Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Posts Tagged ‘विनोबा’

मित्र गोपाल राठी ने सूचित किया है की आज मैथिलीशरण गुप्त की जन्म तिथि है । अपने नाना के संग्रह से उनकी लिखी एक छोटी सी पुस्तिका लाया हूं – ‘भूमि-भाग ‘। विनोबा के भूदान के दौर में लिखी गई कविताओं का संग्रह है ।

एक खेत

रहते हम यों जीवित-मृत क्यों ? ज्यों मरघट के भूत-प्रेत ,

कहीं हमारा भी होता हां ! छोटा-मोटा एक खेत ,

बैल न होते , हम तो होते ,

श्रम-जल सींच जोतते बोते ,

उगते आशा के-से अंकुर रहता फिर क्यों रक्त श्वेत ?

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

बांध मचान रखाते गाते  ,

हम कितना आनंद मनाते ,

जग में हरा खेत हैं जिनका भरा उन्हींका है निकेत ।

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

आती फिर गोमाता मोटी ,

बच्चे खाते  माखन – रोटी ,

देती उन्हें गर्व से गृहिणी घर के तिल गुड़ के समेत ।

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

क्या-क्या फूल फूलते-फलते ,

रंहट और रंहटे सब चलते ,

मोती बरसाती तब मिट्टी मणि-कणिकाएं धुल रेत ।

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

स्वप्न देखते हैं हम झूठे ,

देश काल दोनों हैं रूठे ,

दुर्लभ हुई धुल भी हमको , व्यर्थ कल्पना , चित्त ,चेत ।

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

- मैथिलीशरण गुप्त

Read Full Post »

सारांश यह है कि इस्लाम का यह सच्चा स्वरूप है । इसे ठीक – ठीक पहचानना चाहिए और उसका सार ग्रहण कर लेना चाहिए । इन्हीं सब के आधार पर इस्लाम टिका हुआ है ,किसी जोर जबरदस्ती के आधार पर नहीं ।  कुरान में साफ़ तौर पर कहा गया है , ला इकराह फ़िद्दीन ’ - धर्म की बाबत कत्तई जोर जबरदस्ती नहीं हो सकती । इस बात का कथित मुसलमानों द्वारा कई बार भंग हुआ है , परंतु यह मूलत: इस्लाम के विरुद्ध है । इस्लाम तो यह ही कहता है कि धर्म- प्रचार में जबरदस्ती हो ही नहीं सकती । बस , आप धर्म के विचार लोगों के समक्ष रख दीजिए ।

बरसों पहले इस्लाम के एक अध्येता मोहम्मद अली ने मुम्बई में कहा था कि कुरान के उपदेशों की बाबत हिंदुओं या ईसाइयों के मन में उपजी विपरीत भावनाओं के लिए ऐसे थोड़े से मुसलमानों की जिम्मेदारी  है, जिन्होंने कुरान के उपदेश के विरुद्ध आचरण किया ।

अलबत्ता , यह पाया जाता है कि कि मुसलमानों ने अपनी संस्कृति के विकास के लिए दो मार्ग अपनाये – एक हिंसा का तथा दूसरा प्रेम का । दोनों मार्ग दो धाराओं की तरह एक साथ चले । हिंसा के साथ हम गजनी , औरंगजेब का नाम ले सकते हैं , तो दूसरी तरफ़ प्रेम मार्ग के साथ अक़बर और फ़कीरों के नाम ले सकते हैं । इसलिए यह मान्यता रूढ़ हो गई है कि मुसलमानों ने तलवार के बल पर धर्म – प्रचार किया , यह संपूर्ण सत्य नहीं है, बल्कि अत्यल्प सत्य है , केवल तलवार के बल पर दुनिया में कुछ संभव नहीं है।

एक बात समझने लायक है । तलवार के बल पर सब कुछ संभव है यह मानना वैसा ही है मानो रेत की बुनियाद पर बड़ा मकान खड़ा कर लेना । यह असंभव है । हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उन्हीं बीजों में से अंकुर फूटता है , जिनमें सत्व होता है । हम जब कचरे को धूल के ढेर में डालते हैं तब उसके साथ एकाध जौ का दाना भी चला जाता है । कचरा तो फिर कचरा है , वह सड़ जाता है। परन्तु वह दाना है जिसमें से अंकुर फूटता है। हमारे ध्यान में यह बात नहीं आती । यदि दाना सजीव न हुआ तो अंकुर नहीं फूटता । यह बात संस्कृतियों पर भी लागू होती है । किसी आंतरिक सत्व के बिना संस्कृतियां प्रस्फुटित नहीं होतीं ।

कई बार पश्चिम की संस्कृति की बाबत भी हम कह देते कि वह पशुबल के आधार पर विजयी हुई है। यह बिलकुल स्थूल दृष्टि है । उन्हें जो सफलता मिली है वह उनकी उद्यमशीलता,सहकार्य की वृत्ति ,कष्ट तथा संकट सहन कर लेने की हिम्मत , एक-एक विषय के पीछे पागल बन पूरी जिन्दगी उसके लिए न्योछावर कर देने की तैयारी आदि गुणों के कारण मिली है । हमें झट तलवार या पशुबल दीखता है,परंतु तलवार लंगड़ी होती है, बुनियाद में तो गुणों की राशि ही होती है ।

