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Posts Tagged ‘वर्ण शंकर’

मेरी बहन डॉ. संघमित्रा की शादी हुई डॉ. सुरेन्द्र गाड़ेकर के साथ । शादी सुबह सार्वजनिक संडास-सफ़ाई और गौशाला सफ़ाई से शुरु हुई थी। शाम को आशीर्वाद -गोष्ठी में सर्वोदयी मनीषी दादा धर्माधिकारी ने कहा कि इस दम्पति की संतान ’महागुजबंगोड़िया’ होगी । दादा संविधान सभा के सदस्य भी रहे । दादा के इस सम्बोधन में तीन पीढ़ी ऊपर और एक पीढ़ी बाद तक का तार्रुफ़ हो जाता है। मेरे ओड़िया नाना , बंगाली नानी ,और गुजराती पिता के अलावा महाराष्ट्र के जीजाजी का उल्लेख दादा द्वारा दिए गए सम्बोधन में आ गए। इस प्रकार मेरी भान्जी चारुस्मिता महागुजबंगोड़िया हुई ।

इस सम्बोधन के सभी शब्दांश प्रान्त और भाषा का संकेत देते हैं , जाति का नहीं । मेरी माँ ने मुझे सिखाया था कि तुम्हारी जाति ’वर्ण शंकर’ है । बहुत ताव से मैं यह बताता था। काफ़ी बाद में पता चला कि गीता के अनुसार वर्ण शंकर काफ़ी ’खतरनाक” विचार है । [ पहले अध्याय के ४१वें से ४४वें श्लोक में अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं,’हे कृष्ण ! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां अत्यन्त प्रदूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दूषित चरित्र वाली हो जाने पर वर्णशंकर संतान उत्पन्न होती है । वर्ण शंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। गुप्त शारीरिक विलास जो नर-मादा के बीज और रज रूप जल की क्रिया से इनके वंश भी अधोगति को प्राप्त होते हैं । इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं । हे जनार्दन ! जिनका कुल धर्म नष्ट हो गया है ऐसे मनुष्यों का अनिश्चितकाल तक नरक में वास होता है ऐसा हम सुनते आये हैं । ]

अर्जुन के मुख से इन समस्त गालियों को सुनने के बावजूद जाति तोड़ने में अन्तर्जातीय विवाह का महत्व (खास कर सवर्ण-अवर्ण) गौण नहीं किया जा सकता। जहाँ तक जनगणना में मुझ जैसे वर्ण शंकरों के वर्गीकरण की बात है हजारों अलग-अलग जातियों की तरह एक समूह इनका भी निर्दिष्ट हो सकता है । यह कत्तई जनगणना में जाति को न गिनने के हक़ में  गिनाया नहं जाना चाहिए। जनगणना की सांस्कृतिक सारिणियों के खण्ड में धर्म न बताने वालों की भी अलग गिनती होती है।

केन्द्र सरकार की नौकरियों में मण्डल कमीशन की संस्तुतियों को लागू करने की घोषणा के बाद सामाजिक यथास्थिति को बनाये रखने में जिनका स्वार्थ था वे तमाम ताकतें सक्रिय हो उठी थीं। इनमें खुद को आग लगाने वाले तरुणों से लगायत भारत के बड़े व्यापारियों की संस्थायें और तमाम अखबारों में अग्रलेख लिखने वाले भी थे । देश के सर्वोच्च न्यायालय ने पक्ष-विपक्ष के तमाम तर्कों को सुनने के बाद क्रीमी लेयर की शर्त के साथ इसे वैधानिक माना। उच्च शिक्षा में पिछड़े वर्गों के आरक्षण के मामले को भी सर्वोच्च न्यायालय में ले जाया गया , जहाँ उसे भी वैध ठहराया गया।

मंडल संस्तुतियों के विरोध को भाजपा और कांग्रेस उकसाने का काम कर रही हैं ऐसा जान पड़ता था। हाल ही में जब लोक सभा में जनगणना में जाति की गिनती पर चर्चा हुई तब भाजपा के हुकुम देव यादव , कांग्रेस के बेनी प्रसाद वर्मा , मुस्लिम लीग तथा नैशनल कॉनफ़रेंस के नुमाइन्दों की वक्तृता ने मुझे प्रभावित किया। सदन में आम सहमति दीख रही थी- मानो देश की आबादी का अक्स दीख रहा हो।

न्यायपालिका , विधायिका में आए ये सकारात्मक परिवर्तन स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं । इसके बावजूद अखबारों के अग्रलेखों में मर्दुम शुमारी की बाबत लिए गए इस अहम फैसले की नुक्ताचीनी वाले लेख आना जारी है। मंडल कमीशन के विरोध से अपने असामाजिक जीवन की शुरुआत करने वाले अरुण त्रिपाठी ’हिन्दुस्तान’ के एसोशियेट एडिटर हैं। तमाम समाज शास्त्रियों और विद्वानों के नाम अपने लेख में चुआने के बाद उन्हें यह समझ में आता है कि जाति को गिनने से उसे भूलाना आसान न होगा। इसी अखबार में टेवि पत्रकार सुधांशु रंजन एक ओर अपने से ऊपर की जाति में गिनती कराने तथा उसी वाक्य में जातीय वोट बैंक के कारण तादाद बढ़ाने की प्रवृत्ति का उल्लेख करते हैं। पिछली शताब्दी की शुरुआत में कई अत्यन्त पिछड़ी जातियों द्वारा अछूत जातियों के साथ खुद को न गिने जाने,कुछ पिछड़ी जातियों द्वारा खुद को क्षत्रीय गिनाने की प्रक्रिया अपनाई गई थी। इसे ’ऊँचा बनो आन्दोलन’ कहा गया। इन तबकों ने अपने समूह के विकास में इससे हुए नुकसान को अच्छी तरह महसूस किया तथा मुश्किल है कि वे इस गलती को दोहरायें ।

बहरहाल , मुझ जैसे पतित वर्ण शंकर को भी एक दलित युवा ने इस मुल्क में जाति की सच्चाई से रू-ब-रू करवा दिया था। एक बार बाबा साहब के परिनिर्वाण दिवस पर मेरे भाषण से प्रभावित होकर उस तेज-तर्रार दलित युवा ने मुझसे कहा था, ’भाषण तो जबरदस्त दिया,अब अपनी जाति भी बता दीजिए’-बिलकुल मुक्तिबोध द्वारा कौन सी पॉलिटिक्स है वाले सवाल के तेवर में। मैंने कहा,’मैं जाति में नहीं मानता।’ इस पर तपाक से उसने पूछा ,’ उस जाति का नाम ही बता दीजिए जो आपको अपने में मानती है !’ मैं निरुत्तर था।

किसी जुलूस में जब तक कुछ पागल , कुछ विकलांग नहीं दिखते तब तक उसे ’काएदे की तादाद वाला जुलूस’ नहीं कहा जा सकता- यह मेरा साथी अजय द्विवेदी कहता था।

[कम्प्यूटर के मॉनिटर के सामने बैठ कर हिन्दी में विचार व्यक्त करने वालों की तादाद अब इतनी हो चुकी है कि इसे काएदे का कहा जाए! अपने खेत में निपटने से जिनका मन हल्का नहीं होता वे घूम घूम कर निपटते हैं -ऐसी छिटपुट बूँदा-बाँदी और गरज के साथ छीटें की अनुमति यहाँ न होगी।]

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