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Archive for अगस्त, 2009

        पिछले भाग : एक , दो

    भारतीय समाज में ऐसी कोई बनी – बनाई संस्कृति नहीं है जो इस शून्य को पूरा कर सकेगी । आपका एक सरल विश्वास है कि भारत के ग्रामीण समाज में भारतीय संस्कृति है । भारतीयता के नाम पर जो भी इस वक्त बचा हुआ है , वह एक विकृति है । अगर तपस्या करने का इरादा न हो तो आप जैसे भारतीयतावादी भी बिहार या ओड़िशा के किसी गाँव में एक साल लगातार नहीं रह सकेंगे । आप कहते हैं कि पर्दा – प्रथा भारतीय नहीं है । यह तो आप और हम मानते हैं । पूर्वी उत्तर प्रदेश की किसी ग्रामीण महिला से पूछिए – पर्दा – प्रथा और चूड़ियों को छोड़कर वह भारतीयता की कल्पना नहीं कर सकती है । अगर आप इन चिह्नों को मिटाना चाहेंगे तो वह कहेगी कि आप ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा प्रभावित हैं । पर्दा – प्रथा , चूड़ियाँ , अस्पृश्यता , जाति – प्रथा , सती – प्रथा –  यही तो भारतीयता है , भारतीय ग्रामीणों की नजर में । जिस भारतीयता की आप कल्पना करते हैं वह समाज में नहीं है , हमारे खून में या अवचेतन में है , इतिहास में है । हम उसका उद्धार कर सकते हैं बशर्ते कि हम इन विकृतियों से लड़ सकें । विकृतियों से लड़कर ही हम एक नई भारतीयता का सृजन कर सकेंगे । हम अपनी विकृतियों को जानेंगे कैसे ? यहाँ पर हमे यूरोपीय कसौटी पर परीक्षा देनी पड़ेगी । यह इतिहास का नियम है कि एक सभ्यता बनती है , बिगड़ती है और खतम होने के पहले मानव समाज को कुछ मूल्य दे जाती है । संकट के काल में एक सभ्यता के मूल्यों को दूसरी सभ्यता के मूल्यों से परखा जाता है । भारतीय संस्कृति की सारी उपलब्धियों के बावजूद उसमें व्यक्ति की गरिमा या मानव सेवा की परम्परा नहीं है ( न होने के कुछ अच्छे कारण भी रहे होंगे ) । बौद्ध परम्परा को छोड़कर मानव सेवा की वृत्ति भारत में नहीं है । ब्राह्मणवादी हिन्दू परम्परा में यह बिलकुल नहीं है । आपको एक भी पौराणिक नायक , राजा या ऋषि नहीं मिलेगा , जिसने किसी पतित आदमी को , छोटे आदमी को , पापी आदमी को , महामारी से ग्रस्त आदमी को गले लगाकर , गोद में लिटाकर उसकी सेवा की हो । भारतीय संस्कृति की इस मौलिक कमी के परिणामस्वरूप भारतीय समाज में अस्पृश्यता से लेकर सती दाह तक की गलत प्रथायें बनी हुई हैं । इस कमी के विरुद्ध बुद्ध का एक प्रयास था । बुद्ध का प्रभाव मिट गया । विवेकानन्द और गाँधी का प्रभाव भी क्षीण हो चला है । हमारी महान संस्कृति की गहराई में ऐसी एक कमी क्यों रह गयी ? यही तो इतिहास की विचित्रता है ।

    रामकृष्ण परमहंस कई अर्थों में एक नवीन भारत के धार्मिक संस्थापक थे । विवेकानन्द और केशवचन्द्र सेन के माध्यम से उन्हें पश्चिम का स्पर्श मिला होगा । उनका तरीका बौद्धिक नहीं था , अलौकिक था । उनके सन्देश सांकेतिक थे । उनके जीवन प्रसंगों में ही उनका सन्देश निहित था । उनके जीवन के चार प्रसंगों को हम लें । अपने प्रियतम शिष्य को उन्होंने मोक्ष के लिए नहीं , समाज जागरण के काम में लगाया । खुद हिन्दू मन्दिर का पूजक होकर इस्लाम और ईसाई धर्म की भी साधना की । चांडालों के घरों में जाकर झाड़ू लगाई और उनका पाखाना साफ़ किया ।  पत्नी को संन्यासिनी किया और विधवा को सुहागिन बनाया । भारतीयता के पुनर्जागरण के लिए ये सारे संकेत थे – समाज सुधार को प्राथमिकता देना , गैर भारतीय संस्कृति के मूल्यों का आदर करना और अपनाना , मनुष्य की गरिमा को स्वीकृति देना , नारी जीवन को स्वतंत्र और सकरात्मक बनाना । शारदा देवी के प्रसंग में दोनों बातें ध्यान देने योग्य हैं – पति के साथ संन्यासिनी और पति के बाद सुहागिन ।

किशन पटनायक ,  १ जनवरी १९८८.