फकीर आम जनता में हिल-मिल गए

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इस्लाम का प्रचार तलवार के जोर पर नहीं हुआ है । मुसलमानों में सैंकड़ों संत हो गए , औलिया हो गए , फकीर हो गए । इस वजह से ही इस धर्म का ज्ञान दुनिया भर में फैला । जैसे बुद्ध के अनुयाई दुनिया के चारों ओर गए , वैसे ही इस्लाम के संत और फकीर भी गए । इस्लाम का प्रचार मुसलमान राजाओं ने नहीं , फकीरों ने किया । उस वक्त हिन्दुस्तान की आम जनता पर फकीरों का कितना अधिक प्रभाव था,उसका अनुमान आप छत्रपति शिवाजी के इस कथन से लगा सकते हैं,जिसमें उन्होंने कहा कि हिन्दु धर्म की रक्षा के लिए मैंने फकीरी अपनाई है । यानि ’फकीरी’ शब्द सामान्य बोलचाल की भाषा में दाखिल हो गया था । जनता के दिल में फकीरी के लिए इतना आदर था । फकीर आम जनता में हिल-मिल गए थे । हिंदु अपनी संतान का नाम भी इस्लामी संतों के नाम पर रखते थे ! अरे,शिवाजी के पिता का नाम शाहजी था, जो एक मुसलमान संत का नाम है !

इसलिए हमें इस्लाम के विषय में अपनी कई गैर-समझ और ग्रंथियों को दूर कर लेना चाहिए , तथा इस्लाम की असली पहचान हासिल करनी चाहिए व विकसित करनी चाहिए ।

(संकलित)

इस्लाम का पैगाम / ब्याजखोरी का तीव्र निषेध / विनोबा

इस्लाम का पैगाम / एकेश्वरवाद का बहुमूल्य संदेश और जकात/ विनोबा

इस्लाम की असली पहचान : मानव – मानव का नाता बराबरी का है / विनोबा

Read Full Post »

इस्लाम ने ब्याजखोरी का भी तीव्र निषध किया है । सिर्फ़ चोरी न करना इतना ही नहीं , आपकी आजीविका भी शुद्ध होनी चाहिए । गलत रास्ते से की गई कमाई को शैतान की कमाई कहा गया है । इसीलिए ब्याज लेने की भी मनाही की गई है । कहा गया है कि सूद पर धन मत दो , दान में दो ।

मोहम्मद साहब को दर्शन हुआ कि ब्याज लेना आत्मा के विरुद्ध काम है । कुरान में यह वाक्य पाँच-सात बार आया है – ” आप अपनी दौलत बढ़ाने के लिए ब्याज क्यों लेते हैं ? संपत्ति ब्याज से नहीं दान से बढ़ती है । ” बारंबार लिखा है कि ब्याज लेना पाप है , हराम है । इस्लाम ने इसके ऊपर ऐसा प्रहार किया है , जैसा हम व्यभिचार या ख़ून की बाबत करते हैं । परंतु हम तो ब्याज को जायज आर्थिक व्यवहार मानते हैं ! वास्तव में देखिए तो ब्याजखोरी, रिश्वतखोरी वगैरह पाप है । ब्याज लेने का अर्थ है , लोगों की कठिनाई का फायदा उठाते हुए पैसे कमाना । इसकी गिनती हम लोग कत्तई पाप में नहीं करते ।

वास्तव में देखा जाए तो अपने पास आए पैसे को हमें तुरंत दूसरे की तरफ़ धकेल देना चाहिए । फ़ुटबॉल के खेल में अपने पास आई गेंद हम अपने ही पास रक्खे रहेंगे , तो खेल चलेगा कैसे ? गेंद को खुद के पास से दूसरे को फिर तीसरे को भेजते रहना पड़ता है , उसीसे खेल चलता है । पैसा और ज्ञान , इन्हें दूसरे को देते रहेंगे तब ही उनमें वृद्धि होगी ।

मेरा मानना है कि ब्याज पर जितना प्रहार इस्लाम ने किया है किसीने नहीं किया है । ब्याज पर इस्लाम ने यह जो आत्यंतिक निषेध किया है , उसको समाज को कभी न कभी स्वीकार करना ही पड़ेगा । वह दिन जल्दी आना चाहिए , हमें उस दिन को जल्दी लाना चाहिए । एक बार ब्याज का निषेध हो गया , तो संग्रह की मात्रा बहुत घट जाएगी । इस्लाम ने ब्याज न लेने का यह जो आदेश दिया है , उसका यदि अमल किया जाए तो पूँजीवाद का ख़ातमा ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाएगा । जिसे हम सच्चा अर्थशास्त्र कहते हैं उसके बहुत निकट का यह विचार है । मुझे लगता है कि साम्यवाद की जड़ का बीज मोहम्मद पैगम्बर के उपदेश में है । वे एक ऐसे महापुरुष हो गये जिन्होंने ब्याज का निषेध किया तथा समता का प्रचार किया । इस उसूल को उन्होंने न सिर्फ़ जोर देकर प्रतिपादित किया बल्कि उसकी बुनियाद पर संपूर्ण इस्लाम की रचना उन्होंने इस प्रकार की , जैसी और किसी ने नहीं की ।

