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Archive for अक्टूबर, 2016

सन 1952 में मैं ‘साम्ययोगी विनोबा’ नामक पुस्तक की तैयारी कर रहा था। उसी सिलसिले में मैं एक सूची बना रहा था – विनोबा कितनी भाषाएं जानते हैं, कितने धर्मों का अभ्यास,उन धर्मों के मूल ग्रंथों के  मार्फत उन्होंने किया है,उन्होंने किस-किस प्रकार के शारीरिक परिश्रम के काम किए हैं आदि। इस सूची में कहीं कोई गलती न रह जाए,इसलिए वह सारी जानकारी जांच के लिए विनोबा को दे दी।शरीर-परिश्रम के कामों की सूची खासी लंबी थी।किसान,बुनकर,रंगरेज,धोबी,बढ़ई,लुहार,पत्थर तोड़ने वाले आदि अनेक प्रकार के श्रमजीवियों के साथ विनोबा अपने जीवन का तार मिला चुके थे।

इस सूची को देखकर विनोबा ने कहा”इसमें एक मजदूरी का उल्लेख नहीं आता।”भाषा ज्ञान की सूची में मैंने ऐसी भाषाएं शामिल की थीं,जिनको विनोबा को थोड़ा परिचय था,लेकिन पूरा ज्ञान नहीं था,इसलिए उस सूची को संक्षिप्त करने का उन्होंने प्रयत्न किया था। लेकिन वही विनोबा शरीर परिश्रम की सूची बढ़ाने के लिए कह रहे हैं,इससे मुझे आश्चर्य हुआ।मैंने पूछा-कौन-सी मजदूरी बाकी रह गई?

विनोबा ने बड़ी गंभीरता से कहाः मैंने लिखने की मजदूरी की है,उसे तुमने सूची में नहीं लिखा है।मुझे लगा कि विनोबा विनोद कर रहे हैं।पर विनोद करते समय उनके चेहरे पर जिस प्रकार की रेखाएं उभरती हैं,वे इस समय नहीं थीं।

मैंने पूछा कि लिखना क्या मजदूरी कही जा सकती है?

” जिससे हाथ में आंटन (गांठ),भट्ट पड़ जाए,वह काम शरीर परिश्रम का गिना जाएगा या नहीं?” विनोबा ने पूछा।मैंने कहा,”जी हां,वह तो जरूर गिना जाएगा।”

“तो देखो,मेरी ये उंगलियां!इसमें आंटन पड़ गए हैं।उंगलियों की पोर थोडी सख्त हो गई है।आज से 38 वर्ष पहले मैंने जो लिखा,उसके कारण ऐसा हुआहै।”

“आज से 38 वर्ष पहले।” विनोबा की जीवनी लिखने वाले की हैसियत से मुझे इस बात में ज्यादा दिलचस्पी थी।उस समय आपको ऐसा क्या लिखना पडा था?”

“उस समय मैं कविता लिखता था।कविता लिख-लिख करके ही मेरे आंटन पड़े हैं” विनोबा हंस कर बोले।

इतनी सारी कविताएं।मिल जाएं तो एक बहुत बडा काम हो जाए। मैंने पूछा- “ये कविताएं आज कहां होंगी?”

“ये काव्य मैंने काशी में गंगा के किनारे लिखे थे।इनमें से जिनके बारे में मुझे समाधान नहीं था,जो मुझे ठीक जंचे नहीं,वे तो मैंने अग्नि को समर्पित किए और जिनके बारे में समाधान था,वे मैंने गंगाजी में बहा दिए थे।”

मैं चकित होकर सुनता रहा।ये काव्य प्रसिद्धि के लिए नहीं लिखे गए थे,प्रशस्ति के लिए भी नहीं लिखे गए थे।पाठ के लिए भी नहीं लिखे गए थे।गीता का अनुवाद करने के लिए मां रुक्मिणीबाई ने कहा था।बस उसके अभ्यास के तौर पर एक ओर गीता को जीवन में उतारने का प्रयास शुरु किया और दूसरी ओर व्याकरण,काव्य शास्त्र इत्यादि का अभ्यास।ये काव्य तो स्वान्तः सुखाय लिखे गये थे।विनोबा के लिए साहित्य मनोरंजन या शोक का विषय नहीं है,जीवन साधना का एक साधन है।

