Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘शिक्षा’ Category

काशी विश्वविद्यालय आवासीय विश्वविद्यालय है। कला संकाय का डॉ एनी बेसेन्ट छात्रावास परिसर के बाहर है। सुरक्षा की दृष्टि से कम सुरक्षित।शहर से सीधे छात्रावास में घुस कर मार-पीट की संभावना ज्यादा होगी यह मानते हुए उसे परिसर के छात्रावासों से अधिक असुरक्षित माना जा सकता था। 1982 में उस छात्रावास में रहने वाले नन्दलाल,नन्दा राम,राम दुलार सहित 8 छात्रों को छुआछूत और जातिगत भावना से मारा-पीटा गया। समता युवजन सभा ने आवाज उठाई तो मार-पीट करने वाले छात्र प्रो मनोरंजन झा की समिति की जांच के बाद निकाल दिए गए। पीडित छात्रों को सुरक्षा की दृष्टि से परिसर के छात्रावास में कमरे दिए जांए,यह मांग भी थी। प्रशासन ने इन सभी छात्रों को बिडला छात्रावास के 6ठे ब्लॉक के कॉमन रूम से 6-7 कमरे बनवा कर आवण्टित किया गया।

सयुस की इकाई की स्थापना के मौके पर किशन पटनायक 1982 में बोले। परिसर में जाति,पैसे और गुंडागर्दी के बोलबाले का हमने जिक्र किया।किशनजी ने कहा ,”भारतीय समाज में जाति ऐसी गली है जो बन्द है।जन्म,विवाह और मृत्यु इसी गली के भीतर होना तय हो जाता है।गुण्डा वह है जो अपने से कमजोर को सताता है और अपने से मजबूत के पांव चाटता है। छात्र किसी एक वर्ग से नहीं आते लेकिन उनका समूह ऐसा होता है जिसके सदस्यों के गुण- जोखिम उठाने का साहस,बड़ों की बात आंख मूंद कर न मान लेना और दुनिया बदलने का सपना देखना होता है।”

मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के फैसले के बाद उच्च शिक्षा केन्द्रों में लाजमी तौर पर विरोध हुआ। चूंकि उच्च शिक्षा केन्द्र सवर्ण वर्चस्व के केन्द्र हैं।मंडल विरोधी छात्रों द्वारा आत्मदाह के प्रयास के बाद मुझे जला कर मारने की योजना बनी। सिख छात्रों को बचाने,एक छात्रावास के कमरे में मालवीयजी के समय से रखे गए गुरुग्रंथ साहब से छेडछाड करने वालों के खिलाफ शिकायत करने के कारण भी मेरे खिलाफ उन्हीं लोगों में गुस्सा था।जो अखबार राम मन्दिर आन्दोलन के दौर में विहिप का पैम्फलेट बन जाते थे उन्हींमें से एक में एक अध्यापक ने सवर्ण वर्चस्व के पक्ष में लिखा,’घोड़ा खरीदने जाते हैं तो अरबी घोड़ा खोजते हैं।कुत्ता रखना होता है तो अलसेशियन रखते हैं। फिर पढ़ाई और नौकरियों में सवर्णों का होना तो स्वाभाविक है।’ इस लेख के छपने के बाद लाजमी तौर पर वे छापा-तिलक लगाए,जनेऊधारी चिकित्सक हमें बेल्टधारी अलसेशियन लगते थे।

ऐसे माहौल में काशी विश्वविद्यालय में नेल्सन मण्डेला का कार्यक्रम बना।उन्हें मानद उपाधि दी गई। हम हवाई अड्डे पर पहुंचे। नेल्सन मण्डेला के साथ राजमोहन गांधी थे। उन्होंने हमें अपने साथ ले लिया।काफिला प्रह्लाद घाट पहुंचा,जहां स्थानीय प्रशासन ने मण्डेला साहब से ‘गंगा-पूजन’ करवाया। 5 कदम की दूरी पर रविदास मन्दिर था,जिसके बारे में मण्डेला साहब को नहीं बताया गया। हमारे ज्ञापन के बारे में राजमोहनजी ने संक्षेप में बताया और हम लोगों से कहा कि वे विस्तार से बाद में उसके बारे में बात कर लेंगे।

ज्ञापन तो यहां दर्ज करेंगे ही,उस दौर में वि.वि. में जाति प्रथा कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए थी,कुछ उदाहरण जान लीजिए। कृषि विज्ञान संस्थान में स्नातक स्तर पर ही आपको अपनी जाति के हिसाब से इतने अंक मिला करते थे कि स्नातकोत्तर कक्षाओं के विभाग उसी हिसाब से तय हो जाते थे। ब्राहमण के कृषि अर्थशास्त्र,राजपूत और भूमिहार के एग्रोनॉमी,पिछडे और दलित के हॉर्टीकल्चर में जाने की संभावना ज्यादा रहती थी। इसका व्यतिक्रम होने पर – कुर्मी किसान घर का पंचम सिंह  और पांडुरंग राव आत्महत्या करते हैं (दोनों कृषि विज्ञान संस्थान)। भौतिकी विभाग के कुशवाहा प्रोफेसर ने  एक क्षत्रीय शोध छात्र (नाम के साथ उसके भी कुशवाहा था) को परेशान किया तो प्रोफेसर ने चक्कू खाया था। छात्र पर 307 न लगे इसके लिए तत्कालीन कुलपति ने कचहरी जाकर निवेदन किया था।

आम तौर पर दलों,संगठनों से ऊपर उठकर जातियों का एका बन जाता था। जातिवादी मठाधीश प्रोफेसर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए जाति का उपयोग करते थे,जाति के प्रति प्रेम भी उसके लिए आवश्यक नहीं होता था।

एक मजबूत दलित प्रत्याशी लगातार ब्राह्मण प्रत्याशी से हारा-तब सवर्ण गोलबन्दी के लिए,’आजादी की लड़ाई सवर्णों ने लड़ी।छात्र संघ किसका? सवर्णों का’ जैसे परचे बटते। संयोगवश मैं भी उसी पद पर चुनाव लड़्ता था। ‘खटिका को हराना है तो……. को जिताना होगा’ नारा सफल नहीं हो पाया क्योंकि मेरे कारण गोलबन्दी नहीं हो पाई। वि.वि. में महिला महाविद्यालय,चिकित्सा विज्ञान संस्थान,दृश्य कला संकाय और प्रौद्योगिकी संस्थान के छात्र छात्राओं में जाति का असर न्यूनतम था और वहां मैं नम्बर एक पर था-अन्य संकायों में एक बडे गठबंधन के नाम पर सोनकर नम्बर पर एक थे। विश्वविद्यालय के पिछड़े- दलित छात्रों ने इस बात पर गौर किया और अगले साल ऊपर दिए संकायों के अलावा उनका भरपूर समर्थन मुझे मिला।

समता युवजन सभा हाथ के बने पोस्टर लगाती और मोटर साइकिल जुलूस की जगह साइकिल जुलूस निकालती। राजनीति में असरकारी होना जरूरी होता है।जब सयुस असरकारी हुई तब मुख्यधारा वाले समूहों ने भी साइकिल जुलूस निकाला।छात्रों ने उसे नकल माना। ”सयुस की साइकिल देखी,सबने मोटर साइकिल फेंकी”

नेल्सन मण्डेला को दिया गया ज्ञापन-

 

प्रति,

माननीय नेल्सन मण्डेला,

नेता, अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस ।                                        दिनांक 17 अक्टूबर 1990

परम आदरणीय महोदय.

