Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘किशन पटनायक’ Category

आज अपराह्न में भदैनी, वाराणसी स्थित तुलसी पुस्तकालय में चर्चित और प्रखर कवि राजेन्द्र राजन ने अपनी लगभग बीस कविताओं का पाठ करके यह स्पष्ट कर दिया कि सरल सहज भाषा में सभी कुछ इतनी तीव्रता के साथ व्यंजित किया जा सकता है कि फ़िर और किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं पड़ती। निश्चय ही कुछ कविताएं एक-दो दशक पहले से हमारे सामने आ रही हैं, पर वे वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक संदर्भों और राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में इतनी ताजगी लिए हुए हैं, मानों उन्हें अभी-अभी कहा गया हो।

 

इस एकल काव्य कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति ने कहा कि कवि ने विद्रूपता के किसी भी कोने को छोड़ा नहीं है। सत्ता और ताकत से सम्पन्न शासक-वर्ग के मन की कुरूपता को यदि नग्न किया है तो उस जनता को भी नहीं छोड़ा है, जो विजेता के पक्ष में होने के सुखद अहसास को महसूस करना चाहती है। कवि ने स्वयं को भी नहीं छोड़ा है, जो अपनी ज़िन्दगी को चलाने के लिए दूसरों के द्वारा दिए गए विषय पर सोचता है और दूसरों के द्वारा निर्धारित भाषा में सुर में सुर मिलाकर बोलता है; और कवि ऐसा पेड़ हो गया है, जो छाया फ़ल और वसंत की अनुभूति देने में सक्षम नहीं रहा। कवि शब्दों को भी नहीं छोड़ता है क्योंकि फूल, पहाड़, नदियों का सौन्दर्य और बाकी सब कुछ शब्दों से ढंका हुआ है और वह वास्तविक सौन्दर्य को नहीं देख पाता है।

 

श्रेय पाने की लिप्सा में पहले के लोगों की कोशिशों को नकार दिया जाए और नया इतिहास लिखने की कोशिश हो, इससे कवि सहमत नहीं है। इतिहास में जगह बनाने के लिए आतुर लोग जानते हैं कि इतिहास में कितनी जगह है, अत: वे अपनी जगह बनाने के लिए एक-दूसरे को धकियाते हैं। मज़े की बात है कि कुछ लोग अपनी छोटी-सी जगह पर इस कारण चुप रहते हैं कि उनसे वह जगह भी न छिन जाए। ‘विकास’ में विकास के नाम पर सभी प्राकृतिक अवदानों के कम होते जाने पर और ‘नया युग’ असहमत लोगों को हटाने मात्र से विकास का अहसास कराए जाने की कुत्सित चेष्टा को सामने लाती है। ‘प्रतिमाओं के पीछे’ में स्वयं के वास्तविक रूप को छिपाने की चेष्टा करने वालों पर तीखी टिप्पणी है। ‘ताकत बनाम आज़ादी’ में निस्सार सत्ता-सुख में डूबे लोगों को आज़ादी के सुख को याद दिलाया गया। ‘छूटा हुआ रास्ता’ और ‘लौटना’ कविताओं में कवि अपने वास्तविक व्यक्तित्व के क्षय से पीड़ित होता है और लौटना चाहता है।

 

तालिबान द्वारा ‘बामियान में बुद्ध’ की विशालकाय मूर्तियों को तोड़ा जाना कवि को आहत करता है और उसे खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान याद आते हैं, जो बुद्ध की तलाश में बामियान में भटक रहे हैं। ‘बाजार में कबीर’ कबीर अपनी चादर इसलिए नहीं बेच पाते हैं क्योंकि वह किसी कंपनी का नहीं है। उस चादर का खरीदार नौकरशाहों द्वारा संचालित कंपनी-अधिनियम और राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चमक में कबीर को भला कैसे खोज पाएगा। ‘मनुष्यता के मोर्चे पर’ इस विडंबना को सामने लाती है कि आदमी ज़िन्दगी में उठने के लिए गिरता है और ऐसी स्थिति में कवि आत्मकेन्द्रित होता चला जाता है। ‘हत्यारों का गिरोह’ कविता उस षड्यंत्र को नग्न करती है जो संवेदनशून्य-तंत्र नित्य हमारे आस-आस रच रहा है। ‘तुम थे हमारे समय के राडार” कविता में कवि ने समाजवाद के पुरोधा और अपने गुरु किशन पटनायक जी को शिष्य के रूप में तथा अहोभाव से याद किया है।

