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	<title>यही है वह जगह</title>
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	<description>काशी विश्वविद्यालय और बनारस पर</description>
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		<title>यही है वह जगह</title>
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		<title>कट्टरपन्थी नहीं समझ सकते शांति और तर्क की भाषा : डॉ. असगर अली इंजीनियर</title>
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		<pubDate>Wed, 15 May 2013 03:43:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अफ़लातून अफलू</dc:creator>
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				<content:encoded><![CDATA[<p>हाल में समाचारपत्रों में एक अत्यंत दुःखद और चिन्ताजनक खबर छपी, जिसके अनुसार पाकिस्तान में कट्टरपन्थियों ने उनमें से कई महिलाओं को जान से मार दिया जो बच्चों को पोलियो की दवा पिला रही थीं। कट्टरपन्थियों का मानना है कि पोलियो उन्मूलन अभियान, दरअसल, मुसलमानों की आबादी कम करने का अन्तर्राष्ट्रीय षडयन्त्र है। वे ऐसा सोचते हैं कि पोलियो की दवा पीने से लड़के नपुंसक हो जायेंगे। भारत में भी कुछ मुसलमान और इमाम ऐसा ही सोचते हैं और जु़मे की नमाज के बाद होने वाली तकरीरों में कई इमामों ने मुसलमानों से यह अपील की कि वे सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपने बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने की इजाजत न दें। <a href="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2013/05/970634_565383813482876_1357230121_n.jpg"><img src="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2013/05/970634_565383813482876_1357230121_n.jpg?w=500" alt="असगर अली इंजीनियर"   class="alignleft size-full wp-image-1363" /></a></p>
<p>परन्तु भारत में यह मुद्दा केवल चंद इमामों की अपीलों तक सीमित रहा। किसी व्यक्ति को कोई शारीरिक नुकसान नहीं पहुँचाया गया – कत्ल तो दूर की बात है। पाकिस्तान के कट्टरपन्थी हिंसा की संस्कृति में विश्वास रखते हैं और उनके पास उनकी आज्ञा को न मानने वाले के लिये एक ही सजा है-मौत। मलाला को इसलिये मार डालने की कोशिश की गयी क्योंकि उसने तालिबान की बात नहीं सुनी और बच्चियों की शिक्षा की वकालत करती रही। जो लोग इस्लाम के नाम पर दूसरों को मारते हैं वे सच्चे मुसलमान तो हैं ही नहीं, बल्कि वे तो मुसलमान कहलाने के लायक भी नहीं हैं। धर्मपरायण मुसलमान होने के लिये व्यक्ति को न्याय करने वाला होना चाहिये। कुरान कहती है ‘‘न्याय करो : यही धर्मपरायणता के सबसे नजदीक है। अल्लाह से डरते रहो, निःसंदेह, जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी खबर रखता है‘‘ (5ः8)।</p>
<p>कोई भी ऐसा व्यक्ति जो दूसरों की जान लेता है स्वयं को न्याय करने वाला कैसे कह सकता है? न्याय करना वैसे भी बहुत कठिन काम है। हत्यारे को सजा देने के लिये कम से कम दो धर्मपरायण और ईमानदार गवाहों की आवश्यकता होती है। और बलात्कार को साबित करने के लिये कम से कम चार ऐसे गवाह चाहिये होते हैं। शरीयत कानून के अनुसार, किसी भी व्यक्ति की गवाही स्वीकार करने के पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि वह व्यक्ति ईमानदार, पवित्र और धर्मपरायण है। हर किसी की गवाही को स्वीकार नहीं किया जा सकता। किसी को मारने की इजाजत तभी है जब उस व्यक्ति ने कत्ल किया हो और वह भी कत्ल-ए-अमत (जानबूझकर व सोच-समझकर)। अल्लाह तो यही चाहता है कि कातिल को मुआवजा लेकर या बिना मुआवजा लिये माफ कर दिया जाये।</p>
<p>किसी भी व्यक्ति को बिना उचित कारण के जान से मारना एक बहुत बड़ा पाप है। कुरान कहती है ‘‘जिसने किसी व्यक्ति का, किसी के खून का बदला लेने या ज़मीन में फ़साद फैलाने के सिवाय, किसी और कारण से कत्ल किया तो मानो उसने समस्त मनुष्यों की हत्या कर डाली और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो समस्त मनुष्यों को जीवन प्रदान किया‘‘ (5ः32)। यह कुरान की सबसे महत्वपूर्ण आयतों में से एक है। जीवन पवित्र है और किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी अन्य व्यक्ति का जीवन अकारण ले ले। किसी की जान लेने के लिये बहुत महत्वपूर्ण कारण होना चाहिये। अगर हम मनुष्य एक-दूसरे को अकारण और जब चाहे मारने लगेंगे तो इस धरती से मानव जाति का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा।</p>
<p>सामान्यतः, हथियारों का इस्तेमाल स्वयं की रक्षा के लिये किया जाना चाहिये। किसी की जान लेने के लिये नहीं। क्या कोई यह बता सकता है कि शरीयत में कहाँ यह लिखा है कि पोलियो की दवा पिलाने की सजा मौत है? पोलियो की दवा तो उस समय थी ही नहीं जब शरीयत लिखी गयी थी। कट्टरपन्थी धार्मिक नेता वैसे तो शरीयत कानून में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का कड़ा विरोध करते हैं – फिर चाहे वह कितना ही औचित्यपूर्ण क्यों न हो – परन्तु अपनी सुविधानुसार वे शरीयत कानून में कुछ भी जोड़ – घटा लेते हैं या शब्दों और वाक्यों के ऐसे अर्थ निकाल लेते हैं जो उनके हितों और लक्ष्यों के अनुरूप हों। पोलियो की दवा पिलाने वाली महिलाओं की हत्या इसी तरह के किसी बेहूदा तर्क के आधार पर की गयी। यह शरीयत कानून में मनमाना परिवर्तन है जिसे किसी भी हालत में औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता।</p>
<p>ये वही कट्टरपन्थी हैं जिन्हें नारकोटिक ड्रग्स का उत्पादन करने और उन्हें बेचने से कोई गुरेज नहीं है। वे इन ड्रग्स को बेचकर अकूत धन कमाते हैं और उससे खरीदे गये हथियारों का इस्तेमाल युवाओं की जान लेने के लिये करते हैं। इस्लाम में शराब सहित सभी नशीले पदार्थों पर कड़ा प्रतिबन्ध है परन्तु यह सर्वज्ञात है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तालिबान, बड़े पैमाने पर ड्रग्स का उत्पादन करते हैं, उन्हें तस्करी के जरिये दूसरे देशों में ऊँची कीमत पर बेचते हैं और उस धन से हथियार खरीदते हैं। मैंने अफगानिस्तान में कई ड्रग-विरोधी सम्मेलनों में भाग लिया है और मैं जानता हूँ कि हथियार और असलाह की अपनी लिप्सा पूरी करने के लिये तालिबान ने हजारों ज़िन्दगियाँ तबाह कर दी हैं। अफगानिस्तान में महिलाएं तक ड्रग्स लेने की आदी हैं। यह है तालिबान का इस्लाम।</p>
<p>तालिबान से हम यह भी जानना चाहेंगे कि यह उन्हें किसने बताया कि पोलियो की दवा से पुरूष नपुंसक हो जाते हैं। क्या वे किसी वैज्ञानिक अनुसन्धान के आधार पर इस नतीजे पर पहुंचें हैं? या वे केवल अफवाहों के आधार पर किसी भी विषय पर अपना मत बना लेते हैं? किसी भी बात पर उसकी सत्यता का पता लगाये बिना विश्वास कर लेने की कुरआन सख्त शब्दों में निंदा करती है। कुरान की आयत 48:9, 48:12, 49:12 और 53:23 में इस प्रवृत्ति की आलोचना की गयी है। कुरान कहती है कि कई मामलों में ऐसा करना गुनाह करने जैसा है और कई बार हम अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिये ऐसी बातों को सच बताने लगते हैं जो सही नहीं हैं। कुरान इस तरह की प्रवृत्ति को घोर अनुचित करार देती है। अगर तालिबान केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर पोलियो की दवा पिलाने वाली महिलाओं का कत्ल कर रहे हैं तो यह कुरान की दृष्टि में गुनाह है। और यदि वे अनुसन्धान या किसी और तरीके से इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि पोलियो की दवा नपुंसकता को जन्म देती है तो उन्हें इसका प्रमाण प्रस्तुत करना चाहिये। क्या वे यह चाहते हैं कि छोटे-छोटे बच्चे पोलियो के कारण अपना पूरा जीवन अपाहिज के तौर पर बिताने पर मजबूर हों? जीवन अल्लाह की एक सुन्दर भेंट है। क्या वे चाहते हैं कि हजारों-लाखों बच्चे ईश्वर की इस भेंट का आनन्द न ले पायें और वह भी केवल तालिबान की गलतफहमी या कमअक्ली के कारण?</p>
<p>पल्स पोलियो अभियान को संयुक्त राष्ट्र संघ ने शुरू किया है और इसका लक्ष्य है धरती के माथे से पोलियो के कलंक को मिटाना। इस अभियान का उद्धेश्य हमारी पृथ्वी के निवासियों को अधिक स्वस्थ और प्रसन्न बनाना है। यह दवा केवल मुसलमानों को नहीं पिलायी जा रही है। पूरी दुनिया में सभी धर्मों के बच्चे इस दवा का सेवन कर रहे हैं। पूरी मानवता इस अभियान से लाभान्वित हो रही है, विशेषकर अफ्रीका और एशिया के वे इलाके जहाँ गरीबी, बदहाली और भूख ने अपने पाँव पसार रखे हैं। ऐसा लग रहा है कि पल्स पोलियो अभियान का विरोध, दरअसल, तालिबान का एक षडयन्त्र है जिसका लक्ष्य मुसलमानों की आने वाली पीढ़ियों को अपाहिज बनाना है ताकि वे तालिबान की दया और दान पर निर्भर रहें।</p>
<p>कुरान और हदीस में इल्म पर बहुत जोर दिया गया है। इसके चलते होना तो यह था कि मुसलमान, विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के मामले में पूरी दुनिया में सबसे आगे होते। परन्तु यह दुःखद है कि मुस्लिम कट्टरपन्थी इतने अज्ञानी और अन्धविश्वासी हैं और वे बन्दूक के बल पर मुसलमानों को अज्ञानता के अंधेरे में कैद रखना चाहते हैं। मुसलमानों का यह कर्तव्य है कि वे अज्ञानता का नाश करें और ज्ञान के युग का आगाज़ करें। तालिबान आधुनिक शिक्षा के विरोधी हैं। वे महिलाओं को शिक्षित और स्वतन्त्र देखना नहीं चाहते। यहाँ तक कि वे आधुनिक दवाओं तक के विरोधी हैं। वे केवल बन्दूकों की खेती कर रहे हैं। क्या यह इस्लाम है? हमें युवा मुसलमानों को प्रेरित करना होगा कि वे तालिबान के अभिशाप के खिलाफ खुलकर खड़े हों। यह अभिशाप उतना ही खतरनाक है जितना कि पोलियो।</p>
<p>(लेखक डॉ. असगर अली इंजीनियर मुंबई स्थित सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म के संयोजक हैं, जाने-माने इस्लामिक विद्वान हैं और कई दशकों से साम्प्रदायिकता व संकीर्णता के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं। जिनका आज निधन हो गया l मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)</p>
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		<title>सांग्ती घाटी की शान्ति</title>
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		<pubDate>Mon, 22 Apr 2013 06:49:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अफ़लातून अफलू</dc:creator>
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		<description><![CDATA[दिरांग के सरकारी टूरिस्ट लॉज को आज-कल निजी हाथों में दे दिया गया है। उसके मालिक से जब हमने आस-पास की अन्य देखने लायक जगहों के बारे में पूछा तो उसने गरम पानी का सोता,याक शोध संस्थान और सांग्ती घाटी और वहां का भेड़-फार्म बताया । बोमदिला से तवांग जाने वाली मुख्य सड़क पर दिरांग [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kashivishvavidyalay.wordpress.com&#038;blog=439658&#038;post=1358&#038;subd=kashivishvavidyalay&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>दिरांग के सरकारी टूरिस्ट लॉज को आज-कल निजी हाथों में दे दिया गया है। उसके मालिक से जब हमने आस-पास की अन्य देखने लायक जगहों के बारे में पूछा तो उसने गरम पानी का सोता,याक शोध संस्थान और सांग्ती घाटी और वहां का भेड़-फार्म बताया । बोमदिला से तवांग जाने वाली मुख्य सड़क पर दिरांग घाटी है और उसी पहाड़ के दूसरी तरफ बनी घाटी सांग्ती है। शान्त,सौम्य,सुन्दर। शुरुआती ५ चित्र दिरांग के हैं ।</p>
<table style="width:194px;">
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<br />Filed under: <a href='http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/category/%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%80/'>यायावरी</a> Tagged: <a href='http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/tag/%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%a3%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%b2/'>अरुणाचल</a>, <a href='http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/tag/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97/'>दिरांग</a>, <a href='http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/tag/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%98%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80/'>सांग्ती घाती</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kashivishvavidyalay.wordpress.com/1358/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kashivishvavidyalay.wordpress.com/1358/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kashivishvavidyalay.wordpress.com&#038;blog=439658&#038;post=1358&#038;subd=kashivishvavidyalay&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>अरुणाचल प्रदेश में दुर्गम पथ-निर्माता</title>
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		<pubDate>Wed, 10 Apr 2013 09:40:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अफ़लातून अफलू</dc:creator>
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		<description><![CDATA[भालुकपोंग से तवांग के रास्ते को गुगल-मैप पर देख कर ही मेरी हालत खराब हो रही थी। यह सड़क जम्मू से श्रीनगर अथवा हिमाचल प्रदेश की मनाली या मंडी वाली सड़कों से बिलकुल जुदा है।दरअसल भारत में तलवार की आकृति की हिमालय पर्वतमाला का यह हिस्सा भौगोलिक रूप से भी अनूठा है। सड़क की दोहरीकरण [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kashivishvavidyalay.wordpress.com&#038;blog=439658&#038;post=1355&#038;subd=kashivishvavidyalay&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>भालुकपोंग से तवांग के रास्ते को गुगल-मैप पर देख कर ही मेरी हालत खराब हो रही थी। यह सड़क जम्मू से श्रीनगर अथवा हिमाचल प्रदेश की मनाली या मंडी वाली सड़कों से बिलकुल जुदा है।दरअसल भारत में तलवार की आकृति की हिमालय पर्वतमाला का यह हिस्सा भौगोलिक रूप से भी अनूठा है। सड़क की दोहरीकरण का काम चल रहा है।सीमा सड़क संगठन स्थानीय लोगों को ठेके देता है।इस इलाके में सड़क बनाने की मजदूरी में महिलाएं काफी हैं।</p>