आपके हमारे विश्वविद्यालय आगमन के अवसर पर हमारा मन हर्ष नहीं, अपितु विषाद से भर उठा है। मानवीय मूल्यों के लिए आपकी आजीवन लड़ाई,अपने जीवन मूल्यों के लिए कठोरतम परिस्थिति में विश्वास ज्योति को जलाए रखना, सिर्फ ऐसे समाज के लिए प्रेरणा बननी चाहिए जो स्वयं उन मूल्यों में विश्वास करे और उन्हें प्रतिस्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हो।

आज हमारा समाज , विशेषतः इस विश्वविद्यालय का छात्र-युवा,अध्यापक समाज, विशेष अवसर द्वारा विषमता मूलक समाज संरचना को दूर करने के खिलाफ खड़ा है। उसकी वाणी,उसकी लेखनी में जातिवाद के साथ-साथ नस्लवाद साफ-साफ परिलक्षित होता है। जात्यिवाद को वैज्ञानिक व्यवस्था करार देने के साथ हर जाति को अलसेशियन कुत्ता,अरेबियन घोड़ा की विशिष्टता के साथ जोड़ा जा रहा है। आज की तारीख में ऐसी मानसिकता को प्रश्रय देने वाला यह प्रशासन, छात्रावासों में अनुसूचित जाति, जनजाति के छात्रों को अलग लॉबी में रखता है। खुले कमरों में रहने की जुर्रत करने वाले,राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में मुखर दलित छात्रों को पीटा जाता है।लिखित शिकायत करने पर भी कुलपति,प्रशासन सिर्फ आश्वासन देते हैं। दोषी छात्रों अथवा छात्रावास संरक्षकों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाता।

यहां मंडल कमीशन की संस्तुतियों के खिलाफ आन्दोलनकारियों के प्रति वि.वि. प्रशासन ने अतिशय नरम व सहयोगी रुख अपनाया है। ऐसे में यहां की विद्वत परिषद द्वारा आपका अभिनन्दन एक विडंबना ही है। यदि आपको सही वस्तुस्थिति की जानकारी होती तो आप कदापि इस मानद उपाधि को सम्मान नहीं मानते व इसे ग्रहण करने से इंकार कर देते।

विषमता मूलक समाज के पोषक , विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा आयोजित इस समारोह का विरोध करते हुए भी महात्मा गांधी के देश में हम अपने प्रेरणा स्रोत के रूप में आपका स्वागत करते हैं।

विनीत,

( डॉ स्वाति )                                          (हरिशंकर)

समता संगठन                                    समता युवजन सभा

Advertisements

Read Full Post »

चेन्नई सम्मेलन – दृष्टि, कार्यक्रम और अपेक्षाएं

(पहला प्रारूप)

(30 जून-01 जुलाई 2012)

पृष्ठभूमि

अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच एवं समान स्कूल व्यवस्था के लिए राज्य मंच, तमिलनाडु (स्टेट प्लेटफ़ार्म फ़ॉर कॉमन स्कूल सिस्टम, तमिलनाड़ु) के संयुक्त तत्वावधान में 30 जून-01 जुलाई 2012 को चेन्नई में ‘शिक्षा का बाजारीकरण खत्म करने और समान स्कूल व्यवस्था का निर्माण करने के लिए अखिल भारत सम्मेलन‘ का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन समकालीन भारत के एक खास ऐतिहासिक क्षण पर किया जा रहा है। यह वह ऐतिहासिक क्षण है जब सन् 1991 की वैष्वीकरण की घोषणा के 20 साल बीतने पर और कई मोर्चों पर लगातार संघर्ष के तजुर्बों      से आम जनता को साफ हो गया है कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान आज़ाद भारत का जो सपना देखा गया था उसे भारत का शासक वर्ग ताक पर रखने और उन सपनों के मुताबिक जो संविधान तैयार हुआ था, उसे नजरंदाज़ करने का फैसला कर चुका है। आज देश का हर संसाधन – जल, जंगल, जमीन, जीविका, जैव-विविधता, ज्ञान, उत्पादन, भाषा, कौशल, शिक्षा, सेहत और सांस्कृतिक विरासत – वैश्विक बाजार में बिकाऊ माल बन चुका है। जनता देख रही है कि ऐसा अपने-आप नहीं हुआ है। इसके लिए शासक वर्ग ने कारपोरेट पूंजी के हित में तमाम नीतियां बनाईं, बजट व कानून पारित करवाए, समर्थक ढांचे खड़े किए और जरूरत पड़ने पर जनता के बढ़ते हुए प्रतिरोध को दबाने के लिए गैर-लोकतांत्रिक ढंग से मीडिया, पुलिस व देशभक्त फौज का भी इस्तेमाल किया। इस दौरान हर जनपक्षी और देशप्रेमी सुझाव को ठुकराया गया।

यही कहानी शिक्षा की भी रही है। आज शिक्षा की नीतियों का निर्माण और व्यवस्था को पूरी तौर पर कारपोरेट पूंजी और दुनिया को बाजार के हवाले किया जा चुका था। सरकार शिक्षा के प्रति अपनी संवैधानिक जवाबदेही से बरी होने के लिए इसे तेजी के साथ अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, निजी कारोबार व एन.जी.ओ. को सौंप रही है। जिस शिक्षा को संविधान में लोकतांत्रिक, समतामूलक, न्यायशील, धर्मनिरपेक्ष और प्रबुद्ध भारत के निर्माण के जरिए के रूप में देखा गया है उसी को आज समाज को बांटने, भेदभाव बढ़ाने, 80 फीसदी से अधिक जनता को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित करने और वैश्विक बाजार के लिए बाजारपक्षी मूल्यों से सिंचित गुलाम कामगारों की फौज खड़ा करने का साधन बना दिया है। आज वह वक्त आ गया है जब हमें तय करना है कि हम कैसा भारत चाहते हैं, ऐसे भारत का निर्माण करने में शिक्षा की क्या भूमिका हो व उसके लिए उपयुक्त व्यवस्था कैसी हो और इस को मुमकिन कराने के लिए हमें क्या करना है। यही ऐतहासिक महत्व हागा चेन्नई सम्मेलन का।