 

 

कार्यक्रम के आरंभ में संजय गौतम ने बताया कि किस प्रकार राजेन्द्र राजन ने स्वयं को विचारधाराओं और संगठनों की सीमाओं से बचाए रखा और शब्दों के अर्थ को सुनिश्चित करते हुए आज के समय की प्रत्येक मूर्त और अमूर्त घटना और समस्या को पैनी निगाह से देखा है। इसीलिए उनकी कविताएं उद्वेलित करती हैं। कवि एवं आलोचक राम प्रकाश कुशवाहा ने राजेन्द्र राजन की कविताओं पर विशद टिप्पणी की। कार्यक्रम के संचालक अफ़लातून ने छात्र-जीवन मे राजेन्द्र राजन द्वारा लिखी गयी कविताओं का उल्लेख करते हुए बताया कि किस प्रकार उनकी कविताएं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र-आंदोलनों में अपनी भूमिकाएं निभाती रहीं। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए चंचल मुखर्जी ने कहा कि राजन की कविताओं से उन्हें अपने सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यों में सदैव सहयोग मिला है। – राजेश प्रसाद

रामप्रकाश कुशवाहा :

वरिष्ठ कवि ज्ञानेंद्रपति की अध्यक्षता में सम्पन्न सामाजिक परिवर्तन के लिए लिखने वाले अति-महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कवि राजेंद्र राजन की कविताओं का एकल पाठ अस्सी(भदैनी)स्थित तुलसी पुस्तकालय के सभागार में दो अक्टूबर को गाँधी जयंती के दिन संपन्न हुआ..नगर में तीन कार्यक्रमों में बंटे होने के बावजूद पर्याप्त संख्या में साहित्यप्रेमी स्रोतागण राजेन्द्र राजन की कविताएँ सुनने तुलसी पुस्तकालय पहुंचे .इस अवसर पर राजेंद्र राजन नें
अपनी चुनीहुई श्रेष्ठ कविताएँ -‘इतिहास में जगह’, ‘बामियान में बुद्ध’ ,’श्रेय ‘,’हत्यारे ‘ ‘पेड़’,’ विजेता की प्रतीक्षा.’,’इतिहासका नक्शा;,’नयायुग’,’बाजार’ ,’प्रतिमाओं के पीछे’,’लौटना तथा ,’छूटा हुआ रास्ता ‘ आदि का पाठ किया.
श्रोताओं नें राजन की नए ज़माने के कबीर रूप को खूब पसंद किया .उनकी बाजार में खड़े कबीरऔर शेयर बाजार के प्रतीक सांड को आधार बनाकर लिखी गयी कविता बहुत पसंद की गयी..काव्यपाठ के बाद विशेषज्ञ वक्तव्य देते हुए मैंने उन्हें इतिहस के निर्णायक मोड़ों और क्षणों की शिनाख्त करने वाला कवि बताया.उनकी बाजार कविता बाजार की नैतिकता की पड़ताल करती है.शेयर बाजार का प्रतीक-चिन्ह सांड बाजार के अस्थिर चरित्र पर प्रकाश डालता है. बामियान में बुद्ध कविता सौन्दर्य,सम्मान एवं करुणा कीभाषाको मिटाकर हिंसा की लिखी जा रही नयी इबारत को अंकित करती है .अंततःमहत्त्व धर्म के सम्मान का नहीं मनुष्य के सम्मान का है.यह कविता ऐतिहासिक चरित्रों को मानवता के पक्ष में नैतिक मूल्यों के प्रतिमान के रूप में प्रस्तुत करती है.
. राजेंद्र राजन की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति नें कहा कि –
‘राजेन्द्र राजन कविता की कबीरी परंपरा में हैं.वे किसी को भी नहीं छोड़ते हैं-विजेताओं और जनता को भी नहीं छोड़ते -स्वयं को भी नहीं.राजेंद्र राजन के यहाँ कविता आत्मा के रूप में बची हुई है .पेड़ नहीं बन पाने की पीड़ा या अहसास इन की काव्यालोचना को आत्मिक आधार देता है. उनका कवि उस मनुष्य से अलग नहीं है.वह सबसे जुड़ने की आकांक्षा का नाम है.कवि को अपने अंतर्वस्तु पर भरोसा है.. उसे भाषा-बद्धकर पाना उसकी चुनौती है.

