइकिल जुलूस की जगह साइकिल जुलूस निकालती। राजनीति में असरकारी होना जरूरी होता है।जब सयुस असरकारी हुई तब मुख्यधारा वाले समूहों ने भी साइकिल जुलूस निकाला।छात्रों ने उसे नकल माना। ”सयुस की साइकिल देखी,सबने मोटर साइकिल फेंकी”

नेल्सन मण्डेला को दिया गया ज्ञापन-

 

प्रति,

माननीय नेल्सन मण्डेला,

नेता, अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस ।                                        दिनांक 17 अक्टूबर 1990

परम आदरणीय महोदय.

आपके हमारे विश्वविद्यालय आगमन के अवसर पर हमारा मन हर्ष नहीं, अपितु विषाद से भर उठा है। मानवीय मूल्यों के लिए आपकी आजीवन लड़ाई,अपने जीवन मूल्यों के लिए कठोरतम परिस्थिति में विश्वास ज्योति को जलाए रखना, सिर्फ ऐसे समाज के लिए प्रेरणा बननी चाहिए जो स्वयं उन मूल्यों में विश्वास करे और उन्हें प्रतिस्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हो।

आज हमारा समाज , विशेषतः इस विश्वविद्यालय का छात्र-युवा,अध्यापक समाज, विशेष अवसर द्वारा विषमता मूलक समाज संरचना को दूर करने के खिलाफ खड़ा है। उसकी वाणी,उसकी लेखनी में जातिवाद के साथ-साथ नस्लवाद साफ-साफ परिलक्षित होता है। जात्यिवाद को वैज्ञानिक व्यवस्था करार देने के साथ हर जाति को अलसेशियन कुत्ता,अरेबियन घोड़ा की विशिष्टता के साथ जोड़ा जा रहा है। आज की तारीख में ऐसी मानसिकता को प्रश्रय देने वाला यह प्रशासन, छात्रावासों में अनुसूचित जाति, जनजाति के छात्रों को अलग लॉबी में रखता है। खुले कमरों में रहने की जुर्रत करने वाले,राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में मुखर दलित छात्रों को पीटा जाता है।लिखित शिकायत करने पर भी कुलपति,प्रशासन सिर्फ आश्वासन देते हैं। दोषी छात्रों अथवा छात्रावास संरक्षकों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाता।

यहां मंडल कमीशन की संस्तुतियों के खिलाफ आन्दोलनकारियों के प्रति वि.वि. प्रशासन ने अतिशय नरम व सहयोगी रुख अपनाया है। ऐसे में यहां की विद्वत परिषद द्वारा आपका अभिनन्दन एक विडंबना ही है। यदि आपको सही वस्तुस्थिति की जानकारी होती तो आप कदापि इस मानद उपाधि को सम्मान नहीं मानते व इसे ग्रहण करने से इंकार कर देते।

विषमता मूलक समाज के पोषक , विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा आयोजित इस समारोह का विरोध करते हुए भी महात्मा गांधी के देश में हम अपने प्रेरणा स्रोत के रूप में आपका स्वागत करते हैं।

विनीत,

( डॉ स्वाति )                                          (हरिशंकर)

समता संगठन                                    समता युवजन सभा

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इन दिनों बिहार में एक विवाद छिड़ा हुआ है। इसे मोतीहारी बनाम गया, नीतीश बनाम सिब्बल या राज्य बनाम केन्द्र का झगड़ा कहा जा सकता है। वर्ष 2009 में संसद में एक कानून पास करके देश के 12 प्रांतांे में एक-एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय खोलने का फैसला लिया गया था। इससे गोवा को छोड़कर देश के हर प्रांत में कम से कम एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय हो जाएगा। किंतु बिहार का केन्द्रीय विश्वविद्यालय कहां हो, इस पर मामला फंस गया है। नीतीश सरकार चाहती है कि यह मोतीहारी में हो, जिससे इस पिछड़े इलाके के विकास में मदद मिलेगी। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल इसे गया में खोलना चाहते है। उनकी दलील है कि मोतीहारी बहुत अंदर है और मुख्य रेलमार्ग व हवाई मार्ग से कटा है, इसलिए वहां केन्द्रीय विश्वविद्यालय ठीक से चल नहीं पाएगा। अच्छे प्रोफेसर भी वहां नहीं जाना चाहेंगे।

अब यह विवाद दो सरकारों से नीचे चलकर जनता के बीच पहंुच गया है। केन्द्रीय विश्वविद्यालय अपने यहां खोलने की मांग को लेकर दोनों जगह कई नेता और संगठन मैदान में आ गए है। हड़तालों, बंद आदि का आयोजन हो रहा है।