<table style="width:194px;">
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<td align="center" style="height:194px;background:url('//picasaweb.google.com/s/c/transparent_album_background.gif') no-repeat left;"><a href="https://picasaweb.google.com/116266757156298174802/rbMLuE?authuser=0&amp;feat=embedwebsite"><img src="https://lh3.googleusercontent.com/-UKy3Q5u2HmQ/UWUsPqvIYjE/AAAAAAAADgo/3FiDvvsIWZE/s160-c/rbMLuE.jpg" width="160" height="160" style="margin:1px 0 0 4px;" /></a></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align:center;font-family:arial, sans-serif;font-size:11px;"><a href="https://picasaweb.google.com/116266757156298174802/rbMLuE?authuser=0&amp;feat=embedwebsite" style="color:#4D4D4D;font-weight:bold;text-decoration:none;">दुर्गम पथ निर्माता</a></td>
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		<title>अरुणाचल का बौद्ध अंचल</title>
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		<pubDate>Tue, 09 Apr 2013 03:48:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अफ़लातून अफलू</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अरुणाचल प्रदेश के इस अंचल का बौद्ध प्रभाव चार सौ वर्षों से अधिक पुराना है। बौद्ध विहारों में प्रशिक्षु-भिक्षु,शिशु-भिक्षु। प्लास्टिक की खाली बोतलों से फुटबॉल खेलते भिक्षु।सारनाथ के निकट से हम आ रहे हैं,यह बता देना तुरन्त तंतु जोड़ देता है। दलाई लामा का प्रभाव इतना है कि स्थानीय नेता खुद के प्रचार के लिए [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kashivishvavidyalay.wordpress.com&#038;blog=439658&#038;post=1352&#038;subd=kashivishvavidyalay&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>अरुणाचल प्रदेश के इस अंचल का बौद्ध प्रभाव चार सौ वर्षों से अधिक पुराना है। बौद्ध विहारों में प्रशिक्षु-भिक्षु,शिशु-भिक्षु। प्लास्टिक की खाली बोतलों से फुटबॉल खेलते भिक्षु।सारनाथ के निकट से हम आ रहे हैं,यह बता देना तुरन्त तंतु जोड़ देता है। दलाई लामा का प्रभाव इतना है कि स्थानीय नेता खुद के प्रचार के लिए उनके साथ खिंचवाई तस्वीरों की होर्डिंग लगवाते हैं। तवांग के बड़े बौद्ध विहार में स्वातिजी ने कुछ दान देने की इच्छा प्रकट की।एक विद्यार्थी दान-पात्र तक ले गया।वहीं एक बड़ा रजिस्टर था। उसने कहा कि उस रजिस्टर में मनोकामना दर्ज कर सकते हैं। हमने दर्ज किया , &#8216;तिब्बत मुक्त हो।अहिंसक संघर्ष सफल हो।&#8217; (दो नन्हे विडियो क्लिप्स आखिर में हैं,जरूर देखें)</p>
<table style="width:194px;">
<tr>
<td align="center" style="height:194px;background:url('//picasaweb.google.com/s/c/transparent_album_background.gif') no-repeat left;"><a href="https://picasaweb.google.com/116266757156298174802/ZQTBoJ?authuser=0&amp;feat=embedwebsite"><img src="https://lh3.googleusercontent.com/-qwvY3MwfrRc/UWL5RXkAKeE/AAAAAAAADfc/tM-jcrKuElU/s160-c/ZQTBoJ.jpg" width="160" height="160" style="margin:1px 0 0 4px;" /></a></td>
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<tr>
<td style="text-align:center;font-family:arial, sans-serif;font-size:11px;"><a href="https://picasaweb.google.com/116266757156298174802/ZQTBoJ?authuser=0&amp;feat=embedwebsite" style="color:#4D4D4D;font-weight:bold;text-decoration:none;">अरुणाचल का बौद्ध अंचल</a></td>
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		<title>अरुणाचल के फूल , पेड़ &#8211; पौधे</title>
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		<pubDate>Sun, 07 Apr 2013 06:12:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अफ़लातून अफलू</dc:creator>
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		<description><![CDATA[भालुकपोंग में हम अरुणाचल की सीमा में दाखिल हुए।यहीं तक तराई है। कुछ ही दूर टीपी गांव में वन विभाग द्वारा संचालित एक ऑर्किड शोध-केन्द्र है। अरुणाचल में हिमालय की पहाड़ियां कतारबद्ध नहीं हैं। आड़ी-तिरछी एक दूसरे को काटती हुई हैं। असम के सहायक वन संरक्षक बनारस में मेरे स्कूल में ५ वर्ष आगे थे। [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kashivishvavidyalay.wordpress.com&#038;blog=439658&#038;post=1345&#038;subd=kashivishvavidyalay&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>भालुकपोंग में हम अरुणाचल की सीमा में दाखिल हुए।यहीं तक तराई है। कुछ ही दूर टीपी गांव में वन विभाग द्वारा संचालित एक ऑर्किड शोध-केन्द्र है। अरुणाचल में हिमालय की पहाड़ियां कतारबद्ध नहीं हैं। आड़ी-तिरछी एक दूसरे को काटती हुई हैं। असम के सहायक वन संरक्षक  बनारस में मेरे स्कूल में ५ वर्ष आगे थे। उन्होंने बताया कि अंडमान-निकोबार के बाद अरुणाचल का वनाच्छादित इलाका सर्वाधिक है(क्षेत्रफल के प्रतिशत के हिसाब से)।भालुकपोंग से तवांग पहुंचने के लिए जिन दर्जनों पहाड़ियों-घाटियों को पार किया उन पर पेड-पौधों की विविधता ध्यान खींचने वाली थी।जगह-जगह फूले लाल बुरांश के फूलों ने ध्यान खींचा तब स्वातिजी ने उसका नाम बताया। केले से मिलता-जुलता एक पेड़ बहुतायत में दिखा। जंगल के हिस्से के रूप में।यानि जिसे बतौर खेती न लगाया गया हो।मजे की बात यह थी कि मीलों तक यह पेड़ दिखे और सिर्फ एक जगह उनका फूल और एक जगह गाढ़े रंग के छिलके वाले फल दिखे।मुमकिन है फल सड़ चुके हों।अरुणाचल के बाहर के एक विद्वान साथी ने कहा कि सम्भव है उनके फूलने-फलने का यह मौसम न हो।अरुणाचल के जंगल में विविधता है लेकिन अनमने तो नहीं लगते वे।</p>
<table style="width:194px;">
<tr>
<td align="center" style="height:194px;background:url('//picasaweb.google.com/s/c/transparent_album_background.gif') no-repeat left;"><a href="https://picasaweb.google.com/116266757156298174802/YtphHK?authuser=0&amp;feat=embedwebsite"><img src="https://lh5.googleusercontent.com/-tWX7DMMDNj0/UWD-R5hKvVE/AAAAAAAADYs/KIpAevER9-8/s160-c/YtphHK.jpg" width="160" height="160" style="margin:1px 0 0 4px;" /></a></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align:center;font-family:arial, sans-serif;font-size:11px;"><a href="https://picasaweb.google.com/116266757156298174802/YtphHK?authuser=0&amp;feat=embedwebsite" style="color:#4D4D4D;font-weight:bold;text-decoration:none;">अरुणाचल के फूल,पेड़-पौधे</a></td>
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		<title>सेला दर्रे पर प्रथम हिम-दर्शन</title>
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		<pubDate>Fri, 05 Apr 2013 07:19:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अफ़लातून अफलू</dc:creator>
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		<description><![CDATA[सेला दर्रा कई पहाड़ियों के ऊपरी हिस्से में बना दर्रा है। ऊपर तक पहुंचने के पहले रूई के फाहों की तरह बर्फ यत्र-तत्र छितराई हुई थी। स्वातिजी ने ध्यान दिलाया। उन फुटकर फाहों को देख कर ही मैं उत्तेजित हो गया।लगा उनके क्लोज-अप लेने।हिमांचल और काश्मीर में दूर से हिमाच्छादित चोटियां देखी थीं।छू कर नहीं। [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kashivishvavidyalay.wordpress.com&#038;blog=439658&#038;post=1338&#038;subd=kashivishvavidyalay&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>सेला दर्रा कई पहाड़ियों के ऊपरी हिस्से में बना दर्रा है। ऊपर तक पहुंचने के पहले रूई के फाहों की तरह बर्फ यत्र-तत्र छितराई हुई थी। स्वातिजी ने ध्यान दिलाया। उन फुटकर फाहों को देख कर ही मैं उत्तेजित हो गया।लगा उनके क्लोज-अप लेने।हिमांचल और काश्मीर में दूर से हिमाच्छादित चोटियां देखी थीं।छू कर नहीं। दर्रे पर पहुंच कर मानो किसी और दुनिया में पहुंच गया। एक शाम पहले हुई बर्फबारी ने अद्भुत नजारा बना दिया था। उतना निर्मल-नीला आकाश भी न मालूम कब देखा होगा? धूप बर्फ को चमका रही थी। दो दिन बाद लौटते वक्त सड़क की कीचड़ से पता चला कि बर्फ को पिघला भी रही थी। सीमा सड़क संगठन द्वारा इस सड़क का दोहरीकरण का काम चल रहा है। सड़क बनाने के काम में स्थानीय महिलाओं की अच्छी भागीदारी है। सड़क बनाने में लोगों की जाने भी गई हैं। उन्हें सीमा सड़क संगठन के अधिकारी अंग्रेजी के सिवा कैसे याद कर सकते थे?मानों कह रहे हों &#8221;हिज्जों की भूलों से हिचकिचाहट कैसी? अंग्रेजी लिखते-लिखते आएगी।&#8221; १३,७०० फुट की इस ऊंचाई पर चाय-पानी की एक दुकान है।</p>
<table style="width:194px;">
<tr>
<td align="center" style="height:194px;background:url('//picasaweb.google.com/s/c/transparent_album_background.gif') no-repeat left;"><a href="https://picasaweb.google.com/116266757156298174802/PrathamHimDarshan?authuser=0&amp;feat=embedwebsite"><img src="https://lh4.googleusercontent.com/-hDzXnv6bjaQ/UV4_EEB-MgE/AAAAAAAADU0/JjldVNhTubg/s160-c/PrathamHimDarshan.jpg" width="160" height="160" style="margin:1px 0 0 4px;"/></a></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align:center;font-family:arial, sans-serif;font-size:11px;"><a href="https://picasaweb.google.com/116266757156298174802/PrathamHimDarshan?authuser=0&amp;feat=embedwebsite" style="color:#4D4D4D;font-weight:bold;text-decoration:none;">Pratham Him-darshan</a></td>
</tr>
</table>
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		<title>रामप्रकाश कुशवाहा की कविता : थोड़ी-सी जगह</title>
		<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2013/01/22/ramprakash_kushvaha_hindi_poems/</link>
		<comments>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2013/01/22/ramprakash_kushvaha_hindi_poems/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 22 Jan 2013 07:21:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अफ़लातून अफलू</dc:creator>
				<category><![CDATA[hindi poem]]></category>
		<category><![CDATA[kavita]]></category>
		<category><![CDATA[कुशवाहा]]></category>
		<category><![CDATA[थोड़ी सी जगह]]></category>
		<category><![CDATA[रामप्रकाश]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी कविता]]></category>

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		<description><![CDATA[थोड़ी-सी जगह थोड़ी सी जगह जरूरी है किसी और के लिए चाहे वह ईश्वर हो या फिर कोई और थोड़ा सा भोजन उसके लिए जो अभी नहीं आया है लेकिन जो आ सकता है कभी भी थोड़ा सा धैर्य &#8211; जो दुख में है उसकी नाराजगी और क्रोध के लिए थोड़ा सा बोझ दूसरों की [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kashivishvavidyalay.wordpress.com&#038;blog=439658&#038;post=1324&#038;subd=kashivishvavidyalay&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><strong>थोड़ी-सी जगह</strong></p>
<p>थोड़ी सी जगह जरूरी है<br />
किसी और के लिए<br />
चाहे वह ईश्वर हो या फिर कोई और<br />
थोड़ा सा भोजन उसके लिए<br />
जो अभी नहीं आया है<br />
लेकिन जो आ सकता है कभी भी</p>
<p>थोड़ा सा धैर्य &#8211; जो दुख में है<br />
उसकी नाराजगी और क्रोध के लिए<br />
थोड़ा सा बोझ दूसरों की विपत्ति को<br />
बांट लेने और बचा लेने के लिए</p>
<p>थोड़ी सी संभावनाएं बची रहनी चाहिए<br />
नए अविष्कारों के लिए भी<br />
और थोड़ी सी ऊब<br />
नए प्रश्नों के लिए<br />
थोड़ा सा मन<br />
नैराश्य के अंतिम क्षणों के विरुद्ध<br />
थोड़ी सी चुप्पी और थोड़ा सा संवाद<br />
एक संवेदनशील मन<br />
और सुरक्षित जीवन के लिए&#8230;<br />
<strong>- रामप्रकाश कुशवाहा</strong><br />
कवि का संपर्कः बी १ साईं अपार्टमेंट,टडिया,करौंदी,सुन्दरपुर, वाराणसी २२१०००५<br />
( सामयिक वार्ता , जनवरी २०१३ से साभार। वार्षिक सदस्यता शुल्क- सौ रुपये,पांच वर्षीय ६ सौ रुपये,आजीवन २००० रुपये<br />
मनी आर्डर से &#8211; सामयिक वार्ता,द्वारा चन्द्रशेखर मिश्र,दूसरी लाइन,इटारसी,जि होशंगाबाद,म.प्र. ४६११११ पर भेजें। varta3@gmail.com )</p>
<br />Filed under: <a href='http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/category/hindi-poem/'>hindi poem</a>, <a href='http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/category/kavita/'>kavita</a> Tagged: <a href='http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/tag/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b6%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%be/'>कुशवाहा</a>, <a href='http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/tag/%e0%a4%a5%e0%a5%8b%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%b9/'>थोड़ी सी जगह</a>, <a href='http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/tag/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b6/'>रामप्रकाश</a>, <a href='http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/tag/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be/'>हिन्दी कविता</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kashivishvavidyalay.wordpress.com/1324/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kashivishvavidyalay.wordpress.com/1324/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kashivishvavidyalay.wordpress.com&#038;blog=439658&#038;post=1324&#038;subd=kashivishvavidyalay&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">अफ़लातून</media:title>
