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Archive for मई, 2009

चुनाव बाद दी गयी मेरी पहली त्वरित टिप्पणी पर अनूप शुक्ल ने कहा,” राहुलगांधी के बारे में जो चैनल वाले कह रहे हैं तो उनको कोई तो हीरो चाहिये ही तुरत-फ़ुरत प्रतिक्रिया करने के लिये। विस्तार से विष्लेषण कहां से करें बेचारे वे :)

मौजूदा आम चुनाव में उत्तर प्रदेश की जनता ने जो परिणाम दिए हैं उन्हें सरसरी तौर पर  विश्लेषित करने पर हमें तुरत-फुरत प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए एक व्यक्ति जरूर मिलता है ।

आजमगढ़ , लालगंज , जौनपुर ,फैजाबाद-अयोध्या यह चार सीटें सपा की झोली में नहीं जा पाईं।नवगठित उलेमा काउंसिल अथवा डॉ. अयूब की पार्टी मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने में सफल रहीं जिसके फलस्वरूप आजमगढ़ में भाजपा के अपराधी रमाकान्त यादव ,जौनपुर में बसपा के अपराधी प्रत्याशी धनन्जय सिंह, और लालगंज में बसपा के वरिष्ट नेता  डॉ. बलिराम की जीत हुई। नतीजो में गौरतलब है कि लालू-पासवान की तरह मुलायाम की पार्टी पूरी तरह साफ़ नहीं हुई। पिछले चुनाव से सीटें कम होने के बावजूद रुहेलखंड इलाके में सपा के पांव नहीं उखड़े । धर्मेन्द्र यादव , जया प्रदा , कौशलेन्द्र वाल्मीकी,कल्याण सिंह आदि इस इलाके के सपा के सफल प्रत्याशियों को मुलायम के चुनाव पूर्व गठजोड़ का पूरा लाभ मिला है ।

इसी गठबन्धन के कारण यदि मुलायम मध्य उत्तर प्रदेश में टिके रह पाये तो इसी की वजह से मुसलमान मतदाताओं पर उनकी पकड़ ढीली भी हुई । मेरठ और भागलपुर के दंगों के लिए , रामजनमभूमि-बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने तथा बाबरी मस्जिद गिराए जाने के समय केन्द्र सरकार द्वारा अस्थाई मन्दिर बनाने देने के कारण कांग्रेस से मुसलमान  स्वाभाविक तौर पर विमुख हुआ था, जिसका लाभ अब तक सपा को मिलता था । सपा के इसी चुनाव पूर्व गठबन्धन के कारण कांग्रेस और बसपा मुसलिम मतों में जगह सेंधमारी कर सके ।

मुलायम सिंह यादव के इसी चुनाव पूर्व गठबन्धन के कारण मध्य उत्तर प्रदेश में भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा । भाजपा से पिछड़ा -चेहरा हट गया ।

इस प्रकार हम पाते हैं कि उत्तर प्रदेश में लोक सभा चुनाव के नतीजों के कई पहलुओं की जड़ में एक शक्सियत थी –  इस सूबे के पूर्व मुख्य मन्त्री कल्याण सिंह । इस सूबे के चुनाव में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से कहीं ज्यादा प्रभाव इस कद्दावर नेता का रहा ।