सवाल यह है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय को लेकर लोग इतने लालायित क्यों है ? दरअसल बिहार के स्थानीय विश्वविद्यालयों और काॅलेजों की हालत इतनी खराब है कि पढ़े-लिखे लोगों को लगता है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय आने से शिक्षा का स्तर सुधरेगा। केन्द्रीय विश्वविद्यालय में पैसा भी खूब आता है और सुविधाओं की कमी नहीं होगी। इससे स्थानीय युवाओं को अपने इलाके में अच्छी स्तरीय शिक्षा के अवसर उपलब्ध हो सकेंगे। उन्हें दिल्ली, बनारस, इलाहाबाद आदि जगहों पर नहीं जाना पड़ेगा।

किंतु स्थानीय लोगों की यह उम्मीद शायद पूरी नहीं होने वाली है। इस मामले में मध्यप्रदेश में सागर का अनुभव गौरतलब है। सागर का डाॅ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय एक बहुत पुराना और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय रहा है, किंतु इधर के सालों में इसकी हालत काफी बिगड़ी है। इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनाने की बात काफी समय से चल रही थी। सागरवासियों ने आंदोलन भी किए। आखिरकार तीन साल पहले केन्द्र सरकार ने इसे अपने हाथ में ले लिया। किंतु अगले साल ही सागर के नौजवानों को झटका लगा, जब उसमें उनके दाखिले बंद हो गए। केन्द्रीय विश्वविद्यालय होने से इसमें प्रवेश के लिए अखिल भारतीय स्तर पर प्रवेश परीक्षा होने लगी और स्थानीय विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम हो गई। इस तरह केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनने से उसके दरवाजे सागरवासियों के लिए बंद हो गए। उनके लिए अब वह एक सजावट और प्रदर्शन की वस्तु जरूर हो गई।

यही हाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय आने पर मोतीहारी या गया में होने वाला है। अच्छी उच्च शिक्षा हासिल करने की इच्छा रखने वाले ज्यादातर स्थानीय विद्यार्थियों केा इसमें जगह नहीं मिलेगी। उन्हें बिहार के अन्य 15 विश्वविद्यालयों तथा उनसे जुड़े हजारों काॅलेजों मे ही शिक्षा हासिल करना पडेगा, जहां साधनों और शिक्षकों का काफी अभाव है, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का बोलबाला है तथा शिक्षा का स्तर बहुत बिगड़ा हुआ है। विडंबना यह है कि नीतीश कुमार केन्द्रीय विश्वविद्यालय के लिए तो एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैे और नालन्दा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय को अपने लिए एक तमगे के रूप में विकसित करने की कोशिश कर रहे है किंतु उन्होनें प्रदेश की उच्च शिक्षा को सुधारने की कोई विशेष पहल अभी तक नहीं की है। बिहार के 90 फीसदी विद्यार्थी तो इसी सड़ी-गली, उपेक्षित उच्च शिक्षा में कंुठित-हैरान होने के लिए अभिशप्त रहेंगे।

जो बात बिहार के बारे में सही है, वही देश के स्तर पर भी सही है। पूरे देश में इस वक्त करीब 504 विश्वविद्यालय है जिनमें मात्र 40 केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं तथा केन्द्रीय कानून के तहत बने, आईआईटी, आईआईएम जैसे 33 राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान हंै। इनके लिए संसाधनों की कमी नहीं है और ये देश के लाड़ले संस्थान हैं। करीब 130 डीम्ड विश्वविद्यालय हैं। 53 प्रांतीय निजी विश्वविद्यालय हैं और प्रांतीय कानूनों से बने 5 उच्च शिक्षा संस्थान हैं जो डिग्री देते हैं। किंतु सबसे बड़ी संख्या 243 प्रांतीय विश्वविद्यालयों की हैं। देश के 26,000 काॅलेजो में से ज्यादातर इन्हीं से जुड़े हैं। देश में उच्च शिक्षा के 70 से 80 फीसदी विद्यार्थी इन्हीं में अध्ययन कर रहैं हैं। किंतु वे ही सबसे ज्यादा उपेक्षित, वंचित, साधनहीन और बुरी हालत में हैं।

भारत के उपराष्ट्रपति श्री मो. हमीद अंसारी ने दिसंबर 2010 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस का व्याख्यान देते हुए देश का ध्यान इसी ओर खींचने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि अक्सर प्रांत के एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय का बजट उस प्रांत के अन्य सारे विश्वविद्यालयों के कुल संयुक्त बजट के बराबर या उससे भी ज्यादा होता हैं। कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति श्री सुरंजन दास ने मार्च 2012 में एक भाषण में फिर शिकायत की कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग प्रांतीय विश्वविद्यालयों के साथ सौतेला बरताव करता हैं। यूजीसी का 60 प्रतिशत बजट थोड़े से केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को दे दिया जाता हैं। केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी कम होते है किंतु उनका बजट प्रांतीय विश्वविद्यालयों से कई गुना होता है। प्रति विद्यार्थी बजट का हिसाब लगाएं तो यह गैरबराबरी और बढ़ जाती है।

