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Posts Tagged ‘census’

किसी आबादी के छोटे हिस्से की गणना (सैम्पल सर्वे ) और उस के आधार पर पूरी मूल आबादी के आँकड़ों के अनुमान लगाने के फायदों में प्रमुख पैसे और समय की बचत बताया जाता है । परन्तु जब पूरी आबादी की गणना यूँ भी हर दस साल पर होती है तब सिर्फ़ कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों को मर्दुम शुमारी की प्रश्नावली में जोड़ लेना तो खर्चीला भी नहीं होगा । विद्वानों का एक तबका सोच – समझ कर सोचने – समझने की गलतियाँ करना चाहता है इसलिए पूरी आबादी में जातियों की गिनती की मुख़ालफ़त कर रहा है । भारत में जाति – प्रथा को समझने तथा उसको समाप्त करने की दिशा में कदम उठाने की बाबत डॉ. राममनोहर लोहिया ने अपनी पैनी मेधा से प्रकाश डाला । अपनी बातों को बल प्रदान करने के लिए लोहिया आँकड़ों और अनुमानों का जगह – जगह हवाला देते हैं । इन्हें पढ़ते हुए लगता है कि मुल्क के पैमाने पर काश इस प्रकार के आँकड़े उपलब्ध होते।

इस आलेख में लोहिया के ऐसे वैचारिक उद्धरण लिए जा रहे हैं जिनमें उन्होंनेआँकड़े या अनुमानों का हवाला दिया है :

* सारे देश के पैमाने पर अहीर , जिन्हें ग्वाला , गोप भी कहा जाता है , और चमार , जिन्हें महार भी कहा जाता है , सबसे ज्यादा संख्या की छोटी जातियाँ हैं । अहीर तो हैं शूद्र और चमार हैं हरिजन। हिन्दुस्तान की जाति प्रथा के वे वृहत्काय हैं , जैसे द्विजों में ब्राह्मण और क्षत्रीय । अहीर , चमार, ब्राह्मण और क्षत्रीय , हर एक २ से ३ करोड़ हैं । सब मिला कर ये हिन्दुस्तान की आबादी के करीब १० से १२ करोड़ हैं । फिर इनकी सीमा से हिन्दुस्तान की कुल आबादी के तीन चौथाई से कुछ कम बाहर ही रह जाते हैं । कोई भी आन्दोलन जो उनकी हैसियत और हालत को बदलता नहीं , उसे थोथा ही मानना चाहिए । इन चार वृहत्कायों की हैसियत और हालत के परिवर्तन में उन्हें ही बहुत दिलचस्पी हो सकती है पर पूरे समाज के लिए उनका कोई खास महत्व नहीं है ।

उत्तर हिन्दुस्तान के अहीरों और चमारों ने भी , शायद पर्याप्त जागरूक न रहते हुए , रेड्डियों और मराठों जैसे ही प्रयत्न किये हैं । उन्हें असफल होना ही था, पहले तो इसलिए उत्तर में द्विज बहुत संख्या में हैं और दूसरे इसलिए कि उत्तर की नीची जातियों के बीच संख्या में वे उतने शक्तिशाली नहीं हैं । इसके बावजूद कुछ दब कर प्रयत्न हो ही रहा है । कई मानी में जनतंत्र है संख्या का ही शासन । ऐसे देश में जहाँ समुदायों का संसर्ग जन्म और पुरानी परम्परा के आधार पर होता है , सबसे ज्यादा संख्या वाले समुदाय राजनैतिक और आर्थिक विशेषाधिकार प्राप्त कर ही लेते हैं । संसद और विधायिकाओं के लिए उन्हीं के बीच से उम्मीदवारों का चयन करने के लिए राजनीतिक दल उनके पीछे भागते फिरते हैं । और व्यापार और नौकरियों में अपने हिस्से के लिए ये ही सबसे ज्यादा शोर मचाते हैं । इसके परिणाम बहुत ही भयंकर होते हैं । सैंकड़ों नीची जातियाँ जो संख्या में प्रत्येक कमजोर हैं, पर सब मिला आबादी का बहुत बड़ा तबका हैं ,निश्चल हो जाती हैं । जाति पर हमले का मतलब होना चाहिए सबकी उन्नति न कि सिर्फ किसी एक तबके की उन्नति । एक ही तबके की उन्नति से जातिप्रथा के अन्दर कुछ रिश्ते परिवर्तित होते हैं , किन्तु जातियों के आधार में कोई बदलाव नहीं आता ।

एक और मानी में भी किसी एक तबके की उन्नति घातक होती है । नीची जातियों के जो लोग ऊँची  जगहों पर पहुँच जाते हैंवे मौजूदा ऊँची जातियों में घुल मिल जाना चाहते हैं । इस प्रक्रिया में वे लाजमी तौर पर ऊँची जातियों के दुर्गुण सीख जाते हैं । ऊँची जगह पर पहुँचने के बाद , सभी जानते हैं कि नीची जाति के लोग कैसे अपनी औरतों को परदे में कर देते हैं जो कि उच्च जातियों नहीं होता , बल्कि बिचली उच्च जाति में ही होता है । इसके अलावा, ऊँची उठने वाली नीची जातियाँ द्विज की तरह जनेऊ पहनने लगती हैं ,जिससे वे अब तक वंचित रखे गये , लेकिन जिसे अब सच्ची ऊँची जाति उतारने लगी है । इस तरह की उन्नति से नीची जातियों के बीच कोई गरमी नहीं आती । जो उन्नत हो जाते हैं वे अपने ही समुदाय से अलग हो जाते हैं, अपने ही मूल नीचे समुदायों को गरमाने के बजाय , वे जिन जगहों पर पहुँचते हैं वहां की ही ऊंची जातियों का अंग बन जाने की कोशिश करते हैं । इस उन्नति को अच्छे गुण सीखने या योग्य बनने का टेक नहीं मिलता, बल्कि जाति भड़काने और लड़ाने का भिड़ाने का टेक मिलता है ।

……. औरत , शूद्र , हरिजन,मुसलमान और आदिवासी , समाज के इन ५ दबे हुए समुदायों को , उनकी योग्यता आज जैसी भी हो , उसका लिहाज किए बिना , उन्हें नेतृत्व के स्थानों पर बैठाना इस आन्दोलन का लक्ष्य होगा । योग्यता का प्रेक्षण भी ऐसा होता है कि वह ऊँची जाति के ही पक्ष में जाता है । इतिहास के हजारों बरसों ने जो किया उसे धर्मयुद्ध के द्वारा ही दूर किया जा सकता है । समाज के दबे हुए समुदायों में सभी औरतों को ,द्विज औरतों समेत जो कि उचित ही है , शामिल कर लेने पूरी आबादी में इनका अनुपात ९० प्रतिशत हो जाता है ।

….इस बात बार बार जोर डालना चाहिए कि नीची जातियों के सैंकड़ों , जिन पर अन्यथा ध्यान नहीं जा पाता, उन पर पूर्व नियोजित नीति द्वारा ध्यान देना चाहिए,बनिस्बत उन दो वृहत्काया वालों के जो किसी न किसी तरह ध्यान आकर्षित कर ही लेते हैं ।

…. हिन्दुस्तान की जनता को हम तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं १. द्विज या जनेऊधारी , २. हरिजन या अछूत , और ३. शूद्र ।पहले की जनसंख्या ७ करोड़ के आसपास है, हरिजनों की ५ करोड़ और शूद्रों की १७ करोड़ ।

…द्विज लाख की चोरी करके भी उसे आदर्शवाद का जामा पहना सकता है , जबकि शूद्र अठन्नी-चवन्नी की चोरी में भी बुरी तरह पकड़ा जाता है ।

काफ़ी हाउस में बैठ कर बातें करने वालों में एक दिन मैं भी बैठा था जब किसी ने कहा कि काफ़ी के प्यालों पर होने वाली ऐसी बातचीत ने ही फ्रांस की क्रान्ति को जन्म दिया । मैं गुस्से में उबल पड़ा । हमारे बीच एक भी शूद्र नहीं था । हमारे बीच एक भी औरत न थी । हम सब ढीले ढाले , चुके हुए और निस्तेज लोग थे , कल के खाये चारे की जुगाली करते हुए ढोर की तरह ।

…. देश की सारी राजनीति में – कांग्रेसी , कम्युनिस्ट अथवा समाजवादी चाहे जानबूझ कर अथवा प्रम्परा के द्वारा राष्ट्रीय सहमति का एक बहुत बड़ा क्षेत्र है , और वह यह कि शूद्र और औरत को , जो कि पूरी आबादी का के तीन चौथाई हैं, दबा कर और राजनीति से अलग रखो ।

जनगणना में जाति की गिनती और विधायिका में महिला आरक्षण की बहस में कितनी औरते और शूद्र शरीक हैं ?




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मेरी बहन डॉ. संघमित्रा की शादी हुई डॉ. सुरेन्द्र गाड़ेकर के साथ । शादी सुबह सार्वजनिक संडास-सफ़ाई और गौशाला सफ़ाई से शुरु हुई थी। शाम को आशीर्वाद -गोष्ठी में सर्वोदयी मनीषी दादा धर्माधिकारी ने कहा कि इस दम्पति की संतान ’महागुजबंगोड़िया’ होगी । दादा संविधान सभा के सदस्य भी रहे । दादा के इस सम्बोधन में तीन पीढ़ी ऊपर और एक पीढ़ी बाद तक का तार्रुफ़ हो जाता है। मेरे ओड़िया नाना , बंगाली नानी ,और गुजराती पिता के अलावा महाराष्ट्र के जीजाजी का उल्लेख दादा द्वारा दिए गए सम्बोधन में आ गए। इस प्रकार मेरी भान्जी चारुस्मिता महागुजबंगोड़िया हुई ।

इस सम्बोधन के सभी शब्दांश प्रान्त और भाषा का संकेत देते हैं , जाति का नहीं । मेरी माँ ने मुझे सिखाया था कि तुम्हारी जाति ’वर्ण शंकर’ है । बहुत ताव से मैं यह बताता था। काफ़ी बाद में पता चला कि गीता के अनुसार वर्ण शंकर काफ़ी ’खतरनाक” विचार है । [ पहले अध्याय के ४१वें से ४४वें श्लोक में अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं,’हे कृष्ण ! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां अत्यन्त प्रदूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दूषित चरित्र वाली हो जाने पर वर्णशंकर संतान उत्पन्न होती है । वर्ण शंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। गुप्त शारीरिक विलास जो नर-मादा के बीज और रज रूप जल की क्रिया से इनके वंश भी अधोगति को प्राप्त होते हैं । इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं । हे जनार्दन ! जिनका कुल धर्म नष्ट हो गया है ऐसे मनुष्यों का अनिश्चितकाल तक नरक में वास होता है ऐसा हम सुनते आये हैं । ]

अर्जुन के मुख से इन समस्त गालियों को सुनने के बावजूद जाति तोड़ने में अन्तर्जातीय विवाह का महत्व (खास कर सवर्ण-अवर्ण) गौण नहीं किया जा सकता। जहाँ तक जनगणना में मुझ जैसे वर्ण शंकरों के वर्गीकरण की बात है हजारों अलग-अलग जातियों की तरह एक समूह इनका भी निर्दिष्ट हो सकता है । यह कत्तई जनगणना में जाति को न गिनने के हक़ में  गिनाया नहं जाना चाहिए। जनगणना की सांस्कृतिक सारिणियों के खण्ड में धर्म न बताने वालों की भी अलग गिनती होती है।

केन्द्र सरकार की नौकरियों में मण्डल कमीशन की संस्तुतियों को लागू करने की घोषणा के बाद सामाजिक यथास्थिति को बनाये रखने में जिनका स्वार्थ था वे तमाम ताकतें सक्रिय हो उठी थीं। इनमें खुद को आग लगाने वाले तरुणों से लगायत भारत के बड़े व्यापारियों की संस्थायें और तमाम अखबारों में अग्रलेख लिखने वाले भी थे । देश के सर्वोच्च न्यायालय ने पक्ष-विपक्ष के तमाम तर्कों को सुनने के बाद क्रीमी लेयर की शर्त के साथ इसे वैधानिक माना। उच्च शिक्षा में पिछड़े वर्गों के आरक्षण के मामले को भी सर्वोच्च न्यायालय में ले जाया गया , जहाँ उसे भी वैध ठहराया गया।

मंडल संस्तुतियों के विरोध को भाजपा और कांग्रेस उकसाने का काम कर रही हैं ऐसा जान पड़ता था। हाल ही में जब लोक सभा में जनगणना में जाति की गिनती पर चर्चा हुई तब भाजपा के हुकुम देव यादव , कांग्रेस के बेनी प्रसाद वर्मा , मुस्लिम लीग तथा नैशनल कॉनफ़रेंस के नुमाइन्दों की वक्तृता ने मुझे प्रभावित किया। सदन में आम सहमति दीख रही थी- मानो देश की आबादी का अक्स दीख रहा हो।

न्यायपालिका , विधायिका में आए ये सकारात्मक परिवर्तन स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं । इसके बावजूद अखबारों के अग्रलेखों में मर्दुम शुमारी की बाबत लिए गए इस अहम फैसले की नुक्ताचीनी वाले लेख आना जारी है। मंडल कमीशन के विरोध से अपने असामाजिक जीवन की शुरुआत करने वाले अरुण त्रिपाठी ’हिन्दुस्तान’ के एसोशियेट एडिटर हैं। तमाम समाज शास्त्रियों और विद्वानों के नाम अपने लेख में चुआने के बाद उन्हें यह समझ में आता है कि जाति को गिनने से उसे भूलाना आसान न होगा। इसी अखबार में टेवि पत्रकार सुधांशु रंजन एक ओर अपने से ऊपर की जाति में गिनती कराने तथा उसी वाक्य में जातीय वोट बैंक के कारण तादाद बढ़ाने की प्रवृत्ति का उल्लेख करते हैं। पिछली शताब्दी की शुरुआत में कई अत्यन्त पिछड़ी जातियों द्वारा अछूत जातियों के साथ खुद को न गिने जाने,कुछ पिछड़ी जातियों द्वारा खुद को क्षत्रीय गिनाने की प्रक्रिया अपनाई गई थी। इसे ’ऊँचा बनो आन्दोलन’ कहा गया। इन तबकों ने अपने समूह के विकास में इससे हुए नुकसान को अच्छी तरह महसूस किया तथा मुश्किल है कि वे इस गलती को दोहरायें ।

बहरहाल , मुझ जैसे पतित वर्ण शंकर को भी एक दलित युवा ने इस मुल्क में जाति की सच्चाई से रू-ब-रू करवा दिया था। एक बार बाबा साहब के परिनिर्वाण दिवस पर मेरे भाषण से प्रभावित होकर उस तेज-तर्रार दलित युवा ने मुझसे कहा था, ’भाषण तो जबरदस्त दिया,अब अपनी जाति भी बता दीजिए’-बिलकुल मुक्तिबोध द्वारा कौन सी पॉलिटिक्स है वाले सवाल के तेवर में। मैंने कहा,’मैं जाति में नहीं मानता।’ इस पर तपाक से उसने पूछा ,’ उस जाति का नाम ही बता दीजिए जो आपको अपने में मानती है !’ मैं निरुत्तर था।

किसी जुलूस में जब तक कुछ पागल , कुछ विकलांग नहीं दिखते तब तक उसे ’काएदे की तादाद वाला जुलूस’ नहीं कहा जा सकता- यह मेरा साथी अजय द्विवेदी कहता था।

[कम्प्यूटर के मॉनिटर के सामने बैठ कर हिन्दी में विचार व्यक्त करने वालों की तादाद अब इतनी हो चुकी है कि इसे काएदे का कहा जाए! अपने खेत में निपटने से जिनका मन हल्का नहीं होता वे घूम घूम कर निपटते हैं -ऐसी छिटपुट बूँदा-बाँदी और गरज के साथ छीटें की अनुमति यहाँ न होगी।]

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