img_0110

राजेंद्र राजन की कविताएँ-

कविता : पेड़ : राजेन्द्र राजन

छुटपन में ऐसा होता था अक्सर
कि कोई टोके
कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज
इसलिए पेड़ उगेगा तुम्हारे भीतर

मेरे भीतर पेड़ उगा या नहीं
पता नहीं
क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट

लेकिन आज जब मैंने
एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
तो मैंने सुनी अपने भीतर
एक हरी – भरी चीख

एक डरी – डरी चीख
मेरे भीतर से निकली

मेरी चीख लोगों ने सुनी या नहीं
पता नहीं
क्योंकि लोगों के भीतर
मैं पेड़ की तरह उगा नहीं

क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट.

। । इतिहास पुरुष अब आयें। ।

काफ़ी दिनों से रोज़-रोज़ की बेचैनियां इकट्ठा हैं हमारे भीतर
सीने में धधक रही है भाप
आंखों में सुलग रही हैं चिनगारियां हड्डियों में छिपा है ज्वर
पैरों में घूम रहा है कोई विक्षिप्त वेग
चीज़ों को उलटने के लिये छटपटा रहे हैं हाथ

मगर हम नहीं जानते किधर जायें क्या करें
किस पर यकीन करें किस पर संदेह
किससे क्या कहें किसकी बांह गहें
किसके साथ चलें किसे आवाज़ लगाएं
हम नहीं जानते क्या है सार्थक क्या है व्यर्थ
कैसे लिखी जाती है आशाओं की लिपि

हम इतना भर जानते हैं
एक भट्ठी जैसा हो गया है समय
मगर इस आंच में हम क्या पकायें

ठीक यही वक्त है जब अपनी चौपड़ से उठ कर
इतिहास-पुरुष आयें
और अपनी खिचड़ी पका लें-

राजेन्द्र राजन .

संतोष कुमार ,फेसबुक परः

तुलसी पुस्तकालय भदैनी के हाल मे एकाकी पंखा अपनी गति से बल्ब की पीली रोशनी मे राजेन्द्र राजन के शब्दों को इतिहास से लेकर वर्तमान तक बिखेर रहा था। बमियान मे घायल बुद्ध से एक बुर्जग पख्तून से संवाद के बहाने वर्तमान की निर्ममता को उकेरते राजेन्द्र राजन बाजार मे बिकने के लिए विवश कबीर को हाल मे बैठे श्रोतागण के समक्ष दो-चार कर रहे थे । अफलातून ने सुधी श्रोताओ के लिए राजेन्द्र राजन की कविता का एकल पाठ और ज्ञानेन्द्रपति के सभापतित्व का सुनहरा अवसर दिया था । बहुत सारी त्रासदियां और उनके बीच से निकलती उम्मीद की किरणों को टटोलते कवि ने श्रोतागण को इस कदर बांधे रखा कि समय कम पड़ गया । प्रस्तुत है राजेन्द्र राजन की दो कविताएं-
विकास
कम हो रहीं है चिड़ियां
गुम हो रही है गिलहरियां
अब दिखती नही है तितलियां
लुप्त हो रही हैं जाने कितनी प्रजातियां

कम हो रहा है
धरती के घड़े म ेजल
पौधों मे रस
अन्न मे स्वाद
कम हो रही है फलो मे मिठास
फूलों मे खुशबू
शरीर मे सेहत
कम हो रहा है
जमीन मे उपजाऊपन
हवा मे आक्सीजन

सब कुछ कम हो रहा है
जो जरुरी है जीने के लिए
मगर चुप रहो
विकास हो रहा है इसलिए। राजेन्द्र राजन
पेंड़
छुटपन मे ऐसा होता था अक्सर
कि कोई टोके
कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज
इसलिए पेंड़ उगेगा तुम्हारे भीतर
मेरे भीतर पेड़ उगा या नहीं
पता नही
क्योंकि मैने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट
लेकिन आज जब मैने
एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
ते मैने सुनी अपने भीतर
एक हरी भरी चीख
मेरी चीख लोगो ने सुनी या नही
पता नही
क्योेंकि लोगो के भीतर
मैं पेड़ की तरह उगा नही
क्योंकि मैने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट ।

राजेन्द्र राजन

 

Advertisements

Read Full Post »