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के मध्यावाधि मूल्यांकन में भी यह स्वीकार किया गया कि कलकत्ता, मुंबई, पूणे, चैन्नई जैसे पुराने व प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भी साधनों की कमी से जूझ रहे है, क्योंकि वे केन्द्रीय विश्वविद्यालय नहीं है।

दसअसल यह विसंगति भारत के संघीय ढांचे में एक बुनियादी असंतुलन के कारण पैदा होती है। इस ढांचे में करो तथा राजस्व के काफी स्त्रोत केन्द्र सरकार के पास है। इसीलिए राज्य सरकारों को हर काम के लिए केन्द्र सरकार का मुंह देखना पउता है और केन्द्र सरकार अवसर बंदरबांट करती है। केन्द्रीय मदद के साथ कई बार शर्ते भी लगाई जाती है। भारत में वैश्वीकरण प्रेरित सुधारों को प्रांतीय सरकारों पर इसी तरीके से लादा गया है।

पहले शिक्षा पूरी तरह राज्य सरकार का विषय था। फिर आपातकाल के दौरान 1976 में एक संविधान संशोधन के जरिये इसे समवर्ती सूची में डाला गया। तब से शिक्षा में केन्द्र का हस्तक्षेप व नियंत्रण बढ़ता गया है और शिक्षा में लाड़ले-सोतले का भेद बढ़ता जा रहा है।

भारत के नए मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल शिक्षा में इस गैरबराबरी और भेदभाव को कम करने के बजाय बढ़ाते जाना चाहते हंै। देश के सारे विश्वविद्यालयों को बराबर और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने का उपाय करने के बजाय वे हर प्रांत को एक-दो केन्द्रीय विश्वविद्यालय या कोई राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान का लाॅलीपाॅप पकड़ाना चाहते है। खबर यह भी है कि बारहवीं पंचवर्षीय योजना में देश के 374 पिछड़े जिलों में एक-एक विशेष काॅलेज खोले जाएंगे, जिन्हें काफी संसाधन दिए जाएंगे और आधा खर्च केन्द्र सरकार उठाएगी। किंतु इसका मतलब यह भी होगा कि बाकी काॅलेज और विश्वविद्यालय और ज्यादा उपेक्षित-वंचित हो जाएंगे। इन लाॅलीपाॅपों से सम्मोहित नेता, बुद्धिजीवी वर्ग और समाज का जागरूक-वाचाल तबका उनको भूल जाएगा। स्कूली शिक्षा में भी माॅडल स्कूल, नवोदय विद्यालय, कस्तूरबा विद्यालय, केन्द्रीय विद्यालय आदि की यही भूमिका रही।

वैश्विक पूंजीवाद के नए दौर की यह खासियत है कि ‘‘कल्याणकारी राज्य’’ की अवधारणा केा पूरी तरह दरकिनार करके यह शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल आदि बुनियादी सुविधाओं को भी मुट्ठी भर लोगो तक सीमित करना चाहता है। नीतिष कुमार और कपिल सिब्बल वैसे चाहे विरोधी दिखाई दें, इस मामले में वे एक मालूम पड़ते है। बहुसंख्यक विद्यार्थियों की षिक्षा पर दोनों का ध्यान नहीं है और वह उनकी प्राथमिकता में नहीं है।

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छनकर बचा हुआ तबका  ही उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों तक पहुंच पाता है । शिक्षा के बजट का बड़ा हिस्सा इसी मद में खर्च होता है- छँटे हुओं के लिए । इसके बावजूद यह अपेक्षा की जा रही है कि उच्च शिक्षा के संस्थान और विश्वविद्यालय अपने स्तर पर संसाधन जुटायें ।

देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय (काशी विश्वविद्यालय) में संसाधन जुटाने के तरीकों में जो फर्क आया है उस पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ ।

यह विश्वविद्यालय  इंजीनियरिंग की पढ़ाई देश में सबसे पहले शुरु करने वाले केन्द्रों में से एक है । इसके फलस्वरूप आई.आई.टियों के निर्माण के पहले अधिकांश बड़े इंजीनियरिंग के पदों पर यहीं के स्नातक पाए जाते थे । बनारस के दो प्रमुख उद्योगों के विकास में इस विश्वविद्यालय का हाथ रहा ।

संस्थापक महामना मालवीय के आग्रह पर एक चेकोस्लोवाकियन दम्पति यहां के सेरामिक विभाग से जुड़े़ । इन लोगों ने विश्वविद्यालय परिसर के आस पास के गांवों और मोहल्लों के लोगों को मानव निर्मित मोती बनाने का प्रशिक्षण दिया । प्रशिक्षण पाने वाले न्यूनतम दरजा आठ तक पढ़े थे । आज यह बनारस का प्रमुख कुटीर उद्योग है । एक समूह तो इन मोतियों का प्रमुख निर्यातक बन गया है । इसी विभाग द्वारा उत्पादित चीनी मिट्टी के कप – प्लेट भी काफ़ी पसन्द किए जाते थे । पूर्वी उत्तर प्रदेश में ’भारत छोड़ो आन्दोलन’ के प्रमुख नेता और इस विभाग के शिक्षक राधेश्याम शर्मा ने यह तथ्य मुझे एक साक्षात्कार में बताये थे।