   

   

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प्रथम भाग से आगे :

    भारतीयता के अलग – अलग युग हुए हैं और इनमें नारी जीवन के अलग-अलग मूल्य बने हैं । इनके अनुसार अलग – अलग प्रथायें भी प्रचलित हुईं हैं । आज का भारतीय अपने ही इतिहास से किसी एक परम्परा को बनाए रखने के लिए कुछ अन्य परम्पराओं को तथा प्रथाओं को ठुकरायेगा ही । सती – प्रथा भारतीय – समाज के कुछ ही इलाकों में , कुछ ही कालखण्डों में प्रचलित प्रथा है । इसलिए कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति की जो स्वस्थ मुख्यधारा रही है उससे इसका तार्किक मेल नहीं है । जिन दिनों हिन्दू समाज में पुरुषार्थ इतना घट गया था कि अपने मुल्क या अपने धर्म की रक्षा करने के लिए सामर्थ्य नहीं रह गया था , जिन दिनों राजपूत रमणियों के पास आत्महत्या के अलावा सम्मान – रक्षा का कोई उपाय नहीं बच गया था , सती – प्रथा को उन्हीं दिनों गौरव प्राप्त हुआ था । उसके पहले सिर्फ निकृष्ट व्यक्ति और निकृष्ट संस्कृति के सन्दर्भ में सती – प्रथा का उल्लेख है । रामायण की सती अयोध्या में नहीं लंका में है । कुन्ती सती नहीं होती है , माद्री होती है । आपने अपने ही लेख में लड़कियों के पैदा होते ही मार दिए जाने की घटना को शर्मनाक और राजपूतों की कायरता की निशानी कहा है । अपनी बेटियों के मान – सम्मान की रक्षा का आत्मविश्वास उनमें नहीं था । सती – प्रथा पर भी ठीक वही बात लागू होती है , क्योंकि कायरता के जमाने में ही पद्मिनी को आदर्श नारी माना गया है ।

    भारतीय समाज में  सिद्धान्त और आचरण की दूरी शायद दूसरे समाजों की तुलना में ज्यादा है । आपने ऐसे सिद्धान्तों का हवाला दिया है जिन पर अमल नहीं होता है या किसी एक जमाने में सम्भवत: उन पर अमल होता हो जबकि अधिकांश कालावधि में उनसे विपरीत व्यवहार चला है । आपने पंचकन्याओं का उल्लेख कर कहा है कि नारी के सम्बन्ध में भारतीय दृष्टिकोण कितना उदार और विज्ञान सम्मत है । लेकिन क्या आपने कभी हिन्दू परिवार में किसी को कहते हुए सुना है कि अमुक स्त्री द्रौपदी जैसी या कुन्ती जैसी या अहिल्या जैसी सती-साध्वी है ? वाल्मीकि रामायण और महाभारत के बाद नारी का इस प्रकार का आदर्श न पुराणों में है , न किस्सों-कहानी में है , न कथोपकथन में है । भारतीय नारी का वह स्वर्ण युग खतम हो गया है । उसके बाद के कालों की जो भारतीयता हमारे सामने है , उसमें नारी का सामाजिक मूल्य भिन्न प्रकार का हो गया है । यह शायद सर्वसम्मत है कि उपनिषद और महाभारत के बाद भारतीय नारी का अवमूल्यन होता रहा । वाल्मीकि की सीता असभ्य कट्टर राम की आलोचना करती है । तुलसी की सीता के मुँह से ऐसी आलोचना निकल नहीं सकती है । पंचकन्या को सती माननेवाला समाज और सती की पूजा करनेवाला समाज दो अलग – अलग दृष्टिकोणों की उपज हैं । दो भिन्न संस्कृतियाँ हैं । आप जब भारतीयता के बारे में लिखते हैं तब उपनिषद , गौतम बुद्ध , महाभारत , मनुस्मृति , तुलसीदास और मुगलकालीन राजपूत समाज , इन सबको एक ही संस्कृति मान लेते हैं । एक  ही सभ्यता की कुछ मौलिक धारणायें इन सबके पीछे कड़ी के तौर पर रही होंगी । लेकिन आचरण , प्रथा , पुरुषार्थ , दृष्टिकोण , मान्यताएँ अलग – अलग हैं । एक दूसरे के विपरीत भी हैं । भारतीयता के किसी एक युग या एक स्थल के सिद्धान्त को बताकर भारतीयता के किसी दूसरे युग या स्थल की मान्यताओं के पक्ष में बहस करना तर्क की बहुत बड़ी ग़लती होगी । वर्णाश्रम और जाति-प्रथा का फर्क काफ़ी सूक्ष्म है । फिर भी जाति प्रथा के पक्ष में बहस करने के लिए वर्णाश्रम के सिद्धान्त को बताना तर्क की ग़लती होगी ।

    आप पश्चिमी   संस्कृति और भारतीय संस्कृति की तुलना करते हैं , इस प्रकार की गलतियाँ बार – बार होती हैं । भारतीय संस्कृति की कुछ अवधारणायें जरूर ऐसी हैं जो दुनिया में श्रेष्ठ हैं और मानव संस्कृति के नवनिर्माण के लिए आधार बन सकती हैं । लेकिन आपकी दृष्टि में भारतीय संस्कृति में सब कुछ अच्छा है , युरोपीय संस्कृति में सब कुछ तुच्छ है । भारतीय नारी के बारे में आप चुन चुन कर ऐसी बातें निकालते हैं जो श्रेष्ठ हैं और वे ज्यादातर तो सिद्धान्तरूप में हैं , व्यवहार में नहीं हैं ( जैसी पंचसती का श्लोक ) । नारी के सम्बन्ध में जो प्रतिकूल बाते हैं , श्लोकों से लेकर कहावत तक ,  उसका आप उल्ले नहीं करते । जिन श्लोकों में और कहावतों में कामुकता का स्रोत नारी को ही माना गया है  , पराधीनता नारी की स्वाभाविक स्थिति मानी गयी है ,  उनको आपने छोड़ दिया है । दूसरी ओर युरोपीय समाज की जो खास उपलब्धियाँ हैं उनको आप छोड़ देते हैं और वहाँ की निकृष्ट बातों का जिक्र करते हैं । कैथलिक संन्यासिनियों की परम्परा को आपने बिलकुल नजरअन्दाज कर दिया है । संयुक्त परिवार को आपने भारतीय विशेषता मान ली है , जब कि यह यूरोप तथा सारी दुनिया में प्रचलित था ।

    आधुनिकतावाद और युरोपीय संस्कृति दो अलग – अलग चीजें हैं । आप दोनों को एक मान रहे हैं । युरोपीय संस्कृति की अपनी जड़ें हैं जबकि आधुनिकतावाद जड़विहीन है । पश्चिम की प्रभुता और समृद्धि से प्रभावित होकर गैरयूरोपीय बुद्धिजीवियों ने उसका अनुकरण किया है । हीन – भावनाग्रस्त होकर , अपनी भाषाओं को छोड़कर , अपने इतिहास को बाजू में रखकर उन्होंने एक नकली संस्कृति का निर्माण किया है । यही आधुनिकतावाद है । यूरोपीय संस्कृति में फ्रांस या जरमनी में आप कल्पना कर नहीं सकते कि किसी विदेशी भाषा को राष्ट्रीय कार्यकलाप , अनुसन्धान और शिक्षा का माध्यम बनाया जाए । पश्चिमी समाज अभी भी नये नये सत्यों और तथ्यों का अनुसंधान करता है । नए सत्यों का उद्घाटन , नए प्रतिपादनों की स्थापना , मौलिक यन्त्रों का निर्माण आधुनिकतावाद की क्षमता के बाहर है । आधुनिकतावाद विकासशील देशों की संस्कृति है ,  यूरोप की नहीं । यूरोपीय समाज और आधुनिकतावादी समाज में काफ़ी सामंजस्य है , कारण आधुनिकतावादी समाज उस सारे सामान , तरीकों और धारणाओं का इस्तेमाल करता है जिनकी उत्पत्ति पश्चिम में हुई है । इस बाह्य सामंजस्य के तले जो आधुनिकतावाद की असलियत है , वह एक नकलची और गुलामों की संस्कृति है ।

    यूरोपीय संस्कृति का विकास भारत जैसा लम्बा या पुराना नहीं है , इसका पतन भी शुरु हो चुका है । प्रभुता और यान्त्रिक सम्रुद्धि को छोड़कर उसमें और कोई प्रभावशाली गुण नहीं रह गया है । लेकिन उसके पूरे इतिहास को देखें तो मानव समाज के लिए उसके कई महत्वपूर्ण योगदान हैं । जिन मुद्दों पर उसका योगदान है उन बातों में भारतीय संस्कृति में कमियाँ पाई जाती हैं । व्यक्ति की गरिमा , जिसका आपने कई बार जिक्र किया है , एक यूरोपीय अवधारणा थी ,अब सारी दुनिया की अवधारण है । फ्रांसीसी क्रान्ति के तीन शब्द ’स्वतंत्रता , समता और भातृभाव ’ आधुनिक मनुष्य के सपने के पर्यायवाची बन गये हैं । जब किसी समाज में पुरुषार्थ होता है और कुछ मूल्य होते हैं तब उन मूल्यों की दिशा में सत्य का अनुसंधान चलता है । जब भारतीय समाज में पुरुषार्थ था तब एक खास दिशा में सत्य का अनुसंधान था । इसको हम ’आध्यात्मिक दिशा’ कह सकते हैं । यूरोपीय समाज में भौतिक मूल्यों को अग्राधिकार मिला । भौतिक सुख को सर्वोच्च मानकर पश्चिम में जो अभूतपूर्व अनुसंधान चला , वह अभी भी भी जारी है लेकिन मौजूदा भारतीय समाज में आध्यात्मिक या भौतिक किसी प्रकार के सत्य का अनुसन्धान नहीं है । उसमें जड़ता आ गई है । यूरोप के सत्य से जो भौतिक सम्रुद्धि बनी वह राक्षसी हो गई क्योंकि पश्चिम की प्रभुता और समृद्धि को बनाये रखने के लिए बाकी मानव समाज को कंगाली और गुलामी में रखना पड़ता है । यूरोप का अपना लक्ष्य (स्वतंत्रता , समता और भ्रातृत्व ) अब मौजूदा यूरोपीय संस्कृति के द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता है । मानव समाज को एक नई संस्कृति चाहिए 

     ( अगली किश्त में समाप्य  ) 

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[ दिवराला ( राजस्थान ) सती – कांड के बाद भारतीय संस्कृति में नर – नारी सम्बन्धों पर सितम्बर – अक्टूबर १९८७ में जनसत्ता के दिल्ली संस्करण के सम्पादक श्री बनवारी के कई लेख छपे । इन लेखों पर अपनी  प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मैंने (किशन पटनायक )बनवारीजी को एक लेख-पत्र लिखा । यह जनसत्ता में नहीं छपा तो मैंने उसे ’हंस’ को भेज दिया तो उसमें यह प्रकाशित हुआ और बाद में सामयिक वार्ता में भी । ]

प्रिय बनवारीजी ,

भारतीयता पर आपका जो भी लेख मेरी नजर से गुज्रता है , मैं उसे अवश्य पढ़ता हूँ । कारण , मेरी भी यह मान्यता है कि आधुनिकतावाद हमारे देश को घोर मूल्यहीनता और दरिद्रता की ओर ले जा रहा है । परन्तु आपके लेखों को पढ़ते वक्त मुझे कभी कभी परेशानी होती है । मुझे लगता है आपके प्रतिपादनों से कट्टर हिन्दूवाद को ही बल मिलेगा । अगर आपका लक्ष्य है कि भारतीयता के आधार पर एक नई संस्कृति और समाज का निर्माण हो तो कट्टर हिन्दूवाद के बढ़ने से इस लक्ष्य पर प्रतिकूल असर होगा । कई बार इच्छा हुई कि आपसे मिलकर बातचीत करूँ । परन्तु दूरी के कारण ऐसा नहीं हो सका । इसलिए आपको सम्बोधित करते हुए यह लेख-पत्र लिख रहा हूँ । आपके लेखों से मेरे मन में जो संशय उत्पन्न होता है उसी को इस लेख-पत्र में लिपिबद्ध कर रहा हूँ ।

आधुनिकतावाद के विरोध में और भारतीयता के समर्थन में इस वक्त देश में एक छोटा सा वैचारिक समूह बना हुआ है । इतिहासकार धर्मपाल , कन्नड़ लेखक अनन्तमूर्ति और हिन्दी लेखक निर्मल वर्मा भी शायद इस धारा के अन्तर्गत हैं | अरुण शौरी को मैं इस धारा का नहीं मानता हूँ । वे सिर्फ़ हिन्दूवाद के पक्षधर हैं । वे भारतीयतावादी नहीं हैं । राजनीति व अर्थनीति में वे सम्पूर्ण आधुनिकतावादी हैं । अनन्तमूर्ति व निर्मल वर्मा को मैंने ठीक ढंग से नहीं पढ़ा है । आपके लेखों को कुछ ज्यादा पढ़ा है । वैसे तो आपकी धारा को भारतीयतावादी कहता हूँ लेकिन जब मुझे इसमें खतरा दिखाई देता है तब इसे ’बौद्धिक हिन्दूवाद’ कहता हूँ । साम्प्रदायिक हिन्दूवाद और कट्टर हिन्दूवाद से सम्पूर्ण भिन्न होने पर भी इसकी कुछ ऐसी कमजोरियाँ हैं कि साम्प्रदायिक और कट्टर हिन्दूवाद के लिए वह एक चुनौती बनने के बजाय एक ढाल बन जाता है । सती – प्रथा पर विवाद के सन्दर्भ में यही हो रहा है । राजपूत जाति के तलवारधारी संरक्षकगण और पुरी के शंकराचार्य के भक्त लोग आपको अपना पक्षधर मानेंगे । १९३४ के बिहार भूकम्प के दिनों में गांधीजी के बयान का तीखा विरोध रवि ठाकुर ने तो किया था , लेकिन कट्टर हिन्दूवादी लोगों की हिम्मत नहीं हुई कि गांधीजी को अपना पक्षधर मानें ।* [* १९३४ के बिहार के भूकम्प के बाद गांधीजी ने एक बयान में कहा था कि यह (भूकम्प) अछूतों के साथ किए गए दुर्व्यवहार के पापों का फल है । इस बयान पर विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था कि गांधीजी ऐसा कहकर अन्धविश्वासों को बढ़ावा दे रहे हैं – यह पापों का कैसा फल है जिसकी सबसे अधिक मार अछूतों पर ही पड़ी हो । ] गांधीजी की भारतीयता में जहाँ आधुनिकतावाद के खिलाफ़ धार थी वहाँ कट्टर हिन्दूवाद के खिलाफ़ भी तीखी धार थी । गांधी और रवि ठाकुर दोनों का लक्ष्य था भारतीय संस्कृति का नव सृजन । दोनों का विवाद एक ही खेमे का अन्दरूनी  संघर्ष था । दोनों से कट्टर हिन्दूवाद भयभीत था । उनके पहले स्वामी विवेकानन्द से भी कट्टर हिन्दूवाद भयभीत था ।

भारतीयता की सबसे आत्मघाती प्रवृत्ति यह है कि भारतीय संस्कृति की अच्छाइयों की कल्पनाओं में वह इतना रम जाती है उसकी सारी विकृतियो , विवेकहीनताओं और जड़ताओं के प्रति भी उसे ममता होने लगती है । वह दुविधा में सोचती है ,’ दिखने में अमानवीय होने पर भी उनके पीछे जरूर कोई ब्रह्मांड विषयक सत्य रहा होगा सो उन पर प्रहार करना गलत हो सकता है ।’ आपके लेख और जनसत्ता के सम्पादकीय में इसी प्रकार की दुर्बलता छिपी हुई है । इस उद्धरण को देखें , ’ जो लोग इस जन्म को ही आदि और अन्त मानते हैं और अपने व्यक्तिगत भोग में ही सबसे बड़ा सुख देखते हैं , उन्हें सती प्रथा कभी समझ में नहीं आएगी । यह उस समाज से निकली है जो मृत्यु को सर्वथा अन्त नहीं मानता , बल्कि उसे एक जीवन से दूसरे जीवन की तरफ़ बढ़ने का माध्यम समझता है । ऐसा समाज ही सती – प्रथा के उचित होने पर कोई सार्थक बहस कर सकता है । उसी हिसाब से अब नये सिरे से सती प्रथा पर विचार होना चाहिए । मगर यह अधिकार उन लोगों को नहीं है जो भारत के आम लोगों की आस्था और मान्यताओं को समझते नहीं हैं ।ऐसे लोग कोई फैसला देंगे तो उसकी वैसे ही धज्जियाँ उड़ेंगी जैसे राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले की दिवराला में उड़ी(’दिवराला की सती’-सम्पादकीय ’जनसत्ता’ )।”