विनोबा की संपूर्ण साहित्य साधना एक वांगमय तप ही बनी है।मां की इच्छा थी कि उनका बेटा श्रीमदभगवद्गीता का मराठी अनुवाद करे।मां की यह इच्छा मां की मृत्यु के बाद पूरी हुई।इस अनुवाद को विनोबा ने नाम दिया गीताई और उसकी प्रस्तावना एक अनुष्टुप में कीः गीताई माऊली माझी,मी तिचा बाल नेणता,पडता रडता थेई उचलून कडेवरी।

विनोबा मानते हैं कि यदि ईश्वर ने उनके पास से दूसरी कोई और सेवा नहीं कराई होती और गीताई ही लिखाई होती तो भी ये अपने कृतकृत्य मानते।मराठी और संस्कृत भाषा के विशेषज्ञ गीताई के साहित्यिक गुणों पर मुग्ध हैं।उत्तर भारत की अधिकांश भाषाओं में गीता के समश्लोकी अनुवाद सुने हैं।पर गीताई में जो ओज है,सरलता और शुद्धता का जो मेल है,वैसा दूसरे किसी भाषांतर में मन्हीं मिलता। मराठी भाषियों में विनोबा की इस पुस्तक की लोकप्रियता असाधारण है।अब तक गीताई की 40 लाख से ऊपर प्रतियां छप चुकी हैं।

नोआखली में पदयात्रा करते समय गांधीजी से किसी अमेरिकी पत्रकार ने संदेश मांगा था। 79 वर्ष की उम्र विद्यार्थी के रूप में गांधीजी उस समय बंगाली भाषा सीखते थे।उन्होंने बंगाली में लिखकर संदेश दिया’आमार जीवन इ आमार वाणी।”

विनोबा पर भी यह वाक्य अक्षरशः लागू होता है।उनका जीवन ही उनकी वाणी है,और उनकी वाणी ही उनका जीवन है।

इस वांगमयी तपास,खोज के आरंभ की तपस्या कठोर थी।दिन के हर क्षण का निश्चित हिसाब पसीने से सराबोर हो जाए,इतना परिश्रम,बुजुर्ग ज्ञानियों को भी मात करे,अभ्यास की ऐसी गहराई-ये विनोबा की आरंभिक तपस्या के क्षण थे।उनके आरंभकाल के साहित्य में यह तेजस्विता और साथ-साथ थोड़ी कठोरता की झलक मिलती हैं। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध कवि मामा वरेरकर के शब्दों में कहूं तो ‘उनकी भाषा में मिठास थी थी,लेकिन यह मिठास मिश्री जैसी सख्त थी।जीवन के प्रौढ़काल  में यह मिठास अंगूर की तरह रसीली बन गई।’

विनोबा वांगमय एक विशाल सागर जैसा है।विनोबा ने जो कुछ लिखा और आगे आगे चलकर जो कुछ बोला, वह साहित्य की एक विशिष्ट निधि बन गया है।

आज लोग यद्यपि उन्हें एक आन्दोलन के नेता और क्रांतिकारी संत के रूप में ही जानते हैं पर उनका साहित्यकार का रूप भी कम लुभावना नहीं है।

स्वयं विनोबा द्वारा लिखी गई और उनके प्रवचनों के आधार पर तैयार की गई पुस्तकों की कुल संख्या पचासों में है। उनके विचारों में हमें एक निष्पक्ष,सजीव और मौलिक दिशा मिलती है।

[नारायण भाई ने यह लेख सन 1965 में लिखा था।]

 

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आज अपराह्न में भदैनी, वाराणसी स्थित तुलसी पुस्तकालय में चर्चित और प्रखर कवि राजेन्द्र राजन ने अपनी लगभग बीस कविताओं का पाठ करके यह स्पष्ट कर दिया कि सरल सहज भाषा में सभी कुछ इतनी तीव्रता के साथ व्यंजित किया जा सकता है कि फ़िर और किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं पड़ती। निश्चय ही कुछ कविताएं एक-दो दशक पहले से हमारे सामने आ रही हैं, पर वे वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक संदर्भों और राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में इतनी ताजगी लिए हुए हैं, मानों उन्हें अभी-अभी कहा गया हो।