बनारस का एक अन्य प्रमुख लघु उद्योग छोटा काला पंखा रहा है । इसके निर्माताओं ने भी पहले पहल काशी विश्वविद्यालय से ही प्रशिक्षण पाया । इंजीनियरिंग कॉलेज के औद्योगिक रसायन विभाग द्वारा टूथ पेस्ट भी बनाया और बेचा जाता था । विश्वविद्यालय में यह सभी उत्पादन आजादी के पहले हुआ करते थे ।

इस प्रकार इन उत्पादों द्वारा न सिर्फ़ विश्विद्यालय संसाधन अर्जित करता था अपितु बनारसवासियों के लिए  रोजगार के नये और स्थाई अवसर भी मुहैय्या कराता था ।

ग्लोबीकरण के दौर को किशन पटनायक ने एक प्रतिक्रान्ति के तौर पर देखा था । जैसे क्रान्ति जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन लाती है  वैसे ही प्रतिक्रान्ति हर क्षेत्र में नकारात्मक दिशा में ले जाने वाली तब्दीलियाँ लाती है । काशी विश्वविद्यालय के संसाधन अर्जन के मौजूदा तरीकों पर गौर करने से यह प्रतिक्रान्ति समझी जा सकती है ।

विश्वविद्यालय में संसाधन जुटाने का प्रमुख तरीका अब ’पेड सीटों’ वाले पाठ्यक्रम हैं। इन पाठ्यक्रमों में अभिभावकों से भारी फीस वसूली जाती है । इस प्रकार इन पाठ्यक्रमों में दाखिले में छद्म – आरक्षण दिया जा रहा है – सभी जातियों के पैसे वालों को ।

पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बिहार का सबसे बड़ा सर सुन्दरलाल चिकित्सालय- विश्वविद्यालय के आयुर्विज्ञान संस्थान से जुड़ा है । मुष्टिमेय ईमानदार डॉक्टरों को अलग कर दिया जाए तो बाकी सभी प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए बदनाम है । जाहिर है प्रैक्टिस न करने के लिए मिलने वाला भत्ता पाने के बाद भी । पिछले कुछ समय से इस लूट को अधिकृत बनाने के लिए अस्पताल-भवन में ही ज्यादा पैसा देकर मरीज दिखाने की सुविधा दे दी गई है । इस बढ़ी फीस का छोटा हिस्सा विश्वविद्यालय को मिलता है और बाकी डॉक साहबों की जेब में जाता है । प्राइवेट प्रैक्टिस के इस अधिकृत रूप के आने के बाद आम-ओ.पी.डी के मरीजों के प्रति उपेक्षा-भाव बढ़ना लाजमी है ।

दवा कम्पनियां डॉक्टरों को विदेश यात्रायें , चार चकिया वाहन आदि भेंट में देने लगी हैं – जिनके बदले डॉक्टर लगभग हर पर्ची में निर्दिष्ट दवायें लिखते हैं । यह देन-लेन तो डॉक्टरों से निजी स्तर पर हुआ। जाहिर है इस संस्थान के सेमिनार और कॉन्फ़रेंसों के लिए चिकित्सकीय यन्त्र ,दवा बनाने वाली कम्पनियां और निजी पैथेलॉजिकल प्रयोगशालायें – वाहन , खाना-’पीना’, अच्छे होटलों में टिकाने की व्यवस्था घोषित-अघोषित रूप से करती हैं ।

विश्वविद्यालय द्वारा धन कमाई का बदलता स्वरूप दिखाता है कि आजादी के पहले इन प्रयोगों से गरीब नागरिकों को आर्थिक मजबूती मिल रही थी । प्रतिक्रांति के दौर में विश्वविद्यालय की दुनिया से गरीब दो तरीकों से दूर कर दिया गया है । सामान्य मंहगाई के माध्यम से उसकी पहुंच असाध्य हुई है । मंहगाई का एक हिस्सा अप्रत्यक्ष करों के बोझ से उसके कन्धों पर भी आता है।  फीस वृद्धि और निजीकरण ने इस युग के उस नीति को ही पुष्ट किया है – ’समाज के एक छोटे-से छँटे हुए तबके के लिए ही सरकारी सुविधायें हों ’- शिक्षा,स्वास्थ्य,बिजली,पानी सब । सस्ते हो रहे हैं हमारे  जल , जंगल, जमीन, खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधन विदेशी कम्पनियों और बड़े उद्योगपतियों के लिए ।