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	</item>
		<item>
		<title>उदारीकरण के दो दशकः कितना नफा, कितना नुकसान / लेखक- सुनील</title>
		<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2012/11/02/liberalisation_two_decades_sunil/</link>
		<comments>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2012/11/02/liberalisation_two_decades_sunil/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 02 Nov 2012 15:16:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अफ़लातून अफलू</dc:creator>
				<category><![CDATA[बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[Liberalisation]]></category>
		<category><![CDATA[corporatisation]]></category>
		<category><![CDATA[globalisation]]></category>
		<category><![CDATA[liberalisation]]></category>
		<category><![CDATA[sunil]]></category>

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		<description><![CDATA[बीसवीं सदी के आधुनिक भारत का इतिहास जब लिखा जाएगा, तो उसमें दो तारीखें महत्वपूर्ण मानी जाएगी। पहली है 15 अगस्त 1947, जब लंबे संघर्ष के बाद भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ। दूसरी है मई 1991, जब आजाद भारत की सरकारों ने वापस देश को गुलाम और परावलंबी बनाने की नीतियों को अख्तियार [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kashivishvavidyalay.wordpress.com&#038;blog=439658&#038;post=1320&#038;subd=kashivishvavidyalay&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>	बीसवीं सदी के आधुनिक भारत का इतिहास जब लिखा जाएगा, तो उसमें दो तारीखें महत्वपूर्ण मानी जाएगी। पहली है 15 अगस्त 1947, जब लंबे संघर्ष के बाद भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ। दूसरी है मई 1991, जब आजाद भारत की सरकारों ने वापस देश को गुलाम और परावलंबी बनाने की नीतियों को अख्तियार करना शुरु किया। कहने को तो राजनीतिक रुप से देश आजाद रहा, किंतु उसकी नीतिया, योजनाए और कार्यक्रम विदेशी निर्देशों पर, विदेशी हितों के लिए संचालित होने लगे। बहुत तेजी से भारत की नीतियों, आर्थिक प्रशासनिक ढांचे और नियम कानूनों में बदलाव होने लगे।<br />
	तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह अब देश के प्रधानमंत्री हैं। बीच में वे सरकार में नहीं थे, किंतु जो सरकारें आई, उन्होंने भी कमोबेश इन्हीं नीतियों को जारी रखा। देश के जागरुक लेाग, संगठन और जनआंदोलन इन नीतियों का विरोध करते रहे और इनके खतरनाक परिणामों की चेतावनी देते रहे। दूसरी ओर इन नीतियों के समर्थक कहते रहे कि देश की प्रगति और विकास के लिए यही एक रास्ता है। प्रगति के फायदे नीचे तक रिस कर जाएंगे और गरीब जनता की भी गरीबी दूर होगी। उनकी दलील यह भी है कि वैश्वीकरण के जमाने में हम दुनिया से अलग नहीं रह सकते और इसका कोई विकल्प नहीं है।<br />
	प्रारंभ में यह बहस सैद्धांतिक और अनुमानात्मक रही। दोनों पक्ष दलील देते रहे कि इनसे ऐसा होगा या वैसा होगा। हद से हद, दूसरे देशों के अनुभवों को बताया जाता रहा। किंतु अब तो भारत में इन नीतियों को दो दशक से ज्यादा हो चले है। एम पूरी पीढ़ी बीत चली है। किन्हीं नीतियों के या विकास के किसी रास्ते के, मूल्यांकन के लिए इतना वक्त काफी होता है। इन नीतियों वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, मुक्त बाजार, आर्थिक सुधार, बाजारवाद, नवउदारवाद आदि विविध और कुछ हर तक भ्रामक नामों से पुकारा जाता है। वास्तव में यह वैश्विक पूंजीवाद का एक नया, ज्यादा आक्रामक और ज्यादा विध्वंसकारी दौर है। भारत में इसके अनुभव की समीक्षा का वक्त आ गया है। इन पर पूरे देश में खुलकर बहस चलना चाहिए। यह इसलिए भी जरुरी है कि भारत सरकार अभी तक के अनुभव की समीक्षा किए बगैर बड़ी तेजी से इन विनाशकारी सुधारों को आगे बढ़ा रही है। उनकी भाषा में यह ‘दूसरी पीढ़ी के सुधारों‘ पर चल रही है। तो आइए देखें कि भारत में इस तथाकथित उदारीकरण का रिपोर्ट कार्ड क्या रहा है ?<br />
उपलब्धियां<br />
	सरसरी तौर पर पिछले दो दशकों में काफी प्रगति दिखाई देती है। राष्ट्रीय आय (जीडीपी) की सालाना वृद्धि दर पहले 2-3 फीसदी हुआ करती थी, जिसे अर्थशास्त्री मजाक में ‘हिन्दू वृद्धि दर‘ कहते है। किंतु इस अवधि में वह बढ़ते-बढ़ते 2005-06 से 2007-08 के बीच 9 से ऊपर पहंुच गई। इससे उत्साहित होकर भारत को चीन के साथ नई उभरती आर्थिक महाशक्ति का दरजा दिया जाने लगा। हालांकि बाद में यह वृद्धि दर उतरते-उतरते चालू साल में 6 से नीचे आ गई है।<br />
	1991 के संकट के समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो गया था और भारत का सोना लंदन में गिरवी रखना पड़ा था। यह संकट दूर हुआ और भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में काफी बढोतरी हुई। भारत के निर्यात भी काफी बढ़े हैं। यदि विदेशी पूंजी निवेश को उपलब्धि माने, तो इस अवधि में वह भी काफी बढ़ा है। भारतीय कंपनियं अब दुनिया  के अन्य देशों में जा रही है और वहां की कंपनियों को खरीद रही हैं, यानी वे भी बहुराष्ट्रीय बन रही हंै। दुनिया के चोटी के अमीरों की सूची में भारतीय नाम  भी दिखाई देते हैं।<br />
	आधुनिक तकनालाजी में काफी प्रगति हुई है। देश में कम्प्यूटर, सूचना तकनालाजी, मोबाईल, और वाहन क्रांतियां हुई है। बंगलौर, हैदराबाद, पूना, गुड़गांव में इंटरनेट-कम्प्यूटर के केन्द्र विकसित हुए हैं, जिनमें रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। नए राजमार्ग और एक्सप्रेस मार्ग बने है, जिन पर कारें सौ से ऊपर की रफ्तार पर दौड़ सकती हैं। दिल्ली की मेट्रो रेल भी एक चमत्कार लगती हैं। नए कार्पोरेट अस्पताल बन गए हैं, जहां इलाज कराने के लिए दूसरे देशों से लोग आ रहे हैं और अब ‘रसायन पर्यटन‘ नाम एक नई चीज शुरु हो गई हैं।  शिक्षा में भी प्रबंधन, इंजीनियरिंग, सूचना तकनालाजी, एविएशन आदि के कई तरह के नए संस्थान खुल गए हैं और नए अवसर पैदा हुए हैं।<br />
	किंतु इन लुभावने आंकड़ों और चमक-दमक के बीच जो सवाल रह जाता है वह यह कि देश के साधारण लोगों का क्या हुआ ? उनकी जिंदगी पर क्या असर पड़ा ? वही असली कसौटी होगी।<br />
<strong>गरीबी और भूखमरी: कहां है रिसाव</strong><br />
	कुछ समय पहले भारत सरकार ने अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता की अध्यक्षता में असंगठित क्षेत्र के बारे में एक आयोग गठित किया था। इस आयोग के एक बयान ने देश के प्रबुद्ध वर्ग को चैंका दिया था। वह यह कि देश के 78 फीसदी लोग 20रु. रोज से नीचे जीवनयापन करते हैं। इस आंकडे़ ने देश की प्रगति और विकास के दावों की पोल खोल दी और राष्ट्रीय आय की ऊंची वृद्धि दर के जश्न की हवा निकाल दी। सेनगुप्ता आयोग का यह आंकड़ा 2004-05 का था। किंतु उसके बाद तो मंहगाई से लोगों की हालत  और खराब हुई है।<br />
	भारत सरकार और उसका योजना आयोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली आबादी में लगातार कमी का दावा करता रहता है, उसकी भी असलियत सेनागुप्ता आयोग के इस कथन ने उजागर कर दी। इस बीच में कई विद्वानों ने बताया है कि गरीबी रेखा के निर्धारण और उसकी गणना में कितनी त्रुटियां हंै। पिछले वर्ष जब योजना आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि वह गांवों में 26 रु. और शहरों में 32 रु. रोज से ज्यादा प्रति व्यक्ति खर्च करने वालों को गरीब नहीं मानता है, तब इस हास्यास्पद और दयनीय गरीबी रेखा पर देश में बवाल मचा। दरअसल जानबूझकर इतनी नीची और अव्यवहारिक गरीबी रेखा रखी गई है ताकि गरीबी में कमी और वैश्वीकरण की नीतियों को सफल बताया जा सके। गरीबी रेखा का उपयोग देश की साधारण अभावग्रस्त आबादी के बड़े हिस्से को बुनियादी सुविधाओं में सरकारी मदद से वंचित करने में भी किया जा रहा है, जिससे साधारण लोगों के कष्ट और बढ़े हैं।<br />
	भारत को आर्थिक महाशक्ति बताने वालों को यह भी देख लेना चाहिए कि प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से दुनिया के देशों में भारत का स्थान लगातार बहुत नीचे 133 के आसपास बना हुआ है। ऊंची वृद्धि दर के बावजूद भारत दुनिया के निर्धनतम देशों में से एक है।<br />
 राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय के मौद्रिक आंकड़े पूरी हकीकत का बयान नहीं करते है। मानव विकास सूचकांक और अंतरराष्ट्रीय भूख सूचकांक में भी भारत का स्थान बहुत नीचे है। संख्या के हिसाब से दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे, कुपोषित और अनपढ़ लोग भारत में ही रहते है। अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और अमत्र्य सेन ने पिछले दिनों एक लेख (आउटलुक, 14 नवंबर 2011) में हमारा ध्यान कुछ दुखद तथ्यों की ओर आकर्षित किया है। कुपोषित कमजोर बच्चों का अनुपात पूरी दुनिया में भारत में सबसे ज्यादा है (43.5 फीसदी), अफ्रीका के अकालग्रस्त देशों से भी ज्यादा। दुनिया का एक भी देश ऐसा नहीं है, जिसकी हालत इस मामले में भारत से खराब हो। अफ्रीका के बाहर केवल चार देशों की बाल मृत्यु दर भारत से ज्यादा है और केवल पांच देशों की युवा महिला साक्षरता दर भारत से कम है। कई मामलों में हमारे पडोसी पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल की हालत हम से बेहतर है। क्या ये शरम से सिर झुकाने लायक हालात नहीं है ?<br />
	दरअसल पिछले दो दशकों में भारत में पहले से मौजूद गैरबराबरी और तेजी से बढी है। जो समृद्धि दिखाई दे रही है, वह थोड़े से लोगों के लिए है। राष्ट्रीय आय की वृद्धि मुट्ठी भर लोगों के हाथ मंे जा रही है। अमीर और उच्च मध्यम वर्ग के लोग अमीर बनते जा रहे है। बाकी लोग या तो अपनी जगह हैं या कई मायनों में बदतर होते जा रहे हैं। अमीर-गरीब की बढ़ती खाई के अलावा गांव-शहर, खेती-गैरखेती की खाई तथा क्षेत्रीय गैरबराबरी और सामाजिक गैरबराबरी भी बढ़ी है। इस बढ़ती गैरबराबरी के कारण समाज में असंतोष, तनाव, झगड़ों और अपराधों में भी बढ़ोतरी हो रही है।<br />
रोजगारशून्य विकास<br />
	राष्ट्रीय आय की वृद्धि का आम लोगों की बेहतरी में न बदलने का एक प्रमुख कारण है कि यह रोजगार रहित वृद्धि है। नए रोजगार कम पैदा हो रहे हैं और पुराने रोजगार तथा आजीविका के पारंपरिक स्त्रोत ज्यादा नष्ट हो रहे हैं। कम्प्यूटर-इंटरनेट के नए रोजगारों की संख्या बहुत सीमित है और अमरीका-यूरोप की मंदी के साथ उनमें भी संकट पैदा हो रहा है। रोजगार का संकट मुख्य रुप से निम्न कारणों से गंभीर हुआ है-<br />
1.	बढ़ता मशीनीकरण और स्वचालन। श्रमप्रधान की जगह पूंजी प्रधान तकनालाजी को बढ़ावा। दुनिया के बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए इसे जरुरी माना जा रहा है।<br />
2.	वैश्वीकरण के दौर में कई बड़े कारखानों (जैसे कपड़ा मिलें), छोटे उद्योगों, ग्रामोद्योगों और पारंपरिक धंधों का विनाश। इसमें खुले आयात और विदेशी माल की डम्पिंग ने भी योगदान किया।<br />
3.	भूमि से विस्थापन। जंगल, नदियों और पर्यावरण के प्रभावों ने भी लोगों की अजीविका को प्रभावित किया है।<br />
रोजगार के मामले में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ है कि कंपनियों ने अब स्थायी मजदूर व कर्मचारी रखना कम कर दिया है और वे अस्थायी, दैनिक मजदूरी पर या ठेके पर (ठेकेदार के मारफत) मजदूर रखने लगी हैं या काम का आउटसोर्सिंग करने लगी है। इससे उनकी श्रम लागतों में काफी बचत हो रही हैं। सरकार ने भी श्रम कानूनों को शिथिल कर इस नाम पर इसे बढ़ावा दिया है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय माल प्रतिस्पर्धी बन सकेगा, निर्यात बढे़गा और भारत में विदेशी पंूजी आकर्षित होगी। किंतु इसका मतलब है कि वास्तविक मजदूरी कम हो रही है और श्रम का शोषण बढ़ रहा है। भारत के मजदूर आंदोलन ने लंबे संघर्ष के बाद जो चीजें हासिल की थी, वे खतम हो रही हैं और भारत पीछे जा रहा है।<br />
	सरकारी क्षेत्र में भी निजी कंपनियों की इन शोषणकारी चालों की नकल की जा रही है। जैस अब पुराने स्थायी शिक्षकों की जगह पैरा-शिक्षक लगाए जाते हैं, जिनका वेतन एक-चैथाई होता है। कई बार उन्हें न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जाती ।<br />
	यह भी गौरतलब है कि औद्योगीकरण के प्रयासों के छः दशक और उदारीकरण के दो दशक बाद भी भारत की कुल श्रम शक्ति का 7 फीसदी से भी कम संगठित क्षेत्र में है। (संगठित क्षेत्र में वे पंजीकृत उद्यम, फर्म या कंपनियां शामिल होते है जिनमें दस या ज्यादा लोग काम करते हैं।) बाकी पूरी आबादी असंगठित क्षेत्र में हैं जिनमें किसान, पशुपालन, मछुआरे, खेतीहर मजदूर, हम्माल, घरेलू नौकर, असंगठित मजदूर, फेरीवाले, दुकानदार आदि है। इनमें डाॅक्टरों, वकीलों और मध्यम व बड़े व्यापारियों को छोड़ दें (जो कि करीब 5 फीसदी होंगे), तो बाकी की हालत खराब है। भारत की बहुसंख्यक आबादी की बेहतरी और इस कथित विकास में भागीदारी कब और कैसे होगी ? क्या यह एक मृग-मरीचिका नहीं है ?<br />
<strong>खेती का अभूतपूर्व संकट</strong><br />
	इस देश के बहुसंख्यक लोग आज भी खेती और कुदरत से जुडे कामों में लगे हैं, किंतु राष्ट्रीय आय में उनका हिस्सा लगातार कम होता जा रहा है। खेती और उससे जुड़े पेशों (पशुपालन, मछली, वानिकी) का कुल राष्ट्रीय आय में हिस्सा 1950-51 में 53.1 फीसदी था, जो 1990-91 में घटकर 29.6 और 2011-12 में 13.9 रह गया। दूसरी तरफ देश की आबादी का 58 फीसदी अभी भी इनमें लगा है। इसका मतलब है कि भारत में गांवों में रहने वाली विशाल आबादी वंचित-शोषित हो रही है।<br />
	उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियां कई तरह से भारतीय खेती और किसानों के हितों के खिलाफ साबित हुई हैं-<br />
1.	अनुदान कम करने, विनियंत्रण और निजीकरण के कारण खेती में प्रयोग होने वाले आदान (डीजल, बिजली, खाद, बीज, पानी आदि) महंगे हुए हैं।<br />
2.	कृषि उपज के दाम आम तौर पर लागत-वृद्धि के अनुपात में नहीं बढ़े हैं। कृषि उपज का व्यापार खुला करने और और खुले आयात के कारण भी दाम कम बने रहते हंै। जैसे खाद्य तेलों के आयात से देश में किसानों को तिलहन फसलों के समुचित दाम नहीं मिल पाते हैं। दूसरी ओर, निर्यात फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिनमें कुछ समय तक अच्छे दाम मिलते हैं, किंतु अचानक अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम गिरने से किसानों को नुकसान भी हुआ है। उदारीकरण की नीति के तहत सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदी की व्यवस्था धीरे-धीरे खतम करना चाहती है। यदि यह हुआ तो भारतीय किसान पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार और निजी कंपनियों के चंगुल में आ जाएगा और बरबाद हो जाएगा। चीनी उद्योग के विनियंत्रण की रंगराजन समिति की हालिया रपट में राज्य सरकारें गन्ने के लिए जो समर्थन मूल्य घोषित करती है, उसे खतम करने की सिफारिश की गई है।<br />
3.	हरित क्रांति की गलत तकनालाजी के दुष्परिणाम इस अवधि में सामने आए हैं। भूजल नीचे जा रहा है, मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है, कीट-प्रकोप बढता जा रहा है। विभिन्न फसलों की पैदावार-वृद्धि में ठहराव आ गया है और किसानों को उतनी ही पैदावार लेने के लिए अब ज्यादा खाद और कीटनाशक दवाईयों का इस्तेमाल करना पड रहा है। इस बुनियादी गलती को दुरुस्त करने के बजाय सरकार उसी दिशा में और आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है और ‘दूसरी हरित क्रांति‘ की बात कर रही है। इसी के तहत जीन-मिश्रित बीजों को लाया जा रहा है, जिसके दुष्परिणाम और ज्यादा भयानक एवं दीर्घकालीन हो सकते हैं। नयी हरित क्रांति पूरी तरह कंपनियों के द्वारा संचालित होने वाली है।<br />
4.	खेती का स्वावलंबन पूरी तरह समाप्त करके उसे बाजार-केन्द्रित, बाजार-आधारित और बाजार निर्भर बनाया जा रहा है। इस बाजार को भी अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा जा रहा है। इससे खेती में जोखिम बहुत बढ़ गया है।<br />
5.	मौसम और मानसून के पुराने जोखिम के साथ खेती में कई नए तरह के जोखिम जुड़ते जा रहे हैं। एक, आदानों (पानी, बिजली, खाद, बीज, कर्ज) की आपूर्ति का जोखिम समय पर न मिलना, पर्याप्त मात्रा में न मिलना, उचित गुणवत्ता का न मिलना। दो, तकनालाजी का जोखिम कीट प्रकोप, नए बीजों का ज्यादा नाजुक होना। तीन, बाजार का जोखिम- उपज की कीमत गिर जाना, समर्थन मूल्य पर खरीदी न होना। इतने सारे जोखिमों के आगे आधी-अधूरी फसल बीमा योजनाएं नाकाफी साबित हो रही हैं।<br />
6.	खेती के हर पहलू में देशी विदेशी कंपनियों की घुसपैठ हुई है और उनका नियंत्रण एवं वर्चस्व बढ़ा है। कॉन्ट्रेक्ट खेती, बीजों का पेटेन्ट जैसा कानून, कृषि उपज मंडी कानूनों में बदलाव, और अब खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों को इजाजत ने इस का रास्ता साफ किया है। जमीन मालिकी, बीज आपूर्ति, खाद आपूर्ति, कीटनाशक आपूर्ति, विपणन, भंडारण, प्रसंस्करण आदि हर क्षेत्र में कंपनियां आ रही हैं और छा रही हैं। भारत के किसानों, भारत की खेती और खाद्य-आपूर्ति के नजरिये से यह खतरनाक है।<br />
7.	बडे़ पैमाने पर, सीधे अधिग्रहण करके या बाजार के जरिये, जमीन किसानों के हाथ से निकल रही है और खेती के बाहर जा रही है। जमीन एक सीमित संसाधन है और इसे बढ़ाया नहीं जा सकता। वर्ष 1992-93 से 2002-03 के दौरान देश की कुल खेती की जमीन 12.5 करोड हेक्टेयर से घटकर 10.7 करोड़ हेक्टेयर रह गई। इस तरह महज दस बरस की अवधि में 1.8 करोड़ हेक्टेयर जमीन खेती से निकलकर दीगर उपयोग में चली गई। यही बात पानी के बाबत भी हो रही है। बड़े पैमाने पर नदियों, बांधों, नहरों, व तालाबो का पानी तथा जमीन के नीचे का पानी औद्योगिक और शहरी प्रयोजन के लिए लिया जा रहा है, जिससे खेती के लिए पानी का संकट पैदा हो रहा है।<br />
इन सब का मिला-जुला नतीजा यह हो रहा है कि भारतीय खेती और खेती से जुडे़ समुदाय जबरदस्त मुसीबत में है। बड़े पैमाने पर किसानों की आत्महत्याएं इसका एक लक्षण है। वर्ष 1995 से लेकर 2011 तक खुद सरकार के आंकड़ों के मुताबिक  2 लाख 70 हजार से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके हैं। इस अवधि में हर साल औसतन करीब 16 हजार किसानों ने आत्महत्या की है। यानी रोज 44 किसान देश के किसी कोने में आत्महत्या करते हैं। यह एक अभूतपूर्व संकट है।<br />
	यह भी गौरतलब है कि सबसे ज्यादा संख्या में किसान आत्महत्याएं महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में हो रही हैं। पंजाब और गुजरात में भी काफी किसान आत्महत्याएं हुई हैं। ये वो राज्य है, जहां की खेती काफी बाजार आधारित, उन्नत और खुशहाल मानी जाती है, जहां विश्व बैंक काफी मेहरबान है और जहां खेती में कंपनियों की काफी घुसपैठ है। बीटी कपास के नए जीन-मिश्रित बीजों को बहुत सफल, फायदेमंद और लोकप्रिय बताया जा रहा है। किंतु महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के कपास इलाके में बड़ी तादाद में किसानों की आत्महत्याएं बदस्तूर जारी हैं।<br />
<strong>सेवाओं की लूट</strong><br />
	भारत की राष्ट्रीय आय में जो तेज वृद्धि पिछले सालों में दिखाई दी है, वह लगभग पूरी की पूरी खेती या उद्योग से न होकर, तथाकथित सेवा क्षेत्र से आई है। भारत का सेवा क्षेत्र पिछले बरसों में दस से पंद्रह फीसदी दर से बढ़ रहा है। भारत की राष्ट्रीय आय में खेती का हिस्सा घट रहा है, तो उसकी जगह उद्योग न लेकर  सेवाएं ही ले रही हैं। राष्ट्रीय आय में उद्योग का हिस्सा 1950-51 में 16.6 फीसदी, 1990-91 में 27.7 और 2011-12 में 27.0 फीसदी था। यानी पहले तो कुछ बढ़ रहा था , किंतु पिछले दो दशकों में तो स्थिर है या कम हुआ है। दूसरी ओर, सेवाओं का हिस्सा 1950-51 में 30.3 फीसदी था, 1990-91 में 42.7 हुआ और 2011-12 में 59 हो गया।<br />
	यह दुनिया के मौजूदा अमीर देशों के अनुभव से अलग है। वहां तीव्र औ़द्योगीकरण के चलते पहले उद्योगों का हिस्सा बढ़ा और बाद के तीसरे चरण में सेवाओं का अनुपात बढ़ा। भारत ने एक तरह से बीच वाले चरण को बायपास कर लिया है। यूरोप-अमरीका-जापान में औद्योगिकरण से जो रोजगार पैदा हुए और लोगों का जीवन-स्तर ऊंचा हुआ, भारत में वह नहीं हुआ है। यह मानना चाहिए कि भारत जैसे हाशिये के देशों में पूंजीवादी विकास इसी तरह होगा, क्योंकि भारत के पास लूटने के लिए बाहरी उपनिवेश नहीं है और आंतरिक उपनिवेश की एक सीमा है।<br />
	खेती-उद्योग का विकास न होकर महज सेवाओं के विस्तार से भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरे असंतुलन पैदा हुए है। सही मायने में उत्पादन और मूल्य-सृजन खेती और उद्योग में ही होता है तथा अर्थव्यवस्था का आधार उनसे ही बनता व बढता है। सेवाएं तो खेती-उद्योग से पैदा हुए धन का ही पुनर्बंटवारा करती है। कह सकते है कि वे मूलतः परजीवी होती है। एक पेड़ पर ज्यादा परजीवी लताएं हो जाएंगी, तो वे पेड़ को ही सुखा देगी। यही हालत भारतीय अर्थव्यवस्था की हो रही है।<br />
	सेवाओं में तेजी से बढती हुई एक सेवा है वित्तीय सेवाएं। इनमें बैंक, बीमा, चिटफंड, माईक्रो फाईनेन्स, म्युचुअल फंड, शेयर व्यवसाय, वायदा कारोबार, लॉटरी सेवाएं आदि शामिल है। सेवाओं के परजीवी चरित्र का यह बढ़िया उदाहरण है। कोई मेहनत न करके, केवल लेनदेन, ब्याज और सौदों से इनमें जमकर कमाई की जाती है। इनकी गतिविधियों का बडा हिस्सा सट्टा जैसा होता है, जिनमें कीमतों में उतार-चढ़ाव का अनुमान लगाकर सौदे किए जाते है और कमाई की जाती है। किंतु इसके चलते छोटे निवेशक कई बार बरबाद हो जाते हैं, बड़े खिलाडियों में बाजार को किसी तरह प्रभावित करके बड़ा हाथ मारने की प्रवृति बढ़ती है, मंहगाई बढती है और अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने का खतरा बढ़ता है। इनसे एक कृत्रिम और भ्रामक तेजी भी दिखाई दे सकती है। किंतु इसके बुलबुले फूटने पर गहरा संकट आ सकता है जैसा कि अमरीका-यूरोप में 2008 में आया है।<br />
<strong>अभाव और महंगाई</strong><br />
	आम तौर पर किसानों और उपभोक्ताओं के हितों को एक-दूसरे के खिलाफ बता कर पेश किया जाता है और दलील के रुप में इस्तेमाल भी किया जाता है। किसानों को दाम कम देना हो तो महंगाई बढ़ने का डर दिखाया जाता है। महंगाई के जवाब में कहा जाता है कि यह तो किसानों को बेहतर दाम देने के कारण आई है। किंतु उदारीकरण के इस दौर की सच्चाई यह है कि किसान भी मुसीबत में फंसे है और आम जनता को भी भीषण महंगाई को झेलना पड़ रहा है।<br />
	पिछले पांच-छः बरस से भारत की जनता पर महंगाई की जबरदस्त मार पड़ रही है। यह मूलतः भारतीय विकास नीति और अर्थनीति की बुनियादी त्रुटियों और गलत प्राथमिकताओं का नतीजा है। इसे निम्नानुसार देखा जा सकता है-<br />
1.	खेती की उपेक्षा, जमीन का ट्रांसफर, खाद्य-स्वावलंबन लक्ष्य के त्याग और निर्यात खेती के कारण देश में खाद्य पदार्थों का अभाव पैदा हुआ है। देश में बढ़ते अनाज उत्पादन के आंकड़े तो उपलब्धि के बतौर पेश किए जाते है, किंतु यह नहीं बताया जाता कि प्रति व्यक्ति अनाज उपलब्धता में 1991 के बाद से भारी गिरावट आई है। 1961 में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन अनाज उपलब्धता 399.7 ग्राम थी, जो बढ़कर 1991 में 468.5 ग्राम हो गई थीं किंतु उसके बाद से गिरते हुए यह 2010 में 407 ग्राम पर पहुंच गई है। एक तरह से हम वापस पचास-साठ के दशक के अकालों व अभावों वाले वक्त में वापस पहुंच रहे हंै। दालें तो हरित क्रांति  और आधुनिक विकास का सबसे ज्यादा शिकार हुई है। प्रति व्यक्ति दाल उपलब्धता पिछले पचास सालों में लगातार गिरती रही है। प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दाल उपलब्धता 1961 में 69 ग्राम थी, जो घटते हुए 1991 में    41.6 ग्राम और 2010 में 31.6 ग्राम रह गई।<br />
दूध, अंडे, मांस और मछली के उत्पादन में जरुर भारी बढ़ोतरी दिखाई देती है। ‘श्वेत क्रांति‘ की बदौलत आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध-उत्पादक देश बन गया है। किंतु इसमें भी वही दिक्कतें हैं, जो हरित क्रांति में है। पूंजी-प्रधान तकनालाजी, भारी लागतों, रसायनों व पानी के भारी उपयोग, बाजार पर निर्भरता और देशी नस्लों के नाश के साथ यह क्रांति आई है और कितने दिन चल पाएगी, यह देखना होगा। दूध उत्पादन में बढ़ोतरी का एक हिस्सा कागजी भी होगा यानी जो दूध पहले घर में और गांव में खप जाता था और आंकड़ों में नहीं आता था, वह अब शहर और बाजार में आने लगा। यानी दूध का संग्रह बढ़ा है, और उतना उत्पादन नहीं। इसी के साथ इस दूध का बढता हुआ हिस्सा आईसक्रीम, पनीर, मक्खन, घी, मिठाईयों व चाकलेटों के रुप में अमीरों के उपभोग में जा रहा है। इसी कारण दूध ज्यादा पैदा होने पर भी सस्ता नहीं हुआ है। एक हद तक गांव के गरीब और उनके बच्चे दूध से वंचित हुए है। अब वे चाय से ही काम चलाते हैं। यही समस्या मांस-मछली-अंडे के आधुनिक उत्पादन के साथ भी है। डेयरी फार्मों, मुर्गी फार्मों, मशीनीकृत बूचड़खानों और सघन मछली फार्मों वाले आधुनिक पशुपालन के साथ कई गंभीर आर्थिक, सामाजिक एवं पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हो रही हंै। बर्ड फ्लू, स्वाईन फ्लू, मेड काऊ डिजीज, एन्थे्रेक्स जैसे नई महामारियां इसी की देन है।<br />
2.	गैरबराबरी बढ़ने, कुछ लोगों के हाथ में काफी पैसा आने, उपभोक्तावादी संस्कृति और विलासिता को बढ़ावा देने से देश के संसाधनों (मौद्रिक, प्राकृतिक और श्रम संसाधन) का ज्यादा हिस्सा अब विलासितापूर्ण उत्पादन-उपभोग में जा रहा है। फिजूलखर्च और बरबादी बढ़ रहे हैं। इससे जरुरी चीजों का उत्पादन और आपूर्ति प्रभावित हो रही है।<br />
3.	वायदा कारोबार और खुले आयात-निर्यात ने भी देश में महंगाई बढाई है। कई उद्योगों में विलय-अधिग्रहण के चलते एकाधिकारी वर्चस्व बढा है, जिससे कीमतों पर चंद कंपनियों का नियंत्रण हो गया। नई नीतियों से देश को प्रतिस्पर्धा के फायदे मिलेंगे, यह दलील दी जाती थी। किंतु असलियत में उल्टा हुआ है। खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों के आने से भी यही होगा।<br />
4.	जो सेवाएं और वस्तुएं पहले सरकार मुफ्त या सस्ती मुहया कराती थी, नई नीति के तहत उन्हें या तो मंहगा किया जा रहा है या निजीकरण करके बाजार के हवाले किया जा रहा है। इनमें राशन, किरोसीन, डीजल, पेट्रोल, रसेाई गैस, पेयजल, बिजली, सफाई, सड़क (टोलटेक्स), बस और रेल किराया, शिक्षा, इलाज आदि को देखा जा सकता है। कुल महंगाई में इनका काफी बड़ा हिस्सा है जो कीमत सूचकांक के सरकारी आंकड़ों में पूरी तरह दिखाई नहीं होता। दवा व्यवसाय में जितना ज्यादा मार्जिन और मुनाफा है, वह नई व्यवस्था में नीहित लूट का एक उदाहरण है।<br />
<strong><br />
शिक्षा और सेहत में मुनाफाखोरी</strong><br />
	देश में भले ही नामी कार्पोरेट अस्पताल और उच्च शिक्षण संस्थान खुल गए हों, देश के साधारण लोगों के लिए उनके दरवाजे बंद हैं। वे बहुत महंगे हैं। नई सोच के तहत शिक्षा और इलाज की सरकारी व्यवस्था को जानबूझकर उपेक्षित किया गया है और बिगाड़ा गया है ताकि इनके बाजार को बढ़ावा मिले। शिक्षा-चिकित्सा के बढ़ते निजी क्षेत्र और उसकी महंगी सेवाओं से राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर बढ़ाने में तो मदद मिली हैं, किंतु वे साधारण जनता की पहुंच से बाहर हुई है और उनकी लूट बढ़ी है। चिकित्सा में मुनाफाखोरी एक विकृति है जो पिछले बरसों में काफी तेजी से बढ़ी है।<br />
<strong>प्राकृतिक संसाधनों की लूट, पर्यावरण का क्षय</strong><br />
	विकास के नाम पर जल, जंगल, जमीन, खनिज आदि को कंपनियों के हाथों में सस्ते दामों पर लुटाने का सिलसिला इस दौर में तेज हुआ है। राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर को तेज करने और पूंजी निवेश के लिए देशी-विदेशी कंपनियों को ललचाने के लिए यह जरुरी माना गया। यह पागलपन इतना बढ़ गया है कि हम लोह अयस्क जैसे खनिजों को सीधा निर्यात कर रहे है। यहा उसका इस्पात बनाते और इस्पात से दूसरा सामान बनाते तो यहां के लोगों को रोजगार मिलता और यहां की आमदनी बढ़ती। पोस्को जैसी विवादास्पद परियोजनाओं में विदेशी कंपनियों को सीधे लौह अयस्क निर्यात करने की छूट दी गई है। इस तरह हम अंतरराष्ट्रीय व्यापार के औपनिवेशिक युग में पहुंच रहे हैं, जिसमें उपनिवेशों से कच्चा माल जाता था और साम्राज्यवादी देशों से तैयार माल आता था।<br />
	निर्यात पर जोर का मतलब है कि हम अपने संसाधनों का उपयोग देश की सधाराण गरीब जनता के लिए न करके विदेशों के अमीरों की सेवा में कर रहे हैं। प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, इसलिए विदेशीयों की सेवा में उनको खतम या बरबाद करना और ज्यादा अक्षम्य है। उदाहरण के लिए, बासमती चावल के निर्यात का मतलब देश के पानी का निर्यात है।<br />
	प्राकृतिक संसाधनों के बढ़ते  अंधाधुंध उपयोग और हस्तांतरण का मतलब उन समुदायों को उजाडना और बेदखल करना है, जिनकी जिंदगी प्रकृति से जुड़ी है। पिछले दो दशकों में जमीन से विस्थापन की बाढ़ आ गई है और इससे प्रभावित होने वालों में आदिवासी तथा गैरआदिवासी किसान दोनों हैं। इसी तरह किसानों से पानी छीनकर कंपनियों को दिया जा रहा है। इससे देश में नये संघर्ष पैदा हो रहे हैं। सिंगुर, नंदीग्राम, कलिंगनगर, पोस्को, नियमगिरि, हिराकुंड, सरदार सरोवर, ओंकारोश्वर, इंदिरा सागर, यमुना एक्सपे्रसवे, जैतापुर, कुडनकुलम, फतहपुर, श्रीकाकुलम जैसी एक लंबी सूची है।<br />
	प्राकृतिक संसाधनों की इस बंदरबाट ने देश में बड़े-बड़े घोटालों को जन्म दिया है। कोयला घोटाला इसका ताजा उदाहरण है जो इस देश का अभी तक का सबसे बड़ा घोटाला है।<br />
	इस दौर में प्रदूषण और पर्यावरण विनाश की दर भी तेज हुई है। नदियों, भूजल, मिट्टी, हवा, भोजन सबमें तेजी से जहर घूलता जा रहा है। कचरा एक बहुत बडी समस्या बनकर उभरा है। वाहन क्रांति के साथ ट्रैफिक जाम, वायु-प्रदूषण और शोर-प्रदूषण की जबरदस्त समस्या सामने आई है। जंगलों के विनाश और जैविक विविधता के नाश की गति बढ़ी है। यह एक बड़ी कीमत है जो हम और हमसे ज्यादा हमारी भावी पीढ़िया चुकाने वाली है। राष्ट्रीय आय की गणना में इसका कोई हिसाब नहीं होता है।<br />
घटता स्वावलंबन, बढ़ता विदेशी वर्चस्व<br />
	इस दौर में गांव का और देश का स्वावलंबन तेजी से खतम हुआ है। कई मामलों में (जैसे खाद्य तेल या रेल का इंजन) हमने काफी मेहनत से देश को स्वावलंबी बनाया था, अब वापस विदेशों से आयात, विदेशी कंपनियों और विदेशी तकनालाजी पर निर्भर हो गये हैं। स्वावलंबन का लक्ष्य ही छोड दिया गया है। अर्थव्यवस्था और जीवन के करीब-करीब हर क्षेत्र में विदेशी कंपनियों की घुसपैठ हुई है और कई क्षेत्रों में उन्होंने अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। यह एक खतरनाक स्थिति है।<br />
	विदेशी पूंजी भारत मंे आई है किंतु इसकी काफी कीमत चुकानी पड़ रही है। इसके लिए भारत सरकार को अपने कई कायदे-कानून बदलने पड़े हैं ( जैसे पेटेन्ट कानून, विदेशी मुद्रा नियमन कानून, एमआरटीपी एक्ट आदि), मुनाफे और लूट की इजाजत देनी पड़ी है, कर-चोरी और कर-वंचन को अनदेखा करना पड़ा है (जैस मारीशस मार्ग)। विदेशी पूंजी, खास तौर  पर शेयर बाजार में लगने वाली, चाहे जब वापस लौटने की धमकी देने लगती है। भारत सरकार एक तरह से उनकी बंधक बन गई है। इन विदेशी कंपनियों के हितों को बढ़ाने के लिए कई बार विदेशी सरकारें भी दबाव बनाती हैं।<br />
	भारत के निर्यात बढ़े है, तो आयात उससे ज्यादा बढे़ हैं। इस पूरी अवधि में भारत का विदेश व्यापार घाटे में रहा है और यह घाटा बढ़ता जा रहा है। भुगतान संतुलन का संकट घना हो रहा है। भारत इस घाटे को विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भेजी धनराशि, विदेशी कर्ज ओर विदेशी पूंजी से पूरा करता रहा था। किंतु अब इन स्त्रोतों के सूखने तथा व्यापार घाटा ज्यादा होने से इस को पूरा करने का कोई तरीका नहीं बचा है। नतीजतन विदेशी मुदा्र भंडार खाली होने लगा है। हम वापस 1991 की हालात की ओर जाने लगे हैं। डॉलर और दूसरी विदेशी मुद्राओं के मुकाबले रुपया लुढक रहा है। पिछले डेढ़ साल में डाॅलर की कीमत 45 रु. से बढ़कर 55 के करीब हो गई है, जबकि वर्ष 1991 मे डाॅलर करीब 16 रु. का था। डालर के मुकाबले रुपया लुढ़क रहा है। पिछले डेढ़ साल में डालर की कीमत 45 रु. से बढकर 55 के करीब हो गई। जबकि वर्ष 1991 में डालर करीब 16 रु. का था। डालर की कीमत बढ़ने और रुपए की कीमत गिरने का मतलब विदेशियों की क्रयशक्ति बढ़ना तथा भारत की लूट बढ़ना है।<br />
	विदेश नीति, रक्षा, उर्जा जैसे क्षेत्रों में भी भारत की स्वतंत्रता, संप्रभुता और स्वावलंबन पर समझौता किया जाने लगा है। एक वक्त था जब भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेता था। अब वह अमरीका का पिछलग्गू बनता जा रहा है। भारत-अमरीका परमाणु करार इसका एक उदाहरण है तो ईरान के साथ गैस पाईप लाईन में आगा-पीछा करना और संयुक्त राष्ट्र संघ में ईरान के मसले पर अमरीका के प्रस्ताव पर वोट देना दूसरा उदाहरण है। फिलीस्तीन के मुद्दे पर पहले भारत की स्पष्ट लाईन थी और वह इजराइल की खुलकर आलोचना करता था। अब उसने इजराइल के साथ दोस्ती कर ली है। अमरीका के साथ संयुक्त  सैनिक अभ्यास भी शुरु हो गए है, जो पहले नहीं होते थे।<br />
घोटालों और भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान<br />
	पहले यह कहा जाता था कि भ्रष्टाचार का कारण अर्थव्यवस्था में सरकार का अत्यधिक हस्तक्षेप-नियंत्रण और ‘परमिट-लाईसेन्स राज‘ है। सरकार हट जाएगी, तो यह कम हो जाएगा। निजीकरण और विनियंत्रण के पक्ष में माहौल भी इस आधार पर बनाया गया। किंतु दो दशक बाद हम पाते हैं कि भ्रष्टाचार कम होने के बजाय बढ़ गया है। बड़े-बडे़ घोटाले सामने आ रहे हैं और घोटालों के नए रिकार्ड कायम हो रहे हैं।<br />
	1991 के पहले का सबसे बड़ा और सबसे चर्चित घोटाला बोफोर्स घोटाला था, जिसने केंद्र की सरकार को पलट दिया था। इस घोटाले में बोफोर्स तोपों के सौदे में कमीशनखोरी का आरोप लगा था, जिसकी राशि करीब 50-60 करोड़ रु. होगी। किंतु 1991 में नयी नीतियां लागू होने के एक साल बाद ही हर्षद मेहता वाला शेयर-प्रतिभूति घोटाला हुआ, जिसमें 5000 से 10000 करोड़ रु. तक की हेरा-फेरी का आरोप लगा। उसके बाद तो यह सिलसिला बढ़ता गया। अब तो घोटालों की बाढ़ आ गई है। जो बड़े घोटाले सामने आए है, उनमें राष्ट्रमंडल खेल घोटाला करीब 80,000 रु., 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला 176000 करोड़ रु. ओर कोयला घोटाला 186000 करोड़ रु. को होने का अनुमान है। यानी हमने घोटालों में कितनी जबरदस्त प्रगति की और कहां से कहां पहुंच गए!<br />
	दरअसल निजीकरण, विनियंत्रण और विनिवेश ने भ्रष्टाचार के नए रास्ते खोले हैं। जिस सरकारी उद्यम में पहले आपूर्ति और खरीदी में कमीशखोरी होती थी, उस पूरे उद्यम (या उसके शेयरों) को बेचने में एकमुश्त बड़ी दलाली और कमीशनखोरी होने लगी। प्राकृतिक संसाधनों (जमीन, पानी, खनिज, तरंगे यानी स्पेक्ट्रम आदि) की जिस लूट को विकास और निवेश-प्रोत्साहन के नाम पर बढ़ावा दिया गया, उससे भी बड़े-बड़े घोटालों को जन्म दिया।<br />
	यह भी देखा जा सकता है कि सत्ता में बैठे नेताओं-अफसरों ने जनहित-देशहित के खिलाफ होने के बावजूद नई नीतियों को अपनाया और आगे बढाया, क्योंकि इनमें उन्हें बड़े रुप में निजी फायदे नजर आ रहे थे। नीति और नीयत दोनों मे खोट का यह अद्भुत मेल था।<br />
समाजिक -सांस्कृतिक विकृतियां<br />
	राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर बढ़ाने के लिए और अर्थव्यवस्था को एक बनावटी तेजी देने के लिए सरकार ने गैरबराबरी (कुछ लोगों के हाथ में धन, आमदनी और क्रयशक्ति का केंद्रीकरण) तथा उपभोक्ता संस्कृति को काफी प्रोत्साहन दिया। उन्मुक्त बाजारवाद के साथ मिलकर इसने कई तरह के तनावों और विकृतियों को बढाया। पैसा और मुनाफा आज का भगवान हो गया है जिसकी चारों तरफ पूजा हो रही है। नैतिक मूल्यों, भाईचारा, सामूहिकता, सादगी, बराबरी आदि सब को इसकी वेदी पर बलि चढाया जा रहा है । शिक्षा, चिकित्सा, मीडिया,राजनीति, धर्म, कला, खेल, संस्कृति सब बाजारु बनते जा रहे हैं और गिरावट के शिकार हो रहे हैं। यह एक चैतरफा गिरावट है।<br />
	मूलतः ये पूंजीवाद की विकृतियां है। वैश्वीकरण-उदारीकरण के इस दौर ने इन विकृतियों को भयानक रुप से बढाया, फैलाया तथा उग्र बनाया है।<br />
<strong>लोकतंत्र का हनन</strong><br />
	इस दौर में विदेशी प्रभावों और दबावों के आगे इस विशाल लोकतंत्र की जनता की आवाज गौण होती जा रही है। कंपनियों को रिझाने और बुलाने में लगी सरकारें जनता की तरफ से आंख मूंद लेती है। मिसाल के लिए 1994 में डंकल मसौदे पर दस्तखत करने जैसे काफी बड़े फैसले के पहले भारत सरकार ने देश की जनता तो दूर, संसद से भी मंजूरी लेने की जरुरत नहीं समझी। फैसले के बाद जाकर सरकार ने ससंद को सूचना दी और चर्चा कराई।<br />
	देश में एक तरह से ‘कंपनी राज‘ कायम होता जा रहा है। कंपनियों द्वारा संसद में विश्वास मत और मंत्रियों के चयन को प्रभावित करने के मामले सामने आ रहे हैं।<br />
	एक और तरीके से लोकतंत्र का नुकसान हो रहा है। बढ़ती घोर गैरबराबरी से कुछ लोगों के हाथ में विशाल पैसा आ रहा है। चुनावों में इसे पानी की तरह बहाया जाता है और मतदाताओं को प्रभावित किया जाता है। इस मामले में अब चुनाव स्वतंत्र नहीं रह गए हैं। पैसे का उपयोग टिकिटों के बंटवारे और लोकसभा, विधानसभा, नगरनिगम, नगरपालिका, पंचायतों में समर्थन जुटाने और जनप्रतिनिधियों को खरीदने में भी जमकर होने लगा है।<br />
(यह अधूरा है)<br />
लेखक : सुनील ,राष्ट्रीय उपाध्यक्ष,समाजवादी जनपरिषद</p>
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		<title>दास्तान &#8211; ए &#8211; मध्यप्रदेश / एक बेचारा, गलत विकास नीति का मारा / लेखक &#8211; सुनील</title>
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		<pubDate>Thu, 25 Oct 2012 16:09:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अफ़लातून अफलू</dc:creator>
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		<description><![CDATA[‘भारत एक अमीर देश है, जहां गरीब लोग रहते हैं’ &#8211; यह कहावत काफी दिनों से चली आ रही है। आधुनिक विकास की विडंबना को जाहिर करने वाली इस कहावत का मतलब है कि भारत में प्राकृतिक संसाधन तो भरपूर हैं, कुल मिलाकर इसकी राष्ट्रीय आय और उसकी वृद्धि दर भी अच्छी दिखाई दे सकती [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kashivishvavidyalay.wordpress.com&#038;blog=439658&#038;post=1317&#038;subd=kashivishvavidyalay&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>‘भारत एक अमीर देश है, जहां गरीब लोग रहते हैं’ &#8211; यह कहावत काफी दिनों से चली आ रही है। आधुनिक विकास की विडंबना को जाहिर करने वाली इस कहावत का मतलब है कि भारत में प्राकृतिक संसाधन तो भरपूर हैं, कुल मिलाकर इसकी राष्ट्रीय आय और उसकी वृद्धि दर भी अच्छी दिखाई दे सकती है, किन्तु इसके ज्यादातर लोगों की हालत खराब और दयनीय बनी रहती है।</p>
<p>यह कहावत भारत के बीचोंबीच स्थित, ‘हृदय प्रदेश’ कहलाने वाले राज्य मध्यप्रदेश पर भी लागू होती है। खनिज, जंगल, वर्षा, नदियों, उर्वर मिट्टी, जैविक संपदा आदि के हिसाब से मध्यप्रदेश काफी संपन्न है। पिछले कुछ समय से इसकी वृद्धि दर भी काफी अच्छी और प्रभावशाली दिखाई दे रही है। किन्तु देश के सबसे गरीब, सबसे कुपोषित राज्यों में इसकी गिनती होती है और यह ‘बीमारु’ (बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश &#8211; हिन्दी पट्टी के इन चार गरीब-पिछड़े राज्यों के लिए प्रचलित संक्षिप्त नाम) की श्रेणी से बाहर नहीं निकल पा रहा है। इस मायने में यह प्रदेश भारत का सच्चा प्रतिबिम्ब है। पूंजीवादी विकास जिस तरह लगातार साम्राज्यवाद, औपनिवेषिक शोषण, आंतरिक उपनिवेश, प्राकृतिक संसाधनों की लूट और गैरबराबरी के दम पर पनपता है, उसका एक उदाहरण भारत है, तो दूसरी मिसाल मध्यप्रदेश है। यदि भारत नव-औपनिवेषिक व्यवस्था का एक मोहरा है, तो मध्यप्रदेश आंतरिक उपनिवेश का मॉडल है।</p>
<p><strong>ऊँची वृद्धि दर का जश्न</strong></p>
