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Archive for अगस्त, 2008

एक सभा में

एक श्रोता के रूप में

बहुत-सी सभाओं ने लिया था मेरा समय

लेकिन पहली बार एक श्रोता के तौर पर

संयोग से मैं एक ऐसी सभा में मौजूद था

जिसके आयोजक एक हत्या में शामिल थे

और कार्यवाही से यह भी पता चलता था

कि सभा उस हत्या के समर्थन में बुलायी गयी थी

लेकिन वहाँ न कोई डर था न किसी बात की फिक्र

सभी की पूरी कार्यवाही के दौरान

ग़ज़ब की शालीनता थी

जी ज़रूर कहता था हर कोई हर किसी के नाम के बाद

न मंच पर बैठने को लेकर झगड़ा था न वक्ताओं में कोई मतभेद

सभापति सबको स्वीकार्य थे और आसन पर उनकी मौजूदगी से

सभा में एक धार्मिक या सांस्कृतिक रंग आ गया था

कई वक्ताओं के भाषण श्रोताओं को बड़े ओजस्वी लगे

कई वक्ताओं ने अपनी संस्कृति की महानता का बखान किया

सभापति ने जोर दिया सनातन मूल्यों की रक्षा पर

अंत में बेहद लोकतांत्रिक ढंग से यानी सर्वानुमति से

एक प्रस्ताव पारित हुआ जिसमें मारे गए आदमी के दोषों का वर्णन था

और उससे सहानुभूति रखने वालों की निन्दा की गई थी

और उससे कोई संबंध न रखने की हिदायत दी गई थी

और उन्हें सबक सिखाने का आह्वान किया गया था

जब मैं लौट रहा था तो रास्ते में कुछ लोग

सभा की शालीनता और गरिमा की चर्चा कर रहे थे

राजेन्द्र राजन.

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वे कभी बहस नहीं करते

या फिर हर वक़्त बहस करते हैं

वे हमेशा एक ही बात पर बहस करते हैं

या फिर बहुत-सी बातों पर बहस करते हैं एक ही समय

वे बहस को कभी निष्कर्ष की तरफ़ नहीं ले जाते

वे निष्कर्ष लेकर आते हैं और बहस करते हैं

जब वे बहस करते हैं तब सुनते नहीं कुछ भी

कोई हरा नहीं सकता उन्हें बहस में

राजेन्द्र राजन.

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ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे

हमसफ़र चाहिये हूज़ूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी काफ़िला है मुझे

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे

लब कुशां हूं तो इस यकीन के साथ
कत्ल होने का हौसला है मुझे

दिल धडकता नहीं सुलगता है
वो जो ख्वाहिश थी, आबला है मुझे

कौन जाने कि चाहतो में फ़राज़
क्या गंवाया है क्या मिला है मुझे

 

अहमद फ़राज़ .

[ उर्दू के वरिष्ट शायर अहमद फ़राज़ गुजर गये । चिट्ठेकार शहरोज़ ने मुझे उनके बारे में बताया । फ़राज़ साहब की राजपाल से छपी किताब का देवनागरी में लिप्यांतरण शहरोज़ ने ही किया है ।

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फोटो पोस्टर 'बूट पॉलिश

फोटो पोस्टर

पोस्टर 'बूट पॉलिश'

पोस्टर

शास्त्रीय संगीत पर आधारित व्यंग्य ! मुझे लगता है उत्कृष्ट व्यंग्य के साथ उत्कृष्ट शास्त्रीय संगीत का मेल बैठाना अत्यन्त हूनरमन्द ही कर सकते हैं । ऐसे कभी कदाच ही मुमकिन होता है । मेरे होश में आने के बाद सुनील दत्त / किशोर कुमार बनाम महमूद (मन्ना डे) की पडोसन में हुई स्पर्धा ही इस श्रेणी में गिनी जाएगी ।
शंकर जयकिशन द्वारा संगीतबद्ध इस गीत में मन्ना डे के साथ किसी पक्के शास्त्रीय गायक के टुकड़े भी हैं । क्या वह पण्डित भीमसेन जोशी की आवाज है ? गीत मियाँ की मल्हार में है।

प्रकाश अरोड़ा द्वारा निर्देशित इस श्वेत – श्याम फिल्म बूट पॉलिश (१९५४) में बेबी नाज़ , रतन कुमार,चाँद बुर्के और चरित्र अभिनेता डेविड अब्राहम ने अभिनय किया है। रतन कुमार की चर्चा मैंने इस पोस्ट में की है । इस फिल्म को सर्वोत्तम फिल्म के लिए फिल्म फ़ेयर पुरस्कार मिला । केन्स फिल्म समारोह में बाल कलाकार के रूप में बेबी नाज़ के उत्कृष्टअभिनय का विशेष उल्लेख किया गया । डेविड को सर्वोत्तम सहायक अभिनय के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था। विडियो यहां देखें

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गूगल ने दिसम्बर २००७ में ऐलान किया था कि वह नेट उपयोगकर्ताओं द्वारा लिखे गए एनसाइक्लोपीडिया की शुरुआत करने जा रहा है । २३ जुलाई को इसकी शुरुआत हो गयी है। आप किसी विषय पर लिखेंगे और उस पृष्ट के मालिक होंगे , विकीपीडिया की भांति कोई दूसरा उस पृष्ट का सम्पादन नहीं कर सकेगा । पाठक उस पृष्ट को सुधारने के सुझाव जरूर दे सकेंगे लेकिन आप पर होगा कि उन्हें आप मंजूर करते हैं या नहीं । कई माएने में यह विकीपीडिया से अलग है लेकिन  इन्टरनेट पर अपना स्वायत्त,स्वतंत्र पृष्ट बनाने का दर्शन भी तो मूलत: यही है ! 

   मानिए कि अभय तिवारी इस्राईल के इतिहास के बारे में ‘नॉल’ लिखते हैं । उसी विषय पर २३३५ और लोग लेख लिख सकते हैं । इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में दोहराव होगा। सिद्धान्तत: यह माना जा रहा है कि स्पर्धा होगी तो सब से अच्छी सामग्री वाला पृष्ट टिकेगा ।

    यह बताया जा रहा है कि विकीपीडिया से विपरीत ‘नॉल’ से धन कमाया जा सकेगा । दरअसल एडसेन्स जैसे विज्ञापनों द्वारा गूगल की जो कमायी होगी उसमें से कुछ टुकड़ा लेखक को फेंक दिया जाएगा।

   विकीपीडिया की तरह नॉल में विषय सूची या वर्गीकरण नहीं है । गूगल को शायद अखर रहा है कि लाखों विषयों को सर्च इंजनों से खोजते वक्त मुनाफ़ा न कमाने वाली संस्था ( विकीमीडिया फाउन्डेशन ) द्वारा संचालित विकीपीडिया की प्रविष्टी सब से ऊपर आती है । यह मुमकिन है कि नॉल के पृष्टों को गूगल के सर्च इंजनों पर प्राथमिकता और वरीयता मिले इसकी पूरी संभावना है ।

   ‘नॉल’ गूगल के उपाध्यक्ष यूडी मैनबर के दिमाग की पैदाइश माना जा रहा है । फिलहाल इस पर कुछ सौ लेख हैं जिनमें से ज्यादातर स्वास्थ्य एवं आयुर्विज्ञान पर हैं । विकीपीडिया में सिर्फ़ अंग्रेजी में २१ लाख लेख है तथा इसके द्वारा अन्य भाषाओं में लिखने को भी प्रोत्साहित किया जाता है । गूगल ने ज्ञान की इकाई के रूप में नॉल को परिभाषित किया है ।

    कुछ वर्ष पहले गूगल ने किसी प्रश्न का उत्तर देने और उसकी कीमत देने का एक चोंचला चलाया था।  लगता है कि यह विफल हो चुका है ।

  हिन्दी चिट्ठालोक के कई वरिष्ट सदस्य हिन्दी विकीपीडिया को समृद्ध करने में मेहनत करते आए हैं । अनुनाद सिंह और अनूप शुक्ला हिन्दी विकीपीडिया को समृद्ध करने के प्रति गंभीर रहे हैं । इस दानवाकार कम्पनी द्वारा ज्ञान को कमाई का सस्ता जरिया बनाने के प्रति हिन्दी चिट्ठालोक की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है ।

 

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