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कुछ साल पहले की बात है। उड़ीसा के कालाहांडी जिले के लांजीगढ़ क्षेत्र में नियमगिरी के पहाड़ों में बॉक्साईट खुदाई की वेदान्त कंपनी की परियोजना का काफी विरोध हो रहा था। यह काफी विवादास्पद बन गई थी। तभी खबर आई कि वेदान्त कंपनी पुरी के पास 10 हजार एकड़ भूमि में 15000 करोड़ रु. की लागत से एक विशाल विश्वविद्यालय बनाएगी। तब बात कुछ समझ में नहीं आई। मुनाफा कमाने पर पूरी तरह केन्द्रित एक व्यावसायिक कंपनी इतना पैसा शिक्षा पर क्यों लगाएगी ? शायद अपने विरोध को कम करने के लिए तथा उड़ीसा के नागरिक समाज में समर्थन जुटाने के लिए कंपनी ने समाज-सेवा का यह काम चुना है। किन्तु उसके लिए भी इतना ज्यादा पैसा खर्च करने की क्या जरुरत है ?

अब धीरे – धीरे यह गुत्थी सुलझ रही है। वेदान्त विश्वविद्यालय ने जिन आधा दर्जन गांवो की जमीन जा रही है, वहां के ग्रामीणों द्वारा इसके विरुद्ध संघर्ष समिति बनाकर आंदोलन किया जा रहा है। इस संघर्ष समिति ने जो जानकारी उपलब्ध कराई है, वह आंख खोलने वाली है। विरोध के कारण वेदान्त विश्वविद्यालय को दी जाने वाली जमीन का रकबा कुछ कम हो गया है, किन्तु फिर भी पुरी शहर के पास, समुद्र किनारे, पुरी-कोणार्क मरीन ड्राईव के बगल में, छः हजार एकड़ से ज्यादा बेशकीमती जमीन बहुत सस्ती दरों पर इस विश्वविद्यालय के नाम पर दी जा रही है। इस मायने में यह अभी तक देश का सबसे ज्यादा जमीन हड़पने वाला विश्वविद्यालय होगा। अभी तक देश में विश्वविद्यालयों या अन्य षिक्षा संस्थानों के जो सबसे बड़े परिसर हैं, उनसे कम  से कम तीन-चार गुने से ज्यादा क्षेत्रफल में इसका परिसर होगा। (देखें बॉक्स) इसकी मालिक अनिल अग्रवाल फाउन्डेशन नामक एक निजी कंपनी होगी, जिसके चार संयुक्त मालिकों में से तीन वेदान्त कंपनी के मालिक अनिल अग्रवाल के परिवार के लोग है।  इस भूमि पर यह कंपनी एक पूरा नगर भी विकसित करेगी। यहां पर स्कूल, मनोरंजन केन्द्र, आवासीय कालोनी, दुकानें, बाजार , बगीचे, सांस्कृतिक केन्द्र, आदि भी विकसित किए जाएंगे। बिजली आपूर्ति के लिए 600 मेगावाट का एक विषाल बिजली संयंत्र भी लगाने की वेदान्त कंपनी की योजना है।

उड़ीसा सरकार ने जमीन के अतिरिक्त प्रतिदिन 11 हजार लीटर पानी भी उपलब्ध कराने का वायदा किया है। पुरी जिले की पूरी आबादी को जितना पानी दिया जाता है, यह उसके 95 प्रतिशत के बराबर है। जाहिर है कि यह विश्वविद्यालय जमीन के अलावा स्थानीय आबादी का पानी भी हड़पने वाला है। उड़ीसा सरकार ने भुवनेश्वर हवाई अड्डे से इस विश्वविद्यालय तक चार लेन वाली सड़क भी बनाने का वादा किया है, जो करीब 60 कि.मी. लंबी होगी। इतना ही नहीं इस विश्वविद्यालय के नाम पर की जाने वाली समस्त खरीदी, निर्माण, अनुबंधों और व्यावसाय को आने वाले 20 वर्षों तक वेट, प्रवेष कर, स्टाम्प शुल्क आदि तमाम करों से मुक्त करने का भी वायदा उड़ीसा सरकार ने कर रखा है। उस पर तुर्रा यह भी कि इस विश्वविद्यालय को पूरी स्वायत्तता होगी और प्रशासन, विद्यार्थियों का दाखिला, फीस निर्धारण, पाठ्यक्रम, शिक्षकों की नियुक्ति आदि में पूरी आजादी होगी। किसी भी प्रकार का आरक्षण भी नहीं होगा। उड़ीसा सरकार और वेदान्त कंपनी के बीच 19 जनवरी 2006 को हुए समझौते में ये सब बातें स्पष्ट रुप से लिखी हैं।