<p>जैसे भारत के स्तर पर राष्ट्रीय आय की ऊँची वृद्धि दर को लेकर कुछ साल पहले जश्न का माहौल था, हालांकि अब उसके लगातार गिरने से इस जश्न की हवा निकल गई है, वैसे ही मध्यप्रदेश सरकार के गलियारों में भी ऊँची वृद्धि दर को लेकर खुद अपनी पीठ थपथपाई जा रही है। पहले की कम या ऋणात्मक वृद्धि दर के बाद पिछले चार बरस से मध्यप्रदेश की वृद्धि अच्छी रही है और इनमें से तीन बरसों में तो यह दहाई अंकों मे रही है (देखें तालिका-1)। मध्यप्रदेश मुख्यतः कृषि प्रधान राज्य है। कृषि क्षेत्र में वर्ष 2011-12 मंे 18 फीसदी की प्रभावशाली वृद्धि को लेकर भी सरकार ने खुद को शाबाशी दी है, हालांकि कृषि क्षेत्र में बहुत उतार-चढ़ाव होते हैं। सवाल यह है कि यह ऊँची वृद्धि दर कितने समय तक चल पाती है। उससे बड़ा सवाल यह है कि आंकड़ों के परे इस वृद्धि से लोगों की जिंदगी और उसकी गुणवत्ता में कितनी बेहतरी आई है। वही विकास की असली कसौटी होगी और विकास नीति की सही परीक्षा होगी। अफसोस की बात है कि इस मोर्चे पर संकेत बहुत अच्छे नहीं दिखाई दे रहे हैं।</p>
<p>तालिका 1: राष्ट्रीय आय/राज्य घरेलू उत्पाद की वृद्धि दरें (प्रतिशत में)</p>
<p>वर्ष              2000-01     2001-02     2002-03    2003-04    2004-05   2005-06   2006-07  2007-08</p>
<p>मध्यप्रदेश         -6-9         7.1        -3.9       11.4       3.0        5.3       9.2      4.6</p>
<p>भारत            4.35         5.81        3.84      8.52       7.60       9.49      9.6      9.30</p>
<p>वर्ष              2008-09    2009-10   2010-11    2011-12    </p>
<p>मध्यप्रदेश         12.3        10.5      8.1        11.98</p>
<p>भारत             6.7        8.4       8.39        6.88</p>
<p>स्रोत : योजना आयोग के आंकड़े</p>
<p><strong>हाशिए पर जाती खेती</strong></p>
<p>चूंकि मध्यप्रदेश एक कृषि प्रधान और गांव प्रधान प्रांत है, इसके गांवों और इसकी खेती की क्या स्थिति है, उससे बहुत कुछ इस प्रांत की हालत का फैसला होता है। इसके कुल रोजगार में खेती का हिस्सा 1980 में 76 फीसदी था, बीस साल बाद इसमें केवल 3 फीसदी की कमी हुई और 2001 में यह 73 फीसदी था। फिर श्रम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 2008 में यह वापस बढ़कर 76 फीसदी हो गया। दूसरी ओर प्रदेश की कुल सालाना आय/उत्पाद में खेती का हिस्सा लगातार घटता जा रहा है। 1994-95 में यह 43.19 था, 1999-2000 में 37.12 हो गया और 2005-06 में घटकर 32.09 रह गया। इसके क्या मायने हैं ? -</p>
<p>1)    प्रदेश में खेती के अलावा दूसरे रोजगार का विकास नहीं हो पा रहा है। बल्कि गांवों के धंधों का विनाश होने से खेती पर निर्भर आबादी का प्रतिशत वापस बढ़ने लगा है। यह एक गंभीर स्थिति है।</p>
<p>2)    खेती पर निर्भर मध्यप्रदेश की विशाल आबादी का प्रदेश की कुल आय में हिस्सा (भारत की ही तरह) कम होता जा रहा है, जो कृषि क्षेत्र के तुलनात्मक रुप से वंचित और शोषित होने का द्योतक है।</p>
<p>मध्यप्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री एक किसान परिवार से हैं और वे स्वयं को किसान का बेटा कहते हैं। उनकी सरकार द्वारा खेती और किसानों के हित में उठाए गए कदमों व उपलब्धियों के बखान के लिए अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन दिए जा रहे हैं और बड़े-बड़े होर्डिंग्ज लगाए जा रहे हैं। निश्चित ही उन्होंने कुछ कदम उठाए हैं, जैसे गेहूं के समर्थन मूल्य पर राज्य शासन की ओर से पहले 100रु. प्रति क्विंटल तथा बाद में 50रु. प्रति क्विंटल का बोनस देना। या कृषि कार्य हेतु सहकारी कर्जों की ब्याज दरों में अनुदान देना। किन्तु इन उपायों के बावजूद मध्यप्रदेश के किसान जबरदस्त संकट से गुजर रहे हैं और यह संकट दूर नहीं हो पा रहा है।</p>
<p><strong>खुदकुशी की फसल</strong></p>
<p>इस संकट की एक अभिव्यक्ति मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में किसानों की आत्महत्या में हो रही है। देश में लगातार जिन पांच राज्यों में सबसे ज्यादा संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, उनमें मध्यप्रदेश एक है (तालिका-2)। अन्य चार राज्य हैं &#8211; महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक और छत्तीसगढ़। महाराष्ट्र और आन्ध्रप्रदेश की किसान आत्महत्याओं की चर्चा तो होती है, प्रधानमंत्री भी वहां गए हैं। किन्तु मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के किसानों की आत्महत्याओं पर देश का ध्यान नहीं गया है। यह एक खामोशी भरा संकट है। गौरतलब है कि पिछले ग्यारह सालों में इन आत्महत्याओं में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं हो पाई है। इन आंकड़ों का मतलब है कि करीब चार किसान रोज प्रदेश के किसी-न-किसी कोने में आत्महत्या करते हैं। ये आत्महत्याएं प्रदेश के किसी एक हिस्से या पिछड़े-सूखाग्रस्त बुंदेलखंड तक सीमित नहीं है। रीवा, सतना, खंडवा, खरगोन, बड़वानी, इंदौर या होषंगाबाद जैसे अपेक्षाकृत उन्नत व संपन्न माने जाने वाली खेती के जिलों से भी किसानों की खुदकुशी की खबरें आ रही है।</p>
<p><strong>तालिका 2: किसानों की आत्यहत्याएं</strong></p>
<p>वर्ष         2001    2002    2003   2004    2005    2006   2007   2008   2009   2010    2011</p>
<p>मध्यप्रदेश     1372    1340    1445   1638    1248    1375   1263   1379   1395   1237    1326</p>
<p>भारत        16415   17971   17164   18241  17131   17060   16632 16196   17368  15964   14027</p>
<p>स्रोत: राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो।</p>
<p><strong>सोयाबीन का संकट</strong></p>
<p>होशंगाबाद जिले का एक दृष्टांत किसानी के इस संकट को समझने में मदद कर सकता है। सोयाबीन की फसल खराब होने के बाद पिछले वर्ष वहां 11 से 14 अक्टूबर 2011 के बीच तीन किसानों ने आत्महत्या की। यह वह जिला है, जहां तवा परियोजना से काफी बड़ी मात्रा में सिंचाई होती है और जहां सोयाबीन की खेती सबसे पहले शुरु हुई। खेती में नए बीजों, रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाओं और मशीनों का भरपूर उपयोग होता है। इस जिले को मध्यप्रदेश का पंजाब कहा जाता है। किन्तु यहां का खुशहाल माना जाने वाला किसान जबरदस्त मुसीबत में है। वह सोयाबीन से भी काफी परेशान हो गया है और  इसका विकल्प खोज रहा है। लेकिन इतनी बुरी तरह फंस गया है कि इससे निकलना आसान नहीं है।</p>
<p>सोयाबीन की खेती मूलतः यूरोप में पशु-आहार की कमी को दूर करने के लिए शुरु करवाई गई। इसका सीधा उपभोग गांव के लोग नहीं कर सकते और इसकी पूरी फसल मंडियों और फिर कारखानों में ही जाती है। एक तरह से मध्यप्रदेश में खेती और गांव के स्वावलंबन को खतम करने और सुदूर विदेशों की मांग पर निर्भरता की दिशा में यह बड़ा कदम था।</p>
<p>शुरु में सोयाबीन की पैदावार काफी अच्छी होती थी और पहले दाम भी अच्छे मिल रहे थे इसलिए सोयाबीन की खेती फैलती गई। मध्यप्रदेश को सोयाबीन राज्य कहते हैं। (देश का 60 फीसदी सोयाबीन यहीं होता है।) अब महाराष्ट्र और राजस्थान में भी सोयाबीन की काफी खेती हो रही है। किन्तु कुछ साल बाद इसकी पैदावार गिरने लगती है। 1994 तक मध्यप्रदेश में सोयाबीन की प्रति हेक्टेयर उपज 18 क्विंटल पर पहुंच गई थी, जो उसके बाद से लगातार घटते हुए 2011-12 में 10.77 क्विंटल रह गई। 2011 की सोयाबीन फसल में भारत की पैदावार 11.55, महाराष्ट्र की 12.56, राजस्थान की 13.93, मध्यप्रदेश की 10.77 और होशंगाबाद जिले की मात्र 6.40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर थी। दरअसल लगातार भारी रसायनों के साथ सोयाबीन की खेती होने पर जमीन खराब हो जाती है और कीट-प्रकोप बढ़ने लगता है। इसी बीच डंकल मसौदे पर दस्तखत होने तथा विश्व व्यापार संगठन बनने से देश में खाद्य तेलों का आयात खुला हो गया। पाम तेल और सोया तेल के आयात की बाढ़ ने देश में सोयाबीन की कीमतों को बढ़ने नहीं दिया और गाहे-बगाहे गिरा भी दिया। जिस सोयाबीन को किसानों की समृद्धि का दूत माना जा रहा था, वह अब किसानों के गले की फांसी बन गया है।</p>
<p>जो कहानी सोयाबीन की है, वही कल बीटी कपास की होने वाली है। शुरु में इसमें फायदा दिखाई देने से मध्यप्रदेश के पश्चिम में निमाड़-मालवा के कपास के खेतों में, बाकी देश की तरह, बीटी बीज छा गया है। प्रदेश और केन्द दोनों सरकारों ने इसे और इसे लाने वाली कंपनियों को भरपूर मदद की है। मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने वैसे तो जीन-मिश्रित बीजों का विरोध किया है, किन्तु यह विरोध अधूरा है क्योंकि बीटी-कपास को तो उसका प्रश्रय मिला है। सात साल पहले कई खेतों में बीटी-कपास की फसल सूखने की घटनाएं हुई थी और कुक्षी (जिला धार) की कृषि उपज मंडी में एक जनसुनवाई में किसानों की व्यथा और कंपनियों की लापरवाही खुलकर सामने आई थी। किन्तु सरकार ने कंपनियों पर कोई कार्रवाई नहीं की व किसानों को मुआवजा नहीं दिलाया। सोयाबीन और बीटी कपास में फर्क यह है कि इस बार मामला निजी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का है, जिसमें किसान ज्यादा असहाय होंगे।</p>
<p><strong>पानी का कुप्रबंध</strong></p>
<p>एक और उदाहरण बासमती चावल की खेती का है, जिसे सोयाबीन व अन्य फसलों के विकल्प के रुप में पेश किया जा रहा है। इसकी खेती बढ़ रही है तथा ‘दावत’ जैसी कंपनियों ने इसका श्रेय लिया है। किन्तु यह निर्यात फसल है और अमीरों का खाद्य है, जिसे न पैदा करने वाला किसान खा पाता है और न स्थानीय लोग। फिर पिछले साल यूरोप-अमरीका में मंदी व मांग में कमी के कारण अचानक इसके दाम काफी गिर गए और किसानों को काफी नुकसान हुआ। तीसरी समस्या है कि इसमें काफी पानी व पूंजी की जरुरत होती है। जो किसान ढाई-तीन लाख रु की पूंजी लगाकर ट्यूबवेल खुदवा पाता है, वही इसकी खेती कर पाता है, इसलिए इसका विकल्प छोटे किसानों के लिए खुला नहीं है। विडंबना है कि होशंगाबाद जिले के तवा कमांड क्षेत्र में, जहां कई जगह जल-भराव और दलदल की समस्या है, किसान ट्यूबवेल खुदवाकर बासमती की खेती कर रहे हैं। नहरी सिंचाई क्षेत्र में ट्यूबवेल एक तरह से दुहराव है और संसाधनों की बरबादी है। पंजाब में बासमती चावल की खेती ने कई तरह के संकट पैदा किए हैं और वहां इस पर गंभीरता से पुनर्विचार शुरु हुआ है। उससे कोई सबक न लेकर मध्यप्रदेश की  खेती को भी उसी आत्मघाती दिशा में ले जाया जा रहा है।</p>
<p>मध्यप्रदेश की खेती और पेयजल के संकट का एक आयाम तेजी से घटता भूजल स्तर है। मालवा और निमाड़ में तो हालत बहुत चिंताजनक हो गई है। सन् 2004 में मध्यप्रदेश के 46 विकासखंडों में भूजल का अतिदोहन हो रहा था (यानी पुनर्भरण के करीब या उस से अधिक दोहन), 2009 में इन विकासखंडों की संख्या 123 हो गई। यानी हम ऐसी खेती कर रहे हैं और ऐसी तकनीक अपना रहे हैं कि हजारों-लाखों सालों का संचित भूजल भंडार खाली करते जा रहे हैं। कुल मिलाकर कृषि विकास की योजना व रणनीति में गंभीर गड़बड़ी दिखाई देती है।</p>
<p>पेयजल का संकट भी मध्यप्रदेष में बढ़ता जा रहा है। डेढ़ वर्ष पहले उज्जैन में गर्मियों में यह नौबत आ गई थी कि छः दिन में एक बार पानी दिया जा रहा था। किन्तु जल-संचय, जल-संरक्षण और पानी की बरबादी व फिजूलखर्च की रोकथाम के उपाय करने के बजाय, महंगी और बड़ी योजनाओं पर जोर दिया जा रहा है। इन्दौर, भोपाल, देवास, उज्जैन, पिपरिया जैसे कई नगरों में काफी दूर नर्मदा से पानी लाने की योजनाएं बनाई जा रही हैं। कितने नगरों को नर्मदा का पानी दिया जाएगा और कब तक? किस कीमत पर ? एक तरफ पानी का संकट है, दूसरी तरफ 24 घंटे पानी का लालच देकर जल-आपूर्ति का ठेका निजी कंपनियों को देने की तैयारी भी की जा रही है। खंडवा और शिवपुरी में निजी कंपनियों को ठेका दिया जा चुका है, जिसका काफी विरोध हो रहा है।</p>
<p><strong>बिजली का उल्टा बंटवारा</strong></p>
<p>ऐसे भी वाकिये आए हैं, जब समय पर बिजली न मिलने के कारण फसल सूख गई और किसान ने आत्महत्या कर ली। पहले तो प्रगति के नाम पर खेती में डीजल-बिजली के उपयोग को खूब बढ़ावा दिया गया, अब उनकी बढ़ती कीमत और घटती उपलब्धता किसानों की जान निकाल रही है। कांग्रेस सरकार और उसके बाद बिजली-पानी के नाम पर सत्ता में आई भाजपा सरकार दोनों किसानों को सस्ती व समुचित मात्रा में बिजली देने में असफल रही है। एशियाई विकास बैंक से कर्ज लेकर उसकी शर्तों के मुताबिक मध्यप्रदेश में कथित बिजली सुधार लागू किए गए हैं, जिनके तहत विद्युत मंडल का विखंडन, निजीकरण और बिजली की दरें बढ़ाने के काम हुए हैं। रास्ते की बरबादी (वितरण व पारेषण हानियां) या अकुशलता या आपूर्ति की अनिश्चितता में विशेष कमी नहीं आई है। पारेषण एवं वितरण हानियां मध्यप्रदेश में पूरे देश में सबसे ज्यादा हैं।</p>
<p>बिजली की कटौती के नियम भी एक-से नहीं है। सबसे कम या नही के बराबर कटौती प्रदेश की राजधानी में होती है। उसके बाद संभाग मुख्यालय, जिला मुख्यालय, तहसील मुख्यालय में उत्तरोत्तर ज्यादा कटौती होती है और गांव में तो कोई ठिकाना नहीं होता है। यह बिल्कुल उल्टा है। समाज का सबसे जरुरी काम यानी खेती और अन्न उत्पादन गांव में होता है। शहरों में तो एसी, विज्ञापन, सजावट, फव्वारों जैसे विलासितापूर्ण गैरजरुरी कामों में बिजली का उपयोग होता है। सरकारों की उल्टी प्राथमिकताओं की एक झलक इससे मिलती है।</p>
<p>बिजली, डीजल, रासायनिक खाद, सिंचाई आदि की बढ़ती लागत और समय पर आपूर्ति व गुणवत्ता की अनिश्चिता प्रदेश के किसानों की मुष्किलों का प्रमुख स्रोत रही है। रही-सही कसर समर्थन-मूल्य पर खरीदी की अव्यवस्था पूरी कर देती है। बीते साल सरकार ने बड़े ताम-झाम से ई-उपार्जन (यानी कंप्यूटर पंजीयन) का प्रचार किया, किन्तु वह यह भूल गई कि उससे ज्यादा जरुरी है गेहूं भरने के लिए बारदाने। नतीजतन हर जगह किसानों के आंदोलन हुए और रायसेन जिले में तो पुलिस की गोली ने एक किसान की जान भी ले ली। यह भी गौरतलब है कि पुलिस की गोली से देश में सबसे ज्यादा किसानों की मौत वाला मुलताई गोलीकांड भी 1998 में इसी प्रदेश में हुआ था।</p>