” गांधी – एक सख़्त पिता । जेपी – एक असहाय मां । विनोबा – एक पुण्यात्मा बड़ी बहन ।
लोहिया – गांव-दर-गांव भटकने वाला यायावर । अम्बेडकर – पक्षपाती हालात से नाराज होकर घर से बाहर रहने वाला बेटा ।
यह है हमारा हमारा कुटुंब । हम हैं इस परिवार की संतान। इसे और किस नजरिए से देखा जा सकता है ?”
– देवनूर महादेव , (प्रख्यात कन्नड़ साहित्यकार और अध्यक्ष , सर्वोदय कर्नाटक पक्ष)

देवनूर महादेव

अध्यक्ष ,सर्वोदय कर्नाटक पक्ष

Read Full Post »

पिछले भाग से आगे ;
तो भारतीय बुद्धिजीवी को जब पश्चिमी सभ्यता अधूरी लगती है , तब वह प्राचीनता की किसी गुफा में घुस जाता है और जब वह अपनी सभ्यता के बारे में शर्मिन्दा होता है तब पश्चिम का उपनिवेश बन कर रहना स्वीकार कर लेता है । दोनों सभ्यताओं से संघर्ष करने की प्रव्रुत्ति भारतीय बुद्धिजीवी जगत में अभी तक नहीं विकसित हुई है या जो हुई थी , वह खत्म हो गई है । गांधी के अनुयाई गुफाओं में चले गये। रवि ठाकुर के लोग अंग्रेजी और अंग्रेजियत के भक्त हो गये । गांधी के एक शिष्य राममनोहर लोहिया ने ‘इतिहास चक्र’ नामक एक किताब लिखी । एक नई सभ्यता की धारा चलाने के लिए आवश्यक अवधारणाएं प्रस्तुत करना इस किताब का लक्ष्य था । अंग्रेजी में लिखित होने के बावजूद बुद्धिजीवियों ने उसे नहीं पढ़ा । औपनिवेशिक दिमाग नवनिर्माण की तकलीफ को बर्दाश्त नहीं कर सकता । ज्यादा-से-ज्यादा वह प्रचलित और पुरानी धाराओं को साथ-साथ चलाने की कोशिश करता है और दोनों के लिए कम-से-कम प्रतिरोध की रणनीति अपनाता है । आम जनता पर दोनों प्रतिकूल सभ्यताओं का बोझ पड़ता है और वह अपनी तकलीफ के अहसास से आन्दोलित होती है । सभ्यताओं से संघर्ष की इच्छा शक्ति के अभाव में देश के सारे राजनैतिक दल अप्रासंगिक और गतिहीन हो गए हैं । जनता के आन्दोलन को दिशा देने की क्षमता उनमें नहीं रह गई है । जन-आन्दोलनों का केवल हुंकार होता है, आन्दोलन का मार्ग बन नहीं पाता । जहां क्षितिज की कल्पना नहीं है, वहां मार्ग कैसे बने ? इस कल्पना के अभाव में क्रान्ति अवरुद्ध हो जाती है ।
ऐसी स्थिति में यही कहना काफी नहीं होगा कि सभ्यता के स्तर पर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा । मुकाबले की रणनीति भी बनानी पड़ेगी । किन बिन्दुओं पर हम सभ्यता या सभ्यताओं से टकराएंगे ? आधुनिक सभ्यता ने हमें कहां गुलाम बनाया है ? प्राचीन सभ्यता ने हमें कहां दबोच रखा है और पंगु बनाया है ? आज हम किन बिन्दुओं पर किस प्रकार का विद्रोह कर सकते हैं ? इन ठोस सवालों से जो नहीं जूझेगा , वह गांधी की प्रशंसा करेगा तो तो नेहरू का भी समर्थन करेगा । यह एक बौद्धिक बाजीगरी होगी, संघर्ष नहीं होगा,सृजन नहीं होगा । सभ्यताओं से जो तकरायेगा , उसे कुछ झेलना पड़ेगा। अपने वर्ग और तबके में उसे अप्रिय और कटु होना पड़ेगा ।
आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह दुनिया को अपने मानदंडों के अनुसार आधुनिक नहीं बना नहीं सकती । बारी – बारी से वह कुछ इलाकों को प्रलोभित करती है कि ‘ तुमको आधुनिक बना सकती हूं अमरीकी ढंग से नहीं , तो रूसी ढंग से ।’ पूरी दुनिया को एक समय के अन्दर आधुनिक बना सकने का दावा अभी तक वह कर नहीं सकी है। अतः यह सभ्यता दुनिया के बड़े हिस्से को उपनिवेश बना कर ही रख सकती है , जिसके लिए आधुनिक सभ्यता का अर्थ उपभोग का कुछ सामान मात्र है ।
