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Archive for the ‘भारत डोगरा bharat dogra’ Category

15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद तो हो गया, किन्तु भारतीय दिमाग गुलामी से मुक्त नहीं हो पाया। इस दिमागी गुलामी को बनाए रखने का काम हमारे विश्वविद्यालयों, शिक्षण संस्थाओं और उनको मदद करने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेन्सियों के जरिये चलता रहा। हमारा ज्ञान, हमारे शास्त्र, हमारे पाठ्यक्रम, हमारे विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों में होने वाली शोध और अनुसंधान, उन पर आधारित नीतियां व योजनाएं – सब कहीं न कहीं विदेशी प्रभाव और नियंत्रण में रहते हैं। भारत की स्थानीय देशज हालातों के मुताबिक और भारत के लोगों के नजरिये से शास्त्र, ज्ञान, विज्ञान और तकनालाजी का सही विकास नहीं हो पाया। भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों को एक नए आजाद भारत के विकास में मदद करना था, लेकिन वे अक्सर विदेशी साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति करते रहे। इसे हम बौद्धिक साम्राज्यवाद कह सकते हैं, जो आर्थिक, राजनैतिक एवं सैनिक साम्राज्यवाद का सहयोगी एवं पूरक होता है।
उच्च शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में कैसे अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप व नियंत्रण होता है तथा देश के हित में सोचने व काम करने वालों को कैसे साजिशों का शिकार बनाकर रोका और बाहर निकाल दिया जाता है, इसका अच्छा उदाहरण है कृषि वैज्ञानिक डॉ० आर.एच. रिछारिया। उनका किस्सा हमारी आंखें खोलने के लिए काफी होना चाहिए।
साठ और सत्तर के दशक में डॉ० रिछारिया भारत के चोटी के कृषि वैज्ञानिकों में से थे। वह यही समय था, जब भारत में तथाकथित ‘हरित क्रांति’ की शुरुआत हो रही थी, जिसके दूरगामी दुष्परिणाम अब पूरी तरह सामने आ गए हैं। डॉ० रिछारिया 1959 से 1967 तक कटक स्थित केन्द्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के निदेश थे। उनके नेतृत्व में वहां के वैज्ञानिक चावल की देशी किस्मों के आधार पर उत्पादन बढ़ाने के महत्वपूर्ण अनुसंधान में लगे थे। उसी समय विश्व बैंक, राकफेलर फाउन्डेशन और फोर्ड फाउन्डेशन के सहयोग से मनीला में अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान की स्थापना हुई। इसके द्वारा भारत में धान की ज्यादा पैदावार देने वाली जिन किस्मों का प्रचलन करने का प्रस्ताव किया गया था, डॉ० रिछारिया ने उनका विरोध किया। उन्होंने कहा कि इन किस्मों से भारत की धान की खेती में नये वायरस, कीड़े एवं अन्य रोग फैलेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय परिस्थितियों में, सूखा आदि में, विदेशी बौनी किस्में उपयुक्त नहीं हैं और इनके प्रचलन में जल्दबाजी न करें। डॉ० रिछारिया ने इस बात पर भी आपत्ति की कि इस संस्थान के कार्यक्रमों के तहत कुछ कृषि वैज्ञानिक बिना अनुमति के भारत के धान के जनन-द्रव्य (जर्म प्लाज्म) को बाहर ले जा रहे हैं तथा बाहर से बिना संगरोधी (क्वारंटाईन)’ जांच के धान की जनन सामग्री ला रहे हैं। लेकिन भारत सरकार के कृषि मंत्रालय और कृषि अनुसंधान ढांचे में अंतरराष्ट्रीय हितों की पकड़ इतनी जबरदस्त थी कि इस वरिष्ठ वैज्ञानिक की चेतावनियों व आपत्तियों को दरकिनार कर दिया गया। इतना ही नहीं, उन्हें केन्द्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के निदेशक पद से भी बहुत बुरी तरह से हटा दिया गया। उनके नेतृत्व में चल रहा चावल की ज्यादा पैदावार देने वाली देशी किस्मों के विकास का काम भी रुक गया।
बाद में 1971 में तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने उन्हें मध्यप्रदेश का कृषि सलाहकार नियुक्त किया और उनके नेतृत्व में रायपुर में म.प्र.चावल अनुसंधान संस्थान शुरु किया गया।  रिछारिया मूलतः मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले की सिवनीमालवा तहसील के नंदरवाड़ा गांव के रहने वाले थे।) डॉ.रिछारिया ने पांच वर्ष तक मेहनत करके छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से, आदिवासी इलाकों से धान की 17000 किस्मों का अद्भुत संग्रह किया। धान की देशज किस्मों के आधार पर अनुसंधान फिर से चलने लगा। किन्तु इससे उन अंतरराष्ट्रीय ताकतों को फिर खतरा पैदा हुआ, जो हरित क्रांति के नाम पर धान एवं गेहूं की विदेशी किस्मों वाली नयी खेती को चलाना चाहते थे, जिससे रासायनिक खाद, कीटनाशकों और कृषि मशीनों का उनका धंधा भारत में बढ़ सके। पहले प्रस्ताव आया कि चावल के जनन-द्रव्यों का यह संग्रह मनीला के अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान को दे देना चाहिए, जो इसको सुरक्षित रख सकेंगे। डॉ. रिछारिया ने इसका कड़ा विरोध किया। मनीला संस्थान से जनन-द्रव्यों के लेनदेन एवं साझेदारी के बारे में भी रिछारिया की कुछ शंकाएं थी। तब राह के इस रोड़े को हटाने के लिए एक और साजिश हुई। मध्यप्रदेश में चावल अनुसंधान के लिए 4 करोड़ रु. की अंतरराष्ट्रीय मदद आई, किन्तु इस शर्त के साथ कृषि अनुसंधान में दो जगह काम के कारण हो रहा दोहरीकरण बंद होना चाहिए। डॉ० रिछारिया वाला म.