सरोकार व मुद्दे

चेन्नई सम्मेलन में इन सब सवालों पर खासकर स्कूली शिक्षा के संदर्भ में विचार किया जाएगा यानी पूर्व-प्राथमिक स्तर (नर्सरी, के.जी.) से लेकर 12वीं कक्षा तक के संदर्भ में। आज की गैर-बराबरी और भेदभाव की बुनियाद पर खड़ी की गई बहु-परती स्कूल व्यवस्था को ध्वस्त करके पडोसी स्कूल पर आधारित और पूरी तौर पर सार्वजनिक वित्त (सरकारी कोष) से पोषित समान स्कूल व्यवस्था को कैसे स्थापित किया जाए? मुफ्त शिक्षा के मायने क्या हैं? क्या इसका अर्थ महज निःशुल्क शिक्षा (यानी फीस नहीं लेना) देना है या ऐसी शिक्षा की गारंटी देना है जिसको पाने के लिए किसी भी बच्चे या उसके अभिभावक पर किसी भी तरह का आर्थिक बोझ न पड़े? जाहिर है कि ऐसी स्कूल व्यवस्था का प्रबंधन आज की प्रबंधन व्यवस्था जैसा नहीं हो सकता। सार्वजनिक वित्तसे पोषित होने के बावजूद समान स्कूल व्यवस्था का प्रबंधन लोकतांत्रिक, विकेंद्रित और सहभागी कैसे बने? स्कूली व्यवस्था से समाज में सदियों से व्याप्त तरह-तरह की विषमताओं (वर्गीय, जातीय, सांप्रदायिक, लिंग-आधारित, भाषाई, विकलांगता-संबंधित, आंचलिक आदि) को बाहर कैसे किया जाए और देशभर की जनपक्षी विविधताओं को शामिल कैसे किया जाए? हालांकि संवैधानिक नजरिए का भारत बनाने के लिए पाठ्यचर्या (करीकुलम) की एक राष्ट्रीय रूपरेखा या खाके को स्वीकारना होगा लेकिन उसमें बच्चों व शिक्षकों की सृजनशीलता, भू-सांस्कृतिक विविधता व बहुभाषीयता, सीखने-सिखाने के तौर-तरीकों में नवाचार और वैज्ञानिक कसौटी पर परखकर स्थानीय ज्ञान को जोड़ने एवं अन्य चुनौतियों क¨ शामिल करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश कैसे बन पाए? स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा के बीच के तमाम विरोधाभास (जैसे कोचिंग का कारोबार) को खत्म करके उनके बीच सहज संबंध कैसे बने? यानी ‘के.जी. से पी.जी.‘ तक पूरी तौरपर मुफ्त शिक्षा और 12वीं कक्षा के बाद उच्च शिक्षा पाने के लिए सभी बच्चों को समान अवसर की गारंटी कैसे मिले, यह भी सम्मेलन का एजेंडा होगा। कुल मिलाकर हमारी लड़ाई केवल समान स्कूल व्यवस्था तक सीमित नहीं है वरन् ‘के.जी. से पी.जी.‘ तक समान शिक्षा व्यवस्था की है। चेन्नई सम्मेलन में ऐसे कई सवालों पर जनपक्षी वैकल्पिक एजेंडे के निर्माण की कवायद की जाएगी।

उद्देश्य

सम्मेलन के निम्नांकित उद्देष्य होंगे –

1. भारत के सभी बच्चों को संवैधानिक मूल्यों से सिंचित पूर्व-प्राथमिक स्तर (नर्सरी, के.जी.) से कक्षा 12 तक बगैर किसी भेदभाव के मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मौलिक अधिकार देने के लिए पूरी तौर पर सार्वजनिक वित्त (सरकारी कोष) से पोषित व पडोसी स्कूल पर टिकी हुई समान स्कूल व्यवस्था की अवधारणा को विकसित करना और उसको ‘राज्य‘ की संवैधानिक जवाबदेही के रूप में स्थापित करना।

2. 12वीं कक्षा के बाद गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के लिए समान अवसर का संवैधानिक अधिकार उपलब्ध करने के लिए ‘के.जी. से पी.जी.‘ तक पूरी तौर पर सार्वजनिक वित्त (सरकारी कोष) से पोषित समान शिक्षा व्यवस्था को जन आंदोलन का मुद्दा बनाना।

3. समान शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए शिक्षा के बाजारीकरण को खत्म करने और वर्तमान नवउदारवादी नीतियों को पलटकर संवैधानिक एजेंडे को पुनस्र्थापित करने की पूर्वशर्त के पक्ष में जन आंदोलन की रणनीति तय करना।

प्रमुख सत्र

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में शिक्षा की सामाजिक परिवर्तनकारी भूमिका, षिक्षा और संवैधानिक मूल्यों के बीच अंतर्संबंध, ‘मैकॉले से लेकर मनमोहन‘ तक शिक्षा के अधिकार की लड़ाई के इतिहास, शिक्षा पर नवउदारवादी हमला व उसके बाजारीकरण का प्रतिरोध और समान स्कूल व्यवस्था की दृष्टि का नवनिर्माण आदि विषयों पर विचार पेश किए जाएंगे। इसके अलावा सम्मेलन में निम्नांकित उल्लेखनीय सत्र होंगे –

अंतरराष्ट्रीय सत्र – इस सत्र में उन मुल्कों के अनुभवों को जानने, समझने व उनसे भारत के संदर्भ में सबक सीखने की कोशिश की जाएगी जहां किसी-न-किसी रूप में सार्वजनिक वि्त्त-पोषित समान स्कूल व्यवस्था अपनाई गई, चाहे वे मुल्क पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के रहे हों, चाहे समाजवादी अर्थव्यवस्था के। इसके लिए अमरीका, कनाडा, क्यूबा, जर्मनी, जापान, दक्षिण अफ्रीका, फ्रांस, फ़िनलैंड, ब्राझील, भूटान आदि को चिन्हित किया गया है। इसमें उन अनुभवों की भी पड़ताल की जाएगी जिनमें पिछले दो-तीन दशकों में नवउदारवादी नीतियों के चलते समान स्कूल व्यवस्था को विकृत या ध्वस्त करने की कोशिश हुई है।

कानूनी सत्र – इस सत्र में कानून विषेषज्ञों की मदद से यह समझा जाएगा कि 86वें संविधान संशोधन अधिनियम (2002), शिक्षा अधिकार कानून (2009) और इस मामले में हाल में हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले में शिक्षा में गैर-बराबरी व भेदभाव बढ़ाने और बाजारीकरण की नीतियों को तेज करने के जो प्रावधान या विचार हैं उनके खिलाफ़ क्या संवैधानिक कदम उठाए जा सकते हैं। खासकर अनुच्छेद 19(1)(छ) के दायरे से शिक्षा व स्वास्थ्य को बाहर करने व अनुच्छेद 19(6) की अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(क) और 21 के संदर्भ में वर्तमान सीमाओं को तोड़ने के मकसद से किस तरह के संवैधानिक संशोधनों, कानूनी कदमों या राजनीतिक कार्रवाइयों की जरूरत होगी।