बात बहुत साफ है । वेदान्त कंपनी के मालिक पूंजीपति के लिए वेदान्त विश्वविद्यालय की यह योजना कोई घाटे का सौदा नहीं हैं। न ही यह उसके एल्युमीनियम व्यवसाय के सामाजिक – पर्यावरणीय दुष्परिणामों को ढकने के लिए किया जा रहा परोपकार या समाजसेवा का उपक्रम है। यह तो अपने आप में भारी कमाई का एक शुद्ध व्यावसायिक प्रोजेक्ट है। विशेष आर्थिक जोन के कारखाने, टाटा की नैनो कार या वैश्वीकरण के इस दौर की अन्य परियोजनाओं की भांति इसमें भी सस्ती जमीन, कर छूट और सरकारी अनुदान के साथ भारी मुनाफा कमाने की पूरी आजादी निजी पूंजीपतियों को मिल रही है। ‘लागत सरकार (जनता) की और मुनाफा पूंजीपतियों का’ – पूंजीवाद का यह चिरंतन सूत्र पूरी बेहयाई से यहां भी लागू हो रहा है।

वेदान्त के मालिक ने इसमें एक तीर से कई शिकार किए हैं। पुरी नगर के पास महंगी जमीन को सस्ती दरों पर विषाल मात्रा में पाकर वह उसका व्यवसायिक उपयोग करके भी कमाई करेगा और शिक्षा का व्यवसाय भी चलाएगा। फीस निर्धारण और छात्र-षिक्षक चुनने की पूरी आजादी देकर उड़ीसा सरकार ने यह भी सुनिश्चित कर दिया है कि इस कथित ‘विश्व-स्तरीय विश्वविद्यालय’ का चरित्र पूरी तरह अभिजात्य होगा और इसके दरवाजे उड़ीसा जैसे गरीब प्रांत की 95 प्रतिशत जनता के लिए बंद होंगे।

वेदान्त विश्वविद्यालय दरअसल भारत में शिक्षा के तेजी से बढ़ते निजीकरण और व्यवसायीकरण का एक नमूना है। इससे कंपनी-सह-विष्वविद्यालय की नई प्रजाति अस्तित्व में आई है। देष में ऐसे कई निजी स्कूलों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की बाढ़ आती जा रही है, जिनका एकमात्र मकसद मुनाफा कमाना है। उनकी कमाई इतनी है कि वे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में पूरे-पूरे पृष्ठ के विज्ञापन देते हैं। नगरों व महानगरों में बड़े-बड़े विज्ञापन वाले होर्डिंग लगाने में वे कार या मोबाईल कंपनियों से भी आगे निकल गए हैं। शिक्षा का यह घोर निजीकरण उस पुरानी निजी भागीदारी से अलग है, जिसमें समाजसेवा की कुछ भावना हुआ करती थी। पहले स्थापित हुए बिड़ला के पिलानी संस्थान या मुंबई में टाटा के संस्थानों की बात अलग थी। अब तो षिक्षा देष में सबसे तेज बढ़ता हुआ और संभवतः सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाला उद्योग बन गया है। मंत्री, नेता, व्यापारी, बनिए, फर्में, कंपनियां और बड़े उद्योगपति घराने सभी इस में कूद पड़े हैं। मुनाफे, लूट और षोषण के इस खेल में अब परोपकार या सेवा का कोई घालमेल नहीं हैं, कोई दिखावा भी नहीं है।

भारत सरकार षिक्षा के इस ‘मुक्त बाजार’ कोे बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध और समर्पित है। यों तो इसके संकेत एक दषक पहले ही मिल गए थे, जब सरकार ने षिक्षा में ‘सुधार’ का सुझाव देने के लिए अंबानी-बिड़ला समिति बनाई थी। किन्तु भारत के नए मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के आने के बाद तो षिक्षा के व्यवसायीकरण – कंपनीकरण की गाड़ी अभूतपूर्व तेजी से दौड़ाने लगी है। विदेषी विष्वविद्यालयों को अनुमति देने का कानून बनने पर इसे और गति मिल जाएगी। ‘निजी-सार्वजनिक भागीदारी’ मंे जो स्कूल चलाने की बात हो रही है, उसमें भी जमीन हड़पने और सरकारी अनुदान पर निजी मुनाफा कमाने का ही काम होगा। नगरों व महानगरों के सरकारी स्कूलों की कीमती जमीन निजी हाथों में देने की योजनाएं बन चुकी हैं। भारत सरकार ने बैंको से षिक्षा ऋण दिलवाने और उसमंे ब्याज अनुदान देने की जो योजना चलाई है, वह भी दरअसल इन निजी व्यवसायिक षिक्षण संस्थानों की महंगी फीस भरने की सुविधा के लिए है। योजना आयोग ने एक ‘राष्ट्रीय षिक्षा वित्त निगम’ बनाने का भी प्रस्ताव किया है, जो विद्यार्थियों के साथ-साथ निजी षिक्षण संस्थानों को भी सस्ती दरों पर ऋण दिलवाएगा। कुल मिलाकर, शिक्षण संस्थानों को दुकानों व कारखानों में बदलने का काम तेजी से हो रहा है। लगभग ऐसा ही खेल स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में हो रहा है। भारत की राष्ट्रीय आय की ऊँची वृद्धि दर षायद इसी तरह से हासिल हो रही है।