प्राचीन सभ्यता का सबसे बड़ा अपराध यह है कि राष्ट्रीयता और सामाजिक समता के मूल्य उसमें नहीं हैं । जो भारतीय सभ्यता अब बची हुई है , उसकी सारी प्रवृत्ति इन मूल्यों के विरुद्ध है । मनुष्य , मनुष्य की बराबरी या आपसी प्रेम पारम्परिक भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है । ऐसे मनुष्य की संवेदनहीनता , यन्त्र की संवेदनाहीनता से कम खतरनाक नहीं है । मानव के प्रति उदासीनता प्राचीन हिन्दू संस्कृति का गुण था या नहीं , या यह वर्तमान की एक विकृति है , यह स्पष्ट नहीं है । प्राचीन भारतीय मान्यता न सिर्फ सामाजिक समता के विरुद्ध है , बल्कि वह आध्यात्मिक समता की अवधारणा को भी नकारती है । उसके अनुसार कुछ लोगों की आत्मा ही घटिया दरजे की होती है । बुद्ध ने इस मानवविरोधी प्रवृत्ति को बदलने की कोशिश की थी । लेकिन आधुनिक हिन्दू मनुष्य की विरासत में बुद्ध की धारा नहीं है । पश्चिमी सभ्यता का सबसे बड़ा गुण यह है कि उसने मानव की गरिमा और सामाजिक समानता को मूल्यों के तौर पर विकसित किया है । राष्ट्रीयता और अन्तरराष्ट्रीयता की भावना भी इन मूल्यों पर आधारित है । हिन्दू मनुष्य जब तक इन मूल्यों को आत्मसात नहीं कर लेता है , तब तक वह पश्चिम से बेहतर एक नई सभ्यता बनाने का दावा नहीं कर सकता ।
आधुनिक सभ्यता ने हमें उपनिवेश बनाया है । प्राचीन सभ्यता ने हमें समता विरोधी और मानव विरोधी बनाया है । इन बिन्दुओं पर अगर हम सभ्यता का संघर्ष नहीं चलाते हैं तो हमारी राजनीति , प्रशासन , अर्थव्यवस्था कुछ भी नहीं बदलनेवाली है । इसके बिना हमारे साहित्य , कला , विज्ञान के क्षेत्र में भी कोई उड़ान नहीं हो सकेगी । आधुनिक सभ्यता से संघर्ष की शुरुआत औपनिवेशिक मानस को झकझोरने से होगी । उपभोगवाद , बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और सांस्कृतिक परनिर्भरता को निशाना बनाकर ही यह कार्यक्रम हो सकेगा । दूसरी ओर , हिन्दू मानसिकता और हिन्दू समाज को सुधारने के लिए उग्र कार्यक्रम की जरूरत है ।
किशन पटनायक और डॉ. लोहिया यह मानसिकता कितनी अपरिवर्तित है ही , इसका प्रमाण हरिजनों की प्रतिक्रिया से मिलता है । हाल की घटनाएं बतलाती हैं कि हरिजनों को धर्म-परिवर्तन के लिए बड़ी संख्या में तैयार किया जा सकता है । हरिजनों के लिए मानव का दरजा प्राप्त करने के दो ही रास्ते दीखते हैं – धर्म-परिवर्तन और आरक्षण । आरक्षण का मतलब है हिन्दू मन की उदारता । क्या इस वक्त हिन्दू मन उतनी उदारता के लिए पूरी तरह तैयार है ? जिन दिनों दयानन्द , विवेकानन्द या गांधी हिन्दू समाज के नेता थे , उनका प्रयास और प्रभाव हिन्दू मन को मानवीय बनाने का था । हिन्दू समाज को पिघलाना उनका काम था । जब हिन्दू समाज पिघलता है तब भारतीय राष्ट्र बनता है , हिन्दू समाज जहां जड़ होता है , वहां भारतीय राष्ट्र के सिकुड़ने का डर रहता है ।
दो सभ्यताओं से एक साथ टकराना सत्ता की अल्पकालीन राजनीति में संभव नहीं है । मौजूदा राजनीतिक दलों की क्षमता के अनुसार उनका एकमात्र जायज लक्ष्य हो सकता है – लोकतंत्र के ढांचे की रक्षा करना । अगर ये दल इतना भी नहीं कर सकते तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि सभ्यताओं से लड़े बिना लोकतंत्र की रक्षा सम्भव नहीं है । ऐसी स्थिति में आम जनता के विद्रोहों का राजनीतिकरण नहीं होगा । कभी – कभी विद्यार्थियों में , कभी किसानों में , कभी दलितों में , कभी उपेक्षित इलाकों में खंड-विद्रोह होते हैं । इन तबकों और इलाकों पर दोनों सभ्यताओं का बोझ पड़ता है । मौजूदा राजनैतिक दलों का जो वैचारिक ढांचा है , उसमें इन समूहों की मुक्ति हो नहीं सकती । उनकी मुक्ति के लिए एक नया वैचारिक ढांचा चाहिए । जनता के खंड – विद्रोहों और नए वैचारिक ढांचे के सम्मिश्रण से एक नई राजनीति पैदा हो सकती है ।
वैचारिक संघर्ष बुद्धिजीवी ही करेगा । बुद्धिजीवी का मतलब बुद्धिजीवी वर्ग नहीं है । भारत का बुद्धिजीवी वर्ग अभी मानसिक स्तर पर दोगला ही रहेगा । लेकिन टोलियों में या व्यक्ति के तौर पर बुद्धिजीवी एक नई सभ्यता-निर्माण के लिए प्रतिबद्ध हो सकता है । सारे बुद्धिजीवियों से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वे संगठन या हड़ताल चलायें । लेकिन यह अपेक्षा जरूर रहेगी कि आचरण के स्तर पर वे अपने विचार-संघर्ष को झेलें , ताकि विचारों का सामाजिक प्रभाव बने ।
( स्रोत : सामयिक वार्ता , जनवरी ,१९८२ )

Read Full Post »

जैसे – जैसे देश की समस्याएं गहरा रही हैं और समाधान समझ के बाहर हो रहा है , वैसे – वैसे कुछ सोचनेवालों की नजर राजनीति और प्रशासन के परे जाकर समस्याओं की जड़ ढ़ूंढ़ने की कोशिश कर रही है । वैसे तो औसत राजनेता , औसत पत्रकार , औसत पढ़ा – लिखा आदमी अब भी बातचीत और वाद – विवाद में सारा दोष राजनैतिक नेताओं , चुनाव – प्रणाली या प्रशासन के भ्रष्ताचार में ही देखता है । लेकिन , क्या वही आदमी कभी आत्मविश्लेषण के क्षणों में यह सोच पाता है कि वह भी उस भ्रष्टाचार में किस तरह जकड़ा हुआ है । वह यह सोच नहीं पाता है कि वह भी उस भ्रष्टाचार में किस तरह जकड़ा हुआ है । वह यह सोच नहीं पाता कि किस तरह वह खुद के भ्रष्टाचार को रोक सकता है ।

कुछ लोग अपने को प्रगतिशील मानते हैं । वे कहीं-न-कहीं समाजवादी या साम्यवादी राजनीति से जुड़े हुए हैं । कुछ साल पहले तक ऐसे लोग जोश और जोर के साथ बता सकते थे कि आर्थिक व्यवस्था के परिवर्तन से सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा । पिछले वर्षों में उनका यह आत्मविश्वास क्षीण हुआ है । साम्यवादी और समाजवादी कई गुटों में विभक्त हो चुके हैं । उनकी राजनीति के जरिए तीसरी दुनिया का आम आदमी एक नए भविष्य की कल्पना नहीं कर पा रहा है । बढ़ती हुई सामाजिक हिंसा , सर्वव्यापी भ्रष्टाचार , आदमी की अनास्था जैसी समस्याओं को समझने – समझाने में समाजवादी या साम्यवादियों के पुराने सूत्र और मन्त्र विश्वसनीय नहीं रह गये हैं ।

