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Archive for नवम्बर, 2007

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अब विचार किया जाए अखबार के इन सभी अंग – उपांगों को एकजुट कर एक सजीव कृति के रूप में गढ़ने वाले सम्पादक पर । उस सजीव कृति को गढ़कर उसे कौन सा उद्देश्य हासिल करना है उस पर काफ़ी कुछ निर्भर रहता है । ( १ ) कुछ सम्पादक सिर्फ़ लोकमत का प्रतिबिम्ब दरसाते हैं , लोकमत की योज्ञता – अयोज्ञता पर बगैर विचार किए सिर्फ़ उन्हें ज्यों का त्यों पेश कर देते हैं । ( २ ) कुछ सम्पादक लोकमत को जान – समझ कर उसे सुधारने वाले , गढ़ने वाले और मौका पड़ने पर जनता के विरुद्ध , उसका तिरस्कार झेल कर भी अन्याय और दुराचार के विरुद्ध जबरदस्त जुंबिश चलाने वाले होते हैं । ( ३ ) कुछ लोकशिक्षक होते हैं , अपने जमाने को पलटने वाले । प्रथम वर्ग में आने वालों की संख्या ढेरों ढेर होती है । दूसरे और तीसरे वर्ग में आने वाले गिने-गिनाये ही होते हैं ।

विलायत और अमेरिका जैसे स्वतंत्र देशों में पत्रकारिता की कला सम्पूर्ण रूप से खिली है तथा वहाँ इन तीनों प्रकार के सम्पादक मिलते हैं । तीनों प्रकार के सम्पादकों ने अपने – अपने अखबारों को सफल समाचारपत्र बनाया है , शिक्षण सार्वजनिक हो चुका है इसलिए एक – एक पत्र की १० से २० लाख तक नकल  खपती हैं । उनके दफ़्तरों में डेढ़ से दो हजार तक लोग होते हैं । सिर्फ सम्पादकीय विभाग में ही मुख्य सम्पादक के मातहत अनेक विभागों के सम्पादक – उपसम्पादक मिला कर २० – २५ लोग होते हैं जिनके मददगार – कारकून अन्य ढेर सारे होते हैं । हमारे निर्धन देश में एक सूत्रधार को ही यह सारे खेल खेलने होते हैं । देश परतंत्र है इसलिए उसकी चोट जिनके हृदय पर है वे मुल्क को आज़ाद कराने में जूझे अथवा अखबार निकालें ?

इन विषम परिस्थितियों में भी सी.वाई. चिन्तामणि जैसे , रामानन्द चैटर्जी जैसे , मोतीलाल घोष , श्री नटराजन एवं कालीनाथ राय जैसे सम्पादक तैयार हुए हैं यह ईश्वर की कृपा है । गांधीजी और तिलक महाराज जैसे तो किन्हीं भी परिस्थितियों में पहाड़ तोड़ने वाले विरले होते हैं । अन्य पत्रकार हैं जिन्होंने अपने – अपने अखबारों को आर्थिक रूप से सफलता दिलायी है , जिन्होंने जनता या सरकार को न छेड़ने की नीति अपना कर हवा का रुख देख कर नाव चलाई है । ऐसे सफल अखबार अपने देश में अंग्रेजी में तो चल ही रहे हैं ,  गुजराती में भी चल रहे हैं । मैं इन ‘सफल’ पत्रों की चर्चा का इच्छुक नहीं हूँ । मेरी नज़र में जनता को गढ़ने वाले , जनता की सेवा करने वाले अखबार ही रहे हैं । इसलिए उपरिवर्णित दूसरे और तीसरे किस्म के सम्पादकों का ही तफ़सील से वर्णन करूँगा ।

इन लोक शिक्षक तथा राष्ट्र निर्माता सम्पादक का वर्णन करते हुए सी.पी स्कॉट ने कहा है , ” लोकमत पर असर डालना तथा उसे चित्रित करना महाभारत समान है , किसी एक व्यक्ति अथवा एक अखबार के लिए इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरना मुश्किल है । इस कार्य के लिए उत्तमोत्तम कुशलता चाहिए , शिक्षा के उत्तमोत्तम संस्कार चाहिए , कुशाग्र बुद्धि-शक्ति चाहिए ; इन सब गुणों के साथ – साथ इन्हें सामर्थ्य प्रदान करने वाली धर्मभीरुता चाहिए , सत्यनिष्ठा चाहिए – हृदय की नहीं अपितु बुद्धि की सत्यनिष्ठा की आवश्यकता होनी चाहिए । ” इन गुणों से लैस सम्पादक ही दूसरी तथा तीसरी कोटि में आ सकते हैं । दूसरी श्रेणी के सम्पादकों के नाम ढूँढ़ने पर अमेरिका के लॉइड गैरिसन , इंग्लैंड के डीलेन , स्टेड और सी.पी. स्कॉट तथा अपने मुल्क में गांधीजी का नाम सूझता है । तीसरी श्रेणी में गांधीजी और तिलक महाराज के सिवा अन्य नाम नहीं सूझता ।

स्व. मोतीलाल घोष , श्री चिंतामणी , नटराजन , रामानन्द चैटर्जी  तथा कालीनाथ राय की गिनती मैं समर्थ समाचार विश्लेषकों में करता हूँ । देश की परिस्थिति के कारण इनकी सेवा की शक्ति मर्यादित रही है । स्व. मोतीलाल की कटाक्ष भरी कलम एक बार बंगाल की सरकार पर भारी पड़ गयी थी , परन्तु उनका प्रभाव ऐसा था कि उन्हें सरकार कभी जेल में ठूँस न सकी । जेल में भरने का युग आया तब वे ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज जहाँ नहीं उगता उस धाम में पहुँच चुके थे । श्री चिन्तामणि का ज्ञान आश्चर्यजनक है ।कहा जाता है कि पिछले पचास वर्षों का हिन्दुस्तान का इतिहास उन्हें उँगलियों पर याद है और छोटी से छोटी घटना को वे तारीख़ सहित बता सकते हैं । मॉन्टेग्यु जब भारत आया तब उनके ज्ञान से आश्चर्यचकित हो गया था । नटराजन एक अनुभवी समाजसुधारक तथा सिद्धहस्त पत्रकार हैं , रामानन्द चैटर्जी और कालीनाथ राय गहरे अध्ययन के बूते अनेक लेखकों को शिक्षित करने का मद्दा रखते हैं। परन्तु गांधीजी और तिलक महाराज की जात और भात इन सब से जुदा है । उनकी पत्रकारिता पर उनके लोकनेतृत्व की छाप पड़ी है। दोनों राष्ट्र निर्माता और लोकशिक्षक हैं । उनकी बात मैं यहाँ क्या करूँ ?उन दोनों की सत्ता और प्रभाव का अनुभव अभी हम कर रहे हैं तथा आगे भी करेंगे । उनके लोकशिक्षण के नतीजे हमारी नजरों के सामने तैर रहे हैं ।

इस भाषण के अन्य भाग :

पत्रकारीय लेखन किस हद तक साहित्य

पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई

पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता , ले. महादेव देसाई

पत्रकारिता (४) : ” क्या गांधीजी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ? ”

पत्रकारिता (५) :ले. महादेव देसाई : ‘ उस नर्तकी से विवाह हेतु ५०० लोग तैयार ‘

पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई

समाचारपत्रों में गन्दगी : ले. महादेव देसाई

क्या पाठक का लाभ अखबारों की चिन्ता है ?

समाचार : व्यापक दृष्टि में , ले. महादेव देसाई

रिपोर्टिंग : ले. महादेव देसाई

तिलक महाराज का ‘ केसरी ‘ और मैंचेस्टर गार्डियन : ले. महादेव देसाई

विशिष्ट विषयों पर लेखन : ले. महादेव देसाई

अखबारों में विज्ञापन , सिनेमा : ले. महादेव देसाई

अखबारों में सुरुचिपोषक तत्त्व : ले. महादेव देसाई

अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक , ले. महादेव देसाई

कुछ प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार (१९३८) : महादेव देसाई

[ अगला : प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार ]