बोलने की यह शैली इस प्रकार है – ’हमारे समाज में बुराई हो सकती है , जब हमारा विवेक जगेगा तब हम इसका विरोध करेंगे । लेकिन खबरदार ! हमारे ढंग से न सोचनेवालों को कोई अधिकार नहीं है कि हमारी बुराई पर उँगली उठाए ।’ तो क्या हम भी पश्चिमी समाज की ग़लतियों पर या आदिवासी समाज के जादू – टोनों पर उँगली न उठाएँ ?  जब बाल – विवाह , बाल-विधवा , स्त्री-निरक्षरता आदि के बारे में भारतीय विवेक नहीं जगा था , तब तक ईसाई-धर्म प्रचारकों या राममोहन राय जैसे पश्चिमपरस्त लोग ही इन प्रथाओं पर उँगली उठाते थे ? जब भारतीयता पर गर्व करने वालों का विवेक जग गया और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर , विवेकानन्द , रवि ठाकुर , गांधी , अम्बेडकर जैसे लोग समाज का नेतृत्व करने लगे , तब अपनी बुराइयों को जानने के लिए हमें ईसाई प्रचारकों के लेख पढ़ने की जरूरत नहीं रह गई । आजादी के चालीस सअल बाद हम फिर से पुरानी स्थिति में चले गये हैं । पुरी के शंकराचार्य ही भारतीयतावादियों के मुखपात्र बन गये हैं । आप जैसे भारतीयतावदियों का विवेक सती प्रथा की घटना के विरुद्ध जागृत नहीं हुआ । उपरोक्त उद्धरण में आपने माना है कि सती प्रथा के विरुद्ध भी एक भारतीय दृष्टि हो सकती है । परन्तु उस दृष्टि का प्रतिनिधित्व आपने अपने लेख में नहीं किया है । उलटा उस लेख की तर्क पद्धति ऐसी है कि उसके अनुसार सती प्रथा का विरोध करनेवाला कोई भी व्यक्ति पश्चिमी संस्कृति का दलाल प्रमाणित हो जाएगा , वह ईश्वरचन्द्र विद्यासागर क्यों न हों ।  सती प्रथा के समर्थन में सैद्धान्तिक बहस का जो ढाँचा आपने बनाया है , उस ढाँचे के अन्दर बाल – विवाह और जाति – प्रथा भी ब्रह्मांड विषयक एक महान सत्य पर आधारित माने जाएँगे और उनका विरोध करनेवाले ईसाई प्रचार के शिकार मान लिए जाएँगे ।

आपका कहना है कि जन्म – मृत्यु और काल – सम्बन्धी जो भारतीय अवधारणा है , उसी को मानने वाले समाज में सती – प्रथा तर्कसंगत है । आपका यह प्रतिपादन गैरतार्किक है । यह तब तार्किक होगा जब पत्नी के मर जाने पर पति भी , राजा के मर जाने पर प्रजाकुल भी , नौकर के मर जाने पर मालिक भी सती हो जाएगा । जब तक उस जन्म – मृत्यु की अवधारणा के साथ यह धारणा भी नहीं जुड़ती है कि स्त्री को पति-सर्वस्व अनुशासन में रहना पड़ेगा और विधवा का कोई सार्थक सामाजिक जीवन नहीं हो सकता , तब तक औरत के सती होने की प्रथा नहीं बन सकती है । जिस तरह मुसलमान समाज में तलाक देने की प्रथा दूसरे समाज की तुलना में निकृष्ट है , उसी तरह विधवा के सामाजिक जीवन के मामले में हिन्दू समाज की प्रथा निकृष्ट है । यहाँ विधवा नारी का अपना कोई सामाजिक जीवन नहीं होता है । जिस समाज की विधवा नारी एक सामान्य और सम्मानपूर्ण जीवन बिता सकती हो , उसी समाज में ही सती की घटना को स्वेच्छा से प्रेरित कहा जा सकता है । आत्मोसर्ग के जिस कार्यक्रम में भीड़ जुटकर उल्लास मनाती है  , उसमें देहत्याग के व्यक्तिगत निर्णय की गंभीरता नहीं हो सकती है । अपने आप में यह एक बर्बर काण्ड है – सती की इच्छा जो भी हो । इसलिए विनोबाजीके शरीर-त्याग से सती-समारोह और तलवारधारी राजपूत संरक्षकों के कार्यक्रमों की तुलना नहीं की जानी चाहिए ( स्वेच्छा का तर्क दहेज के सम्बन्ध में भी दिया जाता है ) ।

जन्म – मृत्यु की भारतीय अवधारणा यानी आत्मा की अनन्तता के साथ अगर नारी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण जुड़ जाता है तब विधवा का क्या रूप होगा ? उसका प्रसंग रामकृष्ण परमहंस में मिलता है । यह प्रसंग सचमुच एक पवित्र क्रांतिकारी प्रसंग है । पुरी के शंकराचार्य इसको पढ़ेंगे तो उनको पसीना छूट जाएगा । रामकृष्ण की बीमारी के दिनों में  कभी शारदादेवी ने इच्छा प्रकट की थी कि वे सती होना चाहती हैं । रामकृष्ण ने कहा – हरगिज नहीं , मेरे बाद भी समाज को तुम्हारी जरूरत रहेगी । रामकृष्ण के मर जाने के बाद जब शारदादेवी प्रथानुसार अपनी देह से सारे आभूषण , सिन्दूर , कंगन , लालकिनारी वाली साड़ी उतारने जा रही थीं , रामकृष्ण का आविर्भाव उनके सामने हुआ । निर्देश मिला – ’ तुम यह सब मत उतारो । तुम क्या यह सोचती हो कि मेरा खात्मा हो गया है ?’ फिर शारदादेवी मृत्यु तक उन आभूषणों कोप पहने रहीं । कितनी कटु बातें उनको सुननी पड़ी होंगी , क्या- क्या उन्होंने झेला होगा , यह अनुमान का विषय है । हिन्दू धर्म और भारतीयतावाद का दुर्भाग्य है कि रामकृष्ण और गांधी को ठुकराकर पुरी के शंकराचार्य को पथ-प्रदर्शक माना जाए ।

जारी

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पिछले भाग : एक , दो

विष्णु ने मात्र  भारतीय शिल्पकारों को शिव के जैसा प्रभावित नहीं किया है । तो भी विष्णु के विशेषतापूर्ण कई शिल्प-रूप मालूम होते हैं । मुझे अक्सर लगता है कि विष्णु अपने वस्त्र आवरण के नीचे कुछ छिपा रहा है । हालाँकि वह छिपाना मानवी हित के लिए और और मानव के लोभ को मर्यादित करने हेतु एवं उसके व्यापक संरक्षण की खातिर हो सकता है । विष्णु बिलकुल आराम करते हुए लेटे हैं । जय-पराजय से होने वाले हर्ष विषाद की कक्षा लांघ गये हैं । लगता है अखंड निद्रा लेते हुए वह अपने कृपालय के नीचे रहने वाले विश्व की निगरानी कर रहा है । उदयगिरी का विष्णु का शिल्प मुझे सबसे ज्यादा पसंद है । उसमें दिखाया गया है कि विष्णु वराह का रूप धारण करके एक अलौकिक सुन्दर कुमारिका को ,साक्षात ,  पृथ्वी की मुक्तता कर रहा है । यह पृथ्वी ही विष्णु की पत्नी है । समुद्र उसका वसन और पर्वत , वक्षस्थल । यह वर्णन एक स्तोत्र में है ।

उदयगिरी , वराह अवतार - विष्णु

उदयगिरी , वराह अवतार - विष्णु

आश्चर्य लगता है कि भारतीय शिल्पकारों को राम का कुछ भी आकर्षण क्यों नहीं लगा और कृष्ण को भी उन्होंने अपने कलाविष्कार के विषय में स्थान क्यों नहीं दिया । शायद उन्होंने राम और कृष्ण की शिल्पाकृतियाँ बनाई भी होंगी । एक तो वे नष्ट हुई होंगी या अब तक अज्ञात रही होंगी । अब तक अस्तित्व में दिखाई देने वाला द्वारिका कृष्ण मन्दिर का बालकृष्ण चतुर और होशियार प्रतीत होता है ।

भारतीय शिल्पों के सौन्दर्य की खोज करते समय मुझे उन शिल्पों में प्रकट होने वाले भारतीय इतिहास का अधिकाधिक और बार-बार दर्शन होता गया । रोम के कोलिशियम मानस्तम्भ और कहिरा के पिरामिड्स या स्फिन्क्स जैसे अवशेष जिस तरह इतिहास का दर्शन कराते हैं वैसे ही अन्य पाषाण , ईंटें , धातुओं के टुकड़े वगैरह खास कर जिन पर कुछ खोदा गया है ऐसी चीजें इतिहास खोलकर बताती हैं । हालांकि उनके द्वारा मालूम होने वाला इतिहास प्रत्यक्ष घटित इतिहास होता है ।