ऐसी स्थिति में कुछ संवेदनशील दिमागों को यह लगने लगा है कि समस्याओं की जड़ में राजनैतिक अनैतिकता नहीं , अथवा नैतिक गलतियां नहीं , बल्कि सभ्यता का संकट है । चर्चाओं में यह बात बार – बार आने लगी है । प्रसिद्ध विचारक डॉ. जयदेव सेठी ने भी ऐसी ही बात कही है । देश के अंग्रेजी में लिखनेवाले विचारकों में उनका प्रमुख स्थान है । पिछले दिनों उन्होंने गांधी का अध्ययन किया है और वर्तमान के लिए गांधी की प्रासंगिकता को सिद्ध किया है । कारण , गांधी ने समस्याओं की चुनौती को सभ्यता के स्तर पर लिया । गांधी ने सभ्यता के स्तर पर एक टकराव की रणनीति भी बनाई थी ।

प्रशासन और सत्ता-राजनीति से परे , अर्थव्यवस्था और उत्पादन-व्यवस्था के परे जा कर सभ्यता के परिवर्तन द्वारा समस्याओं का समाधान ढ़ूंढ़ना ही गहराई में जाना और दीर्घकालिक सोच और रणनीति बनाना है । सोचने के इस ढंग को गम्भीरता से लेने के पहले कुछ सावधानी बरतनी पड़ेगी , क्योंकि भारतीय संस्कृति और समाज में रहनेवाला जब गहराई में जाता है , तब वह इतना डूब जाता है कि उसको ऊपर की दुनिया नहीं दिखाई देती । उसके लिए राजनीति , व्यवस्था , संघर्ष , आन्दोलन सब कुछ अप्रासंगिक हो जाते हैं । वह खुद इस सभ्यता के जंजाल से हट जाता है । महर्षि अरविन्द , सन्त विनोबा , अच्युत पटवर्धन , पंडित रामनन्दन मिश्र जैसे लोग संघर्ष की राजनीति से , समस्याओं से दूर चले गए क्योंकि समस्याओं की जड़ बहुत गहराई में जाकर दीखने लगी । भारतीय संस्कृति में यह एक जबरदस्त अवगुण है कि आदमी को गहराई में ले जाने की प्रक्रिया में वह उसे समाज से ही अलग कर देती है । गांधीजी के साथ ऐसा नहीं हुआ । सभ्यता से टकराने के लिए गांधीजी को सारी तात्कालिक समस्याओं से राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर लड़ना पड़ा । लेकिन , गांधीजी की पचास फीसदी बातें ऐसी हैं , जो एक भारतीय को जड़ और उदासीन बना सकती हैं । खुद गांधीजी व्यवहार में आधुनिक और भारतीय दोनों सभ्यताओं से लड़ रहे थे । लेकिन प्रतिपादन में , लेखन तथा प्रचार में , उनका एक ही निशाना रहा – आधुनिक पश्चिमी सभ्यता । भारतीय सभ्यता और हिन्दू व्यवस्था से उनको हर कदम टकराना पड़ा । मृत्यु भी उसी टकराहट से हुई । लेकिन , हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ बताना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा । यह या तो एक प्रकार का छद्म था , या फिर सन्तुलित विचार की कमी थी । इसी कारण अभी तक एक सन्तुलित गांधी-विचार नहीं बन सका है ।