राजनीतिक दलों के साथ सत्र – विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ होने वाले इस सत्र में हरेक के सामने 10-12 सवाल रखकर उनके दलों के नजरिए का खुलासा करवाया जाएगा और संसद व विधान सभाओं में इस संदर्भ में उनके द्वारा की जानेवाली कार्रवाई का आश्वासन मांगा जाएगा। उनसे सवाल-जवाब करके उनके नजरिए के बारे में सफाई मांगी जाएगी और जरूरत पड़ने पर उसमें मौजूद गैर-संवैधानिक व जनविरोधी पक्षों को उजागर भी किया जाएगा ताकि उनकों पुनर्विचार के लिए मजबूर किया जा सके।

जन आंदोलन विकसित करने की रणनीति निर्माण सत्र – इस सत्र में शिक्षा के बाजारीकरण की नीतियों को पलटवाने और सार्वजनिक वित्त-पोषित समान स्कूल व्यवस्था को स्थापित करने के लिए जन आंदोलन खड़ा करने की रणनीतियों पर विचार होगा। इसके लिए उन राज्यों के अनुभवों की खासतौर पर पड़ताल की जाएगी जहां इस दिशा में आंदोलन आगे बढ़ा है और सबक सीखे जा सकते हैं।

अंत में रैली, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सार्वजनिक सभा के जरिए जन आंदोलन के लिए आह्वान दिया जाएगा।

चेन्नई घोषणापत्र

सम्मेलन से शिक्षा का बाजारीकरण खत्म करने और समान शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए जन आंदोलन का आह्वान देने के मकसद से एक चेन्नई घोषणापत्र जारी किया जाएगा जिसे संविधान की 8वीं अधिसूची में शामिल देश की 22 भाषाओं में प्रसारित किया जाएगा।

अनुवाद

तमिल-हिंदी-अंग्रेजी तीनों भाषाओं में परस्पर दोतरफा अनुवाद की व्यवस्था के लिए पुरजोर कोशिश होगी। यदि आप में से कोई साथी इस महत्वपूर्ण काम में सक्रिय योगदान के लिए तैय्यार हैं तो तुरंत संपर्क करें।

सहभाग का आमंत्रण व उसकी कसौटियां

सम्मेलन में विभिन्न विद्यार्थी, शिक्षक व शिक्षा अधिकार की लड़ाई में शामिल संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ व्यक्तिगत हैसियत से कई बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, न्यायाधीशों व समाजकर्मियों के सहभाग की अपेक्षा है। कुल मिलाकर 2,000 प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे, तमिलनाड़ु से 1,500 प्रतिनिधि और देश के विभिन्न राज्यों से 500 प्रतिनिधि। उन सभी संगठनों व व्यक्तियों को सहभागी होने के लिए आमंत्रित किया जाता है जो निम्नांकित तीनों शर्तों पूरा करते हैं। पहला, वे शिक्षा का बाजारीकरण करने व शिक्षा को बिकाऊ माल बनाने एवं सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पी.पी.पी.) के जरिए सार्वजनिक धन निजी एजेंसियों व कारपोरेट घरानों को पहुंचाने की नीतियों का स्पष्ट विरोध करते हैं। दूसरा, वे पूरी तौरपर सार्वजनिक वित्त से पोषित और पडौसी स्कूल पर टिकी हुई समान स्कूल व्यवस्था का समर्थन करते हों।  तीसरा, वे ‘के.जी. से पी.जी.‘ तक मुफ्त व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बिना किसी भेदभाव को सबको समान अवसर मुहैया करने वाली सार्वजनिक वित्त से पोषित लोकतांत्रिक, समतामूलक, नयायशील, धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक शिक्षा व्यवस्था खड़ी करने की मुहिम में शामिल होने को तैयार हों।

यदि आप या आपके साथीगण उक्त तीनों शर्तों को पूरा करते हैं तो अपने संगठन की ओर से या व्यक्तिगत हैसियत से सम्मेलन में सहभागी बनने के लिए निम्नांकित को संपर्क करके अपने व साथियों बारे में जानकारी (नाम, संगठन, फ¨न नं., डाक व ईमेल पता सहित) दें –

1. डॉ. विक्रम अमरावत, कार्यालय सचिव, अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच: मो – 8128293711; फोन – 079-23274360 (घर).

2. श्री प्रिंस गजेंद्र बाबू, महासचिव, स्टेट प्लेटफ़ार्म फ़ॉर कॉमन स्कूल सिस्टम, तमिलनाड़ु:फोन – 044-28341456 (दफ्तर); 044-28443660 (घर).

चेन्नई के बाहर से आनेवाले प्रतिनिधियों को अपनी यात्रा के खर्च का खुद इंतजाम करना होगा लेकिन स्थानीय आवास व भोजन की पूरी जिम्मेदारी आयोजन समिति की होगी। सम्मेलन के खर्च के लिए स्टेट प्लेटफ़ार्म फ़ॉर कॉमन स्कूल सिस्टम, तमिलनाड़ु, चेन्नई शहर में स्वयंसेवकों की टीमें बनाकर आम जनता से पैसा इकट्ठा कर रहा है।

आप सब से अपील है कि इस ऐतिहासिक सम्मेलन में अपने साथियों के साथ पूरे जोश-खरोश के साथ हिस्सा लेकर शिक्षा को मौलिक अधिकार व समान शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए राष्ट्र-व्यापी आंदोलन खड़ा करने और भारत के नवनिर्माण में अपना योगदान दें।

Read Full Post »

काशी विश्वविद्यालय में १९८६ में छात्र संघ निलंबित हुआ उसके साथ छात्र संघ के उपाध्यक्ष और महामंत्री भी निलंबित हुए | अध्यक्ष नहीं हुए |पदाधिकारी न होते हुए भी मैं हुआ | कुछ पूर्व छात्रों के परिसर प्रवेश पर रोक लगी | छात्रों की तरफ से सिर्फ मैंने उच्च न्यायालय के जज ए एस श्रीवास्तव की जांच समिति का सामना किया |मैंने सभी छात्रों का बचाव किया और सभी पूर्णतय: दोषमुक्त हुए | चूंकि दोषसिद्ध होने के पूर्व निलंबन को सजा नहीं माना जाता है इसलिए मेरे विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आर सी यादव ने मेरे यूं जी सी नेट की परीक्षा के आवेदन को अग्रसारित किया था | इस परीक्षा में सफल हुआ और निलंबन की अवधि के वजीफे से स्कूटर खरीदी |निलंबन के दौरान ही पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा भी दी ,द्वितीय स्थान रहा | वजीफे के लिए बैंक खाता खुला | खाते में फिलवक्त ६ हजार ७ सौ २३ रुपये पचास पैसे हैं | अखबारों में छपने वाले लेखों का पारिश्रमिक |