ये इतिहास साधन कहीं केन्द्रीय जगह पर वस्तु संग्रहालय में रखे जाते हैं । अन्यत्र कहीं पर मूल रूप में प्रत्यक्ष होने वाली वस्तुओं का वे एक जगह रखे हुए नमूने मात्र होते हैं । अलग – अलग काल की सात दिल्लियों में ऐसे कई ऐतिहासिक पाषाण और धातु के नमूने देखने को मिलते हैं । भिन्न भिन्न सात काल खण्डों की उए सात या आठ दिल्लियाँ एक ही इलाके में बसी हुई हैं ।उनकी रचना का काल और पद्धतियों में एक तरह की विसंगति मालूम होती है । उनमें से हरेक दिल्ली में कुछ आसानी से ध्यान खींचने वाली विशेषताएं भी व्यक्त होती हैं । और उस वजह से ही सभी दिल्लियों की रचना का विशिष्ट काल भी ध्यान में आता है तथापि उनमें से ज्यादातर दिल्लियों की बनावट एक दूसरे जैसी दिखाई देती है । इन दिल्लियों में चार असाधरण सुन्दर वस्तुएं हैं । उनकी रचना कुछ हाले ही के काल की है । मैजिक लैंन्टन की मदद से दिखाई जाने वाली किसी छाया चित्र कथा की चित्र माला के समान मन पर जो छाप छूटती है वह आदमी के सहज भूलने की शक्ति की और भारत के गत हजारों वर्षों की नादानी की । बदकिस्मती से मैं अथेना कभी नहीं जा सका किन्तु मुझे लगता है कि अथेना के अवशेष अथेनियन एवं ग्रीक इतिहास के प्रतीक हैं ।हिन्दुस्तान का उल्टा है । यहाँ का इतिहास ही यहाँ के अवशेषों का चिन्ह हैं ।

अन्य देशो में ऐतिहासिक अवशेष और प्राचीन कला वस्तुओं की अपेक्षा लिखित इतिहास ज्यादा विपुल पैमाने पर मिला है । भारत में मात्र लिखित इतिहास की तुलना में प्राचीन कला वस्तु और अवशेष ज्यादा पैमाने पर मिलते हैं । मानवी विस्मृति  अपने को मिटा न पाये , अपनी कला की अभिव्यक्ति अधिक लम्बे समय तक टिकने वाले धार्मिक माध्यम से करना संभव हो  और स्त्री सुन्दरता एवं मानवी जीवन की खुशनुमा कृतियाँ  बढ़िया ढंग से चित्रित की जाए इस दृष्टि से भारतीय कलावंतों ने कोशिश की और उनके प्रयत्नों के कारण ही सही माने में भारतीय इतिहास के वे श्रेष्ठ उद्गाने बने । उनकी कलाकृतियों में केवल भारतीय इतिहास के प्रसंग नहीं चित्रित किए गए , तो भारतीय आत्मा की कथा चित्रित की हई है । प्रत्येक बदलने वाले युग के साथ भारतीय आत्मा ने अलग अलग  रूप धारण किया है ।

संपूर्ण इटली में अथवा पूरे इजिप्त में देखना असंभव ऐसी शिल्प कला खजुराहो , भुवनेश्वर , कोणारक , धारवाड़ भाग के एक एक शिल्प में दिखाई देती है । अजंता , वेरूल या चितुर के बारे में तो बोलना ही नहीं चाहिए । इस विशाल देश में जगह जगह ऐसे साठ से अधिक शिल्प फैले हैं । विविध मानवी समाजों द्वारा शिल्पकला और वास्तुकला में की  हुई प्रगति तोलने के लिए तराजू के एक पलड़े में भारतीय कला वस्तुएँ और दूसरे पलड़े में उर्वरित सारी दुनिया की कला वस्तुएँ रखो तो पलड़ा किस तरफ़ झुकेगा कहना मुश्किल है ।

भारतीय कला केन्द्र शौकीन यात्रियों के नियमित मार्ग पर नहीं हैं । ज्यादातर जगह शहरों से दूर हैं । महाबलीपुरम मद्रास से चालीस मील पर तो धारापुरी समुद्र मार्ग द्वारा बम्बई से लगभग १ घण्टे के रास्ते पर है । खजुराहो , अजंता , वेरुल , कोणारक नजदीक के रेल स्टेशन से इसी तरह चालीस मील पर है ।सारे कला केन्द्र बड़े शहरों से दूर हैं और यह स्वाभाविक भी है ।चूँकि भारतीय इतिहास की ’आत्मा’ माने परदेशियों की नजर के जिस पर लगातार आघात होते हैम , ऐसी वह एक नाजुक सुन्दरी है । इस वजह से ही आने जाने वालों की आकस्मिक नजर नहीं पहुंचेगी । इसलिए दूर और निर्जन जगह पर यह खूबसूरत स्त्री छिपी है ।

( जारी )

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