 

इस एकल काव्य कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति ने कहा कि कवि ने विद्रूपता के किसी भी कोने को छोड़ा नहीं है। सत्ता और ताकत से सम्पन्न शासक-वर्ग के मन की कुरूपता को यदि नग्न किया है तो उस जनता को भी नहीं छोड़ा है, जो विजेता के पक्ष में होने के सुखद अहसास को महसूस करना चाहती है। कवि ने स्वयं को भी नहीं छोड़ा है, जो अपनी ज़िन्दगी को चलाने के लिए दूसरों के द्वारा दिए गए विषय पर सोचता है और दूसरों के द्वारा निर्धारित भाषा में सुर में सुर मिलाकर बोलता है; और कवि ऐसा पेड़ हो गया है, जो छाया फ़ल और वसंत की अनुभूति देने में सक्षम नहीं रहा। कवि शब्दों को भी नहीं छोड़ता है क्योंकि फूल, पहाड़, नदियों का सौन्दर्य और बाकी सब कुछ शब्दों से ढंका हुआ है और वह वास्तविक सौन्दर्य को नहीं देख पाता है।

 

श्रेय पाने की लिप्सा में पहले के लोगों की कोशिशों को नकार दिया जाए और नया इतिहास लिखने की कोशिश हो, इससे कवि सहमत नहीं है। इतिहास में जगह बनाने के लिए आतुर लोग जानते हैं कि इतिहास में कितनी जगह है, अत: वे अपनी जगह बनाने के लिए एक-दूसरे को धकियाते हैं। मज़े की बात है कि कुछ लोग अपनी छोटी-सी जगह पर इस कारण चुप रहते हैं कि उनसे वह जगह भी न छिन जाए। ‘विकास’ में विकास के नाम पर सभी प्राकृतिक अवदानों के कम होते जाने पर और ‘नया युग’ असहमत लोगों को हटाने मात्र से विकास का अहसास कराए जाने की कुत्सित चेष्टा को सामने लाती है। ‘प्रतिमाओं के पीछे’ में स्वयं के वास्तविक रूप को छिपाने की चेष्टा करने वालों पर तीखी टिप्पणी है। ‘ताकत बनाम आज़ादी’ में निस्सार सत्ता-सुख में डूबे लोगों को आज़ादी के सुख को याद दिलाया गया। ‘छूटा हुआ रास्ता’ और ‘लौटना’ कविताओं में कवि अपने वास्तविक व्यक्तित्व के क्षय से पीड़ित होता है और लौटना चाहता है।

 

तालिबान द्वारा ‘बामियान में बुद्ध’ की विशालकाय मूर्तियों को तोड़ा जाना कवि को आहत करता है और उसे खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान याद आते हैं, जो बुद्ध की तलाश में बामियान में भटक रहे हैं। ‘बाजार में कबीर’ कबीर अपनी चादर इसलिए नहीं बेच पाते हैं क्योंकि वह किसी कंपनी का नहीं है। उस चादर का खरीदार नौकरशाहों द्वारा संचालित कंपनी-अधिनियम और राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चमक में कबीर को भला कैसे खोज पाएगा। ‘मनुष्यता के मोर्चे पर’ इस विडंबना को सामने लाती है कि आदमी ज़िन्दगी में उठने के लिए गिरता है और ऐसी स्थिति में कवि आत्मकेन्द्रित होता चला जाता है। ‘हत्यारों का गिरोह’ कविता उस षड्यंत्र को नग्न करती है जो संवेदनशून्य-तंत्र नित्य हमारे आस-आस रच रहा है। ‘तुम थे हमारे समय के राडार” कविता में कवि ने समाजवाद के पुरोधा और अपने गुरु किशन पटनायक जी को शिष्य के रूप में तथा अहोभाव से याद किया है।

 

 

कार्यक्रम के आरंभ में संजय गौतम ने बताया कि किस प्रकार राजेन्द्र राजन ने स्वयं को विचारधाराओं और संगठनों की सीमाओं से बचाए रखा और शब्दों के अर्थ को सुनिश्चित करते हुए आज के समय की प्रत्येक मूर्त और अमूर्त घटना और समस्या को पैनी निगाह से देखा है। इसीलिए उनकी कविताएं उद्वेलित करती हैं। कवि एवं आलोचक राम प्रकाश कुशवाहा ने राजेन्द्र राजन की कविताओं पर विशद टिप्पणी की। कार्यक्रम के संचालक अफ़लातून ने छात्र-जीवन मे राजेन्द्र राजन द्वारा लिखी गयी कविताओं का उल्लेख करते हुए बताया कि किस प्रकार उनकी कविताएं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र-आंदोलनों में अपनी भूमिकाएं निभाती रहीं। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए चंचल मुखर्जी ने कहा कि राजन की कविताओं से उन्हें अपने सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यों में सदैव सहयोग मिला है। – राजेश प्रसाद

रामप्रकाश कुशवाहा :

वरिष्ठ कवि ज्ञानेंद्रपति की अध्यक्षता में सम्पन्न सामाजिक परिवर्तन के लिए लिखने वाले अति-महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कवि राजेंद्र राजन की कविताओं का एकल पाठ अस्सी(भदैनी)स्थित तुलसी पुस्तकालय के सभागार में दो अक्टूबर को गाँधी जयंती के दिन संपन्न हुआ..नगर में तीन कार्यक्रमों में बंटे होने के बावजूद पर्याप्त संख्या में साहित्यप्रेमी स्रोतागण राजेन्द्र राजन की कविताएँ सुनने तुलसी पुस्तकालय पहुंचे .इस अवसर पर राजेंद्र राजन नें
अपनी चुनीहुई श्रेष्ठ कविताएँ -‘इतिहास में जगह’, ‘बामियान में बुद्ध’ ,’श्रेय ‘,’हत्यारे ‘ ‘पेड़’,’ विजेता की प्रतीक्षा.’,’इतिहासका नक्शा;,’नयायुग’,’बाजार’ ,’प्रतिमाओं के पीछे’,’लौटना तथा ,’छूटा हुआ रास्ता ‘ आदि का पाठ किया.
श्रोताओं नें राजन की नए ज़माने के कबीर रूप को खूब पसंद किया .उनकी बाजार में खड़े कबीरऔर शेयर बाजार के प्रतीक सांड को आधार बनाकर लिखी गयी कविता बहुत पसंद की गयी..काव्यपाठ के बाद विशेषज्ञ वक्तव्य देते हुए मैंने उन्हें इतिहस के निर्णायक मोड़ों और क्षणों की शिनाख्त करने वाला कवि बताया.उनकी बाजार कविता बाजार की नैतिकता की पड़ताल करती है.शेयर बाजार का प्रतीक-चिन्ह सांड बाजार के अस्थिर चरित्र पर प्रकाश डालता है. बामियान में बुद्ध कविता सौन्दर्य,सम्मान एवं करुणा कीभाषाको मिटाकर हिंसा की लिखी जा रही नयी इबारत को अंकित करती है .अंततःमहत्त्व धर्म के सम्मान का नहीं मनुष्य के सम्मान का है.यह कविता ऐतिहासिक चरित्रों को मानवता के पक्ष में नैतिक मूल्यों के प्रतिमान के रूप में प्रस्तुत करती है.
. राजेंद्र राजन की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति नें कहा कि –
‘राजेन्द्र राजन कविता की कबीरी परंपरा में हैं.वे किसी को भी नहीं छोड़ते हैं-विजेताओं और जनता को भी नहीं छोड़ते -स्वयं को भी नहीं.राजेंद्र राजन के यहाँ कविता आत्मा के रूप में बची हुई है .पेड़ नहीं बन पाने की पीड़ा या अहसास इन की काव्यालोचना को आत्मिक आधार देता है. उनका कवि उस मनुष्य से अलग नहीं है.वह सबसे जुड़ने की आकांक्षा का नाम है.कवि को अपने अंतर्वस्तु पर भरोसा है.. उसे भाषा-बद्धकर पाना उसकी चुनौती है.