परीक्षाओं की कमियों को दूर करने के लिए कई सुधार किए जा सकते हैं |छात्र के साथ  एक बार हुए अन्याय से निजात पाने के लिए और मौके दिया  जाना ऐसा ही सुधार माना जाता है | हमारे विश्वविद्यालय में इन सुधारात्मक उपायों के लिए बैक और इम्प्रूवमेंट कहा जाता था | साल भर की पढ़ाई का आकलन तीन घंटे में हो जाना – कई बार जुआ खेलने जैसी बात हो जाती है | बहरहाल , इन उपायों को हटाया गया तब मैं परीक्षा देने के स्तर से ऊपर जा चुका था | आन्दोलन की मजबूती के लिए परीक्षाओं में सुधार पर हमने संगोष्ठियाँ आयोजित कीं | आन्दोलन में मानव श्रुंखला , जन-सुनवाई और आखीर में घेरा डालो – डेरा डालो जैसे शांतिमय प्रतिकार के उपाए गढ़े गए | प्रशासन ने मुझे इस आन्दोलन का ‘मास्टर माइंड’ माना – जो नकारात्मक पदवी है | लेकिन छात्रों ने इसे एक सम्मान माना |

समाजवादी जनपरिषद ने मुझे वाराणसी कैंट से चुनाव लड़ाने का निर्णय लिया है | नामांकन के साथ नया बैंक खाता खोलने का आयोग का निर्देश है इसलिए कल स्टेट बैंक में खाता खोला |तुरंत एक ए टी एम् -कम- डेबिट कार्ड भी मिला | अब तक ऐसे कार्ड का मालिक न था | मित्र-मंडली से आए चंदे के ४८ हजार रूपए उस खाते में जमा कर दिए  हैं | चुनाव खर्च का ब्यौरा पूर्णतय: मानकों के अनुरूप रखने के लिए एक साथी को  पूर्णकालिक यह काम ही करना होगा |

Read Full Post »

छनकर बचा हुआ तबका  ही उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों तक पहुंच पाता है । शिक्षा के बजट का बड़ा हिस्सा इसी मद में खर्च होता है- छँटे हुओं के लिए । इसके बावजूद यह अपेक्षा की जा रही है कि उच्च शिक्षा के संस्थान और विश्वविद्यालय अपने स्तर पर संसाधन जुटायें ।

देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय (काशी विश्वविद्यालय) में संसाधन जुटाने के तरीकों में जो फर्क आया है उस पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ ।

यह विश्वविद्यालय  इंजीनियरिंग की पढ़ाई देश में सबसे पहले शुरु करने वाले केन्द्रों में से एक है । इसके फलस्वरूप आई.आई.टियों के निर्माण के पहले अधिकांश बड़े इंजीनियरिंग के पदों पर यहीं के स्नातक पाए जाते थे । बनारस के दो प्रमुख उद्योगों के विकास में इस विश्वविद्यालय का हाथ रहा ।

संस्थापक महामना मालवीय के आग्रह पर एक चेकोस्लोवाकियन दम्पति यहां के सेरामिक विभाग से जुड़े़ । इन लोगों ने विश्वविद्यालय परिसर के आस पास के गांवों और मोहल्लों के लोगों को मानव निर्मित मोती बनाने का प्रशिक्षण दिया । प्रशिक्षण पाने वाले न्यूनतम दरजा आठ तक पढ़े थे । आज यह बनारस का प्रमुख कुटीर उद्योग है । एक समूह तो इन मोतियों का प्रमुख निर्यातक बन गया है । इसी विभाग द्वारा उत्पादित चीनी मिट्टी के कप – प्लेट भी काफ़ी पसन्द किए जाते थे । पूर्वी उत्तर प्रदेश में ’भारत छोड़ो आन्दोलन’ के प्रमुख नेता और इस विभाग के शिक्षक राधेश्याम शर्मा ने यह तथ्य मुझे एक साक्षात्कार में बताये थे।

बनारस का एक अन्य प्रमुख लघु उद्योग छोटा काला पंखा रहा है । इसके निर्माताओं ने भी पहले पहल काशी विश्वविद्यालय से ही प्रशिक्षण पाया । इंजीनियरिंग कॉलेज के औद्योगिक रसायन विभाग द्वारा टूथ पेस्ट भी बनाया और बेचा जाता था । विश्वविद्यालय में यह सभी उत्पादन आजादी के पहले हुआ करते थे ।

इस प्रकार इन उत्पादों द्वारा न सिर्फ़ विश्विद्यालय संसाधन अर्जित करता था अपितु बनारसवासियों के लिए  रोजगार के नये और स्थाई अवसर भी मुहैय्या कराता था ।

ग्लोबीकरण के दौर को किशन पटनायक ने एक प्रतिक्रान्ति के तौर पर देखा था । जैसे क्रान्ति जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन लाती है  वैसे ही प्रतिक्रान्ति हर क्षेत्र में नकारात्मक दिशा में ले जाने वाली तब्दीलियाँ लाती है । काशी विश्वविद्यालय के संसाधन अर्जन के मौजूदा तरीकों पर गौर करने से यह प्रतिक्रान्ति समझी जा सकती है ।

विश्वविद्यालय में संसाधन जुटाने का प्रमुख तरीका अब ’पेड सीटों’ वाले पाठ्यक्रम हैं। इन पाठ्यक्रमों में अभिभावकों से भारी फीस वसूली जाती है । इस प्रकार इन पाठ्यक्रमों में दाखिले में छद्म – आरक्षण दिया जा रहा है – सभी जातियों के पैसे वालों को ।

पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बिहार का सबसे बड़ा सर सुन्दरलाल चिकित्सालय- विश्वविद्यालय के आयुर्विज्ञान संस्थान से जुड़ा है । मुष्टिमेय ईमानदार डॉक्टरों को अलग कर दिया जाए तो बाकी सभी प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए बदनाम है । जाहिर है प्रैक्टिस न करने के लिए मिलने वाला भत्ता पाने के बाद भी । पिछले कुछ समय से इस लूट को अधिकृत बनाने के लिए अस्पताल-भवन में ही ज्यादा पैसा देकर मरीज दिखाने की सुविधा दे दी गई है । इस बढ़ी फीस का छोटा हिस्सा विश्वविद्यालय को मिलता है और बाकी डॉक साहबों की जेब में जाता है । प्राइवेट प्रैक्टिस के इस अधिकृत रूप के आने के बाद आम-ओ.पी.डी के मरीजों के प्रति उपेक्षा-भाव बढ़ना लाजमी है ।

दवा कम्पनियां डॉक्टरों को विदेश यात्रायें , चार चकिया वाहन आदि भेंट में देने लगी हैं – जिनके बदले डॉक्टर लगभग हर पर्ची में निर्दिष्ट दवायें लिखते हैं । यह देन-लेन तो डॉक्टरों से निजी स्तर पर हुआ। जाहिर है इस संस्थान के सेमिनार और कॉन्फ़रेंसों के लिए चिकित्सकीय यन्त्र ,दवा बनाने वाली कम्पनियां और निजी पैथेलॉजिकल प्रयोगशालायें – वाहन , खाना-’पीना’, अच्छे होटलों में टिकाने की व्यवस्था घोषित-अघोषित रूप से करती हैं ।