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      बात मध्यप्रदेश की है, किन्तु कमोबेश पूरे देश पर लागू होती है। मध्यप्रदेश हाईस्कूल का परीक्षा परिणाम इस साल बहुत खराब रहा। मात्र 35 फीसदी विद्यार्थी ही पास हो सके। परिणाम निकलने के बाद प्रदेश के कई हिस्सों से छात्र-छात्राओं की आत्महत्याओं की खबरें आईं।
        इतने खराब परीक्षा परिणाम की विवेचना चल रही है। मंत्री एवं अफसरों ने कहा कि शिक्षकों के चुनाव में व्यस्त होने के कारण परीक्षा परिणाम बिगड़ा है। किसी ने कहा कि आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा खत्म कर देने से यह हुआ है। लेकिन सच तो यह है कि लगातार बिगड़ती शिक्षा व्यवस्था का यह परिणाम है। सरकार खुद इसे लगातार बिगाड़ रही है।
        इस परीक्षा परिणाम में एक मार्के की बात यह है कि सबसे ज्यादा अंग्रेजी और गणित  इन दो विषयों में ही विद्यार्थी फेल हुए हैं। अंग्रेजी में 3 लाख 21 हजार और गणित में 2 लाख विद्यार्थी फेल हुए हैं। कुछ दिन पहले घोषित मध्यप्रदेश हायर सेकेण्डरी की परीक्षा में भी फेल विद्यार्थियों में ज्यादातर अंग्रेजी व गणित में ही अटके हैं। अमूमन यही किस्सा हर साल का और देश के हर प्रांत का है। अंग्रेजी और गणित विषय आम विद्यार्थियों के लिये आतंक का स्त्रोत बने हुए हैं।
        गणित का मामला थोड़ा अलग है। गणित के साथ समस्या यह है कि इसे रटा नहीं जा सकता। इसकी परीक्षा में नकल भी आसान नहीं है। शुरुआती कक्षाओं में गणित को ठीक से न पढ़ाने की वजह से बाद की कक्षाओं में गणित कुछ भी समझ पाना एवं याद करना बहुत मुश्किल होता है। गणित विषय की बेहतर पढ़ाई की व्यवस्था जरुरी है।
        लेकिन अंग्रेजी क्यों इस देश के बच्चों पर लादी गई है ? पूरी तरह विदेशी भाषा होने के कारण बच्चों के लिए यह बहुत बड़ा बोझ बनी हुई है। देश के कुछ मुट्ठी भर अभिजात्य परिवारों को छोड़ दें , जिनकी संख्या देश की आबादी के एक प्रतिशत से भी कम होगी, तो देश के लोगों के लिए अंग्रेजी एक अजनबी, विदेशी और बोझिल भाषा है। अपनी जिन्दगी में दिन-रात उनका काम भारतीय भाषाओं या उसकी स्थानीय बोलियों में चलता है। उनमें अंग्रेजी के कुछ शब्द जरुर प्रचलित हो गए हैं, लेकिन अंग्रेजी भाषा बोलना, लिखना या पढ़ना उनके  लिए काफी मुश्किल काम है। फिर भी अंग्रेजी को अनिवार्य विषय के रुप में सारे बच्चों पर थोपी जा रहा है। पहले माध्यमिक शालाओं में कक्षा 6 से इसकी पढ़ाई शुरु होती थी, अब लगभग सारी सरकारों ने इसे पहली कक्षा से अनिवार्य कर दिया है।
        अंग्रेजी को अनिवार्य विषय के रुप में भारत के सारे बच्चों को पढ़ाने के पीछे कई तर्क दिए जाते हैं, जो सब खोखले और गलत हैं। यह कहा जाता है कि अंग्रेजी दुनिया भर में बोली जाती है। अंग्रेजी से हमारे लिए दुनिया के दरवाजे खुलते हैं। हमारे देश को आगे बढ़ना हैं, शोध कार्य करना है, वैज्ञानिक प्रगति करना है, व्यापार करना है, विदेशों में नौकरी पाना है, तो अंग्र्रेजी सीखना ही होगा। लेकिन यह सत्य नहीं है। अंग्रेजी का प्रचलन सिर्फ उन्हीं देशों में     है जो कभी अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं और वहां भी आम लोग अंग्रेजी नहीं जानते हैं। दुनिया के बाकी देश अपनी-अपनी भाषा का इस्तेमाल करते हैं और वहां जाने, उनके साथ संवाद करने और उनको समझने के लिए उनकी भाषा सीखने की जरुरत होगी। स्पेनिश, फ्रेंच, जर्मन, रुसी, पु्र्तगाली, इटेलियन, डच, चीनी, जापानी, अरबी, फारसी, कोरियन आदि भी अंतर्राष्ट्रीय भाषाएं हैं। यदि दुनिया के दरवाजे वास्तव में भारतीयों के लिए खोलने हैं तो इन भाषाओं को भी सीखना पड़ेगा।
        फिर अंतर्राष्ट्रीय जगत से तो बहुत थोड़े भारतीयों को काम पड़ता है। उच्च स्तरीय शोधकार्य करने वाले मुट्ठी भर लोग ही होते हैं। उसके लिए देश के सारे बच्चों पर अंग्रेजी क्यों थोपी जाए ? उन्हें क्यों कुंठित किया जाए ? बार-बार फेल करके उनके आगे बढ़ने के रास्ते क्यों रोके जाए ? प्रतिवर्ष पूरे देश में विभिन्न कक्षाओं में अंग्रेजी में फेल होते बच्चों की संख्या जोड़ी जाए, तो यह करोड़ों में होगी। क्या यह स्वतंत्र भारत का बहुत बड़ा अन्याय नहीं है ? जिन्हें उच्च स्तरीय शोधका्र्य करना है या विदेश जाना है, वे जरुरत होने पर अंग्रेजी या कोई भी विदेशी भाषा का छ: महीने का कोर्स करके कामचलाऊ ज्ञान हासिल कर सकते हैं। दूसरों देशों के नागरिक ऐसा ही करते हैं। सिर्फ भारत जैसे चंद पूर्व गुलाम देशों में ही एक विदेशी भाषा पूरे देश में थोपी जाती है। सच कहें तो, दुनिया का कोई भी देश एक विदेशी भाषा में प्रशासन, शिक्षा, अनुसंधान आदि करके आगे नहीं बढ़ पाया है।