प्र. चावल अनुसंधान संस्थान 1976 में बंद कर दिया गया और चावल – किस्मों का उसका पूरा संग्रह रायपुर के कृषि विश्वविद्यालयों को हस्तांतरित कर दिया गया। बाद में पता चला कि इसके कुलपति खुद मनीला संस्थान के न्यासी मंडल के सदस्य थे और उससे गहरे जुडे़ थे।
उधर डॉ० रिछारिया फिर सड़क पर आ गए। वे काफी परेशान और व्यथित रहे। वे इतने बडे़ कृषि वैज्ञानिक थे कि कटक के बाद दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक के सर्वोच्च पद पर पहुंचते। लेकिन देश हित और देश के किसानों के हितों से समझौता न करने के कारण उन्हें बार-बार निकाल फेंका गया। यदि उनकी चेतावनियों को सुन लिया जाता, और उनके जैसे वैज्ञानिकों को देशज किस्मों के आधार पर पैदावार बढ़ाने की तकनीकों पर काम करने दिया जाता, तो शायद भारत की खेती आज इस गहरे संकट में नहीं फंसती जिसमें लाखो किसानों को आत्महत्या करना पड़ रहा है। असुरक्षित और कमजोर किस्मों के बीज, रासायनिक खाद-कीटनाशकों-पानी का भारी प्रयोग, भारी पूंजी व बढ़ती लागत, इसके बावजूद बढ़ते रोग और बढ़ती जोखिम, घटती या स्थिर उत्पादकता- भारतीय खेती और भारतीय किसान इस गहरे दुष्चक्र में फंस गए है। जो लोग यह भोला तर्क देते हैं कि हरित क्रांति की तकनालाजी नहीं अपनाई होती तो भारत का खाद्य उत्पादन नहीं बढ़ता और भारत भूखा मर जाता, उन्हें डॉ० रिछारिया का पूरा किस्सा पढ़ना चाहिए, जिसे स्वतंत्र पत्रकार भारत डोगरा ने काफी मेहनत करके एक किताब के रुप में लिपिबद्ध किया है। इससे जाहिर होता है कि भारत के वैज्ञानिकों को अपने स्तर पर देश हित में स्वतंत्र शोध, अनुसंधान एवं आविष्कार की दिशा में आगे बढ़ने ही नहीं दिया गया, नहीं तो हम अपनी उपयुक्त देशी किस्मों के आधार पर भी कृषि उत्पादन बढ़ा सकते थे। विज्ञान एवं शास्त्रों की हर शाखा में रिछारिया जैसे कई लोग रहे होंगे, जिन्हें स्वतंत्र रुप से काम नहीं करने दिया होगा और कंुठित कर दिया गया होगा, जिनकी कहानी सामने नहीं आई है। यह भी संभव है कि सबमें रिछारिया जैसा संघर्ष का माद्दा नहीं रहा होगा और उन्हांेने समझौता कर लिया होगा।
कुछ लोग पूछेंगे कि क्या हमें विदेशों से सहयोग और आदान-प्रदान नहीं करना चाहिए ? क्या हम कूप मंडूक नहीं बन जाएंगे ? जबाब है कि बिलकुल करना चाहिए किन्तु अपनी शर्तों पर और अपने हितों का ध्यान रखते हुए। यह भी होशियारी रखते हुए कि कही हम अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवादी हितों के शिकार तो नहीं बन रहे हैं। इस मामले में लगभग 90 साल पहले महात्मा गांधी ने कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जबाब देते हुए जो लिखा था, वह सूत्र आज भी हमारे मार्गदर्शन का काम कर सकता है –
‘‘ मैं नहीं चाहता कि मेरा मकान चारो तरफ से बंद हो और खिड़कियां भी बंद होने से मेरा दम घुटे। मैं चाहता हूं कि सब जगह की संस्कृतियों की हवा मेरे मकान के अंदर स्वतंत्रतापूर्वक बहती रहे। किन्तु मैं ऐसी हवा नहीं चाहता हूं कि मेरे पैर ही उखड़ने लगे। मैं दूसरों के घर में घुसपैठिये, भिखारी या गुलाम के रुप में रहने से इंकार करता हूं।’’
जाहिर है कि देश के आजाद होने से 63 साल बाद भी हम मानसिक रुप से गुलाम हैं और विदेशी आंधी हमें अपने पैरों पर खड़े नहीं होने दे रही है। इसे रोकने  और इन हालातों को बदलने की जरुरत है। किन्तु हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं।
भारत सरकार देश के दरवाजे विदेशी विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों के लिए खोलने का जो फैसला कर रही है, उससे यह आंधी रुकेगी या बढ़ेगी ? क्या यह भारत के शिक्षित बुद्धिजीवी वर्ग को पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान और रुझानों का और ज्यादा पिछलग्गू एवं दास बनाने में मदद नहीं करेगा ? इससे शिक्षा के व्यवसायीकरण की जो नई होड़ शुरु होगी, क्या वह उच्च शिक्षा को भारतीय समाज की जरुरतों के बजाय पूरी तरह देशी-विदेशी कंपनियों के व्यावसायिक हितों का अनुचर बनाने का काम नहीं करेगी ? क्या यह बौद्धिक साम्राज्यवाद की दिशा में एक और आत्मघाती कदम नहीं होगा ? क्या रिछारिया का संघर्ष बेकार जाएगा ? क्या गांधी की बात अनसुनी रहेगी ? ये सवाल आज देश के लोगों के सामने हैं।