वैसे तो ब्याज लेने की बात पर सभी धर्मों ने प्रहार किया है । हिंदु धर्म ने ब्याज को ’ कुसीद ’ नाम दिया है , यानि खराब हालत बनाने वाला, मनुष्य की अवनति करने वाला । उसके नाम मात्र में पाप भरा है । ब्याज न लेना यह चित्तशुद्धि का काम है , पापमोचन है । ब्याज लेना छोड़ना ही चाहिए । वैसे, ब्याज के विरुद्ध तो सभी धर्मों ने कहा है परन्तु इस्लाम जितनी स्पष्टता और प्रखरता से अन्य किसी ने भी नहीं कहा है ।

जारी

[ अगला : धर्म के मामले में कदापि जबरदस्ती नहीं की जा सकती ।

Read Full Post »

इस्लाम का एकेश्वर का संदेश भी बहुमूल्य है । सूफ़ी संत और फ़कीर महाराष्ट्र में भी गाँव – गाँव घूमते हुए, ’ईश्वर एक है ’ कहते रहे । उसी दौर में महाराष्ट्र का एक व्यक्ति पैदल ही निकला और ठेठ पंजाब तक घूम आया । वह पंजाब में बीस साल रहा । वे थे , नामदेव । नामदेव ने भी कहा कि हम भी एक ईश्वर में ही मानते हैं ; परंतु विविध देवताओं की पूजा करते – करते ईश्वर के एकत्व का यह विचार लगभग भुला चुके हैं । इसलिए नामदेव ईश्वर के एकत्व का पुन: प्रतिपादन करने लगे । उन्होंने कहा कि एक बार जब राजा से मुलाकात हो जाती है तब सेवकों को कौन पूछता है ? गणेश ,शारदा आदि तो ईश्वर के सेवक हैं । स्वामी के साक्षात दर्शन हो जाने के बाद चाकरों की क्या जरूरत ? नामदेव ने एक भजन में यह भी कहा कि मन्दिर – मस्जिद दोनों की पूजा छोड़ो तथा जो अंतर्यामी ईश्वर है उसकी तरफ़ रुख़ करो ।

बंगाल में भी इस्लाम और ईसाइयत का बहुत असर था । तब वहां राजा राममोहन राय और देवेन्द्रनाथ टैगोर जैसे लोग खड़े हुए । उन्होंने कहा कि अपने यहाँ भी एकेश्वर की बात कही गई है । श्वेताश्वर उपनिषद में एकेश्वर का प्रतिपादन करने वाले अनेक वचन मिलते हैं । श्वेताश्वर कहता है – ’ एको हि रुद्र: ’। इन लोगों ने श्वेताश्वर उपनिषद का अध्ययन किया । ब्रह्मोसमाज की प्राथना में श्वेताश्वर उपनिषद के कुछ श्लोक भी गाये जाते हैं । ईश्वर ’ एकमेवाद्वितीयम ’ है । ईश्वर एक और अद्वितीय है , उसकी कौन सी उपमा दी जा सकती है? ईश्वर एक ही है। उसके जैसा अन्य कुछ नहीं ।

यह भी पता चलता है कि चैतन्य महाप्रभु हों,कबीर दास हों या गुरु नानक हों सभी के जीवन और चिंतन पर जितना असर वैष्णव धर्म का पड़ा है, उतना ही कुरान का भी पड़ा है ।  नानक ने तो ’जपुजी’ में क़ुरान का उल्लेख भी किया है । सिखों के गुरुग्रंथसाहब में भी गुरुओं की वाणी के साथ ही साथ मुसलमान संत बाबा फ़रीद की वाणी भी है । सभी संतों के हृदय एक होते हैं । गुरु ग्रंथसाहब में ऐसे विचार जगह-जगह देखने को मिल जायेंगे , ’ भले वेद हो या कुरान ,जो सार है तो वह है भगवान का नाम,और उसे हमने लिया है । “

नियमित जकात दो !

इसी प्रकार इस्लाम का एक अन्य संदेश है,जकात का तथा ब्याज के निषेध का । कुरान में आता है,’… व आत ज़ जकात ’ – जकात (नियमित दान ) देना चाहिए । खैरात तथा जकात । खैरात यानि ईश्वर के प्रति प्रेम से प्रेरित हो अनाथ , याचकों आदि को धन देना । जकात यानि नियमित दान । ’ …व मिम्मा रजाक्नाहुम युन्फ़िकून ’ – जो  कुछ भी तेरे पास है , उसमें से दूसरे को देना चाहिए । देना धर्म है तथा यह सब पर लागू होता है , इसलिए गरीब भी दें । देने का धर्म हर व्यक्ति को निभाना है । जो कुछ थोड़ा सा भी मिलता हो उसमें से पेट काट कर देना चाहिए । किसान क्या करता है ? जब फसल आती है तब उसमें से सर्वोत्तम बीज अलग से रख लेता है । अस्गले साल बोने के लिए । खुद के लिए खाने भर का न हो तब यह  बियारण निकाल लेता है,उसे नहीं खाता । देखा जाए तो यह उसकी क़ुरबानी है । इस पर अल्लाह खुश होता है तथा उसे बियारण का दस गुना करके देता है । इसी वजह से हर व्यक्ति को अपना फ़र्ज अदा करना चाहिए ।