        कई अभिभावक सोचते हैं कि अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाकर वे उसे ऊपर तक पहुंचा सकेगें। ‘‘इंग्लिश मीडियम’’ का एक पागलपन इन दिनों चला है और हर जगह घटिया निजी स्कूलों के रुप में इंग्लिश मीडियम की कई दुकानें खुल गई हैं। इंग्लिश मीडियम का मतलब है कि बच्चों को अंग्रेजी सिर्फ एक विषय के रुप में नहीं पढ़ाना, बल्कि सारे विषय अंग्रेजी भाषा में पढ़ाना। यह बच्चों के साथ और बड़ा अन्याय होता है। अपनी मातृभाषा में अच्छे तरीके से और आसानी से जिस विषय को वे समझ सकते थे, उसे उन्हें एक विदेशी भाषा में पढ़ना पड़ता है। उनके ऊपर दोहरा बोझ आ जाता है। अक्सर वे भाषा में ही अटक जाते हैं, विषय को समझने का नंबर ही नहीं आता है। फिर वे रटने लगते हैं। लेकिन विदेशी भाषा में रटने की भी एक सीमा होती है। इसमें कुछ ही बच्चे सफल हो पाते हैं, बाकी बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए यह एक मृग-मरीचिका ही साबित होता है। देश के करोड़ों बच्चे अंग्रेजी के इस मरुस्थल में क्लान्त और हैरान भटकते रहते हैं, कोई-कोई दम भी तोड़ देते हैं।
        यह सही है कि आज भी देश का ऊपर का कामकाज अंग्रेजी में होता है। प्रशासन, न्यायपालिका, उच्च शिक्षा, उद्योग, व्यापार सबमें ऊपर जाने पर अंग्रेजी का वर्चस्व मिलता हैं। अंग्रेजी न जानने पर ऊपर पहुंचना और टिकना काफी मुश्किल होता है। लेकिन इसका इलाज यह नहीं है कि सारे बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाई जाए। यह एक अस्वाभाविक स्थिति है और गुलामी की विरासत है, इसे जल्दी से जल्दी बदलना चाहिए। देश के शासक वर्ग ने अंग्रेजी की दीवार को इसीलिए बनाकर रखा है कि देश के करोड़ो बच्चे आगे नहीं बढ़ पाए और उनकी संतानों का एकाधिकार बना रहे। अंग्रेजी को अनिवार्य रुप से स्कूलों में पढ़ाने से यह एकाधिकार
टूटता नहीं, बल्कि मजबूत होता है।  अभिजात्य वर्ग के बच्चों को तो अंग्रेजी विरासत में मिलती है। फर्राटे से अंग्रेजी न बोल पाने और न लिख पाने के कारण साधारण पृष्ठभूमि के बच्चे प्राय: हीन भावना से ग्रस्त रहते हैं। आधुनिक भारत में अंग्रेजी का वर्चस्व न केवल भेदभाव, विशेषाधिकारों और यथास्थिति को बनाए रखने का बहुत बड़ा औजार है, बल्कि देश की प्रगति को रोकने का बहुत बड़ा कारण भी है। जिस देश के ज्यादातर बच्चे कुंठित एवं हीन भावना के शिकार होंगें, उनके ऊपर दोहरी शिक्षा का अन्यायपू्र्ण बोझ लदा रहेगा, वे ज्ञान-विज्ञान के विषयों को समझ ही नहीं पाएंगे और उनके आगे बढ़ने के रास्ते अवरुद्ध रहेगें, वह देश कैसे आगे बढ़ेगा।
        अंग्रेजी के वर्चस्व का दूसरा नुकसान यह भी होता है कि देशी परिस्थितियों के मुताबिक मौलिक सोच, स्वतंत्र चिन्तन व देशज शोध-अनुसंधान भी काफी हद तक नहीं हो पाता है। पूरा देश नकलचियों का देश बना रहता है और कई बार नकल में अकल भी नहीं लगाई जाती है।
        इसीलिए समाजवादी विचारक डॉ. राममनोहर लोहिया ने आजाद भारत में सार्वजनिक जीवन से अंग्रेजी के वर्चस्व को हटाने का आह्वान किया था। डॉ. लोहिया की जन्म शताब्दी इस वर्ष मनाई जा रही है और यदि इस दिशा में हम कुछ कर सकें, तो यह उनके प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। यह वर्ष महात्मा गांधी की  अद्वितीय पुस्तक ‘‘हिन्द स्वराज’’ का भी शताब्दी वर्ष है। इसमें लिखे गांधी जी के इन शब्दों को भुलाकर हमने अपनी बहुत बड़ी क्षति की है –
        ‘‘ अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, जुल्म वगैरह बढ़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा पाये हुए लोगों ने प्रजा को ठगने में, उसे परेशान करने में कुछ भी उठा नहीं रखा है। ……………यह क्या कम जुल्म  की बात है कि अपने देश में अगर मुझे इंसाफ पाना हो, तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना चाहिए। ………. यह गुलामी की हद नहीं तो और क्या है ?’’