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राजेंद्र राजन की कविताएँ-

कविता : पेड़ : राजेन्द्र राजन

छुटपन में ऐसा होता था अक्सर
कि कोई टोके
कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज
इसलिए पेड़ उगेगा तुम्हारे भीतर

मेरे भीतर पेड़ उगा या नहीं
पता नहीं
क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट

लेकिन आज जब मैंने
एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
तो मैंने सुनी अपने भीतर
एक हरी – भरी चीख

एक डरी – डरी चीख
मेरे भीतर से निकली

मेरी चीख लोगों ने सुनी या नहीं
पता नहीं
क्योंकि लोगों के भीतर
मैं पेड़ की तरह उगा नहीं

क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट.

। । इतिहास पुरुष अब आयें। ।

काफ़ी दिनों से रोज़-रोज़ की बेचैनियां इकट्ठा हैं हमारे भीतर
सीने में धधक रही है भाप
आंखों में सुलग रही हैं चिनगारियां हड्डियों में छिपा है ज्वर
पैरों में घूम रहा है कोई विक्षिप्त वेग
चीज़ों को उलटने के लिये छटपटा रहे हैं हाथ

मगर हम नहीं जानते किधर जायें क्या करें
किस पर यकीन करें किस पर संदेह
किससे क्या कहें किसकी बांह गहें
किसके साथ चलें किसे आवाज़ लगाएं
हम नहीं जानते क्या है सार्थक क्या है व्यर्थ
कैसे लिखी जाती है आशाओं की लिपि

हम इतना भर जानते हैं
एक भट्ठी जैसा हो गया है समय
मगर इस आंच में हम क्या पकायें

ठीक यही वक्त है जब अपनी चौपड़ से उठ कर
इतिहास-पुरुष आयें
और अपनी खिचड़ी पका लें-

राजेन्द्र राजन .

संतोष कुमार ,फेसबुक परः

तुलसी पुस्तकालय भदैनी के हाल मे एकाकी पंखा अपनी गति से बल्ब की पीली रोशनी मे राजेन्द्र राजन के शब्दों को इतिहास से लेकर वर्तमान तक बिखेर रहा था। बमियान मे घायल बुद्ध से एक बुर्जग पख्तून से संवाद के बहाने वर्तमान की निर्ममता को उकेरते राजेन्द्र राजन बाजार मे बिकने के लिए विवश कबीर को हाल मे बैठे श्रोतागण के समक्ष दो-चार कर रहे थे । अफलातून ने सुधी श्रोताओ के लिए राजेन्द्र राजन की कविता का एकल पाठ और ज्ञानेन्द्रपति के सभापतित्व का सुनहरा अवसर दिया था । बहुत सारी त्रासदियां और उनके बीच से निकलती उम्मीद की किरणों को टटोलते कवि ने श्रोतागण को इस कदर बांधे रखा कि समय कम पड़ गया । प्रस्तुत है राजेन्द्र राजन की दो कविताएं-
विकास
कम हो रहीं है चिड़ियां
गुम हो रही है गिलहरियां
अब दिखती नही है तितलियां
लुप्त हो रही हैं जाने कितनी प्रजातियां

कम हो रहा है
धरती के घड़े म ेजल
पौधों मे रस
अन्न मे स्वाद
कम हो रही है फलो मे मिठास
फूलों मे खुशबू
शरीर मे सेहत
कम हो रहा है
जमीन मे उपजाऊपन
हवा मे आक्सीजन

सब कुछ कम हो रहा है
जो जरुरी है जीने के लिए
मगर चुप रहो
विकास हो रहा है इसलिए। राजेन्द्र राजन
पेंड़
छुटपन मे ऐसा होता था अक्सर
कि कोई टोके
कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज
इसलिए पेंड़ उगेगा तुम्हारे भीतर
मेरे भीतर पेड़ उगा या नहीं
पता नही
क्योंकि मैने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट
लेकिन आज जब मैने
एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
ते मैने सुनी अपने भीतर
एक हरी भरी चीख
मेरी चीख लोगो ने सुनी या नही
पता नही
क्योेंकि लोगो के भीतर
मैं पेड़ की तरह उगा नही
क्योंकि मैने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट ।

राजेन्द्र राजन

 

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