शिक्षा के इस बढ़ते बाजार में दो ही किन्तु – परन्तु हैं। एक तो यह कि इसमें षिक्षा का स्वरुप भी बाजारु ही होगा, जिसका व्यक्ति, समाज और देष की जरुरतों से कम ही संबंध रहेगा और जो पूरी तरह बाजार व कंपनियों की जरुरतों को समर्पित रहेगी। वैसे तो अभी तक भी भारत की शिक्षा काफी दमघोंटू, घटिया, नकलची और जमीन से कटी रही है। किन्तु बाजारीकरण से इसकी विकृतियां और बढ़ जाएगी। दूसरा शिक्षा का यह बाजार बहुत बड़ी संख्या में इस गरीब देष के बच्चों को बहिष्कृत, कुंठित, तिरस्कृत करता जाएगा। सरकार चाहे सर्व शिक्षा अभियान चला ले और चाहे शिक्षा अधिकार कानून बना ले, शिक्षा के व्यवसायीकरण का मतलब देष के साधारण बच्चों व युवाओं को शिक्षा से वंचित करना और पछाड़ना है। क्या ये दोनों हालात दे्श के लिए चिन्ता की बात नहीं है ?

सुनील

लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।

ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)

पिन कोड: 461 111

मोबाईल 09425040452

शिक्षा और जमीन

वेदान्त विश्वविद्यालय के साथ ही शिक्षा भी अब जमीन हड़पने और किसानों को विस्थापित करने का एक जरिया बन रही है। देश व दुनिया के कुछ बड़े शिक्षण परिसरों का क्षेत्रफल इस प्रकार है: –

शिकागो विश्वविद्यालय    211 एकड़

हार्वर्ड विश्वविद्यालय    380 एकड़

प्रिंसटन विश्वविद्यालय    600 एकड़

वाशिंगटन विश्वविद्यालय    643 एकड़

भारतीय तकनालाजी संस्थान, दिल्ली  320 एकड़

भारतीय तकनालाजी संस्थान, चेन्नई  625 एकड

भारतीय तकनालाजी संस्थान, गुवाहाटी  712 एकड़

भारतीय तकनालाजी संस्थान, कानपुर  1055 एकड़

भारतीय तकनालाजी संस्थान, दिल्ली  320 एकड़

उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर   400 एकड़

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली  1000 एकड़

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी  1300 एकड़

केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद   2300 एकड़

(प्रस्तावित) वेदांत विश्वविद्यालय, पुरी  6270 एकड़

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क्या पहली अप्रैल को पूरे देश को मूर्ख बनाया जा रहा है ?

1 अप्रैल 2010 को देश में ‘मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून’ लागू हो रहा है। यह बताया जा रहा है कि यह एक क्रांतिकारी काम है। इससे देश के सारे बच्चों को शिक्षित करने का काम हो जाएगा। लेकिन सच क्या है ? आइए, विचार करें –

*             इस कानून की शर्तें पूरी करने के लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति तो हो रही है, किन्तु वे अस्थायी, ठेके पर, अप्रशिक्षित पैरा शिक्षक हैं। इस कानून में ‘पैरा-शिक्षक’ (जैसे संविदा शिक्षक, अतिथि शिक्षक, गुरुजी, शिक्षा मित्र आदि) लगाने पर कोई रोक नहीं है। इसका मतलब है कि सरकारी स्कूलों में और सस्ते निजी स्कूलों में गरीब बच्चों की पढ़ाई ‘राम-भरोसे’ रहेगी। क्या स्थायी, प्रशिक्षित, पर्याप्त वेतन वाले शिक्षकों का कैडर बनाए बगैर देश के बच्चों की शिक्षा ठीक से हो सकेगी ?

*              इस कानून में शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता और न्यूनतम वेतन की बात तो है, लेकिन इतना कम रखा गया है कि सरकारी स्कूलों में पैरा-शिक्षक जारी रहेंगे और निजी स्कूलों में शिक्षकों का शोषण जारी रहेगा।

*              इस कानून में न्यूनतम विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात प्राथमिक शालाओं में 30 बच्चों पर 1 शिक्षक रखा गया है। इसका मतलब है कि कई छोटे स्कूलों में (जहां विद्यार्थी संख्या 120 से नीचे है) तीन या चार शिक्षक ही होंगे। यानी गरीब बच्चों को एक कक्षा पर एक शिक्षक भी नसीब नहीं होगा।

*              इस कानून में स्कूल में जितने शिक्षक जरुरी है, उतने ही शाला भवन में कमरे रखना जरुरी होंगे। यानी छोटे स्कूलों में एक कक्षा के लिए एक कमरा भी नहीं होगा। दो या तीन कक्षाओं को एक साथ पढ़ाया जाएगा। क्या यह गरीब बच्चों की शिक्षा के नाम पर मजाक नहीं होगा ?

