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Archive for फ़रवरी, 2008

malati choudhary ,nagabhushan,

‘मोहल्ले’ पर किसी ने महादेव देसाई के नाम से टीपा।’अंग्रेजों भारत छोड़ो-करो या मरो’ के नारे के बाद इस नारे को सर्वप्रथम लगाने वाले के साथ गिरफ़्तार हुए महादेव देसाई १५ अगस्त , १९४२ को जेल बना दिए गए आगा खाँ महल में मरे ।

    उन जैसे महानुभावों से चाहूँगा ऊपर दिए चित्र को चीन्हने की कोशिश करें , दिक्कत हो तब भाकपा(मा.-ले.) के किसी पुरानी साथी से पता करें। मैं करीब २०-२५ दिनों बाद लौटा तब इस चित्र पर लिखूँगा।

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[ ‘भवानी प्रसाद मिश्र के आयाम’ , संपादक लक्ष्मण केड़िया,विशेषांक ‘समकालीन सृजन’ , २० बलमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता – ७००००७ से साभार ]

तुम काग़ज़ पर लिखते हो

वह सड़क झाड़ता है

तुम व्यापारी

वह धरती में बीज गाड़ता है ।

एक आदमी घड़ी बनाता

एक बनाता चप्पल

इसीलिए यह बड़ा और वह छोटा

इसमें क्या बल ।

सूत कातते थे गाँधी जी

कपड़ा बुनते थे ,

और कपास जुलाहों के जैसा ही

धुनते थे

चुनते थे अनाज के कंकर

चक्की पिसते थे

आश्रम के अनाज याने

आश्रम में पिसते थे

जिल्द बाँध लेना पुस्तक की

उनको आता था

भंगी-काम सफाई से

नित करना भाता था ।

ऐसे थे गाँधी जी

ऐसा था उनका आश्रम

गाँधी जी के लेखे

पूजा के समान था श्रम ।

एक बार उत्साह-ग्रस्त

कोई वकील साहब

जब पहुँचे मिलने

बापूजी पीस रहे थे तब ।

बापूजी ने कहा – बैठिये

पीसेंगे मिलकर

जब वे झिझके

गाँधीजी ने कहा

और खिलकर

सेवा का हर काम

हमारा ईश्वर है भाई

बैठ गये वे दबसट में

पर अक्ल नहीं आई ।

भवानी प्रसाद मिश्र

[ १९६९ ]

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फूल को छिपा लिया

शब्दों से ढका हुआ है सब कुछ

मैंने कहा फूल

एक शब्द ने फूल को छिपा लिया

मैंने कहा पहाड़

एक शब्द आ खड़ा हुआ पहाड़ के आगे

मैंने कहा नदी

एक शब्द ने ढक लिया नदी को

शब्दों से अबाधित नहीं है कुछ भी

पता नहीं कब से

शब्दों से ढका हुआ है सब कुछ

ओह , पता नहीं कब से

मैं खोज रहा हूँ

शब्दों से निरावृत सौन्दर्य ।

राजेन्द्र राजन

बस यही एक अच्छी बात है

मेरे मन में

नफरत और गुस्से की आग

कुंठाओं के किस्से

और ईर्ष्या का नंगा नाच है

मेरे मन में

अंधी ,महत्त्वाकांक्षाएं

और दुष्ट कल्पनाएं हैं

मेरे मन में

बहुत-से पाप

और भयानक वासना है

ईश्वर की कृपा से

बस यही एक अच्छी बात है

कि यह सब मेरी सामर्थ्य से परे है ।

– राजेन्द्र राजन

मेरा अंधकार

थोड़ी सी रोशनी जो मिली थी मुझे

शब्दों में बिखेर दिया मैंने उसे

मगर शब्दों से परे था मेरा अंधकार

मैं कैसे बताता कि कितना घना था मेरा अंधकार

जो कि मुझसे ही बना था

वह मेरे शब्दों से परे था

बहुत सी अंधेरी जगहों में मैं गया

पर खुद के अंधकार में

जाने की हिम्मत मुझमें नहीं थी

शायद यही था मेरा अंधकार

जो मेरे शब्दों से परे था

शब्दों से इतना परे

कुछ भी नहीं था मेरे लिए

जितना कि मेरा अंधकार ।

राजेन्द्र राजन

राजेन्द्र राजन

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