पानी से हमे सबक लेना चाहिए । जैसे पानी हमेशा नीचे की तरफ़ दौड़ता है,वैसे ही हमे भी समाज के सबसे दु:खी,गरीब की इमदाद (सहायता ) में दौड़ पड़ना चाहिए । मुझे दो रोटियों की भूख है और मेरे पास एक ही रोटी है तो भी मुझे उसमें से एक टुकड़ा दूसरे को देकर ही ख़ुद खाना चाहिए । इसी में मानवता है । यादि आप ऊपर की तरफ़ देखते रहेंगे तब आपको लगेगा कि मुझे अधिक,और अधिक मिलता रहे । इस प्रकार लोभ लालसा बढ़ाने में मानवता नहीं है । यह मनुष्य के भेष में छुपी हैवानियत है ।

एक और बात भी कही है कि आपने जो बहुत बड़ा संग्रह किया है ,उसमें से देने की बात नहीं है । वैसा संग्रह करना तो मूल रूप में ही पाप माना गया है । आप जिसे ’रिज्क’ यानि रोजी कहते हैं , भगवान की कृपा से जो आपको प्रति दिन मिलती है , उसमें से आपको देना है । यह बात सभी के लिए कही गई है ,मात्र रईसों के लिए नहीं । तथा यह सभी धर्मों ने कही है ।

[ जारी ]

अगली कड़ी -’ब्याजखोरों का तीव्र निषेध ’

Read Full Post »

[ गुजराती पत्रिका ’ भूमिपुत्र’ में विनोबा भावे के इस्लाम की बाबत विचार प्रकाशित हो रहे हैं । आशा है इस विषय पर समझदारी बनाने में इन से मदद मिलेगी । अफ़लातून ]

यह निर्विवाद हकीकत है कि आरंभिक जमाने में इस्लाम का प्रचार त्याग और कसौटी पर ही हुआ । प्रारंभ में इस्लाम का प्रचार तलवार से नहीं , आत्मा के बल से हुआ । कार्लाइल ने कहा है कि प्रारंभ में इस्लाम अकेले पयगंबर मोहम्मद के हृदय में ही था , न ? तब क्या वे अकेले तलवार लेकर लोगों को मुसलमान बनाने निकले थे ? इस्लाम का प्रचार-प्रसार उन्होंने आत्मा के बल से किया था । सभी प्रारंभिक खलीफ़ा भी धर्म-निष्ठ थे तथा उनकी धर्म-निष्ठा के कारण ही इस्लाम का प्रचार हुआ ।

इस्लाम का मतलब ही है शांति तथा ईश्वर-शरणता । इसके सिवा इस्लाम का कोई तीसरा अर्थ नहीं है । इस्लाम शब्द में ’सलम’ धातु है । जिसका अर्थ है शरण में जाना । इस धातु से ही ’सलाम’ शब्द बना है। सलाम का मतलब शान्ति । इस्लाम का अर्थ पर्मेश्वर की शरण में जाना । परमेश्वर की शरण में जाइएगा तो शान्ति पाइएगा ।

मानव – मानव का नाता बराबरी का है

इस्लाम में सूफ़ी हुए । सूफ़ी यानी कुरान का सूक्ष्म अर्थ करने वाले । भारत में इस्लाम का प्रथम प्रचार सूफ़ियों ने किया । इस वास्ते ही इस्लाम भारत में लोकप्रिय बना । मुस्लिम राजा या लुटेरे तो बाद में आये  , आउर वे आए और लौट गये । परंतु सूफ़ी फ़कीर यहाँ आए और देश भर में घूम कर प्रचार किया । इस्लाम में एक प्रकार का भाईचारा मान्य है । इस्लाम धर्म की यह भाईचारे की भावना हम सब को अपना लेनी चाहिए । यहाँ की ब्रह्मविद्या उससे मजबूत होगी ।

’ सब में एक ही आत्मा बसती है’ – यह कहने वाले हिंदू धर्म में अनेक जातिभेद , ऊँच-नीच के भेद तथा अन्य अनेक प्रकार के भेदभाव हैं । हमारी सामाजिक व्यवस्था में समानता की अनुभूति नहीं होती है । यह एक बहुत बड़ी विसंगति है , विडंबना है ।  जबकि इस्लाम में जैसे एकेश्वर का संदेश है , वैसे ही सामाजिक व्यवहार में संपूर्ण अभेद का भी संदेश है । इस्लाम कहता है कि  , मानव – मानव के बीच किसी प्रकार का भेद नहीं करना चाहिए , मानव – मानव का नाता बराबरी का है । इस्लाम की इस बात का असर भारत के समाज पर पड़ा है ।  हमारे यहाँ जो कमी थी उसको इस्लाम ने पूरा किया । खास तौर पर फ़कीरों और सूफ़ी संतों ने जो प्रचार किया उसका यहाँ बहुत असर पड़ा । कई संघर्ष हुए , लड़ाइयां हुईं, इसके बावजूद बाहर से आई एक अच्छी और सच्ची चीज का यहाँ के समाज पर गहरा असर पड़ा । इस्लाम का यह संदेश बहुत पवित्र संदेश है । [ जारी ]

http://hi.wordpress.com/tag/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%AC%E0%A4%BE/


 

 

Read Full Post »

 प्रथम भाग से आगे :

    भारतीयता के अलग – अलग युग हुए हैं और इनमें नारी जीवन के अलग-अलग मूल्य बने हैं । इनके अनुसार अलग – अलग प्रथायें भी प्रचलित हुईं हैं । आज का भारतीय अपने ही इतिहास से किसी एक परम्परा को बनाए रखने के लिए कुछ अन्य परम्पराओं को तथा प्रथाओं को ठुकरायेगा ही । सती – प्रथा भारतीय – समाज के कुछ ही इलाकों में , कुछ ही कालखण्डों में प्रचलित प्रथा है । इसलिए कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति की जो स्वस्थ मुख्यधारा रही है उससे इसका तार्किक मेल नहीं है । जिन दिनों हिन्दू समाज में पुरुषार्थ इतना घट गया था कि अपने मुल्क या अपने धर्म की रक्षा करने के लिए सामर्थ्य नहीं रह गया था , जिन दिनों राजपूत रमणियों के पास आत्महत्या के अलावा सम्मान – रक्षा का कोई उपाय नहीं बच गया था , सती – प्रथा को उन्हीं दिनों गौरव प्राप्त हुआ था । उसके पहले सिर्फ निकृष्ट व्यक्ति और निकृष्ट संस्कृति के सन्दर्भ में सती – प्रथा का उल्लेख है । रामायण की सती अयोध्या में नहीं लंका में है । कुन्ती सती नहीं होती है , माद्री होती है । आपने अपने ही लेख में लड़कियों के पैदा होते ही मार दिए जाने की घटना को शर्मनाक और राजपूतों की कायरता की निशानी कहा है । अपनी बेटियों के मान – सम्मान की रक्षा का आत्मविश्वास उनमें नहीं था । सती – प्रथा पर भी ठीक वही बात लागू होती है , क्योंकि कायरता के जमाने में ही पद्मिनी को आदर्श नारी माना गया है ।

    भारतीय समाज में  सिद्धान्त और आचरण की दूरी शायद दूसरे समाजों की तुलना में ज्यादा है । आपने ऐसे सिद्धान्तों का हवाला दिया है जिन पर अमल नहीं होता है या किसी एक जमाने में सम्भवत: उन पर अमल होता हो जबकि अधिकांश कालावधि में उनसे विपरीत व्यवहार चला है । आपने पंचकन्याओं का उल्लेख कर कहा है कि नारी के सम्बन्ध में भारतीय दृष्टिकोण कितना उदार और विज्ञान सम्मत है । लेकिन क्या आपने कभी हिन्दू परिवार में किसी को कहते हुए सुना है कि अमुक स्त्री द्रौपदी जैसी या कुन्ती जैसी या अहिल्या जैसी सती-साध्वी है ? वाल्मीकि रामायण और महाभारत के बाद नारी का इस प्रकार का आदर्श न पुराणों में है , न किस्सों-कहानी में है , न कथोपकथन में है । भारतीय नारी का वह स्वर्ण युग खतम हो गया है । उसके बाद के कालों की जो भारतीयता हमारे सामने है , उसमें नारी का सामाजिक मूल्य भिन्न प्रकार का हो गया है । यह शायद सर्वसम्मत है कि उपनिषद और महाभारत के बाद भारतीय नारी का अवमूल्यन होता रहा । वाल्मीकि की सीता असभ्य कट्टर राम की आलोचना करती है । तुलसी की सीता के मुँह से ऐसी आलोचना निकल नहीं सकती है । पंचकन्या को सती माननेवाला समाज और सती की पूजा करनेवाला समाज दो अलग – अलग दृष्टिकोणों की उपज हैं । दो भिन्न संस्कृतियाँ हैं । आप जब भारतीयता के बारे में लिखते हैं तब उपनिषद , गौतम बुद्ध , महाभारत , मनुस्मृति , तुलसीदास और मुगलकालीन राजपूत समाज , इन सबको एक ही संस्कृति मान लेते हैं । एक  ही सभ्यता की कुछ मौलिक धारणायें इन सबके पीछे कड़ी के तौर पर रही होंगी । लेकिन आचरण , प्रथा , पुरुषार्थ , दृष्टिकोण , मान्यताएँ अलग – अलग हैं । एक दूसरे के विपरीत भी हैं । भारतीयता के किसी एक युग या एक स्थल के सिद्धान्त को बताकर भारतीयता के किसी दूसरे युग या स्थल की मान्यताओं के पक्ष में बहस करना तर्क की बहुत बड़ी ग़लती होगी । वर्णाश्रम और जाति-प्रथा का फर्क काफ़ी सूक्ष्म है । फिर भी जाति प्रथा के पक्ष में बहस करने के लिए वर्णाश्रम के सिद्धान्त को बताना तर्क की ग़लती होगी ।

    आप पश्चिमी   संस्कृति और भारतीय संस्कृति की तुलना करते हैं , इस प्रकार की गलतियाँ बार – बार होती हैं । भारतीय संस्कृति की कुछ अवधारणायें जरूर ऐसी हैं जो दुनिया में श्रेष्ठ हैं और मानव संस्कृति के नवनिर्माण के लिए आधार बन सकती हैं । लेकिन आपकी दृष्टि में भारतीय संस्कृति में सब कुछ अच्छा है , युरोपीय संस्कृति में सब कुछ तुच्छ है । भारतीय नारी के बारे में आप चुन चुन कर ऐसी बातें निकालते हैं जो श्रेष्ठ हैं और वे ज्यादातर तो सिद्धान्तरूप में हैं , व्यवहार में नहीं हैं ( जैसी पंचसती का श्लोक ) । नारी के सम्बन्ध में जो प्रतिकूल बाते हैं , श्लोकों से लेकर कहावत तक ,  उसका आप उल्ले नहीं करते । जिन श्लोकों में और कहावतों में कामुकता का स्रोत नारी को ही माना गया है  , पराधीनता नारी की स्वाभाविक स्थिति मानी गयी है ,  उनको आपने छोड़ दिया है । दूसरी ओर युरोपीय समाज की जो खास उपलब्धियाँ हैं उनको आप छोड़ देते हैं और वहाँ की निकृष्ट बातों का जिक्र करते हैं । कैथलिक संन्यासिनियों की परम्परा को आपने बिलकुल नजरअन्दाज कर दिया है । संयुक्त परिवार को आपने भारतीय विशेषता मान ली है , जब कि यह यूरोप तथा सारी दुनिया में प्रचलित था ।

    आधुनिकतावाद और युरोपीय संस्कृति दो अलग – अलग चीजें हैं । आप दोनों को एक मान रहे हैं । युरोपीय संस्कृति की अपनी जड़ें हैं जबकि आधुनिकतावाद जड़विहीन है । पश्चिम की प्रभुता और समृद्धि से प्रभावित होकर गैरयूरोपीय बुद्धिजीवियों ने उसका अनुकरण किया है । हीन – भावनाग्रस्त होकर , अपनी भाषाओं को छोड़कर , अपने इतिहास को बाजू में रखकर उन्होंने एक नकली संस्कृति का निर्माण किया है । यही आधुनिकतावाद है । यूरोपीय संस्कृति में फ्रांस या जरमनी में आप कल्पना कर नहीं सकते कि किसी विदेशी भाषा को राष्ट्रीय कार्यकलाप , अनुसन्धान और शिक्षा का माध्यम बनाया जाए । पश्चिमी समाज अभी भी नये नये सत्यों और तथ्यों का अनुसंधान करता है । नए सत्यों का उद्घाटन , नए प्रतिपादनों की स्थापना , मौलिक यन्त्रों का निर्माण आधुनिकतावाद की क्षमता के बाहर है । आधुनिकतावाद विकासशील देशों की संस्कृति है ,  यूरोप की नहीं । यूरोपीय समाज और आधुनिकतावादी समाज में काफ़ी सामंजस्य है , कारण आधुनिकतावादी समाज उस सारे सामान , तरीकों और धारणाओं का इस्तेमाल करता है जिनकी उत्पत्ति पश्चिम में हुई है । इस बाह्य सामंजस्य के तले जो आधुनिकतावाद की असलियत है , वह एक नकलची और गुलामों की संस्कृति है ।

    यूरोपीय संस्कृति का विकास भारत जैसा लम्बा या पुराना नहीं है , इसका पतन भी शुरु हो चुका है । प्रभुता और यान्त्रिक सम्रुद्धि को छोड़कर उसमें और कोई प्रभावशाली गुण नहीं रह गया है । लेकिन उसके पूरे इतिहास को देखें तो मानव समाज के लिए उसके कई महत्वपूर्ण योगदान हैं । जिन मुद्दों पर उसका योगदान है उन बातों में भारतीय संस्कृति में कमियाँ पाई जाती हैं । व्यक्ति की गरिमा , जिसका आपने कई बार जिक्र किया है , एक यूरोपीय अवधारणा थी ,अब सारी दुनिया की अवधारण है । फ्रांसीसी क्रान्ति के तीन शब्द ’स्वतंत्रता , समता और भातृभाव ’ आधुनिक मनुष्य के सपने के पर्यायवाची बन गये हैं । जब किसी समाज में पुरुषार्थ होता है और कुछ मूल्य होते हैं तब उन मूल्यों की दिशा में सत्य का अनुसंधान चलता है । जब भारतीय समाज में पुरुषार्थ था तब एक खास दिशा में सत्य का अनुसंधान था । इसको हम ’आध्यात्मिक दिशा’ कह सकते हैं । यूरोपीय समाज में भौतिक मूल्यों को अग्राधिकार मिला । भौतिक सुख को सर्वोच्च मानकर पश्चिम में जो अभूतपूर्व अनुसंधान चला , वह अभी भी भी जारी है लेकिन मौजूदा भारतीय समाज में आध्यात्मिक या भौतिक किसी प्रकार के सत्य का अनुसन्धान नहीं है । उसमें जड़ता आ गई है । यूरोप के सत्य से जो भौतिक सम्रुद्धि बनी वह राक्षसी हो गई क्योंकि पश्चिम की प्रभुता और समृद्धि को बनाये रखने के लिए बाकी मानव समाज को कंगाली और गुलामी में रखना पड़ता है । यूरोप का अपना लक्ष्य (स्वतंत्रता , समता और भ्रातृत्व ) अब मौजूदा यूरोपीय संस्कृति के द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता है । मानव समाज को एक नई संस्कृति चाहिए 

     ( अगली किश्त में समाप्य  ) 

Read Full Post »

प्रकृति – लय के साथ सुसंवादी जीवन का लय

पिछला भाग ।  इस प्रकार सूर्य हमारे जीवन से गहन रूप से सम्बद्ध है । उसके लय के साथ यदि हमारे जीवन का लय मिला होगा तो इससे हमारा जीवन सुसंवादी बनेगा । अपनी आंखों के सामने हम रोज सूर्य की दो प्रक्रियाओं को देखते हैं । शाम को सूर्यनारायण अस्त होते हैं , तब पूरी दुनिया अव्यक्त में लीन हो जाती है तथा सुबह सूर्योदय होता है , तब फिर व्यक्त का विस्तार होता है । यह प्रक्रिया रोज-ब-रोज चल रही है । रात में हम कहां जाते हैं , मालूम नहीं । अवश्य कहीं जाते हैं तथा बहुत शान्ति पा कर लौटते हैं । हम जहां पहुंचते हैं वहां ‘अहं’ का होश हमे नहीं रहता । एक सिंह सोया हुआ है । निद्रावस्था में उसे इसका ख्याल नहीं है कि वह खुद ‘सिंह’ है । मनुष्य भी जब सोता है तब उसे होश नहीं रहता है कि वह खुद ‘मनुष्य’ है । अर्थात निद्रावस्था में सभी अपने मूल स्वरूप में पहुंच जाते हैं तथा सब का मूल स्वरूप एक ही है । इस बात की थोड़ी अनुभूति गाढ़ निद्रा के दौरान होती है ।इसके पश्चात हम फिर जागृत हो कर अपने – अपने स्वरूप में लौट कर भिन्न – भिन्न कामों में लग जाते हैं ।

    अर्थात हमें प्रकृति की घटनाओं के प्रति उदासीन नहीं रहना चाहिए , बल्कि प्रकृति के लय के साथ अपना लय मिलाए रखने की कोशिश करते रहना चाहिए । वेद में कहा गया है , ‘ श्रेष्ठै रूपै स्तन्वं स्पर्शयस्वं ‘  - सूर्य के श्रेष्ठ रूपों से शरीर का स्पर्श होने दो । इस प्रकार , सूर्य हमारा परम मित्र है । मित्र के सभी लक्षण हम सूर्य में देख सकते हैं ।

जनहित काज

जनहित काज

जीवन – दर्शन की विशेषता का द्योतक

    हिन्दुस्तान में ‘मैत्री’ शब्द का उच्चारण पहली बार वेद भगवान ने किया तथा उसका उदाहरण सूर्यनारायण का दिया । वेद में सूर्य को ‘मित्र’ कहा गया । यह हमारी संस्कृति की विशेषता है । हमारी संस्कृति का यह एक विशेष दर्शन है । जहाँ यह दर्शन नहीं है वहाँ इस बात को ढंग से समझना मुश्किल होता है । वहाँ इससे बिलकुल जुदा अभिगम देखा जा सकता है । ऋगवेद में एक मंत्र है , ‘ सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्यो न योषाम्भ्येति पश्चात ‘  । ऋगवेद के अंग्रेजी अनुवादक ग्रिफिथ ने इसका अर्थ ऐसा किया है – Like a young man followeth a maiden , so doth th sun thee dawn. जैसे कोई युवक एक तरुणी के पीछे जाता है , वैसे ही सूर्य ऊषा के पीछे आता है । ग्रिफिथ ने ऐसा अर्थ किया। मैं इसका अर्थ ‘मेडन’ ( तरुणी ) करने के बजाए ‘ मदर’ ( माता ) कर रहा हूँ । ऊषा माता है और उसके उदर से सूर्य निकलता है । आगे ऊषा है , उसके पीछे सूर्य है । ऊषा माँ है , पत्नी नहीं ।’

    जीवन – दर्शन की ऐसी विशेषता के कारण ही हमने सूर्य को मित्र माना है । सूर्य हमारा परम मित्र है ।

( संकलित , संकलन – कांति शाह , मूल गुजराती ‘भूमिपुत्र’ से , अनुवाद – अफ़लातून )

Read Full Post »

सूर्य के उदय – अस्त भी हमारे लिए बोधदायक हैं । सूर्य के उदय – अस्त की भांति मनुष्य की वृत्ति का भी उदय – अस्त होता रहता है । इन प्रक्रियाओं के कारण सृष्टि में ताजगी रहती है , बासीपन नहीं आता । सूर्योदय , सूर्यास्त हमेशा ताजे लगते हैं । यदि हम प्रकृति के साथ एकरूप हो जाते हैं तथा सूर्य के उदय – अस्त पर गौर करने की आदत डालते हैं , तब हमारे जागने पर हमारे लिए जीवन नया होगा , हमारा मन ताजा होगा । हर शाम मन को तथा उसकी आदतों को व्यवहार से , जीवन से तथा खुद से अलग कर परमात्मा की गोद में सो जांए , गहरी नि:स्वप्न निद्रा का अनुभव करें , तब सुबह मन के ताजे होने की अनुभूति होगी तथा जीवन में दु:ख न होगा । नाहक ही हम भांति भांति के बोझ लादे घूमते हैं । ईश्वर हम पर बोझ नहीं डालना चाहता , हम खुद अपने माथे पर बोझ उठा लेते हैं । उसीसे हमारे आनन्द का ह्रास होता है । सही देखा जाए तो ऐसा नहीं होना चाहिए ।

    समझने लायक बात यह है कि मानव – जीवन में सुख – दु:ख के प्रसंग टाले नहीं जा सकते , यह निश्चित है । वे आते – जाते रहेंगे , यह पक्का है । परन्तु हमें इन अवसरों पर चित्त को शांत रखने की युक्ति  साधनी चाहिए । कभी भी हमारे उत्साह में कमी नहीं आनी चाहिए । तभी मनुष्य टिका रह सकता है तथा उसका आनंद – उत्साह कायम रह सकता है । सूर्यनारायण सदैव ताजे रहते हैं । हमारे मन को भी बराबर , निरंतर वैसा ही ताजा रहना चाहिए ।

    सूर्य अपनी आभा और प्रभा निरंतर फैलाता है । भोर में जब सूर्य उगता है – वह उसकी आभा है तथा उगने के बाद चारों दिशाओं मेंउसकी किरणें फैल जाती हैं , वह उसकी प्रभा है । सूर्य में यदि सिर्फ आभा होती और प्रभा न होती , तो उसका प्रचार न होता । विचार की मात्र आभा ही नहीं , प्रभा भी फैलती रहती रहनी चाहिए । तब क्रांति का प्रसार होता है । क्रांति का अर्थ है प्रचार शक्ति । अंदर तेजविता हो और बाहर वह फैली हुई हो , उसी का नाम क्रांति है । सूर्य जैसी तेजस्विता हमारे भीतर होगी , हमारे विचारों में होगी तो उसकी क्रांति फैलेगी । जारी

Read Full Post »

पिछला भाग

दुनिया की अन्य किसी भाषा में सूर्य के लिए ऐसा शब्द नहीं है । पारसियों में सूर्य के लिए ‘ मित्र ‘ शब्द मिलता है । अन्य किसी भाषा में सूर्य के लिए ऐसा शब्द नहीं है । हाँलाकि अपने देश में सूर्य जितना मित्र जैसा लगता है उससे बहुत अधिक युरोप में मित्र जैसा लगता है और आनन्ददायक होता है । हमें तो उसका ताप भी तनिक सहन करना पड़ता , परन्तु उनके लिए सूर्य की धूप आनन्ददायक बन पड़ती है । उनकी स्थिति कैसी है ? संस्कृत में एक शब्द है ‘दुर्दिन’ । उसका शब्दश: अर्थ तो ‘अशुभ दिन’ होगा । परन्तु उसका विशेष अर्थ है : जिस दिन आकाश में बादल छाये हुए हों उस वजह से अथवा बारिश के कारण सूर्यनारायण का दर्शन न हो , वह दिन ।

दिनकर , अगम मार्ग को सुगम करो

दिनकर , अगम मार्ग को सुगम करो

    इससे यह समझ में आता है कि यहाँ आए उसके पहले हमारे पूर्वज अरबस्तान जैसे किसी गरम प्रदेश में नहीं रहते होंगे , किसी ठण्डे प्रदेश में ही रहते होंगे जहाँ सूर्य-दर्शन उन्हें मित्र जैसा प्रिय लगता होगा । सूर्य हमेशा रहे इसे वे अपना भाग्य मानते । परंतु सूर्य की धूप जिनके लिए इतनी अधिक आनन्ददायक होती है उन युरोप के लोगों को सूर्य के लिए ‘मित्र’ की संज्ञा नहीं सूझी ! इसलिए उनकी भाषाओं में सूर्य के लिए ‘मित्र’ शब्द नहीं है । वेद में सूर्य को मित्र कहा गया , यह हमारी अग्रणी संस्कृति का द्योतक है । इसमें एक प्रतिभा है , एक दर्शन है । बाद में गौतम बुद्ध ने अपने यहाँ पैदा इस बहुत पुरातन शब्द को ले कर मैत्री का एक आन्दोलन भी चलाया ।

[ जारी ]

अगला – सूर्य के उपकार की कोई सीमा नहीं

Read Full Post »

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 83 other followers