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(लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय अध्यक्ष है।)

 

    सुनील
    ग्राम पोस्ट -केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461 111
    फोन नं० – 09425040452

ई – मेल   sjpsunilATgmailDOTcom

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लेख का प्रथम भाग

(4)
    दरअसल, पंजीवाद को फलते-फूलते रहने के लिए लगातार बढ़ते हुए मुनाफे, बढ़ता हुआ बाजार और दुनिया के श्रम व प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता हुआ दोहन चाहिए। तीस के दशक की जबरदस्त मंदी से उसे उबारने में द्वितीय विश्वयुद्ध जनित मांग ने काफी मदद की और इसके बाद दो-तीन दशक तक सब कुछ बढ़िया चलता रहा। लेकिन सत्तर के दशक में अमरीका-यूरोप के पूंजीवादी मुनाफे कम होने लगे, क्योंकि संगठित होकर मजदूर अपनी मजदूरी बढ़वाने में सफल रहे थे और विकासशील देशों से प्रतिस्पर्धा का भी सामना करना पड़ रहा था। तब इस संकट के समाधान के रुप में वैश्वीकरण का दौर आया। एक ओर, अमीर देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना साम्राज्य फैलाया, जिससे विकासशील देशों में उद्योग स्थानान्तरित होने पर भी मुनाफा, रायल्टी आदि उनको ही मिलते रहे। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को ‘मुक्त’ करने के साथ ही पूरी दुनिया के बाजार पर कब्जा करने का मौका उन्हें मिला, साथ ही पूरी दुनिया के संसाधनों के बढ़ते हुये दोहन का मौका मिला। वित्तीय वैश्वीकरण भी एक प्रकार से दुनिया के संसाधनों को बेरोकटोक खींचने एवं नियंत्रण के तंत्र के रुप में आया, जिससे बिना उत्पादन किए उन्हें दूसरों की मेहनत का फल हड़पने का मौका मिलता रहे। गौरतलब है कि संयुक्त राज्य अमरीका के कंपनी मुनाफों में वित्तीय मुनाफों का हिस्सा अस्सी के दशक में 17-25 प्रतिशत था, जो चालू दशक में बढ़कर 27-40 प्रतिशत हो गया।
    दुनिया के बाजार पर नियंत्रण के साथ मुद्रा और कर्ज की बहुतायत से अमरीका-यूरोप के घरेलू बाजार में तेजी आई , उससे भी अमरीकी पूंजीवाद को मदद मिली। अमरीका-यूरोप के लगातार बढ़ते उपभोग ने अंतहीन विकास एवं समृद्धि का भ्रम पैदा किया और बनाए रखा। लेकिन जैसा कि अब साफ हो रहा है, यह उधार की समृद्धि थी और पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों व श्रम की लूट पर आधारित थी। उदाहरण के लिए, पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति पेट्रोल खपत अमरीका में ही है। वहां पहले, 1973 के पहले तेल संकट के समय 33 प्रतिशत तेल बाहर से आता था। अब 60 प्रतिशत आता है और अनुमान है कि 2020 तक वह 70 प्रतिशत तेल आयात करने लगेगा। दुनिया के संसाधनों पर अपने कब्जे के लिए अमरीका आर्थिक, व्यापारिक, कूटनीतिक, सैनिक सभी तरीकों का इस्तेमाल करता है। लेकिन उसका भी प्रतिरोध हो रहा है और दुनिया के संसाधनों के दोहन की भी सीमा आती जा रही है। यह संकट एक प्रकार से साम्राज्यवाद पर टिकी आधुनिक जीवन -शैली और अंतहीन भोगवाद का भी संकट है।