गांधी का व्यवहार सन्तुलित था , किन्तु उनमें वैचारिक सन्तुलन नहीं था । दूसरे लोग जब आधुनिक सभ्यता से टकराते हैं , अक्सर दोनों स्तर पर सन्तुलन खोते हैं । प्राचीन सभ्यता के कुछ प्रतीकों को ढ़ूंढ़ कर वे एक गुफा बना लेते हैं और उसमें समाहित हो जाते हैं । उनके लिए समस्या नहीं रह जाती है , संघर्ष की जरूरत नहीं रह जाती है । अधिकांश भारतीय बुद्धिजीवी यह नहीं जानते कि हमारी ‘सभ्यता का संकट’ क्या है ? उनका एक वर्ग आधुनिक पश्चिमी सभ्यता को नकार कर या उससे घबराकर प्राचीन सभ्यता के गर्भ में चला जाता है । योग , गो-सेवा या कुटीर उद्योग उनके लिए कोई नवनिर्माण की दिशा नहीं है बल्कि एक सुरंग है , जिससे वे प्राचीन सभ्यता की गोदमें पहुंचकर शान्ति की नींद लेने लगते हैं । बुद्धिजीवियों का दूसरा वर्ग पश्चिमी सभ्यता से आक्रांत रहता है , या घोषित तौर पर उसे अपनाता है । उसको अपनाने के क्रम में पश्चिमी सभ्यता का उपनिवेश बनने के लिए वह अपनी स्वीकृति दे देता है । लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है । हम सब कमोबेश आधुनिक सभ्यता से आक्रांत हैं । उसको आंशिक रूप से या पूर्ण रूप से स्वीकारने की कोशिश करते हैं । लेकिन हमारी रगों में प्राचीन भारतीय सभ्यता का भूत भी बैठा हुआ है । उसके सामने हम बच्चे जैसे भीत या शिथिल हो जाते हैं । वह हमें व्यक्ति या समूह के तौर पर निष्क्रिय , तटस्थ और अप्रयत्नशील बना देता है । जो लोग पश्चिमी सभ्यता को बेहिचक ढ़ंग से अपनाते हैं, वे भी साईं बाबा के चरण-स्पर्श से ही अपनी सार्थकता महसूस करते हैं । सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व न्यायाधीश वी. आर. कृष्ण अय्यर मार्क्सवादी रहे हैं और महेश योगी के भक्त भी हैं । नाम लेना अपवाद का उल्लेख करना नहीं है । यह अपवाद नहीं , नियम है । यह विविधता का समन्वय नहीं है , यह केवल वैचारिक दोगलापन है । दोगली मानसिकता की यह प्रवृत्ति होती है कि वह किसी पद्धति की होती नहीं और खुद भी कोई पद्धति नहीं बना सकती । दूसरी विशेषता यह होती है कि वह केवल बने बनाये पिंडों को जोड़ सकती है , उनमें से किसी को बदल नहीं सकती , उनमें से किसी को बदल नहीं सकती । तीसरी विशेषता यह है कि वह आत्मसमीक्षा नहीं कर सकती । आत्मसमीक्षा करेगी , तो बने-बनाए पिंडों से संघर्ष करना पड़ेगा । इसलिए बाहर की तारीफ से गदगद हो जाती है और आलोचना को अनसुना कर देती है । इसकी चौथी विशेषता यह है कि वह मौलिकता से डरती है । एक दोगले व्यक्तित्व का उदाहरण होगा ,’श्री आरक्षण-विरोधी जनेऊधारी कम्प्यूटर विशेषज्ञ’ !  इस तरह के व्यक्तित्व को हम क्या कहेंगे – ‘विविधता का समन्वय ?’

शेष भाग

Read Full Post »

सुयश सुप्रभ Suyash Suprabhने रामकृष्ण परमहंस की बाबत अपने विचार प्रकट किए हैं। यहां मैं किशन पटनायक के रामकृष्ण परमहंस के बारे में विचार दे रहा हूं :

” रामकृष्ण परमहंस कई अर्थों में एक नवीन भारत के धार्मिक संस्थापक थे ।विवेकानन्द और केशवचन्द्र सेन के माध्यम से उन्हें पश्चिम का स्पर्श मिला होगा । उनका तरीका बौद्धिक नहीं था , अलौकिक था। उनके संदेश सांकेतिक थे। उनके जीवन प्रसंगों में ही उनका संदेश निहित था । उनके जीवन के चार प्रसम्गों को हम लें। अपने प्रियतम शिष्य को उन्होंने मोक्ष के लिए नहीं,समाज जागरण के काम में लगाया ।खुद हिन्दू मंदिर का पूजक होकर इस्लाम और ईसाई धर्म की भी साधना की । चांडालो कें घरों में जाकर झाड़ू लगाई और उनका पाखाना साफ किया ।पत्नी को संन्यासिनी किया और विधवा को सुहागिन बनाया ।भारतीयता के पुनर्जागरण के लिए ये सारे संकेत थे- समाज सुधार को प्राथमिकता देना,गैर भारतीय संस्कृति के मूल्यों का आदार करना और अपनाना , मनुष्य की गरिमा को स्वीकृति देना,नारी जीवन को स्वतंत्र और सकारात्मक बनाना । शारदा देवी के प्रसंग मे दोनों बातें ध्यान देने योग्य हैं-पति के साथ संन्यासिनी और पति के बाद सुहागिन ।” (१ जनवरी,१९८८)

Read Full Post »

किशनजी१

किशनजी१

किशनजीअ

किशनजी१अ

किशनजी२

किशनजी२

किशनजी२अ

किशनजी२अ

सच्चिदाजी१

सच्चिदाजी१

Read Full Post »

%d bloggers like this: