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Archive for अप्रैल, 2008

[  जुलाई १९६७ में बनारस में हुए नेपाल के युवा समाजवादियों के सम्मेलन को डॉ. लोहिया ने यह सन्देश दिया था । प्रदीप गिरि , केदारनाथ श्रेष्ठ और नेमकान्त दाहल सम्मेलन के आयोजक थे । लोकतंत्र के करीब आने के बाद शायद यह सन्देश पहली बार प्रसारित हो रहा है ।

    नेपाल के बारे में डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने जो कुछ कहा – लिखा उनमें से यह आखिरी सन्देश है । नेपाल के जनसंघर्ष की अन्तर्पीड़ा को इस सन्देश की सदीच्छा शायद अब पूरी होगी ।  ]

 

   

   

    नेपाली युवजन का एक जगह इकट्ठा होना ही बड़ी बात है । जब राज्य स्वच्छन्द हो जाता है , उसे किसी भी तरह के समूह से डर लगने लगता है । मेरा अन्दाज है कि पशुपतिनाथ की भीड़ से भी वर्तमान राजा को डर लगता होगा । ऐसी अवस्था में जनतन्त्र और समाजवाद का उद्देश्य लेकर जो भीड़ बनारस में इकट्ठा हो रही है वह नेपाली इतिहास के लिए निर्णायक हो सकती है ।

   वर्तमान राजा के पिता ने जब वे राणाशाही के कैदी जैसे थे , मुझसे एक बार पुछवाया था कि क्या किसी जुलूस के नेतृत्व करने का उनका समय आ गया है । राणा और राजा की लड़ाई का आज जैसा जनतन्त्र विरोधी नतीजा निकलेगा ऐसा अन्दाज हम नहीं लगा सके थे । खैर , कोई बात नहीं , क्योंकि इतिहास बिल्कुल सीधी चाल नहीं चलता थोड़े बहुत उलट फेर या आगे पीछे ही करते हैं । एक बात मैं वर्तमान राजा को जरूर कहना चाहूँगा । बेचारे मानें न मानें , आज वे गद्दी पर बैठ हैं उसमें थोड़ा बहुत मेरा भी हाथ रहा है । चाहे इसी नाते मेरी वे सलाह मानें कि नेपाल के नागरिकों को भाषण और संगठन की आजादी मिले बाकी चीजें बाद में होती रहेंगी ,  उनकी और जनता की पारस्परिक रजामन्दी से ।

    नेपाल के युवजनों को मैं सलाह दूँगा कि जनतन्त्र और समाजवाद ऐसे देवता हैं कि जिन पर कभी – कभी बड़ी आहुति चढ़ानी पड़ती है । ऐसा कुछ, थोड़ा बहुत नेपाल के युवजनों ने किया है । लेकिन वह बहुत कम है । देखों योरोप के युवजनों को और उनकी संकल्प शक्त को । संकल्प चाहे छोटा करो लेकिन उसके हासिल करने में अपना तन मन न्योछावर करने की शक्त हासिल करो । मैं बहुत चाहता था आप लोगों के बीच आता लेकिन इसी संदेश से संतोष कर रहा हूँ ।

 डॉ. राममनोहर लोहिया  ,                        जुलाई १९६७ .

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    वर्डप्रेस वाले खुले स्रोत में यक़ीन रखते हैं , लिनक्स वालों की तरह । पिछले दिनों वर्डप्रेस ने अपने चिट्ठों की बाबत तफ़सील से आवाजाही की तालिका देनी शुरु की हैं । अपने चिट्ठे समाजवादी जनपरिषद से सम्बन्धित तालिकाओं को यहाँ दिया ।