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दुनिया को लूटकर समृद्धि के महल खड़ा करने की इस अमरीका-केन्द्रित अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवादी व्यवस्था में जो देश जितना जुड़ा है और एकाकार हुआ है, वह उतना ही प्रभावित हो रहा है। भारत जैसे देशों का एकीकरण पूरी तरह नहीं हुआ है , इसलिए भारत पर उतना असर नहीं हुआ है। हालांकि पिछले 18 वर्षों में भारत की सरकारों की इच्छा, सोच व दिशा तो वही रही है, किन्तु यहां कि लोकतांत्रकि व्यवस्था ने एक प्रकार की थोड़ी बहुत रोक का काम किया है। चुनाव में जाने की मजबूरी के कारण सरकारों द्वारा पूरी तरह जन-हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। लेकिन चीन, यूरोप के कई देशों और अमरीका से काफी ज्यादा जुड़े़ मध्य अमरीका व अफ्रीका के कई देशों के हालात काफी खराब हैं। चीन तो बुरा फंसा है। वहां पिछले काफी समय से राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर 10-11 प्रतिशत रही है और इसे चमत्कार माना जा रहा था। किन्तु यह वृद्धि मुख्यत: निर्यातों पर आधारित थी। चीन की राष्ट्रीय आय का लगभग 30 प्रतिशत निर्यातों से मिलने लगा था। अब मंदी के चलते निर्यात काफी कम हो गए हैं, चीन की अनेक औद्योगिक इकाइयां बंद हो गई हैं और बड़े पैमाने पर बेरोजगारी फैल गई है। डॉलर के जाल में भी चीन बुरी तरह फंसा है। निर्यातों के चलते और विदेशी पूंजी के आगमन के चलते चीन के पास विदेशी मुद्रा और विदेशी प्रतिभूतियों का विशाल भंडार जमा हो गया है, तो ज्यादातर डॉलर में है। अनुमान है कि चीन के पास लगभग 2000 अरब डॉलर मूल्य की विदेशी परिसंपत्तियां हैं, जिनमें 70 प्रतिशत डॉलर में है। डॉलर की वर्तमान विनिमय दर कृ्त्रिम रुप से बहुत ऊँची है और यह नीचे आ सकती है। किन्तु डॉलर की कीमत नीचे आई , तो चीन के इस भंडार का मूल्य भी कम हो जाएगा। डॉलर के रुप में जमा चीन की सालों की कमाई चंद दिनों में हवा हो सकती है। चीन डॉलर के इस जाल से मुक्त होने के लिए अपनी डॉलर-परिसंपत्तियां बेचता है तो ये इतनी ज्यादा हैं कि स्वयं चीन के बेचना शुरु करने पर डॉलर की कीमत नीचे जाने लगेगी और चीन को भारी नुकसान हो जाएगा। इसलिए पिछले दिनों चीन ने अमरीका के ऊपर अपने कर्ज की सुरक्षा के लिए बार-बार चिंता प्रकट की है। समूह-20 की लंदन बैठक के पहले चीन ने एक नई अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा की जरुरत का मुद्दा भी उछाला था।
लेकिन महज एक मुद्दा उछालने से कुछ होने वाला नहीं है। समूह-20 की बैठक में भी कुछ फौरी राहत की बातें हुई हैं। सिर्फ वित्तीय कारोबारों पर सरकारी नियंत्रण एवं देखरेख बढ़ा देने तथा अर्थव्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप की कीन्सवादी नीतियों से भी यह संकट दूर नहीं होने वाला है। विनियंत्रण-विनियमन इस संकट का मूल कारण नहीं है, वह तो एक प्रकार का औजार था, पूंजीवादी ताकतों द्वारा संसाधनों एवं कमाई हड़पने का। कीन्स के अर्थशास्त्र एवं कीन्सवादी उपायों ने पिछली मंदी के समय सरकारी हस्तक्षेप से प्रभावी मांग की कमी को दूर करके पूंजीवाद को बचाने का रास्ता सुझाया था। लेकिन इस बार संकट सिर्फ बाजार या मांग की कमी का नहीं है। पूंजीवादी मुनाफों की भूख ने सारी मर्यादाओं को तोड़कर दुनिया की कमाई और संसाधनों को हड़पने के नए-नए तरीके निकाले हैं, उनसे यह संकट पैदा हुआ है। आज जरुरत लालच, भोगवाद, गैरबराबरी और लूट पर आधारित इस पूंजीवादी सभ्यता को बचाने की नहीं है, बल्कि इसका एक सही विकल्प खोजने की है, जिसके लिए यह सबसे अच्छा मौका है। इसमें गांधी, मार्क्स, लोहिया व शुमाखर हमारी मदद कर सकते है। और तभी पूंजीवाद के मौजूदा संकट तथा अन्य संकटों का स्थायी समाधान हो सकेगा।