विश्वविद्यालय द्वारा धन कमाई का बदलता स्वरूप दिखाता है कि आजादी के पहले इन प्रयोगों से गरीब नागरिकों को आर्थिक मजबूती मिल रही थी । प्रतिक्रांति के दौर में विश्वविद्यालय की दुनिया से गरीब दो तरीकों से दूर कर दिया गया है । सामान्य मंहगाई के माध्यम से उसकी पहुंच असाध्य हुई है । मंहगाई का एक हिस्सा अप्रत्यक्ष करों के बोझ से उसके कन्धों पर भी आता है।  फीस वृद्धि और निजीकरण ने इस युग के उस नीति को ही पुष्ट किया है – ’समाज के एक छोटे-से छँटे हुए तबके के लिए ही सरकारी सुविधायें हों ’- शिक्षा,स्वास्थ्य,बिजली,पानी सब । सस्ते हो रहे हैं हमारे  जल , जंगल, जमीन, खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधन विदेशी कम्पनियों और बड़े उद्योगपतियों के लिए ।

Read Full Post »

कुछ साल पहले की बात है। उड़ीसा के कालाहांडी जिले के लांजीगढ़ क्षेत्र में नियमगिरी के पहाड़ों में बॉक्साईट खुदाई की वेदान्त कंपनी की परियोजना का काफी विरोध हो रहा था। यह काफी विवादास्पद बन गई थी। तभी खबर आई कि वेदान्त कंपनी पुरी के पास 10 हजार एकड़ भूमि में 15000 करोड़ रु. की लागत से एक विशाल विश्वविद्यालय बनाएगी। तब बात कुछ समझ में नहीं आई। मुनाफा कमाने पर पूरी तरह केन्द्रित एक व्यावसायिक कंपनी इतना पैसा शिक्षा पर क्यों लगाएगी ? शायद अपने विरोध को कम करने के लिए तथा उड़ीसा के नागरिक समाज में समर्थन जुटाने के लिए कंपनी ने समाज-सेवा का यह काम चुना है। किन्तु उसके लिए भी इतना ज्यादा पैसा खर्च करने की क्या जरुरत है ?

अब धीरे – धीरे यह गुत्थी सुलझ रही है। वेदान्त विश्वविद्यालय ने जिन आधा दर्जन गांवो की जमीन जा रही है, वहां के ग्रामीणों द्वारा इसके विरुद्ध संघर्ष समिति बनाकर आंदोलन किया जा रहा है। इस संघर्ष समिति ने जो जानकारी उपलब्ध कराई है, वह आंख खोलने वाली है। विरोध के कारण वेदान्त विश्वविद्यालय को दी जाने वाली जमीन का रकबा कुछ कम हो गया है, किन्तु फिर भी पुरी शहर के पास, समुद्र किनारे, पुरी-कोणार्क मरीन ड्राईव के बगल में, छः हजार एकड़ से ज्यादा बेशकीमती जमीन बहुत सस्ती दरों पर इस विश्वविद्यालय के नाम पर दी जा रही है। इस मायने में यह अभी तक देश का सबसे ज्यादा जमीन हड़पने वाला विश्वविद्यालय होगा। अभी तक देश में विश्वविद्यालयों या अन्य षिक्षा संस्थानों के जो सबसे बड़े परिसर हैं, उनसे कम  से कम तीन-चार गुने से ज्यादा क्षेत्रफल में इसका परिसर होगा। (देखें बॉक्स) इसकी मालिक अनिल अग्रवाल फाउन्डेशन नामक एक निजी कंपनी होगी, जिसके चार संयुक्त मालिकों में से तीन वेदान्त कंपनी के मालिक अनिल अग्रवाल के परिवार के लोग है।  इस भूमि पर यह कंपनी एक पूरा नगर भी विकसित करेगी। यहां पर स्कूल, मनोरंजन केन्द्र, आवासीय कालोनी, दुकानें, बाजार , बगीचे, सांस्कृतिक केन्द्र, आदि भी विकसित किए जाएंगे। बिजली आपूर्ति के लिए 600 मेगावाट का एक विषाल बिजली संयंत्र भी लगाने की वेदान्त कंपनी की योजना है।

उड़ीसा सरकार ने जमीन के अतिरिक्त प्रतिदिन 11 हजार लीटर पानी भी उपलब्ध कराने का वायदा किया है। पुरी जिले की पूरी आबादी को जितना पानी दिया जाता है, यह उसके 95 प्रतिशत के बराबर है। जाहिर है कि यह विश्वविद्यालय जमीन के अलावा स्थानीय आबादी का पानी भी हड़पने वाला है। उड़ीसा सरकार ने भुवनेश्वर हवाई अड्डे से इस विश्वविद्यालय तक चार लेन वाली सड़क भी बनाने का वादा किया है, जो करीब 60 कि.मी. लंबी होगी। इतना ही नहीं इस विश्वविद्यालय के नाम पर की जाने वाली समस्त खरीदी, निर्माण, अनुबंधों और व्यावसाय को आने वाले 20 वर्षों तक वेट, प्रवेष कर, स्टाम्प शुल्क आदि तमाम करों से मुक्त करने का भी वायदा उड़ीसा सरकार ने कर रखा है। उस पर तुर्रा यह भी कि इस विश्वविद्यालय को पूरी स्वायत्तता होगी और प्रशासन, विद्यार्थियों का दाखिला, फीस निर्धारण, पाठ्यक्रम, शिक्षकों की नियुक्ति आदि में पूरी आजादी होगी। किसी भी प्रकार का आरक्षण भी नहीं होगा। उड़ीसा सरकार और वेदान्त कंपनी के बीच 19 जनवरी 2006 को हुए समझौते में ये सब बातें स्पष्ट रुप से लिखी हैं।

बात बहुत साफ है । वेदान्त कंपनी के मालिक पूंजीपति के लिए वेदान्त विश्वविद्यालय की यह योजना कोई घाटे का सौदा नहीं हैं। न ही यह उसके एल्युमीनियम व्यवसाय के सामाजिक – पर्यावरणीय दुष्परिणामों को ढकने के लिए किया जा रहा परोपकार या समाजसेवा का उपक्रम है। यह तो अपने आप में भारी कमाई का एक शुद्ध व्यावसायिक प्रोजेक्ट है। विशेष आर्थिक जोन के कारखाने, टाटा की नैनो कार या वैश्वीकरण के इस दौर की अन्य परियोजनाओं की भांति इसमें भी सस्ती जमीन, कर छूट और सरकारी अनुदान के साथ भारी मुनाफा कमाने की पूरी आजादी निजी पूंजीपतियों को मिल रही है। ‘लागत सरकार (जनता) की और मुनाफा पूंजीपतियों का’ – पूंजीवाद का यह चिरंतन सूत्र पूरी बेहयाई से यहां भी लागू हो रहा है।

