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Archive for अगस्त, 2010

इस्लाम ने ब्याजखोरी का भी तीव्र निषध किया है । सिर्फ़ चोरी न करना इतना ही नहीं , आपकी आजीविका भी शुद्ध होनी चाहिए । गलत रास्ते से की गई कमाई को शैतान की कमाई कहा गया है । इसीलिए ब्याज लेने की भी मनाही की गई है । कहा गया है कि सूद पर धन मत दो , दान में दो ।

मोहम्मद साहब को दर्शन हुआ कि ब्याज लेना आत्मा के विरुद्ध काम है । कुरान में यह वाक्य पाँच-सात बार आया है – ” आप अपनी दौलत बढ़ाने के लिए ब्याज क्यों लेते हैं ? संपत्ति ब्याज से नहीं दान से बढ़ती है । ” बारंबार लिखा है कि ब्याज लेना पाप है , हराम है । इस्लाम ने इसके ऊपर ऐसा प्रहार किया है , जैसा हम व्यभिचार या ख़ून की बाबत करते हैं । परंतु हम तो ब्याज को जायज आर्थिक व्यवहार मानते हैं ! वास्तव में देखिए तो ब्याजखोरी, रिश्वतखोरी वगैरह पाप है । ब्याज लेने का अर्थ है , लोगों की कठिनाई का फायदा उठाते हुए पैसे कमाना । इसकी गिनती हम लोग कत्तई पाप में नहीं करते ।

वास्तव में देखा जाए तो अपने पास आए पैसे को हमें तुरंत दूसरे की तरफ़ धकेल देना चाहिए । फ़ुटबॉल के खेल में अपने पास आई गेंद हम अपने ही पास रक्खे रहेंगे , तो खेल चलेगा कैसे ? गेंद को खुद के पास से दूसरे को फिर तीसरे को भेजते रहना पड़ता है , उसीसे खेल चलता है । पैसा और ज्ञान , इन्हें दूसरे को देते रहेंगे तब ही उनमें वृद्धि होगी ।

मेरा मानना है कि ब्याज पर जितना प्रहार इस्लाम ने किया है किसीने नहीं किया है । ब्याज पर इस्लाम ने यह जो आत्यंतिक निषेध किया है , उसको समाज को कभी न कभी स्वीकार करना ही पड़ेगा । वह दिन जल्दी आना चाहिए , हमें उस दिन को जल्दी लाना चाहिए । एक बार ब्याज का निषेध हो गया , तो संग्रह की मात्रा बहुत घट जाएगी । इस्लाम ने ब्याज न लेने का यह जो आदेश दिया है , उसका यदि अमल किया जाए तो पूँजीवाद का ख़ातमा ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाएगा । जिसे हम सच्चा अर्थशास्त्र कहते हैं उसके बहुत निकट का यह विचार है । मुझे लगता है कि साम्यवाद की जड़ का बीज मोहम्मद पैगम्बर के उपदेश में है । वे एक ऐसे महापुरुष हो गये जिन्होंने ब्याज का निषेध किया तथा समता का प्रचार किया । इस उसूल को उन्होंने न सिर्फ़ जोर देकर प्रतिपादित किया बल्कि उसकी बुनियाद पर संपूर्ण इस्लाम की रचना उन्होंने इस प्रकार की , जैसी और किसी ने नहीं की ।

वैसे तो ब्याज लेने की बात पर सभी धर्मों ने प्रहार किया है । हिंदु धर्म ने ब्याज को ’ कुसीद ’ नाम दिया है , यानि खराब हालत बनाने वाला, मनुष्य की अवनति करने वाला । उसके नाम मात्र में पाप भरा है । ब्याज न लेना यह चित्तशुद्धि का काम है , पापमोचन है । ब्याज लेना छोड़ना ही चाहिए । वैसे, ब्याज के विरुद्ध तो सभी धर्मों ने कहा है परन्तु इस्लाम जितनी स्पष्टता और प्रखरता से अन्य किसी ने भी नहीं कहा है ।

जारी

[ अगला : धर्म के मामले में कदापि जबरदस्ती नहीं की जा सकती ।

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आज सुबह से तमाम हत्यारे भाई दिमाग में घूम रहे हैं । अपनी बहन की हत्या करने वाले । पिछले साल भर में ऐसे हत्यारों की तादाद का कोई अन्दाज है ? निश्चित तौर पर अब तक की सर्वाधिक संख्या रही होगी , इस प्रकार के जुर्म करने वालों की। जिनकी बहनों ने अपनी पसंदगी से शादी की , कईयों ने अपने गोत्र में की – यह अपराध उनके भाइयों के आन-बान-शान पर इतना बड़ा धब्बा था कि इन तरुण जोड़ों की जान ले ली जाए ।

आज रक्षा बन्धन के मौके पर समाज में तेजी से बढ़ी इस बीमारी के मद्देनजर लोहिया को याद कर रहा हूँ :

हिन्दुस्तान आज विकृत हो गया है ; यौन पवित्रता की लम्बी चौड़ी बातों के बावजूद , आमतौर पर विवाह और यौन के सम्बन्ध में लोगों के विचार सड़े हुए हैं ।

… नाई या ब्राह्मण के द्वारा पहले जो शादियाँ तय की जाती थीं उसकी बनिस्बत फोटू देख कर या सकुचाती शरमाती लड़की द्वारा चाय की प्याली लाने के दमघोंटू वातावरण में शादी तय करना हर हालत में बेहुदा है। यह ऐसा ही है जैसे किसी घोड़े को खरीदते समय घोड़ा ग्राहक के सामने तो लाया जाए , पर न उसके खुर छू सकते हैं और न ही उसके दाँत गिन सकते हैं ।