*            इस कानून में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को चुनाव और जनगणना के काम में लगाने पर भी रोक नहीं लगाई है। यानी गरीब बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती रहेगी।

*            इस कानून में निजी स्कूलों की फीस बढ़ाने पर कोई रोक नहीं है। यानी वे मनमानी फीस बढ़ाते रहेगें। इन स्कूलों के प्रबंध में किसी तरह की अभिभावकों, समाज या सरकार की भागीदारी भी जरुरी नहीं होगी।

*             इस कानून में शिक्षा में बढ़ती गैरबराबरी और भेदभाव को रोकने की कोई बात नहीं है। बल्कि सरकार उसे और बढ़ावा देने का काम कर रही है। इससे सरकारी स्कूलों में सिर्फ गरीब बच्चे ही रह जाएंगे, और उनकी उपेक्षा व दुर्दशा और बढ़ेगी। इस कानून के बाद नाम के लिए तो हर बच्चे को स्कूल की शिक्षा पाने का अधिकार होगा, किन्तु गरीब बच्चों के लिए बहुत घटिया, अधकचरी शिक्षा होगी (जिसमें 5वीं और 8वीं में आ जाने पर भी बच्चे को न्यूनतम पढ़ना-लिखना भी नहीं आएगा।)

*              इस कानून में निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने (उनकी फीस सरकार देगी) का बहुत प्रचार किया जा रहा है। किन्तु बाकी बच्चों का क्या होगा ? उनके हिस्से में वही घटिया, अधूरी नाममात्र की शिक्षा रहेगी।

*             इस कानून में 8वीं से पहले कोई परीक्षा नहीं होगी। इसका मतलब है कि सरकारी और सस्ते निजी स्कूलों में आधी-अधूरी शिक्षा के बाद भी बच्चों को अगली कक्षा में धकाया जाता रहेगा।

*             इस कानून में मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान करते हुए भी कुछ स्कूलों व कुछ बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा की गुंजाईश छोड़ दी है। इस तरह देश में दोहरी शिक्षा व्यवस्था चालू रहेगी।

*             इस कानून में देश में शिक्षा के बढ़ते धंधे और मुनाफाखोरी पर रोक लगाने की कोई मंशा नहीं है। उल्टे सरकार निजी-सरकारी भागीदारी के नाम पर सरकारी भूमि और मदद देकर पूंजीपतियों को इस धंधे में बुला रही है और बढ़ावा दे रही है।

*              उच्च शिक्षा और कोचिंग का निजीकरण व बाजार भी बहुत बढ़ता जा रहा है। बी.एड. और डी.एड. में भी जिस तरह से निजी कॉलेजों की बाढ़ आई है, लूट एवं धांधली मची है, बिना किसी पढ़ाई के डिग्री बांटी जा रही है, उससे तैयार शिक्षक क्या पढाएंगे ?

*              देश में शिक्षा का बाजार बढ़ाने के मकसद से विदेशी विश्वविद्यालयों को भी इजाजत देने की तैयारी चल रही है, जिससे शिक्षा में लूट और मुनाफाखोरी और बढ़ेगी।

*             देश के सारे बच्चे तभी भलीभांति शिक्षित हो सकेंगें, जब सरकारें इसकी जिम्मेदारी लेंगी और देश में समान स्कूल प्रणाली लागू होगी। दुनिया में जिस भी देश ने अपनी पूरी आबादी को शिक्षित किया है, किसी-न-किसी तरह की समान स्कूल प्रणाली के दम पर ही वे यह कर पाए हैं। किन्तु यह कानून इस दिशा में आगे बढ़ने के बजाए, उल्टी दिशा में देश को ले जाता है।

यह साफ है कि यह कानून एक धोखा है। इसकी आड़ में देश के साधारण जनों को झूठमूठ समझा कर सरकार इस देश में शिक्षा का जबरदस्त बाजार एवं धंधा बढ़ाने का काम कर रही है। इससे देश के साधारण बच्चे शिक्षा से वंचित और कुंठित होंगे। बच्चों की आत्महत्याएं और बढ़ेंगी। देश के नौजवान और ज्यादा बेरोजगारी, गैरबराबरी, हिंसा एवं उग्रवाद की और बढ़ेंगे। क्या यही भारत का भविष्य होगा ?

आइए, हम सब मिलकर इसका विरोध करें। शिक्षा के बाजारीकरण और व्यापार के खिलाफ आवाज उठाएं। देश के हर बच्चे को अच्छी और समान शिक्षा का हक मिले और सरकारें अपनी संवैधानिक जवाबदारी पूरी करें, इसके लिए संघर्ष करें।

एक अप्रैल 2010 को पूरे देश में अपने स्तर पर सरकार की इस धोखाधड़ी के विरोध में कार्यक्रम करें।

शिक्षा अधिकार मंच

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