वेदान्त के मालिक ने इसमें एक तीर से कई शिकार किए हैं। पुरी नगर के पास महंगी जमीन को सस्ती दरों पर विषाल मात्रा में पाकर वह उसका व्यवसायिक उपयोग करके भी कमाई करेगा और शिक्षा का व्यवसाय भी चलाएगा। फीस निर्धारण और छात्र-षिक्षक चुनने की पूरी आजादी देकर उड़ीसा सरकार ने यह भी सुनिश्चित कर दिया है कि इस कथित ‘विश्व-स्तरीय विश्वविद्यालय’ का चरित्र पूरी तरह अभिजात्य होगा और इसके दरवाजे उड़ीसा जैसे गरीब प्रांत की 95 प्रतिशत जनता के लिए बंद होंगे।

वेदान्त विश्वविद्यालय दरअसल भारत में शिक्षा के तेजी से बढ़ते निजीकरण और व्यवसायीकरण का एक नमूना है। इससे कंपनी-सह-विष्वविद्यालय की नई प्रजाति अस्तित्व में आई है। देष में ऐसे कई निजी स्कूलों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की बाढ़ आती जा रही है, जिनका एकमात्र मकसद मुनाफा कमाना है। उनकी कमाई इतनी है कि वे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में पूरे-पूरे पृष्ठ के विज्ञापन देते हैं। नगरों व महानगरों में बड़े-बड़े विज्ञापन वाले होर्डिंग लगाने में वे कार या मोबाईल कंपनियों से भी आगे निकल गए हैं। शिक्षा का यह घोर निजीकरण उस पुरानी निजी भागीदारी से अलग है, जिसमें समाजसेवा की कुछ भावना हुआ करती थी। पहले स्थापित हुए बिड़ला के पिलानी संस्थान या मुंबई में टाटा के संस्थानों की बात अलग थी। अब तो षिक्षा देष में सबसे तेज बढ़ता हुआ और संभवतः सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाला उद्योग बन गया है। मंत्री, नेता, व्यापारी, बनिए, फर्में, कंपनियां और बड़े उद्योगपति घराने सभी इस में कूद पड़े हैं। मुनाफे, लूट और षोषण के इस खेल में अब परोपकार या सेवा का कोई घालमेल नहीं हैं, कोई दिखावा भी नहीं है।

भारत सरकार षिक्षा के इस ‘मुक्त बाजार’ कोे बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध और समर्पित है। यों तो इसके संकेत एक दषक पहले ही मिल गए थे, जब सरकार ने षिक्षा में ‘सुधार’ का सुझाव देने के लिए अंबानी-बिड़ला समिति बनाई थी। किन्तु भारत के नए मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के आने के बाद तो षिक्षा के व्यवसायीकरण – कंपनीकरण की गाड़ी अभूतपूर्व तेजी से दौड़ाने लगी है। विदेषी विष्वविद्यालयों को अनुमति देने का कानून बनने पर इसे और गति मिल जाएगी। ‘निजी-सार्वजनिक भागीदारी’ मंे जो स्कूल चलाने की बात हो रही है, उसमें भी जमीन हड़पने और सरकारी अनुदान पर निजी मुनाफा कमाने का ही काम होगा। नगरों व महानगरों के सरकारी स्कूलों की कीमती जमीन निजी हाथों में देने की योजनाएं बन चुकी हैं। भारत सरकार ने बैंको से षिक्षा ऋण दिलवाने और उसमंे ब्याज अनुदान देने की जो योजना चलाई है, वह भी दरअसल इन निजी व्यवसायिक षिक्षण संस्थानों की महंगी फीस भरने की सुविधा के लिए है। योजना आयोग ने एक ‘राष्ट्रीय षिक्षा वित्त निगम’ बनाने का भी प्रस्ताव किया है, जो विद्यार्थियों के साथ-साथ निजी षिक्षण संस्थानों को भी सस्ती दरों पर ऋण दिलवाएगा। कुल मिलाकर, शिक्षण संस्थानों को दुकानों व कारखानों में बदलने का काम तेजी से हो रहा है। लगभग ऐसा ही खेल स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में हो रहा है। भारत की राष्ट्रीय आय की ऊँची वृद्धि दर षायद इसी तरह से हासिल हो रही है।

शिक्षा के इस बढ़ते बाजार में दो ही किन्तु – परन्तु हैं। एक तो यह कि इसमें षिक्षा का स्वरुप भी बाजारु ही होगा, जिसका व्यक्ति, समाज और देष की जरुरतों से कम ही संबंध रहेगा और जो पूरी तरह बाजार व कंपनियों की जरुरतों को समर्पित रहेगी। वैसे तो अभी तक भी भारत की शिक्षा काफी दमघोंटू, घटिया, नकलची और जमीन से कटी रही है। किन्तु बाजारीकरण से इसकी विकृतियां और बढ़ जाएगी। दूसरा शिक्षा का यह बाजार बहुत बड़ी संख्या में इस गरीब देष के बच्चों को बहिष्कृत, कुंठित, तिरस्कृत करता जाएगा। सरकार चाहे सर्व शिक्षा अभियान चला ले और चाहे शिक्षा अधिकार कानून बना ले, शिक्षा के व्यवसायीकरण का मतलब देष के साधारण बच्चों व युवाओं को शिक्षा से वंचित करना और पछाड़ना है। क्या ये दोनों हालात दे्श के लिए चिन्ता की बात नहीं है ?

सुनील

लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।

ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)

पिन कोड: 461 111

मोबाईल 09425040452

शिक्षा और जमीन

वेदान्त विश्वविद्यालय के साथ ही शिक्षा भी अब जमीन हड़पने और किसानों को विस्थापित करने का एक जरिया बन रही है। देश व दुनिया के कुछ बड़े शिक्षण परिसरों का क्षेत्रफल इस प्रकार है: –

शिकागो विश्वविद्यालय    211 एकड़

हार्वर्ड विश्वविद्यालय    380 एकड़

प्रिंसटन विश्वविद्यालय    600 एकड़

वाशिंगटन विश्वविद्यालय    643 एकड़

भारतीय तकनालाजी संस्थान, दिल्ली  320 एकड़

भारतीय तकनालाजी संस्थान, चेन्नई  625 एकड

भारतीय तकनालाजी संस्थान, गुवाहाटी  712 एकड़

भारतीय तकनालाजी संस्थान, कानपुर  1055 एकड़

भारतीय तकनालाजी संस्थान, दिल्ली  320 एकड़

उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर   400 एकड़

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली  1000 एकड़

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी  1300 एकड़

केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद   2300 एकड़

(प्रस्तावित) वेदांत विश्वविद्यालय, पुरी  6270 एकड़

Read Full Post »

क्या पहली अप्रैल को पूरे देश को मूर्ख बनाया जा रहा है ?