..लड़की की शादी करना माँ बाप की जिम्मेदारी नहीं ; अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी शिक्षा दे देने पर उनकी जिम्मेदारी ख़तम हो जाती है । अगर कोई लड़की इधर उधर घूमती है और किसी के साथ भाग जाती है और दुर्घटना वश उसके अवैध बच्चा , तो यह औरत और मर्द के बीच स्वाभाविक सम्बन्ध हासिल करने के सौदे का एक अंग है , और उसके चरित्र पर किसी तरह का कलंक नहीं ।

लेकिन समाज क्रूर है । और औरतें भी बेहद क्रूर बन सकती हैं । उन औरतों के बारे में , विशेषत: अगर वे अविवाहित हों और अलग अलग आदमियों के साथ घूमती फिरती हैं , तो विवाहित स्त्रियां उनके बारे में जैसा व्यवहार करती हैं और कानाफूसी करती हैं उसे देख कर चिढ़ होती है । इस तरह के क्रूर मन के रहते मर्द का औरत से अलगाव कभी नहीं खतम होगा।

….समय आ गया है कि जवान औरतें और मर्द ऐसे बचकानेपन के विरुद्ध विद्रोह करें । उन्हें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि यौन आचरण में केवल दो ही अक्षम्य अपराध हैं : बलात्कार और झूठ बोलना या वादों को तोड़ना । दूसरे को तकलीफ़ पहुँचाना या मारना एक और तीसरा भे जुर्म है,जिससे जहां तक हो सके बचना चाहिए।

…. धर्म , राजनीति , व्यापार और प्रचार सभी मिल कर उस कीचड़ को संजो कर रखने की साजिश कर रहे हैं जिसे संस्कृति के नाम पुकारा जाता है । यथास्थिति की यह साजिश अपने आप में इतनी अधिक शक्तिशाली है कि उससे बदनामी और मौत होगी । मुझे पूरा यकीन है है कि मैंने जो कुछ लिखा है उसका और भी भयंकर बदला चुकाया जाएगा , चाहे यह लाजमी तौर पर प्रत्यक्ष या तात्कालिक भले ही न हो ।

जब जवान मर्द और औरतें अपनी ईमानदारी के लिए बदनामी झेलते हैं , तो उन्हें याद रखना चाहिए कि पानी फिर से निर्बन्ध बह सके इसलिए कीचड़ साफ़ करने की उन्हें यह कीमत चुकानी पड़ती है ।

आज जाति और योनि के इन वीभत्स कटघरों को तोड़ने से बढ़ कर और कोई पुण्यकार्य नहीं है। वे सिर्फ इतना ही याद रखें कि चोट या तकलीफ़ न पहुँचाएँ और अभद्र न हों,क्योंकि मर्द और औरत के बीच का रिश्ता बड़ा नाजुक होता है । हो सकता है,हमेशा इससे न बच पायें। किन्तु प्रयत्न करना कभी नहीं बंद होना चाहिए । सर्वोपरि , इस भयंकर उदासी को दूर करें,और जोखिम उठा कर खुशी हासिल करें ।

१९५३, जनवरी । (जाति-प्रथा,समता विद्यालय न्यास,हैदराबाद)

फैसला करो कि कैसा संसार रचाना है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि सबसे अच्छी बात होगी , नर-नारी के सम्बन्ध में,एकव्रत रहें, यानी एक तरफ़ पतिव्रत और दूसरी तरफ़ पत्नीव्रत । यह सबसे अच्छी चीज है ,लेकिन अगर वह नहीं रहता है तो फिर क्या अच्छी चीज है । आधुनिक दिमाग के सामने एक संकट आ गया है कि जब तक संसार रहेगा, तब तक मनुष्य रहेगा और तब तक यह आफ़त रहेगी कि बलात्कार और व्यभिचार,दो में से कोई एक प्राय: निश्चित ही रहेगा । अब किसको चाहते हो ? बलात्कार को या व्यभिचार को चाहते हो ? जिस समाज में व्यभिचार को इतना ज्यादा बुरा कह दिया जाता है कि उसको पाप सिर्फ़ नहीं नरक(मिलेगा) और उसके लिए यातना सजा ऐसी कि बहुत बुरी बुरी , उस समाज में बलात्कार हो करके रहता है और बहुत अधिक होता है। आधुनिक दिमाग पसंद करेगा वही एकव्रत वाली अवस्था को । कहीं गलत मत समझ लेना कि मैं व्यभिचार पसंद कर रहा हूँ। लेकिन फिर दूसरे नम्बर की चीज में कहेगा कि मनुष्य है ही ऐसा,तो फिर किया क्या जाए ? बलात्कारी से व्यभिचारी अच्छा। यह आगे देखू दृष्टि है ।

१९६२ ,सितम्बर

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इस्लाम का एकेश्वर का संदेश भी बहुमूल्य है । सूफ़ी संत और फ़कीर महाराष्ट्र में भी गाँव – गाँव घूमते हुए, ’ईश्वर एक है ’ कहते रहे । उसी दौर में महाराष्ट्र का एक व्यक्ति पैदल ही निकला और ठेठ पंजाब तक घूम आया । वह पंजाब में बीस साल रहा । वे थे , नामदेव । नामदेव ने भी कहा कि हम भी एक ईश्वर में ही मानते हैं ; परंतु विविध देवताओं की पूजा करते – करते ईश्वर के एकत्व का यह विचार लगभग भुला चुके हैं । इसलिए नामदेव ईश्वर के एकत्व का पुन: प्रतिपादन करने लगे । उन्होंने कहा कि एक बार जब राजा से मुलाकात हो जाती है तब सेवकों को कौन पूछता है ? गणेश ,शारदा आदि तो ईश्वर के सेवक हैं । स्वामी के साक्षात दर्शन हो जाने के बाद चाकरों की क्या जरूरत ? नामदेव ने एक भजन में यह भी कहा कि मन्दिर – मस्जिद दोनों की पूजा छोड़ो तथा जो अंतर्यामी ईश्वर है उसकी तरफ़ रुख़ करो ।

बंगाल में भी इस्लाम और ईसाइयत का बहुत असर था । तब वहां राजा राममोहन राय और देवेन्द्रनाथ टैगोर जैसे लोग खड़े हुए । उन्होंने कहा कि अपने यहाँ भी एकेश्वर की बात कही गई है । श्वेताश्वर उपनिषद में एकेश्वर का प्रतिपादन करने वाले अनेक वचन मिलते हैं । श्वेताश्वर कहता है – ’ एको हि रुद्र: ’। इन लोगों ने श्वेताश्वर उपनिषद का अध्ययन किया । ब्रह्मोसमाज की प्राथना में श्वेताश्वर उपनिषद के कुछ श्लोक भी गाये जाते हैं । ईश्वर ’ एकमेवाद्वितीयम ’ है । ईश्वर एक और अद्वितीय है , उसकी कौन सी उपमा दी जा सकती है? ईश्वर एक ही है। उसके जैसा अन्य कुछ नहीं ।

यह भी पता चलता है कि चैतन्य महाप्रभु हों,कबीर दास हों या गुरु नानक हों सभी के जीवन और चिंतन पर जितना असर वैष्णव धर्म का पड़ा है, उतना ही कुरान का भी पड़ा है ।  नानक ने तो ’जपुजी’ में क़ुरान का उल्लेख भी किया है । सिखों के गुरुग्रंथसाहब में भी गुरुओं की वाणी के साथ ही साथ मुसलमान संत बाबा फ़रीद की वाणी भी है । सभी संतों के हृदय एक होते हैं । गुरु ग्रंथसाहब में ऐसे विचार जगह-जगह देखने को मिल जायेंगे , ’ भले वेद हो या कुरान ,जो सार है तो वह है भगवान का नाम,और उसे हमने लिया है । “

नियमित जकात दो !

इसी प्रकार इस्लाम का एक अन्य संदेश है,जकात का तथा ब्याज के निषेध का । कुरान में आता है,’… व आत ज़ जकात ’ – जकात (नियमित दान ) देना चाहिए । खैरात तथा जकात । खैरात यानि ईश्वर के प्रति प्रेम से प्रेरित हो अनाथ , याचकों आदि को धन देना । जकात यानि नियमित दान । ’ …व मिम्मा रजाक्नाहुम युन्फ़िकून ’ – जो  कुछ भी तेरे पास है , उसमें से दूसरे को देना चाहिए । देना धर्म है तथा यह सब पर लागू होता है , इसलिए गरीब भी दें । देने का धर्म हर व्यक्ति को निभाना है । जो कुछ थोड़ा सा भी मिलता हो उसमें से पेट काट कर देना चाहिए । किसान क्या करता है ? जब फसल आती है तब उसमें से सर्वोत्तम बीज अलग से रख लेता है । अस्गले साल बोने के लिए । खुद के लिए खाने भर का न हो तब यह  बियारण निकाल लेता है,उसे नहीं खाता । देखा जाए तो यह उसकी क़ुरबानी है । इस पर अल्लाह खुश होता है तथा उसे बियारण का दस गुना करके देता है । इसी वजह से हर व्यक्ति को अपना फ़र्ज अदा करना चाहिए ।

पानी से हमे सबक लेना चाहिए । जैसे पानी हमेशा नीचे की तरफ़ दौड़ता है,वैसे ही हमे भी समाज के सबसे दु:खी,गरीब की इमदाद (सहायता ) में दौड़ पड़ना चाहिए । मुझे दो रोटियों की भूख है और मेरे पास एक ही रोटी है तो भी मुझे उसमें से एक टुकड़ा दूसरे को देकर ही ख़ुद खाना चाहिए । इसी में मानवता है । यादि आप ऊपर की तरफ़ देखते रहेंगे तब आपको लगेगा कि मुझे अधिक,और अधिक मिलता रहे । इस प्रकार लोभ लालसा बढ़ाने में मानवता नहीं है । यह मनुष्य के भेष में छुपी हैवानियत है ।

एक और बात भी कही है कि आपने जो बहुत बड़ा संग्रह किया है ,उसमें से देने की बात नहीं है । वैसा संग्रह करना तो मूल रूप में ही पाप माना गया है । आप जिसे ’रिज्क’ यानि रोजी कहते हैं , भगवान की कृपा से जो आपको प्रति दिन मिलती है , उसमें से आपको देना है । यह बात सभी के लिए कही गई है ,मात्र रईसों के लिए नहीं । तथा यह सभी धर्मों ने कही है ।

[ जारी ]

अगली कड़ी -’ब्याजखोरों का तीव्र निषेध ’

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छनकर बचा हुआ तबका  ही उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों तक पहुंच पाता है । शिक्षा के बजट का बड़ा हिस्सा इसी मद में खर्च होता है- छँटे हुओं के लिए । इसके बावजूद यह अपेक्षा की जा रही है कि उच्च शिक्षा के संस्थान और विश्वविद्यालय अपने स्तर पर संसाधन जुटायें ।

देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय (काशी विश्वविद्यालय) में संसाधन जुटाने के तरीकों में जो फर्क आया है उस पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ ।

यह विश्वविद्यालय  इंजीनियरिंग की पढ़ाई देश में सबसे पहले शुरु करने वाले केन्द्रों में से एक है । इसके फलस्वरूप आई.आई.टियों के निर्माण के पहले अधिकांश बड़े इंजीनियरिंग के पदों पर यहीं के स्नातक पाए जाते थे । बनारस के दो प्रमुख उद्योगों के विकास में इस विश्वविद्यालय का हाथ रहा ।

संस्थापक महामना मालवीय के आग्रह पर एक चेकोस्लोवाकियन दम्पति यहां के सेरामिक विभाग से जुड़े़ । इन लोगों ने विश्वविद्यालय परिसर के आस पास के गांवों और मोहल्लों के लोगों को मानव निर्मित मोती बनाने का प्रशिक्षण दिया । प्रशिक्षण पाने वाले न्यूनतम दरजा आठ तक पढ़े थे । आज यह बनारस का प्रमुख कुटीर उद्योग है । एक समूह तो इन मोतियों का प्रमुख निर्यातक बन गया है । इसी विभाग द्वारा उत्पादित चीनी मिट्टी के कप – प्लेट भी काफ़ी पसन्द किए जाते थे । पूर्वी उत्तर प्रदेश में ’भारत छोड़ो आन्दोलन’ के प्रमुख नेता और इस विभाग के शिक्षक राधेश्याम शर्मा ने यह तथ्य मुझे एक साक्षात्कार में बताये थे।

बनारस का एक अन्य प्रमुख लघु उद्योग छोटा काला पंखा रहा है । इसके निर्माताओं ने भी पहले पहल काशी विश्वविद्यालय से ही प्रशिक्षण पाया । इंजीनियरिंग कॉलेज के औद्योगिक रसायन विभाग द्वारा टूथ पेस्ट भी बनाया और बेचा जाता था । विश्वविद्यालय में यह सभी उत्पादन आजादी के पहले हुआ करते थे ।

इस प्रकार इन उत्पादों द्वारा न सिर्फ़ विश्विद्यालय संसाधन अर्जित करता था अपितु बनारसवासियों के लिए  रोजगार के नये और स्थाई अवसर भी मुहैय्या कराता था ।

ग्लोबीकरण के दौर को किशन पटनायक ने एक प्रतिक्रान्ति के तौर पर देखा था । जैसे क्रान्ति जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन लाती है  वैसे ही प्रतिक्रान्ति हर क्षेत्र में नकारात्मक दिशा में ले जाने वाली तब्दीलियाँ लाती है । काशी विश्वविद्यालय के संसाधन अर्जन के मौजूदा तरीकों पर गौर करने से यह प्रतिक्रान्ति समझी जा सकती है ।

विश्वविद्यालय में संसाधन जुटाने का प्रमुख तरीका अब ’पेड सीटों’ वाले पाठ्यक्रम हैं। इन पाठ्यक्रमों में अभिभावकों से भारी फीस वसूली जाती है । इस प्रकार इन पाठ्यक्रमों में दाखिले में छद्म – आरक्षण दिया जा रहा है – सभी जातियों के पैसे वालों को ।

पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बिहार का सबसे बड़ा सर सुन्दरलाल चिकित्सालय- विश्वविद्यालय के आयुर्विज्ञान संस्थान से जुड़ा है । मुष्टिमेय ईमानदार डॉक्टरों को अलग कर दिया जाए तो बाकी सभी प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए बदनाम है । जाहिर है प्रैक्टिस न करने के लिए मिलने वाला भत्ता पाने के बाद भी । पिछले कुछ समय से इस लूट को अधिकृत बनाने के लिए अस्पताल-भवन में ही ज्यादा पैसा देकर मरीज दिखाने की सुविधा दे दी गई है । इस बढ़ी फीस का छोटा हिस्सा विश्वविद्यालय को मिलता है और बाकी डॉक साहबों की जेब में जाता है । प्राइवेट प्रैक्टिस के इस अधिकृत रूप के आने के बाद आम-ओ.पी.डी के मरीजों के प्रति उपेक्षा-भाव बढ़ना लाजमी है ।

दवा कम्पनियां डॉक्टरों को विदेश यात्रायें , चार चकिया वाहन आदि भेंट में देने लगी हैं – जिनके बदले डॉक्टर लगभग हर पर्ची में निर्दिष्ट दवायें लिखते हैं । यह देन-लेन तो डॉक्टरों से निजी स्तर पर हुआ। जाहिर है इस संस्थान के सेमिनार और कॉन्फ़रेंसों के लिए चिकित्सकीय यन्त्र ,दवा बनाने वाली कम्पनियां और निजी पैथेलॉजिकल प्रयोगशालायें – वाहन , खाना-’पीना’, अच्छे होटलों में टिकाने की व्यवस्था घोषित-अघोषित रूप से करती हैं ।

विश्वविद्यालय द्वारा धन कमाई का बदलता स्वरूप दिखाता है कि आजादी के पहले इन प्रयोगों से गरीब नागरिकों को आर्थिक मजबूती मिल रही थी । प्रतिक्रांति के दौर में विश्वविद्यालय की दुनिया से गरीब दो तरीकों से दूर कर दिया गया है । सामान्य मंहगाई के माध्यम से उसकी पहुंच असाध्य हुई है । मंहगाई का एक हिस्सा अप्रत्यक्ष करों के बोझ से उसके कन्धों पर भी आता है।  फीस वृद्धि और निजीकरण ने इस युग के उस नीति को ही पुष्ट किया है – ’समाज के एक छोटे-से छँटे हुए तबके के लिए ही सरकारी सुविधायें हों ’- शिक्षा,स्वास्थ्य,बिजली,पानी सब । सस्ते हो रहे हैं हमारे  जल , जंगल, जमीन, खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधन विदेशी कम्पनियों और बड़े उद्योगपतियों के लिए ।

