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Archive for मार्च, 2012

[” मार्क टली भारत में एक परिचित नाम है । वे तीन दशक से ज्यादा समय तक भारत में बीबीसी के संवाददाता रहे हैं । भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किए जा चुके हैं । यह लेख कुछ साल पहले लिखा गया था । भारतीय संस्कृति पर नाज करने वाले मार्क टली ने हाल ही में टीवी पर एक इंटरव्यू के दौरान कारन थापर को जो कुछ कहा , वह गौरतलब है । करन थापर ने गुस्से से पूछा की क्या आप चाहते हैं की हम इस तरह से कपड़ा पहनना छोड़ दें , जमीन पर बैठने लगें ? मार्क टली ने कहा – “नहीं – नहीं , मैं ऐसा नहीं चाहता । मैं आपसे एक बात पूछता हूं कि आप क्या चाहते हैं – असली भारत या नकली अमेरिका ? ” यह सामग्री जिला शिक्षा अधिकार मंच  व्  विद्यार्थी युवजन सभा – जिला होशंगाबाद द्वारा प्रकाशित ‘जागो भारत श्रृंखला ‘ के परचे से साभार ली गई है । ]

दिल्ली में ,जहां मैं रहता हूं उसके आस-पास अंग्रेजी पुस्तकों की तो कई दर्जनों दुकानें हैं , हिंदी की एक भी नहीं । हकीकत यह है की दिल्ली में मुश्किल से ही हिंदी पुस्तकों की कोई दुकान मिलेगी । टाइम्स आफ इंडिया समूह के समाचार पत्र नवभारत टाइम्स की प्रसार संख्या कहीं ज्यादा होने के बावजूद भी विज्ञापन दरें अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले अत्यंत कम है । इन तथ्यों के उल्लेख का एक विशेष कारण है । हिंदी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली पांच भाषाओं में से एक है । जबकि भारत में बमुश्किल पांच प्रतिशत लोग अंग्रेजी समझते हैं ।

कुछ लोगों का मानना है यह प्रतिशत दो से ज्यादा नहीं है । नब्बे करोड़ की आबादी वाले देश में दो प्रतिशत जानने वालों की संख्या १८ लाख होती है और अंग्रेजी प्रकाशकों के लिए यही बहुत है । यही दो प्रतिशत बाकी भाषा – भाषियों पर प्रभुत्व जमाए हुए है । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के इस दबदबे का कारण गुलाम मानसिकता तो है ही , उससे भी ज्यादा भारतीय विचार को लगातार दबाना और चंद कुलीनों के आधिपत्य को बरकरार रखना है ।

इंग्लैण्ड में मुझसे अक्सर संदेह भरी नज़रों से यह सवाल पूछा जाता है की तुम क्यों भारतीयों को अंग्रेजी के इस वरदान से वंचित करना चाहते हो जो इस समय विज्ञान , कम्प्युटर ,प्रकाशन और व्यापार की अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन चुकी है ? तुम क्यों दंभी -देहाती (स्नाब – नेटिव )बनाते जा रहे हो ? मुझे बार – बार बताया जाता है की भारत में संपर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी क्यों जरूरी है, गोया यह कोई शाश्वत सत्य हो । इन तर्कों के अलावा जो बात मुझे अखरती है वह है भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी का विराजमान होना । क्योंकि मेरा यकीन है की बिना भारतीय भाषाओं के भारतीय संस्कृति ज़िंदा नहीं रह सकती ।

कोढ़ में खाज का काम अंग्रेजी पढ़ाने का ढंग भी है । पुराना पारंपरिक अंग्रेज़ी साहित्य अभी भी पढ़ाया जाता है । मेरे भारतीय मित्र मुझे अपने शेक्सपियर  के ज्ञान से खुद शर्मिन्दा कर देते हैं । अंग्रेजी लेखकों के बारे में उनका ज्ञान मुझसे कई गुना ज्यादा है । एन . कृष्णस्वामी और टी . श्रीरामन ने इस बाबत ठीक ही लिखा है जो  अंग्रेज़ी जानते हैं उन्हें भारतीय साहित्य की जानकारी नहीं है और जो भारतीय साहित्य के पंडित हैं वे अपनी बात अंग्रेज़ी में नहीं कह सकते । जब तक हम इस दूरी को समाप्त नहीं करते ,अंग्रेजी ज्ञान जड़विहीन ही रहेगा । यदि अंग्रेजी पढ़ानी ही है तो उसे भारत समेत विश्व के बाकी साहित्य के साथ जोड़िये न की ब्रिटिश संस्कृति के इकहरे द्वीप से ।