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लोगों की सुरुचि के पोषक , रसवृत्ति की उन्नति करने वाले व बुद्धि का अनुरंजन करने वाले उपायों पर एक भी अखबार जोर नहीं देता। हम वीभत्स चित्र देते हैं लेकिन मौजूदा राजनैतिक अथवा सामाजिक परिस्थिति पर प्रकाश डालने वाले ‘ कार्टून ‘ – व्यंग्य चित्र क्यों नहीं देते ? कार्टून की कला पश्चिम में खूब विकसित हुई है, ‘ हिन्दुस्तान टाइम्स ‘ में शंकर नामक कलाकार उत्तम व्यंग्य चित्र बनाता था ।यदि अखबार व्यंग्य चित्रों को तरजीह दें तो उनमें कौशल हासिल करने वाले अनेक लोग पैदा हो सकते हैं । आकर्षक अनुच्छेद लिखने की कला भी विकसित करने लायक है, इससे पाठकों की बुद्धि को खुराक मिलती है तथा विनोद वृत्ति बढ़ती है । ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के तत्कालीन सम्पादक जोसफ़ इस कला में अनूठे थे । एबिसीनिया पर अत्याचार के कारण इटली पर रोक द्वारा सजा के उपायों की बड़ी बड़ी बातें चल रही थीं । इन उपायों को अमल में लाने की कूअत किसी में नहीं थी – इस बात की व्यंग्यात्मक टीका करते हुए इस लेखक का लिखा एक पैराग्राफ़ याद आ रहा है : ” सैंकशन्स शुरु होते ही उन का कितनी कड़ाई से अमल होगा , यह काबिले गौर है । न्यू दिल्ली के भोजभात में मेकेरोनी और स्पाघेटी का बहिष्कार होगा । इटालियन शराब तो कोई छुएगा भी नहीं । पराक्रमी फ्रान्स तो सर्वप्रथम सैंकशन्स लगाएगा , इसलिए शैम्पेन की पूछ बढ़ जाएगी । अखबारों को तो लम्बी छुट्टी ले लेनी होगी क्योंकि छपाई तो पूरी रोमन टाइप में होती है, या फिर ईटालिक्स में । अंग्रेजी में शब्द भी लैटिन से आते हैं यानी अत्याचारी प्रजा इटली की भाषा से – इसलिए उसका भी बहिष्कार ! ”  

कटाक्ष द्वारा लम्बे बोधप्रद लेख लिखने वाले स्व. लल्लू काका के पुत्र भाई गगनविहारी हैं । उनका पूरा लेख तो क्या उद्धृत करूँ?हमारी कायरता , त्याग तथा उद्यम करने की अशक्ति का दोष खुद पर न ले कर औरों के मत्थे पढ़ने की वृत्ति का जो जानदार उपहास “कोई और” नामक लेख में उन्होंने किया है उसे पढ़ कर कौन अपने गिरेबान में नहीं झाँकेगा तथा आनन्द नहीं लेगा ? उस लम्बे लेख से कुछ झलकियाँ पेश कर रहा हूँ :

” आप के काम में भी क्या यह अज्ञात मनुष्य असंख्य विघ्न नहीं डाला करता है ? कोई किताब ढूँढे न मिल रही हो , कोई नोटबुक या फाइल खो गई हो , कोई कागज लापता हो – ऐसी स्थिति में दफ़्तर के सभी कारकून पूरे यकीन से यही कहते हैं कि भूल किसी दूसरे की थी ।…

” सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में इस अज्ञात व्यक्ति की विनाशकारक शक्ति को हर जगह देखा जा सकता है । सभी युद्ध अन्य देशों की दुष्टता के कारण होते हैं , यह साफ़ है । दूसरे देश ही शान्ति का उल्लंघन करते हैं ,हिंसामय माहौल बनाते हैं तथा हरेक युद्ध का आरम्भ करते हैं ।हमारा अपना देश तो हमेशा आत्मरक्षार्थ ही लड़ता है ।युद्ध के दौरान होने वाले तमाम अधम कृत्य , अत्याचार तो परदेशी ही करते हैं ।…….

” हर रोज अखबार पढ़ने का महान देश-कार्य करते वक्त असंख्य लोगों को यही लगता कि यदि भारी तादाद में दूसरे जेल गए होते , लाठी खाई होती और स्वदेशी का व्रत लिया होता तो पूर्ण स्वराज्य नहीं तो उसका सत्व या तत्व अवश्य मिल जाता । बहुतेरे देशबन्धुओं ने मुझे भरोसा दिया है कि यदि केवल एक लाख लोग मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने के लिए तैयार होते तो भारत जरूर आज़ादी प्राप्त कर लेता ।…..

” हिन्दू और मुसलमान कौमों के नेता एकता की आवश्यकता के बारे में एकमत हैं । बावजूद इसके एकता क्यों नहीं सधती है ? कौन इन नासमझियों और विद्वेष को उत्पन्न करता है ? दूसरी कौम के दूसरे मनुष्य ! इसलिए नेता अन्य मनुष्यों से ( अथवा नेताओं से ) एकता साधने की निरंतर विनती करते रहते हैं ।…….

” इस प्रकार यह अनजान मनुष्य हमारी राष्ट्रीय प्रगति को अटका देता है , हमारे सामाजिक जीवन को अव्यवस्थित कर देता है तथा आर्थिक उन्नति हासिल करने नहीं देता । इसके बावजूद उससे हमारी भेंट नहीं होती ! कोई शर्लॉक हॉम्स जैसा कुशल डिटेक्टिव या सरकार की खूफिया पुलिस या गुप्त जासूस भी उसे पकड़ नहीं पाते , वैसे ही कोई योगी प्रबल समाधि द्वारा उस सर्वव्यापी , अगाध एवं गहन व्यक्ति के अस्तित्व के रहस्य का भेद नहीं जान पाता है ।….”

” क्या पता यह रहस्य जो इतना कठिन लग रहा है, वह बिलकुल सरल हो ? यह दूसरा आदमी जो हर जगह बसता है और कहीं नहीं बसता – वह शायद आप में , मुझ में तथा हम सब में ही तो नहीं बसता होगा ?…..”

इसी दिशा में ; परन्तु कुछ अलग प्रकार और अलग लहजे का आभास देने वाले मीठे कटाक्ष ‘स्वैरविहारी’ रामनारायण पाठक के होते हैं । हम सब की गंदगी जुटाने की वृत्ति पर उनकी कटार देखें :

”  यहाँ , मुम्बई आया हूँ इसके बावजूद यह नहीं लगा कि मुल्क छोड़ कर आया हूँ । उसका कारण अपनी भाषा , अपने मित्र , जाने-पहचाने रीति रिवाज आदि सब कुछ है परन्तु सब से विशेष है यहाँ का कूड़ा । जब नजर के सामने कूड़े के अम्बार को बढ़ते देखता हूँ तब लगता है, ‘ नहीं,नहीं, मैं अभी गुजरात में ही हूँ ।’  गीत फूट पड़ता है :

‘ जहँ – जहँ बसा एक गुजराती , तँह – तँह सदा काल गुजरात ! ‘

” लोग बेवजह बढ़ते हुए कूड़े की फरियाद करते हैं । कूड़ा तो बढ़ेगा ही , और कर ही क्या सकता है ?  मुम्बई का विकास चाहने वालों ने बड़े बड़े पीपे रख छोड़े हैं – कूड़ा इकट्ठा करने के लिए । वैसे तो हमारे गाँव में भी कूड़ा एकत्र करने के लिए स्थान निर्धारित है। पर यह कूड़ा है कि बिना फैले रह नहीं पाता । समुद्र में तूफान भले न आये लेकिन वो कूड़ा जरूर छोडता है । कूड़े की फरियाद करने वाले समझ नहीं पाते । यदि उसका कारण समझ लेते तब शायद फरियाद न करते । कूड़ा यानी गन्दगी की जगह – यह बात सही है , न ? अब हम ठहरे साफ-सुथरे लोग , इतनी ज्यादा गन्दगी वाली जगह से सम्पर्क की सरहद तक कैसे जा सकते हैं ? इसलिए कचरा दूर से फेंकने का चलन है । दूर से फेंकने पर फेंकने वाले तक उसका थोड़ा भाग जरूर बिखरता है । टेनिस खिलाड़ी गेंद मारता है तब हर बार निर्धारित चौखटे में ही गेंद टप्पा खाये यह जरूरी नहीं होता है । फिर कूड़ा एक गेंद जैसा तो होता नहीं । कूड़े में कई चीजें गेंद से बड़ी – छोटी होती हैं । कचरे का पीपा या हाते भी टेनिस के चौखटों जितने बड़े कहाँ होते हैं ? इसलिए दूर से कचरा फेंकने पर उसका थोड़ा भाग फेंकने वाले व्यक्ति तक बिखरेगा । उस के बाद कचरा फेंकने आने वाले व्यक्ति को इस नई सरहद के बाहर खड़े हो कर कचरा फेंकना पड़ता है , इस प्रक्रिया में कूड़े की सीमा का विस्तार होता है,तो उसमें बेचारा व्यक्ति क्या कर सकता है ? “

यह सुन्दर रुचिकर सामग्री मासिकों में ही क्यों छपे , इसका लाभ दैनिक और साप्ताहिक क्यों नहीं उठा सकते ? दैनिकों और साप्ताहिकों को अपने पाठकों की रसतृप्ति पथ्य के रूप में करना नहीं सूझा है ।

इस भाषण के अन्य भाग :

पत्रकारीय लेखन किस हद तक साहित्य

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पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता , ले. महादेव देसाई

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[ जारी , अगली कड़ी– सम्पादक ]

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पिछला भाग अखबारों के मुख्य अंगों की बात मैंने की है । इनमें अब नए नए अंग शामिल हो रहे हैं । सिनेमा जगत के बारे में पूरे पृष्ट की सामग्री आ रही है , खेल कूद की बाबत भी । इन पर मेरी नज़र नहीं पहुँचती है । हाल ही में एक कतरन पढ़ी , जिसमें लेखक कहता है कि साहित्य परिषद ‘ फुरसतियों का जलसा ‘ है , परन्तु (या तथा ? ) ‘सिनेमा साहित्य का प्रमुख अंग है।’ इस साहित्य के बारे में अपना अज्ञान मैं कबूलता हूँ ।सिनेमा देखने वालों की आँखें बहुत तेज़ होनी चाहिए इसमें सन्देह नहीं , मैं तो पूरी जिन्दगी में दो चार बार ही सिनेमा गया हूँ , इसलिए बाल की खाल निकालने की वृत्ति हो ऐसा नहीं , बल्कि मेरी आँखें कमजोर हैं इसलिए । एक सिनेमा-शास्त्र-प्रवीण ने फिल्म की सफलता की अनिवार्य शर्त बतायी है जो जान लेनी चाहिए: ‘ स्त्री-पुरुष संबंध पर पर्याप्त मात्रा में उत्तेजक सामग्री भरो , अच्छे से अच्छे दृश्य प्रस्तुत करो तथा अभिनय द्वारा पूरा अलंकरण करो , बस बेड़ा पार हो जाएगा ।’ इस स्वीकृति से बढ़कर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती है ।

अखबारों का एक अंग रह गया- वह भी एक आवश्यक ‘जीवनप्रद’ अंग ; ‘जीवनप्रद’ क्योंकि कहा जाता है कि अखबार उसके बिना टिक नहीं सकते हैं । यह भी इस जमाने का कैसा अटपटा दस्तूर है कि जहर ही कैसी जीवनप्रद वस्तु बन गया है ? यह मेरी चूक है । अखबारों को वह जहर खुद पीना नहीं पड़ता , वे तो उसे बेचने का व्यापार करते हैं और उसके दम पर जीवित रहते हैं । प्राकृतिक नियमों के चाहे जितने उल्लंघन कीजिए , शरीर अथवा मन को उससे कोई हानि नहीं पहुँचने वाली- अधिकांश आमदनी कराने वाले विज्ञापनों का यह निचोड़ होता है । एक प्रतिष्ठित दैनिक के व्यवस्थापक से मालूम हुआ था कि भड़काऊ लाल रंग में छपे , दो इंच चौड़े और चार इंच लम्बे सिगरेट अथवा याकुती ( चासनी में पगी कामोत्तेजक भाँग) के विज्ञापन से सैंकड़ों रुपये प्राप्त होते हैं । अच्छे से अच्छे माने जाने वाले अखबारों में याकुति तथा ‘ नवाबी रति शक्ति ‘ की वीभत्स विज्ञापन भरे रहते हैं ; ‘ गुप्त वशीकरण मन्त्र ‘ अथवा ‘शत प्रतिशत सफल संतति नियमन के साधन ‘ के विज्ञापन उनके पृष्ठों को सुशोभित करते हैं । चाय के बारे में पाँच हिन्दी अखबारों में छपी पाँच अलग अलग स्तुतियाँ एक सज्जन ने मुझे भेजीं थीं । एक अखबार अपने ग्राहक बनने वालों को उसी प्रेस से छपा ‘कामविज्ञान ‘ मुफ्त देता है । मुम्बई के एक प्रतिष्ठित अखबार ने पूरे एक पृष्ठ पर बिछे विज्ञापन में याकुति को प्रमाणपत्र दिए हैं , उन पर अखबार ने इस बात की अपनी मुहर लगा दी है कि उसके संवाददाता इन प्रमाणपत्रों को देख चुके हैं और उसकी सत्यता की पुष्टि कर रहे हैं । एक प्रतिष्ठित मासिक में ‘स्त्री आकृति की कामोत्तेजक अंग’ नामक एक पुस्तक का सचित्र विज्ञापन छपा है , इस विज्ञापन में काफी वीभत्स वर्णन हैं । यह पूरा विज्ञापन स्त्री जाति का भीषण अपमान है । यदि इन विज्ञापनों के बिना ये अखबार नहीं टिक सकते हों , तब हम इन्हें तिलांजलि ही क्यों न दे दें ? काका साहब का इस सम्बन्ध में कहा गया एक तीखा वाक्य उद्धृत किए बगैर काम नहीं चल सकता :”अखबारों में जब इतने सारे घटिया विज्ञापन देखता हूँ तब मन में विचार आता है कि प्रभु सेवा के लिए एकाध उत्तम देवमंदिर बनाने के बाद उसका खर्च चलाने के लिए उसके परिसर स्थित कोठरियाँ शराबखाने तथा वेश्याओं को किराए पर देने जैसा यह नहीं है ? ”

यह तो हुई अनीतिपोषक विज्ञापनों की बात । परन्तु अन्य ऐसे उटपटांग विज्ञापन अखबारों में आते हैं जो कत्तई शोभास्पद नहीं होते।एक बेचारे ने गांधीजी को पत्र लिख कर पूछा था ,” बेलगाँव में कानून के कॉलेज के बारे में यह विज्ञापन देखा था ।आपके परिचित हों तो क्या उनसे पूछ कर पुष्टि करा लेंगे ? यह कॉलेज ऐसा है कि ६० रुपये की पहली फीस देनी होगी ,इसके बदले खाना-पीना मुफ्त , किताबें मुफ्त, अमुक महीने में परीक्षा पास करवा देंगे ( परीक्षा हाई कोर्ट में प्लीडर की अथवा ऐसी ही कोई – यह मुझे अब याद नहीं है ।) पास होने पर ६० रुपया वेतन मिलेगा और फेल होने पर ५० रुपये । ” यह विज्ञापन तथा ऐसे ही विज्ञापन अखबार नहीं रोक सकते ?

अखबारों के इन दूषित अंगों में अब एक नया अंग शामिल हुआ है । अनेक उत्तर वाले प्रश्न एकत्र कर उसके सही यानी अखबार द्वारा तय उत्तर देने वाले को ईनाम देने वाली लॉटरी अथवा जुआ । उत्तर तो वहीं दिए हुए होते ही हैं परन्तु निर्दिष्ट उत्तर पसंद करने पर आपकी लॉटरी खुल सकती है । बिना परिश्रम ,बिना बुद्धि धनवान बनना किसे पसन्द न होगा ? ऐसे लोभियों की भरमार से ही अखबारों की जेब गरम रहती है ।

इस भाषण के अन्य भाग :

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पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई

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समाचारपत्रों में गन्दगी : ले. महादेव देसाई

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विशिष्ट विषयों पर लेखन : ले. महादेव देसाई

अखबारों में विज्ञापन , सिनेमा : ले. महादेव देसाई

अखबारों में सुरुचिपोषक तत्त्व : ले. महादेव देसाई

अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक , ले. महादेव देसाई

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( आगे – सुरुचिपोषक तत्व )

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पिछला भाग :     परदेशी , खास कर युरोपीय घटनाओं के बारे में हम ज्यादा समझ सकें तथा उनकी चर्चा ज्ञानपूर्वक कर सकें , यह जरूरी है । देश के अंग्रेजी अखबारों में भी इस विषय के लिए उत्तम संवाददाताओं का अभाव है , गुजराती अखबारों की तो बात ही दरकिनार  । यह कहा जा सकता है कि उनमें इस विषय का अध्ययन भी सिफ़र है । महायुद्ध ( प्रथम ) के जमाने में खाडिलकर युद्ध के बारे में अध्ययनपूर्ण , ज्ञानवर्धक लेख लिखते थे , उनकी काफ़ी बखान भी होती थी । आज युरोपीय इतिहास और युरोपीय राष्ट्र-सम्बन्धों के ज्ञान से भरे लेखों की बहुत आवश्यकता है । इस कमी को हमें पाटना होगा ।

लोक वित्त शास्त्र का विषय लें । अब इस विषय के कई विशेषज्ञ यहाँ मिलते हैं । गुजराती अखबारों को चाहिए कि वे इन विशेषज्ञों से वक्त-बेवक्त लेख लेते रहें । विशेष विषय ( उदाहरणार्थ – आज-कल विलायत में शांति की प्रतिज्ञा लेने का अभियान चल रहा है, उस पर ) – अंग्रेजों द्वारा संचालित भारतीय अंग्रेजी अखबारों में इस विषय पर विवेचनापूर्ण और ज्ञानपूर्ण लेख आ रहे हैं । ‘ स्टेट्समैन ‘ में युद्ध विषयक हिन्सा-अहिन्सा पर लेखमाला चल रही थी , इस में कुछ लेखों के सुन्दर जवाब ‘ अमृत बाजार पत्रिका ‘ ने दिए थे।गुजराती समाचारपत्र ऐसी बाबतों से अनजान हैं ।

कुछ घटनाओं पर अध्ययनपूर्ण विवेचन करने के लिए हमें खास लेखकों से गुजारिश करनी चाहिए । ‘ खोर्द-गोविन्दपुर केस’ नाम से चर्चित एक चौंकाने वाला मुकदमा कलकत्ते में चला । इस पर हाइकोर्ट के फैसले की बाबत ‘अमृतबाजार पत्रिका’ ने इतनी कानूनी ज्ञानभरी टीका छापी कि हाईकोर्ट के न्यायाधीश को उस पर ध्यान देना पड़ा । वे चिढ़े लेकिन उसके खिलाफ़ कोई कदम न उठा सके और बंगाल भर की जनता के जुबान पर वह मामला चढ़ गया । बारडोली के बेचारे गरीब आदिवासियों को दन्ड न भरने की वजह से सजा हुई ।
इसके बावजूद भी सरकार ने उन्हें बेरहमी के साथ परेशान किया और उनके बर्तन
तथा घरेलू सामान को नीलाम किया । इस पर हाईकोर्ट में कफ़ी टीका हुई और
उन्हें बहुत दिनों के बाद न्याय मिला। इस मसले पर जितनी चर्चा होनी चाहिए उतनी नहीं हुई । ऐसे अन्याय तो अपने गुजरात में थोक में हुए हैं ।

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रिपोर्टिंग : ले. महादेव देसाई

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विशिष्ट विषयों पर लेखन : ले. महादेव देसाई

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[ जारी , अगला – सिनेमा और विज्ञापन वगैरह ]

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