1 अप्रैल 2010 को देश में ‘मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून’ लागू हो रहा है। यह बताया जा रहा है कि यह एक क्रांतिकारी काम है। इससे देश के सारे बच्चों को शिक्षित करने का काम हो जाएगा। लेकिन सच क्या है ? आइए, विचार करें –

*             इस कानून की शर्तें पूरी करने के लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति तो हो रही है, किन्तु वे अस्थायी, ठेके पर, अप्रशिक्षित पैरा शिक्षक हैं। इस कानून में ‘पैरा-शिक्षक’ (जैसे संविदा शिक्षक, अतिथि शिक्षक, गुरुजी, शिक्षा मित्र आदि) लगाने पर कोई रोक नहीं है। इसका मतलब है कि सरकारी स्कूलों में और सस्ते निजी स्कूलों में गरीब बच्चों की पढ़ाई ‘राम-भरोसे’ रहेगी। क्या स्थायी, प्रशिक्षित, पर्याप्त वेतन वाले शिक्षकों का कैडर बनाए बगैर देश के बच्चों की शिक्षा ठीक से हो सकेगी ?

*              इस कानून में शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता और न्यूनतम वेतन की बात तो है, लेकिन इतना कम रखा गया है कि सरकारी स्कूलों में पैरा-शिक्षक जारी रहेंगे और निजी स्कूलों में शिक्षकों का शोषण जारी रहेगा।

*              इस कानून में न्यूनतम विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात प्राथमिक शालाओं में 30 बच्चों पर 1 शिक्षक रखा गया है। इसका मतलब है कि कई छोटे स्कूलों में (जहां विद्यार्थी संख्या 120 से नीचे है) तीन या चार शिक्षक ही होंगे। यानी गरीब बच्चों को एक कक्षा पर एक शिक्षक भी नसीब नहीं होगा।

*              इस कानून में स्कूल में जितने शिक्षक जरुरी है, उतने ही शाला भवन में कमरे रखना जरुरी होंगे। यानी छोटे स्कूलों में एक कक्षा के लिए एक कमरा भी नहीं होगा। दो या तीन कक्षाओं को एक साथ पढ़ाया जाएगा। क्या यह गरीब बच्चों की शिक्षा के नाम पर मजाक नहीं होगा ?

*            इस कानून में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को चुनाव और जनगणना के काम में लगाने पर भी रोक नहीं लगाई है। यानी गरीब बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती रहेगी।

*            इस कानून में निजी स्कूलों की फीस बढ़ाने पर कोई रोक नहीं है। यानी वे मनमानी फीस बढ़ाते रहेगें। इन स्कूलों के प्रबंध में किसी तरह की अभिभावकों, समाज या सरकार की भागीदारी भी जरुरी नहीं होगी।

*             इस कानून में शिक्षा में बढ़ती गैरबराबरी और भेदभाव को रोकने की कोई बात नहीं है। बल्कि सरकार उसे और बढ़ावा देने का काम कर रही है। इससे सरकारी स्कूलों में सिर्फ गरीब बच्चे ही रह जाएंगे, और उनकी उपेक्षा व दुर्दशा और बढ़ेगी। इस कानून के बाद नाम के लिए तो हर बच्चे को स्कूल की शिक्षा पाने का अधिकार होगा, किन्तु गरीब बच्चों के लिए बहुत घटिया, अधकचरी शिक्षा होगी (जिसमें 5वीं और 8वीं में आ जाने पर भी बच्चे को न्यूनतम पढ़ना-लिखना भी नहीं आएगा।)

*              इस कानून में निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने (उनकी फीस सरकार देगी) का बहुत प्रचार किया जा रहा है। किन्तु बाकी बच्चों का क्या होगा ? उनके हिस्से में वही घटिया, अधूरी नाममात्र की शिक्षा रहेगी।

*             इस कानून में 8वीं से पहले कोई परीक्षा नहीं होगी। इसका मतलब है कि सरकारी और सस्ते निजी स्कूलों में आधी-अधूरी शिक्षा के बाद भी बच्चों को अगली कक्षा में धकाया जाता रहेगा।

*             इस कानून में मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान करते हुए भी कुछ स्कूलों व कुछ बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा की गुंजाईश छोड़ दी है। इस तरह देश में दोहरी शिक्षा व्यवस्था चालू रहेगी।

*             इस कानून में देश में शिक्षा के बढ़ते धंधे और मुनाफाखोरी पर रोक लगाने की कोई मंशा नहीं है। उल्टे सरकार निजी-सरकारी भागीदारी के नाम पर सरकारी भूमि और मदद देकर पूंजीपतियों को इस धंधे में बुला रही है और बढ़ावा दे रही है।

*              उच्च शिक्षा और कोचिंग का निजीकरण व बाजार भी बहुत बढ़ता जा रहा है। बी.एड. और डी.एड. में भी जिस तरह से निजी कॉलेजों की बाढ़ आई है, लूट एवं धांधली मची है, बिना किसी पढ़ाई के डिग्री बांटी जा रही है, उससे तैयार शिक्षक क्या पढाएंगे ?

*              देश में शिक्षा का बाजार बढ़ाने के मकसद से विदेशी विश्वविद्यालयों को भी इजाजत देने की तैयारी चल रही है, जिससे शिक्षा में लूट और मुनाफाखोरी और बढ़ेगी।

*             देश के सारे बच्चे तभी भलीभांति शिक्षित हो सकेंगें, जब सरकारें इसकी जिम्मेदारी लेंगी और देश में समान स्कूल प्रणाली लागू होगी। दुनिया में जिस भी देश ने अपनी पूरी आबादी को शिक्षित किया है, किसी-न-किसी तरह की समान स्कूल प्रणाली के दम पर ही वे यह कर पाए हैं। किन्तु यह कानून इस दिशा में आगे बढ़ने के बजाए, उल्टी दिशा में देश को ले जाता है।

यह साफ है कि यह कानून एक धोखा है। इसकी आड़ में देश के साधारण जनों को झूठमूठ समझा कर सरकार इस देश में शिक्षा का जबरदस्त बाजार एवं धंधा बढ़ाने का काम कर रही है। इससे देश के साधारण बच्चे शिक्षा से वंचित और कुंठित होंगे। बच्चों की आत्महत्याएं और बढ़ेंगी। देश के नौजवान और ज्यादा बेरोजगारी, गैरबराबरी, हिंसा एवं उग्रवाद की और बढ़ेंगे। क्या यही भारत का भविष्य होगा ?

आइए, हम सब मिलकर इसका विरोध करें। शिक्षा के बाजारीकरण और व्यापार के खिलाफ आवाज उठाएं। देश के हर बच्चे को अच्छी और समान शिक्षा का हक मिले और सरकारें अपनी संवैधानिक जवाबदारी पूरी करें, इसके लिए संघर्ष करें।

एक अप्रैल 2010 को पूरे देश में अपने स्तर पर सरकार की इस धोखाधड़ी के विरोध में कार्यक्रम करें।

शिक्षा अधिकार मंच

Read Full Post »

%d bloggers like this: