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Posts Tagged ‘कृष्णा’

[ अज़दक की पोस्ट पढ़ते हुए मेरी साथी डॉ. स्वाति को मशहूर मलयालम कथाकार (केन्द्रीय साहित्य अकादमी विजेता) सारा जोसेफ़ की कहानी झूम उठी बालों की देवी बरबस याद आ गई । इस कहानी का हिन्दी अनुवाद चेन्नीत्तला कृ्ष्णन नायर ने किया है ।

सारा जोसेफ़ का सम्पर्क पता - मलयाळम विभाग, गवर्न्मेंट विक्टोरिया कॉलेज,पालघाट (केरल) है। चेन्नीत्तला कृष्णन नायर का सम्पर्क पता- विद्या भवन, पो.ऑ. चेन्नित्तला,मावेलिक्करा (केरल) है । कथाकार एवं अनुवादक के प्रति आभार के साथ कहानी प्रस्तुत है । ]

लिता ने नहाने के बाद , बालों को खूब फैला कर झटकारा और सहेज-सँवार कर आँगन में आ खड़ी हुई।

’बालों को बाँध लो ।’ सनातन ज़ोर से चिल्ला उठा ।

अनजाने में ही ललिता के बाल ऊपर उठे । उस ने बालों को हाथों में ले लिया । लेकिन बाँधने के बजाय उन्हें हाथों से सहलाते हुए वह क़दम-दर-क़दम सनातन की ओर बढ़ी । कुछ दूर चल कर , खड़ी हो सनातन की आँखों में ध्यान से देखने लगी ।

’बालों को बाँध कर रखो ।’ सनातन फिर गरजा ।

ललिता के होंठों से हँसी फूट पड़ी । हँसी उसकी आँखों में भी झलक रही थी । सनातन का मुख शर्म से पीला पड़ गया ।

धीरे-धीरे ललिता के हाथ ढीले पड़ गये । चमकीली लहरों जैसे बाल खुले और उसकी पीठ पर लहलहा उठे । बंधन रहित लह्लहाते ललिता के बालों को ,सोने वाले कमरे की खिड़की से देखता सनातन पीला मुँह लिये खड़ा था । बालों से निकले अँधेरे से सनातन अंधा हो गया । अँधेरे में भी , ललिता की आँखों की हँसी प्रतिबिम्बित हो कर चमक उठी ।

ब वह छोटी बच्ची थी तो बाबूजी भी ऐसे ही कहा करते थे, ’बालों को बाँध कर रखो , बालों को बाँध कर रखो ।’

गर्जन की आवाज सुन कर माँ तेल की शीशी और कंघी ले कर आतीं और बरामदे में पैर फैला कर बैठी ललिता के बालों को पकड़ कर खींचने लगतीं । वे कंघी चला-चला कर ललिता के प्राणों को भी खींच लेतीं । पीठ पर पड़े बालों की चोटी गूँथ देतीं ।

चोटी में गुँथ कर भी एक मोटे काले नाग जैसे बाल ललिता की पीठ पर रेंगते । उस का फन ललिता के पृष्ठ भाग को चाटता रहता । कभी कंधों से हो ,छाती पर रेंगता और डसता रहता ।

बंधन खोल कर रेंगती , तेल में तर काली कुंडली से पिताजी को नफ़रत थी । इसीलिए माँ , दादी और बुआ अपने बालों का सिर पर शिवलिंग जैसा जूड़ा बाँधे घर के भीतर घूमती – फिरतीं ।

रात को नहा कर आते ही माँ ललिता के बालों को भी शिवलिंग बना देतीं । फिर भी भोजन करते समय पिताजी की थाली में बाल का रोयाँ पड़ा मिलता । कौर दूर फेंक कर वे लपक कर उठ जाते और बाल दिखाते हुए लाल चेहरा किए गरजने लगते ।

दादी , मँ और बुआजी बाल सँवारने के बाद उँगलियों और कंघी में उलझे बालों की गुच्छियों को केले के नीचे गाड़ आतीं । फिर भी पिताजी के टहलते समय , उब के पैरों की मोटी उँगलियों में बालों की गुच्छियाँ उलझ जातीं और वे गिरते-गिरते बचते ।

तालाब में उतर कर स्नान करते समय ललिता बालों को पानी में उलट-पलट कर धोती और पानी के ऊपर बिछा देती । पानी में तैरते मणि-सर्पों के बीच पुलकित हो कर , देर तक गले-गले पानी में खड़ी रहती ।

स्नान पूरा होते न होते भैया चिल्ला उठते , ’ अरी बालों को बाँध कर रख । ’

तरह-तरह की रुकावटों के बावजूद ललिता के बाल तमाल वन की तरह लहलहा उठते । टेढ़े-मेढ़े चलने वाले काले-काले भुजंगों की तरह वे उस पर रेंगते रहते । रात में जब माँ सो जातीं तो ललिता सिर पर बाँधे हुए बाल खोल कर मुँह और गले पर छितरा लेती । दोनों हाथों में बालों को ले कर सूँघती और उनकी गंध आत्मा में खींच लेती । मुँह बालों से छिपा कर सो जाती ।

सवेरे ललिता के चेहरे , गले , छाती और पलंग पर छितरे बालों को देख माँ चकित होतीं कि क्यों इस के बाल इस तरह बिखरे रहते हैं ।

ललिता की एक सहेली थी जिसके बाल घुँघराले नहीं बल्कि रूखे और मोटे थे । एक दिन उसने देखा कि वह उन्हें कैंची से काट-काट कर फेंक रही है। ललिता दौड़ कर वहाँ पहुँची । सहेली मानो किसी देवता के आवेश में आ कर काँपते हुए बालों के टुकड़े-टुकड़े कर रही थी । कटे हुए बालों के टुकड़े , रोयाँ – रोयाँ बन उस के पैरों में बिखरे हुए थे । बाद में धुएँ की तरह ऊपर उड़े और खिड़की से उतर , घर के बरामदे,छोटे तंग रास्ते और खेतों के किनारे से होते हुए गिरजाघर के आँगन की ओर उड़ चले । ललिता ने हाँफते हुए पूछा , ’यह क्या किया ? ’

’मेरा जीवन कन्या-स्त्री मठ में समर्पित कर दिया गया है । ’

सहेली ने दीवार पर लटकी ईसा की तसवीर की ओर कैंची फेंकी । तसवीर का शीशा टूट कर , काले- काले बालों के टु्कड़ों के ढेर में जा घुसा – बालों का खून काला है….. काले रक्त की धार में ललिता के पैर भीग गए ।

मुँडे हुए सिर का भार सहने में असमर्थ हो ललिता वहाँ से भाग निकली ।

’ मैं अपने बाल नहीं काटने दूँगी । बालों को खोल कर ही घूमूँ – फिरूँगी । ’ सहेली के घर से निकलते हुए , आँगन में खड़े हो , हाथ उठा कर ललिता ने शपथ ली ।

बैठकख़ाने से पिताजी की जलती हुई आँखें दिखाई दीं तो अनजाने में ही उस ने सिर के बालों को बाँध लिया। ग़ुस्से को दबाए रख कर वह , बालों का एक छोटा-सा गुच्छा पिता के पान वाले डिब्बे में छिपाती गई ।

चोटी में गुँथी-पिरी बालों की जीभ ललिता की पीठ को चातती रहती । इसे भी अश्लील समझने वाला भाई एक दिन चिल्लाया , ’ आज से साड़ी के पल्ले से बालों को ढक कर ही ललिता कॉलेज जाएगी । मुझे लोगों को मुँह दिखाना है । ’ ललिता के होठों पर मुस्कान झलक उठी ।

सिर धोती के पल्ले से ढक कर ललिता कॉलेज जाती । होंठों पर दबी-दबी हँसी और आँखों में चमक लिए वह मदमदाती और इठलाती हुई चलती । कॉलेज का फाटक लाँघते ही वह साड़ी के कोने का बंधन खोल , वेणी की नागिन को मुक्त कर देती । पायल की मंद ध्वनि फैलाती हुई वह बरामदे में चलती ।

[ जारी ]

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