– सुनील

लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।

ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111
मोबाईल 09425040452

नोट: ’ क्वारंटाईन या संगरोधी जांच का मतलब उस जांच से है जो देश की सीमा में आने वाली किसी भी नई वनस्पति, पशु या बीमार मनुष्य की होती है। उसको एक अलग जगह में कुछ दिनों तक निगरानी में भी रखा जा सकता है। बाहर से कोई नया रोग न चला आए या पर्यावरण पर अवांछित प्रभाव न पड़े, इस संभावना को रोकने के लिए यह जांच होती है। पश्चिमी देशो में इसके कड़े नियम हैं। किन्तु हर मामले में उनकी नकल करने वाले भारत ने इस बारे में काफी लापरवाही बरती है। अक्सर यह लापरवाही नीहित स्वार्थों के चलते हुई है, जैसा की डॉ. रिछारिया ने भी बताया है।

क्लॉड अलवारेस का इलस्ट्रेटेड वीकली के २३ मार्च १९८६ के अंक में छपा लेख  ’ द ग्रेट जीन रॉबरी’अवश्य देखें ।- अफ़लातून

अगली किस्त : प्रोफ़ेसर रिछारिया की आपबीती

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[ प्रसिद्ध लेखक और सामाजिक कार्यकार्ता भारत डोगरा की यह कविता बाबा मायाराम की लिखी किताब ’सतपुड़ा के बाशिन्दे’ से साभार ली गई है । ]

पलामू के एक जंगल में

एक ट्राइबल को एक टाइगर मिल गया

दोनों के सम्बंध अच्छे नहीं थे उन दिनों

तो भी पुराने दिनों की खातिर

ट्राइबल ने हाथ जोड़ नमस्ते कर दी

घमंड में चूर बाघ ने मुंह फेर लिया

नमस्ते का जवाब तक न दिया

तिरस्कार की नज़र से घूरा

बोला – हट जाओ रास्ते से

हम तुम्हारे ढोर खाने जाते हैं

यह देख आदिवासी को ताव आ गया

बिरसा का खून धमनियों में बह गया

इतना दर्प ! ऐसा अपमान !

किस बात का है इसको गुमान

उसने तान दिया तीर – कमान

टाइगर ने अट्टहास किया,बोला

आज का कानून समझ के तीर चलाना

मैं तुम्हें मारूँ तो सुरक्षित हूँ

तुम मुझे मारो तो धर लिए जाओगे

पछताओगे , जेल की हवा खाओगे

ट्राइबल झल्लाया , बोला यह कैसा कानून

यह तो अंग्रेजों के दिनों में भी नहीं था

तब अति संक्षेप में टाइगर ने समझाया

प्रोजेक्ट टाइगर बन चुका है

प्रोजेक्ट मानव अभी बनना है

– भारत डोगरा.

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