चलो इस बात पर भी विचार कर लेते हैं की अंग्रेजी को कुलीन लोगों तक मात्र सीमित करने के बजाय वाकई सारे देश की संम्पर्क भाषा क्यों न बना दिया जाए ? नंबर एक , मुझे नहीं लगता इसमें सफलता मिल पाएगी (आंशिक रूप से राजनैतिक कारणों से भी ) । दो, इसका मतलब होगा भविष्य की पीढ़ियों के हाथ से उनकी भाषा संस्कृति को जबरन छीनना । निश्चित रूप से भारतीय राष्ट्र की इमारत किसी विदेशी भाषा की नींव पर नहीं खड़ी हो सकती है । भारत , अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया की तरह महज भाषाई समूह नहीं है । यह उन भाषाओं की सभ्यता है जिसकी जड़ें इतनी गहरी हैं की उन्हें सदियों की औपनिवेशिक गुलामी भी नहीं हिला पाई ।

संपर्क भाषा का प्रश्न निश्चित रूप से अत्यंत कठिन है । यदि हिन्दी के लंबरदारों ने यह आभास नहीं दिया होता की वे सारे देश पर हिन्दी थोपना चाहते हैं तो समस्या सुलझ गई होती । अभी भी देर नहीं हुई है । हिन्दी को अभी भी अपने सहज रूप में बढाने की जरूरत है और साथ ही प्रांतीय भाषाओं को भी , जिससे की यह भ्रम न फैले की अंग्रेजी साम्राज्यवाद की जगह हिन्दी साम्राज्यवाद लाया जा रहा है । यहाँ सबसे बड़ी बाधा हिन्दी के प्रति तथाकथित कुलीनों की नफरत है । आप बंगाली , तमिल , या गुजराती पर नाज़ कर सकते हैं , पर हिन्दी पर नहीं । क्योंकि कुलीनों को प्यारी अंग्रेजी को सबसे ज्यादा खतरा हिन्दी से है । भारत में अंग्रेजी की मौजूदा स्थिति के बदौलत ही उन्हें इतनी ताकत मिली है और वे इसे इतनी आसानी से नहीं खोना चाहते ।

मार्क टली

 

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मुख्यधारा की राजनीति में तब्दीली लाने की कल्पना कई अराजनीतिक समूह और चुनाव आयोग भी कर लिया करते हैं । खुद राजनीति का हिस्सा न होने के कारण इन जमातों और संस्थाओं में  लोकतंत्र और राजनीति  की बाबत बुनियादी समझदारी का अभाव अक्सर दिखाई देता है । चुनाव आयोग द्वारा  सुधारों की प्रतिमूर्ति के रूप में अब भी याद किए जाने वाले शेषन की भोंडी महत्वाकांक्षा शिव सेना के समर्थन से राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने  में प्रकट हुई थी । भोंडी इसलिए कि नारायण साहब के लिए बन रही सुन्दर सर्वसम्मति में यह दखल थी । पांच राज्यों में हुए हालिया चुनावों के दौरान केन्द्रीय मंत्रियों के साथ आयोग की नोंकझोंक को भी जरूरत से ज्यादा तूल दिया गया । इन सभी ने अपनी सफाई दी  और यह सभी मामले वापिस भी ले लिए गए हैं ।

बहुदलीय – संसदीय – लोकतंत्र में सुधार की चर्चा अक्सर उन समूहों के द्वारा उठाई जाती है जो स्वयं प्रत्यक्षरूप से इस खेल के खिलाड़ी नहीं होते हैं।  जनता इस खेल की सीधे तौर पर भागीदार होती है । टीम अण्णा ने जनता से सभी उम्मीदवारों को अस्वीकृत करने का आवाहन किया था । वाराणसी जिले में डेढ़ सौ लोगों ने इस औजार का इस्तेमाल किया । लोकतंत्र के स्वच्छ करने के लिए टीम अण्णा के आवाहन पर चलने वाले  इन डेढ़ सौ लोगों में से एक सौ तीन मेरे विधान सभा क्षेत्र के मतदाता थे । बाकी के तिरालिस वाराणसी के अन्य सात विधान सभा क्षेत्रों के थे । सभी प्रत्याशियों को अस्वीकृत करने वाले मतों से ज्यादा मत शायद हर  प्रत्याशी पायेगा ।