  सांख्यिकी का विद्यार्थी होने के नाते कुछ सुकूनदायक आँकड़ों की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहिए । चिट्ठाजगत जैसे कम लोकप्रिय संकलक की तुलना में मेरे मित्र चिट्ठेकार अभय तिवारी के ‘निर्मल आनन्द’ तथा प्रमोद सिंह के अज़दक ने मेरे इस चिट्ठे पर अधिक पाठक भेजे | १५ अलग – अलग हिन्दी चिट्ठों से कुल ५७३ बार पाठक मेरे चिट्ठे पर पधारे । आने वालों की तादाद से सिर्फ़ आधों को मैं अन्य चिट्ठों पर भेज सका ( २८७ पाठक ) । प्रियंकर , मनीष और घुघूती बासूती के चिट्ठे प्रथम तीन हैं जिन पर मेरे चिट्ठे से लोगों ने जाना मुनासिब समझा । कुल २५ मित्र चिट्ठों ( जिनकी मैंने कड़ियाँ दी हैं ) पर मेरे इस चिट्ठे से लोग गए ।

    सबक : मित्रों की कड़ी अपने चिट्ठे पर दो , मित्र तुम्हारे चिट्ठों की कड़ी देंगे । नतीजा बढ़ी हुई आवाजाही ।

      

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गाओ वसन्ततिलका…

vasantatilaka ( स्लाइड शो )

    महुआ के बेतरह गिरते सूखे पत्तों के साथ – साथ उसके फूल भी टपकने लगते हैं । ‘ महुआ वीथिका’ (चित्र २) की सड़क रस से चिपचिपी हो गई है । लगातार कमर झुकाए पत्ते बीनते जो मुसहर परिवार परिवार दीखते थे वे फूल बीनते नहीं दीखते । महुए के फूल बीनने वाले उनसे कुछ बेहतर स्थिति वाले हैं । महामना मालवीय के समय से ही इस परिसर में मुसहर परिवारों द्वारा पत्ते तोड़ने पर रोक नहीं रही । ‘पृथ्वी प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त देती है।’।

   सेमर के पत्तेविहीन पेड़ों से रूई फूट फूट कर उड़ने लगी है (चित्र ८)। इनके लाल और दुर्लभ पीले फूल तो होली के पहले आ कर जा चुके हैं । जिन फल्लियों में अत्यन्त नरम रूई भरी है उनकी लम्बाई से बराबरी करती सैकड़ों मैना के झुंड इन विशाल नग्न सेमरों पर ही कलरव करते हुए आराम करते हैं ।

    वसन्त के इस दौर में मेहमान हैं रूसी हारिल (चित्र ३ ,४) । फ़ाख़्ते ( चित्र ५) – कबूतरों के भाई बन्द ।अत्यन्त शर्मीले। परिसर की सड़कों के जिन हिस्सों से सुबह टहलने वाले कम गुजरते हैं , उनके किनारे लगे दरख़्त हारिलों को प्रिय हैं । धनराजगिरी छात्रावास के सामने के महुए पर प्राय: इनके दर्शन होते हैं । जिस दिन दो कौए उस पेड़ पर होते हैं , हारिल मानो हेरा जाते हैं । मुम्बई के चाचा – भतीजे इन्हीं कौओं के गोत्र के होंगे । प्रवासियों के घरौंदों मे अपने अण्डे देने-सेने की फिराक में ।

    हारिलों के बारे में जिन सुबह टहलने वालों से जानना चाहा संयोग से दोनों पूर्व शिकारी हैं । रतन ने बताया कि कहावत है – ‘ हारिल-लकड़ी के अछूट रिश्ते की ‘ । पानी पीते वक्त भी इनके पंजे में कोई लकड़ी जरूर होती है । डॉ. सुशील सिंह ने बताया कि यह आहार बनने वाले परिन्दों में एक है ।

 