<p><strong>बड़े बांध घाटे का सौदा</strong></p>
<p>आधुनिक विकास की विसंगति बड़े बांधों में भी दिखाई देती है। नेहरुजी की तरह मध्यप्रदेश की कांग्रेस-भाजपा सरकारों ने इन्हें ‘आधुनिक भारत का मंदिर’ मान लिया और विकास का सूत्रधार समझ लिया। किन्तु इनसे जितने फायदे दिखाए गए थे, उतने हुए नहीं। तवा बांध बने पैंतीस बरस हो गए, किन्तु जितनी जमीन की सिंचाई इसकी प्रोजेक्ट रिपोर्ट में बताई गई थी, उसके 60-65 फीसदी से ज्यादा सिंचाई कभी नहीं हो पाई। बरगी बांध बने बीस साल हो गए, किन्तु उसकी नहरें आज तक पूरी नहीं हो पाई। किसी को उसकी परवाह भी नहीं है। बाणसागर परियोजना की नहरों का काम 1971 में शुरु हुआ और 10.6 करोड़ रु. की लागत से 1987 तक पूरा होना था। किन्तु मार्च 2010 तक 961 करोड़ रु. फूंक देने के बाद भी केवल 62 फीसदी नहरें बन पाई हैं। ‘मध्यप्रदेश जल क्षेत्र पुनर्संरचना प्रोजेक्ट’ नामक एक परियोजना 2004 में विश्व बैंक के कर्ज से शुरु हुई है। इसकी कुल लागत 1919 करोड़ रु. की है। यह 2011 तक पूरी होनी थी। किन्तु मार्च 2010 तक इसके कुल लक्ष्य का केवल 11 फीसदी सिंचाई ही हासिल हो पाई। केग की ताजा रपट ने मध्यप्रदेश जल संसाधन विभाग के कामों में काफी भ्रष्टाचार, अनियमितताएं और असफलताएं उजागर की हैं। बड़े बांधों से बाढ़-नियंत्रण होगा, यह भी एक दावा किया गया था। किन्तु यह दावा कितना गलत निकला, इसे नर्मदा में देखा जा सकता है। चार-पांच बांध (तवा, बारना, बरगी, इंदिरा सागर, सरदार सरोवर आदि) बन जाने के बाद भी नर्मदा में भीषण बाढ़ों का आना जारी है।</p>
<p>मध्यप्रदेश के संदर्भ में बड़े बांधों की एक खास अनुपयुक्तता है। देश के बीच का पहाड़ी-पठारी इलाका होने के कारण कई नदियां यहां से निकलती हैं और यहां का पानी लेकर पड़ोसी राज्यों में जाती है। इनमें नर्मदा, चंबल, सोन, ताप्ती, पेंच, वैनगंगा, बेतवा, केन, माही आदि प्रमुख है। इन पर बने, बन रहे या बनने वाले बांधों की साईट, इस विशेष भौगोलिक परिस्थिति के कारण, दूसरे राज्यों की सीमा के पास है। इसके कारण डूब और विस्थापन मध्यप्रदेश के हिस्से में आता है और पानी-बिजली का ज्यादा फायदा पड़ोसी राज्यों को मिलता है। इसे इंदिरा सागर- सरदार सरोवर बांध (नर्मदा), गांधी सागर बांध (चंबल), तोतलाडोह बांध (पेंच), रिहंद, बाणसागर (सोन), बावनथड़ी बांध, ताप्ती पर प्रस्तावित बांध आदि में देखा जा सकता है। इस तरह बड़े बांध मध्यप्रदेश के लिए घाटे का सौदा है। अपने जल संसाधनों के समुचित उपयोग के लिए मध्यप्रदेश को छोटे-छोटे बांधों और जलग्रहण क्षेत्र विकास पर जोर देना था। किन्तु प्रदेश की सरकारें लकीर की फकीर बनी हुई उल्टी चाल चलती रही है।</p>
<p>इन विषाल बांधों में उजड़ने वाले प्रदेश के किसानों-गांववासियों के समुचित पुनर्वास की तरफ भी प्रदेश की सरकारों ने कोई ध्यान नहीं दिया। इसका एक ताजा उदाहरण तब सामने आया जब नर्मदा पर बन रहे ओंकारेश्वर और इंदिरासागर बांधों के विस्थापितों को अपनी मांगों के लिए बढ़ते पानी में बैठकर या खड़ें होकर 16 दिन तक जल-सत्याग्रह करना पड़ा ।</p>
<p>इन अनुभवों से सबक लेने के बजाय नदी-जोड़ो योजनाएं बनाई जा रही है। नर्मदा का पानी क्षिप्रा में डालने की एक योजना का शिलान्यास कुछ माह पहले मुख्यमंत्री ने हेलीकॉप्टर से नर्मदा का पानी ले जाकर क्षिप्रा में डालने की नौटंकी के साथ किया। केन-बेतवा, पार्वती-कालीसिंध-चंबल जैसी नदी जोड़ो योजनाओं को भी जबरदस्ती थोपा जा रहा है। ये योजनाएं काफी महंगी, अव्यवहारिक और समस्यामूलक हैं। इनमें नदियों पर नए बांध बनाने पड़ेंगे या काफी बिजली से पानी पंप करना पड़ेगा। विस्थापन होगा। विभिन्न इलाकों में आपस में वैसे ही झगड़े होंगे, जैसे अभी कावेरी के पानी को लेकर कर्नाटक-तमिलनाडू में हो रहे हैं।</p>
<p><strong>जमीन की बंदरबांट</strong></p>
<p>मध्यप्रदेश एक तरह से विस्थापितों का प्रदेश बन गया है। बड़े बांधों के अलावा खदानों, कारखानों, प्लांटेशनों, राष्ट्रीय उद्यानों-अभ्यारण्यों, शहरी विकास परियोजनाओं और राजमार्गों से काफी बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। बड़े पैमाने पर जमीन खेती व किसानों के हाथ से निकल रही है। या तो सरकार अधिग्रहण कर रही है या कंपनियां खुद संकटग्रस्त किसानों से जमीन खरीद रही है। पिछले दिनों मध्यप्रदेश सरकार ने बड़े पैमाने पर पड़त भूमि रतनजोत या अन्य प्लांटेशन के लिए कंपनियों को लीज पर देने की एक नीति बनाई और 25 लाख एकड़ भूमि उन्हें देने का लक्ष्य रखा। इसके लिए हदबंदी कानून में छूट दी गई और शुल्क बहुत मामूली रखा गया &#8211; पहले दो वर्ष निःशुल्क, फिर पांच वर्ष तक 200 रु प्रति एकड़, अगले पांच वर्ष तक 400 रु. एकड़ और अगले 20 वर्ष के लिए 600 रु. प्रति एकड़ की वार्षिक दर पर। (जमीन की इस बंदरबांट का फायदा उठाने के लिए रातों-रात कई कंपनियां सामने आ गई &#8211; कास्मो बायोफुएल, मेगनम ऑर्गेनाईजर, ट्राईफेक, एलटी ओवरसीज आदि। हजारों एकड़ जमीन उन्हें आबंटित हो गई। जांच करने पर यह भी कोयला घोटाला जैसा बड़ा घोटाला निकलेगा)।  फिर जिसे पड़त भूमि कहा जा रहा है, व्यवहार में उस पर भी कोई गरीब आदमी खेती करता है या गांव के मवेशी चरते हैं। इस तरह यह जमीन जैसे सीमित व दुर्लभ संसाधन का पुनर्बंटवारा है। प्रदेश के भूमिपुत्रों के हाथ से भूमि निकलकर पूंजीपतियों व कंपनियों के हाथ में जमीन जा रही है।</p>
<p>गौरतलब है कि गांव के किसान के हाथ से जमीन निकलने का मतलब बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा है। इसीलिए भूमि-अधिग्रहण का विरोध बढ़ता जा रहा है। 2007 में रीवा जेपी सीमेंट फैक्टरी के बाहर गांववासियों पर गोली चली, क्योंकि 25 वर्ष बाद भी वायदे के मुताबिक रोजगार न मिलने और प्रदूषण के कारण वे धरना दे रहे थे। इसके अगले वर्ष सिंगरौली में एस्सार बिजली कारखाने की जगह पर बड़ा संघर्ष हुआ। इस वर्ष अनूपपुर में मोजर बेयर बिजली कारखाने का विरोध कर रहे किसानों पर लाठीचार्ज हुआ और लंबे समय तक उन्हें जेल में रखा गया। छोटे रुप में आंदोलन व असंतोष तो काफी व्यापक है।</p>
<p><strong>सरकारों का कंपनी प्रेम</strong></p>
<p>किन्तु इससे बेखबर मध्यप्रदेश की सरकारें विकास के नाम पर ज्यादा से ज्यादा कंपनियों व उद्योगों को बुलाने के लिए बैचेन हैं। कई इन्वेस्टर मीट हो चुकी हैं। प्रदेश का हर मुख्यमंत्री कंपनियों को बुलाने के लिए दल-बल के साथ मुंबई-बंगलौर ही नहीं, अमरीका, यूरोप, चीन व जापान की यात्रा करता है। कंपनियों को बिक्री-कर (वेट), प्रवेश शुल्क, स्टाम्प ड्यूटी आदि में छूट, सस्ती या निःशुल्क जमीन आदि का लालच दिया जाता है। प्रदेश का खनिज और पानी भी उन्हें उपहार में दिया जाता है। यह तय है कि कंपनी केन्द्रित इस विकास नीति से प्रदेश में संघर्ष, विस्थापन, बेरोजगारी और प्रदूषण में इजाफा होगा।</p>
<p>औद्योगीकरण की इस विकृत व अनुपयुक्त विकास नीति का अभी तक का अनुभव भी अच्छा नहीं है। उदाहरण के लिए मंडीदीप, पीलूखेड़ी और पीथमपुर का अनुभव लें। भोपाल और इंदौर के पास इन औद्योगिक क्षेत्रों को चालाकी से इस तरह बनाया गया है कि वे हों तो महानगर के पास, किन्तु पिछड़ें जिलों में हों, ताकि पिछड़ें जिलों में मिलने वाली रियायतें व अनुदान उद्योग लगाने वाली कंपनियों को दिया जा सके। इतने साल बाद नतीजा क्या हुआ ? मंडीदीप से रायसेन जिले का पिछड़ापन दूर नहीं हुआ, पीलूखेड़ी से राजगढ़ जिले की गरीबी दूर नहीं हुई और पीथमपुर ने इंदौर नगर का विकास किया, धार जिले के आदिवासियों का नहीं। इसी तरह भिलाई, बोकारो और राउरकेला के पास के आदिवासी इलाकों को भी देखा जा सकता है। आधुनिक उद्योगों की प्रकृति ऐसी होती है कि वे गरीबी के सागर में, प्राकृतिक संसाधनों और श्रम का शोषण करते हुए, बहुत मामूली रोजगार पैदा करते हुए और उससे ज्यादा आजीविका नष्ट करते हुए, संपन्नता के टापू बनाते हैं। इनसे समग्र विकास और सम्यक विकास नहीं हो सकता। इसीलिए गांधी, लोहिया और जयप्रकाश ने इस औद्योगीकरण का विरोध करते हुए गांव-केन्द्रित औद्योगीकरण और स्थानीय संसाधनों पर आधारित विकास पर जोर दिया था।  एक आदिवासी बहुल, पिछड़ा, प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर, कृषि प्रधान, गांव प्रधान राज्य होने के नाते मध्यप्रदेश के लिए यह और भी प्रासंगिक है।</p>
<p>इस अनुभव के बाद भी यदि मध्यप्रदेश और भारत की सरकारें उसी राह पर चल रही हैं तो या तो उनकी समझ में बुनियादी गड़बड़ी है या इस गलत विकास नीति में उनके नीहित स्वार्थ हैं। (बड़ी परियोजनाएं बनाने और कंपनियों से गलबहियां करने में उन्हें भ्रष्टाचार के नए मौके मिलते हैं।) शायद दोनों हैं। नीति और नियत दोनों में खोट हैं।</p>
<p>मध्यप्रदेश के विकास की दिषा और स्वरुप को तय करने का काम पिछले दो दशकों से दो अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं &#8211; एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक कर रही हैं। इनके कर्जों के साथ ही पानी, सिंचाई, सड़कों, षिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, जंगल आदि में क्या होगा, उसकी शर्तें और नीतियां भी आती हैं। एषियाई विकास बैंक के सुधारों के तहत ही प्रदेष सरकार के कई उपक्रमों को बंद किया गया है, कर्मचारियों की भारी छंटनी की गई है, निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है और बिजली-पानी-सड़कों के टोल टैक्स आदि की दरें बढ़ाई गई हैं। इस विदेशी हस्तक्षेप ने प्रदेश की जनता की आवाज को एकतरफ किया है और जनता के कष्ट बढ़ाए हैं।</p>
<p><strong>मध्य में भी नहीं मध्यप्रदेश</strong></p>
<p>जीडीपी, उसकी वृद्धि दर या प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ें किसी मुल्क की हालत को सही बयां नहीं करते, यह अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कबूल किया जाना लगा है। गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार आदि में क्या हो रहा है, यह देखना भी जरुरी है। एक वैकल्पिक पैमाने के रुप में मानव विकास सूचकांक भी बनाया गया है। मध्यप्रदेश इन कसौटियों पर कहां ठहरता है ? वह देश के मध्य में नहीं, सबसे नीचे है।</p>
<p>मानव विकास सूचकांक &#8211; सन् 2001 में मध्यप्रदेश का मानव विकास सूचकांक 0.394 था जो राष्ट्रीय सूचकांक 0.472 से काफी कम था। मानव विकास सूचकांक में देश के 32 राज्यों में मध्यप्रदेश का स्थान 30वां, यानी बहुत नीचे था। केवल उत्तरप्रदेश और बिहार मध्यप्रदेश से बदतर थे। दस सालों में मध्यप्रदेश कुछ ऊपर गया है किन्तु हालत ज्यादा नहीं बदली है, यह मानने के पर्याप्त कारण हैं, जो आगे बताए गए हैं।</p>
<p>गरीबी &#8211; हालांकि गरीबी रेखा की प्रचलित परिभाषा गरीबों की संख्या को बहुत कम करके बताती है, फिर भी तुलना के लिए उन्हें देखा जा सकता है। तालिका 3 से पता चलता है कि बीच में तो मध्यप्रदेश में गरीबी कम होने के बजाय बढ़ी है। 1993-94 में मध्यप्रदेश की हालत राष्ट्रीय औसत से बेहतर थी, किन्तु बाद में काफी नीचे आ गई। 2009-10 में मात्र दो राज्यों (बिहार और ओडिशा) में गरीब आबादी का अनुपात मध्यप्रदेश से ज्यादा था और एक (उत्तरप्रदेश) में मध्यप्रदेश के बराबर था। यानी प्रगति और विकास के दावों के बावजूद मध्यप्रदेश देश के सबसे ज्यादा गरीबी वाले सूबों में शुमार है।</p>
<p><strong>तालिका 3: गरीबी रेखा के नीचे आबादी का प्रतिशत (तेंदुलकर पद्धति से)</strong></p>
<p>वर्ष         1993-94   2004-05   2009-10</p>
<p>मध्यप्रदेश     44.6      48.6      40.5</p>
<p>भारत       45.3       37.2      32.2</p>
<p>स्रोत: मोंटेक सिंह अहलूवालिया का लेख (देखें संदर्भ)</p>
<p>शिक्षा &#8211; मध्यप्रदेश में स्कूलों में बच्चों के नामांकन में तो काफी प्रगति दिखाई देती है और यह 95 फीसदी करीब हो गया है, हालांकि इसमें एक हिस्सा कागजी होगा। किन्तु अभी भी पढ़ाई को बीच में छोड़ने वाले बच्चों का प्रतिशत काफी ऊँचा है। 2007-08 में कक्षा 8 तक आते-आते 46.1 फीसदी बच्चे पढ़ाई छोड़ रहे थे। इसका मतलब है कि करीब आधे बच्चे कक्षा आठ तक भी शिक्षा हासिल नहीं कर पा रहे हैं।</p>
<p>किन्तु शिक्षा में सबसे बड़ी गिरावट इसकी गुणवत्ता में आई है। इसके लिए खुद सरकार की नीतियां और व्यवस्थाएं जिम्मेदार रही हैं। सरकारी शालाओं में पूर्णकालिक स्थायी शिक्षकों के कैडर को समाप्त करके कम वेतन पर पैरा शिक्षकों की व्यवस्था बनाने में मध्यप्रदेश देश का अग्रणी प्रांत है। आज यहां पैरा शिक्षकों की कई श्रेणियां हैं &#8211; अध्यापक, संविदा शिक्षक, गुरुजी, अतिथि शिक्षक आदि। प्रदेश की ज्यादातर प्राथमिक शालाएं एक, दो या तीन शिक्षकों के भरोसे चल रही हैं, यानी वहां एक कक्षा पर एक शिक्षक भी नहीं है।</p>
<p>इसी के समानांतर और इसी के कारण मध्यप्रदेश में निजी स्कूलों का पूरा बाजार विकसित हो गया है। बच्चों की शिक्षा में भेदभाव का एक नया तंत्र विकसित हुआ है, जिसमें आर्थिक हैसियत के मुताबिक बच्चों को शिक्षा मिल रही है। ज्यादातर निजी स्कूल शिक्षा की घटिया दुकानें है, जिनकी फीस, शिक्षा की गुणवत्ता और षिक्षकों के शोषण पर सरकार या समाज का कोई नियंत्रण नहीं है। यही गिरावट उच्च शिक्षा में भी आई है। मध्यप्रदेष में उच्च शिक्षा पहले भी अच्छी हालत में नहीं थी, किन्तु अब और ज्यादा हालत बिगड़ी है। बहुत सारे बी.एड. कॉलेज खुल गए हैं, जो बिना पूरी फैकल्टी के चलते हैं और बिना हाजिरी के परीक्षा में बैठा लेते हैं। इंजीनियरिंग कॉलेजों की भी बाढ़ आई है, जिनके द्वारा विद्यार्थियों-पालकों के शोषण के किस्से सामने आते रहते हैं। शिक्षा में मुनाफाखोरी और भेदभाव एक विकृति है जो मध्यप्रदेश में खूब फल-फूल रही हैं।</p>
<p><strong>कुपोषण में अव्वल</strong></p>
<p>कुपोषण &#8211; इस मामले में मध्यप्रदेश को देश में सबसे अव्वल होने का श्रेय प्राप्त है यानी देश में सबसे ज्यादा कुपोषण लगातार इसी राज्य में है।</p>
<p>कुपोषण की जानकारी का सबसे प्रमुख स्त्रोत ‘राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण’ है, जो 1992-93, 1998-99 और 2005-06 में हुआ था। पहले सर्वेक्षण में बाल कुपोषण की दृष्टि से सबसे खराब प्रांतों में मध्यप्रदेश सातवें नंबर पर था। दूसरे सर्वेक्षण में पहले नंबर पर पहुंच गया। छत्तीसगढ़ अलग होने के बाद उसकी स्थिति और खराब हुई तथा वह सबसे ज्यादा बाल कुपोषण वाले पद पर विराजमान है। वर्ष 1992-93 में मध्यप्रदेश में 3 वर्ष से छोटे 48.5 फीसदी बच्चे कुपोषित थे। इनकी संख्या कम होने के बजाय 1998-99 में बढ़कर 55.1 फीसदी हो गई। सात वर्ष बाद और बढ़कर 60.3 फीसदी हो गई। इस तरह जहां और राज्य कुपोषण कम कर रहे थे, मध्यप्रदेश में बढ़ रहा था।</p>
<p>शिशु मृत्यु दर (जन्म से एक वर्ष के अंदर मरने की दर) में भी यह प्रदेश अव्वल है। 2005 के आंकड़ों के मुताबिक इस प्रांत में जन्म लेने वाले 1000 बच्चों में से 76 बच्चे अपना पहला जन्मदिन नहीं देख पाते थे। बाद में यह दर 2008 में 70 पर आई, फिर भी देश में सबसे ऊँची है। मध्यप्रदेश की हालत अफ्रीका के बदनाम अकालग्रस्त देशों से भी बदतर है।</p>
<p>इसी तरह महिलाओं का कुपोषण और जननी मृत्यु दर (प्रसव के दौरान मरने की दर) भी मध्यप्रदेश में काफी ऊँची है। इसे कम करने के लिए जननी सुरक्षा योजना चलाई जा रही है, जिसमें जोर दिया जाता है कि सारे प्रसव अस्पताल में ही हों। किन्तु इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि स्वास्थ्य एवं चिकित्सा का सरकारी तंत्र कितना चुस्त-दुरुस्त है। शिक्षा की तरह स्वास्थ्य में भी सरकारी अस्पतालों की बदहाली-बरबादी-उपेक्षा हुई है। और निजी डॉक्टरों और अस्पतालों के बाजार का तेजी से विकास हुआ है। ये दोनों प्रवृत्तियां परस्पर पूरक और एक दूसरे को पुष्ट करने वाली हैं। ऐसे वाकये भी सामने आये हैं, जब गरीब महिलाओं को अस्पतालों के बाहर सड़क पर, नाली के किनारे, बच्चों को जन्म देना पड़ा है।</p>
<p>सारी आबादी के लिए सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को सुदृढ़ बनाने के बजाय गरीबों को 40 हजार रुपए तक के मुफ्त इलाज की ‘दीनदयाल अंत्योदय उपचार योजना’ जैसी योजनाएं चलाई गई है जो गरीबों का भी इलाज सुनिष्चित करने में असफल रही है। मध्यप्रदेष के स्वास्थ्य महकमे की बदहाली के ये हाल है कि बार-बार प्रदेष के स्वास्थ्य संचालकों (जैसे डॉ० योगीराज शर्मा) के यहां छापे पड़ते हैं और अकूत संपत्ति पाई जाती है।</p>
<p><strong>भूख है तो सब्र कर</strong></p>
<p>सार्वजनिक वितरण प्रणाली &#8211; राषन व्यवस्था में जो भ्रष्टाचार और कालाबाजारी है वह अपनी जगह है। किन्तु प्रदेश में भारी कुपोषण के बावजूद सरकार ने इतना भी सुनिश्चित करने की जरुरत नहीं समझी कि कम से कम गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को निर्धारित 35 किलो अनाज प्रतिमाह का आबंटन किया जाए। ज्यादातर जिलों में उन्हें 20 से 25 किलो अनाज ही दिया जाता है। इसका कारण यह बताया जाता है कि प्रदेश में बीपीएल कार्डों की संख्या गरीब परिवारों की उस संख्या से ज्यादा है जिसे केन्द्रीय योजना आयोग मान्यता देता है। इसलिए केन्द्र सरकार से प्राप्त सस्ते अनाज को ज्यादा परिवारों के बीच बांटा जाता है। किन्तु मध्यप्रदेश सरकार चाहे तो इस बढी हुई संख्या को अपने खर्च पर सस्ता अनाज दे सकती है। कई राज्य सरकारों ने ऐसा किया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री ने केन्द्र सरकार के दोषपूर्ण गरीबी रेखा निर्धारण पर शोर तो मचाया है। किन्तु उस अन्याय को अपने बजट से पूरा करने की जरुरत नहीं समझी।</p>
<p>इस तरह मध्यप्रदेश में गेहूं-चावल की पैदावार तो भरपूर हो रही है, किन्तु प्रदेश के गरीबों को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा। वह अनाज या तो प्रदेश से बाहर चला जाता है या गोदामों में सड़ जाता है। गरीब जनता के लिए तो वही संदेश है जो दुष्यंत कुमार ने अपनी गजल में उतारा था -</p>
<p>भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ।</p>
<p>आजकल संसद में है, जेरे बहस ये मुद्दआ।।</p>
<p><strong>सामाजिक सुरक्षा</strong> -<br />
प्रदेश के बेसहारा, बूढ़ों, विधवाओं और विकलांगों को दी जाने वाली मासिक सामाजिक सुरक्षा पेन्शन की राशि 150 और 275 रुपए की हास्यापद व दयनीय दरों पर काफी समय से चली आ रही है। देश के अन्य राज्यों में यह राषि 400 से लेकर 1000 रु. तक है। विडंबना यह है कि प्रदेश के मंत्री और विधायक साल-दो साल में विधानसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास करके अपने वेतन, भत्तों और पेन्शन में काफी बढ़ोत्तरी कर लेते हैं। इससे ज्यादा राजनीति की निर्लज्जता  और विद्रूपता का उदाहरण और कहां मिलेगा ?</p>
<p>विडंबना यह भी है कि सामाजिक सुरक्षा पेन्शन की इस मामूली राशि को भी प्रदेश के घोटालेबाजों ने नहीं छोड़ा है। इंदौर नगर निगम के जिस महापौर के कार्यकाल में सामाजिक सुरक्षा पेन्शन में छत्तीस करोड़ रुपए का घोटाला हुआ, वे आज प्रदेश सरकार में दूसरे नंबर के सबसे ताकतवर मंत्री बनकर बैठे हैं। यह प्रदेश की राजनीति की घोर गिरावट को भी बताता है।</p>
<p>कुल मिलाकर, मध्यप्रदेश आंतरिक उपनिवेश पर आधारित गलत विकास नीति, गलत प्राथमिकताओं और पतनशील राजनीति का मारा एक बेचारा प्रदेश है। इसकी मुक्ति तभी हो सकती है, जब यह वैकल्पिक विकास की राह पर चलेगा। किन्तु इसके लिए प्रदेश के आम लोगों को आगे आकर संघर्ष करना होगा तथा प्रदेश की राजनीति को भी बदलना होगा जो कि भ्रष्ट नेताओं, भ्रष्ट अफसरों और पूंजीपतियों &#8211; दलालों की तिकड़ी तथा कांग्रेस -भाजपा की नूराकुश्ती में फंसी हुई है।</p>
<p>sjpsunilATgmailDOTcom</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<p>(लेखक समाजवादी जन परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं ‘सामयिक वार्ता’ के संपादक है।)</p>
<p>- सुनील, ग्राम &#8211; केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)</p>
<p>पिन कोड: 461 111 मोबाईल 09425040452  </p>
<p>संदर्भ</p>
<p>1.    डाॅ० गणेष कावड़िया एवं सुश्री शीना सारा फिलिप्स, ‘डेवलपमेन्ट प्रोस्पेक्ट्स आॅफ मध्यप्रदेष’    अप्रकाषित पेपर,  2012</p>
<p>2.    ‘खुषहाली से खुदकुषी की ओर: होषंगाबाद जिले में तीन किसानों की आत्महत्याओं पर एक जमीनी रपट’, समाजवादी जन परिषद, अक्टूबर 2011</p>
<p>3.    डाॅ० रामप्रताप गुप्ता एवं आर.सी. गुप्ता, ‘मध्यप्रदेष में भूजल का अतिदोहन’, अप्रकाषित पेपर 2012</p>
<p>4.    डाॅ० रामप्रताप गुप्ता, ‘अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद विकास पथ पर लड़खड़ाता मध्यप्रदेष’, वार्ता (डेवलपमेन्ट फाउंडेषन, अभ्यास मंडल, इंदौर की त्रैमासिक बुलेटिन), नवंबर, 2011</p>
<p>5.    मोंटेकसिंह अहलूवालिया, ‘प्रोस्पेक्ट्स एंड पाॅलिसी चेलेन्जेज इन द ट्वेल्थ प्लान’, इकाॅनाॅमिक एंड पोलिटिकल वीकली, 21 मई, 2011</p>
<p>6.    सुनील, ‘म.प्र. को घाटे का सौदा है बड़े बांध’, राज एक्सप्रेस,  21 अगस्त 2006</p>
<p>7.    सुनील, ‘बड़े उद्योगों की बड़ी-बड़ी विडंबनाएं’, राज एक्सप्रेस, 19 अक्टूबर 2007</p>
<p>8.    सुनील, ‘जमीन का असली मालिक कौन ?’ राज एक्सप्रेस, 21 दिसंबर 2007</p>
<p>9.    सुनील, ‘मध्यप्रदेष बिकाऊ है!’ लोकमत समाचार, 23 अगस्त 2007</p>
<p>10.    सुनील, ‘ कुपोषण मंे अव्वल है मध्यप्रदेष’, राज एक्सप्रेस, 7 अक्टूबर 2008</p>
<p>11.    ‘सूखती फसलें, मुरझाते चेहरे’, निमाड़ मंे बीटी-कपास की फसल में हुए व्यापक नुकसान पर जन-सुनवाई की रपट, कृषि उपज मंडी समिति, कुक्षी, जिला धार (म.प्र.), नवंबर 2005</p>
<p>12.    समाजवादी जन परिषद, मध्यप्रदेष की प्रेस विज्ञप्ति, 22 अक्टूबर 2012</p>
<p>13.    ‘बर्बादी की ओर चलें, एडीबी के साथ चलें’, जन संघर्ष मोर्चा, मध्यप्रदेष</p>
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		<title>कविता / कितनी बार क्षमा / लाल्टू</title>
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		<pubDate>Sat, 20 Oct 2012 03:27:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अफ़लातून अफलू</dc:creator>
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		<category><![CDATA[laltu]]></category>
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		<category><![CDATA[भालू]]></category>
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		<description><![CDATA[भालू की आँखें तुझे देख रही हैं तूने उसे जो पानी का सोता दिखाया था वह ऊपर गुफा तक जाता है भालू की आँखें कहती हैं तुझे गुफा तक ले जाऊँ वहाँ तू भालू को सीने से लगा सोएगी बीच रात उठ पेड़ों से डर मेरा कंधा माँगेगी भालू पड़ा होगा जहाँ तू सोई थी [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kashivishvavidyalay.wordpress.com&#038;blog=439658&#038;post=1314&#038;subd=kashivishvavidyalay&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<pre><span style="font-family:Lohit Hindi;">भालू की आँखें तुझे देख रही हैं</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">तूने उसे जो पानी का सोता दिखाया था</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">वह ऊपर गुफा तक जाता है</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">भालू की आँखें कहती हैं</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">तुझे गुफा तक ले जाऊँ</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">वहाँ तू भालू को सीने से लगा सोएगी</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">बीच रात उठ पेड़ों से डर मेरा कंधा माँगेगी</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">भालू पड़ा होगा जहाँ तू सोई थी</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">कीट पतंगों की आवाज के बीच बोलेगी चिड़िया</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">तुझे प्यार करने के लिए</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">भालू को पुचकारुँगा</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">तू ले लेगी भालू को फिर देगी अपना नन्हा सीना</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">बहुत कोशिश कर पूछेगी</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">बापू भालू </span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">मैं सुनूँगा भालू भालू </span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">गाऊँगा सो जा भालू सो जा भालू </span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">नहीं कह पाऊँगा उस वक्त दिमाग में होगी सुधा</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">छत्तीसगढ़ में मजदूर औरत की बाँहों से तुझे लेती</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">तब तक कहता रहूँगा  सो जा भालू सो जा </span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">जब तक तेरी आँखों में फिर से आ जाएगा जंगल</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">जहाँ वह सोता है</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">जो ऊपर गुफा तक जाता है</span><span style="font-family:Lohit Hindi;">..........</span>

<span style="font-family:Lohit Hindi;">किस डर से आया हूँ यहाँ</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">डरों की लड़ाई में कहाँ रहेगा हमारा डर</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">तेरा भविष्य बोस्निया से भागते अंतिम क्षण</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">हे यीशुः कितनी बार क्षमा

</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">क्या अयोध्या में आए सभी निर्दोषों को करेगा ईश्वर मुआफ</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">तू क्या जाने ईश्वर बड़ा पाखंडी</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">वह देगा और ताकत उन्हें जो हमें डराते</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">भालू को थामे रख</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">यह पानी का सोता जंगल में बह निकल जहाँ जाता है</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">वहाँ पानी नहीं खून बहता है</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">तब चाँद नहीं दिखता भालू डर जाएगा</span><span style="font-family:Lohit Hindi;">.........</span>

<span style="font-family:Lohit Hindi;">भालू को थामे रख</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">वह नहीं हिंदू मुसलमान</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">खेल और गा भालू खा ले आलू</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">कोई मसीहा नहीं जो भालू को बचा पाएगा</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">कोई नहीं माता पिता बंधुश्चसखा</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;">इस जंगल से बाहर </span><span style="font-family:Lohit Hindi;">...</span>

<span style="font-family:Lohit Hindi;">भालू को थामे रख।</span>

<span style="font-family:Lohit Hindi;">(</span><span style="font-family:Lohit Hindi;">रविवारी जनसत्ता  १९९२</span><span style="font-family:Lohit Hindi;">)</span>
<span style="font-family:Lohit Hindi;"> </span></pre>
<p><strong><ins datetime="2012-10-20T03:12:22+00:00"> </ins></strong></p>
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