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Archive for मार्च 7th, 2009

बुरे दिनों में साथ निभाना दोस्ती का असली मानदण्ड है । आपात काल के दौरान सेंसरशिप द्वारा अभिव्यक्ति की आज़ादी गला दबा दिया गया था । देश भर से निकलने वाली साइक्लोस्टाइल्ड (कई तरुण इस मुद्रण-तकनीक से परिचित न होंगे) बुलेटिनों के अलावा लन्दन से प्रसारित हिन्दी , उर्दू , बांग्ला में बीबीसी की पूर्वी विश्व सेवा(Eastern service) की खबरें , विश्लेषण और साक्षात्कार समाचारों का प्रमुख स्रोत था । उत्तर भारत के घर-घर में रत्नाकर भारतीय , कैलाश बुधवार ,ओंकारनाथ श्रीवास्तव के नाम आत्मीय हो गये थे ।

बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौर में भी जब दुनिया भर की सरकारों ने इस नये मुल्क को मान्यता नहीं दी थी परन्तु दुनिया भर की लोकतांत्रिक मूल्यों में यकीन रखने वाली जनता ने अपने दिलों में जगह दे दी थी तब भी बीबीसी की रेडियो सेवा खबरों का एक विश्वसनीय स्रोत थी ।

उन दिनों भी भारत में लोग यह कहना न भूलते कि बीबीसी सौ ‘सच’ बोलने के बाद जब एक ‘झूठ’ बोलता है तब वह विश्वसनीय हो जाता है । भारत में जब प्रसार भारती द्वारा प्रसारण संस्थानों को स्वायत्तता देने की बात आई तब भी बीबीसी के मॉडल का अध्ययन किया गया था।

निश्चित ही पाकिस्तान , बांग्लादेश और नेपाल के लोगों को भी इस सेवा का लाभ मिलता होगा।खास तौर पर राजशाही ,सैनिकशाही और अधिनायकतंत्र के दौर में ।

बहरहाल पिछले शुक्रवार से इस संवाद सेवा के अन्त की शुरुआत हो चुकी है । कोका-कोला और पेप्सी कोला जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जैसे भारत ,पाकिस्तान,बांग्लादेश में अपनी आनुषंगिक कम्पनियां बना लेती हैं और फिर कीटनाशक अवशेषों के यूरो-मानकों से मुक्त हो जाती हैं ,ठीक वैसे ही बीबीसी लन्दन को समाप्त कर भारत , पकिस्तान , बांग्लादेश , नेपाल में प्रदूषित उत्पादों की दुकाने खोल दी हैं । पाकिस्तान में एक एफ़ एम चैनल से समझौता हुआ तो भारत में भी अप्रशिक्षित कर्मियों को प्रसारण की कमान सौंप दी गयी है । कुल मिला जुला कर विश्व सेवा के खात्मे से उन तमाम सद्गुणों का खात्मा हो रहा है जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है ।

नैशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स बीबीसी के इस कदम के खिलाफ संघर्षरत है ।  हम इन पत्रकारों की लड़ाई के प्रति समर्थन जताते हैं ।

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