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    सोनाबाबू उनमें थोड़ा अलग थे । कुछ – कुछ बिंदास और कुछ – कुछ जिज्ञासु । मेरी उनसे अच्छी पटती थी ,  मेरी कटु आलोचनाओं के बावजूद उनमें सुनने और समझने का धैर्य था । अपने हमउम्र रंगकर्मियों में वह मुझे आत्मविकास के प्रति सजग नजर आते । वे अपनी नाट्य प्रस्तुतियों को अपनी सीमाओं के बावजूद ठोस आधारों पर खड़ा करते और काफी मेहनत करते । उनके निर्देशन में एक तरह का कसाव रहता जो रंगमंच पर नाटक को झूलने से अक्सर बचा लेता । अपनी नाट्यमंडली के सदस्यों , अभिनेताओं और दूसरी तरह के कार्यकर्ताओं के साथ उनके मानवीय रिश्तों में गर्माहट थी जो उन्हें एकजुट बनाए रखने में काफी मदद करती थी । सोनाबाबू के मन में अच्छा थियेटर करने की उमंग थी लेकिन अपने रंग परिवेश की सीमाओं से वे अक्सर तल्ख़ हो उठते थे । काशी में साधन कोई है ही नहीं । यहां तो हमें जो कुछ भी करना है । उसके बारे में सोचना पड़ता है।आर्थिक पहलू से कमजोर होते हुए भी हम हिंदी रंगमंच की स्थिति को कायम रखे हैं । प्रकाश व्यवस्था के संबंध में कुछ यंत्र डीएल्डब्ल्यू (डीजल रेल इंजन कारखाना) में है पर वे वहीं के लिए सीमित हैं । दूसरों के लिए अप्राप्य ।काशी में आज भी कोई सस्ता मंच न सरकार दे सकी , न रंगकर्मी जुगाड़कर सके , न कोई दानवीर दे सका और न नगरमहापालिका ही कोई सुसज्जित रंगमंच की आवश्यकता महसूस कर सकी ।

    सोनाबाबू अपनी प्रस्तुति और अपनी संस्था से  कुछ ऊपर उठकर काशी के पूरे रंगपरिवेश को उन्नत करने की बात सुनकर सक्रिय भी हो सकते थे । मैंने जब काशी में एक डायेरेक्टर्स फोरम बनाने की योजना बतायी तो वे इसके लिए फौरन तैयार हो गये और शिवमूरत सिंह को उसका संयोजक बना दिया गया ।उसमें मेरे और सोना बाबू के अलावा डीएलडब्ल्यू के ज्योतिंद्र सिंह सोहल भी तुरन्त शामिल हो गये ।लेकिन बनारस के थियेटर की फिजा को मोड़ने में माहिर कुछ लोगों की कृपा से यह फोरम न आगे बढ़ सका न ज्यादा कुछ कर सका ।

    डाकतार विभाग में नौकरी करते हुए और भरी-पूरी गृहस्थी की गाड़ी को कुशलतापूर्वक खींचते हुए भी अपने जीवन के बहुमूल्य ३० – ३५ वर्ष सोना बाबू ने हिन्दी रंगमंच को अर्पित कर दिये । काबिलेगौर है कि यह हिन्दी का अव्यवसायी रंगमंच था जिसके भरोसे असली हिन्दी रंगमंच पिछले सौ साल से टिका हुआ है । औसतन लगभग तीन घण्टे प्रति शाम ऐसा रंगकर्मी हिन्दी को देता है । बिना किसी आर्थिक प्रतिदान के अपने घरेलू जीवन के लिए जरूरी वक्त को छीन कर । मरने के बाद उसके पीछे क्या रह जाता है। कुछेक फोटोग्राफ ,  अखबारों की कुछ कतरनें ,दो-चार अदद छोटे बड़े पुरस्कारों के सर्टिफिकेट्स जो उत्तराधिकारियों के किसी काम के नहीं । इनके अलावा और जो मूल्यवान वह कुछ छोड़ जाता है।एक कला परंपरा को बनाए रखने की कोशिश । उसकी कोई पहचान,कोई कद्र नहीं ।

    सोना बाबू के खाते में लगभग डेढ़ दर्जन नाटकों का निर्देशन और उतने ही में अभिनय , लगभग आधा दर्जन मौलिक नाटक लेखन और करीब दस साहित्यिक कृतियों का नाट्य रूपांतर है । इनके अलावा कई छोटे-मोटे पुरस्कारों के अतिरिक्त अभिनय के लिए शाकुंतल तथा उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार भी उनके खाते में है।हो सकता है कोई अपने खाते में इससे बड़ी संख्या गिना दे लेकिन अपने दौर में गुणवत्ता की दृष्टि से सोनाबाबू अंगुलियों पर गिने जाने वालों में हैं । ऐसे तेजस्वी रंगसहकर्मी को खोकर मैं मर्माहत हूँ ।

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पिछला भाग

सोनाबाबू श्रीनाट्यम के संस्थापकों में से एक थे और उसके साथ उन्होंने नाटकों में अभिनय के अलावा अनुवाद , रूपांतर तथा मौलिक नाटक लेखन के भी प्रयास किए । संगठन और आर्थिक साधन जुटाने में भी उनका काफी हाथ था । लेकिन यह सिलसिला अधिकतम एक दशक से ज्यादा न चल सका और फिर श्रीनाट्यम से अलग होकर उन्होंने अपनी एक दूसरी संस्था बना ली । यों यह एक सामान्य प्रक्रिया थी लेकिन आज जब मैं हिन्दी रंगमंच के विकास , खास तौर से काशी के रंग इतिहास के संदर्भ में सोचता हूँ तो यह एक ऐसा दुर्भाग्यग्यपूर्ण सिलसिला नजर आता है जिससे काशी का रंगमंच अभिशप्त है । सौ साल पहले श्री नागरी नाट्यकला संगीत प्रवर्तक मंडली दो हिस्सों में बंटकर नागरी नाटक मंडली और भारतेन्दु नाटक मंडली बन गयी । उसके बाद से तो काशी की रंग संस्थाओं का इतिहास बनने , टूटने और मिटने का ही इतिहास है जो आज भी अनवरत चलता जा रहा है ।

    किसी समर्थ , संभावनापूर्ण और स्थायी रंगमंचीय परम्परा के निर्माण के लिए काफी संख्या में निष्ठावान , प्रतिभावान , कुशल अभिनेता ,अभिनेत्री ,एक नहीं , कई निर्देशक , कई-कई क्षेत्रों के कलाकार,साहित्यकार , पत्रकार और तरह तरह की व्यवस्थाएँ कर सकने वाले कर्मठ लोग तो चाहिए ही , एक बड़े स्थायी दर्शक वर्ग का भी संरक्षण चाहिए । लंबी नाट्य परंपरा वाले नगर वाराणसी में आज भी ऐसे लोग काफी हैं , लेकिन शायद उतने ही जितने से सिर्फ एक या दो संस्थाएं ही नियमित और बेहतर प्रदर्शन कर सकें ।

    सोनाबाबू ने एक जगह अपने अलगाव का कारण रंगमंच को निजहित एवं प्रचार का माध्यम बनाकर केवल अपना ठीहा जमाने के लिए कुत्सिय प्रयासों में लीन रहने और शुद्ध कलात्मक मूल्यों के लिए रंगमंच के प्रति आस्था के बीच का संघर्ष बताया है लेकिन यह बात दोनोंही पक्षों के लोग कहते हैं ।

    बहरहाल रंगधर्मिता को जीवन का आचरण मानकर चलने वालों के श्रम का मूल्यांकन एवं प्रोत्साहन और हिन्दी रंगमंच को और अधिक विकसित तथा लोकप्रिय बनाने जैसे उद्देश्यों को लेकर सोना बाबू ने ओमप्रकाश जौहरी और रमेशचन्द्र पांडेय के आर्थिक सहयोग से १९७० ई. में अनुपमा नाम से एक नई नाट्य संस्था का गठन किया जिसकी प्रथम प्रस्तुति नींव के पत्थर – १५ अगस्त १९७० – थी जिसके लेखक और निर्देशक तो स्वयं सोना बाबू थे ही , अन्य लोगों के साथ उसमें अभिनय भी किया था । इसके बाद उन्होंने हिन्दी के व्यापक रंगजगत में बहुचर्चित आषाढ़ का एक दिन , आधे अधूरे, पगला घोड़ा , अंधायुग , सच और झूठ , थैंक यू मिस्टर ग्लाड , आदि नाटकों में अभिनय और निर्देशन किया। पिछली सदी के सत्तर का दशक काशी ही नहीं सम्पूर्ण हिन्दी रंगजगत के लिए बेहद सक्रियता का दशक था । महत्वाकांक्षाओं से भरे बहुत सारे युवा रंगकर्मियों की गतिविधियों और स्पर्धात्मक उत्साह से काशी का रंगपरिवेश भरा भरा सा था । जगह- जगह रिहर्सल हो रहे थे । रेस्तराओं और चाय और पान की दुकानों पर रंगकर्मी घंटों जमे रहकर तरह-तरह की रंगचर्चाओं कुचर्चाओं में मशगूल रहते। रंगकर्मियों की यह भीड़ कई समूहों में बंती होती जिनका नेतृत्व उनके निर्देशक करते। ये सब अपने किए की प्रशंसा तलाशते रहते ताकि आगे करते रहने का संबल बरकरार रहे ।

    सोनाबाबू उनमें थोड़ा अलग थे । [ जारी ]

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  सोनाबाबू ( अवधबिहारीलाल श्रीवास्तव ) नहीं रहे । उनके साथ ही काशी रंगपरिवेश का एक अध्याय पूरा हो गया । मेरे लिए सोनाबाबू को याद करना पिछली आधी शती के अपने ही नाट्यजीवन को याद करने जैसा है । इस आधी सदी में बनारस के थियेटर ने कितने रंग बदले ।

    आज से पचास साल पहले मैंने उन्हें पहली बार अभिनय करते देखा था । मैदागिन स्थित टाउनहाल का ऐतिहासिक भवन था जिसे आम जनता अंधरी कचहरी के नाम से जानती थी । उन्नीसवीं शती के साठ के दशक में अंग्रेजी हुकूमत ने पहली बार आनरेरी मैजिस्ट्रेटी की प्रथा चालू की थी और काशी के कई रईसों को आनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाकर उन्हें छोटे-मोटे मामलों की सुनवाई और फैंसले का अधिकार सौंपा था । भारतेंदु भी उनमें से एक थे । उनकी कचहरी यहीं लगा करती थी । उसी समय आम जनता की जुबान पर आ कर आनरेरी अंधरी बन गया । स्वयं भारतेन्दु ने प्रेमजोगिनी में इस और इशारा किया है- ‘ और कहिए अंधरी मजिस्ट्रों का क्या हाल है ? ‘ बाद में यहाँ कचहरी बन्द हो गयी और यह भवन सार्वजनिक कामों के लिए म्युनिसिपैलिटी को सौंप दिया गया । स्वतंत्रता के बाद मैंने इसी भवन में कई नाटक किए और देखे हैं । उस समय नागरी नाटक मंडली का प्रेक्षागृह नहीं बना था और उसकी जगह खुला मैदान था । रंगमंच जरूर विशाल और भव्य था लेकिन वह कुछ इस तरह सीलबंद कर रखा जाता था कि उसे खुलवाना और सफाई करवाना अपने आप में एक छोटा-मोटा नाटक करने जैसा था । इसीलिए ज्यादातर शौकिया नाट्य मंडलियाँ टाउनहाल को ही अपनी प्रस्तुतियों के लिए चुनती थीं ।

    बांग्ला व्यावसायिक रंगमंच पर सफलता अर्जित कर चुके सत्य बंद्योपाध्याय के स्फीत भावनाओं से ओतप्रोत नाटक एरा ओ मानुष – ये भी इंसान हैं- के मुख्य चरित्र मानसिक रूप से विकलांग दासू का चुनौतीपूर्ण अभिनय सोनाबाबू ने किया था । निर्देशक प्रभातकुमार घोष और अनुवादक दया गिरी थे । प्रस्तुत करने वाली उस समय की सबसे  महत्वपूर्ण संस्था थी श्रीनाट्यम । सोनाबाबू के साथ ही इस संस्था से जुड़े़ और भी कई निष्ठापूर्ण रंगकर्मियों की यादें आ रही हैं । त्रिलोचन प्रसाद भार्गव , गोविन्द प्रसाद केजरीवाल , डॉ. कौशलपति तिवारी , कौतुक बनारसी , मंगला भगत , रामचन्द्र विश्वकर्मा , रामउजागर शर्मा , शमशेर बहादुर सिंह ,- फिल्मों के सुजीत कुमार – आदि । उन्नीस जुलाई १९५८ ई. को हुई यह प्रस्तुति मुझे इसलिए भी याद है कि मेरी नाट्य समीक्षा का श्रीगणेश भी इसी के साथ हुआ , जब नाटक से लौटने के बाद देर रात तक जाग कर सहज प्रभाव प्रेरणावश मैंने इसकी लंबी समीक्षा लिख डाली थी ।

   इस नाटक की उसी वर्ष पांच प्रस्तुतियाँ हुईं । इनके दर्शक या तो श्रीनाट्यम के सदस्य होते थे या फिर टिकट खरीदने वाली जनता । बिना किसी सरकारी अनुदान इसकी प्रत्येक प्रस्तुति आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती थी । किसी अव्यवसायी नाट्य संस्था की यह ऐसी उपलब्धि थी जो काशी में बहुत कम दुहराई जा सकी । गोविन्द प्रसाद केजरीवाल को जब यह पता लगा कि मैंने ये भी इंसान हैं की लंबी समीक्षा लिखी है तो वे मुझे बुलाकर नाट्यम के रिहर्सल में ले गये जहाँ मैंने कलाकारों के सामने अपनी समीक्षा का पाठ किया । बड़ा अनोखा अनुभव था । उसी समय अन्य कलाकारों के अलावा सोना बाबू से मेरा सीधा परिचय हुआ । प्रसंगवश यह रिहर्सल भी बांगला के लोकलुभावन नाटक परिछय के हिन्दी अनुवाद का चल रहा था जिसकी प्रस्तुति इसी वर्ष १३ सितंबर को हुई थी । श्रीनाट्यम तेज रफ़्त्यार से आगे बढ़ रहा था ।

[ जारी ]

प्रख्यात नाट्यविद एवं लेखक कुँवरजी अग्रवाल ख्यातनाम नाट्य निर्देशक हैं तथा नैशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में प्राय: जाते हैं । साझा संस्कृति मंच के वे संस्थापक अध्यक्ष रहे हैं । ‘ सुबहे बनारस’ ,हिन्दुस्तान से साभार ।

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घाट - ठ??रवअकिंचनगंगा घाट

श्यामलाल ‘पागल’ मीरजापुर जिले के घुरहूपुर निवासी हैं । यहाँ प्रस्तुत उनके पहले व तीसरे चित्र कैनवस पर तैल -रंगों के तथा दूसरा कागज पर जल-रंग से बना है । काशी विश्वविद्यालय के दृश्य कला संकाय से पेन्टिंग में एम.एफ़.ए में प्रथम स्थान पाने के अलावा राष्ट्रीय ललित कला अकादमी द्वारा उनके चित्र पुरस्कृत हुए हैं तथा देश की प्रमुख वीथिकाओं में प्रदर्शित हुए हैं , संग्रहित हैं ।

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