चुनावों में ‘कीमत अदा की गई खबरों ‘ को रोकने के लिए इस बार आयोग ने जिला – स्तर पर निगरानी समितियां बनाई थीं । एडिटर्स गिल्ड  , प्रेस परिषद् जैसी संस्थाओं ने भी ऐसी खबरों पर चिंता व्यक्त की थी । इस बार इन कदमों से अखबारों द्वारा प्रत्याशियों से की जानी वाली कमाई पर कुछ  अंकुश जरूर लगा परंतु ‘ब्लैक आउट ‘ न किए जाने के लिए मुख्य अखबारों ने  उम्मीदवारों से २५ हजार रुपये लिए ।  घूस न देने वालों को इसका खामियाजा भुगतना ही था । इस मामले में चुनाव प्रेक्षकों की समझ सबसे हास्यास्पद थी । चनाव-खर्च में प्रेस विज्ञप्ति फोटोस्टेट कराने के खर्च को देखकर एक खर्च-प्रेक्षक चौंक उठा । उसने कहा ,’प्रेस विज्ञप्ति क्यों जारी करते हो? यह ‘पेड़ न्यूज ‘ तो नहीं ?’ राजनीति के बारे में सामान्य समझ के अभाव वाली चुनाव मशीनरी , राजनीति से असम्पृक्त और राजनीति-विरोधी  समाज सुधारक और मुख्यधारा की राजनीति  अलग-अलग खाचों में बंटे हुए हैं ,इसलिए  यथास्थिति में तबदीली की आशा नहीं की जा सकती है । चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने वाले दल चुनाव – सुधार का एजेंडा अपनाएं यह जरूरी हो गया है |

मतदान का प्रतिशत  बढ़ने को लेकर आयोग अपनी पीठ ठोंक कर प्रसन्न है । नए परिसीमन के बाद  हुए पहले विधान सभा चुनावों में कितने नागरिक मतदान केन्द्रों से बिना वोट दिए निराश लौटे इसका अंदाज लगाने की चिंता चुनाव आयोग को नहीं है । आयोग द्वारा जारी मतदाता परिचय पत्र लिए यह नागरिक जब मतदाता सूची से अपना नाम ‘विलोपित’ पाते हैं तब उनपर क्या गुजराती है ,सोचिए । उत्तर प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी की वेबसाईट  दावा है  कि इस वेबसाईट पर मतदाता अपना नाम ,परिचय पत्र संख्या से खोज सकते हैं। इस वेबसाईट पर सितम्बर २०११ को प्रकाशित सूची है जबकि चुनाव जनवरी २०१२ को प्रकाशित सूची से कराए गए । इस चूक के कारण ऐसे मतदाता जिन्हें इंटरनेट से मतदाता पर्ची मिली परंतु मूल सूची से वे ‘विलोपित’ थे , मताधिकार से वंचित रहे । पूरे राज्य में मतदाता सूची में सुधार के लिए भरे जाने वाले फार्म इंटरनेट पर चढाने काम निजी कम्पनियों को दिया गया था और वे इसे नहीं कर सकीं । सुधार बीस दिसंबर २०११ तक किए जाने थे । इसके सप्ताह-भर पहले से ही जिले मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाईट से जुड़ ही नहीं पा रहे थे ।  नए मतदाताओं के नाम चढ़े लेकिन पूरे प्रांत में मतदाता सूची में सुधार न हो सका ।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने यह याद  दिलाया है कि चुनाव आचार संहिता राजनैतिक दलों की सहमती से ही बनी थी | मौजूदा क़ानून में दलों द्वारा किए गए चुनाव खर्च की कोई सीमा निर्धारित नहीं है | ऐसे में प्रत्याशी के खर्च की सीमा होना मजाक हो जाता है | व्यक्तिगत  खर्च सीमा से बहुत कम खर्च करने वाले प्रत्याशियों को भी एक पखवारे के प्रचार अभियान में तीन बार प्रेक्षकों के समक्ष खर्च का हिसाब देने के लिए अपने चुनाव एजेंट को भेजना पड़ता है | चुनाव आयोग चाहे तो इस एक पखवारे के लिए हर प्रत्याशी को लेखा-जोखा रखने का प्रशिक्षण प्राप्त हिसाबनवीस मुहैया करा सकता है | सरकार द्वारा चुनाव खर्च किए जाने के आदर्श को हासिल करने की दिशा में यह पहला कदम हो सकता है |

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