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इस स्वतंत्रता दिवस पर जब प्रधानमंत्री लाल किले पर तिरंगा झंडा फहरा रहे थे और पूरे देश में खुशियां मनाई जा रही थी, तब राजधानी से मुश्किल सौ कि.मी. दूरी पर किसान परिवार मातम मना रहे थे। पिछली शाम को वहां पुलिस की गोली से तीन किसान मारे गए और दर्जनों घायल हुए। पुलिस का एक जवान भी इस हिंसा में मारा गया। किसानों की जमीन नोएडा (दिल्ली) से आगरा के बीच बन रहे यमुना एक्सप्रेस वे में जा रही है। वे अपनी जमीन का मुआवजा बढ़ाने की मांग कर रहे थे। इस गोलीचालन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके मुआवजे में कुछ बढ़ोत्तरी की घोषणा भी कर दी। क्या यह हमारी सरकारों का नियम ही बन गया है कि जब तक खून-खराबा न हो और दो-चार लोगों की जान न जाए, वह जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं देती ?
यमुना एक्सप्रेसवे उत्तरप्रदेश की मायावती सरकार की दो महत्वाकांक्षी सड़क योजनाओं में से एक है। दूसरी है गंगा एक्सप्रेसवे। नोएडा से आगरा तक 165 कि.मी. की आठ-लेन की सड़क बनाने का ठेका देश की सबसे बड़ी ठेकेदार कंपनी जेपी समूह को दिया गया है। इस में 42 छोटे पुल, 1 बड़ा पुल और एक रेलपुल के साथ 10 टोल नाके होंगे। इतना ही नहीं, इसके साथ आधुनिक सुख-सुविधाओं से युक्त 49 वर्ग कि.मी. में फैली पांच बड़ी नगरीय बस्तियां भी विकसित की जाएगी। इसके किनारे सेज व औद्योगिक कॉम्प्लेक्स भी बनाए जाएंगे। जेपी कंपनी की असली कमाई दिल्ली के नजदीक बनने वाली इस विशाल जमीन-जायदाद में ही है। इस योजना के लिए ली जाने वाली किसानों की जमीन की मात्रा भी इसके कारण काफी बढ़ गई है। इस योजना से नोएडा, ग्रेटर नोएडा, आगरा, मथुरा, अलीगढ़ और हाथरस जिलों के 334 गांवो के करीब 50 हजार किसान प्रभावित हो रहे हैं।
गंगा एक्सप्रेसवे की योजना इससे काफी बड़ी है। नोएडा (दिल्ली) से बलिया तक गंगा किनारे बनाए जाने वाले एक्सप्रेसवे में एक कि.मी. चौड़ी भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा और इसके साथ ही नगरीय बस्तियां, सेज ( विशेष आर्थिक क्षेत्र ), होटल, रेस्तरां, पेट्रोल पंप आदि बनाए जाएंगे। इस का ठेका भी जेपी कंपनी को दिया गया है। ये दोनों एक्सप्रेसवे बनने के बाद संभवतः रिलायन्स और जेपी ये दो कंपनियां इस देश में शहरी जायदाद की सबसे बड़ी मालिक और जमींदार बन जाएंगी। किन्तु बड़ा सवाल यह है कि यदि मात्र 165 कि.मी. के यमुना एक्सप्रेसवे के लिए इतना बड़ा विस्थापन और खून खराबा हो रहा है तो 1047 कि.मी. के गंगा एक्सप्रेसवे में पता नहीं क्या होगा ?

अमीरों की सुविधा के लिए कितना विनाश

यमुना एक्सप्रेसवे के बारे में कहा जा रहा है कि इसके बन जाने से आगरा से दिल्ली पहुंचने में 90 मिनिट की बचत होगी। इसी तरह का तर्क गंगा एक्सप्रेसवे के लिए भी दिया जा रहा है। किन्तु भारी टोल-शुल्क के कारण इन राजमार्गों पर तो मुख्यतः अमीर कार-मालिक ही चल पाएंगे या फिर डीलक्स एसी बसें चलेंगी। क्या देश के मुट्ठी भर अमीरों के ऐश-आराम के लिए, उन्हें जल्दी पहुंचाने के लिए इतने बड़े पैमाने पर कृषि भूमि को नष्ट करना और किसानों को बेदखल करना जरुरी है ? पिछले कुछ सालों से देश में राजमार्गों और एक्सप्रेसमार्गों के ताबड़तोड़ निर्माण और विस्तार का एक पागलपन चल रहा है, जिस पर पुनर्विचार करने का वक्त आ गया है।
देश का पहला एक्सप्रेस-मार्ग संभवतः मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे था जो 2001 में बनकर पूरा हुआ। यह 94 कि.मी. लंबा है और इस पर 2136 करोड़ रु. खर्च हुए। इसमें भी कई गांवो और आदिवासियों की जमीन गई और यह शुरु से विवादास्पद रहा। चूंकि मुंबई व पुणे के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग नं० 4 का पुराना रास्ता भी चालू रहा, कई वर्षों तक एक्सप्रेसवे पर चलने वाली गाड़ियों की संख्या उम्मीद से कम रही। इसे बनाने वाला महाराष्ट्र सड़क विकास निगम काफी घाटे व करजे में आ गया। तब 2004 में इसे तथा राष्ट्रीय राजमार्ग नं० 4 दोनों को एक निजी कंपनी को दे दिया गया। देश में राजमार्गों का यह पहला निजीकरण था। किन्तु इसने मुंबई और पुणे के बीच यात्रा करने वालों को स्थायी रुप से दो हिस्सों में बांट दिया। अमीरों के लिए जनसाधारण से अलग सड़क बन गई।

अमीर अलग, गरीब अलग

अमीरों और साधारण लोगों में तेजी से बढ़ता अलगाव और बढ़ती खाई उदारीकरण के इस जमाने की खासियत है। एक्सपे्रस मार्गों और राजमार्गों पर तो बैलगाड़ियां व साईकिलें चल भी नहीं सकती है। ऐसे कई मार्ग जमीन से काफी ऊपर उठे रहते हैं, तथा उनके दोनों तरफ दीवालें बना दी जाती हैं, ताकि कोई स्थानीय गांववासी, पशु या वाहन उनमें घुसकर अमीरों की यात्रा में खलल न डाले। इन राजमार्गों से अक्सर गांवो को आपसी आवागमन मुश्किल हो जाता है। किसानों को अपने घर से खेत तक बैलों या ट्रैक्टर से जाने के लिए काफी घूम कर जाना पड़ता है।
देश में जहां भी एक्सप्रेसवे बन रहे हैं या राजमार्गों का चैड़ीकरण हो रहा है या उनके लिए नए बायपास बन रहे हैं, स्थानीय लोगों के लिए संकट आ रहा है तथा विरोध हो रहा है। सड़कों के कारण इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा, पहले कभी सोचा भी नहीं जा सकता था। बंगलौर-मैसूर एक्सप्रेसवे के खिलाफ किसानों का आंदोलन पिछले तीन सालों से चल रहा है। पूरे केरल को दो भागों में बांटने वाले दो मीटर ऊंचे केरल एक्सप्रेसवे के खिलाफ भी जोरदार जन आंदोलन खड़ा हो गया है। कई जगह गांववासियों, विधायकों और विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि 60 मीटर यानी 200 फीट चैड़ी सड़क बनाने की क्या जरुरत है ? हमारे मंत्री और अफसर शायद संयुक्त राज्य अमरीका की सड़कें देखकर आए हैं, तथा उसकी नकल करना चाहते हैं। किन्तु वे यह भूल गए हैं कि अमरीका में आबादी का घनत्व काफी कम है तथा जमीन बहुतायत में उपलब्ध है। नकल में अकल लगाने की जरुरत उन्होंने नहीं समझी।

राजमार्ग निर्माण सर्वोच्च प्राथमिकता

पिछले पांच-छः वर्षों से भारत सरकार देश के कई अन्य जरुरी कामों को छोड़कर सिर्फ सड़कें राजमार्ग और एक्सप्रेसवे बनाने में लगी है। और देश के संसाधनों का बड़ा हिस्सा उसमें लगा दिया है। छः वर्ष पहले ‘राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम‘ शुरु किया गया तथा उसे क्रियान्वित करने के लिए ‘भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण’ बनाया गया। ‘सुनहरा चतुर्भुज’ यानी देश के चारों महानगरों – दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चैन्नई को जोड़ने वाले राजमार्गों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। फिर उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम कोरिडोर और बंदरगाहों को जोड़ने वाले मार्गों को 4 लेन या 6 लेन मार्ग बनाने का काम किया गया। इसके अतिरिक्त, देश के सारे राष्ट्रीय राजमार्गों को चार लेन या मानक दो लेन बनाने का काम भी चल रहा है। देश के कई हिस्सों में ‘फोर लेन’ तथा ‘बायपास’ के अंग्रेजी शब्द आम बोलचाल में आ गये हैं। नबंवर 2009 तक सब मिलाकर 33,642 कि.मी. राजमार्ग निर्माण या उन्नयन के लक्ष्य में से 12,531 कि.मी. चार लेन बनाया जा चुका था और 5,995 कि.मी. पर काम चल रहा था। अब अगले पांच वर्षों में 7000 कि.मी. प्रतिवर्ष की दर से 35,000 कि.मी. राजमार्ग बनाने का लक्ष्य तय किया गया है। जमीन अधिग्रहण के काम में तेजी लाने के लिए देश में 192 विशेष भूमि-अधिग्रहण इकाईयां बनाई जा रही है।
एक्सप्रेस-मार्ग निर्माण का भी महत्वाकांक्षी कार्यक्रम हाथ में लेते हुए 2022 तक तीन चरणों में देश में 18,637 कि.मी. एक्सप्रेस-मार्ग बनाने का लक्ष्य रखा गया है। एक ‘राष्ट्रीय एक्सप्रेस-मार्ग नेटवर्क’ बनाने की योजना है। ‘भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण’ में एक एक्सप्रेस-मार्ग विभाग बनाया गया है तथा अलग से ‘भारतीय एक्सप्रेस-मार्ग प्राधिकरण’ बनाने पर भी विचार किया जा रहा है।

विकास माने सिर्फ सड़कें

इनके अलावा उत्तर-पूर्व के राज्यों में सड़क विकास का एक विशेष कार्यक्रम लिया गया है, जिसमें 5,184 कि.मी. राष्ट्रीय राजमार्गों तथा 4,756 कि.मी. प्रांतीय राजमार्गों को चार-लेन या दो-लेन या उन्नत करने का लक्ष्य रखा गया है। वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में सड़के बनाने के लिए 1900 करोड़ रु. का एक कार्यक्रम अलग से लिया गया है। आन्ध्रप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा और उत्तरप्रदेश के आठ राज्यों के 33 जिलों में 1202 कि.मी. राष्ट्रीय राजमार्ग तथा 4362 कि.मी. प्रांतीय राजमार्ग को इसमें शामिल किया गया है। ऐसा लगता है कि सरकार ने हर समस्या का समाधान सड़क निर्माण ही समझ लिया है।
यही बात भारत के गांवों के मामले में लागू होती है। ‘प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना’ के तहत पिछले पांच वर्षों में (दिसंबर 2009 तक) 50,000 करोड़ रु. से ज्यादा लागत की 1,83,510 कि.मी. सड़के बनायी जा चुकी है। किन्तु दूसरी ओर गांव-विरोधी व खेती-विरोधी विकास एवं आर्थिक नीतियों के कारण गांवों में गरीबी, बेकारी, कुपोषण, शिक्षा-स्वास्थ्य की बिगड़ती हालत आदि से मुर्दानगी छाई हैं। ऐसी हालत में ये सड़कें सिर्फ देशी-विदेशी कंपनियों के सामानों की गांवों में घुसपैठ व बिक्री बढ़ाने तथा गांवों से सस्ता मजदूर शहरों में लाने का जरिया ही बन रही है। शायद यही सरकार की विकास नीति का अभीष्ट भी है।

जनता पर तिहरा बोझ

बेतहाशा सड़कें, राजमार्ग और एक्सप्रेसमार्ग बनाने के लिए पैसा कहां से आ रहा है ? खुद जनता की जेब से। रोड टैक्स तथा अन्य करों के अलावा पिछले कई सालों से भारत सरकार ने पेट्रोल एवं डीजल पर 2 रु. प्रति लीटर का अधिभार लगा रखा है। इस अधिभार से संग्रहित विशाल राशि का बड़ा हिस्सा ‘राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम’ के लिए दे दिया जाता है। इसके अतिरिक्त विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक तथा जापान भी भारत में राजमार्गों के विकास के लिए कर्ज दे रहे हैं। कर्ज की राशि कुल खर्च का बहुत बड़ा हिस्सा नहीं होती है, किन्तु उससे भारत की नीतियों और प्राथमिकताओं को तय करने और बदलने का अधिकार इन विदेशी ताकतों को मिल जाता है। ‘पीपीपी’ यानी निजी-सरकारी भागीदारी और ‘बीओटी’ यानी ‘बनाओ-चलाआ-कमाआ-वापस कर दो’ जैसी योजनाएं व तरकीबें उनके जरिये ही भारत में आई हैं, जिनसे भारत के सड़क क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजी कंपनियों का पदार्पण हुआ है। यमुना एक्सप्रेसवे जैसे हादसे इसी नीति की देन है। दूसरी ओर अब लगभग हर सड़क पर चलने का टोल शुल्क कदम-कदम पर देना पड़ता है। एक तरह से भारत के लोग अब सड़कों पर चलने के लिए तिहरा शुल्क दे रहे हैं – रोड टैक्स, पेट्रोल डीजल पर अधिभार तथा टोल टैक्स।
निजीकरण से अब सरकार विदेशीकरण की ओर जाना चाहती है। भारत सरकार के भूतल-परिवहन मंत्री श्री कमलनाथ ने पिछले एक साल में यूरोप, अमरीका और सिंगापुर की यात्राएं करके विदेशी कंपनियों को भारत के राजमार्गों में पूंजी लगाने  और कमाने का न्यौता दिया। आम तौर पर राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने के लिए सौ-सौ कि.मी. के टुकड़ों का ठेका दिया जाता है। किन्तु विदेशी कंपनियों को एकाधिकारी सुविधा देने के लिए अब 400 से 500 कि.मी. के महा-प्रोजेक्ट बनाए जा रहे हैं, जिनकी लागत करीब 100 करोड़ डॉलर या 5000 करोड़ रु.से कम नहीं होगी। ऐसी हालत में, भारत के सड़क-निर्माण में बड़े-बड़े ठेकेदार और कंपनियां भी प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएंगें। भारत की सड़कों पर विदेशी महा-कंपनियों का कब्जा हो जाएगा।

असली हित वाहन कंपनियों का

भारत के राजमार्गों के निर्माण में जापान की रुचि व भागीदारी का कारण भी समझा जा सकता है। भारत के वाहन उद्योग में जापान की अनेक कंपनियां मौजूद हैं, जैसे सुजुकी, यामाहा, होण्डा आदि। भारत का ऑटो-वाहन उद्योग काफी हद तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे में है। जितने राजमार्ग बनेंगे और सड़कें चिकनी बनेगी, उतनी ही ज्यादा उनकी बिक्री बढ़ेगी। भारत में पिछले कई सालों से वाहनों का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है और मंदी का भी कुछ खास असर उन पर नहीं पड़ा है। सबसे ज्यादा प्रगति कारों और मोटरसाईकिलों में हुई है, जिनकी बिक्री 20 से 25 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है। दूसरी ओर जिस शानदार साईकिल उद्योग में भारत दुनिया में अग्रणी हुआ करता था, उसका उत्पादन नीचे जा रहा है। भारत की वाहन क्रांति दरअसल ‘कार क्रांति’ बन कर रह गई है। एक तरह से देखा जाए तो भारत के राजमार्गों व एक्सप्रेस मार्गों का विकास भी भारत की आम जनता के लिए न होकर इन वाहन कंपनियों की सेवा में ही समर्पित है। इससे भारत की राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर के आंकड़े जरुर अच्छे दिखाई दे रहे हैं जिनसे मनमोहन सिंह या मोंटेक सिंह खुश हो सकते हैं। किन्तु भारत की आम जनता के लिए यह विकास विस्थापन, विकृतियों, विनाश और विषमता की नई त्रासदियां पैदा कर रहा है।
( ईमेल – sjpsunil@gmail.com )

———–00———–

लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।

सम्पर्क :
ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111 मोबाईल 09425040452

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दिसम्बर २००३ में अंग्रेजी का पहला ब्लॉग शुरु किया था , ब्लॉगर पर । तब ब्लॉगर को गूगल ने खरीदा नहीं था । मित्रों की प्रेरणा से १५ अगस्त २००६ को जिस दल से मैं जुड़ा हूँ ,समाजवादी जनपरिषद ,के नाम से पहला हिन्दी ब्लॉग शुरु किया । फिर कुछ समय बाद शैशव और यही है वह जगह शुरु किए । फिर सुरे-बेसुरे गीतों के पॉडकास्टिंग – वॉडकास्टिंग का चिट्ठा आगाज़ भी शुरु किया।