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(लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय अध्यक्ष है।)
सुनील सुनील
ग्राम पोस्ट -केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461 111
फोन नं० – 09425040452

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यह लूट, लालच, भोग की सभ्यता का संकट है।

सुनील (1)
दुनिया का आर्थिक संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। अमरीका के जिस दोयम कर्ज (सब प्राइम लोन) संकट से यह शुरु हुआ, उसको 19 महीने बीत चुके है। निवेश बैंक नाम की जो नयी बैंकिंग प्रजाति अस्तित्व में आई है, उसमें शीर्ष के बीयर स्टर्न्स बैंक को बचाने की घटना को 13 महीने  तथा लेहमन ब्रदर्स के बैठ जाने की घटना को भी सात महीने हो चुके हैं। अभी भी कोई यह विश्वास के साथ नहीं कह सकता कि इस संकट का सबसे बुरा दौर गुजर चुका है। इसका मतलब है कि इस संकट की जड़े बहुत गहरी है। यह वित्तीय कारोबार से शुरु हुआ, लेकिन यह सिर्फ वित्तीय संकट नहीं है। जिसे ‘असली’  अर्थव्यवस्था कहते हैं, उसके बुनियादी असंतुलनों, विसंगतियों व सीमाओं में इस संकट की जड़ें छिपी हैं। एक तरह से देखें तो यह आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता का संकट है।
अभी भी पूंजीवाद की अजेयता और शाश्वतता में विश्वास रखने वाले इसे महज व्यापार चक्र की एक और कड़ी के रुप में देख रहे हैं। तेजी और मंदी तो आती-जाती रहती है। इस मंदी के बाद फिर ग्राफ ऊपर उठेगा, ऐसा अंधा विश्वास उनका है। लेकिन कब तक ? और तब तक दुनिया के करोड़ों लोगों पर जो बीतेगी ,उसका क्या ? दुनिया के करोड़ों लोगों का रोजगार छिन चुका है, करोड़ों लोग भूख और कुपोषण के शिकंजे में आ चुके हैं। खुद संयुक्त राज्य अमरीका में लाखों लोग बेघर हो चुके हैं। यूरोप में लाखों लोगों के प्रदर्शन, हड़तालें व दंगे हो रहे हैं। आत्महत्याओं की संख्या बढ़ रही है। फिर अभी यह भी तय नहीं है कि पूंजीवाद पूरी तरह इस संकट से उबर पायेगा या नहीं। अभी भी चान्स फिफ्टी-फिफ्टी ही है।
इस संकट ने बाजारवाद की हवा निकाल दी है। जो कल तक कह रहे थे कि बाजार ही सबसे कुशल आबंटनकर्ता है, स्व-नियामक है, उस पर सरकार का नियंत्रण, नियमन और हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, वे ही अब बड़े-बड़े  बैंकों व कंपनियों को बचाने के लिये तथा अर्थव्यवस्था  को मंदी से उबारने के लिये सरकारों के बड़े-बड़े पैकेजों का मुंह जोह रहे है। अब अधिकांश लोग कबूल कर रहे हैं कि बाजारों को पूरी तरह खुला नहीं छोड़ा जा सकता। वित्तीय कारोबारों पर नियमन व नियंत्रण रखना ही होगा। ये नियंत्रण और नियमन हटा लेने के कारण ही ये हालातें पैदा हुई है। सट्टा अभूतपूर्व ऊँचाइयों पर पहुच गया। शेयर बाजार और अन्य सट्टा बाजारों के सूचकांको के इशारे पर सरकारें नाचने लगी थी। बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थाओं का मूल काम था बचतों और निवेश के बीच पुल बनाना। बचतकर्ता व निवेशकर्ता के बीच मध्यस्थता करना। यह मूल काम छोड़कर वे भी सट्टे, जुए और कृत्रिम कमायी में लग गए। इसके लिये नए-नए तरीके निकाले गए, जिन्हें ‘वित्तीय नवाचारों’ का सम्मानजनक शब्द दिया गया। वित्तीय बाजार, जुआघर बन गए। जैसे कोई जादूगर हवा में से या टोप में से चीजें निकाल देता है, वैसी ही बिना कोई आधार के, हवा में समृद्धि बन रही थी। वास्तविक अर्थव्यवस्था के वास्तविक उत्पादन से इसका कोई मेल नहीं था। इसलिए यह एक बुलबुला था, जो फूटना ही था। विडंबना यह थी कि कुछ लोग इस बुलबुले को ही ठोस प्रगति मानने लगे थे। अमरीका-यूरोप के लोग मानने लगे थे कि उनकी समृद्धि, कमाई, उपभोग, कर्ज का विस्तार और  अर्थव्यवस्था की तेजी अंतहीन है। उसकी कोई सीमा नहीं है।
रीगन व थैचर के समय से पूरी वैधता पाए इस विनियंत्रण से एनरॉन और सत्यम जैसे घोटाले होना स्वाभाविक था। इसमें बर्नार्ड मेनाफ जैसे ठग पनपना ही थे। पूंजी निवेश में आकर्षक कमाई का लालच देकर इस अमरीकी नटवरलाल ने 5000 करोड़ डॉलर की ठगी की। उसकी बड़ी धूम व इज्जत थी। पिछले दिसंबर में उसका भंडा फूटा और वह जेल में है। लेकिन बात सिर्फ एक दो आदमी या कंपनी के घोटालों की नहीं है। यह ठगी और लूट अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रही है। इस मामले में पिछले वर्ष ही नोबल पुरस्कार पाने वाले अमरीकी  अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमेन की यह स्वीकरोक्ति महत्वपूर्ण है –
‘‘ वास्तव में इन दिनों दुनिया की  अर्थव्यवस्थाओं के बीच अमरीका बर्नार्ड मेडोफ जैसा दिख  रहा है। कई सालों तक उसका बहुत सम्मान था, उसका बड़ा रोब भी था। अंत में पता चला कि वह शुरु से ही एक धोखेबाज ठग था।’’
(2)
अमरीका-यूरोप द्वारा दुनिया की ठगी व लूट का ताजे आर्थिक संकट से गहरा संबंध है। यह लूट किस तरह की है, यह समझने के लिये कुछ तथ्यों पर गौर करें।
एक, पिछले ढाई दशकों से संयुक्त राज्य अमरीका का व्यापार संतुलन लगातार ऋणात्मक रहा है, यानि अमरीका का आयात ज्यादा है, निर्यात कम है। वह शेष दुनिया से जितने मूल्य की वस्तुएं व सेवाएं ले रहा है, उतने मूल्य की बदले में नहीं दे रहा है। यह घाटा समय के साथ बढ़ता गया है। वर्ष 2004 आते-आते यह घाटा संयुक्त राज्य अमरीका की कुल राष्ट्रीय आय के 6 प्रतिशत के बराबर हो गया था। इसका मतलब यह है कि अमरीका अपनी राष्ट्रीय आय का 6 प्रतिशत हिस्सा, बदले में कोई वस्तुएं या सेवाएं दिए बगैर हासिल कर रहा है। बदले में वह डॉलर देता है, जो वापस उसे कर्ज के रुप में मिल जाता है।
दो, अमरीका-यूरोप का शेष दुनिया के साथ व्यापार और भी कई मायनो में एकतरफा, गैरबराबर व शोषणकारी है। जैसे कीमतों का गैरबराबर ढांचा। वर्ष 1980 और 2004 के बीच विकासशील देशों की व्यापार शर्तों में 15 प्रतिशत की गिरावट आई है। यानि अमीर देशों के निर्यात महंगे हुए हैं, गरीब देशों के निर्यात सस्ते हुए हैं। पिछले कुछ दशकों में विकासशील देशों का कुछ औद्योगीकरण हुआ है। उनके निर्यातों में औद्योगिक वस्तुओं का हिस्सा बढ़ा है, जबकि पहले प्राथमिक वस्तुओं(कृषि उपज, पशु उपज, वनोपज, खनिज आदि) का ही प्राधान्य रहता था। दूसरी ओर अमीर देशों के निर्यातों में ‘सेवाओं’ का हिस्सा बढ़ा है जिनमें वित्तीय सेवाएं, परिवहन, मनोरंजन, दूरसंचार, पर्यटन, होटल, चिकित्सा, शिक्षा आदि शामिल हैं। अमीर देशों के अनेक उद्योग गरीब देशों को स्थानांतरित हो गए हैं, ताकि वहां के सस्ते श्रम, सस्ते कच्चे माल , पर्यावरण के शिथिल नियमों और स्थानीय बाजार का फायदा उठा सकें । दुनिया के स्तर पर यह एक प्रकार का नया श्रम-विभाजन है। अब अमीर देश स्वयं उत्पादन का काम ज्यादा नहीं करते। दुनिया के गरीब देशों में उत्पादन होता है और वे चीजें अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के जरिये सस्ती उनको मिल जाती है। बदले में वे अपनी महंगी कथित ‘सेवाएं’ देते हैं।
तीन, डालर की विनिमय दर भी लगातार कृत्रिम रुप से ऊँची चली आ रही है। उदाहरण के लिए क्रयशक्ति-समता के हिसाब से एक डालर 14-15 रुपए के बराबर होना चाहिए, लेकिन वह 40-50 रुपए बना हुआ है। इससे दुनिया के बाजार में अमरीकियों की क्रयशक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
मुद्राओं व कीमतों के ढांचे से अलग करके देखें, तो यह गैरबराबरी और ज्यादा स्पष्ट होती है। जैसे आयात व निर्यात के वजन की तुलना करें, तो दक्षणि अमरीका महाद्वीप जितने टन का आयात करता है, उससे 6 गुना ज्यादा टन निर्यात करता है। इससे उल्टा यूरोपीय संघ जितने टन निर्यात करता है, उससे 4 गुना ज्यादा आयात करता है।
स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और विनिमय पूरी दुनिया के संसाधनों और श्रम को बहुत सस्ते में अमरीका-यूरोप की सेवा में लगाने का तंत्र बन गया है। ‘मुक्त व्यापार’ पर जोर तथा विश्व व्यापार संगठन की स्थापना को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
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इस गैर-बराबर व एकतरफा व्यापार का ही दूसरा पहलू वित्तीय था। डॉलर के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा होने और उसका अंतर्राष्ट्रीय वर्चस्व होने से ही संयुक्त राज्य अमरीका लगातार इतना बड़ा व्यापार घाटा रख सका । जबसे दुनिया में वित्तीय उदारीकरण हुआ और विदेशी मुद्रा व पूंजी के लेनदेन पर नियंत्रण खत्म होते गए, इससे बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ गए। इससे निपटने के लिये हर देश अब अपने पास विदेशी मुद्रा का पर्याप्त भंडार रखना चाहता है और यह भंडार डॉलर में रखना चाहता है। इसलिए जापान, चीन, भारत, कोरिया आदि सभी देश अमरीका से अपने निर्यातों के बदले डॉलर खुशी-खुशी लेते रहे। अमरीका के लिए यह बहुत सुविधाजनक था – कागज पर डॉलर छापना और दुनिया से चीजें खरीदते जाना। क्रुगमेन संभवत: इस ठगी की बात कर रहे है।