उत्साह और आलस के उतार – चढ़ाव के साथ आज मेरे हिन्दी चिट्ठेकारी के चार साल पूरे हुए । संख्यिकी का छात्र था इसलिए आँकड़ों और सारिणियों में रुचि है । इन चार सालों के तजुर्बे को सारिणियों में प्रस्तुत हैं । वर्डप्रेस के चिट्ठों में बिना बाहरी सॉफ़्टवेयर के ये आँकड़े चिट्ठास्वामी को उपलब्ध होते हैं । गौर कीजिएगा , ये आँकड़े इतने नीरस और निर्जीव नहीं है । मेरे पाठकों ने किन पोस्टों को कितना पसंद किया ; सर्च इंजनों में किन शब्दों को खोजते हुए पाठक मेरे चिट्ठों पर पहुँचे ; किन ब्लॉग-संकलकों , वेबसाइटों में दी गई इन चिट्ठों की कड़ी के जरिए पाठकों का आगमन हुआ ,मेरे चिट्ठों से विदा होकर कहाँ गए- यह विभिन्न सारणियों में प्रस्तुत है ।

कितनी बार देखे गए :

समाजवादी जनपरिषद ६१,९८५                                यही है वह जगह ४५,५२१

व्यस्ततम दिन में                     ३७९                                    व्यस्ततम दिन             २४०

कुल पोस्ट                                    ३१९                                    कुल पोस्ट                     २१२

कुल टिप्पणियां                          १५,७७                                कुल टिप्पणियां            १,१४१

शैशव ३७,८५६

व्यस्ततम दिन                            १५८

कुल पोस्ट                                     १६९

कुल टिप्पणियाँ                            ८७०

तीनों चिट्ठों का योग कुल कितनी बार देखे गये  १,४५,३६२

कुल पोस्ट       ७००

कुल  टिप्पणियां  ३५८८

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[ गुजराती पत्रिका ’ भूमिपुत्र’ में विनोबा भावे के इस्लाम की बाबत विचार प्रकाशित हो रहे हैं । आशा है इस विषय पर समझदारी बनाने में इन से मदद मिलेगी । अफ़लातून ]

यह निर्विवाद हकीकत है कि आरंभिक जमाने में इस्लाम का प्रचार त्याग और कसौटी पर ही हुआ । प्रारंभ में इस्लाम का प्रचार तलवार से नहीं , आत्मा के बल से हुआ । कार्लाइल ने कहा है कि प्रारंभ में इस्लाम अकेले पयगंबर मोहम्मद के हृदय में ही था , न ? तब क्या वे अकेले तलवार लेकर लोगों को मुसलमान बनाने निकले थे ? इस्लाम का प्रचार-प्रसार उन्होंने आत्मा के बल से किया था । सभी प्रारंभिक खलीफ़ा भी धर्म-निष्ठ थे तथा उनकी धर्म-निष्ठा के कारण ही इस्लाम का प्रचार हुआ ।

इस्लाम का मतलब ही है शांति तथा ईश्वर-शरणता । इसके सिवा इस्लाम का कोई तीसरा अर्थ नहीं है । इस्लाम शब्द में ’सलम’ धातु है । जिसका अर्थ है शरण में जाना । इस धातु से ही ’सलाम’ शब्द बना है। सलाम का मतलब शान्ति । इस्लाम का अर्थ पर्मेश्वर की शरण में जाना । परमेश्वर की शरण में जाइएगा तो शान्ति पाइएगा ।

मानव – मानव का नाता बराबरी का है

इस्लाम में सूफ़ी हुए । सूफ़ी यानी कुरान का सूक्ष्म अर्थ करने वाले । भारत में इस्लाम का प्रथम प्रचार सूफ़ियों ने किया । इस वास्ते ही इस्लाम भारत में लोकप्रिय बना । मुस्लिम राजा या लुटेरे तो बाद में आये  , आउर वे आए और लौट गये । परंतु सूफ़ी फ़कीर यहाँ आए और देश भर में घूम कर प्रचार किया । इस्लाम में एक प्रकार का भाईचारा मान्य है । इस्लाम धर्म की यह भाईचारे की भावना हम सब को अपना लेनी चाहिए । यहाँ की ब्रह्मविद्या उससे मजबूत होगी ।

’ सब में एक ही आत्मा बसती है’ – यह कहने वाले हिंदू धर्म में अनेक जातिभेद , ऊँच-नीच के भेद तथा अन्य अनेक प्रकार के भेदभाव हैं । हमारी सामाजिक व्यवस्था में समानता की अनुभूति नहीं होती है । यह एक बहुत बड़ी विसंगति है , विडंबना है ।  जबकि इस्लाम में जैसे एकेश्वर का संदेश है , वैसे ही सामाजिक व्यवहार में संपूर्ण अभेद का भी संदेश है । इस्लाम कहता है कि  , मानव – मानव के बीच किसी प्रकार का भेद नहीं करना चाहिए , मानव – मानव का नाता बराबरी का है । इस्लाम की इस बात का असर भारत के समाज पर पड़ा है ।  हमारे यहाँ जो कमी थी उसको इस्लाम ने पूरा किया । खास तौर पर फ़कीरों और सूफ़ी संतों ने जो प्रचार किया उसका यहाँ बहुत असर पड़ा । कई संघर्ष हुए , लड़ाइयां हुईं, इसके बावजूद बाहर से आई एक अच्छी और सच्ची चीज का यहाँ के समाज पर गहरा असर पड़ा । इस्लाम का यह संदेश बहुत पवित्र संदेश है । [ जारी ]

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