दिलचस्प बात यह भी है कि ये डॉलर भी घूम-फिर कर वापस अमरीका पहुंच जाते हैं। दुनिया की सरकारें अपना डॉलर भंडार बेकार पड़ा रखने के बजाय निवेश करना बेहतर समझती हैं। इसका सबसे सुरक्षति तरीका अमरीका सरकार की प्रतिभूतियां खरीदना है, भले ही उनका ब्याज डेढ़ – दो प्रतिशत ही मिले। वित्तीय कारोबार में भी अमरीका का ही वर्चस्व है, अतएव डॉलरों का एक हिस्सा अमरीका के निजी बैंकों में भी पहुंच जाता है। यह सब एक तरह से संयुक्त राज्य अमरीका पर कर्ज बनता गया, लेकिन उसकी परवाह उसे नहीं रही। काफी समय से वह दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी कर्ज वाला देश है। पिछले 5 वर्षों में उस पर विदेशी कर्ज 72 प्रतिशत बढ़ा।
इस तरह, दुनिया के विकासशील देश ‘निर्यातोन्मुखी विकास’ के भुलावे में अमरीका को निर्यात करते रहे और बदले में अमरीका उनको डॉलर की कागजी मुद्रा या फिर अपने सरकारी बॉन्ड पकड़ाता रहा। चीन के बारे में इन दिनों अमरीका में एक मजाक प्रचलित है, ‘चीन ने हमें विषैले खिलौने और सड़ी मछलियां बेची, हमने उनको जाली प्रतिभूतियां बेची।’
इस तरह पूरी दुनिया से आते पेट्रो डॉलर, यूरो डॉलर, जापानी डॉलर और फिर चीनी डॉलरों ने अमरीका म पूंजी की बहुतायत कर दी। उन्होनें अपने नागरिकों को सस्ते उपभोग कर्ज बांटना शुरु कर दिया। इससे अमरीका में एक तरह की तेजी एवं समृ्द्धि का आभास बनाए रखने में मदद मिली। क्रेडिट कार्ड वाली संस्कृति का विस्फोट इसी समय हुआ। अमरीकियों ने बचत करना बंद कर दिया। पूरा देश उधार पर चलने लगा और ‘ऋणम् कृत्वा घृतम् पिबेत्’ की उक्ति को चरितार्थ करने लगा।
पूंजी और कर्ज की इस बहुतायत और मुनाफों के लालच ने ही सब प्राईम लोन जैसे संकट को जन्म दिया। अमरीका के बैंकों ने ऐसे नागरिकों को घर बनाने के लिए ऐसे कर्ज दिए, जिनको चुकाने लायक कमाई उनकी नहीं थी। फिर इन कर्जों को बैंकों ने दूसरी वित्तीय संस्थाओं को बेच दिया या बंधक बना कर और पूंजी उठा ली। उनकी वित्तीय संस्थाओं ने पुन: उनके पैकेज बनाकर बेच दिया। इस तरह कर्जों का एक ऐसा जटिल, अपारदर्शी, बहुपरती कारोबार खड़ा हो गया, जिसमें वास्तविक जोखिम का पता ही नहीं चलता था।
गृह ऋण देने वाले बैंक, जोखिम के बारे में इसलिए भी आश्वस्त थे कि किश्त न मिलने पर मकान कुर्क करके नीलाम कर देगें। मकानों और जमीनों की कीमतें लगातार बढ़ रही थी, जिसका एक कारण खुद गृह ऋणों की भारी संख्या से आई तेजी थी। लेकिन ये बैंक इस पूरी व्यवस्था मे बडे स्तर पर बन रही कृत्रमिता, अस्थिरता व जोखिम को समझ नहीं पाए और यही उनकी गलती थी। जब बड़ी संख्या में मकानों को नीलाम करना शुरु किया, तो उनकी कीमतें तेजी से गिरने लगी। नतीजा यह हुआ कि मकानों की कुर्की-नीलामी से भी ऋण वसूली संभव नहीं हुई। यही संकट की शुरुआत थी। बैंक फेल होने लगे। चूंकि इन कर्जों मे कई तरह की वित्तीय संस्थाओं की पूंजी फंसी थी, और आपस में काफी लेन-देन था, कई अन्य बैंक व बीमा कंपनियां संकट में आ गए। फिर तो यह संकट फैलता गया और पूरी दुनिया में छा गया।
पॉल क्रुगमेन ने इसी हालत का जिक्र करते हुए लिखा है- ‘‘पिछले दशक के ज्यादातर हिस्से में अमरीका उधार लेने और खर्च करने वालों का राष्ट्र था, बचतकर्ताओं का नहीं। निजी बचत दर अस्सी के दशक में 9 प्रतिशत से गिरकर नब्बे के दशक में 5 प्रतिशत हुई और 2005 से 2007 के बीच मात्र 0.6 प्रतिशत रह गई। घरेलू कर्ज निजी आय के मुकाबले तेजी से बढ़ा। किन्तु हाल तक अमरीकी लोग विश्वास करते रहे कि वे ज्यादा अमीर बन रहे हैं, क्योंकि उनके मकानों और शेयरों के मूल्य उनके कर्जों से ज्यादा तेजी से बढ़ रहे थे। उनका विश्वास था कि वे इस पूंजी-लाभ पर हमेशा के लिए भरोसा कर सकते हैं। अंत में असलियत सामने आई। संपत्ति के मूल्यों में बढ़ोत्तरी एक भ्रम था, किन्तु कर्जों की बढ़ोत्तरी वास्तविक थी।’’
एक अन्य जगह पर क्रुगमेन ने इस संकट को ‘अति-भोग का प्रतिशोध’ कहा है।

( जारी )

( लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय अध्यक्ष है।)

सुनील
ग्राम पोस्ट -केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461 111
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